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कृष्णा सोबती की जीवन-कथा का सिरोही-प्रसंग

नन्द भारद्वाज
हिन्दी की प्रतिष्ठित कथाकार कृष्णा सोबती आजादी पूर्व के अखंड पंजाब के गुजरात शहर में पैदा हुई थीं, जो विभाजन के बाद अब पाकिस्तान का हिस्सा है। उनके पिता ब्रिटिश शासन में सीनियर सिविल सर्वेंट थे और अपनी नौकरी के सिलसिले में वे आधे साल शिमला और आधे साल दिल्ली रहते थे। कृष्णाजी का बचपन और शिक्षा दीक्षा शिमला, दिल्ली और लाहौर में सम्पन्न हुई और वे किशोरावस्था पार होने तक अपने जन्म-स्थल और ननिहाल बराबर आती-जाती रहीं। उनकी माता दुर्गादेवी और भाई-बहन विभाजन से पूर्व शिमला-दिल्ली आ चुके थे, बल्कि उनके दादा तो उससे भी पहले अपने काम के सिलसिले में कलकत्ता पहुँच चुके थे। कृष्णा सोबती की जन्मभूमि और ननिहाल पश्चिमी पंजाब में होने की वजह से उस समूचे अतीत और वहाँ के लोकजीवन से उनका गहरा भावनात्मक जुडाव हमेशा बना रहा। उनकी अनेक कहानियाँ और शुरूआती दौर के उपन्यास उसी आँचलिक परिवेश और जीवन से संबंधित रहे हैं, वह चाहे डार से बिछुरी हो,जिन्दगीनामा हो, ए लडकी हो यह ताजा उपन्यास गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान। सन् 2017 में अपने पहले संस्करण के रूप में प्रकाशित यह कथा-कृति प्रकारान्तर से उनकी अपनी ही जीवन-कथा का अंश है।
इस उपन्यास का एक बडा अंश साहित्यिक पत्रिका तद्भव में छपा था और उसे पढते हुए यही अनुमान हुआ था कि शायद वे इसे अपनी आत्मकथा के रूप में लिख रही हैं, लेकिन जब यह मौजूदा रूप में सामने आया, तो इतना ही स्पष्ट हुआ कि यह उनकी अपनी जीवन-कथा का एक अंश अवश्य है, अपने जीवन की पूरी कथा न उन्होंने कभी लिखी और न लिखने का कोई इरादा ही रहा। इस आत्मकथा में आजादी पूर्व के लाहौर से अपनी कॉलेज शिक्षा पूरी कर उनके दिल्ली आने और पहली नौकरी के रूप में राजपूताना की सिरोही रियासत के राजघराने में गवर्नेस के बतौर दो वर्ष तक कार्य करने तक के अनुभव दर्ज हैं। दो वर्ष बाद सिरोही से वापस दिल्ली लौटने के साथ ही इस जीवन-वृतान्त को वे वहीं विराम दे देती हैं। इस जीवन-कथा के आवरण पृष्ठ पर अंकित टिप्पणी भी इसी ओर संकेत करती है, जिसमें कहा गया है कि इस कृति का नजदीकी संबंध उस शख्सियत से है, जिसे हम कृष्णा सोबती के नाम से जानते हैं। बँटवारे के दौरान अपने जन्मस्थान गुजरात और लाहौर को यह कहकर कि याद रखना, हम यहाँ रह गए हैं, वे दिल्ली पहुँची थीं कि यहाँ के गुजरात ने उन्हें आवाज दी है और अपनी स्मृतियों को सहेजते-संभालते वे अपनी पहली नौकरी करने सिरोही पहुँच गई, जहाँ उनमें अपने स्वतंत्र देश का नागरिक होने का अहसास जगा, व्यक्ति की खुद्दारी और आत्मसम्मान को जांचने-परखने के लिए सामंती ताम-झाम का एक बडा फलक मिला।
कृष्णा सोबती लाहौर के फतेहचंद कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी कर जब दिल्ली लौटीं तब उनके सिविल सर्वेंट पिता कर्जन रोड के सरकारी आवास में रहते थे। उसी आवास में रहते हुए एक दोपहर को उन्होंने बाहर सडक पर कुछ मजदूरों को तुरही नगाडा होइश्शा की नारेबाजी के साथ एक बिजली के गोल ट्रांसफॉर्मर को धकेलकर ले जाते हुए खिडकी से देखा और यह भी देखा कि उनके पडौसी कुरेशी अंकल के घर का सामान ताँगे पर लदवाया जा रहा था और उस फ्लैट पर पी. डब्ल्यू. डी का चौकीदार ताला लगाने के लिए मुस्तैदी से खडा था। उसने देखा कि कुरेशी अंकल स्वयं भी परिवार के साथ जैसे हमेशा के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे, तो वह हडबडाई-सी कुरेशी आंटी के पास पहुँची और उनका हाथ छूकर रोने लगी। कुरेशी अंकल ने पुचकारकर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा - जाओ बिटिया, जाओ, यह बाहर खडे रहने का वक्त नहीं। वह स्वयं भी यह बात को जान चुकी थी कि उन दिनों चारों तरफ जिस तरह का माहौल था, उसमें अधिकांश मुस्लिम परिवार नये मुल्क पाकिस्तान की ओर पलायन कर रहे थे और ऐसा ही सिलसिला उधर से हिन्दू परिवारों के हिन्दुस्तान लौटने का भी बना हुआ था। इस आवाजाही के लिए कुछ स्पेशल गाडियों की व्यवस्था की गई थी, जो अपर्याप्त-सी थी। जिस तरह की तबाही की भयावह खबरें अखबारों और अफवाहों के जरिये आ रही थी, उससे चारों तरफ अराजकता का-सा माहौल बनता जा रहा था। ऐसी भयावह घटनाओं की एक चलचित्रनुमा तस्वीर कृष्णाजी ने इस जीवन-कथा के आरंभिक 15 पृष्ठों में दर्ज की है, जिससे यह अनुमान होता है कि उस समय लोग किस तरह के त्रासद हालात के बीच से गुजर रहे थे। ऐसे ही हालात में कृष्णाजी ने अपने को किसी काम में व्यस्त करने के उद्देश्य से जब अखबार में सिरोही रियासत का एक विज्ञापन देखा कि वहाँ की शिशुशाला के किसी प्रशिक्षित शिक्षक की जरूरत है, तो उन्हें यह काम अपनी रुचि के अनुरूप लगा और अपना आवेदन रजिस्टर्ड डाक से भेज दिया। उन्होंने चूंकि स्नातक डिग्री के साथ मोंटेसरी प्रशिक्षण का डिप्लोमा भी कर रखा था, इसलिए कुछ ही दिनों में उन्हें बुलावा भी आ गया।
पंजाब और हिमाचल की हरी-भरी वादियों में रहने वाली कृष्णा सोबती सिरोही रियासत के बुलावे पर शायद पहली बार राजस्थान की रूखी-सूखी धरती पर रेल-सफर कर रही थीं। ऐसे में उनकी यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी, जो इन शब्दों में व्यक्त हुई - वह सरसों के पीले-हरियाले खेत क्या हुए ! कहाँ ओझल हुए वह भरपूर पत्तोंवाले छाँहदार पेड। क्या हुईं वह कच्ची राहें ! वह दरिया चनाब की झिलमिलाती लहरें। कहाँ खो गई वह सुथरी चमकती रेते। और अब गाडी के साथ-साथ दौडती डूँगरों की सलवटों में छिपी मजबूत राजपूताना धरती।
इसी सफर के अंतिम पडाव के रूप में जब वे अपने टिकिट पर अंकित एरिनपुरा रेल्वे स्टेशन पर दोपहर के वक्त उतरीं तो सामने सुनसान सपाट प्लेटफॉर्म को देखकर एकबारगी ठगी-सी रह गई थी कि वे कहाँ आ गई हैं ! सिरोही शहर से कोई चालीस किलोमीटर दूर तब का एरिनपुरा आज जवाई बाँध रेल्वे स्टेशन के रूप में परिवर्तित हो गया है। गाडी से उतरकर जब उन्होंने चारों ओर नजर दौडाई, तो सामने से धोती-कमीज पहने एक नाटा-सा आदमी उनके करीब आता दिखा, जिसने करीब आने पर अपना नाम मुन्नालाल बताते हुए उन्हें आश्वस्त किया कि वह सिरोही राज की ओर से उन्हीं को लेने आया है। उसने बताया कि रेल्वे स्टेशन के बाहर ही एक बस उनके इंतजार में खडी है, जो यहाँ की सवारियों को सिरोही पहुँचाती है। वे एक पुरानी-सी बस सिरोही शहर जाने के लिए तैयार खडी है, उन्हें उसी में सवार होकर सिरोही पहुँचना है। मुन्नालाल से बतियाते हुए सवा-डेढ घंटे के सफर के अंत में वे सिरोही शहर पहुँच गई, जो पहली नजर में एक ठीक-ठाक-सा छोटा शहर नजर आ रहा था। वहाँ पहुचने पर सिरोही राजा के गैस्ट हाउस में उनके लिए ठहरने की व्यवस्था थी, जो पहली नजर में एक पुराना-सा गैस्ट हाउस था, दीवारें और दरवाजे रंग-रोगन से बदरंग। वह रात उन्हें वहीं गुजारनी थी। सुबह जब आँख खुली, तो बाहर का प्राकृतिक दृश्य उन्हें कुछ खुशनुमा-सा लगा। तभी गैस्ट हाउस के सेवक देवला ने आकर सलाम किया और बताया कि चाय-नाश्ता उन्हें दीवानजी यहाँ करना है।
कृष्णाजी नहा-धोकर तैयार हो गईं और नौ बजे उन्हें दीवानजी के यहाँ से गाडी आ गई। वह कुछ ही मिनट में दीवानजी की डयोढी पहुँच गईं और बैठक में दाखिल हो गईं। दीवानजी ने उनका स्वागत किया और सुख-सुविधा की जानकारियाँ लीं। इस बीच उनका नाश्ता आ गया। दीवानजी से यह पहली मुलाकात एक तरह से कृष्णाजी का इंटरव्यू ही थी, जिसमें उनकी शिक्षा-दीक्षा और रुचियों के बारे में आवश्यक जानकारियाँ लीं गईं। इन्हीं जानकारियों में उन्होंने अपनी सिक्का बदल गया और अज्ञेय जी की पत्रिका प्रतीक में प्रकाशित कहानियों का भी हवाला दिया। इस मुलाकात में दीवानजी ने बताया कि उनके अहमदाबाद के मित्र देसाईजी और कृष्णा के पिता अच्छे मित्र हैं और उन्होंने पहले ही उनके आगमन की जानकारी दे दी थी, लेकिन उनका चयन विशुद्ध रूप से योग्यता के आधार पर किया जा रहा है, किसी सिफारिश पर नहीं। अगर उन्हें सिरोही रहना या यहाँ का काम पसंद न आए तो वे बिना किसी संकोच के बता सकती हैं, यात्रा-व्यय सहित उनकी वापसी की व्यवस्था कर दी जाएगी। इंटरव्यू के दौरान दीवान उन्हें बेटी कहकर ही संबोधित करते रहे और कृष्णाजी भी उनकी आँखों में अपने प्रति सहज स्नेह का भाव देखकर थोडी आश्वस्त हुई।
दीवानजी ने कृष्णाजी को रियासत के एक और अधिकारी जुत्शीजी से भी मुलाकात करवा दी, जो उनके कक्ष में ही आ गये थे। जुत्शी जी के पास एजुकेशन सुपरिटेंडेंट और काल्विन स्कूल की प्रिंसीपलशिप का दोहरा चार्ज था। वे मूलरूप से कश्मीरी थे, लेकिन कुछ साल पहले उनका परिवार उदयपुर आ गया था। उन्होंने कृष्णाजी से जानकारियाँ लेकर शिशुशाला के बारे में मुख्य जानकारियाँ दे दीं और शिशुशाला दिखा भी दी। उन्होंने बताया कि महारानी साहिबा अहमदाबाद के श्रेयस स्कूल जैसा आदर्श स्कूल बनाना चाहती हैं, उसी के लिए योग्य शिक्षकों की तलाश की जा रही है। उन्होंने उनके रहने की व्यवस्था के बारे में जानकारी लेने के बाद यही सलाह दी कि वे दीवानजी से कहकर स्टेट के यूरोपियन गैस्ट हाउस में रह सकती हैं।
जुत्शी ने कृष्णाजी को इस बात के लिए आश्वस्त भी कर दिया कि वे उन्हें इस काम के लिए सबसे उपयुक्त लगती हैं, बस एक बार राजमाता साहिबा से उनकी मुलाकात हो जाए और वे भी अपनी सहमति दे दें, फिर उनका चयन निश्चित है। उन्होंने यह भी बताया कि वे जिस पद के लिए आई हैं, उस पर दीवानजी की पसंद का अहमदाबाद का एक और प्रत्याशी भी है, जो उनके बाद दूसरे नंबर पर है, इसलिए अगर उन्हें काम अनुकूल लगे तो वे निर्णय करने में देरी न करें, बल्कि तुरंत अपनी रजामंदी दे दें। जुत्शी जी से मुलाकात के बाद वे वापस अपने गैस्ट हाउस आ गईं और भोजन के बाद कुछ देर आराम करना चाहा। इसी बीच उन्हें दिल्ली से रवाना होने से पूर्व अपने पिता और हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक भगवतीचरण वर्मा और नवीन जी से हुई बातचीत की याद आती रही, जिनकी यही सलाह थी कि उसे दिल्ली में ही बने रहना चाहिए। वे चाहें तो उनके साथ ही काम कर सकती हैं, लेकिन कृष्णाजी को किसी के मातहत काम करने की कोई इच्छा नहीं थी, इसलिए उन्होंने पिताजी को यही कहकर आश्वस्त किया था कि अगर उन्हें सिरोही का काम पसंद न आया तो वे दिल्ली लौट आएँगी और अपनी एम.ए की पढाई पूरी करेंगी। अपरान्ह जब वे आराम करके जागीं, तो राजमहल से उन्हें लेने के लिए गाडी आ गई थी। वे तैयार होकर राजमाता साहिबा से मुलाकात के लिए रवाना हो गईं। सिरोही के दत्तक महाराज स्वरूपविलास में रहते थे और राजमाता केसरविलास में। उन्हें राजमाता से मिलने के नियम-कायदे बता दिये गये थे, जिन पर बिना कोई प्रतिक्रिया किये उन्होंने सुन लिया था। महल में प्रवेश के बाद लाउंज में उनकी भेंट एक अंग्रेज महिला मिस विलियम से हुई, जो व्यवस्था का काम देखती थीं। विलियम कृष्णाजी से आवश्यक जानकारियाँ लेने के बाद उन्हें राजमाता से मिलवाने भीतर ले गईं। मिस विलियम ने राजमाता को कृष्णाजी की ओर संकेत करते हुए बताया कि ये मिस सोबती दिल्ली से आई हैं। उसी के साथ कृष्णाजी ने राजमाता को गुड ईवनिंग योर हाईनैस कहकर अभिवादन किया, जिसका उत्तर राजमाता ने भी गुड ईवनिंग कहकर दिया और पास ही रखी सोफा चेयर पर बैठने का संकेत किया। राजमाता उन्हें एक खुशमिजाज स्त्री लगीं, जिन्होंने आरंभ में उनकी यात्रा और सिरोही में उनकी सुख-सुविधा के बारे पूछते हुए विलियम को चायपान के लिए निर्देश दिया। वे उनसे दिल्ली में उनकी रिहाइश और शिक्षा के बारे में सहजता से बात करती रहीं। जब चाय आ गई और मिस विलियम कहीं अंदर ही व्यस्त दिखीं तो कृष्णाजी ने राजमाता की अनुमति लेकर चाय के दो कप तैयार कर लिये। राजमाता ने बताया कि वे अहमदाबाद के श्रेयस संस्थान जैसा ही एक शिक्षण संस्थान सिरोही में बनाना चाहती हैं, जिसके लिए उन्होंने यही सलाह दी कि एक बार जुत्शीजी के साथ अहमदाबाद जाकर उस संस्थान को देख आए और विलियम को यह भी निर्देश दिया कि उनके रहने की व्यवस्था यूरोपियन गैस्ट हाउस में करवा दी जाए। इस पर कृष्णाजी ने राजमाता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए जब यह कहा कि वे अभी यहाँ रहने का पक्का फैसला नहीं कर पाई हैं, तो राजमाता ने हँसकर कहा कि कोई बात नहीं, आप इत्मीनान से विचार कर लें, लेकिन अगर यहाँ न भी रहना चाहें तो दिल्ली जाने से पहले सिरोही नगर और यहाँ की कृष्णावती नदी को अवश्य देखकर जाएँ। उन्हें राजमाता का यह स्नेह-संवाद बहुत रुचिकर लगा और उनके प्रति फिर से गहरी कृतज्ञता व्यक्त की। इस मुलाकात से कृष्णाजी के मन को गहरा सुकून मिला।
राजमाता से मुलाकात के बाद कृष्णाजी ने सिरोही के इस शैक्षणिक संस्थान में काम करने के लिए अपना मन बना लिया था। उन्हें सिरोही राज से दिल्ली के पते पर जो औपचारिक पत्र भेजा गया था, वह असल में नियुक्ति पत्र ही था, दीवानजी और राजमाता से मिलना तो एक तरह की शिष्टाचार मुलाकातें थीं। उन्होंने सुबह ही सिरोही स्टेट के तहसील ऑफिस जाकर अपनी ज्वाईनिंग दे दी। उन्हें तहसील ऑफिस कर्मियों का रूखा व्यवहार तथा माहौल रास नहीं आया, बल्कि वह ऊबाऊ-सा लगा, लेकिन उसे अनदेखा करते हुए वे ज्वाईनिंग की कॉपी लेकर बाहर आ गईं। रास्ते में जुत्शीजी अपनी जीप में आते दिखाई दिये और पास आने पर जीप रुकवाकर जब उन्होंने पूछा कि वे यहाँ कैसे तो कृष्णाजी ने बता दिया कि वे अपनी ज्वाईनिंग देकर आ रही हैं, इस पर जुत्शी जी ने आश्चर्य प्रकट किया कि उन्होंने इस बारे में उनसे तो पूछा ही नहीं, सीधे ज्वाईनिंग देने कैसे आ गईं। उन्हें और दीवानजी को पहली मुलाकात से यही अनुमान था कि शायद वे वापस दिल्ली लौट जाएँगी, इसलिए दीवानजी ने अपनी पसंद के पोपटलाल को पहले से वहीं रोक रखा था। जुत्शीजी को इस तरह उनसे बिना अनुमति लिये ज्वाईनिंग देना रास नहीं आया। उनकी जीप में अहमदाबाद का वही प्रतियोगी बैठा था, इसलिए वे बिना कुछ कहे जीप से आगे निकल गये। जीप के ड्राइवर ने हाथ के इशारे से कृष्णाजी को काल्विन शिक्षा संस्थान पहुँचने का संकेत जरूर कर दिया था, इसलिए वे मुस्कुराती हुई पैदल ही उस ओर रवाना हो गईं।
काल्विन पहुँचकर कृष्णाजी कुछ देर लाइब्रेरी में किताबें और पत्रिकाएँ देखती रहीं, तभी जुत्शीभी बाहर से लौट आए। वे थोडे खिन्न-से थे, कृष्णाजी को देखकर पहले जैसा उत्साह भी नहीं था, लेकिन सामान्य शिष्टाचार के नाते अपने कमरे में आमंत्रित किया और चाय मँगवाई। बातचीत में उन्होंने बताया कि सिरोही राज के घटनाक्रम में तेजी से बदलाव आया है, दीवानजी सेवानिवृत्त होकर जा रहे हैं और गोकुलभाई भट्ट सिरोही राज के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार सँभाल रहे हैं। तब तक सिरोही राजस्थान राज्य से अलग था। वे बोले, यह न समझ लीजिये कि आपने ज्वाईनिंग दे दी, तो नौकरी पक्की हो गई। मुमकिन है पुराने इंटरव्यू ही रद्द कर दिये जाएँ। कृष्णाजी ने जुत्शी की बात को चुपचाप सुना और बातचीत के अंत में इतना ही पूछा कि सिरोही में कोई देखने की खास जगह है इस पर जुत्शी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए माउण्ट आबू और सिरोही के कुछ प्रमुख सथानों के नाम बताए, जो वे पहले ही देख चुकी थीं। इसी बीच तहसील से संदेशवाहक आया और उन्हें डाक-पैड दे गया। चाय पीते हुए उन्होंने डाक देखी और अंत में बताया कि अगले दिन सवेरे मुख्यमंत्री गोकुलभाई भट्ट ने उन दोनों को मुलाकात के लिए बुलाया है। विदा लेने से पहले कृष्णा ने सारनेश्वर जाने की इच्छा जताई, इस पर जुत्शीजी ने उन्हें जीप ले जाने का सुझाव दिया, लेकिन वे पैदल ही जाने का कहकर वहाँ से गैस्ट हाउस की ओर निकल आई।
अगली सुबह जब वे गोकुलभाई भट्ट से मुलाकात के लिए पहुँची, तो वहाँ दीवान और जुत्शी भी मौजूद थे। भट्टजी ने कृष्णाजी को देखते ही जिस अपनत्व से उनका स्वागत किया और हाल-चाल पूछे तो दीवान और जुत्शी दोनों आश्चर्य से उन्हें देखते रह गये। भट्टजी ने निर्देश देते हुए कहा कि जुत्शीजी, इन्हें वह सब सुविधाएं दें कि ये अपना काम कुशलता से कर सकें। हम शिशुशाला को राज्य का सबसे अच्छा स्कूल बनाना चाहते है। इस पर जुत्शीजी, हुकुम ! कहकर उन्हें आश्वस्त किया। भट्टजी ने कृष्णाजी से कहा कि सोबती बाई, नवीन जी आफ लिए चिन्तित थे। हमने उन्हें आश्वासन दिया कि बाई को हमारे यहाँ कोई तकलीफ नहीं होगी। और इस तरह कृष्णाजी की शिशुशाला की निर्देशिका के रूप में नियुक्ति निश्चित हो गई। जुत्शी और प्रशासन के सभी लोगों को उनकी अहमियत और अपनी सीमाएँ समझ में आ गई।
गैस्ट हाउस पहुँचने पर उन्हें मिस विलियम का छोटा-सा नोट मिला कि राजमाता शाम साढे चार बजे उनसे मिलने की इच्छुक हैं। कृष्णाजी घूमती हुई चार बीस पर केसरविलास पहुँच गई। नियत समय पर राजमाता के कक्ष में पहुँचने पर उन्होंने खुशी से स्वागत किया और अपनी बातचीत में उनके आत्मविश्वास की प्रशंसा भी की। फिर पिछले दो दिनों के हाल-चाल जानने की इच्छा प्रकट की। कृष्णाजी ने बिना किसी की शिकायत या किसी कमी का हवाला दिये सारी बातें उनके सामने बयान कर दीं। खासतौर से सारनेश्वर दर्शन का उत्साह से वर्णन किया। फिर दोनों के बीच साहित्य और दर्शन की कई पुस्तकों और दार्शनिकों पर भी विचार विमर्श हुआ। उन्हें यह जानकर अच्छा लगा कि राजमाता साहित्य और दर्शन में अच्छी रुचि रखती हैं। उन्होंने फिर कभी और चर्चा के लिए आमंत्रित करने का आश्वासन देकर उन्हें विदा किया।
शिशुशाला में नियुक्ति निश्चित हो जाने के बाद कृष्णाजी ने सिरोही में रहने का अपना मन पक्का कर लिया था। अगली सुबह गैस्ट हाउस में शिशुशाला की दो सेविकाएँ मिश्रीबाई और फूलीबाई उनकी हाजरी में आकर खडी हो गई और अपने लायक सेवा का निवेदन करने लगीं। कृष्णाजी ने दोनों को यह कहते हुए विदा किया कि उनकी ड्यूटी स्कूल में है, उन्हें उनकी निजी सेवा के लिए आने की जरूरत नहीं है। उसी दोपहर राज के दारोगा जी उनके लिए आवास की व्यवस्था हेतु उन्हें कुछ मकान दिखाने का प्रस्ताव लेकर आ गये। कृष्णाजी ने उनके साथ जाकर दो आवास देखे, लेकिन वे उन्हें पसंद नहीं आए, लौटते में स्वरूपविलास के पास एक भुतहा-सा कॉटेजनुमा मकान देखा, जो उन्हें पसंद आ गया, लेकिन उस मकान के बारे में आम राय यही थी कि यहाँ रात में भूत मँडराते हैं और इस मकान में कोई रहना पसंद नहीं करता। कृष्णाजी ने इस दलील को नहीं माना और उन्होंने विलियम को नोट भेजकर वह मकान आवंटित करवाने के बारे में रानी साहिबा को अपना निवेदन भिजवा दिया। रानी साहिबा के कहने पर वह कॉटेज तुरन्त उन्हें आवंटित कर दिया गया और उसे रहने लायक तैयार भी करवा दिया गया। रहने की व्यवस्था निश्चित हो जाने के बाद उन्हें जुत्शीजी के साथ शिशुशाला के काम से अहमदाबाद और बंबई की यात्रा पर रवाना होना था। वे दो दिन बाद रेल यात्रा से अहमदाबाद पहुँच गई। वहाँ उनके मौसा रोहित मिल्स में चीफ इंजीनियर थे, इसलिए अहमदाबाद में उनके रुकने का पुख्ता इंजजाम था। वे जुत्शीजी के साथ रेल्वे स्टेशन से सीधे अपनी प्रकाश मौसी के घर पहुँच गई और उनके मौसा मुकुलजी ने जुत्शीजी के लिए अपनी मिल के गैस्ट हाउस में ठहरने की व्यवस्था करवा दी।
प्रकाश मौसी के करीब ही कर्मचारियों के आवास के बीच उनकी छोटी बहन शान्ति भी पाकिस्तान से विस्थापित होकर आनेवाले परिवारों के बीच छोटे से मकान में रहती थी। कृष्णा जब अपनी छोटी मौसी से मिलने पहुँची तो वे उसे गले लगाकर रुआंसी हो गई। विभाजन के दौर में मौसी और मौसा जी किसी तरह अपने दो बच्चों के साथ जान बचाकर अपनी बडी बहन के पास अहमदाबाद आ गये थे, जहाँ मुकुलजी ने अपने साढू को रोहित मिल में ही काम पर लगवा दिया और रहने की तात्कालिक व्यवस्था भी करवा दी। शान्ति मौसी और कृष्णा की इस मुलाकात और उनकी आपसी बातचीत में ऐसे विस्थापितों की पीडा गहराई से व्यक्त हुई है।
अहमदाबाद में कृष्णाजी को एक-दो दिन ही रुकना था, उसके बाद उन्हें बंबई के लिए रवाना होना था। दो दिन बाद जब वे बंबई स्टेशन पहुँची तो बडे मामा (कृष्णाजी के माँ के मामा) और उनके बेटे काशीनाथ स्टेशन पर उसे रिसीव करने आ गये थे। उन्होंने जुत्शीजी से उनके ठहरने की व्यवस्था पूछकर उन्हें टैक्सी से कालबादेवी रोड के लिए रवाना कर दिया और कृष्णा को गाडी में बिठाकर अपने माटूँगा आवास पहुँच गये। माटूँगा में मामा जी के आवास में उनकी अपनी नानी से मुलाकात हुई, जो विभाजन के दौर में कष्ट सहती हुई किसी तरह बंबई पहुँची थी। बडे मामा ने अगली सुबह जुत्शीजी के पास कृष्णा को हार्नबी रोड, पहुँचाने की जिम्मेदारी काशीनाथ को सौंप दी थी। कृष्णाजी एक सप्ताह बंबई में रहीं और दौरान उनके बहुत से दोस्त और सहेलियाँ उनसे मिलने आए। सप्ताह भर में जुत्शी जी के साथ शिशुशाला के लिए आवश्यक सामान की खरीद कर वे उसी रेलयात्रा से सिरोही लौट आई। सिरोही लौटकर उन्होंने अपने मम्मी-पापा को पत्र लिखा जिसमें अहमदाबाद और बंबई में अपने मामा और मौसियों से हुई मुलाकात के बारे में विस्तार से लिखा। सिरोही लौटने पर यह भी जानकारी मिली कि राजघराने और सिरोही की नयी सरकार के बीच शिशुशाला को लेकर उत्पन्न हुए नये विवाद के कारण उसकी शुरूआत अभी स्थगित कर दी गई है, ऐसे में कृष्णाजी के लिए नये काम की तजवीज के लिए कमिश्नर ने उन्हें यूरोपियन गैस्ट हाउस विचार-विमर्श के लिए बुलाया था। कमिश्नर ने कृष्णाजी को राजभवन में नये महाराज की गवर्नेस के रूप में कार्य करने का प्रस्ताव किया तो उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया और वे अगले ही दिन तैयार होकर स्वरूप-विलास पहुँच गई।
गवर्नेस के रूप में स्वरूपविलास में प्रवेश के साथ ही कृष्णाजी के सिरोही प्रवास की परिस्थितियाँ, प्रयोजन और उनकी पूरी दिनचर्या बदल गई। सबसे पहले तो उनके रहने का ठिकाना बदलकर महल के भीतर सभी सुख-सुविधाओं से लैस वह कक्ष हो गया, जहाँ रहते हुए उन्हें दत्तक महाराज तेजसिंह की शिक्षा, राजसी संस्कार और उनके व्यक्तित्व विकास की तमाम जिम्मेदारियाँ निभानी थी। इसके लिए उन्हें सबसे पहले उन सभी लोगों को जानना जरूरी था, जो महल के भीतर महाराज की सेवा में पहले से नियुक्त हैं, जैसे उनके ए.डी.सी जयसिंह और उनके प्रभारी कर्नल साहब आदि। यहाँ तक कि युवराज की बडी माँ और छोटी माँ की देखरेख तथा पूर्व अंग्रेज गवर्नेंस मिसेज मैकफल्र्न द्वारा दी गई अब तक की शिक्षा आदि को जान-समझ लेना जरूरी था। इस प्रक्रिया में कुछ वक्त लगना स्वाभाविक था। उन्होंने पाया कि युवराज में सामान्य शिष्टाचार, विनम्रता और बालसुलभ जिज्ञासाभाव पर्याप्त रूप से विद्यमान था, इससे उन्हें अपना काम थोडा सहज हो गया था। युवराज की शिक्षा के लिए निर्धारित कार्यकक्ष में जब कृष्णाजी ने महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू के चित्र देखे, तो उन्हें यह भी आश्वस्ति हुई कि यह राज परिवार बदलते समय के प्रति सकारात्मक रुख रखता है। उन्हें आजादी की लडाई में प्रजामंडल के साथ देशी रियासतों के टकराव की भी जानकारी थी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज के प्रति लोगों के सहज लगाव से भी वे परिचित थी और अपेक्षा कर रही थी कि इस बदलते माहौल के प्रति इस राजभवन के लोगों की सोच में भी कुछ बदलाव अवश्य आया होगा। इस राजनीतिक परिदृश्य के साथ ही देश के बँटवारे से उत्पन्न विस्थापन की पीडादायक स्मृतियाँ भी यदा-कदा उनके मन-मस्तिष्क में अक्सर गहरी टीस पैदा करती थी। इस राजमहल में काम करते हुए अक्सर वे उन स्मृतियों में खो जाती थी और वे फ्लैशबैक के रूप में उनकी चेतना में उभर आती थीं। आजादी मिलने के तुरन्त बाद देश में बढते साम्प्रदायिक तनाव, दक्षिणपंथी ताकतों का उभार, महात्मा गाँधी की हत्या आदि ऐसे मसले थे, जो उनकी चेतना और स्मृतियों पर लंबे समय तक बने रहे। इसी चिन्ता, सोच और संवेदना के बीच वे अपनी गवर्नेंस की जिम्मेदारियाँ निभा रही थी। इन बाह्य परिस्थितियों के बावजूद राजमहलों के भीतर का वातावरण पूर्व की भाँति आपसी रंजिश, मनमुटाव, ईर्ष्या-द्वेष और वर्चस्व की मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाया था। यही प्रवृत्तियाँ इस राजभवन में भी कमोबेश रूप में कायम थी, जिनके बीच गवर्नेस कृष्णाजी को अपने दायित्व का निर्वाह करना था और अपने शिष्य नन्हे युवराज के मानस को उनसे बचाते हुए उनमें सहज मानवीय संवेदना और संस्कारों का विकास करना उन्हें अपना प्राथमिक कर्तव्य लग रहा था। उन्होंने प्रयत्न करके युवराज के साथ अपना निरापद समय अवश्य निश्चित करवा लिया, जिसमें महारानियों और राजपरिवार के किसी अन्य वयक्ति का कोई दखल न हो। खुद युवराज भी शिक्षक के रूप में उसके निर्देशों को संजीदगी से लेने लग थे, वे जो हिदायतें देतीं, वे उनका पालन करते। गवर्नेस और संरक्षक के रूप में वे उनके खान-पान, राजभवन परिसर की विभिन्न गतिविधियों में उनकी मौजूदगी, उनके आचरण और होनेवाले असर पर पूरा ध्यान रखती थीं। वे यह जान गई थीं कि सिरोही दरबार तेजसिंह के पिता भूपालसिंह मनादर के ठिकानेदार थे। अपने रुतबे के मुताबिक सभी मामलों में बीकानेरी बडी माँ छोटी माँ से हल्की पडती थीं, क्योंकि दरबार छोटी माँ की कोख से ही पैदा हुए थे। गुजरात की इस राजकुमारी से भूपालसिंह की शादी बीकानेरी रानी साहिबा की सहमति से इसी मकसद से करवाई गई थी कि उनसे होनेवाली संतान उन्हीं के निर्देशों का पालन करेगी, ताकि राजमाता के रूप में उनके अधिकार सुरक्षित रहें। तेजसिंह बालपन में ही बडी माँ द्वारा गोद ले लिये गये और सिरोही दरबार बनकर गद्दी पर आसीन हुए। रियासती गद्दी और वह भी आजादी के बाद। बचपन से ऐसी ही परवरिश में पलने के कारण वे बडी माँ पर कुछ ऐसे न्यौछावर रहते कि बडी माँ देखकर खुश रहतीं। वे अपनी आँखों से बेटे को बाँधे रखतीं। छोटी माँ दोनों को बाहरी वृत्त से ही देख पातीं। पहले की विलायती गवर्नेस भी उन्हें अपने बेटे से दूर-दूर ही रखतीं, लेकिन देसी गवर्नेस के रूप में कृष्णाजी के जिम्मेदारी सम्हाल लेने के बाद छोटी माँ के लिए अपने बेटे से मिलना और बात करना सहज हो गया था। महल में आरामदायक आवास व्यवस्था के बावजूद कृष्णाजी अपनी सुरक्षा के प्रति भी चौकस थी। सेविका मिश्रीबाई को इसी मकसद से उन्होंने अपने साथ ही रखा था। सिरोही के स्वरूपविलास में कुछ महीने गुजारने के बाद एक सुबह उन्हें बताया गया कि दरबार अब माउंट आबू के स्वरूपविलास में रहेंगे, इसलिए उन्हें भी उनके साथ माउंट आबू जाना है।
दरबार तेजसिंह, एडीसी जयसिंह, कर्नल साहिब और गवर्नेस कृष्णाजी माउंट आबू पहुँच गये। माउंट आबू पहुँचने के बाद भी तेजसिंह की शिक्षा जारी रही। उसी दौरान दरबार के मामा देवीसिंह और पुराने दीवान पांड्या जी भी माउंट आबू पहुँच गये थे। माउंट आबू के स्वरूपविलास में एक दिन गुजरात कैडर के नये एडमिनिस्ट्रेटर प्रेमा भाई पटेल उनसे बिना किसी पूर्व सूचना के मुलाकात के लिए आ गये, जबकि दरबार को अपनी माँ से मुलाकात के लिए निकलना था, वे इस मुलाकात के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन प्रेमा भाई तो बैठक में आ चुके थे। आने के बाद बेतकल्लुफी से दरबार का नाम पूछने लगे, दरबार पहले तो चुप रहे, फिर जब दुबारा पूछा और कृष्णाजी ने उन्हें उत्तर देने के लिए कहा, तो दरबार ने इतना ही कहा कि जब ये मेरा नाम ही नहीं जानते तो मुलाकात का क्या मतलब है। इस बात पर जब प्रेमा भाई अपने अफसर होने का रौब दिखाने लगे और कृष्णाजी को उनकी जिम्मेदारियों के बारे में कहने लगे, तो दरबार ने तुरंत मुलाकात को स्थगित करने की घोषणा कर दी और कृष्णाजी के साथ माँ साहब के कक्ष की ओर रवाना हो गये, जबकि एडीसी जयसिंह और कर्नल प्रेम पटेल के पास खडे रहे। प्रशासक प्रेम पटेल यह बहुत नागवार गुजरा और उन्होंने अगले ही रोज गवर्नेस के नाम मीमो के रूप में दो पत्र भेज दिये। कृष्णाजी ने उन्हें पढा और बाद में जवाब देने के लिए अलग रख दिया। अगले ही दिन दिल्ली से भारत सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी भास्कर राव दरबार से मुलाकात के लिए आनेवाले थे, जिसकी सूचना पहले ही मिल चुकी थी। अगले दिन जब रेजीडेन्सी ऑफिस में भास्कर राव से दरबार और कृष्णाजी की मुलाकात हुई तो वे दरबार की शालीन बातचीत और गवर्नेस के काम से बहुत प्रभावित हुए।
एक शाम दरबार का काफिला जब स्वरूपविलास से नक्कीलेक की ओर निकला तो रास्ते में सिरोही राज के प्रजाजन अपने महाराज के दर्शन और उनके सम्मान में खम्माघणी कहते हुए रास्ते में खडे मिल गए। इन सबको देखकर बाई (कृष्णाजी) सोचने लगी - पुरानी रस्म कब बदलेगी। विदेशी रेजीडेंट की रजामंदी से तेजसिंह गोद ले लिये गए। अंग्रेज चले जाने के बाद स्वदेशी राज की नीतियों के अनुसार गद्दी पर आसीन हैं। इस छोटे-से बच्चे के आस-पास सिर उठाती चिन्ताओं की भीड है। अलवर महाराजा जैसे हितचिन्तक कम हैं, दुश्मन ज्यादा। सिरोही राज के लिए नए एडमिनिस्ट्रेटर प्रेमा भाई से सहानुभूति की कोई उम्मीद नहीं। सिरोही अंबाजी तीर्थ के दबाव में राजस्थान से गुजरात में जोड दी जाएगी। तो भी क्या तेजसिंह दरबार बने रहेंगे दिल्ली सरकार इस रियासती ताम-झाम को किसी और को सौंप देगी। यही सब चिन्ता करते हुए जब उनकी गाडी आगे बढी तो सडक किनारे एक साधु को देखकर कर्नल साहब के इशारे पर ड्राइवर को कार रोकनी पडी। गाडी के रुकते ही साधु शिलाखंड महाराज जय जूजाननाथ की आवाजें लगाता हुआ उनके करीब आ गया। कर्नल के कहने पर दरबार ने उनका अभिवादन करते हुए हाथ जोड दिये, जबकि कृष्णाजी को यह निरा पाखंड लग रहा था। उन्होंने ड्राइवर को गाडी आगे बढाने के लिए कहा, लेकिन कर्नल के संकेत पर गाडी अभी रुकी रही। शिलाखंड दरबार तेजसिंह की बजाय उनके प्रतिस्पर्धी अभयसिंह का हिमायती था, इसलिए वह कह रहा था कि अब वह तभी मिलेगा जब अभयसिंह सिरोही राज की गद्दी संभाल लेंगे। तेजसिंह को भी साधु का यह व्यवहार कुछ अजीब-सा लगा और वे खिन्न हो गये। कृष्णाजी ने सख्त आवाज में ड्राइवर को गाडी आगे बढाने की हिदायत दी और वे सीधे नक्कीलेक की ओर बढ गए। वहाँ पहुँचकर कुछ देर सभी ने झील में बोटिंग की। तेजसिंह थक गये थे, इसलिए वे नाव में ही कृष्णाजी गोद में सिर देकर सो गये। दरबार का सिर सहलाते हुए कृष्णाजी पहले से ही एक गहन चिन्ता में डूबी हुई थी।
गवर्नेस के रूप में कृष्णाजी अब राजभवन के अंदर की सियासी बातों को काफी कुछ जान गई थी और उन्हें अपने शिष्य से गहरी हमदर्दी थी। वे यह जानती थी कि नाबालिग तेजसिंह की रीजैंसी काउंसिल की मुखिया राजमाता साहिबा हैं। अभयसिंह राजमाता के नजदीक हैं। वे जयपुर दरबार के भी निकट हैं। जाम साहिब नावानगर सिरोही के जामाता हैं और सरदार पटेल के करीब हैं। उनके तराजू में कौन तुलेगा, एक ओर अभयसिंह और दूसरी ओर तेजसिंह। वजन आमने-सामने का नहीं, ऊपर नीचे का था। निवर्तमान दीवान पांड्या का झुकाव भी अभयसिंह की तरफ ही लग रहा था, कर्नल और जयसिंह यों भी अबोले और असरहीन व्यक्ति थे और यही बात कृष्णाजी की चिन्ता का मुख्य कारण थी।
दरबार तेजसिंह को एक दिन खेतडी हाउस में स्वामीजी का आशीर्वाद लेने जाना था। गवर्नेस, एडीसी और कर्नल साहिब सहित वे नियत समय पर खेतडी हाउस पहुँच गए, जहाँ उनका गर्मजोशी से स्वागत हुआ। यहाँ भी कृष्णाजी को स्वामीजी की विलासी जीवन शैली और स्त्रियों के प्रति पूर्वाग्रही व्यवहार के कारण उनसे मिलकर निराशा ही हुई, लेकिन सिरोही राज की अपनी मर्यादाओं के कारण वे बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये इस औपचारिकता को निभा आई। वहाँ से लौटकर सभी स्वरूपविलास आ गये, लेकिन कृष्णाजी को कुछ वस्त्र खरीदने थे, इसलिए वे गाडी लेकर बाजार की ओर निकल आईं। बरूचा की दुकान से उन्होंने कुछ ओढनियाँ, सलवार और कमीज खरीदे और थोडा सुस्ताने और चाय के लिए राजपूताना होटल के रेस्तरां आ गईं। उन्होंने चाय का ऑर्डर दिया ही था कि दरबार के प्रतिस्पर्धी अभयसिंह के भाई रामसिंह शिष्टाचारवश उनके पास आ खडे हुए। वे उनसे पहले केसरविलास में मिल चुकी थीं। कृष्णाजी को थोडा आश्चर्य तो जरूर हुआ, लेकिन उन्होंने चाय का प्रस्ताव किया और कुछ देर उनसे औपचारिक बातचीत की और चाय खत्म होने के साथ ही उनसे विदा लेकर स्वरूपविलास लौट आईं। उसी शाम दरबार से मुलाकात के लिए अभयसिंहजी के वकील के एम मुंशी, सीतलवाड और दरबार तेजसिंह के वकील अमीन साहिब भी आ गये। के एम मुंशी ने दरबार से गुजराती में बात करनी चाही, लेकिन उन्होंने हिन्दी में बात करना ही पसंद किया। उन्होंने दरबार को अंबाजी दर्शन के लिए पधारने का आग्रह किया, लेकिन दरबार ने उसे यह कहकर टाल दिया कि जब माँ साहिब कहेंगी, तभी आएँगे। इस बीच के एम मुंशी ने कृष्णाजी से पूछा कि गवर्नेस के रूप में वे दरबार को कौन-सी भाषाएँ सिखाती हैं और साथ ही उनकी शिक्षा-दीक्षा और मूल निवास के बारे में जानकारी ली। कृष्णाजी ने भी जब यह बताया कि वे उनकी पुस्तक बैरनी वसुलात को हिन्दी अनुवाद पढ चुकी हैं, तो वे भी उनसे प्रभावित हुए। थोडी देर इसी तरह की औपचारिक बातचीत के बाद वे तीनों वापस लौट गये। वे शायद दरबार तेजसिंह की शिक्षा, मनोबल और सिरोही की गद्दी पर उनकी दावेदारी का पक्ष जानने समझने के लिए आए थे, लेकिन इस पर बात करने का कोई सीधा संदर्भ नहीं खोज पाए और न दरबार ने ही उसमें कोई रुचि ली। गवर्नेस कृष्णाजी ने यह जरूर अनुभव किया कि बातचीत के दौरान एडीसी जयसिंह और कर्नल साहिब मौन ही बने रहे। ऐसे में कृष्णाजी को दत्तक पुत्र तेजसिंह और रियासत का भाग्य उन्हें चऋव्यूह में ही फँसता नजर आया।
माउंट आबू प्रवास की समाप्ति के बाद दरबार का काफिला एक दिन सिरोही वापसी पर रवाना हो गया। वे एक रात ही सिरोही रुक पाए, इसी बीच उन्हें दिल्ली यात्रा का बुलावा आ चुका था और उसके लिए आबू रोड से ही ट्रेन पकडनी थी। गवर्नेस कृष्णाजी को भी उनके साथ दिल्ली जाने का आदेश हुआ, तो वे अपने सामान के साथ दिल्ली यात्रा के लिए तैयार हो गई। एडीसी जयसिंह और कर्नल तो साथ थे ही। दिल्ली पहुँचने पर अलवर हाउस की दो गाडियाँ दरबार की अगवानी में तैयार खडी थी। अलवर हाउस पहुँचकर सभी ने नाश्ता वगैरह किया और उसके तुरन्त बाद उन्हें मसूरी के लिए रवाना होना था। मसूरी में दरबार तेजसिंह के वकील बंबई से पहुँचने वाले थे, उन्हीं से मुलाकात के लिए वे मसूरी जा रहे थे। बीच रास्ते में कृष्णाजी दरबार को देहरादून, मसूरी और उत्तरांचल के बारे में बहुत-सी बातें बताती रहीं, क्योंकि वे इस क्षेत्र में बहुत बार आ चुकी थी। उन्होंने मसूरी के होटल में ही रात्रि-विश्राम किया, जहाँ उनके वकील साहब पहले ही पहुँच चुके थे। अगली शाम तक वे सभी दिल्ली वापस लौट आए। सुबह एडीसी जयसिंह ने बताया कि दरबार के साथ मंत्रालय जाना है इसलिए सभी तैयार होकर ड्राइंग रूम में पहुँचे, तो कृष्णाजी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ दीवान पंड्या भी बैठे थे। पंड्या ने भी उन्हें देखा तो हुक्म देने के अंदाज में कहा कि आप यहीं रहिए, आपको हमारे साथ नहीं जाना होगा। और ज्यों ही कृष्णाजी ने ठीक कहकर दरबार का हाथ छोडा, तो दरबार तेजसिंह को पांड्या की यह हरकत बहुत नागवार गुजरी और उन्होंने फौरन आज्ञा के स्वर में कहा - मैम हमारे साथ जाएँगी, आप भले न जाएँ पांड्याजी।
वे सभी मंत्रालय पहुँच गए लेकिन शाम तक इंतजार करने के बावजूद मंत्रीजी से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। ऐसे में सभी लोग वापस अलवर हाउस लौट आए। आखिरकार लंबे इंतजार के बाद अगले दिन शाम मंत्रीजी से मुलाकात का समय निश्चित हुआ और वे लोग फिर से पहुँच गए। मंत्रीजी के निवास पर नवीन जी और सिरोही के नये मुख्यमंत्री गोकुलभाई भट्ट से दरबार की भेंट हुई। उनके बीच थोडी देर सामान्य बातचीत हुई और नवीनजी ने बताया कि मंत्रीजी से बातचीत अगले दिन सवेरे 11 बजे हो सकेगी। वे लोग वापस अलवर हाउस आ गये। अलवर हाउस में शाम की चाय पीते हुए दीवान पांड्याजी जाने किस बात पर खफा थे कि वे एडीसी जयसिंह से गवर्नेस कृष्णाजी को लेकर कुछ अनर्गल-सी टिप्पणियाँ करने लगे, पहले तो कृष्णाजी ने उनकी बातचीत को अनसुना करने की कोशिश की लेकिन जब वे नहीं रुके तो उन्हें सख्ती से कहना पडा कि न वे सिरोही राज के दीवान हैं और न ही दरबार के हितचिन्तक। वे महज मामा देवीसिंह के कहने पर अपने मकसद से यहाँ चले आए हैं, इसलिए अपनी मर्यादा में रहें। कृष्णाजी की इस सपाट और तल्ख टिप्पणी के बाद पांड्या के पास और कुछ कहने का कोई आधार नहीं था। इसके कुछ क्षण बाद ही कृष्णाजी दरबार से अपने पिता से मिलने की इजाजत लेकर वहाँ से निकल आई और रात्रि विश्राम अपने घर पर ही किया।
अपने घर के पुराने कमरे में नींद खुली, तो कृष्णा को लगा ही नहीं कि बीते समय का कोई टुकडा कहीं था भी। माँ और पिताजी अभी अभी उठे नहीं थे। वह बिस्तर से उठी, बाथरूम जाकर हाथ-मुँह धोए, अपना पुराना जोडा निकाला और फ्लीटबूट पहनकर सैर को निकल गई। बाहर पर्याप्त उजाला हो चुका था। वे फिरोजशाह चौक से कर्जनरोड पर दूर तक उनकी चिर-परिचित सडक सूनी और साफ दिख रही थी। सडक पर चलते हुए उनकी स्मृति में सिरोही की सुबहें और नन्हे दरबार की सेवा-चाकरी में लगे लोगों की गतिविधियाँ कौंधती रही। वे जब तक घूमकर लौटीं, उनके माँ-पिताजी उठ गये थे और चाय पीते हुए अखबार देख रहे थे। कृष्णाजी भी उनके करीब बैठकर अखबार देखने लगी और जब पिताजी ने उनके अगले कार्यक्रम के बारे में पूछा तो यही बताया कि वह आज घर पर ही रहेगी। फिर यह भी बता दिया कि अब वह लौटकर सिरोही नहीं जाएगी। यहीं दिल्ली रहकर अपनी पसंद का काम करेगी। दिन में एकबार दरबार से मिलने अलवर हाउस जाएगी और फिर उनसे विदा लेकर लौट आएगी।
कृष्णा जब अलवर हाउस पहुँची, तो दरबार कुछ नयी पोशाक देखने उनके साथ कनॉट प्लेस तक निकल आए। एडीसी जयसिंह उनके साथ थे, जब नयी पोशाक के लिए वे ट्रायल रूम में जाने लगे, तो एडीसी की बजाय उन्होंने कृष्णाजी को अपने साथ आने का निवेदन किया और जब थोडा एकान्त मिला, तो उन्होंने अपनी मैम से पूछ लिया कि ये बेदखल क्या होता है। मैम के वजह पूछने पर उन्होंने बताया कि दिन में पांड्या और मामा देवीसिंह की बातचीत में इसी शब्द का जिक्र हो रहा था। कृष्णाजी को थोडा अफसोस तो जरूर हुआ, लेकिन आनेवाले समय में रियासतों के भविष्य और अपने शिष्य तेजसिंह की बढती समझदारी पर भरोसा रखते हुए उन्होंने यही कहा कि वे इन बातों की तनिक भी परवाह न करें और अपने आत्मविश्वास को बनाए रखें। वहाँ का कार्य संपन्न होने पर जब दरबार तेजसिंह के साथ सभी उनकी कार तक पहुँचे और बैठने लगे, तो दरबार ने मैम से भी अपने साथ चलने का आग्रह किया, लेकिन कृष्णाजी ने मुस्कुराते हुए उनसे अपने घर लौटने की इजाजत माँग ली और वहीं से बाय कहकर वापस अपने माँ-पिताजी के पास लौट आईं। अगले दिन हिन्दुस्तान टाइम्स में एक इंटरव्यू दिया और अपने को हर तरह के दबावों से मुक्त अनुभव करते हुए अपनी इस जीवन-कथा को वहीं विराम दे दिया।
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