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अप्पा से मेरी मुलाकात कभी खत्म नहीं होती

सीमन्तिनी राघव
अपने भाइयों या दोस्तों के नाम चिट्ठियों में अप्पा यानी रांगेय राघव ने अक्सर मेरे लिए लिखा : Munni is fine (मुन्नी इज फाइन) (मुन्नी ठीक है।) या मुन्नी मजे में है या सीमन्तिनी ठीक है।
पर वह तब था। सन् ६०-६२
उसके बाद बीते हुए वक्त और वर्तमान के बीच एक नीरव फासला है।
***
मैंने एक कविता सालों पहले लिखी थी-
अजीबोगरीब बातों में
भागते-दौडते
या पसरते आराम से
इस से उस तक
वहाँ से यहाँ तक
कितनी सारी चीजों हुईं
और होती हैं
इसी बीच अचानक
लौटता रहा
आखिरी क्षण पिता का
जो नहीं देखा था मैंने
पर जो हमेशा देखा मैंने

दम तोडते रहे पिता
लम्हा दर लम्हा
खत्म करते एक पूरा जीवन
जिसके बाद एक-दूसरे सफर की
तैयारी थी हमारी

कुछ नहीं किया मैंने
कहा था जो अपने आप से
केवल चाहा

हुआ क्षय
पर नहीं किया
बहुत देर सोचा
फिर खिडकी से बाहर
देखा किया
सामने वही थे
दृश्य पुराने
पीछे थी तस्वीर
पिता की
बस यही कहा अपने आप से
कैसे जिया, किया
पता ही नहीं
बहुत दिनों से नहीं की बात
पिता से।
**
मेरे लिए :
एक अतीत है, जो कभी नहीं गुजरता। वह जहाँ है, उसी समय में स्थिर है। उसे बस देखने भर की जरूरत होती है, क्योंकि वह हमेशा साथ रहता है। उस वक्त में बहुत-से लोग हैं, बहुत-सी बातें है, जो मेरी जन्दगी को अर्थ देती हैं। पर सबसे अहम एक व्यक्ति है, जो उस दुनिया की धुरी है। वह रांगेय राघव हैं।
मैं ढाई साल की थी, मेरी अम्मा सुलोचना रांगेय राघव 26 वर्ष की जब अप्पा का रक्त कैंसर से देहावसान हुआ। तब वे उनतालीस साल के थे, लगभग 150 किताबें लिख चुके थे, जिनमें तकरीबन 40 उपन्यास, 80-85 कहानियाँ, नाटक, रिपोर्ताज, निबन्ध और औपन्यासिक जीवनी, कविता, इतिहास, संस्कृति, मानवशास्त्र, अनुवाद, चित्रकारी, व्याख्या, पुरातत्त्वीय खोज और फिल्म लेखन... शामिल थे।
***
John Berger, ways of seeing
जॉन बर्जर, वेज ऑफ सीईंग में लिखते हैं- सीईंग कम्ज बिफोर वड्र्स... (Seeing comes before words) देखना शब्दों के पहले आता है।
हमेशा हमारा देखा हुआ हमारे साथ रहता है। शायद यह सही है/ हो।
पर जो देखा न हो, वह फिर भी देखे हुए से ज्यादा सच लगे तो?
शब्द मेरे पास पहले आए।
वे अम्मा के थे :
तुम्हारे अप्पा तुम्हें अक्सर चित्र बनाकर देते थे- ज्यादातर चिडिया का उडती हुई, बैठी हुई, कभी बन्दर, कभी बिल्ली का....।
गाँव में जब सेवक तुम्हें घुमाकर लाता, तुम उनके लिए फूल लेकर आती थी...।
तुम्हारे पहले जन्मदिन पर गाँव में उन्होंने खुद मिट्टी के सकोरे मँगा उन पर वर्क लगाया।
बंबई अस्पताल में बीमारी के दौरान सितंबर के शुरू में जब उनकी हालत बहुत बिगडने लगी, तो मैंने उनसे पूछा, मुन्नी को बुला लूँ? (इलाज के लिए बंबई जाते समय तुम्हें मँझले भाई के परिवार के साथ छोड गए थे। तुम्हारे अप्पा ने कहा था मुन्नी को इनके पास ही छोड चलो, वहाँ पर मेरी देखभाल में तुम उस पर ध्यान नहीं दे पाओगी।)
तो कहने लगे, उसे सरसों के खेत में खेलने दो।
शब्द :
वे परिजनों के थे
वे मित्रों के संस्मरणों में थे, विशेषांकों, पत्रिकाओं में अथवा व्यक्तिशः
वे आत्मीयों की बातों में थे
वे विद्वजनों के उनके बारे में विचारों में थे
और मेरे सबसे करीब थे वे लाखों-लाख शब्द जो अप्पा ने स्वयं रचे थे, जिनसे मैं जिन्दगी के विभिन्न पहलुओं पर उनकी दृष्टि देख सकती थी, उनके मन की गहराइयों की थाह ले सकती थी।
यदि आप जानना चाहेंगे कि मैं कहाँ रहती हूँ, तो मुझे नहीं मालूम, जो पता मैं बताऊँगी, आप उसे कैसे जानेंगे। पर मैं कोशिश करूँगी।
एक ऐसे घर में जहाँ आस्मान, मिट्टी, जल, पक्षियों, गिलहरियों, पेड-पौधों के अलावा रहती हैं कुछ अनुपस्थित उपस्थितियाँ भी। अंग्रेजी में कहूँ, तो कहूँगीं absent presences और बहुत सारे शब्द अपने अर्थों के साथः
कहे- अनकहे, छपे-अनछपे। जब आप ऐसी हवा में रहते हैं, तो हवा की बारीक लहरें आफ जहन में उतरती रहती हैं और भले ही लोग स्थूल रूप से नहीं दिखें, वे जहनी तौर पर आफ साथ रहते हैं और एक रोशनी की तरह रहते हैं।

जैसे वुडकट बनते हैं, उसी तरह कुछ तारीखें समय में दर्ज हो जाती हैं, अपने विवरणों के साथ। ऐसी ही दो तारीखें हैं 17 जनवरी, 1923 और 12 सितंबर, 1962। 39 साल की रांगेय राघव की यात्रा। रांगेय राघव का जन्म और अवसान।
एक किताब है जो पिछले 34 साल से तैयार है : बहुत मेहनत और शिद्दत से तैयार की गई, पर चूँकि उसकी पांडुलिपि दो बार लंबे अर्सों के लिए गुम हो गई और जब मिली, तो उसके संपादक अशोक शास्त्री खुद अपनी महायात्रा पर चले गए, वह शायद इस साल छपी हुई किताब की शक्ल ले सके। उसका वर्किंग टाइटल था रांगेय राघव की खोज में। अब वही रहेगा।
हम अनेक दरवाजों, खिडकियों, निगाहों से रांगेय राघव को वहाँ देखते हैं। उस व्यक्ति को हम कहानियों में देखते हैं- जहाँ कहानी सिर्फ जामा है, पात्र असली हैं।
***
वैर में रांगेय राघव की हवेली में अब कोई नहीं रहता। जो वहाँ रहे थे, वे चले गए, जहाँ से कोई वापस नहीं लौटता। अगली पीढी दूसरी जगहों पर चली गई।
वहाँ जाने पर हमेशा एक रोमांच घेर लेता है।
तो यही थे वे प्रकोष्ठ, वे खिडकियाँ, वे फैली हुई छतें, वह कारे ठाकुर, यानी सीतारामजी के मन्दिर का विशाल प्रांगण जहाँ गरुड की प्रतिमा अवस्थित है, वे तीन मंजला चढती ऊँची सीढियाँ, घर के अंदर एक कोने में कुआँ जहाँ तीनों मंजलों से पानी खींचा जा सकता है, घर के पीछे की सघन, सुंदर, विस्तृत फुलवाडी जिसमें हैं सफेद महल, लाल महल, हनुमान मंदिर... और उसके बाद डाक बंगले के पीछे बहुत, बहुत दूर तक फैलता नौलक्खा, जहाँ किसी पुराने वक्त में नौ लाख पेड हुआ करते थे (और यह सब हम उनकी रचनाओं में मौजूद पाते हैं।) ...और यहीं लगभग तीन सौ साल पहले दक्षिण आरकॉट से ताताचार्य पुरोहित कुल के तमिल व संस्कृत के प्रकांड विद्वान आए थे, जिनके लिए रांगेय राघव ने लिखा था, तिरुपति से नील यमुना तीर तक, पगचिन्ह जिसके पूर्वजों के, बने, मिटकर बने मिटते... जिन्हें विद्वता के सम्मान में राजा से कुछ गाँवों की जागीरी भेंट मिली थी और इस मंदिर की स्थापना कर इसका स्वामित्व...।
रांगेय राघव की पीढी तक आते-आते घर में तमिल और चूँकि उनकी माँ का तमिल भाषी परिवार मैसूर से आया था इसलिए कन्नड और ब्रजभूमि में आने के कारण, ब्रजभाषा की ध्वनियाँ घर में गूँजतीं।
और उसी पुरोहित कुल, जागीरदार परिवार में जन्मे तिरुमलै नंबाकम् वीर राघव आचार्य, यानी पप्पू यानी रांगेय राघव ने मंदिर का स्वामित्व और संपत्ति स्वीकार नहीं की थी।
कौन और कैसा था वह व्यक्ति?
- जिसने किशोरावस्था में जल्दी ही लिखना, चित्रकारी करना शुरू किया।
-जिसे बीए की परीक्षा में अर्थशास्त्र में कंपार्टमेंट इसलिए मिला क्योंकि परीक्षा की तैयारी के बजाय उसने अपना पहला उपन्यास घरौंदें (जो बाद में घरौंदा नाम से प्रकाशित हुआ) लिखना ज्यादा महत्त्वपूर्ण समझा...।
- जो 20-21 साल की उम्र में आगरा से डॉ. कुंटे के नेतृत्व में भेजे गए मेडिकल जत्थे के साथ बतौर रिपोर्टर 1943 के अकालग्रस्त बंगाल में गाँव-गाँव की खाक छानता फिरा ताकि वह भूख से मरते हुए लोगों की कहानियाँ, उनके दुःखों को अभिव्यक्ति दे सके, जो उसने हिंदी के ज्वलंत पहले रिपोर्ताज तूफानों के बीच में किया।
जो आजादी की लडाई में अपने शब्दों के साथ सन्नद्ध था, अपने रंगकर्मी मित्रों के साथ अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाता व उनके साथ गाता हुआ जाता अपने गीत-
सबकी एक लडाई है...
दुनिया की आजादी की..
- जिसने कभी जन्दगी के बँधे-बँधाएँ प्रारूप स्वीकार नहीं किए, भले ही आर्थिक संघर्ष उसके साथ बना रहा।
- जो गलीज समझे जाने वाले लोगों को भी मनुष्यों की तरह देखने का माद्दा रखता था और उनके भावना जगत् में जा सकता था...।
- जो गाँव की धुर गरमी में पेट के बल लेट खुद पैर में पंखे की डोर बाँध उसे खींच कर हवा करना, सेवक से खिंचवाने से बेहतर समझता था और ठिठुराते जाडे में देर रात तक मसहरी में, चारपाई के फ्रेम में कुर्सी-मेज लगाकर लालटेन की रोशनी में काम कर सकता था।
- जो शहर में रिक्शेवाले, चायवाले या गाँव में भडभूँजे या खेतिहर से उतने ही अपनापे से पेश आ सकता था।
- जो किसी दौड में शामिल नहीं था, पर अकेला बीहडों की यात्रा पर था।
- जो समय के प्रवाह को जानता था कि कैसे इतिहास के लंबे रास्ते वर्तमान में आते हैं और जैसे किसी शिखर पर चढ वह भविष्य के रास्ते ढूँढ रहा था।
- जिसके लिए दोस्ताना, हँसना ऊर्जा थी, जो दोस्तों के साथ गजब अड्डेबाजी करता था और खूब मजाक भी!
- जिसके लिए शब्द पन्ने से उठकर खुद उसके व्यवहार में चला आया था।
***
रांगेय राघव ने एक बेहद उलझे, तकलीफदेह समय में जो जीवन चुना वह मुश्किल था।
- क्योंकि उन्होंने चुने शब्द। ऐसे नहीं जैसे हम आजकल इस्तेमाल करते हैं। सुविधा से उन्हें उनके अर्थों से अलग करते हुए।
- उन्होंने चुने शब्द उनके अर्थों के साथ।
- उन्होंने चुनी मन की स्वतंत्रता।
- उन्होंने चुनी निर्भीकता।
- उन्होंने चुनी मनुष्य की गरिमा।
- उन्होंने चुना एक न्याययुक्त समाज।
- उन्होंने चुनी एक संवेदनशील दुनिया।
उनके मित्र घनश्याम अस्थाना ने लिखा है-
रांगेय राघव सिनिक थे?
शायद हर कलाकर किसी न किसी रूप में सिनिक होता ही है। मगर मैं इसका जवाब न हाँ में दे सकता हूँ और न नहीं में।
- जो आदमी एक-एक दिन में 55-60 फुलस्केप कागज लिख डाले
- जो आदमी बडी मेहनत से लिखी हुई हजार पेज की कविताओं, कहानियों को दियासिलाई लगा दे, निहायत शांति और तर्क से अपने इस विध्वंसक कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहे कि बेकार की चीजों थीं सारी।
- जो आदमी डाक्टर के पूर्ण विश्राम के परामर्श का यह अर्थ समझता हो कि संस्कृत से अनुवाद कार्य करने और बडी तस्वीरे बनाने में कोई स्ट्रेन नहीं पडता।
- जो आदमी जन्दगी का नजदीक से अध्ययन करने के लिए आगरे की मई-जून की माथा चटकाने वाली धूप में और खामोशी से डस लेने वाली लू में भिखमंगों की बस्ती में घूमे और बंगाल की विभीषिका से जूझने के लिए आगरा मेडिकल मिशन के साथ इस श्मशान बने स्वर्ण देश में गाँव-गाँव सहायता कार्य करता हुआ भटके, मगर साथ ही लोक मूल्यों की कसौटी पर इतना जनभीरू साबित हो कि आगरा कांग्रेस अधिवेशन (1953) के अवसर पर नेताओं के दर्शन के लिए किले के मैदान की ओर टूटती हुई अटाटूट भीड को देखकर ताजमहल जाने का प्रोग्राम रद्द करके बिल्कुल विपरीत दिशा में सिकन्दरे की तरफ रिक्शा मुडवाकर चल दे, क्योंकि वही काम क्यों किया जाए जो सब लोग कर रहे हैं।
जो आदमी बडी लगन से पीएच.डी के लिए मेहनत करे, सामग्री जुटाने के लिए चार-चार बजे आगरे से शान्ति निकेतन दौड कर जाए, कनफटे जोगियों से घंटों उनके मत-संप्रदाय के बारे में बहस करे, दिन-रात एक कर थीसिस पूरी करे, लेकिन डिग्री मिलने का अवसर आने पर कॉन्वोकेशन के एक दिन पहले ही गाँव भाग जाए?
जाहिर है, वह आदमी सिनिक था!! शायद। मगर अब भी मैं इसका उत्तर न हाँ में दे सकता हूँ न नहीं में।
***
रांगेय राघव के लिए लिखना काम नहीं था, वह जैसे साँस लेने का पर्याय था। अपने आखिरी दिनों में भी कैंसर से जूझते हुए वे चित्रकारी कर रहे थे और लगातार लिख रहे थे। वे एक दिन में दो अलग पृष्ठभूमि के उपन्यास दो लिपिकों को सुबह-शाम बोल कर लिखवा रहे थे क्योंकि वे खुद अशक्त हो रहे थे।
ऐसे रांगेय राघव को मैंने बचपन से जाना।
जब मैं किंडरगार्टन (बाल कक्षा) में थी, किसी बच्चे ने मुझसे पूछा था मेरे पिता कहाँ रहते हैं?... हम हरी घास के मैदान पर खडे थे। मैंने सिर उठाकर नीले आस्मान की ओर हाथ से इशारा कर कहा था वे वहाँ रहते हैं। अब लगता है बालबुद्धि से दिया गया जवाब शायद इतना गलत नहीं था, क्योंकि अपने अवसान के बाद जब वे सृष्टि का हिस्सा हो गए, तो वह उसका वह उजला हिस्सा थे, जो उम्मीद का है, मनुष्यता का है, दरियादिली का है, निर्भीकता का है...।
तो जितनी यात्राएँ मैंने बचपन से कीं, अम्मा के साथ या बाद में परिजनों, मित्रों के साथ, वे हमेशा उन्हीं तक जाती थीं। भले ही वे उनके मरणोपरांत औरंगाबाद से 1966 में उन्हें गाँधी पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की हो या खिली हुई सरसों के खेतों के रास्ते वैर की हों, जहाँ अनेकों बार उनकी याद में कभी खेल-कूद प्रतियोगिता, कवि सम्मेलन, लेखक सम्मेलन आयोजित हुए।
- वह बंगाल में रवि ठाकुर के शांतिनिकेतन की हो जहाँ वे नाथ संप्रदाय पर शोधकार्य के लिए लंबे समय तक रहे। उन्होंने स्वयं लिखा है, शांति निकेतन के वे दिन मेरे लिए संस्कृति के एक संगम, एक मोड की तरह आए थे। जहाँ उन्हें आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सान्निध्य मिला।
- वह आगरा में 1983 में आयोजित त्रिदिवसीय रांगेय राघव स्मृति पर्व की हो जहाँ उनकी याद में हुई गोष्ठियों में जैसे आत्मीयों का एक शहर ही उमड आया था।
- वह 1987-88 में वैर व आस-पास के गाँवों की हो या मुंबई की जहाँ उनके बहुचर्चित उपन्यास कब तक पुकारूँ पर स्व. सुधांशु मिश्र ने दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक का निर्देशन किया।
- या ग्वालियर सिंधिया स्कूल (बॉयज) की सालोंसाल हो, जहाँ उन्होंने रांगेय राघव द्वारा शेक्सपियर के नाटकों के किए अनुवाद व उनके एक मूल नाटक का बेहतरीन मंचन किया।
- या सन् 2000 में वैर के निवासियों के स्नेह से स्थापित उनकी प्रतिमा के अवसर पर हो...।

- वे अनेकानेक गोष्ठियाँ इत्यादि... फेहरिस्त बहुत लंबी है।
- वे सारी यात्राएँ उन्हीं तक जाती हैं।
- उन जगहों पर मिले लोगों का उनके लिए स्नेह अभिभूत करता रहा है।
उन्हें गए आधीसदी से ज्यादा समय हुआ, पर वे लोगों की आँखों की चमक में, उनकी भाव-भंगिमाओं में बहुत आदर के साथ मौजूद रहे हैं।
उनकी खींची गई लकीरें बहुत लंबी हैं, उनके पैमाने बहुत मानवीय हैं...।
अप्पा से मेरी मुलाकात कभी खत्म नहीं होती।

***
सम्पर्क - भूमिका, सेक्टर-2,
घ-26 जवाहर नगर, जयपुर-4