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कामाध्यात्म और उर्वशी

हरीश अरोडा
उर्वशी नाट्यगीति ने दिनकर का स्थान सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में तब सर्वोपरि कर दिया जब उन्हें इस कृति पर साहित्य का सर्वश्रेष्ठ सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में मिला। पुरूरवा तथा उर्वशी के प्राचीन आख्यान को दिनकर ने एक नए अर्थ के रूप में इस कृति में प्रस्तुत किया है। इस कृति में कवि का काम और अध्यात्म का सन्तुलन स्थापित करने की चेष्टा की गई है। यह कृति प्रेम की सनातन समस्या को चिन्तन के पक्ष की ओर ले जाती है। प्रेम और सौन्दर्य को कवि ने मनोवैज्ञानिक धरातल पर लाकर मन की कुण्ठा को वाणी दी है। काम की अतृप्त इच्छाओं से उत्पन्न व्याकुलता के कारण ही पुरुरवा कृति में कहता है -
किन्तु जग कर देखता हूँ
कामनाएं वर्तिका-सी बल रही हैं
जिस तरह पहले पिपासा से विकल थीं
प्यास से व्याकुल अभी भी जल रही हैं
रात भर मानो, उन्हें दीपक सदृश जलना पडा हो,
नींद में मानो किसी मरुथल में चलना पडा हो।1
दिनकर की उर्वशी में पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम के माध्यम से नट-नटी के प्रेम की प्रबल वृत्ति के दर्शन होते हैं। यह प्रेम ही दर्शन की शब्दावली में काम के रूप में अभिहित किया जाता है। उनके काव्य में जहाँ क्रांति की साहसपूर्ण अभिव्यक्ति है वहीं प्रेम के उद्दाम आवेग की प्रखरता भी। उर्वशी में यह काम संदर्भीय प्रेम एक नवीन दर्शन के रूप में ढलकर आया है। डॉ. नगेन्द्र के अनुसार काम की अनुभूति के सूक्ष्म-प्रबल, कोमल-कठोर, तरल-प्रगाढ, मोहक-पीडक, उद्वेगकर और सुखकर, दाहक और शीतल, मृण्मय और चिन्मय अनेक रूपों का उर्वशी में अत्यन्त मनोरम चित्रण हुआ है और सबसे अधिक आकर्षण है प्रेम की उस चिर-अतृप्ति का चित्रण, जो भोग से त्याग और त्याग से भोग अथवा रूप से अरूप और अरूप से रूप की ओर भटकती हुई मिलन और विरह में समान रूप से व्याप्त रहती है।2 उर्वशी काव्य का प्रतिपाद्य यही काम है। इस कृति में कवि ने जीवन में विद्यमान प्रेम अथवा काम की व्याख्या दी है।
प्राचीन काल से पुराणों और उपनिषदों में काम के संदर्भ में विचार होता रहा है। जहाँ वृहदारण्यक उपनिषद् में काममय स्वायं पुरुषः कहकर पुरुष में काम की स्थिति को स्वीकार किया गया है, वहीं मनुस्मृति में मनु काम को जीवन की समस्त क्रियाओं का मूल मानते हैं -
यद्यद्धि कुरुते किंचित्तत्कामस्य चेष्टितम्।
टकामस्य क्रिया काचिद् दुश्यते नेह कर्हिचित।3
श्री शिव महापुराण में तो जीवन के दिव्य आनन्द में विचार को काम से अभिहित किया गया है-
आनन्दममृत दिव्यं परं ब्रह्म तदुच्यते।
परमात्मेति चाप्युक्तं विकाराः कामसंज्ञिकाः।4
संस्कृत के अतुल ग्रंथ-भण्डार में काम पर विस्तार से विचार किया गया है। हिन्दी साहित्य में भी भक्तिकाल और रीतिकाल के कतिपय कवियों ने इस पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उन सभी के मतों और विचारों से स्पष्ट है कि काम एक ओर तो इन्द्रिय सुखों की प्रतिपूर्ति के लिए तथा दूसरी ओर दैहिक सुखों से परे मन की शांति के लिए हुआ है। लेकिन उर्वशीकार ने काम की एक तीसरी कोटि को भी स्वीकार किया है जो इन्द्रियों और मन से परे चैतन्य आत्मा के सुख को स्वीकार करती है। इसी चैतन्य आत्मा के प्रेम ने कामाध्यात्मक के रूप में उर्वशी में स्थान प्रदान किया है।
भारतीय कामाध्यात्मकी ओर यदि दृष्टि डाली जाए, तो वह सर्वाधिक शाक्त दर्शन से प्रभावित है। सृष्टि का विकास शिव और शक्ति के समन्वय में ही है। इनके बिना सृष्टि का विकास असम्भव है। शिव शक्ति के बिना अपूर्ण हैं और शक्ति शिव के बिना। यही प्रेम का दिव्य रूप है। उर्वशी में प्रेम के इसी दिव्य रूप को दिनकर ने स्वरूप देते हुए लिखा -
वह निरभ्र आकाश, जहाँ की निर्विकल्प सुषमा में
न तो पुरुष मैं पुरुष, न तुम नारी केवल नारी हो।
दोनों हैं प्रतिमान किसी एक ही मूल सत्ता के
देह-बुद्धि से परे नहीं जो नर अथवा नारी है।5
अन्य सम्प्रदायों में काम को पाप की श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन शाक्त-सम्प्रदाय में इसे पवित्र कर्म की संज्ञा दी गई है। दिनकर ने अपनी कृति संस्कृति के चार अध्याय’ में शाक्त धर्म के संदर्भ में विचार प्रकट करते हुए लिखा कि शाक्त धर्म में अपने साधकों से कहा गया है - तुम उस स्थिति में आ गए हो, जब नारी समागम तुम्हारे लिए पाप नहीं उदात्तीकृत आनन्द का ही प्रतीक होगा।6 उर्वशी में सर्वज्ञा इसी विचार को ही व्यंजित किया गया है। उर्वशी की भूमिका में दिनकर ने लिखा है कि प्रेम की एक उदात्तीकरण स्थिति वह भी है, जो समाधि से मिलती-जुलती है। जिसके व्यक्तित्व का देवापम विकास हुआ है, जिसके स्नायविक तार चेतन और सजीव हैं तथा जिसका मन स्वभाव से ही, ऊर्ध्वगामी और उड्डयनशील है, उसे काम के स्पर्शमात्र से इस समाधि का बोध होता है।7
मनुष्य जीवन में अपने लैंगिक स्थिति द्वारा ही अपनी काम-साधना का आरम्भ करता है। लेकिन धीरे-धीरे वह काम की दैहिक साध्ना से उठकर शुद्ध आध्यात्मिक स्थिति को जाता है। काम की यही साधना ऊर्ध्वमुखी है -
ये किरणें, ये फूल, किन्तु, अन्तिम सोपान नहीं है
उठना होगा बहुत दूर, ऊपर, इनके तारों पर।
स्यात् ऊर्ध्व उस अम्बर तक जिसकी ऊँचाई पर से
यह भृत्ति का विहार, दिव्य किरणों का हीन लगेगा।8
उर्वशीकार ने उर्वशी में काम के दो रूपों की स्वीकारोक्ति की है - धर्म रूप और पाप रूप। तांत्रिक वामाचार में काम के माध्यम से ही मुक्ति की खोज की जाती है। यही काम जीवन को पतन की ओर भी ले जाता है और इसी के सहारे ही जीवन ऊपर की ओर भी उठ सकता है। जीवन के संदर्भों में पाप पुण्य एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं। संदर्भ-अंतरण से पाप पुण्य भी हो सकता है-
काम धर्म, काम ही पाप है, काम किसी मानव को
उच्चलोक से गिरा हीन पशु-जन्तु बना देता है। और किसी मन में असीम सुषमा की तृषा जगाकर पहुँचा देता है किरण-सेवित अति उच्च शिखर पर।9
शाक्त तंत्र में माया-आबद्ध जीव को पशु की संज्ञा दी गई है। यही माया उसके प्रेम को जब वासना में परिवर्तित कर देती है तब वह बलात् रूप में पाप होता है और जब जीव काम को उदात्तीकृत कर उससे आनन्द प्राप्त करता है तब वह धर्म की स्थिति में होता है। यह स्थिति परम आनन्द की स्थिति होती है। इस स्थिति में जीव को काम की दग्ध्ता भी स्निग्ध् और शीतल प्रतीत होती है।
यह अति क्रान्ति वियोग नहीं, शोणित के तप्त ज्वलन का परिवर्तन है स्निग्ध, शान्त दीपक की सौम्य शिखा में।10
दिनकर ने शाक्त और सहजिया सम्प्रदायों के मतों द्वारा प्रेम के जिस उदात्तीकृत रूप को मुक्ति की प्राप्ति का साधन माना है वहीं विधि् निषेध असहज पद्धति के लिए उसका निषेध् भी किया है। विधि-निषेध् की शास्त्रीय पद्धति इस कामाध्यात्मक की स्थिति में जीव को मुक्ति देने में अक्षम होती है इसीलिए कवि कहता है -
और ज्वार जो भी उठता ऊपर अवचेत अतल से
विधि् निषेध् का उस पर कोई जोर नहीं चलता है।11
विधि्-निषेध् की पद्धति में प्रेम और काम की स्थिति द्वैत-भाव से बँधी रहती है। कठिन होने के कारण यह अद्वैत भाव तक नहीं पहुँच पती। किन्तु सहज भावना द्वारा जीव द्वैत से उठकर अद्वैत तक पहुँच जाता है। जहाँ मन शुभ और अशुभ की विचारणा का त्याग करता है वहीं वह अद्वैत की अवस्था को प्राप्त करता है-
किन्तु शुभाशुभ भावों से, मन के तटस्थ होते ही,
न तो दीखता भेद, न कोई शंका ही रहती है।12
उर्वशी में काम की इस अवधरणा में दिनकर पर जहाँ शाक्त, सहजिया और तंत्रा दर्शनों का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है वहीं पश्चिम के विचारकों लॉरेंस और रसल के काम सम्बन्धी विचारों का प्रभाव भी स्पष्ट है। फ्रायड के काम सम्बन्धी विचारों की परम्परा के विकसित रूप में लॉरेंस ने बुद्धिवाद का विरोध् करते हुए काम का समर्थन किया था। उसने बौद्धिक सेक्स की जमकर भर्त्सना की है। मध्ययुग की आदर्शवादिता के चलते समाज में आई जडता को लॉरेंस ने तोडने के लिए ही काम का समर्थन किया क्योंकि इसी से ही जडता की ग्रंथियाँ खुल सकती हैं। दिनकर ने भी इसी विचार को उर्वशी में ज्वलंत प्रश्न के रूप में ही स्वीकार किया है-
वह आलिंगन अंधकार है, जिसमें बँध जाने पर हम प्रकाश के महासिन्धु में उतराने लगते हैं? और कहोगे तिमिर-शूल उस चुंबन को भी जिससे जडता की ग्रंथियाँ निखिल तन-मन की खुल जाती हैं?13
वास्तव में आधुनिक मानव की समस्या काम की भावना को छिपाने की है, जिससे जीव कामपूर्ति के अभाव में अनेक मनोवेगों से ग्रसित हो जाता है। वह सुन्दर देह को सुन्दर तो मानता है, लेकिन अपनी भावानुभूतियों में ही उन्हें दबा देता है। उर्वशी पुरूरवा के इसी भावावेग की दबी हुई कुण्ठा को तोडकर उसे अपने रूप सौन्दर्य की वास्तविकता के प्रति आकर्षित करती है और पुरूरवा कह उठता है-
एक मूर्ति में सिमट गयीं, किस भाँति सिद्धियाँ सारी
कब था ज्ञात मुझे इतनी सुन्दर होती हैं नारी।14
लारेंस मानसिक काम की निन्दा करते हैं। उनके विचार में मानसिक काम ने ही समाज को रोगी बना रखा है। यह मानसिक काम उनकी दृष्टि में विष के समान है। दिनकर भी लॉरेंस की तरह शारीरिक काम का समर्थन करते हैं और मानसिक काम की निन्दा-
तन का काम अमृत, लेकिन यह मन का काम गरल है।15
शरीर तो प्रकृति के हाथों का यंत्र है। उसकी क्षुधा प्रकृतिजन्य है लेकिन मन का काम एक ऐसा रोग है जो व्यक्ति को नीचे गिराता है-

तन का क्या अपराध, यन्त्र वह तो सुकुमार प्रकृति का,
सीमित उसकी शक्ति और सीमित आवश्यकता है।16
शारीरिक प्रेम की कामानुभूति को तो फिर भी शांत किया जा सकता है, लेकिन मन तो सदैव इच्छाओं की नई श्रृंखला तैयार करता है। वह कभी संतुष्ट नहीं हो पाता। शारीरिक और मानसिक काम का द्वंद्व चलता रहता है। बुद्धि मनुष्य को भटकाती है किन्तु जब उसे सत्य का ज्ञान होता है, तो प्रेम अमृत शिखा तुल्य लगता है। यहाँ मनुष्य रक्त और बुद्धि के भेद को समझ जाता है। उर्वशीकार उर्वशी के द्वारा पुरूरवा के मन पर छाए बुद्धि के आवरण को क्षीण करता है -
रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी,
क्योंकि बुद्धि सोचती और शोणित अनुभव करता है।17
वास्तव में रक्त ही मनुष्य को चैतन्यमयी अवस्था में बनाए रखने में सक्षम है। बुद्धि तो काम की भावात्मकता को कुण्ठा में परिवर्तित करती है। इसीलिए रक्त की भाषा बुद्धि से अधिक सशक्त होती है -
तुम निरूपते सो विराग जिसकी भीषिका सुनाकर
मेरे लिए सत्य की वाणी वही तप्त शोणित है।
पढो रक्त की भाषा को, विश्वास करो इस लिपि को,
यह भाषा, यह लिपि मानस को कभी न भर पायेगी।18
दिनकर पर बर्ट्रेड रसेल की विचारधारा का भी गहरा प्रभाव पडा है। रसेल ने नारी को पुरुष के प्रति पूर्ण समर्पिण की भावना से मुक्त रहने को कहा है। क्योंकि पूर्ण समर्पिता नारी से तृप्त होकर पुरुष अन्य नारी की ओर आकृष्ट होता है। वह नित्य नवीन प्रेम को खोजता है। पुरूरवा का औशीनरी को छोडकर उर्वशी की ओर आकर्षित होना इसी विचार की सघटनता को परिलक्षित करता है -
उस पर भी नर में प्रवृत्ति है, क्षण-क्षण अकुलाने की
नयी-नयी प्रतिमाओं का, नित नया प्यार पाने की।
वश में आयी हुई वस्तु से इनको तोष नहीं है
जीत लिया जिसको उससे आगे संतोष नहीं हैं।19
रसेल का मत है कि नारी को विवाह के पश्चात् पुरुष के प्रति गोपनीयता को बनाए रखना चाहिए अन्यथा काम की भावना शिथिल पड जाएगी। वैवाहिक जीवन की सार्थकता इसी गोपनीयता पर ही है-
क्षण-क्षण प्रकटे, दुरे, छिपे फिर-फिर जो चुम्बन लेकर
ले समेट जो निज को प्रिय के क्षुधित अंक में देकर।
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प्रियतम को रख कसे निमज्जित जो अतृप्ति के रस में
पुरुष बडे सुख से रहता है उस प्रमदा के वश में।20
जीव के लिए यह साधना वास्तव में योगी की साधना के समान है। इसी साधना द्वारा ही प्रेम की नाव दिव्य लोक तक पहुँचती है जहाँ पहुँचने के लिए तन का अतिक्रमण आवश्यक है-
ऊपर हो द्युतिमान, मनोमय जीवन झलक रहा है,
उसे प्राप्त हम कर सकते हैं तन के अतिऋमण से।21
यहाँ यह विचारणीय है कि उर्वशी का प्रेम अतीन्द्रियता की कुण्ठा से मुक्त होकर मानव के ऐन्द्रिय प्रेम को भोगने का इच्छुक है। वह ऐन्द्रिय धरातल पर किए काम-सुख को ही पूर्ण सत्य स्वीकारती है लेकिन पुरूरवा के लिए देह प्रेम की जन्मभूमि है और इसी के अतिक्रमण से ही जीव दिव्य प्रेमानुभूति को प्राप्त करता है-
यह सीमा प्रसरित है मन के गहन, गुह्य लोकों में,
जहाँ रूप की लिपि अरूप की छवि आँका करती है,
और पुरुष प्रत्यक्ष विभासित नारी-मुखमंडल में
किसी दिव्य, अव्यक्त कमल को नमस्कार करता है।22
उर्वशी और पुरूरवा का यह प्रेम देह से परे अदेह की अनुभूति की यात्रा है। जो आनन्द के परम शिखर पर पहुँचने के लिए ही एक-दूसरे के प्रति अर्पित होते हैं।
उर्वशी और पुरूरवा दोनों ही निरुद्देश्य आनन्द की प्राप्ति के लिए अपनी आत्मा को अर्पित करना चाहते हैं, लेकिन उर्वशी का अर्पण प्रकृति अथवा ऐन्द्रिय काम-सुख के लिए है और पुरूरवा का अर्पण प्रकृति के माध्यम से ईश्वर के प्रति है। दोनों ही काम के धरातल पर निरुद्देश्य आनन्द की ओर अग्रसर रहते हैं। उर्वशी का यह निरुद्देश्य आनन्द ही काम के माहात्म्य का मिथकीय अभिधान है।
आनन्द नारायण शर्मा इस कृति को आधुनिक हिन्दी कविता में कामायानी के बाद की सर्वोत्कृष्ट रचना स्वीकारते हैं। उनके शब्दों में- उर्वशी निस्सन्देह कामायानी के बाद आधुनिक हिन्दी कविता की दूसरी सबसे प्रमुख उपलब्धि है, न केवल जीवन के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न को मौलिक ढंग से उठाने की दृष्टि से, बल्कि भाषा की प्रौढता और सम्मूर्त्तनविधान की दृष्टि से भी।23 इस कृति में भौतिक से परे भौतिकोत्तर सौन्दर्य के प्रति अर्पण का भाव ही इसे दैहिक से अलौकिक आनन्द में परिवर्तित करता है। कामाध्यात्मक की ऐसी दुर्लभ और अतुल्य कृति हिन्दी साहित्य में निस्संदेह दूसरी नहीं है।

संदर्भ
1.रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, संस्करण 1971, पृष्ठ 51
2.डॉ. नगेन्द्र, डॉ. नगेन्द्र की व्यावहारिक आलोचना, शुक्लोत्तर आलोचना और डॉ. नगेन्द्र, पुष्प अग्रवाल, संस्करण 1978, पृष्ठ 171 से उद्धृत
3. मनु, श्लोक 2.4, मनुस्मृति, टीकाकारः पंडित रामेश्वर भट्ट, प्रकाशक पेण्डुरंग जावजी, बम्बई, संस्करण 1922, पृष्ठ 16
4. श्लोक 13.22, श्री शिव महापुराण, गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत 1989, पृष्ठ 78
5. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 61
6. रामधरी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय, उदयाचल, पटना, तीसरा संस्करण 1962, पृष्ठ 218
7. रामधरी सिंह दिनकर, भूमिका, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ ग
8. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 59
9. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 82
10. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 62
11. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 85
12. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 77
13. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 46
14. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 24
15. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 83
16. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 83
17. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 57
18. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 59-59
19. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 34
20. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 34-35
21. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 61
22. रामधरी सिंह दिनकर, उर्वशी, उदयाचल, पटना, चौथा संस्करण 1971, पृष्ठ 60
23. आनन्द नारायण शर्मा, सुकवि समीक्षा, शिक्षा भारती, नई दिल्ली, संस्करण 1958, पृष्ठ 207

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