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दक्षिण भारतीय भाषा साहित्य में गाँधी

बाबू राज के नायर
गाँधी-विचारधारा हिमालय-सी उज्ज्वल एवं गंगा-सी पवित्र विचारधारा है। इसे भारत की सामाजिक उन्नति और सांस्कृतिक चेतना का उद्घोषक कह सकते हैं। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रिका से वापसी भारतीय समाज के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति के लिए भी एक क्रान्तिकारी घटना थी। गाँधी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, उनका व्यक्तित्व विराट था। उनके व्यक्तित्व का बडा ही व्यापक प्रभाव भारतीय भाषाओं के साहित्य पर भी पडा। उनकी भावना और प्रेरणा ने सम्पूर्ण भारतीय-साहित्य की चिन्तनधारा को नई दिशा दी। जिन महापुरूष का प्रभाव अखिल भारतीय चिन्तन-पद्धति पर पडा हो तो उसके प्रभाव से दक्षिण भारतीय भाषा साहित्य की जागरूक मनीषा कैसे अछूती रह सकती है! गाँधी-विचारधारा के अधीन दक्षिण भारतीय भाषा साहित्य की विविध विधाएँ प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से अत्यधिक प्रभावित हुईं।
भारतीय इतिहास में गाँधीयुग एक ऐसा काल रहा है जिस पर कईं प्रकार के प्रभाव उत्पन्न हुए। साहित्य भावना का विषय होता है और महात्मा गाँधी ने अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से जनमानस को झकझोर दिया था। इसके फलस्वरूप अन्यान्य क्षेत्रों की अपेक्षा साहित्य का क्षेत्र उनसे सर्वाधिक प्रभावित हुआ। प्रत्येक भारतीय साहित्यकार ने उनसे प्रभावित होकर अपनी रचनाओं में उस युग के आन्दोलनों व स्पंदनों को अभिव्यक्त किया है। गाँधी-विचारधारा वह अपराजेय चिन्तनधारा है जिसका पूर्ण तादाम्य देश के हर प्रदेश की जनता के साथ रहा है, तो दक्षिण भारतीय भाषा साहित्यकार उससे वंचित नहीं रह सकते हैं।
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में राष्ट्रीयता की भावना के प्रस्फुटन का भी गहरा प्रभाव अन्य भारतीय भाषा साहित्य के साथ उस समय के दक्षिण भारतीय भाषा साहित्य पर भी पडा। सत्याग्रह आन्दोलन तथा गाँधी के जीवन-दर्शन ने सारे देश को प्रेरणा के सूत्र में पिरोया। वस्तुतः बीसवीं सदी में दक्षिण भारतीय भाषाओं में जिन साहित्यिक रचनाओं का सृजन हुआ है, उनका एक बडा हिस्सा गाँधीमय था।
एक बडे लेखक होने के बावजूद, अपनी राजनीतिक एवं सामाजिक सक्रियता के कारण गाँधी अपने साहित्यिक जीवन में कोई रचनात्मक सृष्टि नहीं कर पाए। इसके बावजूद वे भारत और दुनियाभर के अन्य देशों के लेखकों के लिए एक उत्प्रेरक हैं। आज भी पूरी दुनिया के प्रतिष्ठित नेताओं में गाँधी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्हें साहित्यकारों द्वारा इतना याद किया जाता रहा है, जिन पर इतनी बहस होती है और जिनकी इतनी आलोचना की जाती है। विदेशी मूल के लेखकों के मुकाबले भारतीय मूल के लेखकों की जडें उनके मूल सामाजिक जीवन में अंतर्निहित थी, इसलिए वे गाँधी के व्यक्ति्व एवं दर्शन, दोनों के अधिक निकट थे। उनके लिए गाँधी आम आदमी के, उनकी आकांक्षाओं और आशाओं के प्रतीक थे। चाहे गाँधी के दर्शन पर भारतीय साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएँ उनके व्यक्तित्व लक्षणों के आधार पर अलग-अलग रही हो, उनके दर्शन ने उन लोगों को उन पर लिखने के लिए प्रेरित किया।
गाँधीपरक दक्षिण भारतीय भाषा-साहित्य मलयालम, तमिल, कन्नड, तेलुगू को मुख्य तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। (1) पहली श्रेणी में आने वाली रचनाएँ गाँधीवादी मूल्यों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उजागर करने का काम करती हैं। (2) दूसरी श्रेणी में गाँधीवादी दर्शन से प्रभावित साहित्यकारों की साहित्यिक रचनाएँ होती हैं। (3) तीसरी श्रेणी में आने वाली रचनाओं में गाँधी स्वयं चरित्र के रूप में दिखाई देते हैं।
मलयालम साहित्य
महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान के अन्यभाषा साहित्यकारों के साथ मलयालम साहित्कारों के लिए भी प्रत्याशा और उत्प्रेरणा के स्रोत रहे थे। स्वाधीनता की चेतना गाँधी-विचारधारा के संग चलनेवाले साहित्यकारों की पहचान थी। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और साधारण गद्य तक में भी स्वाधीनता की लडाई के लिए आवाज दी गई थी। गाँधी की आत्मकथा और गाँधी साहित्य के अनुवाद भी मलयालम भाषा में हुए हैं। गाँधी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग मूल रूप में गुजराती में लिखी गई है, लेकिन अंग्रेजी के बाद इस पुस्तक की सबसे अधिक बिक्री मलयालम भाषा में अनुवादित प्रतियों की हुई हैं।
मलयालम काव्य में गाँधी की लहर
महात्मा गाँधी के आदर्श और उनके जीवन दर्शन से भारत की अन्य भाषा के कवियों की तरह मलयालम भाषा के कवि भी प्रभावित हुए। महात्मा के जीवन से प्रेरित होकर स्वतन्त्रता संग्राम काल के दौरान परंपरागत मलयालम कविताओं की सृष्टि हुई थी। आधुनिक काल में भी गाँधीवादी दर्शन पर आधारित कविताओं की रचना हुईं हैं।
धर्मसूर्यनः- महाकवि अक्कित्तम
महाकवि अक्कित्तम के नाम से विख्यात ज्ञानपीठ पुरस्कृत कवि अक्कित्तम अच्युतन नम्पूतिरि (1926-2020) के गाँधी के जीवन और आदर्श से प्रेरित खंड-काव्य है- धर्मसूर्यन। प्रस्तुत काव्य में धर्म का पालन करने के लिए समर्पित गाँधी के जीवन के साथ उनके मानसिक संघर्ष की भी प्रस्तुति हुई है। कोई भी उपहार उनके लिए मनुष्य के हृदय से उनके लिए निकली प्रार्थना से कतई बढकर नहीं है।
इंडिया मुझे बुला रही है,
कल जाने वाले जहाज में
मातृभूमि की गोद में चढने-
के लिए दौडकर पहुँच रहा हूँ मैं।
कल लूँगा अफ्रीकी
महाद्वीप से मैं विदा।
पूरे नेटाल में इंडियावालों
ने डुबोया हमें
स्नेह रूपी अमृत में; हमारे लिए
प्रार्थना करते हृदय से।
जहाँ-जहाँ पहुँचे वहाँ-वहाँ हुई
उपहारों की वर्षा ने,
रोका मेरे श्वासों की गति।

कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में अक्कित्तम ने दक्षिण अफ्रिका में रह रहे गाँधी के भारत माँ की पुकार सुनकर उन्हें स्वतन्त्र कराने के लिए देश वापसी की तैयारी और विदा लेते समय वहाँ की जनता के द्वारा स्नेह स्वरूप दिए गए उपहारों की बात कही है।
ये रहे मेज के ऊपर वे!
शिकारियों को प्राप्त
मृग शीर्षों की तरह!
विडंबना यह है कि
ये मेरे मन को
अनंत कालीन निराशा
के शिकार बना रहे हैं निर्दयता से।
कवि के अनुसार गाँधी के लिए उपहारों का कोई महत्त्व ही नहीं होता है। उनके लिए कोई भी उपहार शिकारी को प्राप्त अपने शिकार के समान है, जिनसे उन्हें अपनी मृत्यु का आभास होता है। लोग उन्हें उपहार के माध्यम से स्नेह प्रदान करना चाहते हैं, लेकिन सारे उपहार उनके मन में अनन्तकालीन निराशा भर देते हैं।
महाकवि अक्कित्तम ने न केवल कविता में बल्कि अपनी जन्दगी में भी गाँधी के जीवन की सादगी एवं आदर्श को अपनाए हैं। अहिंसा को उन्होंने परमधर्म माना है। अपनी कविता बीसवीं सदी का इतिहास में उन्होंने गाँधीवादी दर्शन से प्रेरित होकर ही निम्नलिखित पंक्तियाँ उकेरी हैं -
जब मैं एक बूँद आँसू गिराता हूँ
दूसरों की दया में लथपथ
एक हजार ब्रह्मांड मेरे दिल में खींचे जाते हैं।
जब मैं अपने होंठों से एक मुस्कान खर्च करता हूँ
दूसरों के लिए मेरे प्यार के साथ गीला
कोमल, अब तक की सबसे शुद्ध
चाँदनी मेरे दिल को भर देती है।
मैं आज तक नहीं जानता था
इस दिव्य उत्साहपूर्ण प्रबुद्ध प्रवाह को
इस ज्ञान के बारे में सोचने के लिए
बार-बार इनकार किया गया
मन में बिखरा हुआ मैं रोता हूँ।
अक्कित्तम ने हमेशा से ही गाँधी पथ पर चलते हुए अपनी जन्दगी बिताई हैं। वो खादी पहनते थे और उन्हें इसमें कभी भी किसी प्रकार की कोई शर्मिन्दगी महसूस नहीं हुई। वो भारत से लुप्त होते उस वर्ग से संबन्ध रखते हैं जो हमें महात्मा गाँधी एवं राष्ट्र के स्वतन्त्रता आन्दोलन के मार्ग को याद दिलाते हैं।
कौन हैं गाँधी? - उल्लूर एम. परमेश्वरन
महाकवि उल्लूर के नाम से विख्यात कवि उल्लूर एस.परमेश्वरा अय्यर (1877-1949) के नवासे(1944) में जन्मे कवि उल्लूर एम. परमेश्वरन, जिनका नाम अपने नानाजी के नाम पर ही रखा गया है। उन्होंने अपने नाना के पदचिन्हों पर चलते हुए कविताओं की रचना की हैं, लेकिन वे नाना तरह काव्य के क्षेत्र में प्रसिद्ध नहीं हो पाए हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपने बचपन की याद, नाना से मिली सीख और महात्मा की जिन्दगी की, अपनी अर्जित जानकारी के माध्यम से गाँधीपरक कविताओं की रचना की है। गाँधी के जीवन और आदर्श से प्रेरित उनकी एक कविता है- कौन हैं गाँधी? कवि को बचपन में सब लोग कुट्टन नाम से संबोधित करते थे। प्रस्तुत कविता में उनके अपने नाना से गाँधी के संबन्ध में पूछने पर उनके द्वारा दिए गए उत्तर के रूप में गाँधी की महिमा प्रस्तुत की गई है।
महात्मा गाँधी यानी कि कौन है अपने पितामह-
से संदेह के साथ कुट्टन।
पितामह कहते हैं कुट्टन से इस प्रकार
गाँधी नाम तो बहुतों के हैं लेकिन
महात्मा गाँधी नाम से पूरी दुनिया में प्रकीर्तित
संपूर्ण महिमावान एकमात्र व्यक्ति हैं,
करेंसी नोटों में, सिक्कों में
एक वृद्ध का चेहरा देखा है न तूने।
दरिद्रनारायणों के साथ बने रहने के लिए
मात्र छोटी-सी धोती कमर पर लपेटने वाला।
आत्मविशुद्धी के लिए कठिनाइयों को सहने वाला,
भौतिक सुखों को पूर्णतः त्यागने वाला।
बिना हथियार के युद्ध का नेतृत्व करने वाला
आदर्शशाली मोहनदास हैं वो।
इस कविता के माध्यम से कवि हमें यह बताना चाहते है कि महात्मा गाँधी की महिमा, बच्चों को बाल्यकाल से दी जाने वाली अच्छी सीख के रूप में बताई जानी चाहिए। इससे उनके मन में अच्छे व्यक्तित्व से संबंधित एक दृढ संकल्प उत्पन्न हो जाएँगे और वे आगे चलकर देश के अच्छे, सच्चे, आदर्शशाली नागरिक बन पाएँगे।
गाँधी के शिष्यगण -कुन्जुण्णी माष्
कुन्जुण्णी (1926-2006) नाम से काव्य रचने वाले विख्यात कवि अतिरायत्त कुन्जुण्णी नायर, जिन्हें सब लोग, प्यार एवं आदर स्वरूप कुन्जुण्णी माष् कहकर सम्बोधित करते थे, क्योंकि पेशे से वो एक अध्यापक थे। दार्शनिक भाव लिए हुए छोटी कविताओं की रचना में वे पारंगत थे। इन्हीं छोटी कविताओं के माध्यम से ही एक कवि के रूप में उन्होंने मलयालम काव्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई हैं। आत्म-समालोचना एवं उपहास से ओतप्रोत उनकी इन छोटी कविताओं ने बडों के साथ बच्चों को भी आकर्षित दिया हैं।
गाँधी के लिए गाँधी ही शिष्य है
गाँधी के शिष्यों के लिए
दुनिया के सब लोग उनके शिष्य हैं
खुद को छोडकर
बाकी सारे लोगों को गाँधी होना है।
कुन्जुण्णी माष् ने हमारे देश के उन नागरिकों पर व्यंग्य किए हैं जो खुद को गाँधी के शिष्य तो मानते हैं, लेकिन स्वयं गाँधी के नक्शेकदम पर न चलकर दूसरों से चलने की माँग करते हैं। कवि के अनुसार गाँधी ने दूसरों को जो भी सीख दी थी, उन पर वे स्वयं भी कायम रहते थे। गाँधी के लिए उनका अपना जीवन ही दूसरों के लिए उनकी सीख है, जबकि स्वयं को गाँधी शिष्य मानने वाले, गाँधी के जीवन को न अपनाकर दूसरों से अपनाने की माँग करते हैं।
मलयालम गद्य साहित्य में गाँधी
कहानी- अम्मा- वैक्कम मुहम्मद बशीर
बेप्पूर सुलतान नाम से विख्यात कहानीकार वैक्कम मुहम्मद बशीर (1908-1994) ने जब पहली बार गाँधी से मुलाकात की थी, तब उनकी उम्र मात्र 16 वर्ष थी। 1924 में जब गाँधी वैक्कम सत्याग्रह के सिलसिले में के वैक्कम के दौरे पर आए तो उनकी यह मुलाकात हुई थी। बशीर तब तक राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय हो चुका था। उनकी उम्र अत्यन्त प्रभावशाली थी, इसलिए गाँधी की उस यात्रा ने उन्हें रोमांचित कर दिया। गाँधी से मुलाकात करने के उनके उत्साह, उनकी कहानी अम्मा, जो कि कहानियों के रूप में लिखी गई उनकी आत्मकथा का एक अंश है, में देखने को मिलता है। वह अपनी माँ से अत्यन्त अभिमान के साथ कहता है- अम्मा, मैंने गाँधी को छुआ। बशीर ने अपनी यह आत्मकथनात्मक कहानी 1937 में लिखी थी, जिसे कि गाँधी की ओर आकर्षित एक देशभक्त की सृष्टि मानी गई है।
कहानी- गाँधी की मृत्यु - तकषी शिवशन्करा पिल्लैय
कुट्टनाडु के कहानीकार के नाम से विख्यात ज्ञानपीठ पुरस्कृत उपन्यास एवं कहानीकार तकषी शिवशन्करा पिल्लैय (1912-1999), जिनके उपन्यास चेम्मीन पर आधारित मलयालम सिनेमा के लिए राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था, जो कि किसी भी दक्षिण भारतीय सिनेमा के लिए प्राप्त इस प्रकार का पहला पदक है। अधिकांश, अपने गाँव कुट्टनाडुं की जनता के जीवन पर आधारित कथा रचना में सक्रिय रहे तकषी ने राष्ट्रीय घटनाओं पर भी अपनी नजर रखी थी। गाँधी ने उन्हें भी छुआ। गाँधी की मृत्यु नामक अपनी बहुस्तरीय कहानी में उन्होंने राष्ट्रीय जागरण के लिए गाँधी द्वारा निभाई गई भूमिका, भारत के दुखद विभाजन और उसके दुष्परिणाम पर कईं जटिल सवाल उठाए हैं।
उनकी एक अन्य कहानी कराची से में भी उन्होंने सांप्रदायिक विभाजन की बात कही हैं, जिसने गाँधी और राष्ट्र को एक ऐसी गहरी चोट दी, जो कभी ठीक नहीं हुई।
अन्य गाँधीपरक मलयालम रचनाएँ
कविताएँ
महाकवि वल्लत्तोल नारायण मेनोन की मेरे गुरूनाथन, पाला नारायणन नायर की महात्मा गाँधी, ज्ञानपीठ पुरस्कृत कवि ओ.एन.वी.कुरूप की अस्तमयम्, विष्णु नारायणन नम्पूतिरि की गाँधी के अतिथि, कवयित्री सुगताकुमारी की अक्टूबर दो, यूसफअली केच्चेरी की अक्टूबर फिर आ रहा है, एम.एन.पालूर की गाँधी जयन्ती आदि, गाँधी-विचारधारा पर आधारित कुछ अन्य कविताएँ हैं।

कहानियाँ
वैक्कम मुहम्मद बशीर की मेरा दायाँ हाथ, वत्सराजन, हथकडी, भारत माता, तकषी शिवशन्करा पिल्लै की जाली मुद्रा, पी.केशवदेव की निर्जनता से सवेरे की ओर, ललिताम्बिका अन्तरजनम की आँधी में फंसा एक पत्ता, पिता का पुत्र, सोने से पहले, कोविलन की गाँधी टोपी, इ.एम.कोवूर की अगस्त 15, खूनी, हमारे पिताजी, पाकिस्तान के बाद, कानम ई.जे. की खद्दर की कमीज, एन.बी.मुहम्मद की बन्दर, बयालीसवें घर में शैतान आदि, गाँधी -विचारधारा पर आधारित कुछ अन्य कहानियाँ हैं।
मलयालम साहित्य में ऐसे साहित्यकार भी हुए हैं जो अस्पष्ट रूप से ही गाँधीवादी प्रतीत होते थे तथा जिन्हें गाँधीवादी होने की दृढ प्रतिबद्धता भी नहीं होती थी। पी.केशवदेव के गाँधीवादी साहित्यकार न होते हुए भी हिन्दु-मुसलमान संघर्ष पर आधारित उनके सशक्त उपन्यास भ्रान्तालयम् (पागलखाना) का अन्त इस टिप्पणी के साथ होता है- गाँधी अकेले ही रास्ता दिखा सकते थे। उरूब नाम से विख्यात साहित्यकार पी.सी.कुट्टिकृष्ण मेनोन अपने उपन्यास सुन्दरिकलुम् सुन्दरनमारूम् में अस्पष्ट रूप से गाँधीवादी प्रतीत होते हैं।
तमिल साहित्य में गाँधी
दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह काल से ही गाँधी की जिंदगी में तमिलों की बहुत ही अहम भूमिका रही थी। वहाँ का उनका निजी क्लर्क लॉरेन्स तमिलनाडु का रहनेवाला एक परिवर्तित ईसाई था। लॉरेन्स के एक अछूत जाति के होने के कारण, इस विषय को लेकर कस्तूरबा के साथ गाँधी का संघर्ष बना रहता था। इसी संघर्ष के चलते ही दक्षिण अफ्रिका में रहते हुए, अस्पृश्यता के मुद्दे पर गाँधी का मार्ग प्रशस्त हुआ था। भारत लौट आने के बाद उनका घनिष्ठ संबन्ध तमिल राजनीतिज्ञ एवं साहित्यकार सी.राजगोपालाचारी के साथ रहा था, जोकि उनके करीबी दोस्तों में से एक रहे थे और जिन्हें गाँधी की अन्तरात्मा के रखवाला माना जाता था। स्वाधीनता की चेतना गाँधी-विचारधारा के संग चलनेवाले साहित्यकारों की पहचान थी। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और साधारण गद्य तक में भी स्वाधीनता की लडाई के लिए आवाज दी गई थी। गाँधी की आत्मकथा और गाँधी साहित्य के अनुवाद भी तमिल भाषा मे हुए हैं।
तमिल काव्य में गाँधी की गूँज
महात्मा गाँधी के आदर्श और उनके जीवन दर्शन से प्रभावित होकर तमिल भाषा में परंपरागत एवं आधुनिक कविताओं की रचना हुई हैं। स्वतन्त्रता संग्राम काल के दौरान, गाँधीपरक परंपरागत कविताओं में पारंपरिक आभियोजना, पद्य संरचना, काव्य प्रतिरूप आदि पर बहुत ध्यान दिया जाता था। आधुनिक कविताएँ आम तौर पर मुक्त छन्द के रूप में रची गई हैं।
महात्मा गाँधी पंचकम् - महाकवि भारतीयार
महाकवि भारतीयार या देशीयकवि के नाम से विख्यात सी.सुब्रह्यण्य भारती (1882-1921) स्वतन्त्रता संग्रामकालीन तमिल कवियों में अग्रतम माने जाते हैं। गाँधी के जीवन और आदर्श से प्रेरित उनकी कविता है-
महात्मा गाँधी पंचकम नाम के अनुरूप ही इसमें पाँच छन्द हैं, जिनमें से तीन छन्द यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं। इस कविता में भारतीयार ने गुलामी की जंजीर में जकडी हुई भारत की अवस्था पर व्यंग्य करते हुए देश को आजादी दिलाने के लिए महात्मा गाँधी का आह्वान किया है।
1 बापू हमारे चिरंजीवी रहें!
इस संसार के राष्ट्रों के बीच,
भारत देश
ने गहराई से जाना है;
कि गरीबी बची हुई है,
स्वाधीनता गँवा दी है,
तबाही की जीत हुई है।
आप आए हैं,
इस देश के अन्दर जान फूँकने,
आशिष आपको गाँधी,
महात्मा, आशिष आपको।
2 गुलामी दूर हो
देश की जनता की, स्वतन्त्र होकर चमके जन्दगी।
सपत्ति और नागरिक अधिकार प्रफुल्लित हो,
शिक्षा एवं प्रज्ञता
मिश्रित होकर ऊँची उडान भरे।
करने दुनिया का नेतृत्व
आपका पहला कदम प्राप्त हो हमें वहाँ!
हुई है प्राप्त आपको असीम प्रतिष्ठा।
जडी-बूटियों से भरे पहाड को
लानेवाले के रूप में,
फणधर के डंक का सम्मोहन करने दूर?
पहाड को छाता बनानेवाले मनुष्य के रूप में, पडते
भारत पर बिजली के गर्जन-प्रकाश को
सँभालने के लिए?
व्याधि को करने दूर जो कि
अनवत निपत्ति के कारणभूत हुए हो,
आपने नया एक मार्ग प्रकल्पित किए
इस संसार में, सत्य में वह सरल।
तलवार बिन, रक्त बिन युद्ध की ओर इशारा - नम्मक्कल कविन्ञर
नम्मक्कल कविन्ञर नाम से विख्यात कवि नम्मक्कल वेंकट्टरामा रामलिंगम पिल्लै (1888-1972) भी एक गाँधीवादी कवि थे। उन्होंने 500 से अधिक कविताओं की रचना की हैं। इनमें, अधिकांश कविताओं में प्रतिबिंबित विचार-गाँधी- अहिंसा, सत्य, सत्याग्रह, अस्पृश्यता-निवारण, लिंगों की समानता और ग्रामीण उद्योग आदि हैं। प्रस्तुत कविता- तलवार बिन, रक्त बिन युद्ध की ओर इशारा में कवि ने गाँधी के सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए भारत को आजादी दिलाने की प्रक्रिया की ओर इशारा किया है। अहिंसा के रूप में युद्ध के एक नए तरीके को अपनाने के लिए कवि गाँधी की प्रशंसा करते हैं।
किसी तलवार के बिन लडी लडाई
या रक्त के, की ओर इशारा! हम विनती करते हैं,
हम से जुडें, जो लोग उपवास रखते हैं,
सच्चाई हमेशा के लिए चलेगाी।
काटने वाले और कायर की हैं नहीं जरूरत
और बम तपते हैं और जिन्दा रहते हैं,
ओह, इतना नया अभियान
दुनिया ने कभी नहीं देखा!
कोई घोडा नहीं हाथी नहीं
वध करने की कोई इच्छा नहीं;
दुश्मन, कोई नहीं,
किसी को हटाने की इच्छा नहीं।
कोई क्रोध नहीं, कोई लालसा नहीं,
कहीं कोई अभिशाप नहीं,
कोई कार्रवाई की इच्छा नहीं।
जिस दिन गाँधी के नेतृत्व में दाँडी में नमक सत्याग्रह का आयोजन किया गया था, उसी दिन राजाजी नाम से विख्यात गाँधीवादी सी.राजगोपालाचारी के नेतृत्व में तमिलनाडु के वेदारन्यम में भी नमक सत्याग्रह का आयोजन किया गया। नम्मक्कल कविन्ञर ने इसी घटना की याद में इस कविता की रचना की थी। कवि के अनुसार युद्ध करने वालों के हाथों में हथियार होते हैं, गाँधी ने बिना किसी हथियार की लडाई लडी थी। युद्ध करते हुए भी उनके हृदय में, मूल प्रवृत्ति में हत्या के लिए कोई स्थान नहीं था।
महान गाँधी महान - ज्ञानकूतन
ज्ञानकूतन (ज्ञान का परमानन्द प्राप्त नर्तक) उपनाम से विख्यात कवि आर. रामानाथन (1938-2016) गाँधीवादी थे। उन्होंने गाँधी कविताएँ नाम से 30 कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित किया हैं। प्रस्तुत कविता-महान गाँधी महान इसी संग्रह से ली गई है।
उठते हुए, उसने अपना गला साफ किया; धीरे से,
भाषण देना उसने अपना शुरू किया
गंजे सिर पर अपने हाथ फेरते हुए,
अमर रहें हमारे बापू उसने कहा।
खींचते हुए झटके से, सन के कपडे का मेजपोश,
उसने आगे कहा, दुनिया के देशों के बीच;
अपनी धोती को बाँधते हुए,
उसने जारी रखा, आजादी छीनी हुई है;
महिलाओं पर नजर डालकर,
उसने ऐलान किया, तबाही कायम है;
जब मैंने बाहर निकलना शुरू किया,
उसने कहा, हमारा देश, भारत।
इस कविता के माध्यम से ज्ञानाकूतन ने गाँधी की महानता को दर्शाते हुए उन राजनीतिज्ञों पर व्यंग्य किया है, जो मंच पर खडे होकर लंबी हाँकते हुए भाषणबाजी में लीन रहते हैं, लेकिन देश के लिए कुछ नहीं करते हैं।
तमिल गद्य साहित्य में गाँधीपरक रचनाएँ
कहानी- दिक्कातरा पार्वती-सी.राजगोपालाचारी
गाँधी की अंतरात्मा के रखवाले कहलाए जाने वाले राजाजी के नाम से विख्यात सी.राजगोपालाचारी (1878-1972) के नेतृत्व में ही गाँधी-विचारधारा को तमिल भाषा साहित्य में काल्पनिक और पत्रिकाओं के माध्यम से प्रस्तुत किए गए थे। स्वतन्त्र भारत के पहले गवर्नर जनरल रहे राजाजी स्वतन्त्रता संग्रामकालीन तमिल के आदरणीय कहानीकारों में अग्रणीय माने जाते हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि उनकी अधिकतर कहानियाँ की तरह दिक्कातरा पार्वती के विषय भी शराब की बुराइयों के खिलाफ ही रहा है, क्योंकि यह विषय गाँधी के दिल की करीबी अवधारणाओं में से एक है।
उपन्यास-अलय् ओस-कल्की आर. कृष्णमूर्त्ति
अपनी तमिल साप्ताहिक पत्रिका कल्की के नाम से विख्यात गाँधीभक्त स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी कल्की आर. कृष्णमूर्ति (1899-1954) के उपन्यास अलय् ओस में गाँधी को एक असामान्य तरीके से चित्रित किया गया है। गाँधी के साथ के उपन्यास के मुख्य पात्र सीता की आध्यात्मिक बातचीत उपन्यास का प्रमुख रूपांकन होते हुए भी प्राथमिक तौर पर सीता के दृष्टिकोण से ही गाँधी दिखाए गए हैं। इस दृश्य में कल्की के अनुसार- सामने के कमरे में फैली हल्की नीली रोशनी में गाँधी के जख्म का निशान चमक रहा था। अपनी शान्त मुस्कान और आँखों की दयालुता के भाव के साथ के महात्मा का पवित्र स्वरूप देखकर सीता को ऐसा अनुभव हुआ जैसे गाँधी उसे आशीर्वाद देने के लिए वहाँ उपस्थित हुए थे। उसे लगा कि वह अच्छा शकुन था।
कुछ अन्य गाँधीपरक तमिल रचनाएँ
कविताएँ
शबरीनाथन की गाँधी से अनुग्रह न प्राप्त बच्चे, देवदेवन की रूपान्तर, कुमारी एस.नीलकण्ठन की एक राजकुमार की कहानी, सी.एस.चेल्लप्पा की यदि आप आज यहाँ होते, रमेश प्रधान की गाँधी को मारना निसन्देह एक गलती थी, मनुष्यपुत्रन की मैं आज रात्री भोजन के लिए गाँधी के साथ जा रहा हूँ, सिरपी की अनुनायियों के नेता इसई की गाँधीवाद आदि, गाँधी-विचारधारा पर आधारित कुछ अन्य कविताएँ हैं।
कहानियाँ
कुछ अन्य गाँधीपरक कहानियों में पुतुमय् पुत्तन की नया नन्दन, बी.एस.रामय्या की चावल का धान्य, आर.चूडामणी की भीतर और बाहर, अशोकामित्रन की गाँधी, जयमोहन की पानी और आग, एस.रामाकृष्णन की मैं गाँधी से बात करूँगा, सी.सरावण कार्तिकेयन की चौथी गोली, नकुल वासन की आदमी को निहारना, सुनील कृष्णन की स्वरोत्कर्ष आदि शुमार हैं।
गाँधी से संबन्धित लिखने वाले सारे तमिल साहित्यकारों ने उनके सिद्धान्तों की प्रशंसा नहीं की थी। स्वतन्त्रता के बाद पैदा हुए साहित्यकारों ने आलोच-नात्मक दृष्टिकोण से गाँधी की राजनीति पर टिप्पणियाँ की हैं। मालन की जन गण मन नामक उपन्यास में गाँधी को एक चरित्र के रूप में दिखाया गया है, जिसमें अपने पिता के द्वारा पुत्र सुगन को सुनाई गई कहानी के रूप में उपन्यास की प्रस्तुति हुई है। उपन्यास में गाँधी की हत्या के कारणों की ओर उंगली उठाई गई है।
कन्नड साहित्य में गाँधी
बीसवीं सदी का आरंभकाल साहित्यिक आन्दोलन के साथ-साथ विचारवाद का युग भी माना जाता है। भारतीय राजनीति में गाँधी के सक्रिय होते ही अपने देश की प्रगति में बन्धक बने पुराने सडे-गले विचारों के उन्मूलन के लिए साहित्यकारों ने भी रचनाओं के माध्यम से अपने योगदान दिए, जिनमें कन्नड साहित्यकार भी शामिल थे। स्वाधीनता की चेतना गाँधी-विचारधारा के संग चलनेवाले साहित्यकारों की पहचान थी। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और साधारण गद्य तक में भी स्वाधीनता की लडाई के लिए आवाज दी गई थी। गाँधी की आत्मकथा और गाँधी साहित्य के अनुवाद भी कन्नड भाषा मे हुए हैं।
कन्नड काव्य में गाँधी
गाँधीवादी दर्शन और स्वतन्त्रता आंदोलन का प्रभाव कन्नड कवियों पर अति तीव्र रहा था। ऊँची कोटी के अनेक कवियों ने इस दिशा में अपने योगदान दिए थे। इन कवियों ने भारतवासियों के मन में स्वतन्त्रता की भावना जगाने के मकसद के साथ कवितओं की रचना की थी। इनकी कनिताएँ सत्याग्रह, अस्पृश्यता निवारण, जाति-व्यवस्था, सामाजिक असमानता एवं पक्षपात के विरोध आदि विषयों पर रची गई थी।
पांचजन्य- कवि कुप्पीली वेंकटप्पा गौडा पुट्टप्पा उर्फ ‘कुवेम्पु’
कन्नड भाषा के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं में सर्वप्रथम स्थान रखने वाले महान कवि कुप्पीली वेंकटप्पा गौडा पुट्टप्पा (1904-1994), अपने उपनाम कुवेम्पु से लोकप्रिय है। कुवेम्पु ने गाँधी से प्रेरित होकर अपनी कविताओं के माध्यम से युवकों को स्वतन्त्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करने के साथ सामाजिक बुराईयों की ओर उनका ध्यान भी आकर्षित किया। 1933 में प्रकाशित उनकी कविता पांचजन्य में उन्होंने युवकों को आंदोलन में भाग लेने का अह्वान किया है। उक्त कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है-
बढे चलो, बढे चलो
चलो, आगे बढे चलो
झुको नहीं, हिलो नहीं
घुसो आगे बढो।
चौंको नहीं, विश्वास रखो
अपनी समर्थ छाती में,
बन्धन दूर करो उसका धूल बनाकर
मुझे मिटना पडे, तुम्हें मिटना पडे
बनेगी हमारी हड्डियों पर
नव भारत की लीला।
भारत की गुलामी का कारण, हमारी आपसी बैर-भावना है। बाहर से आकर अंग्रेजों ने हमारे लोगों के हाथों हमारी हत्या कराई और हम पर राज्य किए। बाहर से आकर यहाँ की सुख-सम्पदा लूटे, लेकिन हम लोगों ने आपस में अविश्वास और द्वेष के बीज बोए। ऐसी करनी पर उन्होंने कहा-
भारत खण्ड के हित में
अपना हित मानकर
भारत माता के मत को
अपना मत मानकर
भारत माता की संतान को
अपनी संतान मानकर
भारत माता की मुक्ति को
अपनी मुक्ति मानो।
अपनी भारत तपस्विनी नामक कविता में कुवेम्पु ने कहा कि भारत एक ऐसी रणभूमि है जहाँ स्वर्ग और नरक, दोनों की मुठभेड होती है। संस्कृति का सर्प अपना फन उठाकर मृत्यु का चुम्बन देना चाहता है। वो कहते हैं कि तपस्विनी भारत माता पुनः जागृत होकर जगत का मार्ग दर्शन करेगी।
कुवेम्पु अपनी पीढी के ही नहीं वर्तमान पीढी के साहित्यकारों के भी मार्ग दर्शक गुरू माने जाते हैं। उन्होंने गाँधी से प्रेरित होकर राष्ट्रीयता का संदेश देने के साथ, अपने लोगों को अंध रूढिवादी भावनाओं से निजात पाने के लिए साहित्य के माध्यम से प्रेरणा दी। उनके अनुसार एक सच्चे साहित्यकार का दायित्व यह होता है कि वह समाज के हित का चिन्तन करे। जाति-धर्म की आड में मानवीयता को नष्ट होने दे रहे अपने लोगों से उन्होंने मनुज मत को विश्वपथ कविता के माध्यम से ये आह्वान किए हैं। वो कहते हैंर्-
मन्दिर गिर्जाघर को निपटकर आओ,
गरीबी की जड सहित उखाडत्ते चले आओ,
मौज की राक्षसी को दूर करने आओ,
विज्ञान का दीपक हाथ में लेते आओ,
भाई जल्दी आओ।
उलझो नहीं मत-धर्म के मोह-अज्ञान में,
बुद्धि से काम करो लोकहित में,
वह मत, वह मत इस प्रकार के पुरानेपन
का सहसास बस है, मिल जाओ मनुज मत में।
बिडुगंडे दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे
कवि दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे (1896-1981) कन्नड साहित्य में गाँधी मूल्यों के संस्थापक माने जाते हैं। अपनी कविता को प्रवाहमयी बनाने के लिए कईं बार उन्होंने लोक साहित्य के छन्द और भाषा को भी अपनाया है। उन्होंने कन्नड काव्य को सम्माननीय ऊँचाई दिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया हैं। अपनी कविताओं के विषय स्वरूप उन्होंने गाँधीपरक मूल्यों से ओतप्रोत सामाजिक स्थिति को अपनाया था। उनकी एक कविता बिडुगंडे (छुटकारा-विमोचन) की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
पंछी स्वच्छन्द हो उडता आकाश में,
मछली स्वेच्छा से जीती हैं समुद्र में,
झरना पहाड पर मंजुल निनाद से झरता है,
हम लोग ही बन्धन में हैं-यह क्यों?
आक्रोश से आत्मा तडपती है,
हृदय जुगुप्यास से भर उठा है,
समझो भगवान हमारी यह वेदना,
और हमारा साथ दो।
हम्बलु - साली रामचन्द्र राव
साली रामचन्द्र राव (1925-2006) अपनी कविताओं में स्वाधीनता की तुलना सूर्य से करते हैं। उनके अनुसार जैसे ही स्वाधीनता के सूर्य का उदय होता है, गुलामी का अन्धकार भी दूर हो जाता है। उनकी कविता हम्बलु (चाह) में उन्होंने माँ भारती के गुणगान करते हुए कहा है-
नहीं चाहिए मुझे गो माता का दूध
नहीं चाहिए मुझे अमृत स्वर्ग का
भगवती जानता हूँ कितना मीठा नाम तुम्हारा
पावन माता, भगवान की कृपा है ऐसी
मैं कर सकता हूँ सेवा तुम्हारे चरणों में;
नहीं चाहिए मुझे कुछ और।
जन्म लूँ यदि ब्राह्मण होकर
जन्म लूँ यदि अंतःवासी,
नहीं मिलेगी तृप्ति मुझे, जानता नहीं मैं, माँ
यह कृपा अपार है,
जन्म लिया है बनकर संतान तुम्हारी।
भाग्य हो ऐसा कि
जन्म ले सकूँ मैं होकर पुत्र तुम्हारा,
जन्म जन्म।
कन्नड गद्य साहित्य में गाँधी
नाटक - बलिदान- कुवेम्पु
कवि होने के साथ कुवेम्पु (1904-1994), ने नाटक, उपन्यास, कहानी, प्रबन्ध, जीवन चरित्र आदि गद्य की विभिन्न विधाओं में अपने महान साहित्यकार होने की अमिट छाप छोडी हैं। उन्होंने 1928 प्रतीकवादी नाटक बलिदान की रचना की थी, लेकिन स्वतन्त्रता के बाद 1948 उसमें दो अध्याय और जोड लिए। इसमें स्वतन्त्रतापूर्व भारत की स्थिति, स्वतन्त्रता संग्राम तथा स्वतन्त्रता के बाद की समस्याओं के चित्रण हैं।
कालिका देवालय में भरतसुत सोया है। कालिका की मूर्ति से दासता की श्रृंखलाओं में जकडी हुई भारत माता को देखकर वह प्रश्न करता है कि वह कौन है? भारत माता अपने प्राचीन वैभव की कहानी सुनाती है और स्वतन्त्रतापूर्व की दुर्गति का चित्र उसके सामने रखती है। गुलामी के जंजीरों से स्वयं के मुक्त होने की इच्छा वह व्यक्त करती है। इसके लिए भरतसुत से बलिदान की भी माँग करती हैं। इसमें कालिका दासताग्रस्त भारत का प्रतीक है। भरतसुत भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का सेनानी है।
गाँधी का सत्याग्रह भारत भर में व्याप्त होता है। हर कहीं वन्देमातरम् का गीत गूँज उठता है। भारतमाता के मुख पर सूर्य की किरणें पडती हैं। भारत माता स्वतन्त्र हो जाती है। स्वतन्त्रता के सूर्योदय काल में ही हिन्दु-मुसलमान के विद्वेष की आग भडक उठती है। खून की नदियाँ बहने लगती हैं। गाँधी के प्रयत्न से सब शांत हो जाते हैं। गाँधी नाम ही हमारे स्वतन्त्रता संग्राम के नान्दी बने।
उपन्यास -चोमाना डूडी- शिवराम कारन्त
कन्नड साहित्य के प्रकांड व्यक्तित्व के स्वामी ज्ञानपीठ पुरस्कृत उपन्यासकार शिवराम कारन्त (1902 -1997) अपनी कॉलेज की पढाई के दौरान ही गाँधी की ओर खिंचे चले गए थे। असहयोग आन्दोलन से प्रेरित होकर उन्होंने अपनी स्नात्तक की पढाई बीच में छोडकर कताई के प्रचार में शरीक हो गए। गाँधी से प्रेरित कारन्त की आरंभकालीन उपन्यासों में से एक चोमाना डूडी नामक उपन्यास में एक निरीह अछूत चोमा की दयनीय जन्दगी का चित्रण बखूबी निभाया गया है। अपने बच्चों के साथ जमींनदार के खेत में मजदूरी करते हुए अपनी आधी उम्र बिता चुके चोमा का एक सपना था कि उसकी अपनी जमीन हो, जिस पर वह फसल उगा सके। कारन्त ने चोमा की दुर्दशा को तेज व्यंग्योक्ति के साथ प्रस्तुत की है। कारन्त कहते हैं- वह झोंपडी उसकी तब ही होती थी, जब बारिश और ऑधी अपने होने का दावा नहीं करते थे! खेती के लिए जाने वाले ऋण मलेरिया के समान होता है, एक बार उसके चपेट में आ जाए तो फिर मृत्यु तक उसके चंगुल से नहीं बच सकते हैं!
उपन्यास- मेरवाणिगे- गोरूर रामस्वामी अय्यंगार
गोरूर रामस्वामी अय्यंगार (1904 -1991) कन्नड के एक प्रमुख गाँधीवादी साहित्यकार थे। उन्होंने अपनी छोटी उम्र में ही शिक्षा का त्याग कर राष्ट्रीयता के आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया था। उन्होंने नवजीवन और यंग इण्डिया जैसे पत्रिकाओं के संपादान भी किए थे। उन्हें ग्रामीण जीवन का बहुत ही गहरा अनुभव था। इन सब कारणों से उनका साहित्य, राष्ट्रीयता एवं नवजागरण की भावनाओं में डूबा हुआ था। मेरवाणिगे अर्थात् जुलूस, उनका राष्ट्रवादी उपन्यास है। इसमें एक ऐसे युवक का चरित्र चित्रण किया गया है जो नाम का सुदर्शन होते हुए भी व्यक्ति्व में बदमाश है। उसके इस विचित्र व्यक्तित्व के कारण समाज में उसका कोई स्थान नहीं है। एक दिन वह भूले-भटके गाँधी के आश्रम पहुँच जाता है। आश्रम पहुँचने से पहले जीवन के प्रति उसका अपना एक अलग ही दृष्टिकोण था। उसे गरीबी पसन्द नहीं थी, वह सरकारी नौकरी पाना चाहता था, जिससे कि वह धन कमा सके और उसे अधिकार की प्राप्ति भी हो। लेकिन आश्रम पहुँचने के बाद से उसके जीवन में अत्यधिक परिवर्तन आ जाते हैं। वहाँ रहते हुए उसने जाना कि भारत के किसान उससे अधिक गरीब हैं, इसलिए गरीब बने रहना कोई अपमानजनक बात नहीं है।
अन्य गाँधीपरक कन्नड रचनाएँ
कविताएँ
कुछ अन्य गाँधीपरक कविताओं में देवदेवन की रूपान्तर, मास्ति वेंकटेया अय्यंगार की भारत वर्षद अण्णर कुरितु, गोविंद वै की होलेयनु यारू (अछूत कौन), भारत छोडो, वी.सीतारामय्या की भारत जगदंबे, नाडतायते (देशमाता),नेल्कलु-वेलकु (अंधकार-प्रकाश), दुंदुभि आदि शुमार हैं।
नाटक
शिवराम कारन्त के रक्त काणिके (रक्त की भेंट), देवी-देही, हिरिय देवरू, डाँ.कृष्णंय्यंगार के रैतर बदुकु, कुवेम्पु के जलगार, शुद्व तपस्वी, बालचन्द्र घाणेकर के गाँधी टोपी, रैतर भाग्योदय (किसानों के भाग्योदय), अस्पृश्य देव, भारतोदय, देवेन्द्र गोसाई के उद्धार, एम.आर.श्रीनिवास मूर्ति के नागरिक आदि कुछ अन्य गाँधीपरक नाटक हैं।
अपनी उत्कृष्ट कृतियों के माध्यम से प्रख्यात लेखकों के योगदान से गाँधी को युवा पीढी तक ले जाने के निरन्तर प्रयास के बावजूद लगता है कि कन्नड साहित्य में एक तरह का द्वंद्ववाद विद्यमान है। बैंगलोर विश्वविद्यालय के गाँधी भवन, युवाओं को गाँधीवादी साहित्य पर लिखने के अवसर प्रदान करने के लिए बापू वाणी नामक एक मासिक पत्रिका छापते थे। पत्रिका में छपी अपनी कृतियों के द्वारा चन्द्रशेखर पाटिल, के.एस.निसार अहम्मद जैसे युवा कवि गाँधी जयन्ती, सर्वोदय दिवस आदि मनाए जाने पर जमकर बरसे। इससे पता चलता है कि गत वर्षों के आदर्शवाद और उत्कट देशभक्ति ने मानवद्वेषवाद और अविश्वास को अपना रास्ता दे दिया था।
तेलुगू साहित्य में गाँधी
भारत की अन्य किसी भी भाषा साहित्यकारों की तरह तेलुगू साहित्यकारों के मन में गाँधी के लिए गहरी आराधना की भावना स्थाई रूप में विद्यमान रहती है। इस कारण से उनकी साहित्यिक सृष्टि में देशभक्ति की भावना उत्पन्न हुई और महात्मा के जीवनचर्या से प्रेरित होकर अनेकों तेलुगू साहित्यकारों ने राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और साधारण गद्य तक में भी स्वाधीनता की लडाई के लिए आवाज दी। गाँधी के जन्म शताबदी वर्ष 1969 को उनसे संबन्धित 100 से अधिक किताबें तेलुगू में छपी थी। इस एक घटना से पता चलता है कि तेलुगू साहित्यकारों की दृष्टि ज्यादातर सामाजिक परिस्थितियों के प्रभाव में लगी रहती है। गाँधी की आत्मकथा और गाँधी साहित्य के अनुवाद भी तेलुगू भाषा में प्रकाशित हुए हैं।
तेलुगू काव्य में गाँधी
गाँधीवादी दर्शन और स्वतन्त्रता आंदोलन का प्रभाव तेलुगू कवियों पर भी अति तीव्र रहा था। अनेक तेलुगू कवियों ने जनसाधारण के साथ अन्य कवियों के मन में भी स्वतन्त्रता की भावना जगाने के मकसद के साथ कवितओं की रचना की। इन कवियों ने सत्याग्रह, अस्पृश्यता निवारण, स्वदेशी, जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता एवं पक्षपात के विरोध आदि विषयों पर कविताओं की रचना की।
माक्कोत्ति तेल्ला दोरत्तनम- गरिमेला सत्यनारायण
महात्मा गाँधी के मार्ग पर चलते हुए सत्याग्रह का रास्ता अपनाए स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी एवं कवि गरिमेला सत्यनारायण (1893-1952) की कविताएँ अन्य सत्याग्रहियों के लिए स्वतन्त्रता की स्तुति हुआ करती थी। सामूहिक और राजनीतिक स्तर पर भारत की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने वालों के बारे में हम जानकारी रखते हैं। यह कितनी विडंबना है कि अपने कलम के माध्यम से जनता के हृदय में स्वतन्त्रता की ज्योति जलाने वाले कविगण और अन्य साहित्यकारों के बारे में हम उतनी जानकारी नहीं रखते हैं। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने संगी नागरिकों को गुलामी की जंजीरों को तोडकर शारीरिक एवं मानसिक आजादी का जश्न मनाने की प्रेरणा देते हैं। गरिमेला सत्यनारायण की माक्कोत्ति तेल्ला दोरात्तनम अर्थात् हमें गौरों का शासन नहीं चाहिए नामक कविता 162 पंक्तियाँ लम्बी है। शायद यह स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान गाई गई कविताओं में से सबसे लम्बी कविता है। उक्त कविता का प्रारंभ ही कुछ इस प्रकार है-
गौरों का शासन,
एकमुश्त हम अस्वीकार करते हैं;
व हमारे जीवन का शिकार करते हैं
और हमारे सम्मान को लूटते हैं।
यह कविता कुल 40 छंदों में बँटी हुई है। जब भी सत्यनारायण जी ने किसी भी सामाजिक या राजनीतिक समस्याओं का सामना किए तब वे कविता में अनायास ही एक नया दोहा जोड देते थे। गरीबी और लाचारी का चित्रण करते हुए उन्होंने लिखा-
एक दर्जन भरपूर फसल हम काटते हैं;
भोजन का एक निवाला तक हमें नसीब नहीं
होता है।
नमक को छूना एक अपराध माना गया है।
और जब हम नमक को छूते हैं
हमारे मुँह में वे मिट्टी भर देते हैं-
आह! हम भोजन के लिए कुत्तों से लडते हैं।
1921 तक, महात्मा गाँधी स्वाधीनता संग्राम के निर्विवाद नेता बन चुके थे। उनसे प्रेरित होकर सभी उम्र और वर्गों के लोग सत्याग्रही बन गए। अंग्रेजी शासकों ने उन्हें देशद्रोहियों के रूप में चित्रित किया और बेरहमी से उनका उत्पीडन किया। अंग्रेजों के इस उत्पीडना को सत्यनारायण ने अपनी कविता में इस प्रकार चित्रित किया-
जैसे ही आप स्कूल में प्रवेश करते हैं,
गाँधी टोपी को खेल भावनायुक्त लेकर
आफ प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा देते हैं।
स्कूल में चरखा वर्जित है
वे आपकी टोपी उतार देते हैं
और आपको निर्दयता से पीटते हैं।
चरखा, वे जोर देकर कहते हैं,
छल का प्रतीक है।
लेकिन सत्याग्रही अंग्रेजों के व्यवहार से अप्रभावित रहे। उन लोगों ने गोलियों से छिदे जाने के लिए अपनी खुली छाती को तान दिए।
आफ चरणों का ध्यान लगाकर कहते हैं
हम जाने नहीं देंगे और आपकी मेहरबानी
हम कभी नहीं भूलेंगे।
हम एकता के साथ समृद्ध होंगे।
जब वे हम पर आक्रमण करते हैं
गोलियों के साथ, हम हिलेंगे नहीं।
जब हम गायेंगे और चरखा कातेंगे!
हम ज्यादा मजबूत होंगे!
कविता लिखने और जनता के बीच घूमते हुए उसका आलाप करने पर गरिमेला सत्यनारायण को अंग्रेजों ने पहले एक वर्ष की साधारण कारावास की सजा दी। देशभक्ति और गाँधी के आदर्श की गरिमा अपने हृदय में समाए हुए कवि ने जेल से रिहा होने के बाद भी अंग्रेजों की गुलामी के विरूद्ध अपना संग्राम जारी रखा। उन्होंने देहातों में घूमते हुए अपनी कविता के आलापन के द्वारा लोगों के मन में स्वतन्त्रता की भावना जगाई। इसके लिए उन्हें 2ड्ट वर्ष की कठोर सजा सुनाई। सजा पाकर जेल जाते हुए उन्होंने अपने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि देश के प्रति उन्होंने अपने कर्तव्य की छोटी सी भूमिका निभाई है और अब वे लम्बे आराम के लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि अंग्रेजी प्रशासन उन्हें सार्वजनिक शान्ति के लिए खतरनाक समझकर जेल में डाल रहे हैं तो उन लोगों ने बहुत देर कर दी। देश की जनता को उनकी तरफ से जो कुछ देना था वो उन्हें दे चुके हैं। उनकी शारीरिक काया को ही अंग्रेज बन्दी बनाकर रख सकते हैं, लेकिन अपनी आत्मा को तो उन्होंने साहित्य के माध्यम से देश की जनता के बीच में छोड रखा है। बाहर रहकर उनकी आत्मा लोगों से अंग्रेजों के विरोध में कहती रही-
हमारे प्राणों को लेकर
हमारे मान का अपमान किया
हर साल भूमि कर बढाते गये,
हमें धिक्कारते हुए बोले कि
यह प्रजा हमारी गुलाम है, सेवक हैं। भारतवासियों,
अंग्रेजों के विरोध में उद्यम चलाना चाहिए।
वीरगन्धमु-त्रिपुरनेनी रामस्वामी चौधरी
भारत में उन्नीसवीं सदी के आरंभ में मौजूदा सांस्कृतिक मूल्यों के पुनर्मूल्यांकण की प्रक्रिया शुरू हुई। आंध्र प्रदेश में कवि त्रिपुरानेनी रामास्वामी चौधरी (1887-1943) ने अपने काल के दौरान इस प्रक्रिया को बखूबी जारी रखा। अपने पूर्वगामियों के पदचिन्हों पर चलते हुए रामास्वामी ने कविता के माध्यम से तेलुगू भाषी लोगों के बीच नए विचारों के प्रसार किए। उन्होंने संस्थागत धर्म के माध्यम से प्रचार में लाई गई जाति व्यवस्था और सामाजिक अन्याय पर पूर्ण हमला किया। इस प्रकार उन्होंने असमानता और पक्षपात के खिलाफ लडाई का नेतृत्व किया। उन्होंने असमानता और पक्षपात के विरूद्ध अपने लोगों को जगाने के लिए अपने तर्कसंगत विचारों को व्यक्त करने के माध्यम के रूप में साहित्य सृजन को अपनाया। वे काँग्रेस पार्टी और स्वतन्त्रता संग्राम में उसकी भूमिका के विरोधी थे, लेकिन महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से वे अत्यधिक प्रभावित थे। उनकी कविता वीरगंधमु में उन्होंने सत्याग्रहियों को देशभक्त कहकर उनकी वीरता का वर्णन किया है।
यह देखो, यहाँ देखो,
इन देशभक्तों की वीरता देखो,
इन त्यागशीलों की वीरता देखो,
इन युवा रक्त के वीर प्रताप देखो।
तेलुगू गद्य साहित्य में गाँधीपरक रचनाएँ
उपन्यास- मालपल्लि- उन्नाव लक्ष्मीनारायण
गाँधी से आत्मिक जुडाव रखने वाले तेलुगू के गद्य साहित्यकार उन्नाव लक्ष्मीनारायणा (1873-1958) के उपन्यास मालपल्लि में अछूत होने मात्र से जीवन में बहुत ही कठिन परिस्थितियों से गुजरने वाले एक परिवार का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया गया है। अछूत होने के कारण सामाजिक अस्वीकृति भुगत रहे परिवार पर, अंग्रेजों के अत्याचार स्वरूप दोहरी मार पड रही थी। परिवार का मुखिया रामादासु, गाँधी द्वारा प्रचारित अहिंसा और असहयोग आन्दोलन के तरीके से प्रभावित था। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ उपन्यास का भी अन्त होता है। उपन्यास में 1921 की शुरूआत में हमारी स्वतन्त्रता की भविष्यवाणी की गई थी जबकि राजनीति के क्षितिज में उसे, उस समय प्राप्त करने का कोई संकेत तक नहीं था।
उपन्यास-कोल्लय गत्तिनेमी-महिधर राममोहन राव
गाँधी की सादगी को दिखाने के लक्ष्य के साथ उपन्यासकार महिधर राममोहन राव (1909) ने अपने इस उपन्यास का नाम कोल्लय गत्तिनेमी रखा था, जिसका अर्थ है- क्या हुआ यदि वो केवल एक लंगोटी ही पहनते हैं? वास्तव में उपन्यास का यह नाम तेलुगू के एक प्रसिद्ध कवि बसवराजा अप्पाराव की एक कविता की पहली पंक्ति है।
उपन्यास-ओबय्या- वेलूरि शिवराम शास्त्री
उपन्यास का नाम ओबय्या वास्तव में बाईबिल के एक चरित्र का नाम है, जिसका अर्थ है-ईश्वर के सेवक।
बाईबिल के इस चरित्र की विशेषता यह थी कि वह राष्ट्रीय तबाही के बीच भी आशावादी बने रहते थे। शिवराम शास्त्री ने गाँधी को ओबय्या मानकर उनके सत्याग्रह आन्दोलन को अपने उपन्यास का विषय चुना था।
अन्य गाँधीपरक तेलुगू रचनाएँ
कहानियाँ
गाँधीपरक कहानियों में मैदवोलु पत्मावती की त्यागिनी, बंदा कनक लिंगेश्वरम की ना इंटिलो गूडा प्रवेशिंचेदे (मेरे घर में भी प्रवेश किए), रायसं वेंकटशिवुडु की नीलवेणी, पेम्मराजु गोपालम की नारीहृदयम्, आदि उल्लेखनीय हैं। यह अत्यन्त आश्चर्य की बात थी कि नारीवादी साहित्यकार होते हुए भी कहानीकार चलम ने गाँधी के सत्याग्रह और अहिंसा पर कईं कहानियाँ लिखी हैँ, जिसका सशक्त उदाहरण है सुशीला नामक कहानी।
उपन्यास
तल्लाप्रगड सूर्यनारायण के हेलावती, वेंकटपार्वतीश्वर के मातृमन्दिर, के, विश्वनाथ सत्यनारायण के वेइपडगलु, अडिव बप्पिराजु के नारायण राव, तूफान वुप्पल लक्ष्मण राव के अत्तडु-आमे, आदि गाँधी-विचारधारा पर आधारित कुछ अन्य उपन्यास हैं।
गाँधी के भाषणों को अन्तर्विभाजित शब्दांश के रूप में तेलुगू के कईं उपन्यासों और कहानियों में उद्धरित किए हुए देखने को मिलते हैं। मुख्य तौर पर बलिवड कांता राव, भामिदिपति रामगोपालम, टी.पतन्जलि शासत्री और दादा हयात जैसे कहानीकारों की कृतियों में यह देखने को मिलते हैं।
अस्तु, यह अध्ययन दर्शाता है कि गाँधी विचार और दृष्टि का प्रभाव अखिल भारतीय साहित्य एवं चरित्र पर समेकित रूप से पडा। दक्षिण में भी गाँधी उतने ही लोकप्रिय थे जितने की शेष भारत में। दक्षिण भारतीय भाषाओं में रचा विपुल साहित्य इसी की साखी भरता है।
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सम्पर्क - गीता भवन, नारन्गानम् वेस्ट (पी.ओ.)
कोषन्च्चेरी, पत्तनमत्तिट्टा (जिला)
केरल-689642
मोबाईल- 09388790099