fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की नयी जिल्द

पल्लव
वाणी प्रकाशन ने कुछ दुर्लभ पुस्तकों और पत्रिकाओं को पुनर्प्रकाशित कर पुस्तकाकार प्रस्तुत किया है जो निश्चय ही इस बाजारीकरण के परिदृश्य में उत्साहवर्द्धक है। उन्होंने पहल सीरीज के अंतर्गत एक पुस्तक माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र का प्रकाशन किया है जो सवा तीन सौ पृष्ठों की समृद्ध जिल्द में उपलब्ध है। यह पुस्तक किए गए माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र विशेषांक का पुस्तकाकार स्वरूप है। इसे देखते ही पहल के यशस्वी संपादकों ज्ञानरंजन और कमला प्रसाद का स्मरण होता है। यह पुस्तक जब फिर पाठकों को सुलभ हुई है, तब दुनिया में माक्र्सवादी का एक विचार मरणी के रूप में राजनीतिक हलकों में पराभव का दौर है। दुनिया भर में मजबूत कम्युनिस्ट सत्तओं का अवसान हो चुका है और भारत में भी बंगाल और त्रिपुरा जैसे वामगढ अब वाम के पास नहीं रहे है। ऐसे में पहला सवाल यह उठता है कि क्या माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की कोई जरूरत हमारे समाज या अकादमिकी को है? हाँ, तो फिर क्या वह विचार-दर्शन लगभग चालीस साल बाद जस का तस छाप दिये जाने योग्य है? क्या इन चालीस सालों में पूँजी और सर्वहारा की परिभाषाएँ ठीक वही रह गई है जो तब थीं? मध्य वर्ग क्या वैसा ही है जैसा माक्र्स और एंगेल्स ने समझा था? और सूचना तकनीक के महाविस्फोट के बाद जिस नये समाज को हम देख रहे है उसका बोध तथा अभिरुचि ठीक चालीस साल पुरानी रह गई है?
फिर भी यदि इस ग्रन्थ (सचमुच इसका आकार-प्रकार की छवि देता है) को देखें-पढें तो पहली बात यह समझ आती है कि भले ही राजनैतिक लडाई में वाम विचार पराभूत दिखाई दे रहा हो, ज्ञान के अनुशासन में अभी इसकी प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। इसका कारण है भूमण्डलीकरण या नव साम्राज्यवाद द्वारा बढाई गई असमानता, और यह असमानता जब तक कायम है कोई संवेदनशील लेखक, विचारक, कलाकार कैसे निर्धन-उपेक्षित लोक के पक्ष में नहीं बोलेगा? जब तक विश्व में कला-साहित्य उपेक्षितों-वंचितों-निर्धनों के पक्ष में बोलने की आवश्यकता महसूस करेगा तब तक माक्र्सवादी दर्शन और सौन्दर्यशास्त्र की जरूरत बनी रहेगी। हाँ, किसी जीवित विज्ञान की तरह इसे नये रूप रंग में गढना होगा-बदलना होगा।
इस लिहाज से देखने पर पुस्तक के पहले खंड में दी गई सामग्री ऐतिहासिक महत्त्व की है। माक्र्स-एंगेल्स, लेनिन और माओ-त्से-तुग के कला और साहित्य पर व्यक्त विचार ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में मूल्यवान हैं। खण्ड दो में उस दौर (अस्सी के दशक में) में सक्रिय भारतीय विद्वानों के लेख हैं जो माक्र्सवाद को जरूरी विचारधारा के रूप में रेखांकित करने वाले है। ओमप्रकाश ग्रेवाल, मैनेजर पांडेय, शिवकुमार मिश्र, सत्यप्रकाश मिश्र, आनन्द प्रकाश, रामकृपाल पांडेय और राजेश्वर सक्र्सना के आलेखों की उत्तेजना मंद नहीं लगती तीसरे खंड में दुनियाभर में विख्यात रहे कुछ बडे माक्र्सवादी विचारकों चर्नीशेवस्की, प्लेखानोव, लूनाचास्र्की, क्रिस्टोफर कॉडवेल, एलिकवेस्ट, जार्ज लुकाच और हर्बट माक्र्यूज के चिन्तन पर वैचारिक आलेख हैं।
परिशिष्ट में प्रदीप सक्सेना और सदाशिव द्विवेदी के आलेख हैं जो भारतीय संदर्भों में माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की अभिलक्षणाओं की व्याख्या करते हैं। ग्रन्थ में सम्पादकीय के स्थान पर प्रकाशकीय है जो पहल के सम्पादक कमला प्रसाद ने लिखा था। इस आलेख को पढना उपयोगी और आवश्यक है। प्रो. कमला प्रसाद ने सरल भाषा में माक्र्सवादी सौन्दर्यदृष्टि पर विचार किया है। उन्होंने लिखा है-माक्र्सवादी सौन्दर्यदृष्टि रचना के क्षेत्र में कोई आरोप नहीं है। अलबत्ता वह मनुष्य की शक्ति पर अटूट आस्था का सन्देश है। यह दृष्टि अस्वीकार करती है कि रचनाकार पैदा होते है। अज्ञात शक्ति रचयिता को शक्ति नहीं देती। वह मनुष्य ही है जो शक्ति अर्जित करता है। आगे और साफ साफ लिखते हैं, भाववादी सौन्दर्यदृष्टि में सुन्दर का अर्थ ढाँचें में निहित है। चेतना की सुन्दरता प्रकाशन्तर से वहाँ एकान्त, उदासीनता और आभिजात्य संस्कृति का सहयोग है। ....यथास्थिति को कायम रखते, सामन्ती पूँजावादी सरोकारों का विस्तार अथवा महाजनी सभ्यता को फैलाने में वह नियति फलीभूत होती है। प्रो. कमला प्रसाद के इन तर्कों को न मानने का आग्रह अब भी कठिन ही है। लेकिन आगे जब वे रीतिवादी-रूपवादी सौन्दर्य दृष्टि की चर्चा करते हैं जो अब लगभग अप्रासंगिक-असंगत मालूम होती है। नवसाम्राज्यवाद ने उन स्थानों को भी विरूपित कर दिया है जहाँ सामन्तवाद और पूँजीवाद पहुँच न सके थे। चमगादड का आहार करना उसी प्रवृत्ति का लक्षण है। ऐसे में रूपवाद और इनसे माक्र्सवादी सौन्दर्य दृष्टि का अब तक अपरिहार्य माना गया दुराश्ा भी खत्म हुआ है। दूसरी बात है जीवन के समक्ष मौजूद संकट अधिक पैने-तीखे और भयानक हो गए हैं, तब कला को माक्र्सवाद-रूपवाद के द्वन्द्वों में देखना पिछडापन न कहा जाए तो क्या कहा जाएगा? धार्मिक तत्त्ववाद और फासीवादी मनोवृत्तियों का दुनियाभर में मजबूत होकर तानाशाही में बदलना भी संकेत देता है कि पुराने द्वैत/द्वन्द्व अब सर्वथा अप्रासंगिक हो चुके हैं। बिहारी को रूपवादी-रीतिवादी कहकर हम अपनी सांस्कृतिक संपन्नता से ही वंचित होंगे, बेहतर हो कि बिहारी का नया मूल्यांकन हो जिसमें स्त्रीवादी दृष्टि से भी विचार करने की गुंजाइश मौजूद रहे। पुस्तक में मौजूद अन्य सभी आलेखों को पढना एक बौद्धिक उत्तेजना का अनूठा अनुभव है जहाँ अपने दौर के विवेकी आलोचकों ने इस विचार दृष्टि के सौन्दर्य को भी समूचे उत्साह की सीमाओं को समझने में भी चूक नह करते, साहित्य की प्रभावशीलता एक और साहित्य का स्वरूप होती है। इसलिए बुनियादी बदलाव में साहित्य की सीमित भूमिका से ही सन्तोष करना उचित जान पडता है।
समूची पुस्तक को नये संदर्भों में देखना-पढना साहित्य आन्दोलनों-वैचारिक बहसों की विरासत से साक्षात्कार जैसा अनुभव है। यह किया जा सकता था कि मैनेजर पांडेय, रविभूषण या अवधेश प्रधान जैसे किसी प्रतिबद्ध माक्र्सवादी जिसमें नये संदर्भों में इस विचार सरणी की सौन्दर्यप्रतिज्ञाओं का नया औचित्य साधन किया जा सकता था। वर्तमान स्वरूप में इसे पढना ठीक वही अनुभव है जैसा पहल के मूल अंक को अभी चालीस साल बाद हाथ में लेकर पढना। श्रृंखला संपादक के रूप में राजकुमार केसवानी का नाम जिल्द के पहले पन्ने पर बडे अक्षरों में है और फ्लैप पर उनका परिचय भी। जबकि पुस्तक देखकर लगता है कि उन्होंने पहल की प्रति प्रकाशक को सौंपने के अतिरिक्त सीरिज के सम्पादन में से एक (कमला प्रसाद) का परिचय है, लेकिन ज्ञानरंजन का परिचय देना केसवानी पर नये सिरे से बात करने की गुंजाइश अभी भी मौजूद है।
बहरहाल, नयी पीढी के लिए इस तरह की सामग्री का पुनर्प्रकाशन किसी सौगात से कम नहीं। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रस्तुतीकरण की कमियों को छोड दे, तब इसे देखना-पढना सचमुच दुर्लभ अवसर सरीखा है।
पुस्तक का नाम - माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र
सम्पादक - ज्ञानरंजन, कमला प्रसाद
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली मूल्य - 695/-
वर्ष - 2019