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अस्म्पृक्त जीवन और लोक साहित्य

ब्रजरतन जोशी
बाह्य और आन्तरिक वास्तविकता के साथ प्राणों के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया का नाम ही जीवन है। जीवन कलाओं की खान है। कला अपनी संरचना में यथार्थमुक्त नहीं। इसीलिए सामान्यतः जिस कर्म व्यापार का संबंध यर्थाथ से नहीं होता, उसे महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता है। हर मानवीय कर्म व कला यथार्थ की सृष्टि करते हुए उसका उद्घाटन भी करता है।
लोक साहित्य जीवन की सामूहिक अभिव्यक्ति है। हमारे अकृतिम यानी प्राकृतिक स्वभाव संरचना का आदर्श रूप भी है। लोक को अक्सर अंग्रेजी के फोक का पर्याय मानकर उसकी व्याख्या की जाती है। यह एक भ्रामक स्थिति है। लोक की जीवंतता उसका प्राणतत्व है जो कि फोक से उसे नितान्त अलग साबित करती है। क्योंकि लोक पुराना, आदिम, बीता हुआ नहीं है वरन् उसका तो धातु अर्थ ही है देखना जो कि वैदिक साहित्य से इसी रूप में प्रयुक्त होता चला आ रहा है। लोक अव्यतीत, अनादिम और अनुभूति जीवनधारा का सतत् प्रवाहमान स्रोत है। लोक की भारतीय दृष्टि से व्याख्या की गहराई में जाएँगे, तो हमें पता चलेगा कि भाषा, प्रकृति और जीवनचर्या से स्थूल-सूक्ष्म, अंग-उपांग सबकुछ लोक में हैं। उससे परे नहीं। जबकि फोक में पिछडेपन, पुरानेपन और असंस्कार की ध्वनियाँ शामिल हैं। संस्कार लोक की आत्मा है। लोक शब्द के मानी हैं दृश्यजगत् खुली जगह, प्रकाश मुक्त विचरण। लोक साहित्य की विशिष्टता इसमें है कि वह नए जीवन क्षणों को प्रतीक रूप में व्यक्त कर जीवन को समृद्ध करता है। इस अर्थ में लोक एक सांस्कृतिक प्रक्रिया भी है। अर्थव्यवस्था के दबाव, बाजार के पैरोंतले रौंदे जा रहे समय के दबे-घुटे सीमित जीवन में लोक ही प्राण ऊर्जा का संचरण करता है। अब प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे विचलनकारी समय में सामाजिक परिवेश के विकास में लोक की भूमिका निर्णायक या सहायक सिद्ध हो सकती है? क्या लोक हमारे समय के नए तनावों, द्वन्द्वों को नई राह दिखा पाने में सक्षम है? सीधे-सीधे कहें, तो क्या लोक हमारे विमर्श का विषय है? क्या लोक का आलोक हमारे जीवन में नवीन आयाम जोड सकता है?
सबसे पहले तो यह जान लेना ज्यादा जरूरी है कि लोक और यथार्थ दो भिन्न अनुभव नहीं है वरन् एक ही है, यानी जो लोक है वही यथार्थ है। इसलिए हमारे जीवन में लोक का आलोक अनुभव के माध्यम से ही उपजता है। दूसरे सामान्यतः लोक अनुभवों, आचरणों, रीति-रिवाजों परम्पराओं और इतिहास की समस्त उपलब्ध जीवन्त चेतनाओं का संग्रहागार-सा है। क्योंकि लोक का कोई स्वाधीनशास्त्र नहीं है और न ही यह अपना शास्त्र रचता है। जन्मना और विलसना ही इसका प्रमुख लक्षण है। लोक की एक बडी ही जबरदस्त विशेषता यह भी है कि उसकी विदाई नहीं होती या कह लें इसे विदा नहीं किया जाता जबकि शास्त्र के साथ तो दोनों का व्यवहार संस्कृति के इतिहास में स्पष्ट परिलक्षित है। यानी शास्त्र की तुलना में लोक अजर-अमर है। यह जो निरन्तरता और उससे भी आगे बढकर शाश्वतता का भाव है वहाँ आज के हमारे परिवेश पर मँडरा रहे खतरों से लडने के लिए, उनसे संस्कृति की रक्षा के लिए बहुत ही कारगर और सफल साबित हो सकता है बशर्ते संस्कृति लोक पर विश्वास रखें। जब तक हम किसी विचार, दर्शन या जीवन पद्धति को नहीं समझते तब तक हमारे जीवन में उसके लिए पर्याप्त जगह नहीं बना पाते हैं। लोक के पास क्या नहीं है- गहरी मानवीय एवं सामाजिक मुक्ति की आधारभूमि होने लायक। इसीलिए वह हमें राह दिखाने में पूर्णतः सक्षम है। लोक पूर्णता की आकांक्षा का सबसे सरल, तीव्र और विश्वसनीय मार्ग है। तीसरे, लोक का सामना जिन जनसमूहों से हो रहा है वे बहद सीमित, उग्र और हिंसा की सत्ता के अनुचर हैं। उनके बरअक्स लोक एक सामूहिक, विराट और अनंत ऊर्जा का अखूट खजाना है। ऐसे में क्या लोक के अतिरिक्त कुछ है जिसके चलते हम लोक को अपने विमर्श के केन्द्र से बाहर कर दें। अपनी प्रक्रिया और प्रविधि में लोक दमित इच्छाओं की अभिव्यक्ति और विरेचन करते हुए संस्कृति के विराट परिसर की सफाई करता है। इसलिए लोक ही को साफ माथे का समाज कहा गया। लोक जनमानस की पाठशाला है। जो पीढियों के संस्कार हस्तांतरण कर मानवीय विवेक को पुष्ट करता है। लोक के पास ताल, स्वर, लय और अभिनटन का विशाल रंगमंच भी है। दृश्य-श्रव्य का संगम स्वरूप इसकी विशिष्टता में चार-चाँद लगाता है। मध्यप्रदेश के लोक आख्यान के रचनाकार प्रख्यात साहित्यकार धु*व शुक्ल ने लिखा है कि लोक अनंत भी है और आँगन भी। वह अनंत को आँगन में उतार लेता है। घर के आँगन से ही अनंत की यात्रा करता है। लोक में ही वह शक्ति है कि आह्वान न जानते हुए भी सारे देवताओं को एक छोटा-सा चौक पूरकर इसमें प्रतिष्ठित कर सकता है। और सबसे महत्त्वपूर्ण तो ये कि लोक हमें आत्मान्वेषण की प्रक्रिया से गुजारता है। वह हमारे विस्मृत होते जा रहे अतीत से हमारा साक्षात्कार करवाता है। अंतस की पारस्परिकता का विकास और प्रत्यक्ष बोध इसके प्रामाणिक गुणधर्म है। लोक हमें अपनी विचार प्रक्रिया में निरन्तर इसका बोध कराता चलता है कि हम क्या थे? हम क्या होते जा रहे हैं? इस रूप में यह ऐतिहासिक है। लोक एक तरह का जैव-सामाजिक दर्शन जिसे स्थापित करने में हमें अपनी पूरी शक्ति खपानी, लगानी होगी।
लोक को किसी एक अनुशासन या ज्ञान प्रविधि तक देखना दृष्टि की सीमितता का ही परिचय देना होगा, क्योंकि लोक की यात्रा मानव मनोविज्ञान के साथ-साथ भूगोल, समाजशास्त्र और अन्य समाज विज्ञानों में शोध की नई संभावनाओं को उभारती हुई आगे बढती है।
आज जब सम्पूर्ण जीवन पर उन्नमाद, आपाधापी, अस्थिरता, अनावश्यक तेजी और उत्तेजना की गिरफ्त दिन-ब-दिन बढती जा रही है, तो यह लोक ही है जो हमें अस्तित्व के साथ सहज सम्बन्ध विकसित करने के विचार के लिए उत्प्रेरित करता है और न केवल उत्प्रेरित ही करता है बल्कि जीवन और अस्तित्व के रिश्ते को प्रगाढ भी बनता है। लोक जीवन का दृढ आधार है।
लोक के आँगन में फल-फूल रही क्षेत्रियता, स्थानीय बोलियाँ, भाषाएँ और संस्कार न केवल हमारी निष्ठाओं को निष्कम्प बनाते हैं साथ ही वे हमारे विचार को विवेकयुक्त भी करते हैं। लाक हमारे व्यक्तित्व की अपूर्णता से पूर्णता की यात्रा को भी सुगम करता है। इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि लोक साहित्य में निबद्ध क्षेत्रीय/स्थानीय या कह लंं सामाजिक संस्कारों की संभावनाओं की सही-सही सन्दर्भों में पहचान करें और व्यापक मानवीय जीवन के उत्थान में चेतना युक्त दृष्टि से उसका उपयोग भी करे।
लोक की अपनी संरचना में यह दृष्टि पूर्व से ही मौजूद है कि वह अपनी प्रक्रिया और प्रवृधि में अविचारित, अर्थहीन और अनावश्यक को छोडकर मूल्यवान को ही ग्रहण कर के जीवन की राह को आसान बनाता है। आज हम जोर-शोर से जिस राष्ट्रीयता और वैश्विकता की बात करते हैं, दरअस्ल उसकी जडें आँचलिकता और क्षेत्रीयता में ही है।
अस्तु, हमें लोक के आँगन में रहते हुए अपनी अपरिमित शक्ति, अनंत सौन्दर्य और अदम्य ऊर्जा के मध्य संतुलन बनाते हुए जीवन की राहों पर आगे बढना चाहिए।
इस अंक के विशेष स्मरण स्तभ में इस बार हम मेवाड की लोकवाणी के गायक परमहंस चतरसिंह जी बावजी के बारे में एक विशेष आलेख दे रहे हैं। बावजी के लेखन की एक अद्भुत विशेषता यह थी कि वे गूढ से गूढ विषय को सरलतम रूप में अभिव्यक्त कर सकते थे। ईश्वर और लोक व्यवहार के साथ ज्ञानतत्व के सूक्ष्म चिन्तन की जितनी विविध और सरल अर्थ छँटाएँ इनके यहाँ मिलती है उतनी किसी अन्य के यहाँ मिलना दुर्लभ है।
इस अंक में हमेशा की तरह आफ लिए नौ लेख, एक संस्मरण, एक उपन्यास अंश, अनुवाद, कविताएँ और समीक्षाएँ तो है ही, साथ ही नियमित सामग्री साहित्य समाचार, संवाद निरन्तर और प्राप्ति स्वीकार भी हैं।
कोरोना पश्चात जीवन जटिल से जटिलतर हुआ है। जीवन में तकनीक का प्रवेश और विस्तार अत्यन्त तीव्र गति से हुआ है। प्रसन्नता का विषय यह है कि इस महामारी का वैक्सीन (टीका) आ चुका है। आप सब से विनम्र आग्रह है कि आप समय-समय पर केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा जारी इस संबंधी सलाह और निर्देशों का यथोचित्त पालन करें और जीवन की गति का सहज, सरल और शांत रखते हुए अस्तित्व के साथ अपने रिश्ते को प्रगाढ करें।
शुभकामनाओं के साथ
- ब्रजरतन जोशी