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जापान में हिन्दी

ऋचा मिश्र
भाषा व साहित्य का सम्मान वास्तव में समाज की ऊर्जा और जीवंतता का सम्मान है। साहित्य का सृजन-शिक्षण और अध्ययन - अध्यापन उसी सामाजिक परिवेश में हो सकता है, जहाँ बौद्धिक विकास के अनुकूल और स्वस्थ अवसर उपलब्ध हों । इस पृष्ठभूमि में जापान के तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग को भारत सरकार द्वारा मिलने वाला विश्व सम्मान विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। 18 से 20 अगस्त 2018 तक मॉरीशस में आयोजित ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण की सुदीर्घ परंपरा को गौरवान्वित करते हुए विश्व सम्मान से सम्मानित किया गया। यह निश्चित ही इस विश्वविद्यालय के लिए ही नहीं अपितु विश्व के समस्त हिंदी प्रेमियों के लिए गर्व का विषय है। संस्थागत और व्यक्तिगत दोनों श्रेणियों में तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय को यह सम्मान मिला, यह दोहरे हर्ष का विषय है। हिंदी अध्ययन और अध्यापन के 100 से अधिक वर्ष पूर्ण कर चुके इस विद्यालय ने कई मील के पत्थर पार किए हैं। सन 1908 से हिंदी उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी के शिक्षण का प्रारंभ करने वाले इस विश्वविद्यालय में आज हिंदी के अतिरिक्त मलयालम, बांग्ला तथा उर्दू के शिक्षण की सम्यक व्यवस्था है।
प्रसिद्ध हिंदी विद्वान तथा भारतीय मनीषा के अद्भुत चितेरे स्वर्गीय श्री विद्यानिवास मिश्र ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक हिंदी और हम में हिंदी भाषा की जिस विशेष वृत्ति को उकेरते हुए कहा था कि प्रत्येक भाषा का अपना संस्कार होता है। हिंदी का संस्कार सबको सहभागी मानने का है। इसको बोलने वालों में यह बोध कहीं गहरे विद्यमान है कि वह जीवन बडे पुण्य का है, जिसमें मनुष्य अपने समाज के लिए कुछ कर सके। सच्ची शिक्षा इसी संकल्प को मात्र धनार्जन की ओर न मोड कर सेवार्जन के लिए मोडती है। वही समन्वयात्मक वृत्ति प्रारंभ से ही जापान के सभी हिन्दी विद्वानों, शिक्षकों तथा रचनाकारों में मिलती रही है। प्रोफेसर क्यूया दोई, प्रोफेसर रेइचि गामो, प्रोफेसर तोशिओ तनाका, प्रोफेसर कज़ुहिको मचिदा तथा ताकेशि फुजिई जैसे शिक्षकों ने भारत जाकर हिंदी की शिक्षा ग्रहण कर, वापस जापान आकर एकनिष्ठ अध्यवसाय के साथ हिंदी के प्रचार प्रसार में अपना अमूल्य और निस्वार्थ योगदान दिया। इस विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षण की नींव डालकर उसे सुदृढ करने का कार्य करते हुए इन विद्वानों ने शब्दकोशों, हिंदी की अभ्यास पुस्तिकाओं तथा भाषा प्रवेशिकाओं की रचना का कार्य सतत जारी रखा। सन 2006 में प्रोफेसर कोगा ने हिंदी-जापानी शब्दकोश प्रकाशित किया जो विश्व के श्रेष्ठतम कोशों में से एक है। आचार्य विनोबा भावे के निर्देश पर डॉक्टर दोई ने देवनागरी लिपि में जापानी भाषा प्रवेशिका की रचना का उल्लेखनीय कार्य किया। हिंदी की असंख्य प्रतिष्ठित और लोकप्रिय रचनाओं के जापानी अनुवाद यहाँ से प्रकाशित होने वाली पत्रिका इंदोगकु-बुक्कयोगकु केंक्यू में तथा स्वतंत्र रूप से भी प्रकाशित किए जाते रहे। जापानी में अनूदित हिंदी की रचनाएँ जो स्वतंत्र रूप से प्रकाशित की गईं, उनमें प्रेमचंद की कुछ चुनी हुई कहानियाँ, भीष्म साहनी का तमस तथा मेरे भाई बलराज, अश्कजी की गिरती दीवारें, कबीर का बीजक, मन्नू भंडारी का आपका बंटी इत्यादि विशेष हैं।
किसी भी विदेशी भाषा के शिक्षण में पाठ्य पुस्तक का निर्माण एक बहुत चुनौती भरा कार्य होता है, क्योंकि विद्यार्थी को उसके अपने भाषा प्रतीकों की सहायता से विदेशी भाषा के प्रारंभिक स्वरूप से परिचित करवाने का जोखिम भरा कार्य शिक्षक को करना पडता है, जिससे विद्यार्थी उसे सुगमता से ग्रहण कर सकें। उल्लेखनीय है कि यह महती कार्य विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तनाका तथा प्रोफेसर मचिदा जी ने 30 वर्ष पूर्व एक्सप्रेस हिंदी नाम की पाठ्यपुस्तक की रचना द्वारा पूरा किया। यह पुस्तक जापान के लगभग सभी हिंदी शिक्षण संस्थानों में प्रारंभिक पुस्तक के रूप में लोकप्रिय है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें आम बोलचाल की हिंदी को विभिन्न प्रसंगों से संबंधित वार्तालाप के द्वारा सहजता से समझाया गया है। हिंदी वाक्यों का उच्चारण जापानी भाषा में संलग्न रिकॉर्डिंग सुन कर भी साथ साथ किया जा सकता है। महती प्रतिभा के धनी प्रोफेसर मचिदा ने उपरोक्त पुस्तक के अतिरिक्त कंप्यूटर की सहायता से गोदान के समस्त शब्दों का प्रयोग कोश परिश्रम पूर्वक तैयार किया। अद्यतन वह भारत की अन्य प्रमुख भाषाओं के शब्दकोश तैयार करने में लगे हुए हैं। उनकी इस अभूतपूर्व क्षमता तथा हिन्दी अनुराग की वृत्ति को उचित स्थान देते हुए व्यक्तिगत श्रेणी में उन्हें विश्व सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी कारयित्री प्रतिभा का उचित मूल्यांकन करता है इसमें कोई संदेह नहीं।
तोक्यों विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय ने हिंदी की शिक्षण प्रणाली को संपुष्ट बनाने में मात्र पाठ्यपुस्तक निर्माण और अनुवाद ग्रंथों द्वारा ही सहयोग नहीं दिया, अपितु आधुनिक शिक्षण की बदलती चुनौतियों, आवश्यकताओं तथा विद्यार्थियों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए, दृश्य श्रव्य माध्यम की एक पृथक व्यवस्था भी की, जहाँ हिन्दी के विद्यार्थी हिन्दी फिल्मों, टेलिविजन सीरियल इत्यादि के द्वारा भाषा के विभिन्न प्रायोगिक रूपों से परिचय प्राप्त कर सकते हैं। भाषा के प्रसार और संप्रेषण के लिए जहाँ एक ओर सुनिश्चित पाठ्यक्रम और उपयोगी पाठ्य पुस्तकों की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर उसकी लालित्यपूर्ण और हृदयग्राही अभिव्यक्ति भी अति आवश्यक है जिससे विद्यार्थियों की रुचि निरंतर बनी रहे। संगीत, सिनेमा तथा इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के अन्य उपकरण इस कार्य को बखूबी निभाते हैं। इनके उपयोग से विश्वविद्यालय में छात्रों की उच्चारण संबंधी समस्याओं का निवारण सफलतापूर्वक किया जाता है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष यहाँ के विद्यार्थी हिंदी नाटक का सफलतापूर्वक मंचन करते हैं। यह हिंदी भाषा में उनकी बढती हुई रूचि का प्रमाण है। स्नातक स्तर तक हिंदी की शिक्षा देने वाले इस विश्वविद्यालय का पुस्तकालय, ज्ञान का अपूर्व भंडार है। हिंदी भाषा और साहित्य की विविध विधाओं से संबंधित जितनी महत्वपूर्ण और दुर्लभ पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाएँ यहाँ संग्रहीत हैं, वे अन्यत्र मिलनी कठिन हैं। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी आदि पत्रिकाओं के पुराने अंक तथा गोदान का प्रथम संस्करण तथा अन्य अनेक दुर्लभ पुस्तकें यहाँ सहेजकर सुरक्षित रखी गई हैं। इसके साथ-साथ भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन, इतिहास इत्यादि से संबंधित विशिष्ट ग्रंथों का भी संकलन पुस्तकालय की गरिमा को चार चाँद लगा देता है। इस प्रकार हिंदी भाषा के अध्ययन, प्रचार प्रसार और जापान में हिंदी की रीढ की हड्डी के रूप में वर्तमान तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय को दोहरे सम्मान का मिलना एक ओर जहाँ जापान और भारत के पारंपरिक सौहार्द को नए आयाम देता है, वहीं देशों के बीच आत्मीयता और सहयोग के संवर्धन में साहित्य और भाषा के सक्रिय योगदान को रूपायित भी करता है।
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