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हिन्दू धर्म : एकरूपता के आग्रह, मध्यवर्ग और संस्कृतीकरण

नरेश गोस्वामी
कभी समाज और राजनीति की परिधि पर सिमटा हिंदुत्व आज उसकी तमाम संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन पर वर्चस्व कायम कर चुका है। एक समय था जब आशीष नंदी जैसे विद्वान बहुत भरोसे से कहा करते थे कि हिंदू धर्म की अंतर्निहित सहिष्णुता और उसकी बहुलताएँ उसे एकाश्मिक धर्म बनने से बचा लेंगी। लेकिन अब उन्हें भी लगता है कि हिंदुत्व की सत्ता ने समाज में एक ऐसा विपर्यय रच दिया है जिसके प्रभाव से उबरने में इस समाज की एक पीढी खप जाएगी।1
यह एक निर्विवाद तथ्य है कि हिंदू धर्म को एक सर्व-व्यापक सत्ता-केंद्र से नियंत्रित करने में इस धर्म की बहुलताएँ अर्थात् उसकी स्थानिक भिन्नताएँ ही सबसे कारगर साबित हुईं थीं। लेकिन, इन बहुलताओं को धर्म का शाश्वत और अपरिवर्तनीय तत्त्व मान लेना एक निराधार विश्वास था क्योंकि हिंदुत्व की राजनीति हिंदू धर्म की इस बहु-केंद्रिकता को उन्हीं के सामने नष्ट करती जा रही थी। यह कोई नयी प्रवृत्ति नहीं थी जो हिंदू धर्म में अचानक उभर आई थी। सच यह है कि हिंदू धर्म की बहुरूपताओं और स्थानिक विशेषताओं को मानकीकृत व समरूपीकृत करने की प्रक्रिया लम्बे समय से चली आ रही थी।
एक तरह से, हिंदू समुदाय की सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना में यह बहु-स्तरीय और नियोजित हस्तक्षेप औपनिवेशिक शासन की स्थापना के साथ ही शुरू हो गया था। मसलन, औपनिवेशिक सत्ता की विधिवत् स्थापना से पहले हिंदू धर्म एक बहुदेववादी धर्म माना जाता था। उसके तत्कालीन रूप को आस्था और विश्वासों का एक ऐसा सैद्धांतिक ढाँचा कहा जा सकता है जिसका एक सीमांत खत्म होने के बजाय दूसरे सीमांत में शामिल हो जाता था। जैसा कि हम जानते हैं, अन्य सामी धर्मों की तरह हिंदू धर्म में एकल ईश्वर की कल्पना तथा किसी धार्मिक ग्रंथ की मान्यता कभी निर्णायक नहीं रही। उसका भाव-जगत श्रुति और स्मृति पर आधारित था जिसमें शास्त्रों से ज्यादा वाचिक परम्पराएँ ज्यादा अहमियत रखती थीं। ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद हिंदू धर्म का यह अंतर्मुखी संसार हमेशा के लिए बदल गया।
हिंदू धर्म को संहिताबद्ध करने की प्रक्रिया वारेन हेस्टिंग्स (1773-1785) के काल में शुरू हुई। प्राचीन भारतीय सभ्यता से संबंधित स्रोत-सामग्री के अध्ययन, संकलन और दस्तावेजीकरण की इस मुहिम में भारत और यूरोप दोनों जगहों के विद्वान शामिल थे। विलियम जॉन्स के प्रयासों द्वारा गठित एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (1784) से शुरू हुआ यह सिलसिला उन्नीसवीं सदी के मध्य तक हिंदू धर्म की दार्शनिक धाराओं, अनुष्ठानों और परम्पराओं का विस्तृत कोश बन चुका था। इस दौरान भगवद् गीता, हितोपदेश, अभिज्ञान शाकुंतल, गीत गोविंद, मनुस्मृति, फारसी के पाठ पर आधारित पचास उपनिषदों तथा सैक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट नाम से वेदों का संकलन तैयार हो चुका था।2
इस क्रम में यह जानना भी आवश्यक है कि भाषाई और साहित्यिक स्रोतों के अध्ययन के अलावा इस दौरान अतीत के ध्वंसावशेषों, प्राचीन मंदिरों, गुफाओं, तीर्थों, सिक्कों तथा पुरातन लिपियों का संकलन भी तैयार किया गया। 1900 तक अनेक ऐतिहासिक इमारतों का विवरण तथा शिलालेखों का अनुवाद किया जा चुका था। गौरतलब है कि हिंदू धर्म और संस्कृति के इस अध्ययन-अनुशीलन के कारण, जिसे प्राच्यविद्या (इण्डोलॉजी) का नाम दिया गया, संस्कृत तथा यूरोपीय भाषाओं के बीच पारस्परिक संबंधों का सूत्रपात हुआ। इसी प्रक्रिया के जरिये हिंदू नाम से संबोधित किए जाने वाले समाज का उच्चवर्ग यूरोप की नस्लवादी विचारधारा के सम्पर्क में आया।3 इसका एक परिणाम यह हुआ कि भारतीय संस्कृति को संस्कृतनिष्ठ परम्पराओं के आलोक में देखा जाने लगा। प्राच्यवाद की यह बौद्धिक परियोजना हिंदू धर्म और संस्कृति की उच्च परम्पराओं पर ज्यादा जोर देती थी। संक्षेप में कहें तो उन्नीसवीं सदी के आखिर तक भारत के प्राचीन इतिहास, दर्शनशास्त्र तथा धर्म संबंधी सामग्री का यह प्राच्यवादी विमर्श आधुनिक हिंदू धर्म की पूर्व-पीठिका के रूप में तैयार हो चुका था। इसके प्रभावस्वरूप हिंदू धर्म का एक ऐसा भाव-लोक उत्पन्न हुआ जिसे हिंदू समुदाय का शिक्षित और वर्चस्वशाली वर्ग अपनी अस्मिता का अनिवार्य संदर्भ मानने लगा था।
फ्रेकनबर्ग कहते हैं कि हिंदू धर्म के स्रोतों के इस दस्तावेजीकरण में शामिल अधिकांश भारतीय विद्वान या तो खुद कंपनी के मुलाजम थे या फिर स्थानीय ताकतवर परिवारों से संबंध रखते थे। भारत में ब्रिटिश राज्य के उत्थान और विस्तार के साथ समाज के इन समूहों का नजदीकी राबिता रहा था। कंपनी के लिए दुभाषिये और मुंशी का काम करने वाले लोग इन्हीं अभिजन-समूहों का हिस्सा थे। इन समूहों की विशिष्ट स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत की तत्कालीन राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था में कंपनी और स्थानीय शासकों या ग्रामीण स्तर पर छोटे बडे किसानों के बीच यही लोग मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे।4 हिंदू धर्म के संस्थानीकरण की इस प्रक्रिया में अगला अहम पडाव तब आया जब कंपनी स्वयं हिंदू धर्म के पूजा-स्थलों की संरक्षक बन बैठी। कंपनी के इस निर्णय के बाद अनेकानेक मंदिर, मठ और धर्मयात्रा से जुडे पवित्र-स्थल सरकारी संरक्षण और प्रबंधन का अंग बन गए। कंपनी प्रशासन के इस कदम को तत्कालीन भारत में प्रचलित विभिन्न संप्रदायों और आस्था के हिंदूकरण का नाम देना अनुचित नहीं होगा।
सामाजिक संरचना में कंपनी के इस हस्तक्षेप के खिलाफ पारम्परिक अभिजन-समूहों की यही सक्रियता आगे चलकर हिंदू चेतना के रूप में विकसित हुई। आत्म-रक्षा तथा आत्म-सजगता की भावना से लैस यह सक्रियता एक राजनीतिक चेतना ज्यादा थी जो हिंदू धर्म को नए सिरे से परिभाषित करना चाहती थी। जैसा कि हमने पीछे कहा, इस चेतना का सूत्रधार वही अभिजन सामाजिक समूह था जो एक समय ईस्ट इण्डिया कंपनी के राज में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सहभागी रहा था। ऐसे में यह कयास लगाना गलत नहीं होगा कि हिंदू धर्म का नया विन्यास गढने की इस मुहिम में वह अपनी हैसियत और सत्ता का संरक्षण करना चाहता था।
उन्नीसवीं सदी में हिंदू धर्म का यह संहिताकरण उस बृहत्तर प्रक्रिया का अंग था जिसे आधुनिक भारतीय इतिहास में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन और कभी-कभी पुनर्जागरण भी कहा जाता है। गौर से देखें तो उन्नीसवीं सदी का सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन एक गहरे अंतर्विभाजन का शिकार था। उसमें एक तरफ ऐसे लोग थे जो हिंदू धर्म की अमानवीय प्रथाओं- शिशु-हत्या, मानव-बलि तथा सती प्रथा आदि को खत्म करने के साथ हिंदू धर्म के लोक-रूप में निहित बहुदेववादी रुझानों के बजाए देवत्व की अखण्डता पर जोर दे रहे थे। सामाजिक-धार्मिक सुधारकों का एक समूह जाति-व्यवस्था की भर्त्सना करते हुए कहता था कि जाति का हिंदू धर्म और आध्यात्मिकता से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन इस वर्ग का प्रभाव और उसकी पहुँच का दायरा मुख्यतः शहरी मध्यवर्ग तक सीमित था।
दिलचस्प है कि सुधारकों का यह समूह ईश्वर या देवत्व की अखण्डता सिद्ध करने के लिए पारम्परिक हिंदू धर्म के रामानुज जैसे सगुण सिद्धांतकारों की तरफ न देखकर इसके साक्ष्य उपनिषदों तथा भगवद्गीता में ढूँढ रहा था। यह अकारण नहीं है कि बाद में भगवद्गीता हिंदू धर्म के शिक्षित मध्यवर्गीय अनुयाईयों की प्रतिनिधि पुस्तक बन गयी। इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि बीसवीं सदी में हिंदू धर्म में पला-बढा हरेक जननायक इस ग्रंथ से गहरा बौद्धिक संवाद करता रहा है। इस सिलसिले में विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष, महात्मा गाँधी तथा राधाकृष्णन आदि का जक्र किया जा सकता है।5 क्या पिछले दिनों गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की माँग इसी तथ्य की ओर इशारा नहीं करती कि हमारे मध्यवर्ग का राजनीतिक रूप से मुखर हिस्सा अपने मानस में हिंदू धर्म की एक एकाश्मिक कल्पना रखता है और गाहे-बगाहे इस बात का समर्थन करता रहता है कि हिंदू धर्म को परिभाषित करने वाली कोई एक केंद्रीय पुस्तक होनी चाहिए।6
हिंदू धर्म को निर्देशित करने वाली यह प्रवृत्ति सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के परवर्ती चरण में भी जारी रही। हिंदू धर्म के संहिताकरण और धार्मिक-सामाजिक सुधार आंदोलन की इस अंतरगुम्फित पीठिका से हिंदू समुदाय में दो विचारधारात्मक आग्रहों का जन्म हुआ। इनमें एक विचारधारा हिंदू धर्म को सांस्कृतिक-साभ्यतिक दाय के रूप में देखने पर जोर देती थी तो दूसरी विचारधारा वर्णाश्रम व्यवस्था को अक्षुण्ण रखते हुए हिंदू धर्म का एक शास्त्रीय संस्करण गढना चाहती थी। इनमें क्रमशः पहली विचारधारा राष्ट्र की सर्वधर्म समभाववादी और सेकुलर कल्पना प्रस्तुत करती थी जबकि दूसरी धारा संस्कृतनिष्ठ हिंदू परम्पराओं के महिमा-मण्डन का रास्ता चुनकर एकांतिक राष्ट्र का विचार पेश करती थी। हिंदू धर्म की इस प्राच्यवादी व्याख्या का यह पहलू खास तौर पर उल्लेखनीय है कि उपनिवेशवाद विरोधी चेतना और संघर्ष में वह अलग-अलग भूमिकाओं में सामने आती रही। मसलन, एक समय वह इतना ग्रहणशील और सहिष्णु थी कि बकौल अभय कुमार दुबे 1893 में जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के मंच पर इस उदार, सहिष्णु और समावेशी धर्म की रूपरेखा प्रस्तुत की, तो दुनिया में बहुतों को यह एक नया आविष्कार लगा, लेकिन यह नया धर्म वही था जिसे प्राच्यवादियों ने एक सदी के दौरान गढा था।7 इस भूमिका के समानांतर दूसरी भूमिका वह थी जिसमें ईसाई मिशनरियों की धर्मांतरणवादी हरकतों का प्रतिकार करने के लिए इसी प्राच्यचादी व्याख्या से प्राप्त वैचारिक स्थापनाओं का इस्तेमाल किया गया। इसकी तीसरी भूमिका औपनिवेशिक सत्ता के साभ्यतिक-सांस्कृतिक अहंकार और श्रेष्ठता-बोध के विरुद्ध राष्ट्रवादी नेतृत्व की उस जवाबी रणनीति के रूप में देखी जा सकती है जिसके तहत कला, विज्ञान, दर्शन और राजनीति आदि के क्षेत्रों में प्राचीन भारत की उपलब्धियों को स्वर्णयुग की तरह प्रस्तुत किया जाता था। जाहिर है कि प्राचीन भारत की महान उपलब्धियों का यह बोध प्राच्यवाद के भंडार-गृह से ही निकला था। कहने का मतलब यह है कि हिंदू धर्म का यह संस्कृतनिष्ठ और शास्त्रोक्त आख्यान औपनिवेशिक शासन के शुरूआती दौर से लगाकर आजादी की लडाई और उत्तर-औपनिवेशिक समय में भी निरंतर मौजूद रहा है। गौर से देखें, तो हिंदू धर्म की इस प्राच्यवादी व्याख्या में एकांतिक और हिंदू राष्ट्र की कल्पना यानी हिंदुत्व भी एक संभावना के रूप में विद्यमान रहा है।
इस कालखण्ड पर वर्तमान-बिंदू से नजर डालें, तो सावरकर द्वारा प्रस्तुत हिंदुत्व की औपचारिक अवधारणा एक संभावना के तौर पर पहले से ही अस्तित्व में आ चुकी थी। हिंदुत्व का विचार राष्ट्र व समाज की एकल और इकहरी परिकल्पना पर जोर देता है। इसी तरह हिंदू धर्म के संहिताकरण में विन्यस्त दृष्टिकोण भी इस धर्म की अंतर्निहित बहुलताओं को एक केंद्रीय संरचना में ढालना चाहता था। यानी इन दोनों परिघटनाओं में एक साझे तत्त्व की निशानदेही की जा सकती है। इसलिए उन्हें एक दूसरे की निरंतरता में देखा जाना चाहिए। जाहिर है कि इस तरह देखने पर हिंदुत्व का मूल विचार हिंदू धर्म की प्राच्यवादी परिकल्पना से प्रभावित एकसार- समरूपी और उच्चवर्गीय विमर्श का ही विस्तार प्रतीत होता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो वह संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीयता तथा वर्णाश्रम की भित्ति पर खडी हिंदू धर्म की पुनरुत्थान-सर्वसत्तावादी विचारधारा का क्रमिक और संचयी विकास है।
इस संबंध में ज्योर्तिमय शर्मा ने हिंदू धर्म के चार आधुनिक उन्नायकों- दयानंद सरस्वती, अरविंद घोष, विवेकानंद तथा विनायक वीर सावरकार के विचारों में एक विलक्षण संगति की तरफ ध्यान दिलाया है। हिंदू अस्मिता तथा धर्म के संबंध में यह संगति इस तरह प्रकट होती है ः-
1. हिंदू धर्म को एक कठोर, संहिताबद्ध और एकाश्मिक संरचना में रूपांतरित करना। धर्म की इस व्याखा का विरोध करने वाले किसी भी मत, व्यवहार या अनुष्ठान का सत्रिज्य विरोध करना आदि।
2. हिंदू धर्म को एक मर्दवादी और आक्रामक रूप देना। इस क्रम में जैन और बौद्ध धर्म में निहित अ-हिंसा के दर्शन को हिंदुओं के पतन के लिए जम्मेदार मानना।
3. अन्य धर्मों की तुलना में हिंदू धर्म को सबसे प्राचीन, परिपूर्ण तथा विकसित सिद्ध करना। इसे अन्य सभी धर्मों का जनक बताना और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस बात पर जोर देना कि हिंदू धर्म को किसी भी अन्य धर्म से कुछ सीखने या ग्रहण करने की जरूरत नहीं है।
4. हिंदू धर्म के दमन, उसके विरुद्ध किए गए कथित षडयंत्रों तथा उस पर मँडराते अंतहीन खतरे का आख्यान रचना। पश्चिमीकरण, इस्लाम, बौद्ध धर्म, लोक में प्रतिष्ठित देवी-देवताओं, मिशनरियों, धर्मांतरण, जीवन-शैली, विधर्मी विचारों, शास्त्रों की नयी व्याख्याओं, आधुनिक भारतीय भाषाओं, नये पंथों, रचनात्मक साहित्य और यौन-स्वतंत्रता आदि को हिंदू धर्म के लिए खतरे के रूप में पेश करना।
5. इस बात पर जोर देना कि वेदों और उपनिषदों की अंतनिर्हित श्रेष्ठता के कारण हिंदू धर्मशास्त्र हमेशा के लिए तय हो चुका है। यानी इस संबंध में कोई नया विचार या व्याख्या हिंदू धर्म के महात्म्य पर चोट करता है।
6. हिंदू धर्म के इस रूप से असहमति रखने वाले लोगों का उग्र विरोध करना। चारों विचारकों का मानना था कि सत्य कठोर और कटुतापूर्ण ढंग से बयान किया जाना चाहिए चाहे लोग इससे कितने भी आहत क्यों न होते हों।8
इस वैचारिक संरचना के आधार पर यह कहना अनुचित न होगा कि संस्कृतनिष्ठता, श्रेष्ठता व गौरव-बोध में पगे हिंदू धर्म के इस आख्यान का बीज हिंदुत्व की औपचारिक धारणा से बहुत पहले पड चुका था।
गौरतलब है कि समय के साथ यह प्रक्रिया अंग्रेजी शासन से स्वायत्त हो चुकी थी। इसलिए यह अचरज की बात नहीं है कि जब हमने स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा हासिल किया, तो इस प्रक्रिया ने नये राष्ट्र की सत्ता-संरचना में भी अपनी निरंतरता या पुनरुत्पादन के नये मुकाम ढूंढ लिए।
(2)
इस तरह, हिंदू धर्म के वैचारिक लोक में निविष्ट मानकीकरण और समरूपीकरण की इस प्रक्रिया की अनेक संभावित परिणतियों में अंततः सबसे प्रबल परिणति हिंदुत्व के रूप में हुई। हिंदू धर्म के संहिताबद्ध एकरूपीकरण की संक्षिप्त विवेचना के बाद लेख के अगले भाग में हम हिंदुत्व और मध्यवर्ग के अंतर्संबंध की पडताल करेंगे। हमारा मानना है कि अगर हमारे समय में हिंदुत्व समाज के अन्य क्षेत्रों, वर्गों और समुदायों में पैठ करता गया है, तो हमें यह देखना चाहिए कि इन समुदायों और वर्गों का मध्यवर्ग के साथ किस तरह का संबंध रहा है और हाल के समय में इस संबंध में क्या बदलाव आए हैं। हमें लगता है कि इस क्रम में मध्यवर्ग का एक अवधारणात्मक निरूपण जरूरी होगा क्योंकि इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि मध्यवर्ग के निचले सीमांत पर स्थित विभिन्न सामाजिक समूहों के लिए यह वर्ग किस प्रकार एक अनुकरणीय मॉडल का काम करता है।
राजनीतिक रुझान, सामाजिक स्थिति और सांस्कृतिक बोध के आधार पर मध्यवर्ग की एक औसत तस्वीर इस तरह बनाई जा सकती है-
(1) मध्यवर्ग शासक वर्ग/गुट के वर्चस्व का वाहक होता है। वह एक तरफ आधिपत्य (डॉमिनेशन) के संबंधों को वैधता की भाषा में स्थानान्तरित कर शासक वर्ग का वर्चस्व अक्षुण्ण रखता है, तो दूसरी ओर शासक वर्ग की अंदरूनी परतों तथा शासक वर्ग और अन्य अधीनस्थ वर्गों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। शासक वर्ग की वैधता के विमर्श का प्रबंधन- विमर्श की रचना से लेकर रोजमर्रा के जीवन में उसके प्रसार का काम भी इसी के हाथों में होता है। शासक वर्ग के दायरे में औद्योगिक-वित्तीय तथा खेतिहर पूँजी के आपसी संबंधों के बीच मेलमिलाप कायम रखने में भी उसकी विशेष भूमिका होती है।
(2) मध्यवर्ग सांस्कृतिक पूँजी का नियंता भी होता है। शैक्षिक ढाँचे तथा भाषाई व अन्य सामाजिक योग्यताओं पर उसकी विशिष्ट पकड होती है। समाज के शेष दायरों में उसकी यह सांस्कृतिक पूँजी योग्यता का पर्याय मानी जाती है। समाज और राजनीति में चल रही प्रक्रियाओं और घटनाओं के संबंध में उसके नजरिये को विशेष महत्त्व दिया जाता है। अपनी उपलब्धियों और विशिष्ट स्थिति को मध्यवर्ग स्वाभाविक योग्यताओं के तौर पर देखता है।
(3) मध्यवर्ग एक विभेदीकृत संरचना है। विचारधाराओं के गठन और निर्माण में उसकी भागेदारी सर्वप्रमुख होती है। मध्यवर्ग का अभिजन हिस्सा जहाँ विचारधाराओं का प्रमुख सूत्रधार होता है वहीं उसका निचला हिस्सा इन विचारधाराओं का मुख्य वाहक होता है। अभिजन हिस्से की विचारधारा को सामाजिक वैधता इसी निचले हिस्से के जरिये हासिल होती है। मोटे तौर पर मध्यवर्ग के अभिजन समूह में बुद्धिजीवी, पेशेवर राजनीतिज्ञ, अधिकारीतंत्र से जुडा अमला, मीडिया के क्षेत्र से संबंधित लोगों को शामिल किया जाता है। मध्यवर्ग की यह अभिजन जमात विचारों की रचना तो करती है परंतु उसके पास इन विचारों को सामाजिक व्यवहार में उतारने की ताकत नहीं होती। इन विचारों को जमीन पर उतारने का काम निम्र-मध्यवर्ग ही करता है।9
मध्यवर्ग के इस निरूपण से यह समझने में मदद मिलती है कि सामाजिक संरचना में उसकी भूमिका कई तरह से केंद्रीय होती है। समाज की बृहत्तर प्रक्रियाओं में वह एक ओर विमर्श की रचना करता है तो दूसरी ओर अन्य अधीनस्थ वर्गों के लिए प्रतिष्ठा, वैधता और गतिशीलता के पूर्व-निश्चित मॉडल का भी काम करता है। इस दृष्टि से देखें, तो पिछले चार दशकों के दौरान हिंदुत्व का विचार मध्यवर्ग की इस केंद्रीयता के जरिये मजबूत हुआ है।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए, तो औपनिवेशिक शासन के दौरान मध्यवर्ग की महत्ता इसलिए स्थापित हो सकी क्योंकि ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत का औद्योगिक बुर्जुआ शासन से सीधी लडाई करने की स्थिति में नहीं था। ऐसे में मध्यवर्ग ही राष्ट्रवादी चेतना का संगठनकर्ता बन सकता था। दूसरे, औपनिवेशिक समाजों का एक खास लक्षण यह भी माना जाता है ऐसे समाजों में पूँजीवाद का विकास स्वाधीनता के बाद होता है और उसकी कमान राज्य के हाथ में रहती है। अपनी पेशेवर और शैक्षिक योग्यताओं के कारण विकास के इस ढाँचे का कार्यकारी प्रबंधन मध्यवर्ग के हाथों में केंद्रित होता जाता है। राजनीतिक वैधता के कारण यह वर्ग इतना सबल होने लगता है कि वह अपनी निरंतरता के उपाय भी खोज लेता है। मध्यवर्ग की इस सैद्धांतिक परिकल्पना से स्वतंत्र भारत का इतिहास समझने का प्रयास किया जाए, तो फौरी तौर पर दो सूत्र चिन्हित किए जा सकते हैं। एक, आजादी के बाद भारत में उभरे शासक वर्ग- खेतिहर पूँजीपति तथा औद्योगिक वित्तीय बुर्जुआ सहित मध्यवर्ग राज्य के ढाँचे में तीसरा सहभागी रहा है। दूसरे, राज्य की विकास-योजनाओं में अपनी प्रबंधकीय क्षमताओं के कारण वह केंद्रीय जगह हासिल करता गया है। आजादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में विकास के जिस ढाँचे की नींव रखी गई उसकी चाबी तकनीकी विशेषज्ञों और अधिकारीतंत्र के हाथों में थी। विकास की यह अवधारणा इस समझ से निकली थी कि तकनीकी विशेषज्ञों तथा अधिकारी तंत्र का यह संयुक्त प्रतिष्ठान राज्य के तत्वावधान में जनहित का काम करेगा।10
गौर करें कि विकास की इस अवधारणा में जनता को निष्क्रिय पक्ष मान लिया गया था। दूसरे शब्दों में, नेहरूयुगीन राज्य यह मानकर चल रहा था कि जन-कल्याण का काम मध्यवर्गीय नेतृत्व ही कर सकता है। इस तरह समाज में मध्यवर्ग को नेतृत्वकारी भूमिका स्वतः ही मिल गई और वह सार्वजनिक संस्कृति का सूत्रधार बनता गया। यहाँ हम इस बात की पडताल नहीं करेंगे कि विकास के इस केंद्रीकृत मॉडल का लाभ अधीनस्थ वर्गों तक कितना पहुँचा। लेकिन बाद का इतिहास बताता है कि मध्यवर्ग का उच्च-शिक्षित और पेशेवर हिस्सा लगातार मजबूत होता गया।
यही वजह है कि पिछली सदी के आठवें दशक तक मध्यवर्ग की नयी पीढी अपने विशिष्ट हितों की राजनीति करने लगी थी। उसकी यह राजनीति इस शिकायत पर आधारित थी कि मुसलमानों तथा नीची जातियों जैसे दलितों और अन्य पिछडे वर्गों को ज्यादा तवज्जो देने के कारण भारतीय लोकतंत्र दूषित हो गया है।11
मध्यवर्ग की नई पीढी इस राजनीतिक प्रदूषण के लिए भारत में सबसे लम्बे समय तक सत्ता रूढ रही कांग्रेस को जिम्मेदार मानती थी। लिहाजा भविष्य की राजनीति को यह वर्ग एक ऐसे मुकाम की ओर ले जाने की कोशिश में था जहाँ उसे अधीनस्थ वर्गों-क्षेत्रीय दलों की प्रतिस्पर्धी राजनीति का मुकाबला न करना पडे। उल्लेखनीय है कि राजनीतिक सत्ता पर अधीनस्थ वर्गों के तथाकथित कब्जे के बावजूद मध्यवर्ग के सामाजिक-सांस्कृततिक वर्चस्व में कोई कमी नहीं आई क्योंकि उसके पास गैर-चुनावी रणनीतियों का एक बडा जखीरा मौजूद था। वह औपचारिक प्रक्रियाओं से बचने की तरकीब जानता था तथा नीतिगत एजेंडे को अपने अनुसार प्रभावित करने और इस तरह राज्य के केंद्र-स्थल तक पहुँचने की क्षमता रखता था।
इस दौरान अपनी राजनीतिक दावेदारी के लिए उसने एक महीन विमर्श तैयार किया जो एक तरफ कानून की सुचारु व्यवस्था और राजनीतिक मर्यादा आदि की भाषा में बात करता था तो दूसरी तरफ उपभोक्ता-नागरिक की एक नयी छवि गढ रहा था।12 उसकी यह दावेदारी राजनीति के राष्ट्रवादी संस्करण में ही सफल हो सकती थी। समकालीन इतिहास में यही वह मुकाम है जब मध्यवर्ग ने भाजपा की ओर रुख किया। चुनावी-अध्ययनों से पता चलता है कि नवें दशक के दौरान मध्यवर्ग का एक बडा हिस्सा भाजपा का समर्थन करने लगा था। इस अवधि में मध्यवर्ग की ऊँची जातियों का मत-प्रतिशत लगभग नियमित रूप से भाजपा के पक्ष में बढता गया।13 चूँकि अपनी इस राजनीतिक दावेदारी को मध्यवर्ग संसाधनों के नियंत्रण की परियोजना का नाम नहीं दे सकता था, इसलिए राज्य द्वारा सार्वजनिक कल्याण के दायित्वों से मुँह फेरने की इस कवायद को राष्ट्रीय रूपांतरण जैसी सांस्कृतिक शब्दावली में व्यक्त किया गया।
इस प्रकार, नवें दशक की इस अवधि में मध्यवर्ग, हिंदुत्ववादी राजनीति तथा नयी अर्थव्यवस्था के बीच एक व्यापक गठजोड तैयार हुआ। हिंदुत्व और नव-उदारतावाद की इस जुगलबंदी की सफलता तीन राजनीतिक लक्ष्यों पर निर्भर करती थी- पहले, समाज को आंतरिक द्वंद्वों से रहित एक इकहरी संरचना के रूप में परिभाषित करना; दूसरे, सामाजिक गतिशीलता को व्यक्तिनिष्ठ संदर्भ में पुनर्परिभाषित करना तथा राजनीति की प्रक्रिया में राज्य की केंद्रीयता को बेअसर करना।14 इस संदर्भ में यह याद करना अप्रासंगिक न होगा कि हिंदू धर्म के संहिताबद्ध रूप से संरचित समझ और हिंदुत्व समाज को एक इकहरी, सपाट और द्वंद्व-रहित इकाई की तरह देखना चाहते हैं क्योंकि समाज में आंतरिक विभाजन और विषमता का तथ्य स्वीकार करने पर उनके वर्चस्व की लडाई कमजोर पडने लगती है। हमारा कहना है कि समाज को एक इकहरी संरचना के तौर पर देखना दरअसल हिंदू समाज तथा स्वयं मध्यवर्ग के स्तरीकरण से निकली विषमताओं का प्रबंधन करना भी है। इसी बिंदू से हिंदुत्व और मध्यवर्ग के बीच दोतरफा संबंध बनता है। और हिंदुत्व की वैचारिक पीठिका आत्मसात करके हिंदू मध्यवर्ग खुद को अधीनस्थ वर्गों के समक्ष एक वांछनीय और व्यावहारिक आदर्श के तौर पर प्रस्तुत करने में सफल होता है।
बरास्ते संस्कृतीकरण
पिछले कुछ समय से कहा जा रहा है कि अब हिंदुत्व का दारोमदार पिछडी जातियों के हाथों में चला गया है। मसलन, राजीव भार्गव का मानना है कि नये हिंदुत्व की एक बडी खासियत यह है कि जो लोग इसका नेतृत्व कर रहे हैं, उसमें अन्य पिछडी जातियों के लोग सबसे प्रमुख हैं... इसकी उग्र तरफदारी करने वाले जितने भी बडे चेहरों पर नजर डालें, उनमें अधिकांश पिछडी जातियों से संबंधित हैं। इसी तरह, राजनीतिक सिद्धांतकार धीरूभाई शेठ की राय भी यही है कि लोकतंत्र के प्रभाव में संगठित हिंदू धर्म की संरचना और उसका मौलिक संघटन पूरी तरह बदल चुका है। उनके अनुसार, अब हिंदू धर्म के केंद्र में ब्राह्मण नहीं रह गए हैं। उसकी मान्यताओं के निर्धारण में भी ब्राह्मणों की कोई विशेष भूमिका नहीं रह गयी है। संगठित हिंदू धर्म के केंद्र में अब अन्य पिछडी जातियाँ आ गयीं हैं।16 ऊपरी तौर पर इन वक्तव्यों से इस बात की तसदीक होती है पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान हिंदुत्व का जनाधार निरतंर बढता गया है। हमारा मानना है कि इस परिघटना को लोकतांत्रिक राजनीति में चुनावी परिणामों से निर्देशित होने वाली प्रवृत्ति के अलावा संस्कृतीकरण की एक महीन और छितरी हुई प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाना चाहिए। लेकिन आगे बढने से पहले हम यह स्पष्ट करना चाहेंगे कि यहाँ संस्कृतीकरण से हमारा आशय कुछ अलग है।
आमतौर भारतीय समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास द्वारा विकसित संस्कृतीकरण की अवधारणा का प्रयोग यह समझने के लिए किया जाता रहा है कि भारत के समाज में निम्र जातियाँ सामाजिक पदानुक्रम में ऊपर उठने के लिए ऊँची जातियों की संस्कृति का अनुकरण किस प्रकार करती हैं। लेकिन यह बात श्रीनिवास ने स्वयं भी स्पष्ट की थी कि संस्कृतीकरण एक बहुमुखी प्रक्रिया है जिसका जाति-व्यवस्था से सिर्फ आंशिक संबंध ही है। उनकी यह अवधारणा समाज और संस्कृति की उन प्रक्रियाओं से भी जुडी है जिसके अंतर्गत विभिन्न सामाजिक समूह और समुदाय धीरे-धीरे हिंदू धर्म के शास्त्रीय रूप का वरण करते जाते हैं। इसी प्रकार ए.एम. शाह ने भी इंगित किया है कि धीरे-धीरे जाति के पदानुक्रम का संबंध संस्कृतीकरण से टूटता जा रहा है। और अब संस्कृतीकरण के क्षेत्र में ऐसी संरचनाएँ-संस्थाएँ उभर आईं हैं जिनका जाति से कोई विशेष संबंध नहीं है। इन संरचनाओं के कारण संस्कृतीकरण की प्रक्रिया का आधार पहले से ज्यादा व्यापक हो गया है। अब इसके दायरे में दलित और आदिवासी भी दाखिल हो गए हैं।17 संस्कृतीकरण के गैर-जातिगत स्रोतों की पडताल करते हुए शाह विभिन्न पंथों, पीठों और आश्रमों के बाबाओं, गुरुओं और महाराज आदि व धार्मिक साहित्य की पुस्तकों, पत्रिकाओं तथा मंदिरों आदि का उल्लेख करते हैं।18
हमारी नजर में हिंदू समुदाय में संस्कृतीकरण की यह प्रक्रिया पिछले तीन दशकों में और सुदृढ हुई है। इस बात की निशानदेही कईर् स्तरों पर की जा सकती है। मसलन, आज से लगभग चार दशक पहले तक उत्तर भारत के गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में लोगों के नाम कम संस्कृतनिष्ठ हुआ करते थे। लेकिन नवें दशक के आसपास नामों में संस्कृतनिष्ठता बढने लगी। आज स्थिति यह है कि बच्चों के नामकरण के मामले में दलित, आदिवासी अथवा पिछडी जाति की नयी पीढी लगभग संस्कृतनिष्ठ हो चुकी है। यह प्रवृत्ति नाम के अलावा विवाह के निमंत्रण पत्रों में भी लक्षित की जा सकती है। तीन-चार दशक पहले तक उत्तर भारत के बडे क्षेत्र में विवाह के निमंत्रण पत्र बोलचाल की हिंदी में होते थे। लेकिन धीरे-धीरे इन न्योता-निमंत्रण पत्रों में संस्कृतनिष्ठ पदावली हावी हो गयी है। इस क्रम में तीसरा उदाहरण कलश यात्रा का दिया जा सकता है।
याद रहे कि कलश यात्रा तीर्थयात्रा जैसी चीज नहीं है। वह एक बहुत ही स्थानीय घटना होती है और उसका एकमात्र उद्देश्य लोगों को इस बारे में सूचित करना होता है कि अमुक क्षेत्र में कोई धार्मिक आयोजन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत आयोजन स्थल (आमतौर पर किसी क्षेत्र का प्रमुख मंदिर) के क्षेत्र में महिलाओं का एक समूह सिर पर कलश लेकर निकलता है। बाहर से देखने पर यह दृश्य किसी भी आम सामूहिक गतिविधि की तरह ही लगता है, परंतु कलश यात्रा में भाग लेने वाली महिलाओं से बात करने पर पता चलता है कि उनमें से अधिकांश महिलाएँ मध्यवर्गीय कॉलोनियों के पडौस में बसी अनियमित बस्तियों से ताल्लुक रखती हैं, जबकि अधिकतर मामलों में आयोजन का स्थल मध्यवर्गीय कॉलोनियों में होता है। दरअसल, इन महिलाओं के लिए ऐसे किसी भी आयोजन में भागीदारी करना एक ऐसे वर्ग के सम्पर्क में आना होता है जिसे वे अपनी जीवनगत आकांक्षाओं का अनुकरणीय संदर्भ मानती हैं।19
कहना न होगा कि हिंदू धर्म का यह संस्कृतनिष्ठरूप मध्यवर्ग में शामिल होने की हसरत रखने वाले पिछडी और दलित जाति के व्यक्ति के लिए एक अलिखित लेकिन अनिवार्य शर्त की तरह होता है। लेकिन, यह पिछडी या दलित जाति द्वारा किसी ऊँची जाति के सांस्कृतिक आचार-विचारों का अनुकरण मात्र नहीं है। यह मसला बृहत्तर समाज में व्याप्त उस सांस्कृतिक परिवेश से जुडा है जिसमें हिंदू धर्म के कुछ निश्चित रूपों को उसके लोक-रूपों से ज्यादा महत्त्व दिया जाने लगा है।
पिछले तीन दशकों के दौरान समाज की मध्यवर्ती जातियों ने भी- जो स्वयं खेतिहर थी या जिनकी जीविका खेती से जुडे काम-धंधों पर निर्भर करती थी, नयी अर्थव्यवस्था से पैदा हुए अवसरों का लाभ उठाया है। अगर इन जातियों को हम एक वर्ग के तौर पर कल्पित करें तो यह साफ देखा जा सकता है कि उसके सामाजिक-बोध में पश्चिमी उदारतावाद और आधुनिकता की कोई खास जगह नहीं है। वह नयी अर्थव्यवस्था का उपभोक्ता तो जरूर है लेकिन उसका आंतरिक और सामाजिक संसार हिंदू धर्म की अन्याय रीतियों, अनुष्ठानों, आदर्शों और परम्पराओं से संचालित होता है। उसकी आर्थिक बेहतरी में औपचारिक शिक्षा के बजाय पारम्परिक कौशल तथा तकनीक के नए औजारों की भूमिका ज्यादा प्रमुख रही है। धार्मिकता उसके जीवन का अभिन्न अंग है। लेकिन शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में ऐसी पूर्व-खेतिहर और दस्तकार जातियों की यह धार्मिकता हिंदू धर्म के व्यापक प्रबंधन तंत्र से निर्देशित होने लगी है।20 निम्र-मध्यवर्ग का जीविका-तंत्र तथा उसका शैक्षिक-सांस्कृतिक बोध इसी वर्ग की छवि से प्रतिकृत होता है। यह अनुकरण एक सीमा तक उसके सामाजिक अस्तित्व की परिस्थितियों का भी परिणाम है- भौतिक जीवन और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की प्रक्रिया में वह जिन लोगों और संस्थाओं के सम्पर्क में आता है वे पहले ही हिंदुत्व के विचार को आत्मसात् कर चुके होते हैं।
मध्यवर्ग की इस सांस्कृतिक-विचारधारात्मक घेरेबंदी का मुकाबला केवल स्वतंत्र और वैकल्पिक सामाजिक-बोध के दम पर किया जा सकता है। लेकिन, भारतीय राजनीति में अस्मिता के उभार के बाद रैडिकल रूपांतरण की प्रवृत्तियाँ हाशिये पर चली गईं हैं। आज, राजनीति के पूरे परिदृश्य-उसके राष्ट्रीय विमर्श से लेकर क्षेत्रीय रूपों तक कोई जननेता ऐसा नहीं दिखाई देता जिसने पिछले तीन दशकों के दौरान विकास के मौजूदा मॉडल की अंतनिर्हित विसंगतियों पर कभी गंभीर सवाल खडे किए हों। भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के नारे के इर्दगिर्द उभरी दलित और पिछडे वर्गों की दावेदारी भी इस दरमियान अपनी स्वतंत्र वैचारिक-सांस्कृतिक संरचना या एजेंसी खडी नहीं कर पाई। ऐसा लगता है कि सामाजिक न्याय की समूची राजनीति विकास के लाभों में अपनी हिस्सेदारी तय करने और अपने निकृष्ट रूप में निजी लाभार्जन तक सिमट कर रह गयी। मसलन, उत्तर प्रदेश में शराब और रियल-स्टेट का एक कारोबारी सामाजिक न्याय की बात करने वाली दोनों पार्टियों के शासनकाल में समान रूप से लाभान्वित हुआ था।
सामाजिक न्याय ने संस्कृति का वैकल्पिक मॉडल विकसित करने पर भी ध्यान नहीं दिया। उत्तर प्रदेश में कई बार सत्ता में रह चुकी समाजवादी पार्टी के सांस्कृतिक बोध की हालत यह है कि 2013 में जब राज्य का एक जनपद मुजफ्फरनगर हिंसा के दौर से गुजर रहा था तो सत्तारूढ पार्टी अपने संस्थापक का जन्मदिन मनाने में डूबी थी। एक राजनीतिक एजेंसी के तौर पर उसके विचारधारात्मक पतन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी ने उक्त समारोह को मुल्तवी करने की कोई इच्छा भी नहीं दिखाई।21
कहना न होगा कि भारतीय समाज के मध्यवर्ग में दलित और पिछडी जातियों का जो तबका नयी अर्थव्यवस्था के दौरान शामिल हुआ है उसका धार्मिक आत्म-बोध मध्यवर्ग के आपेक्षिक रूप से पुराने और ज्यादा सबल हिस्से से प्रतिकृत होता गया है। इन वर्षों में अपने काम की जगहों- दफ्तरों, बाजारों तथा सामाजिक जीवन में उसका हिंदुत्व के इर्दगिर्द उभरे विमर्श से ही साबका पडा है। कहने का मतलब ये है कि हिंदुत्व मध्यवर्ग की दैनंदिन संस्कृति में पैठता गया है। उसके प्रतिनिधि राम-कथा से लेकर भागवत कथा जैसे धार्मिक आयोजनों में शामिल रहते हैं। हिंदुत्व का यह दैनिक संसार मध्यवर्गीय कॉलोनियों के बडे पार्कों में भी देखा जा सकता है जहाँ सुबह के समय सैर करने आए युवा, अधेड और उम्रदराज लोग हर दिन भारतीय इतिहास, राजनीति, समाज और हिंदू धर्म का एक मौखिक आख्यान रचते हैं। ऐसे पार्कों में लोगों की टोलियाँ कई बार सामूहिक व्यायाम करने के बाद जयश्रीराम और हर-हर महादेव के गगनभेदी नारे लगाते भी देखी जा सकती हैं। प्रकट तौर पर यह उद्घोष फेफडों के एक व्यायाम की तरह किया जाता है। लेकिन स्वास्थ्य की यह संस्कृति समाज के दैनिक कार्यकलापों में छितरी राजनीति से विच्छिन्न नहीं है। ऐसी अनेकानेक सामान्य प्रक्रियाएँ हैं जिनके जरिये हिंदुत्व रोजमर्रा के जीवन में हिंदू धर्म का पर्याय बनता गया है।
नवें दशक के बाद तीन दशकों की अवधि में हिंदुत्व और मध्यवर्ग एक साझी संरचना बन गए हैं। जैसा कि हमने इंगित किया है, मध्यवर्ग एक विभेदीकृत श्रेणी है। उसके सबसे ऊंचे स्तर पर अगर पारंपरिक अभिजन- समूह हैं तो निचले स्तर पर इन तीन दशकों के दौरान आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त होने वाली पिछडी और दलित जातियों के भी सदस्य हैं। मध्यवर्ग के इन नए सदस्यों को हिंदुत्व सामाजिक प्रतिष्ठा का मॉडल मुहैया कराता है। नए सदस्यों को हिंदुत्व एक वांछनीय आदर्श इसलिए लगता है क्योंकि अपनी तमाम अधीनस्थता के बावजूद ऐसे अधिकांश जाति-समूह स्वयं को हिंदू धर्म के बृहत्तर लोक में परिभाषित करते हैं। जाहिर है कि समाज और राजनीति की मौजूदा प्रक्रियाओं में हिंदुत्व निश्चय ही एक प्रतिनिधि विचार की तरह प्रतिष्ठित हो चुका है, लेकिन यहां यह भी याद रखा जाना चाहिए कि हिंदुत्व की यह प्रतिष्ठा समाज के भीतर चलती वर्चस्व की लडाई से स्वतंत्र नहीं है।
संदर्भ-
1. देखें, एजाज अशरफ के साथ आशिष नंदी का इंटरव्यू, कैरेवान, 20 जून, 2019.
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6. पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीया सुषमा स्वराज ने यह मांग संसद में उठाई थी. इस संबंध में यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के दौरान वहां के प्रधानमंत्री को गीता की प्रति भेंट की थी.
7. अभय कुमार दुबे (2019), हिंदू एकता बनाम ज्ञान की राजनीति, पृ.119.
8. ज्योतिर्मय शर्मा (2015), हिंदुत्व- एक्सप्लोरिंग द आइडिया ऑफ हिंदू नैशनलिजम, पृ. 13-16.
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16. धीरूभाई शेठ (2015), सेकुलरवाद की निर्मिति और राजकीय राष्ट्रवाद के अंदेशे, प्रतिमान-समय, समाज, संस्कृति, खण्ड 3, अंक 1, पृ. 21.
17. ए.एम. शाह (2005), सैंसक्रिटाईजेशन रीविजिटिड, सोसियोलॅाजिकल बुलेटिन, अंक 54, सं. 2, पृ. 239.
18. वही - 242-43.
19. कलश यात्रा के संबंध में लोगों से अनौपचारिक बातचीत.
20. नरेश गोस्वामी (2013), लोकधर्मिता, सीमांत की राजनीति व कांवड सेवा-समितियाँ, प्रतिमान, जुलाई-दिसंबर, अंक 2, पृ. 612.
21. देखें,https://www.ndtv.com, 14 जनवरी, 2014.
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