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स्वामी विवेकानन्द : अभेद की संस्कृति

ब्रजरतन जोशी
मुझे खुशी है कि मैंने जन्म लिया था, मुझे खुशी है कि मुझे कष्ट हुआ, खुशी है कि मैंने बडी गलतियाँ कीं, खुशी है कि शांति मिली। मैंने किसी को बंधन में नहीं बाँधा, मैं भी किसी से बँधा नहीं हूँ। चाहे यह शरीर धराशायी होगा और मुझे मुक्ति मिलेगी या मैं शरीर के अंदर की स्वतंत्रता में प्रवेश करूँगा, बुजुर्ग व्यक्ति जा चुके हैं, हमेशा के लिए जा चुके हैं, अब वह कभी वापस नहीं आएँगे! मार्गदर्शक, गुरु, नेता, शिक्षक की मौत हो चुकी है.... अब वह लुप्त हो रहे हैं, और मैं दूर जा रहा हूँ। मैं आ रहा हूँ! माँ मैं आ रहा हूँ! तेरी रम छाती में, तू जहाँ कहीं भी विचरण कर रही है, मुझे अपने पास बुला लें, निःशब्द, विचित्र, आश्चर्यजनक जगत में ले चल, मैं तो कर्ता नहीं बस एक दर्शक रह गया हूँ- तुम्हारे पास आता हूँ।
18 अप्रेल 1900 में कैलिफोर्निया के अलमेडा में जोसेफ मैक्लियोड को महासमाधि से दो वर्ष पूर्व लिखे पत्र का अंश।
विवेकानन्द यानी वर्तमान का बोध। कमियों, अतियों और विदू*पताओं पर निर्मम प्रहार। किसी भी प्रकार की अंधता और पाखण्ड के खिलाफ। पददलित भारतीयों के प्रखर अधिवक्ता। सभ्यता का उत्स संस्कृति में देखने की दृष्टि। ज्ञान का अगाध महासागर।
इसलिए उनके विचार विश्व में वेदान्त भी मिलता है, तो माक्र्स सहित अन्य प्रमुख पश्चिमी विचारक भी। इसीलिए वे अपने समय के धन्य और धिक्कार दोनों को आत्मसात कर आगे बढने वाले नायकों के भी महानायक सिद्ध हुए।
वे कोई आदर्शवादी नहीं है, न रूखे दार्शनिक वरन् वे हमारे वर्तमान की विसंगतियों को भली-भाँति देखकर उसकी निर्मम आलोचना कर नवीन मार्ग का संधान करने वाले साधक हैं। उनकी प्रखर आलोचनात्मक मेधा ने समस्त द्वैतों को अद्वैत में देखा। वे सचमुच अभेद की संस्कृति के ध्वजवाहक हैं।
उन्होंने जीवन पर्यन्त पूँजीवाद का विरोध किया, अपने समय के भटके समाज को सही दिशा बोध और राह दिखाने की ईमानदार कोशिश की। सबसे बडी बात यह है कि उन्होंने हमारे अन्तर्द्वन्द्वों एवं विरोधाभासों को केवल सतही दृष्टि से नहीं देखा, वरन् एक सच्चे बौद्धिक की भाँति समग्र दृष्टियों की सीमाओं से परे जाकर अध्यात्म की दृष्टि से देखा-परखा। यह उनके व्यक्तित्व एवं चरित्र का ही प्रभाव था कि वे अपनी सुचिन्तित, तार्किक, वज्ञानिक और आध्यात्मिक मेधा के बल पर विश्व के समस्त मनुष्यों को दीप्त कर सके। वे अज्ञानता, कट्टरता, घृणा, ईर्ष्या, अन्याय, शोषण की जंजीरों में जकडे भारत के मुक्तिदाता थे।
उनकी अभेद दृष्टि ने राष्ट्रीयता के लिए जाति, धर्म और भाषा की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति को नकार दिया और माना कि किसी भी समाज की सांस्कृतिक एकता और अभिव्यक्ति ही उसका मूल है। वे स्पष्ट उद्घोषित करते हैं कि भारत के भविष्य के लिए सब धर्मों की एकता अपरिहार्य है। क्योंकि वे यह जानते थे कि भारत का स्वभाव सदैव ही उत्पीडित और शरणार्थियों के प्रति सहिष्णु रहा है। यह सहिष्णुता भारत का वह दुर्लभ गुण है जिनके कारण भारत अखिल विश्व में जाना-माना जाता रहा है। हमारे समय के मूर्धन्य रचनाकार निर्मल वर्मा ने स्वामी विवेकानंद की इस बात के लिए भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने लिखा अतीत में भारत जो भी रहा हो, लेकिन उसकी ख्याति कभी यह नहीं रही कि पराए देशों में अपने प्रसार के लिए उसने कोई जोखिम उठाए हो- न धर्मान्तरण की आकांक्षा से और न ही पराए देशों को जीतने की इच्छा से ही भारत ने कभी विश्व में अपनी उपस्थिति अंकित की। क्या यह एक विलक्षण बात नहीं है कि बिना किसी सैन्य आक्रमण या युद्ध किए एशिया के व्यापक भू-भागों पर भारतीय संस्कृति फैल सकी जिसे हम विशाल भारत की संज्ञा से जानते हैं, लेकिन स्वयं भारतीय भी अपने इतिहास की इस असामान्य घटना को शताब्दियों तक भुलाए रहे जब तक उन्हें इसका स्मरण उन्नीसवीं सदी में विवेकानन्द ने नहीं कराया।
यह अभेदत्व उन्हें अपने अद्वितीय गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस से मिला था। जिन्होंने सभी धर्मों की दीक्षा ही नहीं ली वरन् उन्हें जीकर भी दिखाया। तभी तो अपने मित्र सरफराज हुसैन को लिखे पत्र में वे यह कह पाते हैं कि जिस दिन इस्लामी देह में वेदान्ती मन होगा, वह मानवीय गरिमा का उत्कर्ष होगा।
विवेकानंद के शोधार्थी इस तथ्य से भली-भाँति अवगत होंगे कि उनके आध्यात्मिक प्रवचनों में भी सर्वधर्म प्रार्थनाएँ गाईं जाती थीं। राजस्थान में ही एक मौलवी मित्र की ओर से आयोजित विशेष सभा में उन्होंने विभिन्न भाषाओं, बोलियों और धर्मों के महापुरुषों के प्रेरणास्पद वचन सुनाकर सबको विस्मित कर दिया था। धार्मिक समन्वय उनका मार्ग था और एक-दूसरे को समझो उनका मूल मंत्र।

समाज में धर्म की उपस्थिति का आकलन करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि मैं धर्म और सम्प्रदाय में अन्तर मानता हूँ। धर्म समस्त प्रचलित सम्प्रदाय को यह मानकर स्वीकार करता है कि वह एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के निमित्त एक ही प्रकार के प्रयास हैं। उनकी दृढ मान्यता थी कि यदि केवल एक ही धर्म सच्चा हो और शेष झूठे। तो तुमको यह कहने का अधिकार होगा कि वह धर्म बीमार है। यदि एक धर्म सच्चा है तो अन्य सभी सच्चे होंगे।
वे विषम परिस्थितियों में बौद्धिक संघर्ष के साथ अध्यात्म की ओर बढने में आ रही चुनौतियों पर भी एक साथ कार्य कर रहे थे, भली-भाँति जानते थे कि यूरोप और भारत की समस्याओं में अंतर है। मद्रास में दिए अपने चर्चित उद्बोधन भारत का भविष्य विषय पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा था कि किसी भी दूसरे देश की अपेक्षा भारत की समस्याएँ अधिक जटिल और गुरुतर है।... यहाँ आर्य, द्रविड तातार, तुर्क, मुगल और यूरोपीय हैं। मानो संसार की सभी जातियाँ इस भूमि में अपना खून मिला रही है। भाषा का यहाँ एक विचित्र ढंग का जमवाडा है।
19वीं सदी में उनके जैसा सिंहनाद करने वाला प्रज्ञा पुरुष दूसरा नहीं हुआ। वे अपने विचार का एक ऐसा विस्तृत भूगोल रचते हैं जिसकी सीमाएँ तथाकथित संकीर्णताओं से मुक्त हैं। उनके अनूठे संन्यासी व्यक्तित्व का एक उज्ज्वल पक्ष यह भी है कि वे अपनी तरह के विरल वचारक हैं जो एक साथ दुनिया के विविध विचारों को पकाकर हमारे स्वस्थ होने का एक अद्भुत रसायन हमें देते हैं। यहाँ ध्यान रहे कि मैंने रसायन कहा है औषधि नहीं। क्योंकि औषधि तो तात्कालिक उपाय है, पर रसायन तो निरन्तर आफ साथ रहकर आफ रोगों का उन्मूलन करता रहता है।
मेरी क्रांतिकारी योजना शीर्षक से दिए मद्रास के भाषण से हमें आज की परिस्थितियों में अडिग, अविचल और अनासक्त भाव से आगे बढने की प्रेरणा मिलती है। वे कहते हैं कि आखिर अंग्रेजों और तुममें कितना अंतर है? अंतर इतना ही है कि अंग्रेज अपने ऊपर विश्वास करता है और तुम नहीं।... हमारी आज की सबसे बडी जरूरत आत्म-बल, अपने में अटूट विश्वास।... अब अपने पैरों पर खडे हो जाओ। हमें एक ऐसे धर्म की आवश्यकता है जिससे हम मनुष्य बन सके।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जिस विवेकानंद के साहित्य के बारे में रोम्या रोलां ने कहा था कि उनकी किताबों को पढकर जिसे बिजली का झटका न लगे, वह सचेतन मनुष्य नहीं। तो क्या आज का भारत निष्क्रिय है? आज के भारत के सामने एक के बाद एक साथ अनेक समस्याएँ सुरसा की तरह मुँह फैलाए खडी हैं, अगर अब भी हम सुप्तावस्था में हैं, तो फिर अब हम किस विकास की राह पर आगे बढे रहे हैं? कब जागेंगे? कब हम विवेकानन्द की सच्ची संतान होने की सार्थकता सिद्ध करेंगे? क्या आज के सभी ज्वलंत प्रश्न विवेकानंद के सामने नहीं थे? हमें विचार करना है कि अगर आज विवेकानंद होते, तो इन समस्याओं के साथ कैसे व किस तरह दो हाथ करते। यह सब छुपा नहीं है वरन् उनके विचारों, उनकी मूल्य दृष्टि और उनके द्वारा आजीवन चले गये पथ में हमारे सामने है। तो क्या हम उनके पथ पर चलने से बच रहे हैं? या दिन-ब-दिन हमारा आत्मिक साम्र्थ्य कमतर होता जा रहा है। यह तो तय है कि वे आजकी स्थिति-परिस्थिति में यथास्थितवादी की तरह हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठते। वे अपनी सारी प्राणऊर्जा से शंखनाद कर इन समस्याओं पर टूट पडते और सात्विक वृत्ति के साथ आगे बढकर समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खडे होते। यही एक सच्चे बौद्धिक के विवेक का आनन्द है और संदेश भी।
***
इस अंक के साथ के मधुमती अपने प्रकाशन के 61वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। साठ वर्ष की सुदीर्ध यात्रा, पीढियों को संस्कारित करने की निरन्तरता और सर्वसमावेशी मूल्यों में आस्था रखते हुए मधुमती ने अपनी पहचान बनाई है। मधुमती को देशभर के बौद्धिकों, साहित्यकारों एवं कलामर्मज्ञों का अपार समर्थन मिला है।
नया साल नई स्थितियों, नई समस्याओं, नई संभावनाओं, समाधानों को अपने में समेटे महामारी पर विजय प्राप्त करने का टीका लेकर आया है। ध्यान रहे खतरा कम हुआ, पर टला नहीं है, अतः स्वास्थ प्रथमो धनः की धारणा पर पूरा ध्यान और उसे पूरा मान देते हुए जीवन पथ पर पथारूढ हो।
मधुमती परिवार इस अंक के सहभागी रचनाकारों का हृदय से आभारी हैं कि जिन्होंने मधुमती को अपना आपर प्रेम और विश्वास दिया।
कीर्तिशेष रचनाकार स्व. रांगेय राघव के गद्यकार से तो आप भली-भाँति परिचित ही हैं, पर इस अंक के माध्यम से आप उनके चित्रकार और कवि रूप से भी परिचित होंगे। अंक का आवरण रांगेय राघव के चित्र से सजा है। मधुमती परिवार उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
पाठक और लेखकों के लिए हम यह जानकारी साझा करना चाहेंगे कि रांगेय राघव के साहित्य एवं जीवन पर प्रामाणिक जानकारी के लिए वे वेबसाईट www.rangeyaraghava.com का उपयोग कर सकते हैं।
हम आभारी हैं विशेष रूप से सुलोचना रांगेय राघव और सीमन्तिनी राघव के जिन्होंने इस अंक हेतु हमें विशेष सामग्री उपलब्ध कराई।
मधुमती अखिल भारतीय चरित्र की पत्रिका बने, ऐसा संकल्प लेकर हमने यात्रा शुरू की थी। आज वह संकल्प अपने में साकार होता दिख रहा है। यह शुभ आप सब के निश्छल प्रेम ओर सद्भाव से संभव हो रहा है। आप सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ-
- ब्रजरतन जोशी

अमर रचनाकार रांगेय राघव को साहित्य परिवार की श्रद्धांजलि
संध्यातारा
वह उडकर अंतिम चिनगारी-सा छिटक एक
संध्यातारा ऊपर आया।
घिरते अंधियारे को सहता
वह एक आँख से लगा घूरने बार-बार
ज्यों पलभर साँझ और भिनसारे की बेला को
तौल रहा था तार-तार,
तम की वह नहीं समीक्षा था,
वह तो दिनकर की अपराजित आलोक किरण की
करता पुनः प्रतीक्षा था,
वह था ज्यों दिन की मुरझी-सी सब
धूप सिमट आई उसमें
पीली-सी शोभिनि मंदप्रभा
लय के आरोहन में स्वर का संगम बनती
मूर्छना मधुर ज्यों धीमे से
जैसे माटी की ही तृष्णा
बन जाती है गेहूँ की बाली मन हरनी
कनकाभा से।
औ कालबुभुक्षा को देती है टोक अभय
जीवन गति को सौंधा करती
संबल बन कर।
***


निर्माण का विश्वास

कोकिल उठी पुकार:
कोंपलों !
वृद्ध तने पर विजयकेतु
अपने फहराओ!
बोली कोंपल : पहले उनको
गिर जाने दो
जो बाहर हैं, फिर अपनी
बारी आएगी,
अभी गर्व कर लेने दो
निर्मम पतझर को
हम आयेंगी जीवन-ज्वाला
लहराएगी
जब यह ध्वंस समझ लेगा
कोई न बचा है
तब अपनी विजयध्वनि
कण-कण पर छायेगी!
कोकिल उठी पुकार:
कोपलों! शक्ति जगाओ!
मेरे आशा के गीतों को
आ दुहराओ!


* कविताएँ स्व. रांगेय राघव के अप्रकाशित संग्रह किरणे बुहार लो से साभार। अंक के आवरण और कविताएँ सौजन्य से सुलोचना रांगेय राघव।