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जो कागज पे लिखा तो झूठा लगा

बृजेश अम्बर
वे निहायत नफासतपसंद थे। बचपन ही से अच्छा पहनना और अच्छा खाना उनकी आदत रही। कमखुराक होने के बावजूद अपने दस्तरख्वान पर उन्हें सभी जरूरी चीजों चाहिये थीं। चाय पीने के जबर्दस्त शौकीन थे। एक मुद्दत तक पाइप भी पीते रहे चाय ही की तरह बर्फ का ठंडा पानी भी उन्हें बहुत पसंद था। ठंडे पानी से इस कदर लगाव कि दिल की बीमारी के बावजूद बर्फ का ठंडा पानी ही पीते। संगीत और पाश्चात्य कलाओं में अत्यधिक रुचि के साथ ही जानवरों और चिडियों से भी प्रेम करते थे। खेल कूद से बहुत लगाव नहीं था । कभी-कभी क्रिकेट देख लेते थे लेकिन ताश के खिलाड थे। ताश की महिफल में घंटों बैठ सकते थे।और इन सब से बढ कर किताबें पढने का शौक था,बल्कि जुनून था। घंटों लाइब्रेरी में बैठे रहते और हर विषय की किताबें पढते रहते थे।
ऐसे थे शम्सुर्रहमान फारुकी(बच्चे मियां)जिनका जन्म 3॰ सितम्बर, 1935 को उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ जले में कालाकांकर हाउस,जो उनकी ननिहाल थी,में हुआ। पिता का नाम मौलवी मुहम्मद खलीलुर्रहमान फारूकी था। प्ररम्भिक शिक्षा आजमगढ में और हाई स्कूल से स्नातक तक की शिक्षा गोरखपुर से प्राप्त की। इलाहाबाद से अंग्रेजी में एम.ए किया और बाद बलिया में और आजमगढ में अंग्रेजी के लेक्चरर रहे। लेक्चररशिप के दौरान ही इंडियन एलाइड सर्विसेज में चयनित हुए और पोस्टल सर्विस में सेवाएँ दीं। उनके चचेरे भाई महबूब-उल-रहमान फारूकी के शब्दों में उन्होंने जब पहली बार 13-14 बरस के शम्सुर्रहमान फारुकी को देखा, तो हुलिया कुछ इस तरह था-कमीस पाजाम पहने,सर पर घुंघराले बाल,गोरा चिट्टा रंग,आंखों पर दबीज शीशे का चश्मा लगाये। याद नहीं कि उस वक्त उनके सर पर टोपी थी या नहीं। गालिबन नहीं थी,अगर्चे उस वक्त तक हमारे घरानों में बुजुर्गों के सामने नंगे सर आना या अंग्रेजी बाल रखना बहुत मायूब बात समझी जाती थी। लेकिन किसे पता था कि प्रचलित रिवाजों से इन्हराफ (अवज्ञा करना) की तमन्ना दिल में रखने वाला यह किशोर आगे चलकर उर्दू साहित्य की स्थापित धाराओं को भी नये आयाम देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
यह फारुकी की शिख्सयत का एक पहलू है। दूसरा पहलू है उनकी साहित्यिक जन्दगी। अपनी साहित्यिक यात्रा का प्ररम्भ कहानी-लेखन से करने वाले फारुकी ने गजल, नज्म, उपन्यास, अनुवाद और सम्पादन आदि अनेक विधाओं में साहित्य-सृजन किया, लेकिन उनकी आलोचना और कथा-साहित्य ने उन्हें बहुचर्चित और बहुप्रशंसित बनाया। उनके उपन्यास कई चाँद थे सरे-आस्मां ने भाषाओं की सरहद लाँघ कर अपना डंका बजाया और अनेक भाषाओं में अनूदित हुआ। छंदशास्त्र के जानकार फारुकी ने साहित्यिक पत्रिका शबखून के सम्पादन से न सिर्फ आधुनिक आलोचना की नींव रखी बल्कि आधुनिक कविता को भी नये आयाम दिए। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक समय शबखून में प्रकाशित होना ही बडी बात समझा जाता था। लेकिन आलोचना की आग में उन्होंने अपनी सृजनात्मक संवेदनाओं को भस्म नहीं होने दिया। उम्र भर अफ्साने की हिमायत में रहने के बावजूद वे शाइरी को हमेशा अफ्साने से बडी विधा मानते रहे। वे लिखते हैं कि-अफ्न्साना इतनी गहराई का मुतहम्मिल (सहिष्णु, गंभीरता) ही नहीं हो सकता जो शाइरी का वस्फ (गुण)है।
उनके चार काव्य-संग्रह गंजे-सोख्ता, सब्ज अन्दर सब्ज, चार सम्त का दरिया और आस्मां मेहराब प्रकाशित हुए। इनमें से चार सम्त का दरिया रुबाइयों का संग्रह है और बाकी तीन संग्रहों में उनकी नज्में,गजलें,तर्जुमे आदि शामिल हैं। यहाँ यह कहना गलत न होगा कि उनके आलोचक होने का खमियाजा उनकी शाइरी को भुगतना पडा। उनकी शाइरी पर गंभीरता से बात ही नहीं की गई। कुछ आलोचकों ने अवश्य उनकी शेरी सलाहियत को तवज्जौ दी। फारुकी स्वयं भी इस बात से परिचित थे, इसीलिये वे उन आलोचकों का जक्र करते हुए यह लिखते हैं कि जिन्हें मेरी शाइरी पर खुशगुमानी रही है। उनमें एक नाम बलराज कोमल का है। वे फारुकी की नज्मों के बारे में लिखते हैं कि-शम्सुर्रहमान की शाइरी में बुनियादी तज्रिबा महज बसरी (अवलोकन किया हुआ),जिस्मानी या तामीरी नौईयत (रचनात्मक विशेषता) का नहीं है।अक्सरो-बेशतर यह तज्रिबा जोरे-जमीन आग के सफर का तज्रिबा है। गंजे-सोख्ता में उनकी नज्मों के उन्वानात (शीर्षक)मुश्किल हैं। सब्ज अन्दर सब्ज की नज्मों के उन्वान निस्बतन सादा हैं। फारूकी के कलाम का मुतालआ (अध्ययन)करते वक्त एक वाजअ जिहत (स्पष्ट हेतु) का अहसास होता है। गंजे-सोख्ता में नज्मों की ड्राफ्टिंग कदरे पेचीदा है। सब्ज अन्दर सब्ज पहुँचते-पहुँचते पेचीदगी रफ्ता-रफ्ता कम होती गई है। नज्मों के ढाँचे सुडौल होते गये हैं। इस उद्धरण की रोशनी में यह भी कहा जा सकता है कि उनकी शाइरी मुश्किलपसंदी से सहजता की ओर सफर करती है।
रिवाजों से इन्हराफ करने वाले फारुकी अपनी काव्य-परम्पराओं से कटते नहीं हैं बल्कि उन परम्पराओं का निर्वाह करते हुए आधुनिक कविता का रास्ता तलाश करते दिखाई देते हैं। उनकी शाइरी (नज्में और गजलें)पढते हुए महसूस होता है कि गजलों में वे क्लासिक लबो-लहजे के तो नज्मों में आधुनिकता के पक्षधर हैं। क्लासिकी अदब में भी एक तरफ वे गालिब की मुश्किलपसंदी तो दूसरी तरफ मीर की सहज-सरलता के कायल थे। इसी के चलते वे पहले तफ्हीमे-गालिब से गालिब के चयनित शेरों की व्याख्या करते हैं, तो शेरे-शोर अंगेज में मीर के कलाम को समझने के नये दृष्टिकोण देते हैं। गालिब और मीर उन में रच-बस गये थे। अपना पहला संग्रह गंजे-सोख्ता गालिब को समर्पित करने वाले फारुकी का अदबी मिजाज भी गालिब ही की तरह रहा। जिस तरह गालिब एक तरफ मोमिन के शेर पर अपना दीवान देने की बात करते हैं और दूसरी तरफ दाग के शेर पर सर धुनते हैं, ठीक उसी तरह फारुकी भी एक ओर गालिब और मीर के मुरीद होना चाहते हैं, तो दूसरी ओर आधुनिक उर्दू कविता के प्रणेता मीराजी से प्रभावित होते हैं। वे मीराजी की तरह पाश्चात्य कवियों का न सिर्फ अध्ययन करते हैं, बल्कि उनका अनुवाद भी करते हैं और मीराजी की तरह नज्में भी कहते हैं। उनके मजमूओं की जबान भी गाजी की भाषा के क्रम में सिल्सिलेवार मुश्किल से आसान होती गई।
उनकी नज्में सब्ज सूरज की किरण, खुफिया कमरे में नजारा, संगे-सवाल, आईनाबरदार का कत्ल, आखिरी तमाशाई, तंग तन्हाई में बातचीत, मौत के लिये एक नज्म, संगे सवाल, काले फूलों का रंग और पेड विशेष ध्यानाकर्षित करती हैं। अजगर,जोगी,डूमनी और पेड को पढते हुए ध्यान मीराजी की नज्म जातरा की तरफ जाता है। पहली नजर में दोनों नज्मों का आहंग पकड में नहीं आता। लेकिन दो-तीन बार पढने के बाद इन नज्मों की गहराई समझ में आने लगती है। अगर फारुकी ही के शब्दों में कहूँ, तो ये नज्में तफहीम से तशरीह की तरफ सफर करती मालूम होती हैं। इस नज्म में वे कई शब्दों के साहचर्य से एक अलग फजा बनाते हैं। जैसे नज्म की ये पंक्तियाँ देखिये-
अजगर का लहराना अब बंद था, लेकिन वह लम्बी काली पट्टी इक मोटी-सी शाख के गिर्द यूं लिपटी थी जैसे जनम जनम की प्यासी हो। किसी किसी को उसके तिकोने चितकबरे सर की झलक आ जाती तो वह घबराकर पीछे हट जाता। फिर उस को वहम-सा होता,मेरी पीठ को इक ठंडी पतली लाल जबाने-दो शाखा चाट रही है। गर्म पसीना भल-भल करता, सारे बदन में गंदी तरी फैलने लगती।
ये पूरी नज्म एक काव्य-कथा की तरह लगती है। जिसमें वे आ जा -आ जा-आ जा-मैं मारुंगा नहीं बस पकडूंगा ले जाऊंगा। जैसी पंक्तियों से बातचीत करते मालूम होते हैं और अंत में यह पूछते हैं कि अजगर,जोगी,डूमनी और पेड इक घर में कैसे रह सकते हैं? जवाब वे नहीं देते पाठक पर छोड देते हैं। जो नज्म की पठनीयता को बढाता है।

अजगर ही की तरह साँप भी उनकी पसंद का प्रतीक है। साँप रदीफ में उनकी अपनी गजल ही नहीं डी.एच.लॉरेंस की नज्म का अनुवाद भी उन्होंने किया है जिसका शीर्षक साँप है। साँप उनके यहाँ कभी अतीत बन जाता है कभी काल और कभी एक काली रेखा। साँप के साथ जुडे सभी पौराणिक आख्यानों की रोशनी में उनकी ऐसी नज्मों को देखा-समझा जाना चाहिये। अब उनकी एक और नज्म काले फूलों का रंग की पंक्तियाँ देखिये-
कौन था
सर्द बिस्तर पर पडा,लम्बा
किसी साये से हर्गिज कम न था
किस कदर बावज्न,कितना बेबदन
गोल काला मुँह,चमकती आँखें, फिर भी जर्दरू
घर के इस दरवाजो से उस कोने तक फैला हुआ
दोनों दीवारों से टकराते हुए हाथों में टेढे काले फूल
इस नज्म को पढते हुए मुझे अपने बचपन की एक कहानी याद आ जाती है जो रात में डरा कर सुलाने के लिये सुनाई जाती थी। इसमें सोख्ता और पोख्ता नाम की दो प्रेतात्माएँ होती हैं और उनके हाथ इतने लम्बे होते हैं कि वे पलंग पर लेटे-लेटे एक-दीवार से दूसरी दीवार को छू सकती थीं। इस नज्म में भी एक ऐसा ही साया है। जिसका वज्न है, लेकिन बदन नहीं है और जिसके हाथ दोनों दीवारों से टकरा रहे हैं। नज्म के दूसरे बंद में उस के राक्षसी कद का जक्र होता है जो पत्थर के बिस्तर पर पडा है और अंत में सारी दीवारों को काला कर देता है। यह किसी मानसिक रोगी का डर भी हो सकता है कि रात के अँधेरे में किसी प्रेत का साया आ कर उसे मार डालेगा।
नज्मों के बाद अब उनकी गजलों पर बात करें। उनका एक शेर देखिये-
अच्छा है कि है जिल्दे-बदन काँटों से मानूस
मुझ से ये कबा वर्ना उतरती तो नहीं थी
जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि साँप का उनके यहाँ अहम स्थान है। इस शेर पर गौर कीजिये। इसमें बजाहिर साँप का कहीं जक्र नहीं है लेकिन इस बात से सभी बखूबी वाकिफ हैं कि साँप जंगल में अपनी केंचुली किसी पेड के कांटे से रगड खा कर उतारता है और केंचुली उतारने के बाद उसे एक नई केंचुली मिलती है, एक नया जीवन मिलता है। फारुकी कहते हैं कि मुझ से मेरी कबा अपने आप तो उतरती नहीं थी। यह तो काँटों से परिचित होने का लाभ है कि मेरी त्वचा उनसे रगड खा कर उतर गयी। यह त्वचा, जिसे वे जिल्दे-बदन कह रहे हैं, रुह का आवरण भी हो सकती है। जिसके हटने पर ही विसाल (ईश्वर से मिलन) संभव है।
गजल में उनके यहाँ जिस्मानी नहीं बल्कि रुहानी फिक्र का इज्हार मिलता है। जैसे यह शेर देखिये
कर्ब के एक लम्हे में लाख बरस गुजर गये
मालिके-हश्र क्या करें उम्रे-दराज ले के हम
फारुकी के यहाँ भी कर्ब का लम्हा -दुख का पल -लाखों बरस से बडा है। इसलिए वे लम्बी आयु के आकांक्षी नहीं। यहाँ शब्द कर्ब दृष्टव्य है। इसे हिज्र (बिछोह)से बदल कर देखें, तो शेर सामान्य हो जाएगा।
लेकिन इसके साथ ही वे यह भी कहते हैं-
बादल का आस्मान पे बनता बिगडता रूप
यादे-मिजाजे-यार की इक लहर बन गया
यहाँ यार के मिजाज को समझाने के लिये बादल का बनता-बिगडता रूप बताया गया है। यानी कभी बनता है और कभी
बिगड जाता है। इस मिजाज में कुछ भी स्थाई नहीं है। वजूद है लेकिन पकडना चाहो तो कुछ भी नहीं।
वे यह मानते जानते थे कि शाइरी या संवेदनाएँ जबान से अभिव्यक्त नहीं होती, बल्कि महसूस की जाती हैं और उसके लिये संकेत ही काफी होता है क्यों कि संकेत दुनिया की सबसे वैयक्तिक और मासूमियत भरी जबान होती है। वे कहते हैं-
मुझे सब कुछ सिखा कर काट डालेगा जबां मेरी
निशानी में वो आँखों से तकल्लुम का हुनर देगा
उनका एक शेर और देखिये-
जो कागज पे लिखा तो झूठा लगा
वो सब कुछ जो हम में जबानी हुआ
यहाँ सहसा अज्ञेय की कविता चक्रांत शिला की ये पंक्तियाँ याद आ जाती हैं-
मैं सच लिखता हूँ
लिख-लिख कर सब
झूठा करता जाता हूँ
उनकी गजलों के निम्नलिखित शेर भी देखने योग्य हैं-
इधर से देखें तो अपना मकान लगता है
इक और जाविये से आस्मान लगता है
दो चार घाटियाँ इक दश्त कुछ नदी नाले
बस उस के बाद हमारा मकान लगता है
ये किस बदन का तसर्रुफ है रु-ए-सेह्रा पर
लगाई पीठ जो मैंने कमर उसी से मिली
किरदार कत्ल करने लगे लोग यूँ कि हम
अपने ही घर में बैठ के आवारा बन गये
आज की दुनिया में हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का चरित्र-हनन करने पर तुला रहता है। ऐसे में एक संवेदनशील इन्सान के पास चुप्पी साध कर घर बैठने के अलावा क्या रास्ता हो सकता है, लेकिन दुनिया वालों की चर्चा से वह हर जगह बातचीत का विषय बन जाता है।यहां भी शब्द आवारा तवज्जो के काबिल है।
तब ऐसे हालात में इन्सान थक हार कर यही कह सकता है कि-
सौ भेस में मैं आया बोला ही नहीं कोई
अब मर के फिर उट्ठूं तो चोला ही नहीं कोई
और इस के बाद भी जब कोई समाधान या सकारात्मकता नजर नहीं आती है तो ऐसे में इस दुनिया के लोगों से परेशान हो कर कहते हैं कि-
बनाएँगे नई दुनिया हम अपनी
तिरी दुनिया में अब रहना नहीं है

सम्पर्क : कबूतरों का चौक
कल्लों की गली,