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अशोक वाजपेयी की कविताएँ

अशोक वाजपेयी
मृत्यु

बरामदे में टहलती है वह
हालांकि उसकी पदचाप सुनायी नहीं देती
पर कभी-कभी उसका एक कदम घिसटता-सा लगता है :
बरामदे में ऊपर जाने
और नीचे उतरने की सीढियाँ हैं
वह चढती या उतरती है इसका पता नहीं :
जब बत्तियाँ बुझा दी जाती हैं रात गये
तब वह अँधेरे की तरह घिर आती है।

उसकी कोई आवाज नहीं है,
मैं उसको पुकार नहीं सकता,
बन्द दरवाजे के बाहर बरामदे में
टहलती है वह।

वह दस्तक देकर अन्दर आएगी
या रोशनी की तरह दरवाजे के नीचे से खिसककर-
कहा नहीं जा सकता।
यह भी कहाँ पता है
कि वह अँधेरा है या रोशनी
या उन के बीच कहीं गोधूलि?

इतना काफी है जानना कि वह नजदीक है
और आने में उसे देर नहीं लगेगी।
फिलवक्त उसके पास और काम है, फिर भी।
अब वह समय नहीं रहा

अब वह समय नहीं रहा
जब इतना कहना काफी हो कि मैं एक आदमी हूँ :
मैं कहीं भी हो सकता था-
निकारागुवा या मोरस्को में
मंगोलिया या जाम्बिया में- कहीं भी
और उतना ही आदमी होता
जितना इस देश में हूँ!
अब अकेले आदमी होने से काम नहीं चलता-
शरीर और आत्मा काफी नहीं हैं :
पहचान पत्र होना चाहिये, निश्चित निवास जरूरी है
आदमी अब एक अमान्य सामान्यीकरण है
बहुत सारे ब्योरे चाहिये।
अगर कहूँ कि कवि हूँ तो वे कहेंगे
वह तो ठीक है पर करते क्या हो,
किस तरफ के हो, क्या जाति है, क्या धर्म आदि?
अगर नागरिक हो यहाँ के तो
उसका प्रमाण पत्र कहाँ है?

मेरा आदमी होना, मेरी भाषा, मेरी कविता
कुछ भी साक्ष्य नहीं है मेरे होने का।
था एक बडा कवि जो कभी अपने आदमी होने से ऊब गया था
दूर चिली में,
मैं तो अपने देश में ही आदमी होने से वंचित किया जा रहा हूँ।

किसने सोचा था कि
एक दिन आदमी होना इस कदर बेकार हो जाएगा
हमारी धरती, हमारा शहर,
हमारा पडोस और हमारी हवा
हमें मानने से इनकार कर देगी
क्योंकि हम आदमी होने के अलावा कुछ और नहीं हो पाए।

क्योंकि
क्योंकि अब तक कुछ हुआ नहीं है - काफ्का

सूर्योदय तो रोज होता है
कभी-कभार धुंध के पार भी
सूर्य न जागता है, न सोता है।

पृथ्वी अपनी परिक्रमा पर है
और सूर्य को उसकी कोई खबर तक नहीं
क्योंकि अब तक कुछ हुआ नहीं है।

क्रान्तियों और तानाशाहियों में अन्तर मिटता जाता है
मनुष्य होता जाता है अकेला निरुपाय
पर उम्मीद, फिर भी,
खोज लेती है एक आकाश,
मनुष्य बने रहने का अवकाश :
क्योंकि अब तक कुछ हुआ नहीं है।

भय आता है कई चमकदार पोशाकों में
कई तरह के झूठों से दमकता हुआ
जो फैलते जाते हैं चारों ओर दिशाओं में
पर, फिर भी, सच आता है
फटेहाल, सकुचाता पर निडर
क्योंकि अब तक कुछ हुआ नहीं है

हम प्रतीक्षा करते हैं
प्रतीक्षा भी कर्म है
अँधेरे में रोशनी की एक दरार बनाती हुई
क्योंकि अब तक कुछ हुआ नहीं है।

कहाँ गये देवता!
जब हम घरबन्द हैं
भयग्रस्त हैं
तब कहाँ गये देवता
जो हमें अभय देने का आश्वासन थे!

दरवाजे पर दस्तक होती है :
हम खोलते हैं इस उम्मीद में
कि शायद कोई देवता है
जबकि वह होता है दूध के पैकेट देनेवाला
एक लडका जिसे इस समय स्कूल में होना चाहिये!

क्या यह देवहीन समय है,
सारे देवताओं और अभय के स्थगन का?

कँफपानेवाली भीषण ठण्ड में
जब किसान तो खुले में ठिठुरते हुए
अपने हकों के लिए संघर्ष कर रहे हैं,
तब देवता किसी आरामदेह मन्दिर में
दुबक गये हैं
भक्ति की रजाई ओढकर!

यात्रा में, पडोस में
भय बैठ गया है :
देवता नहीं आएँगे
पर क्या हम, फिर भी,
कविता से अभय की उम्मीद कर सकते हैं?

डर पर कुछ
होने से डरता हूँ
अनहोने से डरता हूँ :
होने से कि क्या-क्या हो रहा है!
अनहोने से कि क्या-क्या हो सकता है!

घर से डरता हूँ
तो बाहर दो-ती किलोमीटर का चक्कर लगा लेता हूँ
अपनी हाउसिंग सोसायटी के अहाते में,
वहाँ टहलते और लोगों से डरता हूँ
तो वापस भाग आता हूँ अपने घर में।

दिल से डरता हूँ कि कहीं ऐन वक्त पर धोखा न दे दे।
वक्त से डरता हूँ कि पता नहीं उसके दिल में क्या है।

शब्द से डरता हूँ कि कहीं भेद न खोल दे,
भेद से डरता हूँ कि कहीं शब्द में न आ जाए

डर में रहता हूँ, डर में लिखता हूँ :
डरा रहता हूँ कि कहीं डर औरों को न दिख जाए।



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