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अपने उद्देश्य में सफल होती रचना

सुमन केशरी
कोई भी रचना रचते समय, किसी भी रचनाकार के मन में कथ्य की एक मोटा-मोटी रूपरेखा होता है और साथ ही एक धूमिल ही सही, रचना का उद्देश्य भी। किंतु कभी कभी कोई रचनाकार रचना बहुत स्पष्ट उद्देश्य के साथ रचती है और उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कथा व उपकथाओं का चयन और उनका निर्वाह एवं विकास किया जाता है।
कुसुम खेमानी का उपन्यास लाल बत्ती की अमृतकन्याएँ मेरी दृष्टि में दूसरे, यानि कि एक स्पष्ट उद्देश्य के साथ लिखा गया उपन्यास है। कवर देखते ही हम पढ कर यह जान लेते हैं कि यह उपन्यास सोनागाछी के जीवन की कलात्मक पहचान है। हम सब जानते हैं कि सोनागाछी कलकत्ता का प्रसिद्ध रेडलाईट एरिया है- यानि कि वह ऐसी देह-मंडी है जहाँ बांग्लादेश से लेकर मायनमार, नेपाल और पूरे भारत की स्त्री देहें खरीदी-बेची जाती हैं। उपन्यास के शीर्षक में लालबत्ती का होना भी इसकी पर्याप्त सूचना पाठक को दे देता है। लाल बत्ती माने रेडलाईट। दुनियाभर में वैश्याओं की मंडी इसी संज्ञा से पुकारी जाती है। यहाँ भीतर जाने से पहले रुको...सोचो...जो जिंस बन कर जा रहा है वह भी और जो ग्राहक बन कर जा रहा है, वह भी जरा देर को थम जाए! देह व्यापार दुनिया के प्राचीनतम धंधों में से एक है और दूसरा यह कि स्त्री की सारी पवित्रता उसकी देह की शुचिता पर टिकी हुई है। देह को किसी ने विवाहेतर संबंध में बलात् अपवित्र कर दिया तो समझिए, स्त्री अब घर में रहने के काबिल नहीं !
इस उपन्यास का नाम लाल बत्ती की अमृतकन्याएँ में अमृतकन्याएँ संज्ञा लाने के लिए लिपिका की कथा चुनी गई है। लिपिका पढी-लिखी सभ्य स्त्री है और बाकी औरतों की तरह वह भी छल का शिकार होकर सोनागाछी पहुँची है। उसका ग्राहक एक सेठ है, जिसकी सेठानी लिपिका को बरजने-धमकाने के लिए उसके कोठे पर आती है। जब मोटी भद्दी सेठानी लिपिका को विषकन्या कहती है तब राधिका उसे गरज कर बताती है कि सेठानी जी! विषकन्या हम नहीं हैं। सच तो यह है कि हम लोग कामुकता के विष से आफ घरों को बचाने वाली अमृतकन्याएँ हैं। अगर हम नहीं होतीं तो आप लोगों के घर परिवार सडने लगते। दरअसल आपको तो हमारा शुऋगुजार होना चाहिए कि हम आप लोगों की पारिवारिक गंदगी खुद झेलकर, आफ घरों को सुरक्षित कर देती हैं....।
विडंबना फिर भी यह है कि राधिका और तमाम पात्र घर की गंदगी और छल से सोनागाछी पहुँची हैं...और अगर सोनागाछी न होता तो जाने क्या क्या होता!
इस उपन्यास की केन्द्रीय पात्र राधिका नामक स्त्री है। उपन्यास में अनेक औरतों की कहानियाँ है, जो किसी न किसी तरह राधिका से जुड जाती हैं। किसी को वह बचाती है, तो किसी को मरते देखती है, किसी मृतक यौनकर्मी की बच्ची को वह माँ का धन चुफ से भिजवाती है। यह राधिका स्वंय भी इस सोनागाछी में अपने परिवार के एक लडके द्वारा बलात्कार के बाद बेच दिए जाने के चलते आई है। खुद राधिका ने बहुत जुल्म सहने के बाद इसे धंधे के तौर पर बहुत स्वीकार कर लिया है और इसीलिए किसी से बातचीत या मीटिंग करते हुए वह बेबाक ढंग से कह सकती है कि एक दो ग्राहक निबटा कर आती हूँ। किंतु अधिकांश पात्र इस कर्म को धंधे के तौर पर नहीं संबंध के तौर पर देखती हैं, इसीलिए शोषण का शिकार भी होती हैं और कई मार भी डाली जाती हैं।
दरअसल यह पूरा उपन्यास इसी आशय के साथ लिखा गया है कि वेश्याृत्ति को बाकी धंधों की तरह ही धंधा मान लिया जाए, ताकि इसके नियम कानून बन सके। नियम-कानून वाली बात इस उपन्यास में दुर्भाग्य से कुसुम खेमानी ने नहीं उठाई है, जबकि जितनी मार-पीट, हत्याएँ छल-प्रपंच इस उपन्यास के पन्ने-पन्ने पर होते दिखते हैं, उसमें यह सवाल केन्द्रीय सवाल की तरह लाना चाहिए था। यह इस उपन्यास की सीमा है कि कुसुम खेमानी ने इस बात को नहीं उठाया, जबकि आज वेश्यावृत्ति को लेकर होने वाले किसी भी बहस का एक मुद्दा यह होता ही है और सोनागाछी की वेश्याएँ स्वयं इस माँग को खुलकर उठा रही हैं।
कुसुम खेमानी इस उपन्यास में अनेक छोटी छोटी कथाओं के माध्यम से लडकियों के वेश्या बना दिए जाने के बारे में बताती हैं और लगभग सभी कथाएँ नारी मन की इस मूलग्रंथि को सामने लाती हैं, जिसमें स्त्री को प्रेम और घर में ही सब कुछ सार्थक होता दिखता है। सारी लडकियाँ बहुत सुंदर हैं। लगभग सब बहुत अधिक कमा रही हैं। यह पढना कुछ असुविधाजनक लगता है। दरअसल एक सामान्यीकरण भी। एक कहानी जिसमें लेखिका का मन लगा है वह है प्रतिमा और मोहन की कहानी, जिसमें मोहन अपनी चिकनी-चुपडी बातों से प्रतिमा को निरंतर मूर्ख बनाता है और अंत में उसके तन-मन धन को पूरी तरह से लूट कर उसकी हत्या कर देता है। शातिर मोहन जिस पंखों वाले तकिए से उसकी साँस अवरुद्ध करता है, उसका खोल तक ले जाता है ताकि उंगलियों के निशान न बचें। हर जगह मौजूद और प्रतिमा के इस अंजाम के प्रति आशंकित राधिका तक उसे नहीं बचा पाती क्योंकि वह चाहे प्रतिमा हो या सुवर्णकोना, दोनों को अपने-अपने पुरुषों से इतना प्रेम है कि वे उनके लोभ को समझ ही नहीं पातीं। सुवर्णकोना के बारे में तो यह और भी हृदयविदारक है क्योंकि उसका मर्द तो उसे मारता भी है। पर वह राधिका से साफ कह देती है कि वह उसे बहुत प्यार करती है। हाँ प्रतिमा का मोहन हद दर्जे का शातिर और कमीना है। वैश्याओं पर आक्रमण और उनकी हत्याओं के चित्र मार्मिक ढंग से उकेरा गया है।
उपन्यास में ढेरों कहानियाँ हैं, जिसमें सबसे मार्मिक कहानी डॉ.पांडा की है। पुरुष पात्रों में एकमात्र वही सद्पात्र भी हैं, वरना बाकी सब कामुक कपटी और क्रूर हैं। पृथा के यह पूछने पर कि इस गली में कभी कोई एकनिष्ठ भी होता है क्या? राधिका अजूबे की संज्ञा देती हुआ अनन्या और डॉ. पांडा की कहानी सुनाती है। अनन्या से डॉ.पांडा के प्रेम और विवाह की कहानी, जिसमें दोनों बच्चों- अन्विति और वेदांत को न केवल हक मिला बल्कि स्नेह भी। उससे पहले किसी भी यौनकर्मी का विधिवत् विवाह न हुआ था। अपनी पहली पत्नी द्वारा अनन्या के प्रति दुर्व्यवहार के चलते आहत डॉ. पांडा की उसी शाम मृत्यु हो जाती है। उनसे टूट कर प्यार करने वाली अनन्या भी कुछ समय बाद ही प्राण त्याग देती है। उसके बच्चों का हक तो डॉ. पांडा पहले ही सुनिश्चित कर चुके हैं।
इस उपन्यास में एक जगह बेबी हाल्दर भी है जो श्री संगठन की कार्यक्रता के तौर पर कैमरा लेकर अर्पिता के केस के वक्त तैनात है। यह नाम चौंकाता है। पर यह नाम भर है, खास व्यक्ति से उसका कोई ताल्लुक न होगा, ऐसा लगता है। राधिका इस उपन्यास की धुरी है। उसका चरित्र इतना विशिष्ट क्यों है, वह इतनी जागरूक कैसे है इसका पता अंतिम पृष्ठ पर चलता है, जब अपूर्वा बताती है कि राधिका नियमित लाईब्रेरी जाती है। वह सिमोन द वुआ को पढती है, दुनिया भर के बारे में जानती है। यहाँ उपन्यास खत्म हो जाता है।
दरअसल यह उपन्यास मूलतः सोनागाछी तथा अन्य जगहों पर काम कर रही यौनकर्मियों को संबोधित है कि धंधे को धंधे की तरह देखो। रेडलाईट एरिया में पांडा जैसा केस अजूबा ही होता है जो वर्षों में शायद ही कभी हो जाता है। उसमें भी पहली पत्नी अनन्या को प्रताडित करती है। सवाल उठता ही है कि एक शादी के बाद डॉ. पांडा ने दूसरी शादी की। आखिर पहली को तो वेदना होती ही। यह बात सेठानी वाले प्रसंग में भी है और मोहन वाले में भी। सभी जगह पुरुष घर और बाहर दोनों जगहों पर स्त्रियों पर कब्जा जमाए हैं। इसकी पडताल नहीं हुई। हाँ चेतावनियाँ हैं, यौनक्रमियों को लगातार राधिका के मार्फत और हिंसा के मार्फत कि वे दिल से नहीं कुछ दिमाग से काम लें। इस दृष्टि से यह उपन्यास अपने इस उद्देश्य में सफल होता है। बाकी वेश्यावृत्ति की दुनिया के जटिल सवाल इसमें नहीं उठाए गए हैं। उपन्यास रोचक है और एक सिटिंग में पढा जा सकने वाला है।

पुस्तक का नाम : लाल बत्ती की अमृतकन्याएँ
प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स
संस्करण : 2019
मूल्य : 199 रुपए
पृष्ठ संख्या : 151

सम्पर्क - बी-5/ए, ग्राउण्ड फ्लोर,
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