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पूनम अरोडा की कविताएँ

पूनम अरोडा
1.
सघन केशराशि स्त्री-दर्प की चंचलता को
खारिज कहाँ करती है
न अम्बर मुक्त करता है उत्तेजना को
बारिश के सुकोमल अबीर रंगों से
तुम बैठते कुछ और देर
बातें करते कुछ विषैली और ऐषणाओं की नमी में लिपटी
आखिर हम प्रेम के स्पंदनों की
लडखडाती माया के मध्य ही तो थे
सुना है बहुत हौले से उतरता है प्रेम शानों पर
पहले नृत्य को एक काबिल हथियार बनाता है
फिर बुलबुलों के गीतों से
उस हथियार की धार तेज करता है
जरा संभल कर
खुद को आश्वस्त करके आना मेरे लिए
मैं जानती हूँ कि कहाँ तोडनी है नृत्य की उठती लहर
और कहाँ छोडने है बंदिश के इशारे
बुलबुलों के निरपेक्ष गीतों में
मैं कामी स्त्री नहीं
लेकिन बाँधे रखती हूँ
कामबोध की तीक्ष्णता को अपनी सुगंधि में
मेरी देह पर
जहाँ-जहाँ मनचली तितलियों की सरसराहट थमी हुई है
वहाँ-वहाँ मेरी त्वचा ने उगाई है वाष्प की अनंत निहारिकाएँ
कठोर हूँ न
क्योंकि तुम मेरे चाहे पुरुष नहीं
2.

पहले वह खिडकी पर अपनी उंगलियों से
रात के संकेत लिखती है
फिर किसी अदृश्य पानी की
कुछ बूँदों के साथ
खुद को बिछडने की पीडा में विलीन कर देगी
यह देखना और देखते रहना
कितना संताप भरा है
जैसे घर के सबसे छुपे कमरे में
अपनी गोपनीय उम्मीदें
इस आतंक के साथ छोड आना
कि यह उसी मुद्रा में
धूप और अंधेरे की धातु को सदा थामे रहेंगीं
बीतते हुए वह थोडा और आगे आती है
अब गले में ऐसे चुभती है
जैसे किसी पहाड की विराटता को
खुरच दिया जाता है
भविष्य की संभावित मूर्तियों के लिए
अब रात आने तक उसे ध्वनियाँ पकडनी थीं
लेकिन यह क्या
यहाँ तो एक पक्षी बैठा है
चौकन्ना
और
अस्त्रहीन
धीरे-धीरे धूप की पलकें बोझिल होने लगीं

3.
एक रंगरेज देखा
चिथडों में
रंग रहा था
दिवारों पर
संघर्ष की रोटी


4.

एक जगह होती है
जहाँ सोया जा सके
जहाँ पर छोडे जा सकें अधूरे काम और अधूरे वाक्य
जिन्हें उलट-पलट कर कोई लज्जित न कर पाए
न कर सके कोई उनकी चीर-फाड
एक ऐसी भी जगह होती है
जहाँ पर टटोलते हुए खुद को पाया जा सके बार-बार
कुछ टूटे दरवा*ो और खिडकियों से गुजरते हुए खोजी जा सकती है वह रात और बिस्तर,जहाँ गिरा दी जा सकें रोई हुई आँखें और खडी रहे थकी हुई देह
नींद एक सीलन भरी इच्छा को जन्म दे देती तो मैं बचपन की सारी आवाजों को अनसुना कर देती
छोड देती बार-बार बाबा के कमरे में जाना
उनकी बुढाती गंध में लिपटना
लेकिन बदलता कुछ नहीं इस बीच
इस बीच समय लंबा और लंबा होता जाता है
ऐसे ही कितने वसंत खुद को अलविदा कह कर
मैं अपने बालों में बारिश छुपाती आई हूँ

सम्पर्क- shreekaya@gmail.com