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आक्रमकता की भाषा जन-आख्यान तथा प्रजातान्त्रिक प्रतिक्रिया /-गणेश नारायणदास देवी

ज्योतिका एलहेंस
उन्नीसवीं सदी के सुविख्यात छायावादी कवि पी. बी. शैली (1792-1822) ने अपने लेख, डिफेन्स ऑफ पोएट्री में लिखा था, सम्पूर्ण रचना का पद्य होना आवश्यक नहीं है, परन्तु उसके कुछ अंश अवश्य काव्यगत हो सकते हैं। एक अकेला वाक्य भी अपने आप में संपूर्ण हो सकता है, चाहे वह अनेक असमीकृत वाक्य-खंडो में घिरा हुआ क्यों न हो। एक शब्द मात्र ही पर्याप्त होता है विचारों के तारतम्य को प्रज्वलित करने हेतु । इसीलिए संसार के तमाम इतिहासकार, हेरोडोटस, प्लूटार्क, लीवी संभवतः पहले कवि थे ...

शैली कविता के विषय में लिख रहे थ, निस्संदेह एक शब्द मात्र ही बहुधा पूरे युग का सार तथा भाव प्रतिबिंबित कर जाता है।

चले जाओ/ भारत छोडो शब्द सुनते ही मानस पटल पर उन सभी नेता-गण, दार्शनिक, विचारक, गीत, गीतकार, पुस्तक, सिनेमा, घटना आदि की तस्वीर जीवित हो उठती है जिनमें यह ज*बा कूट-कूट कर भरा था। इसी प्रकार आयरिश भाषा का सिन्न फीन शब्द, हिंदुस्तानी स्वशासन का ही तो एक पूर्वज प्रतीत होता है या फिर जन-नायक बिरसा मुण्डा का उलगुलान, जिसने संसार के समस्त मूल-निवासियों के मानस में देवत्व हासिल कर अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया था।

2020 के शुरूआती महीनों से ही एक शब्द है जो प्रतिदिन लाखों बार कानों में पड रहा है, वह है पॅडेमिक, यानी की सर्व-व्यापी महामारी। यह वह शब्द है जिसने जन-साधारण के मन में एक वायरस के प्रति अजीबोगरीब दहशत फैला रखी है। वायरोलॉजिस्ट का मानना है कि यह वायरस कोरोना परिवार में नया-नया ही आया है और इसमें संपूर्ण मानव-जाति को मटिया-मेट करने की अजब क्षमता है। ऐसा विचित्र संकट जो पूरे विश्व को हिलाने की ताकत रखता हो, ना कभी देखा, ना ही सुना था। यदि शैली द्वारा लिखे गए दो शताब्दी पूर्व के लेख का विश्लेषण किया जाए, तो संभवतः यह सामने आएगा कि आमतौर पर भाषा आने वाले समय की उन सभी घटनाओं के प्रति समाज को सचेत कर देती है जिसका प्रभाव वहाँ रहने वाले लोगों के अस्तित्व से जुडा होता है। वे तमाम व्यक्ति जो कवियों, लेखकों, नाटक-कारों, मनोवैज्ञानिक या भाषाविदों से जुडे हैं, इसे नकार नहीं पाएँगे, हालाँकि इसे किसी प्रामाणिक, मात्रात्मक अथवा अनुमानित लौकिक पैमाने पर दर्शाना कोई सरल कार्य नहीं होगा।

यदि आप किसी हादसे का शिकार होते हैं , तो आपको तुरंत ही नजदीक के अस्पताल ले जाया जाता है और यदि शहर में कोई जानलेवा महामारी अपना प्रकोप दिखाती है, तो प्रभावशील उपचार हेतु लम्बी कतारें लग जाती हैं। परन्तु जब भाषा पर प्रहार हो या फिर भाषा किसी हादसे का शिकार हो तो उसका उपचार कैसे हो? हालाँकि शुरूआत के दिनों में यह प्रहार आसानी से नजर नहीं आता, परन्तु धीरे धीरे यह विकार एक विशाल रूप ले लेता है और एक ऐसे चरण पर पहुँच जाता है जहाँ से पुनः पीछे लौटना आसान नहीं होता। इस प्रकार के भाषा विकार से ग्रस्त कुछ व्यक्ति विशेष के लिए तो न्यूरोसाइंसेज द्वारा कुछ समाधान सुझाये गए हैं, परन्तु जब यह विकार संपूर्ण भाषा समुदाय को अपनी गिरफ्त में ले ले, तो न्यूरोसाइंस भी कितना प्रभावी होगा? यह विकार केवल व्यक्ति विशेष पर ही अपना प्रभाव नहीं छोडता अपितु सम्पूर्ण भाषा प्रणाली को ही क्षत-विक्षत कर देता है ।

अपनी पुस्तक अ हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलिट्यूड में गेब्रियल गार्सिआ मार्कवेज एक ऐसी घटना का वर्णन करते हैं जिसमें शब्दों को याद रख पाना ही एक जटिल समस्या बन गई है तथा प्रत्येक व्यक्ति उन वस्तुओं को पहचानने हेतु उनका नाम लिखना प्रारम्भ कर देता है। यह तो रही एक काल्पनिक कहानी की बात, परन्तु क्या असल जन्दगी में भी इसके होने की संभावनाएँ हैं? इससे पहले संभवतः इस प्रश्न का उत्तर मैं नकारात्मक में ही देता । लेकिन अब नहीं । क्योंकि मैंने अब अपने आस-पास चहुँ ओर द्वेष और क्रोध से परिपूर्ण शब्दों की एक ऐसी सुनामी का प्रहार महसूस किया है जिससे कोई भी अछूता नहीं रहा है। चुनाव के दौरान जिस प्रकार की भाषा प्रचलित हो गयी है वह इसका बहुत सटीक उदाहरण है। आये दिन शहर की सडकों पर जो कारचालकों का गुस्सा फूटता है और उनकी आँखों में एक दूसरे को कच्चा चबा जाने वाले भाव होते हैं, वह इस बात का ही एक ज्वलंत उदाहरण है। स्कूली बच्चों का अपने ही विद्यालयों के प्रति जो घोर अलगाव है, इसी प्रवृति की ही शुरुआत है । वही विद्यालय जो उनके पुराने ख्यालों वाले बुजुर्गों के लिए विद्या का मंदिर हुआ करता था। भाषा शाब्दिक अभिप्रायों की एक ऐसी अद्भुत प्रणाली है, जिसमें कई बार जटिल शब्दों का अर्थ तो अपेक्षाकृत आसानी से समझाया जा सकता है, किन्तु सीधे सरल शब्दों के पीछे छुपा तात्पर्य बेहद पेचीदा बन जाता है। उदाहरण के तौर पर अन्थ्रोपोसीन शब्द को ही लीजिये जिसका सीधा सा अर्थ है एक ऐसा युग जिसमें मानव ने प्रकृति पर अपने कामों के कुछ ऐसे प्रभाव छोडे हैं, कि अब प्रकृति स्वयं सहनशीलता की चरम सीमा के परे पहुँच गयी है।

इसके विपरीत प्रकृति शब्द दिखने में बहुत ही सरल प्रतीत होता है, किन्तु उसे सही-सही समझना तथा समझाना उतना ही जटिल। क्या इसका तात्पर्य उन सभी वस्तुओं से है जो जीवन में पहले भी थीं और बाद में भी रहेंगी ? या इसका अर्थ मानवीय स्वभाव तथा उसकी विभिन्न विशेषताओं से है? या फिर उन सब से जो संस्कार से पृथक हो? कुछ ईश्वरीय या कुछ और? और यदि इसका अभिप्राय इन सभी अर्थों से है, तो इनमें निहित विरोधाभास क्या हमें सोचने पर विवश नहीं करते कि ऐसा क्यों है? शब्दों के अभिप्राय को समझाना अत्यंत जटिल काम है। शब्दकोश जो अर्थ तथा अभिप्राय का एक अद्भुत खजाना है, आपको बताएगा, पूरी बेरुखी के साथ, कि शब्द, क्रिया तथा विचार के अर्थ क्या होते हैं । यह कभी मत पूछिएगा कि इस परिभाषा में दिए गए अर्थ का क्या अर्थ है । यदि आप ऐसा करते हैं तो स्वयं को एक अर्थहीन अंध-गली में ही पाएँगे । ऐसी बात नहीं है कि शब्दकोश इन मामलों से अनभिज्ञ है , परन्तु इसलिए कि उसे भली-भाँति ज्ञात है कि समय के साथ-साथ शब्दों के भी मायने निरंतर बदलते रहते हैं । तथा कई बार यह सब जानते हुए भी उनका प्रयोग मात्र इसीलिए किया जाता है ताकि बदलाव लाया जा सके। पिछले कुछ सालों में कई ऐसे शब्दों के मायनों में काफी बदलाव देखने को मिला है। ये ऐसे ही कुछ शब्दों की सूची है, जो हालाँकि अपने आप में परिपूर्ण नहीं है।

यदि कोई भद्रजन अपने कुछ हमप्याला, हमउम्र मित्रों के साथ राजनीति, साहित्य, अथवा संस्कृति पर चर्चा करे, तो उसे खान मार्किट इंटेल्लेक्टुअल्स के नाम से सम्बोधित किया जाता है। जो लोग अन्याय के विरुद्ध, चाहे वह कश्मीर में हो अथवा छत्तीसगढ में, विश्वविद्यालय में हो अथवा सार्वजनिक स्थल पर, आवाज उठाते हैं, उन्हें टुकडे-टुकडे गैंग कह कर सम्बोधित किया जाता है। धर्म और राजनीति से परे, जो व्यक्ति इंसान को इंसान समझता है, वह सूडो-सेक्युलरिस्ट कहलाया जाता है। यदि कोई व्यक्ति सरकार को आम-जनता के खिलाफ कार्यरत बताता है, तो वह उनकी नजर में एक देशद्रोही है। जो व्यक्ति प्रधानमंत्री पर ऊंगली उठाता है, तो वह अर्बन नक्सलवादी हो जाता है । यदि भीड एक बेगुनाह की सरे-आम हत्या कर दे, तो वे गौ-रक्षक कहलाये जाते हैं, तथा वह बेगुनाह गुनहगार बन जाता है, जिसके खिलाफ थाने में एफ. आई .आर. दजर् हो जाती है। घर में घुस के मारूँगा और चुन-चुन के मारूँगा का अर्थ है वेलफेयर स्टेट की नई सोच । नागरिकता प्रदान करना, अर्थात कुछ विशेष धर्म के लोगों को भारत में नहीं रहने देना । कपडों से पहचाने जाते हैं, अर्थात वे लोग जो हिंदुत्व की सोच से सहमत नहीं हैं । चौकीदार से अभिप्राय है, अपने ही लोगों का रहनुमा तथा बेटी बचाओ का अभिप्राय है बलात्कारी का सम्मान। ऑपरेशन कमल का अर्थ है नैतिक मूल्यों से आजादी। किसी को डरने की जरूरत नहीं है, यानी कि उन सबको सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का महिमा मंडन, अर्थात देश-विदेश के प्रमुख समाचार-पत्रों के सम्पादकीय में भारत की भेद-भाव वाली नीतियों का समीक्षण। वार्षिक विज्ञान सम्मलेन में स्वागत भाषण का अभिप्राय है गैर-वैज्ञानिक तथा अजीबो-गरीब विचारों को प्रोत्साहन । छप्पन इंच की छाती का मतलब है गरीब किसान तथा आदिवासियों का शोषण। परीक्षा पर चर्चा यानी कि विश्वविद्यालयों के छात्रों पर प्रहार। प्रधान-सेवक से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो जन मानस का सम्मान न करे। विधवा से तात्पर्य उस विपक्षी पार्टी के नेता से है जिसने देश के लिए अपना पति खोया हो। और चुनाव का अर्थ है लडाई लडाई और लडाई।

साहित्य की शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को, अपने-अपने पाठ्यक्रम के दौरान, कई सुविख्यात कवि तथा लेखकों जैसे शेकस्पियर, मिल्टन, कबीर, तुकाराम की रचनाओं में इस्तेमाल किये गए अनेक शब्द/ शब्दावलियों को पहचानने की कला सिखाई जाती है। परन्तु इस वर्तमान शिक्षा-प्रणाली ने तो शेकस्पियर और कबीर से कई गुना अधिक ऐसे शब्दों तथा विचारों का प्रचलन कर दिया है जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की गयी थी। ऐसी अनर्गल शब्दावली जिसमें अनियंत्रित घृणा, क्रोध, तिरस्कार तथा आक्रमकता का जहर दिखाई देता है। साहित्य के क्षेत्र में सदियों से चली आ रही परंपरा का अनुसरण करते हुए, भाषा की इस नई परिभाषा बनाने वालों को हेट-स्कूल कह कर सम्बोधित करना अनुचित नहीं होगा ।

यदि आज सिग्मंड फ्रॉयड से इस प्रकार के आक्रामक व्यवहार का आंकलन करने को कहा जाए तो वे संभवतः यौन-विकृति तथा नपुसंकता को इसका एक प्रमुख कारण मानेंगे। तथा मनोविज्ञान के ज्ञाता इसका श्रेय इन व्यक्तियों में निहित एक निकृष्ट दजेर् के अहंकार को देंगे, जो इन्हें इस प्रकार की राजनीति करने को उकसाता है। इतिहासकार इस राजनीतिक आख्यान को आम-जन में व्याप्त नैतिक पतन की श्रेणी में रखेंगे। परन्तु भाषा-विद् का नजरिया इन सब से भिन्न है। वे इसकी तहकीकात करेंगे और फिर उसकी व्यवहार्यता का मूल्यांकन करेंगे ।

भाषा, और कुछ भी हो, मगर है एक सामाजिक व्यवस्था। एक बार यदि उसमें पुराने अभिप्रायों के साथ नए अभिप्राय जुड जाते हैं, तो नए अभिप्राय, पुराने अभिप्रायों का एकाधिपत्य स्वीकार नहीं करते । राजनीतिक क्षेत्र में नए आये सदस्यों में इसका उपयोग तथा प्रचलन काफी बढ जाता है। घृणा तथा अवहेलना इन नवीन प्रयोगकर्ताओं को एक स्वघोषित नैतिक उत्कृष्टता प्रदान करती है, जो मात्र इनके भ्रम के अलावा कुछ नहीं होता । जब यह भाषा जन-साधारण द्वारा प्रयोग में लायी जाने लगती है तो नैतिक स्तर पर सिर्फ गंदगी और कीचड ही उपजता है। नफरतखोरी की इस पाठशाला ने तो जन-आख्यान को एक मलकुंड में परिवर्तित कर दिया है। एक समय था जब महात्मा गाँधी ने जन-साधारण में स्वराज, सत्याग्रह, अहिंसा, सविनय-अवज्ञा, यात्रा इत्यादि शब्दों को लोकप्रिय बना दिया था तथा सभी ने मिलकर देश की आजादी के आंदोलन को नैतिकता की धार प्रदान की थी। और आज घृणा की इस पाठशाला ने भारत में ऐसी अवधारणाएं पैदा कर दी हैं जो आज जन-जन में आम हो गई हैं। प्रत्येक व्यक्ति को, हर शाम इसका स्वाद प्राप्त होता है जब वह अपना टी.वी. सेट चालू करता है। भाषा में इतनी आक्रामकता, एक गहन चिंता का विषय है और इससे भी अधिक चिंता का विषय है इनका सामान्यीकरण और इनका समाजीकरण।

शब्दकोश संभवतः अर्थ के मायने भली-भाँति न समझा पाए, परन्तु मानव समाज को शालीनता तथा शिष्टाचार पर भाषा के ऐसे प्रहार से निपटना अवश्य आ गया है। भाषा प्रणाली भी विचित्र है। इसमें एक आंतरिक लचीलापन है। जब भाषा की आक्रमकता हद से परे चली जाती है तो यही भाषा उन शब्दार्थों के ही विरोध में हडताल कर देती है। संचार को बाधित कर देती है तथा संवाद की सभी संभावनाओं पर विराम लगा देती है। कोई भी भाषा-विद आपको यह स्पष्ट कर देगा कि भारत में चारों ओर पक्षपाती नागरिकता संशोधन विधेयक, एन.आर.सी., तथा राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर के विरोध में जो देश-व्यापी आंदोलन चल रहे हैं, वे इससे कहीं अधिक बडी समस्या की ओर इशारा करते हैं। यदि यह पाठशाला स्वयं को इससे ऊपर नहीं उठाती, तब तक इस विषय पर कोई भी चर्चा या विचार-विमर्श होना असंभव है। या तो वे समझदारी से इससे बाज आ जाएँ अथवा मूर्खतापूर्वक उसी पर कायम रहें, विकल्प इसी पाठशाला के पास है।

हम चाहें या ना चाहें, आज के समाज में भाषा आक्रमकता, अवहेलना, असंतोष और अस्वीकृति से सुलग रही है। पलक झपकते ही मुँह से मुझे घृणा है, जैसे अपशब्द झडने लगते हैं। हम तो बचपन से यही सुनते आ रहे हैं कि घृणा बहुत ही प्रबल शब्द है। वैमनस्य की ऐसी भाषा को और अधिक तूल देने की बजाय मैंने निश्चय किया कि मैं स्वयं खोजबीन करूँगा कि क्या शांति तथा प्रेम के पर्यायवाची मानव-भाषा से ही अंतध्यार्न हो गए हैं? मैंने इसकी शुरूआत की अन्य भाषा जानने वाले अपने मित्रों से। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या उनकी भाषा में ये शब्द अब भी प्रयोग में आते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया अपरिहार्य थी। मुझे सौ से अधिक भाषाओं से ऐसे शब्द जानने को मिले जो प्रेम के विविध रूपों तथा प्रतिरूपों को परिभाषित करते थे।

सुविख्यात कवि शैली ने ही एक बार कहा था, एक शब्द मेरे लिए इतना कलुषित हो गया है कि उसे और अधिक कलुषित करने की गुंजाइश नहीं है तथा एक भाव तुम्हारे लिए इतना अधिक तिरस्कृत हो गया है कि उसका और अधिक तिरस्कार करना संभव नहीं है। फिर भी मैं विभिन्न भाषाओं में प्रेम शब्द का प्रयोग अवश्य करना चाहूँगा। संस्कृत भाषा से मैं इसकी शुरूआत नहीं करूँगा जिसमें प्रेम, प्रीत, अनुराग, स्नेह, इत्यादि दर्जनों ऐसे शब्द हैं। जो लोग संस्कृत भाषा के पुनः उत्थान की बात करते हैं, वे राजनीतिक क्षेत्र में स्वयं असहिष्णुता के मामले में काफी अग्रणी हैं। यहाँ ना ही मैं फारसी भाषा का जक्र करूँगा जिसने हमें हुस्न, प्यार, वफा, दोस्ती, मुहब्बत, लगन, इश्क जैसे अल्फाजों से नवाजा है और खूबसूरती और जुनून से भरपूर अपनी शायरी और गजलों के माध्यम से हमारे साहित्य को एक ऐसा अनोखा खजाना दिया है जिसका कोई सानी नहीं है। आज की अधिकांश नई पीढी उदासीन हो गयी है उन सभी भारतीय वस्तुओं के प्रति जिनका उद्भव कभी फारस देश से जुडा था ।

अब हम मुखातिब होते हैं उन भाषाओं की ओर जो कुछ कम लोकप्रिय हैं। हिमाचल प्रदेश की स्टोदपा भाषा में प्रेम तथा लगाव के लिए छे-पा, या-शा, नयिंग-जा, खा-रोग, मंगो-शे, या-तो, रोग-पो जा-बो शब्द हैं। स्पीति भाषा में भी कई इसी प्रकार के शब्द हैं। किन्नौरी में हैं बेननाग , शुमचो में गौरांग, छीनल में डाह, और भोति में चेवा। और यदि प्रेम में करुण-भाव का भी पुट सम्मिलित हो जाता है, तो किन्नौरी में सल-कमली, शुमको में शालतमा, भोति में निंगजी तथा छीनल में डेल्ला। हिमालय के ठंडे प्रदेशों में रहने वाली आदिवासी जन-जातियों में इस प्रकार के सौहार्द से भरपूर शब्द आज भी इस्तेमाल किये जाते है। ये जन-जातियाँ राष्ट्रीय सीमाओं के काफी नजदीक रहती हैं तथा हमेशा ही सशस्त्र हमले के साये में जीती हैं। इनसे हमें बहुत कुछ सीख लेनी चाहिए। यदि हम पश्चिमी भारत के मावाचि भाषा बोलने वाले लोगों का जक्र करें, तो उनका जमीन का मालिकाना हक ही फारेस्ट राइट्स एक्ट के तहत उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर जोखिम में पड गया है। वहाँ पर भी हम पाएँगे कि प्रेम/ लगाव/ अनुराग के लिए उनके पास इटवुनो, दया, खूब, एतेवेहे, देखावडो, हारून, प्रेम, भक्ति, वालो, आयरियो, आरी, रोंग, कदर, हकलावनु, लाग, वालो कोअनुम तथा आयाही माया इत्यादि शब्द हैं। दोस्ती के लिए मावाचि में आरियो, बाहा, हेंगातीयो, जोडी, दोस्तार, गोवालो, हारो ईटावूनरो इत्यादि शब्द हैं। इस भाषा में शाँति तथा सामंजस्य के इतने शब्द हैं कि उनका जिक्र यहाँ नहीं करूँगा। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 1380 मातृभाषाएँ हैं। उनमें यदि प्रेम तथा शाँति के लिए इस्तेमाल आने वाले शब्दों का संग्रह बनाया जाए तो हमें 10,000 से भी अधिक शब्द मिलेंगे जो उनके पारस्परिक संबंधों को दर्शाने का काम करते हैं। इन शब्दों को बडे ही जतन के साथ उन सभी समुदायों द्वारा सरंक्षित रखा जाता है जो बहु-आयामी पाश्र्वीकरण तथा लगातार बढते हुए आर्थिक, राजनैतिक तथा सामाजिक शोषण का शिकार होते हैं।

कई लाख वर्ग किलोमीटर पर फैले हुए इन भू-खण्डों पर इन भाषाओं का प्रयोग करने वाले लोग पैदा होते हैं, बडे होते हैं, फिर वहीं पर मृत्यु को भी प्राप्त हो जाते हैं। ये वे भाषाएँ हैं जो लोगों के चैतन्य को समस्त संसार के लौकिक, अलौकिक तथा मानवीय पहलुओं से जोड देती हैं। ऐसे समय में जब घृणा-द्वेष एक आम बात हो गयी है और हिंसक प्रवृति एक मिसाल तथा असहनशीलता उन्नति का दूसरा नाम, ये सभी भाषाएँ हमें याद दिलाती हैं कि प्रेम आज भी जीवित है और यदि हम रत्ती भर भी प्रयास करें तो हम इसे पुनः प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि इन भाषाओं में घृणा अथवा क्रोध का कोई स्थान नहीं है, किन्तु ऐसा भी नहीं है कि वे किसी गहरे संघर्ष में उलझे हुए न हों। अपने सारे टकराव के बावजूद भी उन्होंने अपनी भाषा में इंसानियत के ज*बे को जीवित रखा। संभवतः यही भाव निहित हैं एकम्मा, कबीर, चैतन्य, मीरा और तुकाराम के पद्यों में जो मन को भीतर तक झंझोड देने की अद्भुत कला रखते हैं।

मानवता के इसी ज*बे ने टैगोर तथा गाँधी की रचनाओं को प्रेरित किया था परन्तु आज के जन-नायक इन सब से कहीं दूर निकल गए हैं। भगवा वस्त्र धारियों ने तो अली को बजरंग-बली के खिलाफ खडा कर दिया तथा पोषाक की बहुरूपता का साक्षात् प्रतीक जब अकाल पीडित किसानों से कहता है कि हमारे बम-पटाखे केवल दिवाली पर फोडने के लिए नहीं हैं, तो यकीनन हम मानवता के ख्याल से काफी दूर निकल आये हैं। वे तथा उन जैसे लोग जब भारत के 130 करोड लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो कुछ कम विडम्बना का विषय नहीं है क्योंकि वे संभवतः उन सैकडों भाषाओं के दस हजार से भी अधिक शब्दों को भूल चुके हैं जो प्रेम, प्यार दोस्ती जैसे संबंधों को दर्शाते हैं। यदि इन परिस्थितियों को यथार्थ के आईने से देखें, तो यह कहना तनिक भी अनुचित नहीं होगा कि मनुष्य पूरी तरह लालच के गर्त में डूब चुका है और एक बे-रोकटोक विचरने वाले पशु के समान बन चुका है। उसमें प्रेम तथा आपसी सदभावनाएँ उन काल्पनिक कथाओं की भाँति लुप्त हो चुकी हैं जो कभी हमने अपने बालपन में सुनी थी।

निश्चित तौर पर यह कहना मुश्किल होगा कि कोरोना महामारी के आने से पूर्व सम्पूर्ण संसार में सार्वजनिक सम्भाषणों में आक्रमकता का काफी बोल-बाला था तथा इसका पूर्वानुमान भाषा के प्रयोग से होने लगा था। परन्तु इस कालकम को नजरअंदाज करना भी अनुचित होगा। अतः स्वास्थ्य सेवाओं के समक्ष वैश्विक सहयोग की भावना, तथा विश्व को आर्थिक तौर पर कमजोर बस्तियों में ना बाँटने की तत्परता, उत्तर तथा दक्षिण, जी-राष्ट्र तथा नॉन-जी राष्ट्र, ये ऐसी सम्भावनाएँ हैं जिसका श्रेय प्रेम के विभिन्न रूप दर्शाने वाले उन शब्दों को जाता है जो अपेक्षाकृत ऐसी भाषाओं से सम्बन्ध रखते हैं जो समाज के हाशिये पर हैं। प्रेम शब्द का जीवित होना मात्र ही, इतिहास के प्रति मेरी अनभिज्ञता के बावजूद, यह दर्शाता है कि मानव जाति कोरोना महामारी पर अवश्य जीत हासिल कर लेगी।

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सम्पर्क - एसोसिएट प्रोफेसर अंग्रेजी विभाग

विवेकानंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली - ११००९५