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भाषा और साहित्य के परिसर में परस्पर

दयाशंकर
राजीव रंजन गिरि मौजूदा हिन्दी के दृष्टिसंपन्न आलोचकों में से एक हैं। उनके पास पत्रिकाओं में सिर्फ लिखने का नहीं; बल्कि कई भूमिकाएँ निबाहने का लंबा अनुभव भी है। उनकी कई पुस्तकें और पुस्तिकाएँ - अथ साहित्य : पाठ और प्रसंग, संविधान सभा और भाषा विमर्श, लघु पत्रिका आंदोलन, सामंती जमाने में भक्ति आंदोलन, १८५७ विरासत से जिरह आदि- अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके अलावा आधी दर्जन उनकी संपादित पुस्तकें हैं, जिनमें ज्यादातर गाँधीजी से संबंधित हैं।
परस्पर : भाषा-साहित्य-आंदोलन राजीव रंजन गिरि की हाल के वर्ष में रजा फाउण्डेशन की ओर से प्रकाशित पुस्तक है, जिसमें तीन महाशोध निबंध शामिल हैं। ये महाशोध निबंध इसलिए हैं कि इनका आकार ४० पृष्ठों से लेकर ७५ पृष्ठों तक बडा है। प्रत्येक महाशोध निबंध एक-एक मुकम्मल पुस्तिका के आकार का है और इनमें से दूसरा और तीसरा पुस्तिका के रूप में पहले प्रकाशित भी हो चुका है। सुखद आश्चर्य यह है कि पुस्तक की शक्ल में प्रकाशित होने के पहले ये महानिबंध हिंदी की मान्य अलग-अलग पत्रिकाओं में छप भी चुके हैं। राजीव इस सिलसिले में स्वयं सूचित करते हुए लिखते हैं कि इस पुस्तक में शामिल तीनों शोध निबंध एक अंतराल में लिखे गए हैं। उन्नीसवीं सदी में ब्रजभाषा बनाम खडी बोली विवाद, तद्भव-14 (अप्रैल 2006); राष्ट्रनिर्माण, संविधान सभा और भाषा विमर्श; वाक-19 (अप्रैल-2014) और बीच बहस में लघु पत्रिकाएँ : आंदोलन, संरचना और प्रासंगिकता, प्रतिमान-2 (जुलाई-सितंबर, 2013) में प्रकाशित हुआ था। आरम्भिक पृष्ठ 10)
राजीव रंजन के इन शोधनिबंधों के वृहदाकार का कारण इनके विषय से संबद्ध विविध पहलुओं को बहुत करीब से देखने-समझने, जाँचने-परखने और गुत्थियों को खोलने की कोशिश है। इन निबंधों का विस्तार केवल विस्तार के लिए नहीं है, बल्कि विषय की गहरी समझ, पकड और अनेक पक्षों के गंभीर विश्लेषण के कारण है। पहले आलेख के कयास है, लेकिन बाद के दोनों निबंध बहुत सुचिंतित और तार्किक हैं। राजीव के पास सोचने-विचारने, विसंवादी मतों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालने की अपनी दृष्टि है। उनकी दृष्टि सर्वेक्षणमूलक, तुलनात्मक तो है ही, विश्लेषणात्मक और आलोचनात्मक भी है। लिखने के लिए लिखना या कॅरियर को ध्यान में रखकर लिखना उनका प्रयोजन नहीं है। आज की हिन्दी आलोचना पर जिस तात्कालिकता, भागमभाग और बाजारवाद का दबाव है, यानी कि वस्तु में गुणवत्ता हो चाहे न हो, लेकिन पैकिंग विशेष आकर्षक हो, इनसे वे अपने निबंधों को बखूबी बचा सके हैं। अपने निबंधों में लिए गए एक-एक संदर्भ को वे बहुत बारीकी से विश्लेषण करते हैं और बडे से बडे विद्वानों, लेखकों की बातों में बिना सोचे-समझे हाँ में हाँ मिलाने से बचते हैं। यदि विश्लेषण के बाद वे उन्हें तर्कसंगत लगती हैं, तो समर्थन भी करते हैं और तर्क संगत न होने पर उनकी आलोचना से परहेज नहीं करते। वे अपने आलेखों को सामान्यीकरण के दोष से प्रायः बचाते हैं। इस लिहाज से उनके बाद के दोनों निबंध अधिक प्रौढ हैं।
पुस्तक का पहला निबंध उन्नीसवीं सदी में ब्रजभाषा बनाम खडी बोली विवाद है। यह विवाद कविता की भाषा को लेकर था। एक तरफ हिंदी कविता के वे आधुनिक पुरातन पंथी थे जिनकी दृष्टि विचार और संवेदना के स्तर पर विभाजित थी। वे विचार की भाषा के सिलसिले में आधुनिक और अपने समय के साथ थे। उनकी संवेदना भी एक हद तक आधुनिक थी, लेकिन वे पुरानी-नई संवेदना को ब्रजभाषा के साँचे में प्रकट करना सुविधाजनक पाते थे। भारतेन्दु, प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, डॉ.ग्रियर्सन, वियोगी हरि आदि इस मुद्दे पर एकमत थे। दूसरी ओर वे हिंदी के कवि-लेखक थे, जो ब्रजभाषा से प्रेम रखते थे, लेकिन विचार और संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए समय की माँग के वजन पर भी खडी बोली को उपयुक्त समझते थे। इस दल में श्रीधर पाठक, हरिऔध, बालकृष्ण भट्ट, मदन मोहन मालवीय, देवकीनंदन खत्री, अयोध्याप्रसाद खत्री आदि थे। खडी बोली के स्वरूप को लेकर सब एकमत नहीं थे। आंदोलन के तौर पर इसदल के अगुआ और सूत्रधार देवकीनंदन खत्री थे। राजीव रंजन गिरि ने उन्नीसवीं शताब्दी के इस भाषाई बहस, शंका-कुशंका को बडे विस्तार से पेश किया है।
राजीव रंजन की यह बात आंशिक रूप में सही है कि असल में सभी ने काव्य-भाषा के तौर पर खडी बोली हिंदी को स्थापित करने के लिए अभूतपूर्व पीठिका तैयार की थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी की विरासत के रूप में सभी का साहित्यिक अवदान मिला था। सवाल यह है कि सभी मुंशी स्टाइल खडी बोली के समर्थक थे, क्या महावीर प्रसाद द्विवेदी भी समर्थक थे?
द्विवेदीजी संस्कृत परम्परा में विकसित हिंदी के समर्थक थे, न कि उर्दू रंगवाली मुंशी स्टाइल के। इतना ही नहीं द्विवेदी उर्दू छंदों से अधिक संस्कृत वर्णवृत्तों और हिन्दी के मात्रिक छंदों के समर्थक थे, जबकि सभी भाषा के मात्रिक छंदों को हिंदी का छंद मानने से इनकार करते हैं। राजीव रंजन गिरि के इस लेख में सबसे बडी खामी यह है कि ब्रजभाषा बनाम खडी बोली, उर्दू बनाम हिंदी के विवाद को ऊपर-ऊपर देखते हैं। इस दौर में एक बहुत बडी ताकत के रूप में अंगे*जी उपनिवेशवाद मौजूद था।
हिन्दी और उर्दू के विवाद के पीछे इसका सूत्र संचालन था और खडी बोली की आवश्यकता इस उपनिवेशवाद से संघर्ष के लिए पडी थी। उपनिवेशवाद के परिप्रेक्ष्य में भाषा के सवाल को देखने-परखने से राजीव रंजन चूक जाते हैं। निबंध समाप्त करते-करते उन्होंने भारतेन्दु और रामचन्द्र शुक्ल पर जो चलताऊ टिप्पणियाँ की हैं, वे भी आधारहीन है और छायावाद के कवियों की भाषा से अयोध्याप्रसाद खत्री की भाषा संबंधी नीति का जो रिश्ता जोडा है, वह भी तथ्य से परे है। प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी की काव्या भाषा का ढाँचा कतई खत्री की मुंशी हिन्दी वाला नहीं है।
पुस्तक का दूसरा आलेख राष्ट्रनिर्माण, संविधान सभा और भाषा विमर्श पहले की तुलना में अधिक समझदारी से लिखा गया है। लेख का केन्द्रीय मुद्दा संघ के कामकाज की भाषा का है। लंबे वाद-विवाद के बाद अंतत राजभाषा को राष्ट्रभाषा के सवाल से अलगाया। संघ की भाषा को राजभाषा और भारतीय संघ के राज्यों की भाषाओं को राष्ट्रभाषा के रूप में संघ की सूची में शामिल किया गया। राजीव रंजन गिरि ने बडे विस्तार से संघ की भाषा को लेकर बहस व उनके सभी पक्षों को रखा है। संविधान सभा में राजभाषा के लिए हिन्दी-हिन्दुस्तान उर्दू, संस्कृत, बंगला के पक्ष-विपक्ष में बहसें हुई, आरोप-प्रत्यारोप भी लगे, लिपि और अंक के मुद्दे पर देवनागरी या रोमन के चुनाव पर बहसें हुईं। अंत में राजभाषा के तौर पर हिन्दी, लिपिक तौर पर देवनागरी और अंक के तौर पर देवनागरी के अन्तराष्ट्रीय रूप पर सहमति बनी। भाषा के मुद्दे पर इस संविधान सभा से एक चूक हो गयी थी। आदिवासी भारतीय... राज्य के नागरिक हैं, उनकी अपनी भाषाएँ है, लेकिन संविधान सभा ने जयपाल सिंह मुण्डा की इस माँग को कि आदिवासी भाषाओं को भी संघ सूची में स्थान दिया जाए, संविधान सभा के लोगों ने उस समय ध्यान नहीं दिया। बहुत बाद की बात है कि अगली अनुसूची में संथाली, बोडो, भोजपुरी भाषाएँ भी शामिल की गयीं। यह कितनी विडंबना की बात है कि अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत आदि किसी राज्य की भाषाएँ नहीं थीं, लेकिन वे आदिवासी भाषाओं से पहले ही आठवीं अनुसूची में शामिल कर ली गयी। राजीव रंजन की यह बात वाजिब है कि इस प्रक्रिया में भाषा का सवाल, भाषा और उसे बोलनेवाले तथा राष्ट्र-राज्य के बीच का नाता, अलग-अलग भाषाभाषी समाज के शैक्षणिक विकास का सवाल और भाषा के साथ लोकतंत्र के रिश्ते का सवाल हाशिये पर चला गया प्रतीत होता है। आम अवाम के लिए भाषा का सवाल, जीने का, जीविका का और रोजमर्रा का मसला होता है। जयपाल सिंह की आवाज संविधान सभा में इसी लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रभाषा की दावेदार किसी भी भाषा के समर्थक समूहों ने जयपाल से पहले, इनके द्वारा उठाये सवाल पर गौर नहीं फरमाया था। जयपाल सिंह की आवाज, एक और भाषा के लिए राष्ट्रवादी दावा नहीं प्रकट कर रहीं थी, बल्कि यह राष्ट्र की उन भाषाओं को शामिल करने की बात करती है, जो राष्ट्रभाषा की कल्पना की सीमाओं से बाहर थी। (परस्पर : भाषा-साहित्य-आंदोलन, पृ.110)

राजीव रंजन के राजभाषा संबंधी बहस की परिणति पर जो टिप्पणी की है वह एकदम दुरुस्त है। राष्ट्रभाषा से राजभाषा की यात्रा में न तो हिंदी समर्थकों की सभी बातें मानी गयीं और न विरोधियों की। सफल हुआ तत्कालीन अंग्रेजीदाँ तबका। इस वर्ग की कामनाएँ बडे हद तक पूरी हो गईं। दिलचस्प बात है कि फ्रेंक एंथनी को छोड दें, तो इस तबके ने भाषाओं की सूची में अंग्रेजी का नाम रखा जाए, इसकी कोशिश नहीं की। पर वह सब हासिल करा लिया, जो चाहिए था। संविधान सभा में सभी भारतीय भाषाएँ हारी, विजयश्री तिलक अंग्रेजी के ललाट पर लगा। (वही, पृ.117)
राजीव रंजन गिरि का तीसरा महानिबंध हिंदी की लघु पत्रिकाओं के आंदोलन, संरचना और प्रासंगिकता पर है। उन्होंने लघु पत्रिका संबंधी लगभग बीस साल (सन् 1990 से 1910 तक) चलने वाली लंबी बहस को अनेक कोणों से देखा है। उन्होंने लघु पत्रिका की परिभाषा, उसके आंदोलन, आधार, संगठन और दायित्व पर बडे विस्तार से विचार किया है। उनकी दृष्टि सकारात्मक के साथ समीक्षात्मक है। उन्होंने लघु पत्रिका के अगुआ पत्रकारों- शंभुनाथ, ज्ञान रंजन आदि की गलत बयानी की आलोचना की है, तो उनकी सही बातों का समर्थन में उद्घृत भी किया है। मसलन शंभुनाथ की यह बात आजादी के बाद साहित्य का अध्ययन अधूरा है, यदि हमारे सामने लघु पत्रिकाएँ नहीं। लघु पत्रिकाओं के बारे में उनकी यह टिप्पणी बिल्कुल सही है कि लघु पत्रिकाएँ एक-एक करके धूल में गिरती जा रही हैं और उनका संगठन तथा आंदोलन खडा करके भी उनकी गिरावट को रोकपाना मुश्किल नजर आ रहा है। (परस्पर : भाषा-साहित्य आंदोलन, पृ.143)
राजीव ने यहाँ लघु पत्रिका आंदोलन की खूबियों को पहचाना है वहीं उनके आपसी मतभेदों, अन्तर्विरोधों और सीमाओं को भी। उन्होंने वामपंथी आस्था वाले रचनाकारों की मानसिक बनावट की सही पहचान की है कि बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में वामोन्मुख रचनाकारों द्वारा लघु पत्रिकाओं को सांस्कृति आंदोलन का ढाँचा देने की कोशिश एक साथ कई आयामों को प्रतिबिम्बित करती है। साठ-सत्तर के बाद जो बदलाव घटित हुए उसे समझने, विश्लेषित करने और अपनी प्रतिरोधी भूमिका के मद्देनजर यह प्रयास किया गया। - तत्कालीन दौर के संकटों को हिंदी के इन महत्त्वपूर्ण रचनाकारों ने चुनौती माना था और उससे जूझने तथा प्रतिपक्ष रचने की सच्ची कोशिश की। इस कोशिश में तत्कालीन चुनौती से अन्योन्य क्रिया स्थापित करने में इन रचनाकारों का मानसिक द्वैध भी उजागर हुआ। इन रचनाकारों ने नम्बे के दशक में हुए बदलाव को अधिकांशतया नकारात्मक अर्थों में ही देखा-परखा है। (वही, पृ. 149) जैसे कि साम्प्रदायिक उभार को तो उन्होंने बखूबी समझा, लेकिन जातिगत चेनता के विस्फोट को व्याख्यायित करने में इनका बौद्धिक औजार भोथरा साबित हुआ। दूसरी बात, लघु पत्रिका आंदोलन का एक प्रमुख मुद्दा सांस्कृतिक प्रदूषण से बचने के लिए वैकल्पिक मीडिया के रूप में खुद को स्थापित करना है। यहाँ भी मुख्यधारा की मीडिया में महज नकारात्मकता ही देखी गई है। मीडिया को देखने-समझने और वस्तुनिष्ठ आलोचना की आँख इन लोगों में नहीं दिखती है। इसके साथ ही वैकल्पिक मीडिया के तौर पर स्थापित करने के लिए आवश्यक तकनीकी बदलाव की भी समझ नहीं दिखती। लघु पत्रिका के संपादकों के वास्तविक संघर्ष और सच्चे प्रयास की ये सीमाएँ भी इस आंदोलन की संरचना में दिखती है। (वही, पृ.150)
कुल मिलाकर राजीव रंजन गिरि की यह पुस्तक और उसके तीनों महानिबंध उनके सतत् बौद्धिक विकास और प्रौढता के सूचक हैं। उन्होंने तथ्य के मद्देनजर उद्वरणों का बहुत उपयोग किया है, लेकिन उनका प्रयोजन संग्रह नहीं, बल्कि गंभीर विश्लेषण करते हुए विषय के अनेक पहलुओं का उद्धाटन है। इसके चलते वे निर्दिष्ट विषयों का बेहतर विश्लेषण, वैचारिक विकास और उनकी सुचिंतित समीक्षा कर सके हैं।

पुस्तक का नाम : परस्पर : भाषा साहित्य आंदोलन
लेखक : रानीव रंजन गिरि
प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य ५९५/-
-सम्पर्क आकाश बी-17, नीलकंठ बंग्लोज,
पंचायत हास्पिटल रोड, नाना बाजार,
वल्लभ विद्यानगर, पिन - ३८८१२० आणंद (गुजरात)
मो. ९४२७५४९३६४