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सचमुच मैं अन्धेरे युग में जी रहा हूँ !

आशुतोष पाण्डेय
(स्वाधीनता आन्दोलन हिन्दी कविता और प्रतिबंधित हिन्दी कविता)

हिंदी कविता के इतिहास में छायावाद एक महत्त्वपूर्ण और शुरुआती पडाव है। 1918 से पहले हिंदी कविता की भाषा ब्रज भाषा थी। छायावाद के दौर में हिंदी कविता की भाषा खडी बोली को पूर्णतः स्थापित मान लिया गया। जिसके बारे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि यह स्वच्छंद नूतन पद्धति अपना रास्ता निकाल ही रही थी कि श्री रविन्द्रनाथ की रहस्यात्मक कविताओं की धूम हुई और कई कवि एक साथ रहस्यवाद और प्रतीकवाद या चित्रभाषा को ही एकांत ध्येय बनाकर चल पडे। चित्रभाषा या अभिव्यंजन पद्धति पर ही जब लक्ष्य टिक गया तब उसके प्रदर्शन के लिए लौकिक या अलौकिक प्रेम का क्षेत्र ही काफी समझा गया। इस बँधे हुए क्षेत्र के भीतर चलने काव्य ने छायावाद का नाम ग्रहण किया। छायावादी कविता जैसे ही अस्तित्व में आई। हिंदी कविता आलोचना में एक वाद-विवाद और सम्वाद की परम्परा उसको लेकर चल पडी । इस कविता के सिद्धहस्त कवियों में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा थीं। यह दौर देश और विदेश दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। एक तरफ जहाँ 1917 में रुसी क्रांति ने दुनिया का ध्यान अपने तरफ खींचा, तो वहीं दूसरे तरफ विश्वयुद्ध ने दुनिया में मानवतावादी सोच को सदमें में डाल दिया।
भारतीय सन्दर्भ में, 1915 में महात्मा गाँधी का भारत आगमन और भारतीय स्वधीनता आन्दोलन में योग देना । इसके बाद 1919 का जालियांवाला बाग हत्याकांड और 1922 का चौरी- चौरा कांड भी इस दौर के कविता आन्दोलन पर अपना छाप छोडा । छायावादी कविता ने एक तरह से देशी विषय-वस्तु के साथ विदेशी रूप ग्रहण कर हिंदी कविता आन्दोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। जैसा की माना जाता है कि 1918 से 1936 तक हिंदी साहित्य और कविता के इतिहास में छायावादी कालखंड था। जिसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है कि रविन्द्रनाथ को किसी जमाने में बँगला का शेली कहा जाता था और निरालाजी को हिंदी का रवीन्द्रनाथ तो नहीं परन्तु यथेष्ट आदर के साथ उनका अनुवर्ती अवश्य कहा जाता था। शेली, ठाकुर और निराला के युगों की परिस्थिति में एक बात समान रूप से विद्यमान है, और वह है पूँजीवाद का प्रारम्भिक विकास तीनों युगों में ही यांत्रिक पूँजीवाद से उत्पन्न होने वाली विषम परिस्थितियों के प्रति घोर असंतोष है, इसके साथ ही पूँजीवाद ने पुराने वर्ग श्रृंखलाओं को झकझोर कर आत्मविश्वासी पथिकों के लिए नए संगठन और नयी प्रगति का मार्ग निश्चित किया, उसकी चेतना भी इन कवियों में विद्यमान है। सामाजिक पृष्ठभूमि में समानता है, तो समाज को प्रतिबिम्बित करने वाले साहित्य में भी समानता होना अनिवार्य है।
रामविलास शर्मा एक तरफ भारत में मौजूद मध्यकालीन वर्ण की संकीर्णताओं के खिलाफ संघर्ष को भी छायावाद की पृष्ठभूमि के रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात है कि उन्होंने उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा थोपा हुआ पूँजीवाद को छायावाद के सन्दर्भ में इस्तेमाल नहीं किया। जबकि छायावादी कवि भारतीय सामन्ती प्रथा और उपनिवेशवादी शासनव्यवस्था दोनों ही वर्गों के साथ अपनी रचनाओं के माध्यम से संघर्ष कर रहे थे। जयशंकर प्रसाद ने 1918 में प्रकाशित अपने संग्रह झरना में लिखा है कि-
किरण! तुम क्यों बिखरी हो आज,
रंगी हो तुम किसके अनुराग,
स्वर्ण सरजित किंजल्क समान,
उडाती हो परमाणु पराग।
प्रसाद उसी नए पूँजीवाद से उत्पन्न हो रहे मानवीय संकट को रेखांकित करते हैं। जिसके बारे में क्रिस हरमन लिखते हैं कि बीसवीं सदी के प्रारम्भ तक संसार में हर कहीं पूँजी की मोहर लग चुकी थी। दुनिया में अंटार्कटिका के बर्फीले रेगिस्तानों, अमेजन घाटी के सुदूर जंगलों और न्यू गिनी के कुछ क्षेत्रों को छोड शायद ही कोई कोना बचा हो जहाँ पूँजीवाद के दूत सस्ता समान, बाइबिल, विषाणु और बिना कमाए धन की आशा लिए न पहुँच गए हों।
बहरहाल पूँजी का प्रभाव हर जगह एक जैसा नहीं था। बहुत-सी जगहों पर अभी भी उसका मतलब था पसीना बहाना, स्थानीय उपभोग के लिए नहीं, दूर बैठे पूँजीपति के लिए। पर पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमरीका में उद्योग, परिवहन और कृषि में यंत्रीकरण बढता ही जा रहा था। हरमन जब पूँजी के प्रभाव को एक समान रूप से नहीं देखते हुए उसे श्रम से जोडते हैं, तो वहाँ श्रम एशिया और भारत के तरफ इशारा करता है। जहाँ पर सस्ते श्रमिक और उत्पादन दोनों ही सुलभ था। दूसरे विज्ञान के उपयोग की सुलभता भी इस मानवीय संकट को बढाने में मददगार हुआ।
छायावाद की इन्हीं सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि के बीच हिंदी में उस दौर में कुछ ऐसी रचनाएँ भी मौजूद थीं। जिन्हें उपनिवेशी ताकतों द्वारा प्रतिबंधित किया गया। इन्हीं कविताओं के संग्रहों को रुस्तम राय 1999 में संग्रहित, सम्पादित और प्रकाशित किया। उन्होंने अपने सम्पादित पुस्तक में- खून के छींटे बलभद्र प्रसाद गुप्त द्वारा लिखित कविताओं का संग्रह है। जिन्हें 1930 में प्रकाशित किया गया था। मुक्त संगीत अभिराम शर्मा एवं प्रणयेश शर्मा की कविता संग्रह का प्रकाशन 1932 में हुआ था। विद्रोहणी और तूफान कविता संग्रह प्रह्लाद पाण्डेय शशि का है। जिन्हें 1942 और 1943 में प्रकाशित किया गया था।
इन कविता संग्रहों के बारे में रुस्तम राय ने लिखा है कि कहने की आवश्यकता नहीं कि आजादी की लडाई की रफ्तार के साथ अंग्रेजी शासन के दमन की रफ्तार तेज हुई। 1857 तक भारतवर्ष पूरी तरह ब्रिटिश साम्राज्य की गिरफ्त में आ चुका था। व्यापारी अब स्वामी बन गए थे। 1857 की विफलता ने भारतीयों का मनोबल क्षय तो किया; किन्तु उन्हें एकता का पाठ भी पढा दिया। भारतेंदु और उनके युग के लेखकों ने अंग्रेजों के शोषण और उनकी दमनमूलक नीति का विरोध करते हुए देश की तत्कालीन दुर्दशा और हीनावस्था के प्रति क्षोभ व्यक्त किया। परन्तु महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके युग के लेखकों का विरोध क्रमशः कमजोर पडता गया। हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग वह प्रथम चरण है, जब ब्रितानी ताकतों का प्रतिरोध अपने साहित्य के माध्यम से किया। रुस्तम राय ने ऊपर लिखित क्रिस हरमन और रामविलास शर्मा की बातों को ही प्रतिबंधित हिंदी कविताओं के सम्दर्भ में लिखा है। अब तक हिंदी साहित्य और खासकर हिंदी कविता आलोचना के लिए विविध पद्धतियों का सहारा लेकर आलोचना हो चुकी है, और आलोचना विधा इन विषयों से काफी दूर और आगे बढ चुकी है लेकिन -
आह! अमित घायल है फिर भी खुले हैं सीने।
चमका दे बली-वेदी को भी क्यों न अमूल्य नगीने?
परधीन होकर भी हैं यदि कर सकते न गुजारा ।
तो फिर इस जीवन से जीवन-दान क्यों न हो प्यारा?
इन पंक्तियों को आलोचना और इतिहास दोनों के विषय-वस्तु से बाहर रखा गया । जबकि मैनेजर पाण्डेय ने आलोचना की राजनीति लेख में लिखा है कि आधुनिक कल में साहित्य पहले से अधिक राजनीतिक हुआ है । टॉमस मान ने कहा था कि आधुनिक समय में मनुष्य की नियति राजनीति से निर्धारित हो रही है ।
साहित्य अपने समय और समाज के मनुष्य की स्थिति तथा नियति की चिंता करता है, इसलिए उसमें मनुष्य की नियति को निर्धारित करने वाली राजनीति की चिंता भी मौजूद होती है । ऐसे साहित्य की व्याख्या की कोशिश करने वाली आलोचना राजनीति की उपेक्षा कैसे के सकती है। साहित्यकार समाज से रचना की प्रेरणा ही प्राप्त नहीं करता, वरन वह जिन वास्तविकताओं और आकंक्षाओं की अभिव्यक्ति करता है, वे भी सामाजिक सन्दर्भ से जुडी होती हैं और वह सामाजिक सन्दर्भ प्रक्रिया से बनता है। सामाजिक संरचना में वर्ग और विचारधाराएँ होती हैं और उनके बीच टकराहटें भी। जिन रचनाओं में ऐसी टकराहटों की चेतना मौजूद नहीं होती वे अपने समय में और बाद में भी प्रासंगिक नहीं होतीं। ऐसी रचनाओं की आलोचना में उन टकराहटों की पहचान और व्याख्या आवश्यक होती है। जिससे रचना की राजनीतिक चेतना समाने आए। इस प्रक्रिया में आलोचना राजनीतिक बनती है। मैनेजर पाण्डेय की यह बात रचना और रचना की प्रासंगिकता के साथ, उसके सामाजिक सन्दर्भ के तरफ इशारा करती है।
प्रतिबन्धित हिंदी कविताओं का तत्कालीन प्रासंगिकता और उसका सामाजिक सन्दर्भ उसके प्रतिबंधित होने से ही जहीर हो जाता है। लेकिन बीसवीं सदी के मध्य की रचनाओं की जब भी बात आती है, तो हिंदी कविता आलोचना प्रसाद, पन्त, निराला, महादेवी के बरक्स दिनकर, बच्चन आदि के सामजिक सन्दर्भों और कुछ सतही बहसों तक ही सीमित कर दिया गया है। इसलिए बलभद्र प्रसाद गुप्त विशारद रसिक ने अपना परिचय देते हुए लिखा-
श्रीकर हो दीनता का दर्प करता हूँ सदा,
तीक्ष्ण तम-तोम हरने के लिए रवि हूँ ।
एकमात्र भारत का पावन पुजारी हूँ मैं,
अग्नि की प्रचंड प्रतिभा का दिव्य छवि हूँ।
शशि-ज्योत्स्ना-सी मेरी कांति-कौमुदी है मंजु,
राजनीति, छत्र-दंड का प्रकांड पवि हूँ।
किसने न विश्व में है मान लिया लोहा मेरा,
शांत क्रांन्तिकारी हूँ मैं रसिक सुकवि हूँ।
इन कवियों की कोई साहित्यिक महत्त्वकांक्षा नहीं थी । इन्होने अंग्रेजी हुकूमत के दौर में भारतीय स्थिति को बयान करने, और उस उत्पीडन को इतिहास में दर्ज कराने के लिए कलम उठाया। कवि-प्रतिभा नामक एक कविता में लिखते हैं-

उज्ज्वल धवल धूमकेतु नभ-मंडल से,
टूट टूट कर भूमि पर गिर जाएँगे।
झंडा के झकोरों से न दिन का चलेगा पता,
सघन गगन-मध्य घन घहराएँगे।
वीर-रस-पूर्ण, महाकाव्य लिखने को जब,
सुकवि रसिक निज लेखनी उठाएँगे।
इन पंक्तियों और पूरी कविता को पढने के बाद 1935 में लिखित और अनामिका में संग्रहित कविता सरोज स्मृति की सहज ही याद आएगी। जब निराला लिखते हैं-
अशब्द अधरों का सुना, भाष,
मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश
मैंने कुछ अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर ।
जीवित-कविते, शत-शत जर्जर
छोड कर पिता को पृथ्वी पर
तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार
एक तरफ बलभद्र अंग्रेजी उत्पीडन को मिटाने के लिए काव्य-रचना का आरम्भ किया तो वहीं, निराला उसी उत्पीडन और देशी रूढिवादिता को नरक के समान बतलाते हैं। निराला की इस कविता पर जब भी बात होती है तो सम्पादकगण और शोकगीत के रूप में ही चिह्नित होती है। लेकिन निराला और बलभद्र दोनों ही कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से आलोचना की राजनीति और समपादन की राजनीति को तिरछी निगाह से देखने के साथ उनके निगाह में अंग्रेजी उत्पीडन भी है। सरोज स्मृति के बारे में नामवर सिंह लिखते हैं कि निराला ने अपनी पुत्री सरोज की स्मृति में शोकगीत लिखा और उसमें अपने नीजी जीवन की अनेक बातें साफ-साफ कह डालीं । सम्पादकों द्वारा मुक्त छंद की रचनाओं का लौटाया जाना विरोधियों के शाब्दिक प्रहार, मातृहीन लडकी को ननिहाल में पालन-पोषण, दूसरे विवाह के लिए निरंतर आते हुए प्रस्ताव और उन्हें ठुकराना, सामाजिक रुढियों को तोडते हुए एकदम नए ढंग से कन्या का विवाह करना, उचित दवा-दारू के अभाव में सरोज का देहावसान और उस पर कवि का शोकोदगार। निराला का यह गीत केवल एक सरोज के लिए ही नहीं है, बल्कि देश की पराधीनता की वजह से उत्पन्न संकट के वजह से भारतमाता के सुपुत्रियों के लिए भी है । जिनके माता को गुलामी की जंजीरों ने जकड रखा था ।
स्वाधीनता आन्दोलन के दौर के कवियों की कविताओं में व्यक्तिगत पीडा के माध्यम से सामाजिक पीडा को अभिव्यक्त करने का कार्य, उस दौर के कवियों ने किया है । इसीलिए जन-जन को जागृत करते हैं । निराला ने लिखा कि -
जागो फिर एक बार!
प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण-पंख तरुण-किरण
खडी खोलती है द्वार-
जागो फिर एक बार !
वहीं बलभद्र प्रसाद लिखते हैं-
जागृति की ज्योति-चंद ज्योत्स्ना जगा दे तू।
चढा दें रसिक प्राण-सुमन समोद हम;-
बलि-वेदी पर, ऐसी लगन लगा दे तू।
भैरवी भयंकरी कराल कलिका-सी फिर,
लेखनी! सदा के लिए भीरुता भगा दे तू।
यहाँ जाग्रति या जागो दोनों ही भारतीयों को पराधीनता से मुक्ति और अत्याचारों से मुक्ति की उत्कंठा है । जिस कार्य में स्वतन्त्रता सेनानी लगे हुए थे । इसके लिए नामवर सिंह ने लिखा है कि ...बुद्धिजीवी मध्य-वर्ग के नेतृत्व में भारतीय जनता ने अपना राजनीतिक और सामजिक स्वाधीनता के लिए जो संघर्ष किया, उसके कई पहलुओं को छायावाद ने सच्चाई के साथ प्रतिबिम्बित किया और यथाशक्ति उसे आगे बढाने में योग भी दिया । नामवर सिंह ने आगे स्वाधीनता की भावना का उदय पुनरुत्थान-भावना से होता है कहा लेकिन पुनरुत्थान की भावना को अभिव्यक्त करने के लिए केवल व्यंजना ही उपयोगी है, जहाँ अत्याचार और पीडा को महसूस करने मात्र से ही ह्रदय कांप उठता हो? अपने खून के छीटे कविता संग्रह में बलभद्र प्रसाद ने लिखा है कि-
रक्त-धार से सिंच रहे हैं स्वतन्त्रता की क्यारी।
आज पूर्णतः धधक रही है विप्लव की चिनगारी।
नमक बनाकर जग को दिखलाते निज नमकहलाली।
नवजीवन के लिए पिए लेते हैं विष की प्याली।
इस कविता में नमक सत्याग्रह या दांडी मार्च को सन्दर्भ बनाया गया। लेकिन नमक के हवाले से ही देश की निर्धन जनता के हाल को बयाँ किया गया। जिसके लिए लिखा गया कि देश को आजाद कराने वाले दीवाने तुम्हारे इस निर्धनता की नमक अदा कर रहे हैं । जिनके सीनों पर गोलियाँ चलाई जा रही है। उपर्युक्त कविता का शीर्षक मतवाला भिक्षुक है। जिसका प्रकाशन वर्ष 1930 है । प्रथमतः यह कविता महात्मा गाँधी के दांडी मार्च से प्रभावित है । लेकिन 1930 में ही निराला का कविता संग्रह परिमल प्रकाशित हुआ। जिसमें भिक्षुक कविता संकलित है। निराला ने लिखा-
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लुकटिया टेक,
मुट्ठी फटी पुरानी झोली का फैलता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता ।
पथ पर आता ।
निराला के यहाँ पेट और पीठ दोनों मिलकर एक इसलिए हो गया कि देश में कोई ऐसी वस्तु नहीं रही, जिस पर अंग्रेजों ने कर न लगा रखा हो। बलभद्र प्रसाद फिर लिखते हैं-
ऐसी हो गई है हाय! हालत हमारी हीन,
जुल्म हुआ आज राष्ट्रिय गान गाना भी
हो गई पतन की परम पराकाष्ठा है,
जुल्म हुआ आज निज वेदना सुनाना भी
रसिक समस्त विश्व को थे जो खिलाते रहे,
जुल्म हुआ आज उन्हें रुखा सूखा खाना भी
किया था विकास जिन लोगों ने ही सभ्यता का,
जुल्म हुआ उन्हें आज नमक बनाना भी।
जैसा कि ऊपर कहा गया है कि महात्मा गाँधी का 1915 में भारत आगमन हुआ था । उसके बाद 1917 में उन्होंने चंपारण सत्याग्रह से स्वाधीनता आन्दोलन में अहिंसात्मक आन्दोलन की नींव रखी। जिसे किसान आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है। महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में लिखा है कि चम्पारण जनक राजा की भूमि है । जिस तरह चम्पारण में आम के वन है, उसी तरह सन 1917 में वहाँ नील के खेत थे । चम्पारण के किसान अपनी ही जमीन के 3/20 भाग में नील की खेती उसके मालिकों के लिए करने को कानून से बंधे हुए थे । इसे वहाँ ‘तीन कठिया’ कहा जाता था । बीस कट्ठे का वहाँ एक एक? था और उसमें से तीन कट्ठे जमीन में नील बोने की प्रथा को कठिया कहते थे। हमें यहाँ नील दर्पण (नाटक- 1860) को याद करना चाहिए । यह नाटक बंगाल में नील की खेती करने वाले किसानों पर अंग्रेजी अत्याचार का उदहारण है । लेकिन इसी नाटक से एक महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक तथ्य जुडा हुआ है कि, 1872 में जब यह नाटक खेला गया तो दर्शकों की भीड देख, अंग्रेजी हुकूमत ने 1876 में ड्रैमेटिक परफोर्मेंस कंट्रोल एक्ट को चलन में लाया । जिससे पुस्तकों और रचनाओं को प्रतिबन्धित किया जाने लगा, तो एक तरह से भारत में प्रतिबंधन की शुरुआत भी नील या किसानों की आवाज दबाने के लिए हुई। वहीं गाँधी ने इसी आवाज लो लेकर अपने अहिंसात्मक सत्याग्रह की शुरुआत की । जिसके बारे में प्रतिबंधित कवियों ने लिखा-

इस ओर कृषकों की टूटी फूटी झोपडी है,
पूँजीपतियों की उस ओर है अटालिका
उस ओर बेबी, बाबा फिरते समोद देखो,
इस ओर रोती क्षुब्ध-गुस्सा दीना बालिका
देवियों कसाले सहती हैं इस ओर हाय!
मौज मारती हैं उस ओर नग्ना कालिका।
रसिक बताओ कैसे स्वागत तुम्हारा करें,
देख लो करुणा-दृश्य तुम भी दीपमालिका।
देश में तत्कालीन शासन की वजह से असामनता बढती जा रही थी । जिसको लेकर स्वतन्त्रता सेनानी और प्रतिबन्धित रचनाकार अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे । स्वयं गाँधी ने लिखा मैं हिटलर की शक्ति का नहीं, एक स्वतंत्र कृषक की शक्ति का अभिलाषी हूँ । मैं इतने वर्षों से कृषक के साथ तादम्य स्थापित करने का प्रयास करता आ रहा हूँ, पर अभी तक इसमें सफल नहीं हो सका हूँ । आज मेरे और किसान के बीच में फर्क यह है कि वह स्वेच्छा से नहीं बल्कि हालातों की मजबूरी की वजह से किसान और मजदूर बना हुआ है, जबकि मैं स्वेच्छा से किसान और मजदूर बनना चाहता हूँ । जब मैं उसे भी स्वेच्छा से किसान और मजदूर बना सकूंगा तो उसे उन जंजीरों को भी तोड फेकने में सहायता दे पाउँगा जिनमें आज वह बँधा है और जिनके कारण वह अपने मालिक का हुक्म बजा लाने के लिए मजबूर है। गाँधी किसानों और जमींदारों के असामनता को पहचानते थे। इसीलिए जमींदारों और किसानों की एकता की बात भी करते थे । अगर भारतीय जमींदारों और किसानों के बीच असमानता और खाई पैदा नहीं हुई होती तो देश के हलात कुछ और होते । जिससे स्वधीनता आन्दोलन के प्रारूप में भी फर्क पडता। लाचारी नाम के एक प्रतिबन्धित लोकगीत में पं. राजकुमार उपाध्याय लिखते हैं
कहवाँ चौहान कहवाँ राणाप्रताप गइलै ।
धनिया के रोटी जिनके जीवन आधार हो ।
पहरूवै बिना लूट गइलिन।
भारत कै देवी झाँसी रनिया कहाँ गइलिन।
पिठिया पर बांधे आपन राजकुमार हो।
पहरूवै बिना लूट गइलिन।
देसवा के कारण केतने गइले काले पानी भइया।
फंसिया पर झूले भगत सरदार हो।
पहरूवै बिना लूट गइलिन।
प्रतिबंधित हिंदी कविताओं में स्वतन्त्रता युगीन फाँसी, कैदी और भगत सिंह, गाँधी और अन्य स्वतन्त्रता सेनानियों को रचना का आधार बनाया गया है। इसी प्रकार एक कैदी शीर्षक नाम से कविता है। जिसमें कैदी कहता है -
विद्रोहात्मक गया विचार मेरा भाषण हलका।
निरपराध की माँगा जाता मुझसे आज मुचलका।
दिया गया हाँ ! ठूँस जेल में जैसे चोर उचक्का।
यह व्यवहार देखकर उनका मैं ही हूँ भौचक्का।
इस पूरी कविता में कैदी देश में फैले न्याय व्यवस्था के हाथों हो रहे अन्याय को बयाँ कर रहा है। उसका जुर्म सिर्फ यहीं है कि वह सत्याग्रही सिपाही है ।
प्रतिबंधित हिंदी कविताओं में देश की आर्थिक बदहाली को सजगता और आक्रमकता से उकेरा गया है । जैसा की हम जानते हैं कि हिन्दी कविता भारतेंदु युग से प्रगतिवाद तक में देश की आर्थिक बदहाली, चाहें गरीबी के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया हो, या चाहें उत्पीडन के माध्यम से व्यक्त किया गया हो। लेकिन 1947 तक की कविताओं में आर्थिक मुद्दे प्रमुखता से रहे हैं। लेकिन प्रतिबंधित कविताओं में यह मुद्दा तीव्रता और आक्रमकता से अभिव्यक्त किया गया है। खद्दर कविता में अभिव्यक्ति इस प्रकार है-
लन्दन, लिवरपूल लाखों लंकाशायर औ,
मान मैनचेष्टर का धूल में मिलावेगा।
फिर से स्वदेशी व्यवसाय का प्रचार कर,
राष्ट्र की दरिद्रता को खद्दर मिटावेगा।
इन लेखकों को कोई बाहरी विचार या सिद्धांत से मुक्ति की उम्मीद नहीं है। वह भारत के संकट को स्वदेशी तौर-तरीके और विचार या सिद्धांत से हल करने का उम्मीद रखते हैं-
मैं प्रबल सत्याग्रही हूँ,
मृत्यु-पति भी चिर निरंतर
चूमता मेरे चरण द्वय ।
है भरा विष-प्यालियों में,
अमरता का कोष अक्षय।
इसीलिए गाँधी के प्रति प्रतिबंधित हिंदी कविताओं में आशा भरी नजरों से देखा गया है। ये कवि जहाँ भी अपनी निगाह ले जाते है, वहाँ उन्हें खून से लथपथ लाल रहे ही दिखती हैं। जो अंग्रेजी हुकूमत द्वारा उत्पीडन की निशानी है। ये किसी पशु-बल या अन्याय के प्यासे नहीं हैं, बल्कि इन्हें न्याय और सत्य ही इनको प्यारा है।
हिंदी साहित्य और कविता के इतिहास में शात्रीय रागों की उपेक्षा दिखता है। लेकिन प्रतिबंधित हिंदी कविताओं के कवियों ने अपनी रचनाओं में मुक्ति के गीत को शास्त्रीय रागों में भी गया है। हिंदी की स्वाधीनता आन्दोलन से पहले की कविताओं में निराला ने शास्त्रीय रगों को अपनी कविताओं में सचेतन रूप से इस्तेमाल किया है। रामचन्द्र शुक्ल ने कविता क्या है निबन्ध में रागों को भावों से जोडते हुए लिखा है कि कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है । राग से यहाँ अभिप्राय प्रवृति और निवृति के मूल में रहनेवाली अंतर् करणवृति से है । जिस प्रकार निश्चय के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रवृति या निवृति के लिए भी कुछ विषयों का बाह्य या मानस प्रत्यक्ष अपेक्षित होता है । यही हमारे रागों या मनोवेगों के जिन्हें साहित्य में भाव कहते हैं- विषय है। जब रामचंद्र शुक्ल ने कविता को सृष्टि के साथ मनुष्य का रागात्मक सम्बन्ध बताते हैं, तो अभिराम शर्मा, और प्रणयेश शर्मा ने राग केदार ध*ुवपद में भारतीय इतिहास के अतीत का सहारा लेते हुआ गाया कि -
भारत के बच्चे-बच्चे में, भर दे भाव महान ।...
प्राची-दिशी की हिलोर
पश्चिम का गहे छोर,
अन्य उभय दिशी को डोर-
खींचे धू*व तान-तान।
गूँज उठें मेरे गान।
पूरब की ओर अब स्वाधीनता की लहर थोडी ही दूर है। जब सबकी गति समान होगी कोई उच्च-नीच या भेद-भाव नहीं का भय नहीं रहेगा तो-
मन में है रट देश नाम की।
नाच रही नयनों में निशि दिन,
नवल घटा नयनाभिराम की मन में ...
नई सृष्टि के लिए भारत के जन-जन में लहर फैल रही है । देश में फैले अत्याचारों से देश की मिट्टी काली हो चुकी है। जहाँ श्रम और प्रकृति मिल कर देश को अब निर्मल बनाएँगे-
बहु बल धारे- देश हमारे ।
गंगा-यमुना-जल-
अविरल निर्मल,
अब क्रांति इन्हीं नदियों के आसपास है। जो प्रलय के लिए आतुर है। कवि उम्मीद से कहता है -
उठ रही कैसी प्रबल हिलोर!
अरे अरे वह देखो! देखो!! विकट क्रांति का छोर!
और हुकूमत को सावधान करता है कि विप्लववादियों से मत उलझो । यह आग है, तुम्हें झुलसा देंगे। जिन्हें रण में विश्वास है-
आमंत्रण आया वीरों! साजों रण के साज।
सुना दिया है सेनापति ने-
रुचिकर सिंह निनाद ।
चलो-चलो अब मर मिटने का,
ले संजीवन स्वाद।
इन कवियों के ह्रदय में पराधीनता के वजह से हलचल पैदा हो रही है । इसी पराधीनता के फलस्वरूप देश में अत्याचार फैला हुआ है ।
इन कवियों को मजदूर-किसान की व्यथाओं को अपनी रचनाओं में चित्रित करने के लिए भी प्रतिबंधित किया गया । लेकिन इन कवियों ने मजदूरों और किसानों की व्यस्थाओं को, अपनी रचनाओं में भरपूर जगह देने से परहेज नहीं किया है । लिखा की-
जर्जर मेरे टूटे फूटे
छप्पर में चूता है पानी।
किसी एक कोने में सिमटी,
खडी भीगती मेरी रानी।
इस कविता का शीर्षक विद्रोही किसान है। जिसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को कवि ने अपने कविता का कथ्य बनाया है । जहाँ एक तरफ बारिश से बच्चा जडा के मारे काँप रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके खेत और किसान है । इस कविता में तीनों ही ऋतुओं में किसान की स्थिति के बरक्स राजमहलों के निवासियों को भी दिखया गया है-
मैंने देखा राजमहल भी,
थाने और कचहरी देखें ।
इधर उधर बंदूक लिए कुछ,
आते-जाते प्रहरी देखे।
इस कविता के अध्ययन के बाद निराला की कविता वह तोडती पत्थर की याद आना सहज है। लेकिन इस कविता का कथ्य वह तोडती पत्थर से आगे जाता महसूस होता है । जिसमें थाने, कचहरी और मंदिर-मस्जिद भी है-
मंदिर देखे मस्जिद देखीं,
पंडित और मौलवी देखे ।
शांत और गम्भीर किन्तु कुछ,
आकुल बडे जोतिषी देखे।
इन सभी जगहों पर किसान को बेदर्दी और अपमान ही मिला । किसानों ने जहाँ तक देखा, वहाँ तक केवल पैसे की पूजा होते देखा था । इससे क्षुब्ध होकर किसान ने तथाकथित सभ्य-संस्कृतियों पर सवाल खडे किया। अंत में विद्रोही तेवर में कहता है कि, यह गीत जाकर महलो में सुना दो। इसी तरह से प्रहलाद पाण्डेय शशि ने मजदूरों की स्थिति का चित्र उकेरा है-
मेरे बच्चे-मेरे राजा,
पानी पी सो रहा रात भर।
सममुच भोर जरुर तुम्हें हम,
देंगे बेटा रोटी लाकर।
किसान की तरह मजदूर का परिवार भी दाने-दाने-दाने के लिए तरस रहा है, और एक तरफ धन-सम्पदा का वैभव है, तो दूसरी तरफ गरीबी। किसानों की गरीबी के आलम को दिखलाने के लिए देवनारायण द्विवेदी ने अपनी प्रतिबन्धित पुस्तक देश की बात में कानपुर और पटना के कलक्टरों के हवाले से लिखा है की कानपुर के सहकारी कलेक्टर मि. बार्ड ने कहा था -
I have calculated the cost of food of male at £ v.vw s. per annum, of a female £ v.| s. y d. and minor 18 s. 8 d.
मेरे हिसाब से एक पुरुष का वार्षिक खाने-पीने का खर्च 16 रु., स्त्री का 13 रु. 10 आना तीन पैसे और बालक का 9 रु. 5 आना 2 पैसे होता है ।
जहाँ के पूर्ण-व्यस्क आदमियों को दो वक्त खाने के लिए केवल तीन पैसे रोज मिलते हैं, वहाँ के लोगों के सुख-दुःख का अनुमान सहज ही किया जा सकता है। जरा बिहार के किसानों का हाल सुनिये। पटना के कलेक्टर ने कहा था कि, - जो किसान सात बीघा जमीन जोतता है, वह-
Can take one full meal insead of two
केवल एक वक्त पेटभर खा सकते हैं ।
गया के कमिश्नर ने लिखा था कि-
Forty percent of the population are insufficiently fed. चालीस सैकडा आदमी भरपेट नहीं खाते। किन्तु ये कथन आज से बहुत पहले के हैं। तब से अबकी दशा और भी अधिक बुरी है। ध्यान रहे यहाँ देवनारायण द्विवेदी 1870 से 1890 की बात कर रहे हैं। लेकिन जब अबकी स्थिति के तरफ इशारा करते है तो, उनका इशारा 1928-29 ई. की स्थिति की तरफ होता है। लेकिन प्रतिबंधित हिंदी कवियों ने इन जुल्मों को अपना बनाया और लिखा-
इसे भूलना मत ओ जालिम!
जुल्मी बार-बार हैं मरते।
एक बार-बस एक बार ही
वीर मौत से खेला करते
इसके बाद ये कवि अपने वीरों लाला लाजपत राय, सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह को याद करते हुए। वे जालियांवाला बाग जैसी नृशंस हत्याओं को भी नहीं भूलते।
प्रतिबंधित हिंदी कविताओं कथ्य जुल्मों के दौर में साहस और उम्मीदों के आधार पर बुनी गई है । जब देश में स्त्री-पुरुष, बच्चे-जवान और बूढे सब पीडित हैं। इनके लिए तीनों ही ऋतुएँ उत्पीडन की ऋतुएँ हैं। जिस बसंत में होली जैसा त्यौहार, जो हंसी-खुशी का और मिलन का त्यौहार है। उसी होली को प्रतिबंधित कवि प्रश्नांकित करते हैं, और पूछते हैं कैसे आज मनाऊं होली? जब -
हम भूखे कंकाल, हमारी,
हड्डी पर सत्ता का नर्तन ।
हाहाकारों की लपटों में,
होता भस्म हमारा जीवन।
गरीबी और भूखमरी से जनता एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत से उत्पीडित है। वहीं दूसरी तरफ सम्प्रदायिक ताकतों ने भी अपना पैर फैला दिया। जिससे उन्हें अनेक स्तरों पर संघर्ष करना पड रहा है। जर्मन कवि ब्रेख्त ने 1936 के आसपास एक कविता अगली पीढी के लिए लिखी। जिसमें उन्होंने लिखा कि सचमुच मैं अन्धेरे युग में जी रहा हूँ। इस पंक्ति को सामने रख जब हम प्रतिबंधित कविताओं का अध्ययन करेंगे तो यही पाएँगे कि 1947 के पहले का भारतीय समाज और रचनाशीलता सचमुच अँधेरे से उजाले के लिए संघर्ष कर रही था।
सन्दर्भ
1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, कमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ - 438
2. निबन्धों की दुनिया, डॉ. रामविलास शर्मा, प्र. सम्पा. निर्मला जैन, सम्पा. रामेश्वर राय, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ - 50
3. Access date – ®x.®}.w®w®, http://kavitakosh.org/kk/%E®%Ay%~z%E®%Ay%BF%E®%Ay%B®%E® %Ay%Ax_/_%E®%Ay%~C%E®%Ay%AF%E®%Ay% B{%E®%Ay%}w%E®%Ay%~z%E® %Ay%B®_%E®%Ay%AA%E®%Az%}D %E®%Ay%B®%E®%Ay%B}% E®%Ay%BE%E®%Ay%A{
4. क्रिस हरमन, विश्व का जन इतिहास, अनु. लाल बहादुर वर्मा, संवाद प्रकाशन, मेरठ, पृष्ठ, 331
5. भूमिका से, रुस्तम राय, प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य भाग- दो, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
6. समर्पण खून के छीटे से, बलभद्रप्रसाद गुप्त विशारद रसिक, खून के छीटे रुस्तम राय (सम्पा.), राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली
7. मैनेजर पाण्डेय, आलोचना की समाजिकता, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठः 22
8. बलभद्रप्रसाद गुप्त विशारद रसिक, खून के छीटे रुस्तम राय (सम्पा.), राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ : 13
9. वहीं, पृष्ठ- 14
10. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला , रामविलास शर्मा (सम्पा.), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ : 80
11. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ : 20
12. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, रामविलास शर्मा (सम्पा.), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ र्50
13. बलभद्रप्रसाद गुप्त विशारद रसिक, खून के छीटे रुस्तम राय (सम्पा.), राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ : 11
14. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ : 72
15. बलभद्रप्रसाद गुप्त विशारद रसिक, खून के छीटे रुस्तम राय (सम्पा.), राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ : 15
16. Access date – ®x.®}.w®w®, http://kavitakosh.org/kk/%E®%Ay%AD%E®%Ay%BF%E®%Ay%~z%E®%A
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v7. बलभद्रप्रसाद गुप्त विशारद रसिक, खून के छीटे रुस्तम राय (सम्पा.), राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ - 22
18. मोहनदास करमचंद गाँधी, सत्य के प्रयोग, पृष्ठ 440 Pdf, mkgandhi.org/ebks/hindi/gandhi-autobiography-hindi.pdf
19. बलभद्रप्रसाद गुप्त विशारद रसिक, खून के छीटे रुस्तम राय (सम्पा.), राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ -30
20. मोहनदास करमचंद गाँधी, महात्मा के विचार, खेतिहर किसान, श्रम, भाग 8 Pdf, https://www.mkgandhi.org/ebks/hindi/Mahatma-Gandhi-ke-Vichaar.pdf
21. पं. राजकुमार उपाध्याय वैद्य, लाचारी, रुस्तम राय सम्पा, प्रतिबंधित हिंदी साहित्य, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ : 263
22. बलभद्रप्रसाद गुप्त विशारद रसिक, खून के छीटे रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, भाग 2 राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ -32
23. वहीं, पृष्ठ : 33
24. प्रह्लाद पाण्डेय शशि, विद्रोहिणी, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, भाग 2 राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ र्158
25. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ग्रन्थावली भाग 3, ओमप्रकाश सिंह (सम्पा.), प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, पृष्ठ-54
26. अभिराम शर्मा, प्रणयेश शर्मा, मुक्ति संगीत, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, भाग 2 राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ 85

27. वहीं, पृष्ठ : 86
28. वहीँ, पृष्ठ : 87
29. वहीं, पृष्ठ र्88
30. वहीँ, पृष्ठः 94
31. प्रहलाद पाण्डेय शशि, तूफान, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, भाग 2 राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ र्215
32. वहीं, पृष्ठः 216
33. वहीं, पृष्ठ : 221
34. देवनारायण द्विवेदी, देश की बात, मैनेजर पाण्डेय(सम्पा), स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ : 85
35. प्रहलाद पाण्डेय शशि, तूफान, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, भाग 2 राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ -209
36. वहीं, पृष्ठ : 237
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