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गोधूलि की इबारतें

जयशंकर
आमला, 2 जनवरी 1983
कस्बाती सर्दियों के एक साधारण से दिन से नये साल की शुरुआत हो रही है। दिन भर बैंक में अपने आप को खपाकर शाम में पहले रेल्वे प्लेटफार्म की कैंटीन में कॉफी पीता हूँ। व्हिलर की किताबों की दुकान से पत्र-पत्रिका खरीदता हूँ और फिर कुछ देर रेलवे क्लब के रिडिंग रूप में अखबार पढता हूँ।
शाम को अँधेरा कुछ जल्दी उतर आता है। झाडियों से ठंडी हवाएँ रिडिंग रूप के भीतर आती है। कोट, बनियान, मफलर पहने हुए कुछ रिटायर्ड बूढे उनके साथ आये हुए उनके नाती-नातिन, जो कैरम खेलते रहते हैं।
हमारा जीवन ऐसे ही मामूली दिनों का जोड ही होता होगा। एक के बाद एक दिन। हमारा अपने बिस्तरों की सलवटों को सुबह उठते ही हटाना, दाँतों को साफ करना, धूप में कपडों को सूखने के लिए डालना, दूध गरम करना और धीरे-धीरे बैंक के लिए निकलना। हम उधर रसोई से बाहर आती हुई दूध के उबलने की गंध सूँध रहे होते हैं और बाहर ही दीवारों के आसपास कुत्ते भौंकते हैं, बिल्लियाँ रोती रहती हैं।
बचपन में पडोस में रह रही नानी की याद आती है। उनके छींटे लिए हुए सूती फ्रॉकों की। उनके बूढे चेहरे पर उतर आयी सलवटों की, उनकी देह से बाहर आती हुई पसीने की गंध की, उनके रसोई में पकते हुए माँस की गंध की और सबसे ज्यादा इस बात की कि वह हम बच्चों को यह क्यों कहा करती थी कि खरगोश कभी नहीं सोते हैं। क्या नानी की यह बात पूरी तरह सच हो सकती है?
8 जनवरी 1983
इतनी ठंड, ऐसा जाडा पहले कभी नहीं देखा था। प्रेमचंद की कहानी पूस की रात का ख्याल आता है। रात में सोते वक्त डायरी का एक पन्ना लिखने का साहस नहीं जुटा पाता हूँ। घर के एक कोने में आग जलती ही रहती है। यह कस्बा जंगलों, पहाडों और खुले-खुले मैदानों से घिरा हुआ है। एक तरफ रेलवे का जंक्शन, दूसरी तरफ एयर फोर्स स्टेशन। बडी-बडी गाडियाँ रेलवे का बेस किचन होने की वजह से यहाँ रूकती है। इधर ठंड इतनी है कि बिस्तर से बाहर निकलने का मन ही नहीं होता है।
अपनी रजाई के भीतर दुबककर टेबल लैम्प की रोशनी में देशी-विदेशी कवियों की कविताएँ पढता रहता हूँ। इन सब कवियों को अपनी कविता में रचा गया अपना-अपना संसार, मेरे अपने संसार से जुडता जाता है, मेरी अपनी दुनिया को बदलता जाता है। एक अच्छी कविता को पढकर महसूस होता है कि हमारा अपने आप से रिश्ता बदलता है, अपने आसपास से रिश्ता बदला है।
अच्छी कलाकृतियों को पढने के बाद अपना जीवन उतना सरल नहीं जान पडता है जितना उनको पढने के पहले नजर आता रहा था। अच्छी कलाकृत्तियाँ हमारी जीवनदृष्टि को, हमारी विश्वदृष्टि को जरूरी तौर पर प्रभावित करने की क्षमता रखती होगी।
इधर रात को अपने रिकार्ड प्लेयर पर संगीत सुनने का सिलसिला टूटा है, खाना खाने के बाद घूमने का भी। सर्दियों ने मेरे भीतर-बाहर को जमा-सा दिया है। हमारे पहाडों पर लोग कैसे जीवन बसर करते होंगे?
12 जनवरी 1983
आज सुबह बरसों बाद उस सैलून में गया। चर्च के सामने। लम्बा-चौडा कमरा। पुराना-शीशम का फर्नीचर। गुजराती भाषी नाई अब बूढे हो गए हैं। दीवारों पर पहलवानों, देवी-देवताओं और नेताओं की तस्वीरें। एक तस्वीर, एक फोटोग्राफ सात-आठ साल की गुलाबी फ्रॉक पहनी हुयी, गोल-मटौल-सी गोरी लडकी का भी था। वह परदा सरका कर, सामने के कमरे में देखते हुए मुस्कुरा रही है। मुझे उसके चेहरे पर उतरे भाव ने, उसकी निश्छल, भोली-भाली मुस्कान ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया। अभी तक सोच रहा हूँ कि वह क्या देखकर इस तरह मुस्कुरा रही होगी? उसकी निगाहों के सामने क्या होगा?
गिरजाघर में संडे के मास के लिए आए लोग नजर आए। ग्राटो में, मरियम की प्रतिमा के करीब काले रंग का बिल्ली का बच्चा बैठा हुआ था। बूढे पादरी (जिनकी कमर झुक आयी है) उस बिल्ली के बच्चे को उत्सुकता से देख रहे थे। डच चित्रकार रेम्ब्रां का वह प्रसिद्ध-सा चित्र याद आया, जिसमें एक बूढा गोद में बिल्ली को लिये हुए है। शायद बिल्ली की देह को सहला रहा है।
फ्रेंच लेखक अल्बेयर कामू का यह संस्मरण भी याद आया जिसमें उन्होंने बूढे होते हुए, अपने पडोसी और दूसरे प्रसिद्ध लेखक आंद्रे जीद से अपनी पहली मुलाकात का जिक्र किया है। किसी सुबह जब वे आंद्र*े जीद के घर गये, तब वे अपनी बिल्ली को गोद में लिए, बिल्ली को सहलाते हुए नजर आए थे।
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13 जनवरी, 1983
वर्जिनिया वुल्फ का निबंध How Should one read a book पढ रहा हूँ। अपने निबंध के अंत में वह लिख रही है कि कयामत के दिन की बात है। ईश्वर संत पीटर की सलाह से धरती से आए हुए अध्यापकों, डाक्टरों, वकीलों को उनके किये गए कर्मों के आधार पर पुरस्कार बाँट रहा है। कतार के लोग एक-एक कर ईश्वर और पीटर के करीब आते जा रहे हैं। तभी कुछ लोग अपनी बगल में पुस्तक दबाए हुए ईश्वर के सामने आते हैं।
ईश्वर पीटर से जानना चाहते हैं कि इन पुस्तक दबाए हुए लोगों को क्या पुरस्कार देना है? पीटर ईर्ष्या से भरे हुए, धीमी आवाज में कहते हैं कि हमारे पास इनको देने के लिए कुछ भी नहीं है, ये धरती पर पागल, गहरा पैशन लिए हुए पाठक रहे हैं और इनको कुछ भी दिया जा सकना संभव नहीं है।
वर्जिनिया वुल्फ स्वयं में एक संवदेनशील सजग पाठक बनी रही थी। कितने ही लेखकों और पाठकों का आदर्श। हेमिंग्वे उनके निबंधों की किताबों को गहरे चाव से पढते रहे थे। इनका एक उपन्यास Mrs Dalloway पढना शुरू किया था, लेकिन बीच में ही छूट गया। उसको पढने के लिए अनिवार्य एकान्त जुटा नहीं पाया। बैंक की छुट्टी के किसी दिन सुबह-सुबह ही उस उपन्यास को पढना शुरू करूँगा।
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8 फरवरी 1983
सुबह रिजेन्ट थिएटर में हंगेरियन फिल्म निर्देशक जेन्स्को की दो फिल्मे The Round up और Love Films देखी। दोनों ही फिल्मों में हंगरी का राजनीतिक-सामाजिक इतिहास है और उस इतिहास को झेलते-सहते हुए पात्रों का भावनात्मक इतिहास। पूर्वी यूरोप के कुछ देशों पर इतिहास का कितना ज्यादा बोझ रहता आया है। राजनीति क्या किसी के जीवन को इस तरह, इतना ज्यादा प्रभावित कर सकती है?
कुछ दिनों पहले ही जेन्स्कों की Electa my love और Red Psalm शीर्षकों से फिल्में देखी थीं। Love Films में बपचन, मानवीय रिश्तों, मानवीय रिश्तों के बीच की जमीन की उपस्थितियाँ, फिल्म देखने के अनुभव को आत्मीय बनती चली गयी।
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18 जनवरी, 1983
एंटन चेखव की लम्बी कहानी ञ्जद्धद्ग ष्ठह्वद्गद्य पढकर समाप्त की। इन दिनों उनकी Bet Bishop The witch और The bride जैसी महत्त्वपूर्ण, मार्मिक और असाधारण कहानियाँ पढता रहा। इनकी कहानियाँ अत्यंत नैसर्गिकता लिए हैं, बहुत ज्यादा गहराइयाँ ली हुयी जान पडती है। इतने कम पन्नों में मंत्रमुग्ध करता हुआ, सोचने- समझने के लिए पाठक को विवश करता उनका प्रांजल, पारदर्शी गद्य। चेखव का चेखोवियन संसार।
चेखव रूसी समाज और उसमें साँस ले रहे आदमी के लिए अपने लिखने में कितना ज्यादा चिंतित नजर आते हैं। उनका नैतिक आवेग कमाल का जान पडता है। वे अपनी नैतिकता को, अपनी कलात्मक कविता और मानवीयता को ऊँचाइयों तक ले जाने के संकल्प और परिश्रम के साथ अपनी कहानियाँ लिखते रहे होंगे। कहानियों की दुनिया में चेखव का होना, हम पाठकों के लिए एक दुर्लभ अनुभव बनता है और एक अविस्मरणीय-सा पाठकीय सौभाग्य।
22 जनवरी, 1983
मेरे घर से बहुत ही कम दूरी पर अमरोलीवाला निवास है। एक गली की शुरुआत में पडता है। सफेद दीवारों की इमारत। सामने फेंस से घिरा हुआ बगीचा। मैं हर वीकएंड की शामों में इस बगीचे में बैठी हुई चार-पाँच पारसी समुदाय की बूढी औरतों को देखते हुए उस गली से गुजरता हूँ। मेजबान बुडिया अपाहिज है। व्हीलचेयर पर बैठी रही है। कभी-कभार वे सब के सब खामोश बैठे रहते हैं। बहुत-बहुत पहले मेरे बचपन में इसी इमारत के पहले कमरे में पियानो की क्लासेस लगा करती थी। पडौस में डॉक्टर का क्लिीनिक था जिसकी बेंच पर बैठे-बैठे मैं यहाँ से आते हुए पियानो के स्वरों को सुना करता था।
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8 फरवरी, 1983
अखबारों में, रेडियो पर आसाम में घट रही हिंसात्मक वारदातों के समाचार आ रहे हैं। उधर पाकिस्तान में सिया और सुन्नी समुदायों के बीच संघर्ष जारी है तो बंगलादेश में छात्रों का प्रदर्शन शुरू है। बिहार के मुख्यमंत्री ने बिहार प्रेस विधायक बिल को वापस लिया है और डकैती से जुडी फुलनदेवी ने आत्मसमर्पण किया है। बैंक से लौटकर दिल्ली से आते अंग्रेजी-हिंदी अखबारों को पढता हूँ और देर-देर तक मन किसी किताब के पास जाने से रोकता रहता है। रिकार्ड-प्लेयर पर कोई रिकार्ड सुन लेता हूँ और फिर रात के खाने तक कोई न कोई किताब को पढने लगता हूँ। आजकल मन चेखव की कहानियों में, उनके नाटकों और पत्रों को पढने में लगा रहा हूँ। कस्बाती मौसम बहुत ही अच्छा हो चुका है। बसंत का जादू बसंत का जीवन।
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14 फरवरी 1983
आज आमला के कस्बाती पुलिस थाने गया था। याद आया कि विदिशा के जेल के भीतर भी जाना हुआ था। टेबल पर रोजनामचा रखा था। दीवार पर अपराधियों और अपराधों के सूचीफलक। दीवारा पर दुर्गादेवी की तस्वीर और जिले का नक्शा टंगा है। पुरुष और स्त्रियों के दो अलग-अलग बंदीगृह हैं। अंधेरे, नंगे, दुर्गधमय। दीवारों पर हथकडियाँ टँगी है। एक सिपाही गश्त दे रहा है। थानेदार की आवाज भारी और कर्कश है। देह का रंग गोरा। गोरी और थुलथुल देह।
कल किसी ने बैंक की तिजोरी तोडने का प्रयत्न किया था। नाकाम रहा। बैंककर्मियों को पंजो के निशान देने के लिए आना पडा। अभी हाल ही में बाँध के पास के हनुमान मंदिर के पुजारी की लाश उनके घर में मिली थी। बाहर के किवाड (दरवाजे) पर बाहर से ताला टँगा था। थानेदार उस घटना को सुनाता रहा। बाद में एक और घटना बाहर निकल आयी। मैं बाहर निकलना चाह रहा था। वहाँ की दुर्गन्ध से दूर। हमारे ब्रांच मैनेजर दिलचस्पी ले रहे थे। शायद सम्बन्ध बनाना चाह रहे हो। इन सबका फर्क तो पडता ही है। मुझे वहाँ बैठे रहना निरर्थक जान पड रहा था। घर में चेखव के नाटकों की किताब मेरा इन्तजार कर रही थी। इन दिनों उनका नाटक सीगल पढ रहा हूँ।
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१५ फरवरी 1983
जॉर्ज आरवेल ने अपने निबंध में लिखा है कि जेम्स हेडली चेस की अमेरिकी समाज की समझ जानकर यह आश्चर्य मिलता है कि वे अंग्रेज लेखक हैं, अमेरिकी नहीं लेकिन अमेरिकी समाज का तानाबाना कितना गहराइयों के साथ व्यक्त कर पाते हैं। व्हिलर के स्टाल से उनका उपन्यास खरीदा है। ट्रेन में पढ रहा हूँ। बाहर के लैंडस्केप में पलाश के पेड हैं। लौटती गर्मियों के दिन।
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४ मार्च, 1983
सत्यजीत राय की जय बाबा फेलूनाथ देखी। दुपहर में चेखव की एक और मार्मिक और महत्त्वपूर्ण कहानी Schoolmistress पढी। कहानी की नायिका को ट्रेन की खिडकी पर बैठी हुई मृत माँ के चेहरे को देखना। चेखव कविता की इमेजरी को अपने गद्य में पकडने की दिशा में कमाल हासिल किये हुए हैं।
चेखव मानवीय गरिमा और गौरव को, आदमी के बडप्पन और वैभव को, आदमी होने की महिमा और आन-बान को इसी तरह मानवीय सुख के नक्शों को तैयर करते रहते है। उनकी कहानियों की मानवीयता,क विता को महसूस करते हुए समझ में आता है कि क्यों बीसवीं सदी के अनेक लेखकों ने चेखव के लिखे गए को, साहित्य की दुनिया का दुर्लभ दस्तावेज माना है। एक छोटे-से जीवन का बडा-सा जादू।
७ मार्च 1983
महाराजबाग से यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी तक जाती सकरी-सी सडक, उसके दोनों तरफ खडे हुए खेत, पेड और कृषि महाविद्यालय की इमारतें मार्च की इस दुपहरी में मन को तसहल्लियों से भर देते हैं। मार्च। मुझे भाता मेरा सबसे आत्मीय महीना। लाइब्रेरी के रिडिंग रूप में बैठकर पढना शुरू ही किया था कि पहले नागचंपा के पेड के नीचे करतब दिखाते हुए बाजीगार का ध्यान आया और बाद में लिली के फूलों को छूते हुए जीसस क्राइस्ट की उस तस्वीर का जिसे लाइब्रेरी आते-आते फोटो फ्रेमिंग की एक दुकान में देखा था।
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९ मार्च, 1983
लिबर्टी टॉकीज में रिचर्ड एटेनबरो की फिल्म गाँधी को तीसरी बार देखा। बरसों बाद उनका असाधारण जीवन सिनेमा जैसे जन माध्यम में इतनी प्रवीणता, कलात्मकता लिए हुए नजर आया है। गाँधीजी के वैयक्तिक और सार्वजनिक जीवन में किए गए अनूठे प्रयोगों को अब देश-विदेश की नयी पीढी देख सकेगी। फिल्म का हिंदी संस्करण देश भर के सिनेमाघरों में दिखाया जर रहा है। यह दुख सालता है कि काश हिंदी में इसी तरह हमारी कुछ असाधारण फिल्मों का सार्वजनिक प्रदर्शन संभव हो पाता जैसे - सत्यजीत राय की पाथेर पांचाली, अपराजिता, जलसाघर और चारूलता का, ऋत्विक घटक की सुवर्णरेखा और मेघा ढका तारा का, अदूर गोपालकृष्ण की कुछ फिल्मों का। इसी तरह की कुछ भारतीय भाषाओं की फिल्मों का।
शाम को सदर के एक विडियो पार्लर में अल्फ्रेड हिचकॉक की प्रसिद्ध फिल्म साइको (Psycho) देखा। मेरे सामने दो-तीन नीग्रो दर्शक बैठे हुए थे। बीच-बीच में मेरा ध्यान एक अश्वेत युवा लडकी के बाल बाँधे जाने की अजनबी शैली पर ठहर जाता। ये शायद नाइजेरिया से पढने के लिए आए छात्र होंगे। इधर हमारे शहर में इस तरह दूसरे देशों से पढने के लिए आए हुए छात्र-छात्राएँ नजर आती रहती हैं।
अपनी डायरी उतारते हुए वैन गॉग का आज ही कहीं पढा गया वाक्य याद आता रहा- The best way to know life is to love many things.
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१२ मार्च, 1983
सिमोन द बुवा का उपन्यास The Blood of others पढा। उपन्यास की नायिका हेलेन के जीवन में उतार-चढाव, उनकी मृत्यु, उनके जीवन का परिवेश,गहरी मार्मिकता के साथ चित्रित हो पाया है। सिमोन द बुवा की बौद्धिकता, अपनी प्रसिद्ध किताब The secod sex के उनके अनुभवों, उनकी अंतर्दृष्टियों, उनके दार्शनिक लगावों, सार्त्र से उनकी गहरी और लम्बी मित्रता के बारे में कुछ-कुछ पढता-सुनता आया हूँ, लेकिन उनकी अपनी किसी कृति को पढने का मेरा पहला अवसर है। सार्त्र का एक उपन्यास The Age of Reason जरूर पढा है, लेकिन कह नहीं सकता कि वह मेरी समझ और संवेदना में जरा-सा भी उतरा है या नहीं?
1७ मार्च, 1983
फ्रांज काफ्का की कहानियों का संग्रह मेटमॉर्फसिस पढ रहा हूँ। कहानी के नायक ग्रेगोर का अपनी बहन का वायलिन वादन सुनना, ग्रेगोर के कमरे से फर्नीचर का उठाया जाना, वह सुबह जब एकाएक ग्रेगोर अपने आपको एक बडे से कीडे में परिवर्तित हुए पाता है, बीसवीं सदी की इस असाधारण, अविस्मरणीय कहानी की गहरी मार्मिकता और नैसर्गिकता, गहराइयाँ और सहजता को बढाने में मददगार होते हुए तत्त्वों की तरह नजर आते हैं।
काफ्का अपने जीवित रहते हुए साहित्य की दुनिया के कोई जाने-माने नाम नहीं रहे थे। तब जर्मनी में टामस मान, हरमन हेस की किताबे प्रसिद्ध हो रही थी। काफ्का ने अपने मित्र मैक्स ब्रॉड से अपनी पांडुलिपियाँ जला देने का आग्रह कर रखा था। पर उनके मित्र ने यह नहीं किया। बडी मुश्किलों से काफ्का के लिखे गए को बचाया। जैसे वैन गॉग के छोटे भाई थियो के बिना वैन गॉग आधे-अधूरे होंगे, वैसे ही मैक्स ब्रॉड के बिना काफ्का।
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१० जुलाई, 1983
फ्रांसिसी निर्देशक लुई बुन्वेल की काली-सफेद फिल्म नाजरीन और अकीरा कुरोसावा की थ्रोन ऑफ ब्लड देखना हो पाया। कुरोसावा की फिल्म शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक मैकबेथ पर आधारित है। कुरोसावा, बुन्वेल जैसे फिल्म निर्देशकों की फिल्मों को देखते हुए समझ में आता है कि क्यों सिनेमा बीसवी सदी के ऐसे गंभीर और गहरे कला माध्यम के रूप में विकसित होता रहा है। बुन्वेल की अपनी गहरी जडे स्पेन के इतिहास, परम्पराओं और परिवेश में छिपी है, तो कुशेसावा की जापान की अपनी मिट्टी में, जापान के अपने माहौल में। कुरोसावा के यहाँ जातीय फॉर्म की उपस्थिति, परम्परा और आधुनिकता के सहज संवादों का भी बोध करवाती है। बुन्वेल, इसाई परम्पराओं, इसाइयत की प्रतिध्वनियों- प्रतीकों से अपने सिनेमा को गहराईयाँ देते हुए जान पडते हैं।
हमारे शहर में फिल्म सोसायटी होने से हम दुनिया के अलग-अलग देशों का, अलग-अलग निर्देशकों का सिनेमा नियमित रूप से देख पा रहे हैं। हम दर्शकों के साथ यह बात बनी रहती है कि हमारे अपने देश में हमारी अपनी दुनिया में सिनेमा अपनी इतनी कम उम्र के बावजूद, मानवीय जीवन को, मनुष्य के सुख-दुख, आशा-निराशा, हार-जीत, उत्थान-पतन को कलात्मक अंर्तदृष्टि के साथ व्यक्त करता आया है।
यह सोचना अच्छा लगता है कि अभी भी हमारी दुनिया में कुरोसावा, सत्यजीत राय, बर्गमैन, अंतोनियोनी, फेलिनी जैसे निर्देशक काम कर रहे हैं, उनकी फिल्में हैं और यह भी अपने जीवन को, इस दुनिया को प्रेम करने का एक कारण बन सकता है।
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4 नवम्बर, 1983
ग्राहम ग्रीन का उपन्यास A Burnt Out case पढा। उसका नायक एक वास्तुविद् है। अपने जीवन का अर्थ, मानवीय जीवन की नैतिकता को खोजता हुआ। चिन्तन-मनन में डूबा एक व्यक्ति, जो कुष्ठरोगियों के लिए बनायी गयी एक जगह में रहने लगता है। ग्राहम ग्रीन को पढता रहा हूँ। वे अपनी आस्था को खोजते हुए, अपनी अनास्था पर ठहरते-ठिठकते हुए लेखक नजर आते हैं। वे अंग्रेज लेखक हैं लेकिन अपनी किताबों का परिवेश दूसरे देशों में दूसरे समाजों से लेते हैं। उनका यात्रा संस्मरण- Journey without maps अच्छा लगता रहा है। इधर उनकी आत्मकथा का एक हिस्सा A Short of life भी पढा है जो उनके दिलचस्प, वैविध्यता लिए हुए कैथोलिक समाज में बडे होने आदि से भरे जीवन की वजह से खूब ज्यादा पठनीय किताब बन गई है।
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११ नवम्बर, 1983
आइरिश लेखक जेम्स ज्वायस की कहानियों की किताब पढने के बाद उनका उपन्याय A Portrait of the Artist as young man पढ रहा हूँ। उपन्यास के नायक स्टीफेन का धीरे-धीरे खुलता, विकसित होता हुआ दिलचस्प, गहरा और गंभीर जीवन। अपने देशकाल को समझने-पकडने की सफल कलात्मक कोशिशें। सुना है इनके जटिल महत्त्वपूर्ण और चर्चित उपन्यास यूलिसस के बारे में। यह उपन्यास, उपन्यास की विधा में क्रांतिकारी मोड के लिए जाना जाता रहा है। इस उपन्यास को खरीद लिया है। कुछ सालों बाद पढना चाहूँगा।
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१६ नवम्बर, 1983
कला प्रदर्शनी के लिए कैटलॉग को देखकर, बीती नवम्बर के कुछ दिन याद आ गए। बसंत के दिनों के पेडों-परिन्दों का ख्याल। बंगाली भाषी मित्रों के घर की सरस्वती पूजा। पर सबसे ज्यादा वह दुपहर जब मैंने अपने बचपन के शहर में मसोजी आर्ट गैलरी और फ्रांसीसी दूतावास के संयुक्त आयोजन में इम्प्रेशनिस्ट चित्रकारों के कुछ चित्रों की प्रदर्शनी देखी थी। सेजां, देगा और पिसारो के कुछ प्रसिद्ध चित्र।
चित्रकार देगा की बैले नर्तकियों की दुनिया, सेजां के चित्रों में पुल, कार्ड प्लेयर और एक स्टील लाइफ।
दिल्ली के आधुनिक कला संग्रहालय का भी स्मरण हो आया, जहाँ अपने प्रवासों में जाता रहा हूँ। अपने देश के कलाकारों के कामों को देखता रहा हूँ। सेमिनरी हिल्स के आसपास के फरवरी के दिन, प्रकृति के अपने ग्रेस। वैभव और वरदान के कारण मंत्रमुग्ध करनेवाले दिन हो जाते हैं।
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१८ नवम्बर, 1983
आमला आये हुए एक बरस से ज्यादा समय बीत चुका है। यहाँ विदिशा से आया था। हर वीकएंड में नागपुर जा सकने की खातिर। धीरे-धीरे इस पुराने कस्बे को जान रहा हूँ। कस्बे के एक छोर पर रेल और रेल्वे की दुनिया है और दूसरे छोर पर एयर फोर्स का स्टेशन। रेलवे के पुल से उतरने पर शुरू होती सडक, एयर फोर्स के गेट तक जाती है। बीच में विभिन्न प्रकार के पेड आते हैं, अंग्रेजों के जमाने के बंगले, घर और क्वाटर्स। मेरे बैंक की इमारत के बाजू कभी केरल से यहाँ आये हुए डाक्टर मोहम्मद का बंगला है। उनके बंगले के पीछे केले और कटहल के पेड हैं। केरल से ही आए कुछ परिवार रेल्वे से जुडे हैं, कुछ सरकारी अस्पतालों से, जिनमें सिस्टर शारदा शामिल है।
सभ्यताओं को बनाने में, बचाए रखने में कितने सारे लोगों का संघर्ष और समर्पण जुडता चला जाता है। यहाँ एक मैदान में, रेलवे इंस्टीट्यूट की पीली इमारत के आसपास एक कस्बाती गिरजाघर है। वहाँ के कैथोलिक पादरी, मेरे बचपन के शहर से आए हुए है। उनकी उम्र ज्यादा नहीं है, लेकिन आँखे बहुत कमजोर हैं।
बीच-बीच में पादरी के घर चला जाता हूँ। उनके पास वक्त हो, उनका भी मन हो तो हम उनके रिकार्ड प्लेयर पर बाख और बिथोवन के रिकार्डस सुनते हैं। वे मुझे इन संगीतज्ञों के बारे में, उनकी रचनाओं के बारे में कुछ-कुछ बताते रहते हैं। इस पादरी के घर से ही हार्डी, डिकेन्स और आस्कर वाइल्ड की कुछ किताबें पढने के लिए लाता रहा हूँ।
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जबलपुर, २५ नवम्बर, 1983
मैं सदर स्थित वार-मेमोरियल और एम्पायर टॉकीज के आसपास थोडा-सा वक्त बिताकर संत पाल गिरजाघर में गया था। गिरजे के भीतर बडी संख्या में लोग उपस्थित थे। बाहर भक्तों, भिखारियों और लावारिस कुत्तों से बनती चहल-पहल। कुछ अश्वेत छात्र-छात्राएँ भी प्रार्थना में शामिल थीं। क्रिसमस कैरल की आवाजें बाहर आ रही थी। मेरा सर्दियों का अहसास गहराने लगा था। मेरी देह पर अम्मा के हाथों बुना गया हाफ स्वेटर था। अम्मा इसी शहर से आती है। आज शाम उनके बचपन के घर को देखने जाऊँगा।
आज यहाँ की एक दुकान से सार्त्र की आत्मकथा Words खरीदी। बाद में इंडियन कॉफी हाउस में उनके कुछ पन्नों को पढता-पलटता रहा था। यह अच्छा लगा कि किसी ने अपनी आत्मकथा का शीर्षक शब्द रखा है।
आमला, 18 सितम्बर, 1985
सुबह की अपनी डाक में दिल्ली से निर्मलजी का पत्र था। उस पत्र में उस जर्मन फिल्म का जिक्र था जिसे फ्रेंच लेखक मार्सेल प्रूस्त के घर में काम कर रही नौकरानी के प्रूस्त को लेकर संस्मरणों के आधार पर बनाया गया है।
दुपहर में बैंक के लंच टाइम के वक्त, अपनी केबिन में बैठकर, नीरद चौधरी की किताब Passage to England के कुछ पन्ने पढकर समाप्त किए। बरसों पुराने इंग्लैंड का लैंडस्केप, जनजीवन और सांस्कृतिक वातावरण।
शाम को रेलवे कॉलोनी के अपने क्वार्टर से आमला रेलवे स्टेशन गया। यहाँ कुछ लम्बी दूरियों पर चलने वाली तमिलनाडु और आंध*पेदश एक्सप्रेस यात्रियों के लिए खाना लेने के लिए दस-पन्द्रह मिनिट रूकती है। मैं व्हीलर के बुक स्टाल पर खडा हुआ दूरदराज से आते यात्रियों की चहल-पहल देखता रहता हूँ। देश के उत्तर और दक्षिण के लोगों, उनके पहनावों और प्लेटफॉर्म पर उनकी गतिविधियों को। आमला के प्लेटफार्म पर छोटा-मोटा हिन्दुस्तान नजर आने लगता है। विभिन्न समुदायों, भाषाओं, प्रान्तों के हर उम्र के स्त्री-पुरुष, उनके माता-पिता और बच्चे।
स्टेशन के पुल से उतरते ही टिकिट बुकिंग ऑफिस की पीली इमारत दिखाई देती है। कोने में एक छोटी-सी कैंटीन, पास खडे हुए रिक्शे। नीलगिरी के पेडों पर उतरती रात का अन्धेरा होता है और परिन्दों की चहचहाटें, जो अपने दिनभर की उडान के बाद अपने बसेरों में लौटने की खुशी मनाते हैं।
रात में सोने के लिए जाते वक्त उन पत्र-पत्रिकाओं को पलटता रहा जिन्हें व्हिलर के स्टॉल से खरीदा था। बाद में चित्रकार वैन गॉग के अपने छोटे भई थियो को लिखे गये पत्रों की किताब डियर थियो । अपने एक पत्र में वैन गॉग लिखते हैं -
we must work as much and with as few pretensions as a peasant, if we want to last.
आमला, 19 सितम्बर, 85
सुबह-सुबह टामस मान के उपन्यास द मैजिक माउन्टेन के कुछ शुरूआती पन्ने पढे। नायक की अपने घर से सेनोटोरियम तक की यात्रा सेनोटोरियम में अपने कजन से मुलाकात। उधर कुछ दिनों से टामस मान की कुछ मार्मिक कहानियों को पढना हुआ। टोनियो क्रोगर और और अर्ली सफरिंग शीर्षकों की कहानियों ने मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। उनका उपन्यास बडनब्रुक्स भी मेरे संग्रह में है। सोचता हूँ साल के आखरी-आखरी तक टामस मान को ही पढता रहूँ। दुपहर में हमारी वायु सेना शाखा के भीतर बैठा था कि खिडकी से अमरूद के पेड पर बैठे हुए बन्दर के परिवार को अमरूद खाते देखा। बूढे बंदर की आँखों में चमक, निर्भयता और बुढापा था। छोटी उम्र के बन्दरों की निगाहों में चंचलता, डर और बचपना। रात में द मैजिक माउन्टेन के कुछ पन्नों को पढा। सिद्धेश्वरी देवी का रिकार्ड सुना।
नागपुर, 22 सिम्बर, 1985
सुबह रिजेन्ट टॉकीज में डी.एच.लारेन्स की जिन्दगी के कुछ हिस्सों पर आधारित Priest of love देखी। लारेन्स का लेखन, विक्टोरियन काल की सामाजिक वर्जनाओं से अपनी असहमति जताता हुआ, सेक्स पर चिंतन-मनन करता रहा होगा, ऐसा फिल्म को देखते हुए महसूस होता रहा। जैसे टामस मान को पढते हुए महसूस होता है कि बीमारी और बीमार उनके रचनात्मक सरोकारों के केन्द्र में रहे होंगे, वैसे ही लारेन्स को पढते हुए लगता रहा है कि सेक्स उनके लेखन के प्रमुख सरोकारों में एक जरूर रहा होगा।
फिल्म में लारेन्स की यात्राएँ थीं। उनके रहने की अलग-अलग जगहें। उनका जटिल और कठिन दाम्पत्य जीवन। शायद मेरिड टू जीनियस शीर्षक की कुछ लेखकों के दाम्पत्य जीवन पर आधारित कितबा में लारेन्स और फ्राइडा के रिश्तों पर एक लम्बा लेख पढा था।
दुपहर में गाँधी भवन में कुछ मित्रों के साथ। थिएटर ग्रुप के लोग निर्मल वर्मा की किताब तीन एकान्त का पाठ कर रहे थे। उनसे कुछ देर बातचीत। रात में छत्तीसगढ से आमला के लिए। इधर शनिवार की शाम को दक्षिण एक्प्रेस से अपने बचपन के शहर में लौटने और रविवार की रात को छत्तीसगढ एक्सप्रेस से आभला जाने का सिलसिला-सा बन पडा है। छत्तीसगढ एक्सप्रेस बारह बजे के आसपास पहुँचती है। पैदल-पैदल ही अपने रेल्वे कॉलोनी में क्वार्टर में जाना होता है। लोको शेड में कर्मचारियों के काम से, भाप इंजिनों के रख-रखाव की गतिविधियों से। चहल-पहल बनी रहती है। खादी की नीले रंग की वेशभूषा में कर्मचारी दिखते रहे हैं।
नागपुर - 28 सितम्बर, 1985
आज सुबह दस बजे रूसी दूतावास के सहयोग से एक संस्था ने आंद्रेई तारकोव्स्की की फिल्म स्टाकर का पंचशील टॉकीज में प्रदर्शन किया था।
तारकोव्स्की की मिरर, सोलारिस जैसी फिल्मों की मानवीयता, मार्मिकता और कलात्मकता ने मंत्रमुग्ध कर रखा था। स्टाकर की कलात्मक अंतर्दृष्टि, ताजगी, गहराई और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया। उनका सिनेमा कितना अलग-सा सिनेमा है। कितना ज्यादा अनूठा और असाधारण सिनेमा है। उनकी यह फिल्म भी काली सफेद ही है। इसमें भी बचपन है, मासूमियत है और मासूमियत, कल्पनाशीलता और विवेकशीलता को साथ लिए हुए मानवीय पतन का प्रतिरोध। अमानवीकरण, यांत्रिकरण और लोगों को डिपर्सनलाइज करने की प्रवृत्तियों से असहमतियाँ नजर आती है। तारकोव्स्की का सिनेमा इत्मीनान का सिनेमा है।
तारकोव्स्की की फिल्में रूसी लेखन और कला की समृद्ध परंम्पराओं का गहरा और विलक्षण विस्तार जान पडती हैं। स्टाकर का एक पात्र लेखक ही है जो अपने लिए किसी सत्य, ज्ञानोदय और सौन्दर्य की तलाश में निकला है। एक प्रतिबंधित जोन में स्टाकर की मदद से जाता है। फिल्म के उस लेखक की लालसा और ललक, रूसी लेखक चेखव के व्यक्तित्व का ध्यान दिलाती है। वे भी उन्नीसवीं सदी के आखरी बरसों में, आवागमन के साधनों के अभाव के दिनों में, तपेदिक के मरीज होते हुए भी, किसी अनुभव या अंतर्दृष्टि को खोजने की खातिर सखालीन की दुर्गम, कठिन और लम्बी यात्रा पर निकले थे।
रूसी लेखकों, कलाकारों के मन में आत्मा, अंतआर्त्मा और अन्तःकरण के सवाल हमेशा से ही उपस्थित रहते आए हैं।
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नागपुर - 29 सितम्बर, 1985
पोलिश निर्देशक आंद्रे वाजदा की फिल्म The Hunting flies देखी। भविष्य के लिए, भविष्य के नाम पर वर्तमान को झुठलाता हुआ एक असुरक्षित-सा समाज। नायक का मन अनुवाद के काम में नहीं लगता है, लेकिन नायिका उसे बराबर, लगातार अनुवाद के काम से जुडने का आग्रह करती रहती हैं ताकि उनका भविष्य और ज्यादा सुरक्षित हो सके। इसके पहले आंद्रे वाजदा की फिल्म Ashes and Diamonds देखी थी। इन फिल्मों को देखते हुए पूर्वी यूरोप के समाजों के संकट समझ में आ रहे हैं। दो-दो महायुद्धों, यातना शिविरों, कम्यूनिज्म, फासिज्म के बाद की पश्चिमी दुनिया।
रात में छत्तीसगढ एक्प्रेस की बर्थ पर लेटे-लेटे मार्सेल प्रूस्त के उपन्यास wlithin a budding grove को पढता रहा।
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आमला - 4 अक्टूबर, 1985
लातिनी अमेरिकी लेखक गेब्रियल गार्सिया माक्र्वेज के असाधारण उपन्या One Hundred year of solitude में कर्नल माक्र्चेज पहला आदमी है जिसे युद्ध की अर्थहीनता, खालीपन और बेतुकेपन का अहसास मिलता है। अपने मोहभंग और विषाद के दिनों में कर्नल अमरन्ता के लिए प्रार्थना-पुस्तक ले आता है और तब अभरन्ता कहती है कि कितना अजीब है कि कोई जीवन भर पादरी के विरोध में संघर्षरत रहता है और बाद में उपहार में प्रार्थना पुस्तक देता है।
अमरन्ता की इस प्रतिक्रिया में अगर गहरा व्यंग छिपा है तो गहरा विषाद भी। व्यंग, विषाद और विडम्बनाओं के ऐसे कितने ही मार्मिक क्षण माक्र्वेज के इस दिलचस्प अविस्मरणीय उपन्यास में आते ही रहते हैं। क्रांति और परिवर्तन, न्याय, सत्य और ज्ञानोदय की तलाश में निकले संवेदनशील आदमी का अकेले होते चले जाना। अपने जीवन मूल्यों से हताश होते चले जाना, माक्र्वेज के यहाँ इस सदी की अत्यंत मार्मिक मानवीय पीडा लिए हुए उभरता है।
इसी उपन्यास में रेबेका के जीवन का अथाह अकेलापन, करुणाजनक एकान्त, विरह का वीरानापन, गहरी शिद्दत से उभरता है। रेबेका अपने घर की मरम्मत करने आए, शायद किसी और काम को करने के लिए आये, मजदूरों को ऐसे सिक्के देती है जो बरसों से चलन से बाहर आ गए हैं और रेबका को इसकी खबर नहीं है। माक्र्चेज कहते हैं कि ऐसा उजला एकान्त बरसों की यातना और पीडा भोगते रहने के बाद आता है।
एकान्त के सौ बरस के हर पात्र के भीतर हमें एक तरह के गहरे अकेलेपन का अहसास मिलता रहता है। उर्सुला का जीवन के आखरी पडाव का अंतहीन और असाधारण अकेलापन। उपन्यास की शुरूआत में उपन्यास के भौगोलिक इलाके में कब्रिस्तान नहीं रहता है और धीरे-धीरे वहाँ मृत्यु और मृतकों की दुनिया खडे होने लगती है। माक्र्वेज को पढते रहना मेरे इधर के पाठकीय जीवन का असाधारण, आत्मीय और अविस्मरणीय अनुभव बना रहेगा।
आमला, 12 अक्टूबर, 1985
विन्सेंट वान गॉग के अपने भाई थियों के नाम लिखे गए पत्रों की किताब पढ रहा हूँ। कितनी रोशनी मिलती है उनके पत्रों से। जीवन के लिए भी और कला के लिए भी। उन्होंने अपने आत्म के लिए, अपने आत्मविकास के लिए कितना कुछ किया था। कितने परिश्रम और समर्पण के साथ अपने आपको गढा था। एक छोटा-सा जीवन और इतना जोखिम उठाता हुआ। निरंतर संघर्ष और आत्मसंघर्ष में डूबा हुआ। हर वक्त संसार, कला, जीवन, न्याय, ज्ञानोदय, सौंदर्य, प्रेम, करूणा और प्रकृति पर चिंतन-मनन करता हुआ। अपने एक पत्र में वान गॉग लिखते हैं- मैं इस संसार के क्या काम आ सकता हूँ? क्या मैं इसके लिए कुछ कर सकता हूँ?
वे जीवन भर पीडित मनुष्यता के लिए व्याकुल बने रहे। मानवीयता के निर्माण और विकास के लिए चिंता भी करते रहे, चिंतन भी करते रहे। अपने एक पत्र में वे कहते हैं - मनुष्य और उसके कर्म में जो कुछ भी सुन्दर है, जो कुछ भी शिव है, जो भी आंतरिक, आध्यात्मिक या आत्मिक सौंदर्य है, वह ईश्वर की देन है और जो भी असुंदर और मलिन है, वह उसकी देन नहीं है। ईश्वर उस असौंदर्य के संग नहीं है।
वे कुछ वक्त तक एक गिरजाघर में पादरी भी रहे थे। खान मजदूरों के बीच धार्मिक प्रवचन भी देते रहे थे। उनका समूचा जीवन गरीबों से संवाद करता रहा। गरीबी को समझता-सहता रहा। अपने एक पत्र में अपनी युवावस्था के शुरूआती वर्षों में वे कहते हैं -
ईश्वर को जानने का सबसे सच्चा तरीका सृष्टि मं बहुत कुछ को प्यार करना है। कोई मित्र, कोई संगी, कोई किताब, कोई वस्तु-जिसे भी तुम पूरे मन से चाहते हो, वही तुम्हें ईश्वर के बारे में बताएगा।
इन पत्रों को पढते-पढते किताबों में उपलब्ध उनके चित्रों को भी देखता रहा हूँ। उनके चित्रों को देखकर गहरी शांति मिलती है, संगीत के किसी मंत्रमुग्ध कर देने वाले टुकडे को सुनने जैसा अहसास मिलता है।
आमला - 22 अक्टूबर, 1984
एंटन चेखव की कहानियों के नये अनुवादों के तीन संग्रह पेंग्युइन प्रकाशन से आए हैं। दिल्ली में बुकवर्म से इनको खरीदते हुए ही खुशी मिली थी। अब नये अनुवादों में उनकी कुछ आत्मीय कहानियों को पढने के सुख के साथ, सुख के बीच हूँ। बैंक में शाम को उन तक पहुँचने का इन्तजार रहता है और रात में सुबह होने का ताकि उनकी कहानियों को बैंक जाने के पहले तक पढता रह सकूँ। शरद पूर्णिमा के पडौस के दिन और रात हैं। हवा में ठंडक रहती है। आसमान नीला, कभी-कभार गाढा नीला बना रहता है।
कहानी की दुनिया में चेखव को प्रवर्तक, इम्प्रेशनिस्ट कहा जाता रहा है। यह भी सुनता हूँ कि कहानी के संसार में चेखव के आने के बाद, कहानी किस्सा नहीं रही, जीवन का हिस्सा या कतरा बन गयी। उनके यहाँ formal plot की अनुपस्थिति बढती चली गयी। इस अर्थ में उनकी कहानियाँ मोपांसा की कहानियों से अलग होती चली गई। ये दोनों ही बडे कथाकर रहे लेकिन कितने अलग-अलग ढंग से लिखते हुए। कहानी के अलग-अलग रास्तों पर चलते हुए।

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