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रंजना मिश्रा की कविताएँ

रंजना मिश्रा
मंगलेश डबराल के लिए

हर नए दुख के लिए
भाषा के पास कुछ पुराने शब्द थे

हर नया दुख भाषा के प्राचीन शब्दकोश का
नया संधान
हर नए दुख के बाद भाषा की
अछूती पगडंडियाँ तलाशनी थीं
चलते चले जाना था
वन कंदराओं आग पानी घाटियों में
हर अंत एक शुरुआत थी
हर शुरुआत अपने अंत की निरंतरता

कोलाहल भरी लम्बी यात्राओं के बाद
मैने पाया दुख छुपा बैठा था
शब्दों के बीच ठहरे मौन में
आसरा ढूँढता था सबसे सरल शब्दों का
हर नए दुख की उपस्थिति
भाषा की आदि स्मृति थी


पिंजरे का अस्तित्व

चीजें खुद से जन्मनी थीं
एक-दूसरे की साँसों से उगती हुई
उन्हें बहता आना था
सरलता से बहती हुई नदियों की तरह
बिना रोक-टोक
कि वे एक ही थीं अपने मूल में
गर्भ के जुडवाँ शिशुओं-सी

यह तब खत्म हुआ
जब चीजों को शब्द और नाम मिले
जब ज़ुबान ने दिमाग का रूख किया
और परिभाषाएँ बनने लगीं

चीजें तब लगातार सिकुडने लगीं
कि उन्हें सिमटना था शब्दों के भीतर
पिंजरे में सार्थक करना था अस्तित्व अपना

कह सकते हैं मुश्किलों के दिन यहीं से शुरू हुए होंगे
गलने की शुरुआत यहीं से हुई होगी





निर्द्वन्द्व

ईश्वर को
हमने ठीक उसी समय सूली पर चढाया
जब उनके साथ चहलकदमी करते, बतियाते
हमें गढने थे शब्दों के नए अर्थ.
सुकरात को जहर का प्याला
ठीक उसी वक्त भेंट किया
जब ईश्वर के साथ हुई अधूरी चर्चा
हमें आगे बढानी थी
इतिहास के प्याले को भविष्य की शराब से भरकर
धरती और अपनी स्त्रियाँ
ठीक उसी वक्त
योद्धाओं और उनकी सेनाओं के हवाले की
जब धरती वसंत के आगमन की प्रतीक्षा में थी
और स्त्री गर्भ के पाँचवे महीने में
गर्भ के शिशु ने
अभी करवट बदलना शुरू ही किया था

हमने
प्रेम और शब्दों के अर्थ
अपनी लालसा और भय की भेंट चढाई
और अपनी आत्मा की
कालिख भरी सीढियाँ
उतरते चले गए
ईश्वर के साथ हुए अपने सारे विमर्श भूलकर
हमने इतिहास में योद्धाओं के नाम अमर कर दिए
हमने इंसान शब्द के अर्थ को
ठीक उसी वक्त अपशब्द में बदला
जब सूली पर चढे ईश्वर ने
अपनी आखिरी सात पंक्तियों में से
पाँचवी पंक्ति में कहा
मैं प्यासा हूँ??
और छठी पंक्ति में ईश्वर ने विलाप किया
यह खत्म हुआ??
ईश्वर की मृत्यु को तीन दिन बीत चुके हैं

अब हम निर्द्व्न्द्व हैं.


?? ईसा मसीह को सूली पर चढाने के बाद उनकी कही गई पंक्तियों में से पाँचवी और छठी पंक्ति.

??????

रेत से घिरे शहर की वह रात

रेत से घिरे उस शहर के बस अड्डे
एक फकीर औरत का अचानक मिलना
उस रात शहर से गुजरते मेरे दिन का
एक जरूरी हिस्सा भर था

एक चिथडा अपने सामने जमीन पर फैलाए
कुछ गाती हुई
वह एक अधेड और रूखी औरत थी
जिसकी आवाज रेतीली धरती के
उस हिस्से पर उग आई थी
धूसर उदासी में खिलते हैं
कैक्टस के नायाब फूल जैसे

कुछ गा रही थी वह
कोई प्रेम गीत
जिसमें उसका प्रेमी लौट कर नहीं आया
या शायद ढोरों, पानी या ईश्वर की प्रार्थना का कोई गीत
जो कुछ भी था वह शब्दों और धुन में न समाता था
जो उसके कंठ से फूटता और गर्म उदास धरती पर
बादल की तरह छा जाता था

आते-जाते लोगों के मुडकर देखने जैसी
कोई खासियत भी न थी उसमें
आखिर वह उनके रोजमर्रा के दृश्य का
एक मामूली हिस्सा भर थी

मेरे ठहर जाने में मेरा अजनबीपन काम आया शायद
या कोई दुःख जो हाथ थामे साथ चलता आया था

कानों से होती दिल के रास्ते गुजरती वह आवाज
उन अकेली रातों तक लिए जा रही थी मुझे
जो अक्सर करवट लिए
औंधे मुँह पडे रहते मेरे करीब
उन सुबहों के इंतजार में
जो अक्सर नहीं आती

उस रात और आनेवाली कई रातों के
निचाट सूनेपन में
वह आवाज रही मेरे साथ

समय के साथ भूल गई उस औरत को मैं
जैसे भूल जाते हैं बडे से बडा दुःख हम
सुख की अनश्वरता का भी
कोई सबूत नहीं मिलता

दृश्य ठहरा है वैसा का वैसा अब भी

अक्सर कोई आवाज मेरा हाथ थामकर
इन दिनों मुझे खुद तक छोड जाती है
गहरे अँधेरे में ठहरी हुई रातें
जैसे फिर लौटती हैं
अगली सुबह की ओर

रेत से घिरे उस शहर की वह रात
मेरी खुद से मुलाकात की एक रात थी
??????
आवाज की झुर्रियाँ

याद आता है -
लम्बी साँस लो और सा लगाओ

पहली सीढी पर ठिठकती है आवाज
पूरी साँस भरती ऊर्जा से थरथराती

नन्हे शिशु का पहला कदम
फेफडे फैलते हैं हवा को जगह देने
विस्तार देती है धरती उर्जा के साम्राज्य को

रेत की तरह मुट्ठी से फिसलती है साँसें,
जीवन है, फिसलता जाता है.

अदृश्य तनी रस्सी पर बंद आँखों चलना है सा
एक अनियंत्रित साँस जरा-सी हलकी या वजनदार
सारा खेल खराब - प्रेम की तरह

हर नया सा जीवन की ओर फैला एक खाली हाथ
हर नए सा के साथ पुराना मृत

हर नए सा के साथ खाली होती जाऊँ
पुराना सा विस्मृत कर नए सिरे से शुरुआत.

स्मृतियों का क्या? वे किन श्रुतियों-सी छिटक आती हैं, बाहर..

मन्द्र सप्तक की म में ठहर जाना अनोखा है..
गहरे पानी में उतरने सा ..कोई आवाज नहीं
मौन ऊब डूब होता है आस-पास भीतर
तुममें गहरे उतरना संदेहों का छँटना है

प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्यनियाँ प्रतिध्वनियाँ

न, यहाँ कुछ भी नहीं
नाद है अपने आप पसरता गूँजता
क्यों पृथ्वी की तरह अचल हो प
पैर नहीं थकते तुम्हारे
अपनी गृहस्थी जमाए ठाठ से खिलते
चंचल उत्साही स्वर तुम्हारे काँधे पर

सुनो, थक जाओ, तो धीमे बजना कुछ देर
आकाश चादर है तने सुरों की
अविजित अचल साम्राज्य तुम्हारा
ढहेगा नहीं

??????
इस दुनिया के कुत्ते

हमारी बातचीत निःशब्द बखूबी चलती है
नई भाषा की बुलंदियाँ छूते हैं हम आँखों ही आँखों से

जान लेती हूँ तुम्हारे उल्लास और
नाराजगी तुम्हारी छुअन से
मेरे दुखों का पता सूँघ लेते हो तुम दूर से ही

मैं जानती हूँ बारिश और दिसंबर की रातें
कैसी गुजरती हैं तुम पर
तुम्हारे कानों पंजों और बालों का
मुआयना करती हूँ अक्सर
अचरज से तकते हो मुझे तुम
हम साथ यात्रा करते हैं, चुपचाप
हालांकि चूमा चाटी, लाड दुलार, धौल धप्पा
अक्सर शब्दों के मोहताज नहीं होते
औपचारिकता तुम्हें भी पसंद नहीं
और हमारे पास विषयों की कमी नहीं होती

एक ही हवा हमें छूती है
सितारे अपनी आँच हमें बराबर बाँटते हैं
हांलाँकि चीजों को हम अपनी अपनी तरह से जानते हैं
और जो हम नहीं जानते वह हमें अधिक करीब लाता है
इंसानों के साथ अक्सर ऐसा नहीं होता

मैं चाहती हूँ तुम मुझसे कुछ कहो पूछूँ मैं कुछ तुमसे
जैसे कि क्यों मेरे दो ही पैर हैं और तुम्हारे चार
हमारे कानों का आकार इतना अलहिदा क्यों है भला
क्या तुम दुनिया के सारे दुःख इसी तरह जान लेते हो?
कि हमारी नस्लों की दोस्ती के लम्बे इतिहास में
कभी कुत्तों ने इंसानों की पीठ पर वार किया?

या किन धर्मगुरुओं ने तुम्हारी सच्चाई और वफादारी में
संभावित खतरे की बू भाँप ली थी
कि नेताओं के बारे तुम्हारी दुनिया की क्या राय है
कि इस अटपटी अराजक दुनिया में
तुम्हारी आँखें अब भी चमकती
साफ पारदर्शी कैसे बची रहीं ?
कि क्या है ऐसा तुम्हारी रगों में
जिसे इंसानी मक्कारी अब तक मैला न कर पाई
स्वार्थ से भरी गफलत की नींद आई क्या तुम्हें कभी
या तुम हमेशा चौकन्ने ही सोते रहे

तुम्हें जानना कितना जरूरी और असीमित
हमारे पास एक दूसरे से जानने को कितना कुछ है
इसे रोका नहीं जा सकता
इस भागती दौडती घायल दुनिया में भी

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सम्पर्क - 102, सन ब्रीज अपार्टमेंट,
मोहन नगर कोआपरेटिव सोसाइटी,
लेन नंबर 4, बानेर, पुणे- 411 045
मो. ७८७५६२६०७०