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राष्ट्र : स्वराज्य का कथात्मक महासमर

कमलकिशोर गोयनका
प्रेमचंद के जन्म से लेकर उनके देहान्त (1880-1936) तक का समय राजनीतिक हलचलों, स्वराज्य आंदोलन तथा साम्राज्यवादी अंग्रेजी सत्ता के क्रूर एवं भयानक अत्याचारों से भरा था। भारत के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम (1857) के बाद अंग्रेजों के अंकुश, दमन एवं अत्याचार में वृद्धि होती गई, लेकिन उपनिवेशिक शक्तियों के इस भारत-विरोधी कुशासन के बावजूद देश में एक नवजागरण की लहर उत्पन्न हुई और स्वदेशी, स्वराज्य, स्वाधीनता तथा आत्म-बिंब की तलाश की प्रवृत्ति तीव्र होती गईं। स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश (1883) में लिखा, कोई कितना ही कहे, परंतु स्वदेशीय राज्य सर्वोपरि होता है। अंग्रेजी शासन के साथ ईसाई मिशनरियों के आतंकपूर्ण धर्म-प्रचार एवं धर्मांतरण की भी भारतीय जनता में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। ह्यूम ने 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की और वह धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय संस्था बनती चली गई। रूस-जापान युद्ध में रूस की हार और जापान की जीत, तथा अंग्रेजों की बंग-भंग योजना ने राजनीतिक चेतना का तीव्रता से विकास किया। बंग-भंग ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग एवं बायकाट के अर्थ में गुणात्मक परिवर्तन कर दिया, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारतीय जनता के शक्तिशाली आधार बने। इधर आनंदमठ (1882) के वंदेमातरम् गीत ने बंगाल के साथ पूरे देश में देश-भक्ति एवं स्वाधीनता की आकांक्षा को तीव्र किया और सन् 1947 तक वह देश के स्वाधीनता-संग्राम का राष्ट्रगीत बना रहा। रवींद्रनाथ ठाकुर ने सन् 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में मंच से इसका पहली बार गायन किया। देश में जन-जागरण, राष्ट्र-भाव, देश-भक्ति तथा स्वराज्य का भाव अनेक सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं तथा राष्ट्र-नायकों ने किया और जब प्रेमचंद ने बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में अपना लेखन शुरू किया तो उनके सामने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष का आधी शताब्दी से भी अधिक का इतिहास था और भारतेंदु युग एवं द्विवेदी युग की परिस्थितियाँ तथा साहित्यिक प्रवृत्तियाँ थीं। उनके समय में देश में पूर्व-पश्चिम का द्वंद्व तथा पश्चिम के सभी राजनीतिक-दार्शनिक आदि विचार आ रहे थे और प्रजातंत्र, अधिनायकवाद, लोकशाही, साम्राज्यवाद, गाँधीवाद, समाजवाद आदि विभिन्न सत्तात्मक प्रणालियाँ भी सामने घटित हो रही थी। प्रेमचंद इन सभी के बीच से गुजर रहे थे और अपने राजनीतिक चिन्तन में युग के अनुरूप आगे बढते जा रहे थे। उनकी कुछ उक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत हैं जो उनके राजनीतिक दर्शन के विविध रूपों तथा उनमें परिवर्तनशीलता को उद्याटित करते हैं -
1. महारानी (विक्टोरिया) दया की भंडार थीं। रहमदिली और हमदर्दी उनकी घुट्टी में पडी थी।... महारानी का स्वभाव बहुत स्नेहशील था। विद्वानों और कलाकारों का आदर करना उनके स्वभाव का अंग था। उन्होंने रिआया के दिलों में घर कर लिया था। (जमाना, अगस्त, 1905 में प्रकाशित लेख महारानी विक्टोरिया की जीवनी से प्रेमचंद : विविध-प्रसंग-खंड-1, पृष्ठ 45-19)
2. खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे दुनिया की सबसे अनमोल चीज है। (दुनिया का सबसे अनमोल रतन, सोजेवतन, जून 1908 में प्रकाशित तथा प्रेमचंद : कहानी रचनावली, खंड-1, पृष्ठ 76 पर संकलित)
3. अब हिंदुस्तान के कौमी खयाल में हुब्बेवतन (देश-प्रेम) के जज्बात लोगों के दिलों में उभरने लगे हैं। ये चंद कहानियाँ इसी असर का आगाज (आरंभ) है। हमारे मुल्क को ऐसी किताबों की अशद (सख्त) जरूरत है, जो नई नस्ल के जिगर पर हुब्बेवतन (देश-प्रेम) की अजमद (महिमा) का नक्शा जमाए। (सोजेवतन, जून, 1908 की भूमिका से, संकलित प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, खंड-2, पृष्ठ 329)
4. महात्मा गाँधी के पर्दापण से राष्ट्रीय जीवन में एक विचित्र स्फूर्ति और सजीवता का विकास हो गया है। (कर्मवीर गाँधी की भूमिका से, सन् 1916, डॉ. रामदीन गुप्त की पुस्तक प्रेमचंद और गाँधीवाद, पृष्ठ 111 पर उद्धृत)
5. मैं अब करीब-करीब वोल्शेविक उसूलों का कायल हो गया हूँ। (मुंशी दयानारायण निगम को 21 दिसंबर, 1919 को लिखे पत्र से, प्रेमचंद : पत्रकोश, पृष्ठ 216)
6. प्रेमचंद ने अपने उर्दू लेख पुराना जमाना : नया जमाना (जमाना, फरवरी, 1919) में रूसी क्रांति की प्रशंसा की, किंतु निर्बलों और अनाथों की हिमायत के दावे को खारिज करते हुए लिखा, जनतंत्र का यह नया पहलू अपनी भौगोलिक परिधि के बाहर निकलकर निर्बलों और अनाथों की हिमायत करेगा या पूँजीपति राष्ट्र की बनिस्पत अ-राष्ट्रों के साथ ज्यादा इंसानियत और हमदर्दी का बर्ताव करेगा, शायद गलत साबित हो। उसे राजसिंहासन और स्वर्ण मुकुट से प्रेम नहीं, लेकिन राजकीय अधिकार-भावना और राज्य-संचालन की वासना से वह भी मुक्त नहीं। बहुत संभव है कि अ-राष्ट्रों पर जनतंत्र का अत्याचार पूँजीपतियों से कहीं अधिक घातक सिद्ध हो। जब कुछ थोडे से पूँजीपतियों की स्वार्थपरता दुनिया को उलट-पलटकर रख दे सकती है तो एक पूरे राष्ट्र की सम्मिलित स्वार्थपरता क्या कुछ न कर दिखाएगा। वह भी जत्थेबंदी की एक सूरत है, ज्यादा ठोस। (प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, खंड-1, पृ. 265-66)
7. मैं उनका (महात्मा गाँधी) का चेला हो गया। चेला तो उसी समय हुआ, जब वह गोरखपुर आए थे। दुनिया में मैं महात्मा गाँधी को सबसे बडा मानता हूँ। उनका भी उद्देश्य यही है कि मजदूर और काश्तकार सुखी हो, वह इन लोगों को आगे बढाने के लिए आंदोलन मचा रहे हैं। मैं लिखकर उनको उत्साह दे रहा हूँ। महात्मा गाँधी हिंदू-मुसलमानों की एकता चाहते हैं, तो मैं भी हिंदी और उर्दू को मिला करके हिंदुस्तानी बनाना चाहता हूँ। (प्रेमचंद : घर में, शिवरानी देवी, पृष्ठ 94)
8. मैं किसी पार्टी में नहीं हूँ, इसलिए कि दोनों में कोई पार्टी (गरम दल एवं नरम दल) कुछ अमली काम नहीं कर रही है। मैं तो उस आनेवाली पार्टी का मेंबर हूँ जो कोतुहुन्नास (साधारण जन) की सियासी तालीम को अपना दस्तूर-उल-अमल बनाए। (मुंशी दयानारायण निगम को 17 फरवरी, 1923 को लिखे पत्र से, प्रेमचंद पत्रकोश, पृष्ठ 241)
9. एक समय था जब साम्यवाद निर्बल राष्ट्रों को आशा से आंदोलित कर देता था। सारे संसार में जब प्रजावाद की प्रधानता हो जाएगी, फिर दुःख या पराधीनता या सामाजिक विषमता का कहीं नाम भी न रहेगा। साम्यवाद से ऐसी ही लंबी-चौडी आशाएँ बाँधी गई थीं, मगर अनुभव यह हो रहा है कि साम्यवाद केवल पूँजीपतियों पर मजदूरों की विजय का आंदोलन हैं, न्याय के अन्याय पर, सत्य के मिथ्या पर, विजय पाने का नाम नहीं। यह सारी विषमता, सारा अन्याय, सारी स्वार्थपरता जो पूँजीवाद के नाम से प्रसिद्ध है, साम्यवाद के रूप में आकर अणु मात्र भी कम नहीं होगी, बल्कि उससे और भी भयंकर हो जाने की संभावना है। (स्वदेश, गोरखपुर, 18 मार्च, 1928 के अंक में प्रकाशित लेख राज्यवाद और साम्राज्यवाद से, इसे कमल किशोर गोयनका ने दस्तावेज में प्रकाशित कराया, अभी असंकलित है।)
10. धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। यह जरूर चाहता हूँ कि दौ-चार ऊँची कोटि की पुस्तकें लिखू, पर उनका उद्देश्य भी स्वराज्य-विजय ही है। (बनारसीदास चतुर्वेदी को 3 जून, 1930 को लिखे पत्र से, प्रेमचंद : पत्रकोश, पृष्ठ 367)
vv. My whole career has been devoted to politics. I have been dabbling in politics for the last thirty years, although not directly. All my words have a political bearing. How can I eschew politics now?...my wife is a whole hogger and has just got six weeks S.I. for picketing. (आनंदराव जोशी की लिखे 26 नवंबर, 1930 के पत्र से, प्रेमचंद : पत्रकोश, पृष्ठ 21)
12. महात्मा गाँधी क्यों भारत के हृदय पर राज्य कर रहे हैं? इसलिए कि वह इस विकल जाग्रति के जीते-जागते अवतार हैं । वह भारत के सत्य, धर्म, नीति और जीवन के सर्वोत्तम आदर्श हैं। (हंस, मई, 1930 में प्रकाशित दमन शीर्षक लेख से)
13. महात्मा गाँधी क्रांति नहीं चाहते और न क्रांति से आज तक किसी जाति का उद्धार हुआ है। (हंस, जून 1931 में प्रकाशित लेख देश की वर्तमान परिस्थिति से, प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 78)
14. महात्मा जी ने राजनीति को उसकी गंदगियों से पाक कर दिया है। उनकी राजनीति और धर्मनीति दोनों एक हैं। (हंस, सितंबर, 1931 में प्रकाशित लेख महात्मा जी की विजय-यात्रा से, प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 80)
15. महात्मा गाँधी देवता हैं। सारा भारत उनकी पूजा करता है। (जागरण, 7 अगस्त, 1933 में प्रकाशित लेख भविष्य से)
16. कम्यूनिज्म और फासिज्म का अस्तित्व इसलिए नहीं है कि उनके पीछे सैनिक शक्ति है, बल्कि इसलिए कि वे प्रजाहित को ही अपना आधार बनाए हुए हैं। ज्यों ही वे इस आदर्श से गिर जाएँगे, जनता फिर चंचल हो जाएगी, और फिर दूसरी तरह इस समस्या को हल करने की चेष्टा करेगी। (जागरण, 21 अगस्त, 1933 में प्रकाशित लेख भारत 1983 से, प्रेमचंद विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 198)
17. प्रेमचंद ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि, उनका कम्यूनिज्म गाँधी, इंग्लैंड या रशियन कम्यूनिज्म की तरह का नहीं है। क्यों भला मेरा कम्यूनिज्म इस प्रकार का हो? हमारे समाज में जमींदार, साहूकार, यह किसान का शोषण करनेवाला समाज बिलकुल रहेगा ही नहीं। (मराठी लेखक श्री रा. टिकेकर को मुंबई में दिसंबर, 1934 में दिए इंटरव्यू से, प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, खंड-1, पृष्ठ 308)
18. स्वराज्य कत्ल, खून से नहीं मिलता; त्याग, तप और आत्म-शुद्धि से मिलता है। यह समझ लो, जो स्वराज्य कत्ल व खून से मिलेगा, वह कत्ल व खून पर ही कायम रहेगा। अवाम की कोशिश से जो स्वराज्य मिलेगा, वह मुल्क की चीज होगी, अफराद (जनता) की चीज होगी और थोडे से आदमियों का एक गिरोह तलवार के जोर से इंतजाम न करेगा। हम अवाम का स्वराज्य चाहते हैं, कत्ल व खून की ताकत रखनेवाले गिरोह का नहीं। (कातिल की माँ, मार्च, 1935 से प्रकाशन प्रारंभ होने वाले उर्दू कहानी-संग्रह वारदात से प्रेमचंद : कहानी रचनावली, खंड-6, पृष्ठ 485-86)
19. अब एक नई सभ्यता का सूर्य सुदूर पश्चिम में उदय हो रहा है, जिसने इस नाटकीय महाजनवाद या पूँजीवाद की जड खोदकर फेंक दी है। धन्य है वह सभ्यता, जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है और जल्दी या देर से दुनिया उसका अनुसरण अवश्य करेगी। (महाजनी सभ्यता, हंस, सितंबर 1936, प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, खंड-2, पृष्ठ 595-602)
20. आपको ईश्वर ने सेवा और त्याग के लिए रचा है। वहीं आपका क्षेत्र है।... मैं सब कुछ सह लूँगी, पर आपको देवत्व के ऊपरी आसन से नीचे न गिराऊँगी।...आप मनुष्य हैं। आप में भी इच्छाएँ हैं, वासनाएँ हैं, लेकिन इच्छाओं पर विजय पाकर ही आपने यह ऊँचा पद पाया है। उसकी रक्षा कीजिए और अध्यात्म ही आपकी मदद कर सकता है। उसी साधना से आपका जीवन सात्विक होगा और मन पवित्र होगा। (प्रेमचंद की अंतिम कहानी रहस्य से, हंस, सितंबर 1936)
ये प्रेमचंद के राजनीतिक चिन्तन के बिखरे सूत्र हैं, लेकिन उनके विचारों में होने वाले परिवर्तन के साथ स्वराज्य एवं लोक-मंगल के प्रति दृढता की चेतना भी स्पष्ट होती है। उनका राजनीतिक दर्शन उनके लेखों, पत्रों, संपादकीयों आदि के साथ उनकी कहानियों एवं उपन्यासों में व्यापकता के साथ चित्रित हुआ है। प्रेमचंद ने यद्यपि अपने साहित्य में समाज, धर्म, अर्थ, संस्कृति, इतिहास, गाँव और शहर आदि अनेक विषयों का व्यापकता से चित्रण किया है, परंतु सभी का मूल है-विदेशी एवं देशीय दासता से मुक्ति और स्वराज्य की स्थापना । वे इस राजनीतिक दर्शन को अनेक बार तथा अनेक रूपों में स्पष्ट करते हैं। उनके लेखों, संपादकीयों, पत्रों आदि में देश की वर्तमान और भविष्य की राजनीति का चित्र मिलता है वे आरंभ में एक पुस्तक समीक्षा में रानी विक्टोरिया के व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हैं, किंतु वे भारत में उनके शासन पर मौन रहते हैं, अर्थात् वे ब्रिटिश शासन के समर्थक नहीं हैं, बल्कि उनका आलोचक रूप तथा देश-भक्ति और राष्ट्रप्रेम का लेखकीय व्यक्तित्व अति शीघ्र सामने आता है। सोजेवतन (जून, 1908) की देश प्रेम की कहानियाँ तथा उस पर सरकारी कलेक्टर की फटकार उनकी उत्कट राष्ट्रीय चेतना को उजागर करती है। प्रेमचंद ने अपने जीवन-सार लेख में लिखा भी है, उस समय बंग-भंग का आंदोलन हो रहा था। कांग्रेस में गरम दल की सृष्टि हो चुकी थी। इन पाँचों कहानियों में देश-प्रेम की महिमा गाई गई है। प्रेमचंद इस राष्ट्र-बोध तथा राष्ट्र प्रेम के कारण ही वे गाँधी के दर्शन तथा आंदोलन से जुडते हैं और वे वर्ष 1916 में उनके राष्ट्रीय जीवन में पदार्पण करने तथा व्यावहारिक राजनीति का मार्ग दिखाने के कारण उनकी प्रशंसा करते हैं ।
प्रेमचंद के राजनीतिक विचारों की दृष्टि से बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में प्रकाशित उनके दो लेख स्वदेश का संदेश (स्वदेश प्रवेशांक, वसंत पंचमी, 1975 वि.) तथा पुराना जमाना : नया जमाना (जमाना, फरवरी, 1919) बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें वे स्वराज्य, स्वदेशी, स्वाधीनता, स्वशासन, रूसी क्रांति आदि कई विषयों पर अपने विचार प्रकट करते हैं। स्वदेश के प्रथम अंक में प्रेमचंद ने लिखा कि नए युग में प्रजातंत्र का विस्तार एवं जनता के अधिकारों में वृद्धि हुई है और हिंदुस्तान का उद्धार हिंदुस्तान की जनता पर निर्भर है।1 उन्होंने अपने लेख पुराना : नया जमाना में लिखा कि नए जमाने ने बेजवानों को वाणी दी है और यह किसानों-मजदूरों का जमाना है और उनके बिना स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। वे लिखते हैं, आप स्वराज्य की हाँक लगाइए, सेल्फ गवर्नमेंट की बात कीजिए, कौंसिलों को विस्तार देने की मांग कीजिए, जनता को इन चीजों से कोई मतलब नहीं, क्योंकि कोई कारण नहीं कि वह दूसरे देश के हाकिमों के मुकाबले में आपकी हुकूमत को ज्यादा पसंद करे।2 लगभग इसी समय गाँधी असहयोग आंदोलन शुरु करते हैं, तो प्रेमचंद पूर्णतः गाँधी के अनुयायी बन जाते हैं। ये स्वयं को गाँधी का चेला कहते ही हैं। वे लिखते हैं कि, असहयोग पर भारत की राष्ट्रीयता की छाप लग गई है और उसने ही रक्तमय अशांति को काबू किया है।3 प्रेमचंद इसी समय स्वराज्य के फायदे शीर्षक लेख लिखते हैं, जो पुस्तकाकार रूप में आषाढ, संवत् 1978 अर्थात् जून, 1921 में छपा था। प्रेमचंद लिखते हैं कि हमारे पूर्वजों में श्रीरामचंद्र जैसे पराक्रमी, महात्मा श्रीकृष्ण जैसे ज्ञानी, महात्मा बुद्ध जैसे त्यागी, महाराणा विक्रम जैसे प्रतापी, महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे रणधीर, बादशाह अकबर जैसे प्रजा-भक्त, गुरु वशिष्ठ जैसे आत्मदर्शी हो गए हैं। हम लोग उन्हीं की संतान हैं, अतः हममें बल, बुद्धि, विद्या लुप्त नहीं हो सकती और भीष्म एवं अर्जुन के नाम पर जान देने वाले इतने बलहीन, इतने कर्महीन नहीं हो सकते। हम स्वराज्य से भारत को उसी उन्नत दशा तक पहुँचा सकते हैं। स्वराज्य पाकर हम अपनी आत्मा को पा जाएँगे, हमारे धर्म का उत्थान हो जाएगा, अधर्म का अँधकार मिट जाएगा और ज्ञान-भास्कर का उदय होगा।4 प्रेमचंद आगे भी महात्मा गाँधी तथा उनके राजनीतिक दर्शन एवं कार्यक्रमों की चर्चा करते हैं और उसे ही अहिंसा से स्वाधीनता प्राप्त करने के मार्ग की घोषणा करते हैं। हंस के प्रवेशांक (मार्च, 1930) में वे लिखते हैं कि, कर्णाधार महात्मा गाँधी ने ही स्वाधीनता की वृत्ति जाग्रत की है और इस संग्राम में हम एक दिन विजयी होंगे। भारत ने शांतिमय समर की भेरी बजा दी है और हंस मानसरोवर की शांति छोडकर, अपनी नन्ही-सी चोंच में चुटकी-भर मिट्टी लिए हुए, समुद्र पाटने आजादी के जंग में योग देने चला है । वे डोमिनियन स्टेट नहीं, स्वराज्य चाहते हैं, क्योंकि स्वराज्य गरीबों की आवाज है, डोमिनियन गरीबों की कमाई पर मोटे होनेवालों की।5 इसी कारण वे मानते हैं कि हमारी लडाई अंग्रेज सत्ताधारियों के साथ हिंदुस्तानी सत्ताधारियों के साथ भी है, क्योंकि इस लडाई को कुचलने में दोनों मिल जाएंगे।1 यह युग स्वराज्य का है, जनता एकाधिपत्य को सहन नहीं कर सकती, चाहे वह स्वदेशी ही क्यों न हो।2 यह डेमोक्रेसी का युग है, निरंकुशता की जडें खोखली होती जा रही हैं।3 प्रेमचंद लिखते हैं कि महात्मा गाँधी क्रांति नहीं चाहते और आज तक किसी जाति का क्रांति से उद्धार नहीं हुआ है। गाँधी के मार्ग से हम क्रांति की भीषणता के बिना ही क्रांति के लाभ प्राप्त कर सकते हैं। और जो लोग क्रांति-क्रांति की दुहाई देते हैं और हिंसा का पुट देकर देश में जो आग लगाना चाहते हैं, उसका परिणाम अच्छा न होगा।4 वे कहते हैं कि महात्मा जी की राजनीति और धर्मनीति दोनों एक हैं और उन्होंने राजनीति को गंदगियों से पाक कर दिया है।5 गाँधी का आंदोलन एक राष्ट्रीय आंदोलन है। यह भारतीय आत्मा के स्वाधीनता प्रेम की विकल जागृति है और महात्मा गाँधी उसके जीते-जागते अवतार, हैं। प्रेमचंद अंग्रेजों की भेद-नीति से क्षुब्ध हैं, क्योंकि वे देश की एकता और स्वराज्य आंदोलन को तोड देना चाहते हैं, जबकि कांग्रेस जन-सत्ता चाहती है, विभिन्नता में एकता चाहती है, निर्धनता एवं भेदभाव मिटाना चाहती है तथा पश्चिमी सभ्यता की कृत्रिमताओं को मिटाकर उस पर भारतीयता की छाप लगाना चाहती है।7
प्रेमचंद हिंसा-अहिंसा, समाजवाद, साम्यवाद आदि पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं और उनकी तुलनात्मक व्याख्या भी करते हैं। वे सन् 1919 में वोल्शेविक उसूलों के कायल होने का उल्लेख करते हैं, किंतु उन्हें कभी व्यावहारिक रूप नहीं देते हैं और उनके प्रति अपना विरोध प्रकट करते हैं। उन्होंने हंस, जून, 1931 में लिखा, हिंसा का भूत हमारे सिर सवार हुआ और हमारा सर्वनाश हुआ। केवल मौखिक अहिंसा से काम नहीं चल सकता। हमें मनसा, वाचा, कर्मणा अहिंसा का अनुयायी होना पडेगा।8 वे चाहते हैं कि किसान महात्मा गाँधी के इस मार्ग पर चलें और उन्हें ही सच्चा नेता मानें। गरीबों और विचलितों का, महात्मा जी से बडा शुभचिंतक संसार में दूसरा नहीं है। प्रेमचंद हंस, दिसंबर, 1931 में लिखते हैं, हिंसा से हिंसा और अहिंसा से अहिंसा उत्पन्न होती है। यह धज्ुव सत्य है।9 वे समाजवाद का समर्थन करते हैं। बीसवीं सदी को सोशलिज्म की सदी कहते हैं, क्योंकि भारत जैसे गरीबों के देश का कोई दूसरा आदर्श नहीं हो सकता। इसलिए वे स्वराज्य का अर्थ आर्थिक स्वराज्य लेते हैं। वे यहाँ तक कहते हैं कि जो समाजवाद का समर्थक नहीं, वह हिंदू नहीं है। समाजवाद चाहता है कि सभी को समान रूप से शिक्षित होने और काम करने का अवसर मिले, सभी काम बराबर समझे जाएँ, सभी प्रेम एवं शांति के साथ जीवित रहें।1 वे गाँधी और नेहरू के सोशलिज्म में अंतर करते हैं। गाँधी सोशलिज्म से भी आगे बढे हुए हैं, कम्युनिज्म से भी, वह अपरिग्रहवादी हैं। जवाहरलाल नेहरू विचार से हैं, व्यवहार से नहीं, जैसे प्रायः सभी कांग्रेसमैन हैं।2 प्रेमचंद स्वयं को कम्यूनिस्ट कहते हैं, पर वे गाँधी, रूस आदि की तरह के नहीं हैं। वे 22 मई, 1933 को जागरण में रूस पर लिखते हैं, साम्राज्य-लिप्सा इस समय हमारी इच्छा का केंद्र है। साम्राज्य विरोधी रूस भी चाहता है कि जमाना सोवियत हो जाए। उसे विचार का साम्राज्य चाहिए।3 वे एक समय प्रजाहित के कारण हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन का समर्थन करते हैं, किंतु कुछ समय बाद वे मान लेते हैं कि रूस का पूँजीवाद पर विजय का विश्वास हमारा भ्रम था और उसे समाजवादी डिक्टेटरशिप कहते हैं।5 प्रेमचंद जागरण के 21 अगस्त, 1933 के अंक में यहाँ तक घोषणा करते हैं कि कम्यूनिज्म के प्रजा-विरोधी होने पर जनता उसे बदलकर नई व्यवस्था कायम कर लेगी, लेकिन साम्यवाद के संबंध में इस मोह-भंग के बावजूद यह प्रश्न बना रहता है कि उन्होंने महाजनी सभ्यता लेख (हंस, सितंबर, 1936) में रूसी क्रांति का समर्थन क्यों किया? वे बार-बार लिखते हैं, मैं वर्ग-संघर्ष, लाल क्रांति, श्रेणियों में संघर्ष नहीं चाहता, क्योंकि यह संभव है कि क्रांति से हम बुरी डिक्टेटरशिप पर पहुँचें जिसमें रंच-मात्र व्यक्ति-स्वाधीनता न हो । प्रेमचंद उस समय अस्वस्थ थे और हंस के सरस्वती प्रेस में न छपाकर दिल्ली के सस्ता साहित्य मंडल से मुद्रित कराकर पचास रुपये बचाने के गाँधी के निर्णय से बहुत आहत होते हैं। वे 27 जुलाई, 1936 को अख्तर हुसेन रायपुरी को पत्र में लिखते हैं, मुफ्त में सरमग्जी, बनियों के साथ काम करके शुक्रिये की जगह यह सिला मिला कि तुमने हंस में ज्यादा रुपया सर्फ कर दिया। इसके लिए मैंने दिलोजान से काम किया। बिलकुल अकेला, अपने वक्त और मेहनत का इतना खून किया, इसका किसी ने लिहाज न किया। मैंने हंस उन लोगों को इस खयाल से दिया था कि वह मेरे प्रेस में छपता रहेगा और मुझे प्रेस की जानिब से गूना बेफिक्री रहेगी और इस तबादले में परिषद् को अंदाजन पचास रुपये महीने की बचत हो जाएगी। मैं भी खुश हूँ। हंस जिस लिट्रेचर का इशाअत कर रहा था, वह हमारा लिटरेचर नहीं है, वह तो यह भक्तिवाला महाजनी लिट्रेचर है जो हिंदी जबान में काफी है।1 इस पत्रांश में महाजनी-सभ्यता लेख की पृष्ठभूमि देखी जा सकती है। प्रेमचंद लेख में महाजनी-सभ्यता के सिद्धांतों, दुर्बलताओं एवं अमानवीयता की चर्चा करते हैं और नई सभ्यता की विशेषताओं का वर्णन करते समय वे जिन मानवीय गुणों तथा दुष्प्रवृत्तियों के नाश की कल्पना करते हैं, वे सब दिवा-स्वप्न बनकर रह जाती हैं। रूस के पतन और चीन के परिवर्तन ने रूसी क्रांति के अंधकार को चीरकर उजाला फैलाने के प्रेमचंदीय स्वप्न को नष्ट कर दिया है। प्रेमचंद यदि होते तो स्वयं ही अपनी आँखों से इस सत्य को देखते।
प्रेमचंद के सर्जनात्मक साहित्य में-उपन्यास और कहानियों में उनके राजनीतिकदर्शन का विपुलता एवं प्रबलता के साथ उद्घाटन हुआ है, बल्कि यह कहना उचित होगा कि उनके विचारों तथा कथात्मक कृतियों में एकरूपता मिलती है। प्रेमचंद का उर्दू कहानी-संग्रह सोजेवतन (जून, 1908) उनकी राजनीतिक चेतना की बुनियाद है, जिसने देशभक्ति, राष्ट्रीयता और स्वाधीनता को उनके साहित्य की मुख्यधारा बना दिया। प्रेमचंद का देश-प्रेम अंग्रेजी सत्ता के लिए राजद्रोह था और इसके लिए उन्हें दंडित होना पडता है। इसके बाद उन्होंने सामाजिक एवं ऐतिहासिक कहानियाँ लिखीं। इतिहास के कथा-प्रसंगों से उन्होंने वीरता, त्याग, न्याय, बलिदान, देश-भक्ति आदि मानवीय गुणों के चित्रण से देशवासियों में अतीत के प्रति गौरव का भाव उत्पन्न किया। गाँधी की प्रेरणा से उन्होंने जब सन् 1921 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया, तो उन्होंने लाल फीता (जुलाई, 1921) कहानी लिखी, जो अंग्रेजों की भारत-विरोधी नीति एवं हिंदुस्तानी अफसरों पर अंकुश को उद्घाटित करती है। इसके पश्चात् उनका उपन्यास प्रेमाश्रम (जनवरी, 1922) प्रकाशित हुआ और उसमें प्रेमचंद ने गाँधी के ट्रस्टीशिप, हृदय-परिवर्तन, अहिंसात्मक सुधार, राम-राज्य, जमींदारी उन्मूलन आदि का मार्ग प्रशस्त किया। प्रेमाश्रम के उपरांत स्वत्व-रक्षा (जुलाई, 1922), चकमा (नवंबर, 1922), परीक्षा (जनवरी, 1923), सत्याग्रह (दिसंबर, 1923), शतरंज के खिलाडी (अक्टूबर 1924) आदि कहानियाँ प्रकाशित हुई, जिनमें अपने अधिकार, अस्मिता और प्रतिशोध की क्षमता को पहचानने की चेष्टा की गई। रंगभूमि उपन्यास के प्रकाशन से गाँधीवादी राजनीति साहित्य के केंद्र में आ गई और स्वयं प्रेमचंद ने उसे राजनीतिक उपन्यास माना। नंददुलारे वाजपेयी भी इसमें राजनीतिक घटनावली की प्रधानता तथा सूरदास को स्वाधीनताकामी भारतीय जीवन का प्रतिनिधि मानते हैं।1 महात्मा गाँधी ने अप्रैल, 1926 को दिए एक भाषाण में लेखकों से तुलसीदास की रामायण माँगी थी2 और प्रेमचंद ने रंगभूमि लिखकर उनकी इच्छा पूरी की। रंगभूमि में राम सूरदास है, जो राम के समान ही धर्म, सत्य और न्याय की लडाई लडता है तथा सीता के समान भूमि हरण होने के कारण रावण जैसी अधर्म, अन्याय, असत्य एवं पशुबल पर आधारित अंग्रेजी सत्ता से संघर्ष करता है। सूरदास गाँधी का प्रतीक है। वह सच्चा असहयोगी है, जो गाँधी के शस्त्रों-असहयोग, सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह, अहिंसा, धर्म, न्याय से औद्योगीकरण एवं साम्राज्यवादियों के विरुद्ध लडता है और गाँधी की नीति के अनुरूप प्राण त्याग देता है।3 सूरदास हिसा को रोकते हुए पुलिस की गोली से मरता है और गांधी भी एक भारतीय गोडसे की गोली से शहीद होते हैं।
रंगभूमि (1925) से कर्मभूमि (नवंबर, 1932) का समय तीव्र राजनीतिक गतिविधियों का काल है। उनके उपन्यासों एवं कहानियों पर इसका गहरा प्रभाव है। कहानियों में हिंसा परमो धर्मः (दिसंबर, 1926), मंदिर (1927), शुद्धि (मई, 1925), इस्तीफा (दिसंबर, 1928), जुलूस (मार्च, 1930), समर-यात्रा (अप्रैल, 1930), शराब की दुकान (मई, 1930), सुहाग की साडी (मई, 1930), मैकू (जून, 1930), आहुति (नवंबर, 1930), जेल (फरवरी, 1931), अनुभव (अक्टूबर, 1932) आदि में महात्मा गाँधी के स्वराज्य आंदोलन, विदेशी वस्त्रों के वहिष्कार, असहयोग, सविनय अवज्ञा, हृदय-परिवर्तन हिंदू-मुस्लिम एकता, और दलितोद्धार का जीवंत चित्रण हुआ है। कायाकल्प उपन्यास में यद्यपि मन और शरीर के कायाकल्प की कथा है, किंतु हिंसा एवं हिंदू-मुस्लिम दंगों को रोकने की चेष्टा है। प्रेमचंद और गाँधी दोनों ही हिंदू-मुस्लिम एकता को स्वराज्य के लिए आवश्यक मानते थे गबन उपन्यास में भी युग की राजनीतिक परिस्थितियों एवं विदेशी गुलामी एवं संस्कृति के प्रभाव को दर्शाया गया है और स्वदेशी और देश का उद्धार का नारा देनेवाले कांग्रेसियों की विलायती जीवन-शैली तथा जनता-विरोधी कार्यों का भंडाफोड किया गया है। देवीदीन कहता है, अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जाएगा, तब तो तुम गरीबों को पीसकर पी जाओगे।4 कर्मभूमि तो पूर्णतः राजनीतिक उपन्यास है। कर्मभूमि का राजनीतिक सामाजिक पराधीनता के विरुद्ध स्वाधीनता-संग्राम, आंदोलन और हडताल, विजय और समझौता सभी गाँधी के तत्कालीन स्वाधीनता आंदोलन की प्रतिच्छाया है। इसमें संघर्ष दलित, किसान, मजदूर का है, जो शहर और गाँव दोनों स्थानों पर होता है, नेता जेल जाते हैं और सरकार से समझौता होता है। गोदान कृषि-संस्कृति की पतन गाथा है और किसान मजदूर बनकर मरने को विवश है, लेकिन राजनीति पर भी चर्चा होती है। प्रो. मेहता में, डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, प्रेमचंद का अंश है, होरी और मेहता मिलकर प्रेमचंद बनते हैं। वही मेहता गोदान में रूसी कम्युनिज्म और हिंदुस्तानी कम्यूनिस्टों के बारे में कहते हैं, आप रूस की मिसाल देंगे। वहाँ इसके सिवाय और क्या है कि मिल के मालिक ने राज कर्मचारियों का रूप ले लिया है। मैं तो केवल इतना जानता हूँ, हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं। हैं तो व्यवहार करें, नहीं हैं तो बकना छोड दें। मैं नकली जिंदगी का विरोधी हूँ।1 मंगलसूत्र में दरिंदों के खिलाफ शस्त्र उठाने का जो उल्लेख है, वह कथानायक की पतनावस्था में कहा गया है और बेटे का भी दवाब है। अतः उसे प्रेमचंद का विचार नहीं माना जा सकता है
प्रेमचंद इस प्रकार देश-भक्ति, राष्ट्रीयता, स्वाधीनता और राष्ट्र-रक्षक एवं राष्ट्र-प्रहरी साहित्यकार हैं। वे नवजागरण, स्वाधीनता-संग्राम तथा राष्ट्र-मुक्ति के महागाथाकार हैं। वे आर्य-समाज और कांग्रेस के सदस्य थे, उनकी पत्नी पिकेटिंग में जेल गई और प्रेमचंद तो गाँधी के भक्त ही थे। वे इस दृष्टि से के कम्युनिष्ट पार्टी के कभी सदस्य नहीं रहे। उनका साहित्य राजनीतिक अर्थवत्ता रखता है, किंतु वे कम्युनिष्ट पार्टी साहित्य को राजनीति से ऊँचा स्थान देते थे। उन्होंने कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। उनका युग राजनीति का युग था और स्वराज्य उसका लक्ष्य था, परंतु इसमें सभी प्रकार की दासता और पराधीनता से मुक्ति का शंखनाद था। प्रेमचंद इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, गाँधी तथा कुछ मात्रा में रूसी क्रांति से भी प्रेरणा और शक्ति लेते रहे, किंतु सर्वाधिक प्रभाव गाँधी का ही रहा। इस पर भी गाँधी ने जैसे राम-राज्य का स्वप्न देखा, प्रेमचंद ने भी ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की जो भारतीयता से परिपूर्ण हों, धर्म-जाति-क्षेत्र- भाषा के भेद से मुक्त हो, विषमता से मुक्ति और सामंजस्य हो और जो विदेशी- स्वदेशी कुशासन, शोषण, दमन से भी मुक्त हो। वे बार-बार गाँधी के समान किसानों और मजदूरों के स्वराज्य की बात कहते हैं, परंतु रूस की तरह वे इन्हें खूनी क्रांति के लिए इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि यह ध्यातव्य है कि उन्होंने कैदी जैसी कहानी (जुलाई, 1933) लिखी, जिसमें रूसी कम्यूनिस्ट नेता लेनिन क कामरेड-आइवन और उसकी प्रेमिका हेलन मिलकर जार के गवर्नर की हत्या का संकल्प लेते हैं। हेलन अपने प्रेमी को धोखा देकर गिरफ्तार करा देती है और खुद गर्वनर से शादी कर लेती है। प्रेमचंद के लिए गाँधी से अधिक पवित्र, सत्याग्राही, धर्म और न्याय पर चलने वाला कोई राष्ट्र-नायक नहीं था, जो राष्ट्र-हित, राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता और राष्ट्रीय एवं सामाजिक मुक्ति को सर्वोपरि मानता हो। गाँधी राजनीति, के अग्रदूत थे और प्रेमचंद साहित्य के। प्रेमचंद का साहित्य उनके राष्ट्र-प्रहरी होने, उनके राष्ट्रीय साहित्यकार होने तथा उनका साहित्य राष्ट्रीय साहित्य होने का जीवंत प्रमाण है। वे स्वराज्य-महासमर के महान कथाकार थे। उस काल में और आज तक उन जैसा कोई हिन्दी-उर्दू का साहित्याकर पैदा नहीं हुआ, जो अपने समय के स्वाधीनता-संग्राम का साहित्यिक संस्करण एवं साहित्य-महानायक बन सका हो।
सन्दर्भ
1. कफन संकलन, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, ग्यारहवाँ संस्करण, 1966, पृष्ठ 62
2. प्रेमचंद और गांधीवाद, रामदीन गुप्त, प्र.सं., पृष्ठ 111
1. प्रेमचंद र् विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 19-22
2. प्रेमचंद : विविध प्रसंग, खंड-1, पृष्ठ 267
3. प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 39-40
4. प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 277
5. प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, खंड-2, पृष्ठ 517-18
1. प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 525
2. वही, पृष्ठ 75, हंस, मई, 1931 से
3. वही, पृष्ठ 65, हंस, नवंबर, 1930 से
4. वही, पृष्ठ 78-79, हंस, जून, 1931 से
5. वहीं, पृष्ठ 80, हंस, सितंबर, 1931
6. प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 53-51
7. प्रेमचंद विविध-प्रसंग, खंड-2, पृष्ठ 87-91 हंस, अप्रैल, 1932 की टिप्पणी से
8. वही, पृष्ठ 79
9. वही, पृष्ठ 85
1. वही, पृष्ठ 151
2. वही, पृष्ठ 217, जागरण, 9 अक्टूबर, 1933 से
3. वही, पृष्ठ 326
4. वही, पृष्ठ 342, जागरण, 29 अप्रैल, 1934
5. वही, पृष्ठ 337, जागरण, 15 जनवरी, 1934
6. प्रेमचंद : पत्रकोश, संपादक : कमल किशोर गोयनका, पृष्ठ 25, इंद्रनाथ मदान को 26 दिसंबर, 1931
को लिखे पत्र से
1. वही, पृष्ठ 15
2 सरस्वती, जून, 1926, पृष्ठ 752
1. प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन, पृष्ठ 17 य 78
2. संपूर्ण गाँधी याङ्मय, खंड-17, पृष्ठ 394
3. वही, खंड-19, पृष्ठ 510
4. गवन, पृष्ठ 171-72
1. गोटान पष्ठ 52 व 55

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