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चाबी

रूपा सिंह
ढोलक पर पडती थापों की आवाज दूर से ही कानों को उकसा रही थी। मंगलगीतों की आवाज ने हमें उत्साह से भर दिया। सजे-धजे शामियाने, खाते-पीते मेहमान, बच्च के कलरव, आम के पल्लव और गेंदा फूल की लडिय से सजा आंगन द्वार दीखने लगा था। जैसे ही हम अंदर पहुँचे, सजी धजी गोल गदराई बहन झटके से उठकर हमसे लिपटने को हुई कि सबने उसे थाम लिया- अरे, अरे सँभलकर ऐसी हालत में ऐसे झटके नहीं खाते। अब सब्र से उठा बैठा कर बन्नो। मैं दौडकर अपनी बहन से लिपट गई।
बहन का यह सातवाँ महीना चल रहा था। उसकी गोदभराई के उत्सव में शामिल होने अलवर से आगरा आये थे हम। बेबे, भाई, भरजाई, नन्हा बिल्लू और मैं। कल सब लौट जाएँगे लकिन बेबे ने मुझसे कहा- अभी दो तीन महीने मैं बहन के पास ठहर लूँ। जीजा मेरा भरतपुर नौकरी करता है, और घर में उसकी बूढी सास अकेली है। मैं खुशी-खुशी तैयार थी। जैसे मेरे भाई भरजाई के घर नन्हा बिल्लू आया था और मेरा सुन्न-सन्नाटा घर किलकारियाँ मार हँस पडा था, अब बहन के घर वैसी ही खुशियाँ उतरने वाली थीं। कितने मनमोहक होते हैं जिंद-जहान के ये व्यापार! बडे चाव से मैं ऊन की लच्छियाँ, सलाई के कांटे, झबलों के लिये कटपीस, कैंची, सूई, धागों के साथ अपनी किताब, कॉपियाँ समेट लाई थी। सत्तर के दशक में ग्यारहवीं ही मैट्रिक थी और मेरी परीक्षा में चार पाँच महीने अभी रहते थे।
आठवीं की परीक्षा के समय भरजाई की जचगी और बिल्लू का होना मुझे खूब याद है। पूरा घर नन्ह जुराबों, स्वेटरों, तेल-जायफल की सोंधी महक और दूध की कच्ची मुस्कान से विहँसता रहता और वह घुंघराले काले बालों वाला चाँद का टुकडा अपनी सफेद नीली आँखों से मुझे तकता रहता। कई बार उसके हाथ-पैर हिलाकर देखती यह प्लास्टिक का गुड्डा है या सचमुच का जीता जागता जीव, तो चुनमुना के खिल उठता वह। मेरे तो जिगर का टोटा हो गया था मेरा बिल्लू। दिन रात मैं उसके आगे पीछे फुदकती। जब बबे जायफल सिंके तेल से उसकी सू-सू करने वाली छुन्नी को हौले दबा कर मालिश करती, वह पाजी अजीब-अजीब मुँह बनाता। खूब आनंदित होता। लेकिन जब उसके नन्हें हाथ पैरो को लपेट ऊपर उठा पीठ पर धौल जमाती तो चिंघाडे मार कर रोता।
मेरी जान निकल जाती। बेबे छोड दे उसे। मर जाएगा वो। मैं फर्श पर लोट-पोट हो रोती। सब हँसते। बेबे कहती, मालिश करने से बच्चों की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। फिर बिल्लू बाबू नहा धोकर खुशबूदार पाउडर से गम-गम गमकते भरजाई की गोद में जब तक चुस्स-चुस्स दूध पीते हुए गहरी नींद सो न जात, मैं वहीं मँडराती रहती। अब मेरी बहन के अंगने में वैसा ही चाँद उतरने वाला था और मैं बहुत खुश लंबी परांदी लटकाये, गोल्डेन झुमके झुलाती, नवा फिराजी सूट, फिरोजी चूडियों से हाथ भरे अपनी बेबे, भाई, भरजाई और नन्हें बिल्लू के साथ बहन के घर उसकी गोद-भराई म आयी थी। हमारे पहुँचते ही पूरे घर में खुशी की चमकार मच गई- नूं के पेके वाले आ गयण। अलवर वाले आ गयेण।
और, बहन जैसे ही झटके से गले मिलने उठी कि उसे वही रोक दिया गया- ना, ना बन्नो! सब्र कर! ऐसे झटकों से अभी न उठ बैठ। बेबे और भाई साथ लाये फल, मिठाइयाँ, मेवों के टोकडे उतरवाने में लगे। इघर स्त्रियों ने स्वागत में गीत गाने शुरू कर दिये-
अलवर वाले पेके जीवेण, जीवेण पियू ते भ्ररां
खट्टन वाला पियू जीवे, भागां वाला भ्ररां
बेबे ने हालांकि खूब हाथ, पैर जोडे कि हम रोटी-पानी खा-पी के चले हैं। अलवर से आगरा है ही कितनी दूर? फिर बेटी के घर पानी पीना- ना, ना! लेकिन बहन की सास ने बात मानी ना ही उनके सिदकों वाले तंदरूस्त जोरावर पुत्तर ने। रज्ज-रज्ज कर स्वागत किया। ना-ना करते भी खूब खिला पिला दिया।
खा-पीकर बेबे और सलोनी भरजाई आँगन म बिछी दरी पर गाती स्त्रियों के पास आ बैठीं। मैं बहन के दुपट्टे को उगलियों से मरोड देती उसके पास सट कर बैठी। सलोनी भरजाई ने अपना लाल घुंघटा तनिक सरकाया, वहाँ बैठी स्त्रियों को आँखों से अदब दिया। सरकते पल्लू को कानों के पीछे सख्ती से ऐेसे ओट दिया कि कान में पहने झुमके तमतमा आये। झट से ढोलकी दबा ली जाँघों तले और पुरानी दिल्ली के मशहूर घंटाघर की हलवाइयों की इस बेटी ने जो रौनक मचाई जैसे प्रतियोगिता की आग लहकाती हो-
आओ सामने आओ सामने, कोलो दी रुस के न लँघ माहिया......
ज्ज्ज्
अज्ज मथुरा दे विच अवतार हो गया वे श्याम निक्का जीयां...........
न केवल चेहरे से, न जिस्म से, न हरकतों से बल्कि गले से भी रसमलाई और जबान से शकरपारे की मिठास घोलती भरजाई ने जब वहाँ अपने गीतों की छेडी बहारें, एक के बाद एक शुरू हुए उनकी पछाडे। लोग देखते रह गये। एक गीत पूरा हो नहीं कि दूसरा शुरू हो जाए-
खेल तू कित्ते न्यारे-न्यार तां तैनू काला कैहंदे ने
काली कोठडी विच जमिया,
काली कंबली विच तू फडिया
काले जमुना दे विच तरिया,
तां तैनू काला कैंहदे ने....।
मैं बहन के आँचल में दबी छुपी उनके हाथों में मेंहदी की खुश्बू और चेहरे के ताजे खिले गुलाबों के साथ, साथ बैठी स्त्रियों को भी निरख रही थी। हँसी ठहाके, ठिठोली और बधाइयों के शोर में मैंने देखा तमाम स्त्रियों के बीच 18-19 वर्ष का एक युवक भी वहाँ बैठा है। दिखने में खूब गोरा, पतला जबडा चहरा, तरूणाई की चमक ताजी घनी दाढी मूँछों के बीच ललछौंही मुस्कुराहट, काली चमकीली पलकों वाली बरौनी और उससे झाँकते कंचों जैसी आँखों की नुकीली ताब। लंबे चौडे-आँगन में स्त्रियों के बेशर्मी वाले टहोके, रतजगे के दुलार, मनुहार, सताना, फसाना- सब ध्यान से सुनता कभी वह किलकारी मारकर हँसता तो कभी दोनों हाथ हवा में लहराकर चुटकियाँ बजाता। बहन की सास, जिन्हें सब प्यार से चाईजी कहते महल्ले की अपनी बूढी सहेली भग्गी मासी के साथ बडे पीतल के थाल में शगुन के लड्डू और शकरपारों से भरे लिफाफे बाँटती जा रही थीं। सारा समां मानो नवजात की मीठी कल्पनाओं से मह-मह मह महा रहा था। मेरी सलोनी भरजाई पर तो सब महित हो रहे थे लेकिन अब स्त्रियाँ प्रतियोगी भाव से भरकर एक दूसरे को कोहनियों से टहोका लगाने लगीं- मायके वालों ने तो महफिल लूट ली।
स्त्रियों में कुछ खुसर-पुसर चली और जिसे बर्दाश्त न हुआ, वह एक गठे हुये बदन की अधेड स्त्री थी। उसके गोरे रंग में चुटकी भर हल्दई पीला मिला था। गहरी लिप्सटिक और उन्नाबी सलवार कुरते पर बेपरवाही से गले में डली जालीदार चुन्नी थी। अपनी आधी देह को कुलांचो वाला झटका देकर एक बारगी ढोलकी को ऐसा अपनी तरफ खींचा कि लंबे घने केशपाश खुलकर बिखर गये। उन्हें फिर से जूडे में लपेटते उनके होंठों और आँखों में तिर्यक मुस्कान आ गई। जब्बर जाँघों के बीच ढोलकी को खींच कर दबाते जो उसने थाप देनी शुरू की, माहौल चम्मचों की खडकार की नयी रौनक से खिसखिला उठा-
ओ लाढा नी वेखो लाढा
चढ बैल ते आया, चढ बैल ते आया,
नारद मुनि विचोला बनके डाढा जुलुम कमाया
जय हो!
भूतियाँ दे नाल साडा रिश्ता आन कराया
जय हो!
गो लाढा, नी वेखो लाढा....चढ बैल ते आया....

दुल्हन के रिश्तेदार और विशेषकर सलोनी भरजाई पर कटाक्ष करके सब हँसी से लोटपोट हुई जा रही थीं। मैंने भरजाई की तरफ देखा, जिनका मुँह तनिक छोटा हो आया था कि अचानक हंगामा मच गया। देखते देखते वह गोरा चिट्टा युवक पीछे की ओर पलट गया था। दोनों पैर अकड गये थे। अपने हाथों को फैलाकर क्वेक-क्वेक की अजीब ध्वनि निकालने लगा। अफरा-तफरी मच गई। उसे जल्दी से सीधा किया गया। हाथ पैर ही नहीं, मानों आँखे भी अकडी हुईं। वैसी ही अपलक सलोनी भरजाई के चेहरे से चिपकी हुई। मन तो किया, नोंच फेकूं इन आँखों को। गोल्डी-गोल्डी! उठ-उठ ! पुकार मच गई। कुछ औरतें उसके हाथ पैरों को सीधा करने में जुटीं। बहन की सास और मेरी परजाई ने हौले से बहन को समेटा और अंदर ले आयीं।
मैं अवाक बैठी उस स्त्री को देखती रही। उसके लंबे बाल फिर जूडे से ढलक कर सर्प की कुंडली की तरह कंधों तक आ गये थे। उसकी जालीदार चुन्नी का कोना गोल्डी की मुट्ठी में दबा जा रहा था। उनका गला उससे कसा एक तरफ को खिंच रहा था। उनकी आँखों से दर्द पानी बनकर बह रहा था। कसती जाती चुन्नी को उसकी मजबूत मुट्ठी से छुडाते उनका शांत स्वर किसी को पुकार रहा था- मदन! मदन को बुलाओ। मदन ही सँभालेगा इसे। मानो सारी है। स्थितियाँ उनकी खूब-खूब पहचानी हुई हैं और सारी जटिलताओं का जवाब ईजाद कर रखा देखते-देखते लोगों की पुकार पर सोलह-सत्तह वर्षीय हाफ-पैंट, काली टी-शर्ट पहना, साँवला, घुँघराले बालों वाला लडका वहाँ आ पहुँचा। उसका मासूम चेहरा शर्मिन्दगी के भाव से भरा था। उस बेचारे ने गोल्डी को झिझोडा और बोला- गोल्डी, चल-चल। उठ जा। उसके हाथों का स्पर्श पाकर गोल्डी जरा स्वस्थ हो आया। उसके मुँह से सनी थूक भरी लार को स्त्री ने अपनी चुन्नी से पोंछ डाला और मदन से कहा- ले जा इसे। घर ले जा। नहीं माने तो चाबी लगा देना।
अब इसका भी ब्याह रचा डाल कमलेश, नहीं तो औक्खा पड जाएगा तेरे को किसी दिन। गोल्डी की नीयत भाँप, भग्गी मासी ने सलाह का टहोका मारा। आँखों को उसी चुन्नी से साफ करते उस स्त्री ने जवाब दिया- कौन करे उसके साथ फेरे! कौन साथ निभाये? मैं होती नहीं सारे-सारे दिन मासी, कोई नूं बनके आये और सारा माल पत्ता बटोर निकल जाए, स्यापा फिर अलग पुलिस चौकियां दा....। बोलती कराहती उसने अपनी ढोलकी पकडी और अपने रागों पर ऐसे केन्द्रित हो गई मानो कई बात न हुई है और न ही हो सकेगी अब कोई बात।
आगरा की जिस गली में बहन का घर था, वह शहर के मशहूर पंसारी बाजार के ठीक पीछे था। विभाजन के बाद आये शरणार्थियों ने अपने दम-खम पर गुब्बारे बेचकर, कचौडियाँ, जलेबियाँ बनाकर, छोटे-छोटे ताजमहल रेहडियों पर लादे परिवहन और पर्यटन के लिये मशहूर आगरा में रियायती दरों पर सरकार से जमीन प्राप्त कर अपने महल्ले बसाये। इन सबके घर प्रायः एक जैसी डिजाइन के बने हुये थे। लंबे चौंडे आँगन वाले घर, लंबे बरांडे और फिर लाइन से तीन कमरे। आँगन के एक सिरे पर होता महमहाता चौका-रसोई जो गरीबी के बावजूद लिपा पुता, बर्तन-भाँडो के सुंदर रैक, सुथरे तेल, घी, मिर्च मसालों के डिब्बों से सजा होता। आँगन के दूसरे सिरे पर होता प्रवेश-द्वार, जो बाहर गली में आने-जाने वालों के लिए खुलता। दरवाजे तो भले कभी बंद होते कभी खुलते, लेकिन मन इतना खुल्ला-डुल्ला होता कि साँझे चूल्हे की तरह सबके दुख-सुख सबके मन में साथ पलते-पकते। कच्चे मन की तरह लकडी के पट्टों को जोडकर बने दरवाजे होते, लरजती धडकनों की तरह उसमें लगी लोहे की सांकल होती। कोने में बाथरूम होते। बाहर आँगन में पानी के नल होते, जहाँ एक दो बाल्टियाँ मग पडे होते। पतली एक मोरी होती और दूसर कोने में छत पर चढने वाली सीढियाँ होतीं। प्रायः सभी घर एक-मंजिल थे। प्रायः सभी के आँगन के गोल घेरे में तुलसी चौरे थे। बहन के घर तो अमरूद का एक पेड भी था जिसकी कटाई-छंटाई अभी जीजा ने कराई थी कि जनवरी-फरवरी के सियाले वाले दिनों में भी सूरज दमकता-सा आँगन में आता जाता रहे।
सियाले वाले ही इन दिनों में आगरा में पतंगबाजी का खूब दौर होता। मकर संक्रांति में लोग दिन-दिन भर पतंग उडाते और इधर इन गलियों में लोहडी बलती। रल-मिलकर सब लकडियाँ जलाते। अग्नि के फेरे लगा कर मक्का, गुड, तिल, नये अनाज अर्पित करते, सुख-शांति की कामना करते और दूसरे दिन सुबह काका-पूणी खेलते। जिन घरों में नया ब्याह या बच्चा-जन्मता, लडकियाँ कपास के टुकडों की उन पर वर्षा करतीं, गीत गातीं और खूब तिल-सामग्री, नगद और मान-सम्मान पातीं-
काका पूणी तेरी मां लटूणी, पियू टूणा
काकरे दी मां, दो चार फुल्लरे चुनवा.......
चुन चुन झोलियाँ भरवा
काकरे दी मां जीवे, जीवे पियू ते भ्ररां
खट्टन आला पियू जीवे, भागां आला भ्रां....
इस बार भग्गी मासी की बहन रेवती के अर्द्वविक्षिप्त लडके की शादी हुई थी। हम सब उनके घर नई ब्याही की काका-पूणी कर आय। यह दिन गप्प वाला होता। सारे दिन गलियों में मंझियाँ बिछी होती, छतों पर लडकों की पतंग-बाजी होती। उधर सभा बैठके, जहाँ सभी जलावतनी, अपने छूट गये वतन को याद करते। किसी की आँखों में आँसू होते तो कोई वहाँ बैठे-बैठे अपने बच्च की शादियाँ तय कर देता। कोई अपने छूट गये अपनों को याद करता, कोई अपनों को जिंदा रखने लिए हाडतोड मेहनत, के बाद भी भूखा सो जाता। यह सच है भरे-पूरे अपने घर, लहलहाते खेत, महमदाते वतन, सोने चाँदी की झंकारों से दीप्त अपनी बहू बेटियों को खोकर आये इन लोगों ने अपने आँगन को फिर से बसाने के लिए बहुत मेहनत की थी। चाईजी ने बताया था, बगल के घर की कमलेश आँटी और मोहनसिंह भाईजी के संघर्ष का इतिहास भी कि, कैसे झोंपडी से शुरू हुआ मेहनत का सफर ढाबे से होता हुआ आज आगरा चौक के मशहूर हनी केबिन में बदल चुका है। हालांकि यह बताते हुए उनकी आँखें कई बार चिन्तनीय मुद्रा में सिकुड जाती थी, फिर अपने सिर को झटक कर वह भली स्त्री तब केवल इतना कहती कि अपनी मिट्टी से दूर होकर कईयों की मिट्टी कितनी पलीद हुई- इसका कोई हिसाब भी नहीं।
बाद में मैंने जाना कि यह वही कमलेश आंटी हैं। गोल्डी की माँ और वह उनका एकमात्र जीवित पुत्र है। कई बच्चे हुए। लोग बताते-घर में दूघ की बूंद तक न होती बेचारी के। औरत दिन-रात मेहनत में हलकान होती। रेहडियों पर चाय बेचती और नासपीटा मोहनसिंह सारे पैसे छीनकर भाग जाता। दारू पी आता। बेचारी को कूटता, पीटता, सो अलग। फिर ईश्वर ने अरज सुनी होगी, ढाबा उसका अब आगरा का मशहूर होटल हनी केबिन म परिवर्तित हुआ।
कमलेश आंटी ने शराबी मोहनसिंह के हाथों से हनी केबिन के सारे अधिकार अपने हाथों ले ली। कडी मेहनत का काम था यह। तभी तो पूरे मोहल्ले में केवल उनका घर ही नये डिजाइन का था और दो मंजिला भी। इस घर में कमलेश आंटी, मोहनसिंह भाई जी, गोल्डी, और मदन के अलावा तीस वर्षीय रामदुलारे नामक नौकर भी रहता। चूंकि बहन और इस घर के बीच एक पाँच इंच ऊँची दीवार थी, दोनों घरों की आवाजें आराम से एक दूसरे के घरों में चहलकदमी करती हुयी। दोन घरों के रोज का कार्यक्रम लगभग निश्चित था। बगल वाले घर में सुबह के गये मोहनसिंह रात को वापस लौटते। शाम पाँच बजे कमलेश आंटी काम पर निकलतीं और फिर दूसरे दिन अलस्सुबह आ पातीं। आते ही सो जाती। मदन की कोई आवाज नहीं मिलती। वह कब स्कूल जाता शाम चार बजे लौट आता, कब क्या खाता, पीता, बोलता। कुछ सुनने को नहीं मिलता। उसके बदले गोल्डी और रामदुलारे की पाठशाला खूब जोर शोर से चलती।
इस पाँच इंच ऊँची दीवार के दूसरी तरफ बहन सुबह उठकर नाश्ता पानी बना, खा पी कर कमरे म आ लेटतीं या क्रोशिया, सलाइयों से नन्हें जुराब बुनतीं। चाई जी सुखमनी साहेब के गुटके से जा लगतीं और म दाल, चावल बर्तनों में डाल आँगन के नलके पर उन्हें धोने बैठती। धूप गुनने का मन होता तो वहीं सब्जी भी काट लेती। यह करीब दस, साढ दस बजे सुबह का समय होता। बगल के घर के आंगन से बर्तन धोने, कपडे कूटते रामदुलारे गोल्डी को पाठ पढाता। आखिर उसे ही माँ के कमाये धन-दौलत का हिसाब रखना था। उनकी पाठशाला चलती- दो में दो मिलाएगा तो कितना होगा? 18-19 साल का गोल्डी मुंह फाड के हंसता। तनिक ठहर कर दुलरूआ गोल्डी ऐेंठ भरा जवाब देता-तार होगा।
फिर रामदुलारे पूछता- मान ले गोल्डी, तेरे पास चार आम हैं। एक आम मदन खा गया, तो कितने आम बचे? गोल्डी पहले तो हँसता, जैसे जाने कितने मजे का प्रश्न हो यह। फिर काल्पनिक आम-रस से टभकता रोज अलग-अलग उत्तर देता। कभी पाँच तो कभी चार..
कई बार मैं दाल चावल वहीं धोना छोड पास की सीढियों से छत पर चढ आती तमाशा देखने। ईटों की झिर्रियों से झाँकती। सचमुच वह सामने चौकी पर पैर पसारे, लकीरों वाला पाजामा और टी-शर्ट पहने, हाथों को हवा में लहराते, मुँह स उत्तरों की फिचकारियाँ निकालता। पाठ में शामिल होने वाली सामग्रियाँ बदलती रहती, लेकिन इन दोनों की यह गणितीय पाठशाला बदस्तूर चला करतीं। कभी-कभी तो जाने किस मूड में होता गोल्डी। पहल तो हो-हो करके हँसता। मदन? मदन मेरा आम खाएगा? हम खाएगा उसका आम? फिर दोनों हँसते। रामदुलारे घुडकता- बदमाशी मत कर, बता सीधे-सीधे और फिर दो समवेत हँसी के ठहाके। हँसते-हँसते नहीं थकता रामदुलारे। फिर पूछता- एक टोकडी में आठ सेब, चार सेब गिर गये तो कितने बचे? गोल्डी केवल हँसता। खूब-खूब हँसता। सेब नहीं केला। केला पूछो। वह हाथ मानों लहराता हवा में। आवाज में खुनक बढ जाती। रामदुलारे की आवाज भी पिनक से भरी होती- तेरे पास चार केले हों। एक केला तूने टॉमी को खिला दिया, तो तेरे पास कितने केले बचे? गोल्डी फिर हँसता। कहता- मेरे पास एक केला, टॉमी के पास एक केला.... फिर वह भयानक हँसी हँसता। लोट-पोट हो जाता। बाँये हाथ से मुँह से गिरते लार को पोंछता। हँसी नहीं रूकती, फुत्कारता तेज आवाज में, मरपदना के पास एक केला.....सब केले मेरे.....।
मरपदना? फिर वही? मदन बोल ! रामदुलारे गलती सुधारता। अचानक गोल्डी देर-सवेर चीखने लगता-मरपदना ओ मरपदना। कित्थे मर गया ओये मरपदना....। फिर शायद उसके हाथ पैर टेढे हो जाते। क्योंकि रामदुलारे की आवाज आती-गोल्डी, गोल्डी, सीधा हो जा। हाथ सीधा रख, देख मदन आ गया... और तब अंदर से कमलेश आँटी की आवाज आती- चुप करा दुलारे इसे। फिर उनके जगने का समय होगा वे उठती तो माने घर की चहल पहल उठती। कई मिलने वाले चले आते। घडी-घडी चाय बनती। वे गुनगुनाती-दो पत्तर अनारां दे, दुख साड्डा समझनगे...., दो पत्तर अनारां दे......। वे नहातीं। बहन के घर तक उनके चंदन साबुन की खूशबू लहराती। चौके में मसाले भूने जाते। कडछी पतीले संग खनकदार आवाज में बतियाती। मालकिन चाय....। आधे-आधे घंटें में चाय पीने की शौकीन उस स्त्री को देख मैं सोचती, अपनी मर्जी का स्वावलंबी जीवन क्या जो होता है और क्या जो उसके इतने ठाठ होते हैं।
छोटे शहरों में रात अमूमन जल्दी हो जाया करती है। रात के दस बजते-बजते गली के तमाम घरों में अंधेरा छा जाता। गली के मुहाने पर लगे लैम्प पोस्ट का धुंधला बल्ब कभी जलता, कभी बुझता रहता। सियाले की नीरव रातों में मैं लालटेन जलाकर और दुलाई अच्छे से ढंक ओढ, बरामदे की मेज-कुर्सी पर पढने का यत्न करती। लेकिन कभी-कभी पडोस की कुछ आवाजें खलल देन वाली होतीं। एक तो मोहनसिंह भाईजी के होटल से वापस घर लौटने पर होती। दुर्गंध का एक भभका उठता-औक्क-औक्क जैसी कै करने की आवाज। स्वयं को सँभालने वाले भतीजे को दिये माँ-बहन की गालियों के टुकडे हवा में तिरते आते....... फिर दूसरी आवाज अंदर के कमरों से निकलती- गों-गों जैसी हल्की काँपती आवाज, जिसमें सुकून और कराह-दोनों होते। सित्कारियाँ होतीं। यह आवाज, मानो दर्द की कोई पगडंडी पार करती हुई रूहों की बेचैनी समेटे होती, जो बहुत हल्की होने पर भी बेतरह बेचैन करती। फिर मेरा पढने से मन एकदम उचट जाता। समझ भी नहीं पाती थी कुछ। वतन से बिछुडे हुए कई कराह उस गली में कैद थे और ठीक-ठीक न पहचान होने से कभी मुझे इस आवाज में कभी एक करूण रूलाई और कभी एक फूहड हँसी भी सुनाई देती। मेरा शरीर पसीने से नहा जाता। फिर तो सारी रात भले ही किताबों के पृष्ठ फडफडाते हों, कलम की निब खुली रह जाए, कॉपियाँ पुकारती रहें, धक-धक कलेजे से किसी तरह लालटेन बुझाती मैं दौड जाती अंदर और बहन के बिस्तर में दुबक जाती।
आगरा की गलियाँ अलवर की गलियों जैसी न थीं। यहाँ रोज शाम को गली पर मंझियाँ आ जुडती थी और रात को गली पर साझा तदूर अभी भी बलता। स्त्रियां एक दूसरे के दरवाजों पर एकत्र होतीं और अपने दुख-सुख, रोजनामचे करती। फरियाद भी होती, पंचायती भी। ये मोहल्ले अपने -आप में एक पूरी दुनिया थे जो उजडने के बाद बसने लगे थे और इस बसावट में सब चोटिल थे। सबके जीवन मूल्य छिन्न-भिन्न हुए थे, और सब पूरी जद्दोजहद के साथ फिर से अपनी पुरानी जिजीविषा लिये नये जीवन-निर्माण में जुटे थे।
मोहल्ले में नई खबर थी- वीरांवाली आँटी के बाल रंगने के प्रयोग को लेकर। उन्होंने कल ही कहीं काम पकडा और ढंग से आने की चेतावनी पर असमय सफेद हो आये बालों को रंगने का यत्न किया। लेकिन यह बहुत कष्टदायी रहा। उनका सिर सूजकर डबल हो गया था। चेहरा लाल भभूका। हम सब उनका हाल पूछ कर वापस आये थे और अभी शांती आँटी के दरवाजे तक ही पहुँचे के जहाँ अन्य जनानियों ने बातों में हमें घेर लिया। मैंने देखा कमलेश आंटी को घर से निकलकर काम पर जाते हुए। मैं तो उनके चलने के अंदाज पर भी मोहित थी। उन्होंने गहरे हरे रंग का सूट पहन रखा था। मैंचिंग हरा पर्स लिये रामदुलारे उनके पीछे-पीछे आगे सडक तक छोडने साथ जाता था, जहाँ उनका स्थायी रिक्शे वाला अजमल रिक्शा लिये उनके इंतजार में होता। एक बार मुडकर सबको राम-राम करती हुई वे ठसके से निकल गईं। जालीदार हरे दुपट्टे को देखते ही मुझे उनका उस दिन का रूआंसा चेहरा याद आ गया- एक माँ की व्यथा, जवान बेटे की र्दुदशा और उसे देख काँपता, कष्ट पाता उनका जिगरा! मेरे इतना कहते ही सब इधर-उधर गर्दन घुमा, होठों को दबा-दबा आँखों से मुस्कुराने लगीं। मुँह से निकला, कितनी अच्छी हैं न? कितना सहती हैं बेचारी? मेरे इतना कहते ही मैंने सुना, सब मुँह दबाकर फिस्स-फिस्स हँस पडे। शांती आंटी ने मुझ गौर से देखा और कहा- हाय-हाय, तू तो बच्ची है, तेरे को क्या पता। इवें-इवें तो कुकर्म कीत्ता हुण शहदी बनी फिरदी है। पहले बच्चों के लिए दूध नहीं था अब जिंदा खिलौने खरीदती फिरती है। पापिन! सारे पंजाबियाँ दा नाम मिट्टी विच मिला दित्ता...। कुंडली मारे बैठी है नागिन...।
भैणजी सूट वेख्या? नवा आया ह। नेपालों आया है। आगरे दे बाजार दा नहीं है। चाई जी ने मेरा हाथ पकडा और चलने को हुईं कि फिर एक तिक्त स्वर आया-कोई इसे बोलने वाला नहीं अब। झोंपड थी इसकी। पूछो न चाईजी से। चाई जी ने भी अब क्या मुँह खोलना गली दा तंदूर सब द हिस्से, बडे लोकां दे बडे-बडे किस्से। हम चुपचाप घर आ गये।
कल शाम से ही बहन को रह-रह दर्द उठ रहे थे। चाईजी ने कमलेश आँटी के घर जाकर जीजा को फोन पर हाल कह सुनाया। वे बेचारे भागते-से रात तक पहुँच गये थे। सबेरे ही बहन को अस्पताल में एडमिट कर दिया गया। समय पर रोटी पानी अस्पताल भी भेजना है सो मैं बरामदे की बिछी चटाई पर सब्जी काटने बैठी। यह दोपहर ढले का समय था। शाम के चार-पाँच बज रहे होंगे। चाईजी हाथ में जपुजी साहब का गुटका लिये, गोड्डे पसारे आँगन मे पाठ कर रही थीं। अमरूद के पेड से अटकी किरणों ने आँगन तो छोड दिया था लेकिन उनके सिर पर पडे सफेद दुपट्टे के गोटों से आंखमिचौली खेल रही थी। छतों पर छोटे और बडे बच्चों का हुजूम पतंगबाजी के लिये जमा था। एक मंजिल वाले घर के लडके भी मंझा और लटाई लेकर दो मंजिले पर चढ आये थे। पूरे मोहल्ले में कमलेश आंटी का ही सिर्फ दो-मंजिला मकान था और यह बहन के घर से बिल्कुल सटा हुआ भी था। चारों ओर वह काटा.. वह गया.. ले काटा... काट के दिखा....... औऽऽ तेर्री ऽऽऽ.... जैसी आवाजों का शोर गूँज रहा था। मैं बहन के घर आने वाली नन्ही किलकारियों और सपनों में खोई थी। सब्जियाँ काटकर छिलकों को एक बर्तन में जमा किया और उन्हें कूडेदान में फेंकने उठी ही थी कि, मेरी आँखों ने जो दृश्य देखा वे अगर बोलने में सक्षम होतीं तो चीख पडतीं। जबान रखने वाले मुंह की तो बोलती ही बंद थी। मैंने देखा, एक उडनतश्तरी ऊपर से तैरती हुई आयी है और अमरूद के पेड से थोडा अटकती, रूकती चाईजी की गोद में आ गिरी है। हट्टी, कट्टी, हृुष्ट, पुष्ट चाईजी के हाथों से गुटका छिटक कर दूर जा गिरा और वे भयभीत हो बुरी तरह चीख रही थीं। मेरी आँखे भी झपझपा गईं। एकदम बंद हो आई आँखों को जब खोला तो देखा, चाईजी चित्त पडी हैं और उन पर एक नंग, धडंग लडका बेहोश पडा है। अमरूद के पास लगे तुलसी चौरे से जिसका पैर टकराया है और बलबलाते खून की धार फूट पडी है। मैंने कटी हुई सब्जी का कटोरा वहीं पटका और दौड पडी आँगन में।
चाईजी बेचारी सदमें में अभी तक डरी सहमी, चिल्लाई जा रही थीं- बचाओ, बचाओ, लोकां बचाओ दुष्मणां आ गयेण भागो बचाओ....। मैं थर-थर काँप रही थी। किसी तरह उस लडके क सीधा किया। आँगन के दरवाजे पर जो गली में खुलता था, उस पर तेज थापें पडने लगी- दरवाजा खोलो। दरवाजा खोलो। की होया? की होया? चाईजी भी किसी तरह उठीं। कुंडा जोरों से खडकाया जा रहा था- दरवाजा खोलो! शोर मचने लगा- मदन गिर गया है.... उत्तों कोठ्यां अतों....दरवाजा खोलो....।
मैं दरवाजा खोलने जा रही थी कि लडके को जो अब सीधा पडा था और आँखे खोल समझने की कोशिश कर रहा था कि उसे हुआ क्या है, क्या वह जिंदा भी है? कि मेरी नजर जहाँ पडी धक्क से रह गयी। हवा में शायद उसका पैंट खुलकर या ढीला होकर उतर गया था और उस जगह आधे इंच का पतला, मरे हुए काले झींगुर-सी कोई चीज थी। चार तरफ सूजन, काली पड गई खरोंचे, लाल-नीले दाग.....।
चाईजी उठ बैठीं। तनिक सी देर में वे समझ गई कि मदन पतंग के चक्कर में गिरता हुआ उनकी गोद में आ समाया है ! जपुजी साहेब ने उसका अंग-भंग न होने दिया। लेकिन अंग का यह कैसा ढंग? दरवाजे पर थाप तेज होती जा रही थी। हल्ला मच गया था- मदन गिर गया है, मदन गिर गया है, चाईजी के अंगने में ऊपर तीन मंजिले से। मरी आँखों का पीछा करती चाईजी की आँखे भी उस जगह तक जा पहुँची और इस प्रकार वह बुजुर्ग महिला सुनी गई आशंकाओं के जिंदा स्वरूप को देखकर सिहर गईं। भड-भड भड-भड, दरवाजा मानो टूट कर गिर पडेगा। दौडती हुई मैं दरवाजा खोल आई। आँधी की तरह औरतों का झुंड अंदर आया। चाईजी, मदन को हिला हुला कर पूछ रही थीं- ए के कित्ता? क्या हुआ है यह? क्या करता है इसके साथ, मांयाह्वा....... बोलता क्यूं नहीं फिट्टाथीवें........, केडी अग्ग लग्गी हुई है, दस्स.......
मदन को अभी भी मानो होश नहीं। सुंदरी आँटी ने एक हाथ से बहते खून को रोकना चाहा दूसरे स पैर में फंसी पैंट को ऊपर चढाया कि हाथ जाने कहाँ कैसे लगा, मदन में प्राण लौटे। उसने सीत्कार भरी। दोनों टाँगे फैला दी। कंठ से गों-गों करती आवाज........ भर चाबी, भर दे, कितनी चाबी भरेगा........ सुंदरी आंटी ने तुरंत हाथ पीछे कर लिये। मदन की आँखें फिर मुँद गई। यह देख सुन वहाँ मौजूद स्त्रियाँ सकते में आ गईं। उन्होंने अपने खुले मुँह में अपनी चुन्नियों के कोर दबा लिए। मदन की घुटी हुई घिघियाई आवाज, मानो किसी दर्द की पगडंडी से आती हो। कुहरती-सिहरती आवाज- बस कर गोल्डी !!! बस कर !!! मैंने रस्सी से लटकती चन्नी उतारी और उसकी टाँगों पर डाल दी।
सामने हायः हाय, बिन माँ पियू दा बच्चा ! रब्ब मेहर करे। भग्गी मासी के करूण स्वर से सब मानों होश में आये। भगदड मच गई। बन्ती मासी दौडी, गरम घी ले आईं। उसके हाथ पैरों में मलना शुरू किया। निम्मो दी ने उसके घावों को सँभाला, मुन्नी आँटी दौडी गरम दूध में हल्दी घोल ले आईं। सज-धज कर तैयार होटल निकलती कमलेश आँटी को वहीं दबोच लिया गया। दूसरे के फटे में कभी दखल न देने वाली चाईजी ने फिर इतनी गरमागरम गालियाँ सुनाई कि उन्होंने पूरे समाज के आगे अपनी लापारवाही और गैर जिम्ममेदारिया के लिए उनके पैरों पर गिरकर माफी माँगी। फूट-फूट कर रो रही थीं वें।
आँखों से बहते आँसू सूरमे से मिल ऐस काले लावे लग रहे थे जिनमें अपने इकलौते बच्चे को किसी तरह बचा लेन की जिद्द का इतिहास छिपा था। सिसकती हुई कमलेश आँटी को भग्गी मासी बाँह पकड वहाँ से ले गयीं। श्यामू भैया अजमल की मदद से मदन को डॉक्टर के पास ले गये। दो, चार दिन आराम करने और दवाइयाँ लेने के बाद मदन फिर स्कूल जाने लायक हो गया। आम बच्चों की तरह अब वह हँसता, मुस्कुराता। घर में अब उसके भी बोलने की आवाजें आतीं। एक फर्क और आया। वह स्कूल जाने से पहले बिलानागा चाईजी का मत्था टेकने बहन के घर जरूर आता। नन्ही गुड्डों क चुमकारे देता और चाईजी को पैरी पोना करता कि उनके गोद ने उसे बचाया है।
अब मैं पढती तो कभी बर्तन खडकते, कभी दुर्गंध आती, गोल्डी वैसे ही चीखता चिल्लाता, लेकिन दीवारों में सुराख कर देने वाली, पीडा भरी वह गों-गों की कुहरती सिहरती आवाज आनी बंद हो गयी थी।
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