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प्रीत के प्रेत

उमा

उसे रात बहुत पसंद है, रात उसे डराती नहीं, तभी तो अँधेरी रातों में चले आते हैं सपने...नाजुक से सपने। उसकी जवां आँखों में भी चला आया एक सपना और उसने अपना लैपटॉप ऑन कर लिया। एक खिडकी खुल गई उस ओर... और तार जुड गए दो सपनों के।
नींद नहीं आ रही है क्या?
न, नहीं... तुम्हें भी तो नहीं आई?
चली आओ यार...
आऊँगी जल्द... पापा वैसे भी मुझे यहाँ रुकने ही नहीं देते...
ऐसा क्यों!
अजीब- सी आवाजें आती हैं यहाँ, वो कहते हैं, उन्हें लगता है कि कोई साया है यहाँ....
नहीं रे... वो अकेले रहते हैं, इसलिए ऐसा लगता होगा उन्हें। वैसे तो दीवारें भी रोती हैं, जब तन्हा होती हैं... पेड भी रोते हैं, मैंने देखा है पेडों को रोते हुए...
तुम मेरा मजाक बना रहे हो
नहीं... सच कह रहा हूँ, आओगी तब दिखाऊँगा, उनका रोना, उनका हँसना...उनका चिल्लाना...
आ.....
सोनाली अपनी कुर्सी से उछल पडी, उसे सच में चीख सुनाई दी, पर यह कंप्यूटर से नहीं आई थी, न ही किसी पेड से... उसने तेज कदमों से बढते हुए कमरे का दरवाजा खोला और अपने पिता के कमरे की ओर भागी, यकीनन चीख उन्हीं की थी।
दरवाजा भीतर से बंद था। सोनाली कभी दरवाजे को जोर-जोर से पीटती, तो कभी पिता को पुकारती। चिल्लाने की आवाज तो नहीं, लेकिन कराहने की आवाज अब भी सुनाई दे रही है। थोडी ही देर में दरवाजा खुल गया, एक काँपती हुई अधेड देह...। जैसे एक पेड कटने वाला हो, वह थाम लेती है।
सोनाली ने कमरे की बत्तियाँ चालू कर दी, पलंग के पास ही मेज पर पानी का गिलास ढका रखा था। उसने उठाया और पिता को पानी पिलाया। पीठ को जरा सहलाया और बेचैन आँखों से पिता की ओर देखा- क्या हुआ था?
कातर नजरों से वह बेटी की ओर देखते रहे, कि जैसे कह रहे हों, जब मेरी बात पर ऐतबार ही नहीं, तो पूछना क्यों? फिर भी उन्हें कहना ही था, होंठ जरा फडफडाए ही थे कि बत्ती गुल हो गई। मौसम सुबह से ही गडबड था, लग रहा था कि बारिश होगी, लेकिन न हुई, पर अभी अचानक से बारिश शुरू हो गई। बादल गरजने लगे। खुली खिडकियाँ बेकाबू होने लगीं।
सोनाली ने मोबाइल का टॉर्च ऑन किया और खिडकियाँ बंद कीं। कमरे का दरवाजा भी बंद कर दिया, पिता के किस्सों से उपजा डर रह-रहकर उसे भी परेशान करता था, क्या पता सच में कोई है यहाँ! पर है भी तो क्या उसे दाखिल होने के लिए दरवाजे की जरूरत होगी!
फिर भी न जाने क्यों दरवाजा बंद कर देना सुकून देता है, उसने अपनी लय छोड चुकी साँसों को फिर से रिदम में आने की मोहलत दी और पिता के पास पहुँची। उसने महसूसा कि उनका बदन अब भी काँप रहा है। उसने बडे प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, कोई सपना देखा था क्या?
तुझे किसने बुलाया, मैंने तुझे नहीं बुलाया। अधेड के काँपते शब्दों में जबरन ठूँसा हुआ क्रोध भी महसूस हुआ।
सोनाली को आदत पड चुकी थी ऐसे नकली और डरे हुए गुस्से की। फिर भी कहाँ समझ पाई वो इस बात को कि उसके पिता क्यों उसे इस घर में नहीं रहने देते। और किसी बात का डर है, तो खुद यहाँ क्यों रहते हैं? क्यों नहीं इस मकान को बेचकर कोई ऐसा घर खरीद लेते, जो वाकई घर होता, जिसमें वह अपने पिता के साथ रहती, जिसमें...।
चेहरे पर बरसों की तकलीफ उभर आई और आँखें नम हो गईं, बरस गईं। अंधेरा सच में कितना अच्छा होता है, सिर्फ सपने ही दाखिल नहीं होते, आँसू भी बेझिझक आते हैं, बेशुमार आते हैं...।
वह एक हाथ से पिता का सिर सहलाने लगी और दूसरे हाथ से अपने आँसुओं को पोंछने लगी, इतने में ही गुल बत्ती आ धमकी, आँसुओं को रुखसत होना पडा।
सोनाली ने एक बार फिर से पूछा, अब बताओगे कि क्या हुआ था?
वो आई थी मुझे लेने। एक बच्चे की तरह डरे हुए पिता ने कहा। बेटी का हाथ कसकर थाम लिया उन्होंने।
कौन आई थी पापा?
वही.... वो एकटक छत को घूरने लगे... कुछ पल सन्नाटा पसर गया, फिर धीरे से बोले, तू जा यहाँ से, मैं ठीक हूँ। तू कल अपनी नानी के यहाँ चली जाना, वो तुझे ले जाएगी तो मैं क्या करूँगा...??
आप हमेशा ऐसा ही कहकर मुझे भेज देते हैं, मुझे बताओ भी तो आखिर बात क्या है।
मैंने किसी का बुरा नहीं चाहा और उसका तो मैं चाह भी नहीं सकता था, वो मेरे दिल के इतने करीब थी, न जाने कैसे क्या हुआ... वो बडबडाते जा रहे थे।
सोनाली ने ये सारी बातें कई बार सुन रखी थीं। अतीत को लेकर पिता का इस तरह बिखरते रहना उससे सहन नहीं होता था। और जो कुछ हुआ वो दुर्घटना ही तो थी, उसकी सजा वो कब तक यूँ खुद को देंगे।
वो पिता का सिर सहलाती रही, उन्हें सामान्य करती रही, इधर-उधर की बातें करती रही। उनकी साँसें भी थोडी ठीक लय पकड चुकी थी। तभी तो उन्हें ख्याल आया कि वो इतनी जोर से भी कहाँ चीखे थे कि बेटी की नींद उड जाती, उन्होंने बेटी से पूछा- तुम सोई नहीं थी क्या?
नहीं पापा, चैट कर रही थी दोस्तों से, नींद नहीं आ रही थी।
अच्छा, ये भी अजीब चस्का है तुम लोगों का, हमारे जमाने में ऐसे बेहूदा शौक नहीं होते थे, जाओ... अब सो जाओ, देर रात नहीं जागते, ये भूतों का वक्त है।
भूत-वूत कुछ नहीं होते पापा।
अगर नहीं होते, तो शायद ये कहने की भी जरूरत नहीं होती कि भूत नहीं होते। हमारी कल्पनाएँ इतनी महान नहीं कि जो है नहीं, उसके बारे में सोचे। खैर, तुम सो जाओ, सुबह टाइम से उठोगी, तो हम खूब सारी बातें करेंगे, फिर शाम को तुम्हें जाना है।
नहीं पापा, मैं इस बार आफ पास ही रुकूँगी।
जिद न करो।
बेच क्यों नहीं देते इस मकान को, अगर इतना ही डर है इस जगह से तो...
और अगर अपने आप से डर लगने लगे, तो क्या खुद को भी बेच दूँ?
पापा!
अब जाओ, थक गया हूँ मैं...
अधेड ने आँखें मूँद ली। कोई आप पर दरवाजा बंद कर दे, तो क्या कर सकते हैं! सोनाली भी कुछ न कर सकी। आहिस्ता-आहिस्ता कमरे से बाहर निकल गई।
करीब बीस वसंत देख चुकी थी सोनाली, लेकिन शायद ही कोई वसंत ऐसा होगा, जिसमें उसने इस घर के आँगन में पंछियों का गीत सुना हो। बस्सी तहसील जैसी छोटी-सी जगह पर एक बडा घर है उसका। बहुत हरा-भरा, लेकिन उसके घर में एक भी पेड ऐसा नहीं, जहाँ उसके बचपन की यादें झूल रही हों। सोचती है सोनाली अक्सर कि इन पेडों से ज्यादा तो दिल्ली का ट्रैफिक उसका अपना है।
बहुत छोटी थी सोनाली, जब उसकी माँ चल बसी। उदयपुर में नानी के घर बडी हुई वो। नाना-नानी के पास भी उसके सवालों के जवाब नहीं होते थे। नाना बडे प्यार से बहला देते कि बेटा जो बीत गया उसे बीत जाने दो। नाना के घर में उसे अपनी माँ की कोई फोटो भी दिखाई नहीं देती थी। क्या उसकी माँ का बचपन यहाँ नहीं बीता! वो सोचती रहती, बस सोचती रहती। पूछ नहीं पाती थी, क्या मालूम नाना-नानी को उसकी माँ की तस्वीर तकलीफ देती हो! आखिर कौन माता-पिता अपनी संतानों को सिर्फ तस्वीर में सिमटा हुआ देख पाते हैं।
झीलों की नगरी वाले इस शहर में उसके नाना के घर हरियाली सिर्फ गमलों में सिमटी थी। उसकी माँ के नाम का कोई झूला उसे यहाँ मिल भी कैसे सकता था। जब कभी बहुत उदास होकर पिता से फोन पर बात करती, तो वो उससे मिलने चले आते, तो कभी वो जिद करके पिता के पास आ जाती, लेकिन यहाँ ज्यादा दिन तक उसे वो रुकने नहीं देते। क्यों नहीं रुकने देते, क्या उनका किसी और से... !!
सोनाली सोचने लगती, लेकिन उसने कभी अपने पिता के आस-पास तो क्या, दूर तक किसी औरत का साया भी नहीं देखा था। कुछ देखा था, तो वो था, उनके चेहरे पर पसरा हुआ डर। उनकी अजीब-अजीब बातें। शायद जाने-अनजाने कोई अपराध हुआ है उनसे, पर क्या! पिता के कुछ दोस्तों को भी कुरेदा, लेकिन सबने दोस्ती ही खूब निभाई। आखिर किसी अपराधी के इतने अच्छे दोस्त कैसे हो सकते हैं!
सोनाली कुछ भी समझ नहीं पाती थी। कॉलेज की पढाई पूरी होने के बाद उसे लगा कि अब तो पापा बुला लेंगे, लेकिन उन्होंने नहीं बुलाया। न जाने क्यों नाना-नानी के यहाँ भी उसका मन नहीं लगता था, एक उदासी ओढे रहते दोनों को। सोनाली ने सोचा कि वो दिल्ली जाने की बात कहेगी, तो पिता उसे अपने पास बुला लेंगे, उसने कह दिया और.... और पिता मान भी गए!!
कैसे पापा हैं ये! उसने मन ही मन सोचा था उस रोज और घंटों रोई थी। अभी भी उसका मन हो रहा था कि जोर-जोर से रोने लग जाए। अपने कमरे में जाते ही उसने पहले लैपटॉप सँभाला, बहुत सारे मैसेज थे, वीडियो चैट विंडो बंद हो चुकी थी। उसने मोबाइल देखा-व्हाट्सएप पर भी उसके ढेर सारे मैसेज थे। उसके चेहरे पर थोडी-सी ही सही, लेकिन मुस्कान तैर गई।
एक मैसेज छोडा- सुबह बात करती हूँ
और खुद को बिस्तर पर निढाल हो जाने दिया। उसके खयालों में राजवीर का चेहरा उभर आया। थोडा मैच्योर और संजीदा चेहरा। कई बार सोचती है वो कि उसने राजवीर को क्यों चुना? क्यों उसे हमेशा ही ऐसे पुरुष ज्यादा अच्छे लगे, जो उससे उम्र में बडे होते। उसने सुना है कि लडकियाँ अपने पार्टनर में अपने पिता की छवि देखना पसंद करती है, पर क्या सच में!
यूँ राजवीर उसे इसलिए भी पसंद है कि वो सोशल वर्कर है। हाँ, तनख्वाह उठाने के लिए उसने एक एनजीओ जॉइन किया, लेकिन उसके काम का तरीका अलग है, काफी अलग। सिर्फ आठ घंटे नहीं, वह चौबीसों घंटे लोगों की मदद करने को तत्पर रहता। राँची में रहने वाले राजवीर ने ठेठ आदिवासी इलाके छाने और उनके जंगल में दखल दिये बगैर उनकी मुश्किलों को अपने स्तर पर हल करने की कोशिश भी की।
एक रोज उसने राजवीर का इंटरव्यू पढा था, सोशल वर्क के लिए कोई सम्मान मिला था उसे। न जाने उसकी तस्वीर में क्या जादू था कि सोनाली ने उसे फेसबुक पर सर्च किया और रिक्वेस्ट भेज दी। तब से चैटिंग होने लगी, फिर फोन नंबर का लेन-देन भी हुआ। नौ महीने होने को आए इस बात को, अब भी दोनों संदेशों और फॉन कॉल्स के जरिये ही एक-दूसरे से जुडे हुए हैं। सोनाली ने मोबाइल गैलेरी से उसकी तस्वीर ओपन की और अपने पास रखकर सो गई। नींद ने कब अपनी आगोश में लिया, पता ही नहीं चला।
उठ री सोन चिरैया... उठ री... सोनाली एक झटके से उठ बैठी। सुबह हो गई है। खिडकी से उजाला कमरे के भीतर दाखिल हो रहा है, लेकिन खिडकी पर कोई साया नहीं, फिर ये आवाज कहाँ से आई! उसने कमरे का दरवाजा खोला, लेकिन वहाँ भी कोई नहीं था। उसने आँगन, बरामदे और चौक में चक्कर काट लिए, पिता के कमरे के पास आकर ठिठक गई। वे कुछ गुनगुना रहे थे- मैं हूँ तेरी सोन चिरैया.... मुझे काहे उडा दिया...।
उनकी आँखें पत्थरीली ही लगा करती हैं, पत्थर से पानी रिस रहा है। सोनाली ने सोचा भीतर जाए, लेकिन कदम उठ न सके। कोई तो है, जो उसके कदमों को उठने से रोक रहा है। कोई तो है, जो उसे इस घर में रहने नहीं दे रहा, कोई तो है, जो उसके पिता को दबोचे हुए है, इस कदर कि वह उससे कभी बाहर ही नहीं निकल पाते।
सोनाली फिर से जाकर बिस्तर पर पड गई, मोबाइल उठाया और राजवीर के अनरीड मैसेज पढने लगी- अच्छा मौसम है राँची का, पेडों का हँसना और गाना सुनना हो तो आ जाना। और किसी बात की फिक्र मत करना, तुम्हारे रहने का अलग इंतजाम कर दूँगा, फिर भी आने में कोई टेंशन हो तो बस्सी का पता भेजो, मैं आता हूँ... रिश्ते को आगे बढाने या इसे तोडने के लिए मिलना जरूरी है, होप यू अंडरस्टेंड...
सोनाली ने बार-बार इस मैसेज को पढा, सच में मिलना जरूरी है... अगर राजीवर सही न निकला तो! अगर कुछ गडबड हुआ तो! खुद से सवाल किया, तसल्ली भी खुद को देती रही और तय कर लिया कि दिल्ली नहीं, राँची के जंक्शन पर ही उतरेगी इस बार।
आज ही शाम रवाना होना है, उसने तत्काल टिकट कराई और राजवीर को मैसेज छोडा। लंबा सफर है अनजानी राहों पर, सैकंड एसी का टिकिट लिया था उसने। भागते हुए पेडों और उसके बीच एक शीशे की दीवार कायम रही। न तो वहाँ से पेडों का रोना सुनाई दे रहा है, न ही उनका हँसना, अलबत्ता उनकी दौड जरूर नजर आ रही है। ठीक उसी तरह जिस तरह उसके पिता दौडते हैं, किससे भाग रहे हैं, क्यों भाग रहे हैं पता ही नहीं चलता, और तिलिस्म टूटता है, तो समझ आता है कि वे तो दौड ही नहीं रहे थे, वहीं के वहीं हैं। जब से होश संभाला, जब से उसे याद है, पिता वहीं के वहीं बने हुए हैं।
और वह... वह राँची पहुँच चुकी है।
कैसा रहा सफर? पहली बार रूबरू होते हुए राजवीर के मुँह से निकला पहला वाक्य।
वो अब पता चलेगा... सोनाली मुस्कुरा दी।
दोनों अब एक कमरे में हैं या एक-दूसरे की बाँहों में। गालों पर होठों का फिसलना जारी रहा। कुछ लम्हे यूँ ही गुजरे कि राजवीर ने खिडकी की ओर इशारा किया- देखो... फूल शरमा गए।
बैंगनी-गुलाबी फूल एक-दूसरे में घुसते दिखाई दिए, जैसे शरमा कर मुँह छिपा रहे हों। सोनाली के चेहरे पर हँसी की लहर उठ गई। हँसी इस रिश्ते पर सोनाली की तरफ से एक मोहर की तरह थी, पर राजवीर थोडा सँभल-सा गया और सोनाली के लिए कुछ खाने-पीने का ऑर्डर किया।
एनजीओ कैंपस में ही है यह रूम, जहाँ उसने सोनाली को ठहराया है। रिसर्च स्कॉलर के लिए बना यह रूम इतना बडा तो नहीं, लेकिन ठहरने के लिहाज से बुरा भी नहीं है। दूसरी मंजिल पर बने इस कमरे की बॉलकनी से राँची की खूबसूरती भीतर तक चली आती है। सोनाली ने सफर की थकान को शावर के नीचे उतारा, तब तक खाना भी लग चुका था। बातें और खाना एक-दूसरे से होड करते रहे, साथ-साथ चलते रहे, पर न जाने क्यों सोनाली के मुँह से निकल गया- तुम्हें मैं अच्छी नहीं लगी, है ना?
दोनों की चम्मचें चुप हो गईं, राजवीर भी कुछ पल चुप रहा। फिर उसकी ओर देखते हुए बोला- दुनिया में क्या कोई एक ही शख्स अच्छा होता है?’
मतलब?
तुम्हारे हिसाब से हमें हर अच्छे शख्स से शादी कर लेनी चाहिए, लेकिन शादी एक से ही करते हैं, कुछ मेरे जैसे होते हैं, जिन्हें दूसरा मौका भी मिल जाता है, तो एक या दो लोग ही दुनिया में अच्छे होते हैं, राइट?
हम्म्म... तो... मैं तुम्हें अच्छी लगी, लेकिन शादी टाइप नहीं...राइट?
हमारी उम्र में अंतर है, और दिख भी रहा है, तुम्हें बाद में अपना ही फैसला अच्छा नहीं लगेगा।
तुम मेरा काम मुझे करने दो, तुम अपना करो।
कर रहा हूँ, तुम्हें देख रहा हूँ, पर सच में सहज नहीं हूँ, तुम बहुत छोटी हो।
हाँ... तो... मुझे भी एक बाप ही चाहिए...। सोनाली को हँसी आ गई।
राजवीर भी हँस दिया- आराम करो, मैं कुछ काम निपटा लूँ, फिर चलते हैं फील्ड में... ओके...
सोनाली ने हामी भरी... राजवीर के कमरे से निकलने के बाद बॉलकनी ×ð´ •Ô¤ फूलों को निहारती रही, हर फूल, अलग-अलग दिखता है, फिर भी ये संग में कितने खूबसूरत हैं।
मोटरसाइकिल पर पीछे बैठाते हुए राजीवर ने बताया कि कोई 50 किलोमीटर दूर जाना है। इस बात ने सोनाली का दिल खुश ही किया। इस हरी-भरी जगह पर लॉन्ग ड्राइव, ख्याल तो अच्छा ही है। जुलाई की भीगी ठंडक फिजाओं में घुली हुई है। सोनाली के हाथ राजवीर के कंधों से फिसलकर उसकी कमर पर लिपट गए। सिर कंधे पर झुक गया। राजवीर ने स्पीड कम कर दी, कि मोहर लगा दी इस रिश्ते पर। कच्चे-पक्के इन रास्तों पर एक रिश्ता तय हो रहा है। एक ख्वाब सच हो रहा है।
राह में दोनों ओर आम और सागवान के पेड हवाओं को और भी ठंडा करते रहे। गुटवाटोली जैसे कई गाँवों और जंगलों से गुजरते हुए मोटरसाइकिल बरहे गाँव पहुँची। यूँ तो ये रास्ता डेढ घंटे में पूरा हो जाता है, लेकिन आज ढाई घंटे में पूरा हुआ। सिर्फ गति ही कहाँ कम की थी, राजवीर ने रास्ते भी तो बदल लिए थे। जंगल के खूबसूरत नजारे दिखाने थे, दिखाना था कि पेड जब अपने पूरे कुनबे के साथ होता है, तो कितने सुकून में होता है।
एक कच्चे पक्के से मकान के आगे राजवीर ने मोटरसाइकिल रोकी। और बताया- ये है हमारा सेंटर
रोज इतनी दूर आते हो तुम?
कहाँ है इतनी दूर और कितनी जल्दी तो पहुँच गए हम, आज तो सच में बहुत जल्द पहुँच गए।
दोनों बातों में खोए थे कि तेजी से आता एक पत्थर सोनाली के पैर पर जाकर लगा। चीख निकल गई उसकी। दोनों इधर-उधर देखने लगे, एक पेड के पीछे नजर आई, दो काली गहरी आँखें... ।
सोनाली सहम गई, वो आँखें उसे घूरती रहीं। राजवीर की नजर भी उस पर पडी, उसने अजीब-सी भाषा में लडके को कुछ कहा, लडका भी कुछ बोला, फिर वहाँ से चला गया, पर पलट-पलट कर उसे घूरकर देखता।
कौन है ये?’ सोनाली ने पूछा।
पागल है वो।
मुझे क्यों घूर रहा था? कुछ बोला भी था न मेरे लिए?
हाँ, कह रहा है कि तुम्हें नहीं छोडेगी वो, साथ लेकर जाएगी।
क्या! ये हर कोई मुझे ही क्यों साथ ले जाना चाहता है।
क्यों? कोई और भी है क्या? राजवीर कहते हुए हँस दिया।
हाँ, पापा कहते हैं कि कोई है जो उन्हें भी ले जाएगी और मुझे भी साथ ले जाएगी।
कौन?
वो कभी बताते नहीं और इसलिए मुझे अपने पास रुकने भी नहीं देते। ज्यादा से ज्यादा एक दिन रह पाती हूँ उनके पास। उस दिन भी वो पीछे पड गए कि जाओ यहाँ से नानी के। मैंने कहा दिल्ली जा रही हूँ, नानी के यहाँ जाने की बजाए दिल्ली जाकर अपना एक असाइनमेंट पूरा करूँगी और यहाँ आ गई तुम्हारे पास।
चालाकियाँ
हाँ, बेवकूफ लोग प्यार करते हैं और प्यार करके चालाक बन जाते हैं।
अच्छा, पैर तो दिखाओ, ज्यादा तो नहीं लगी? राजवीर ने झुककर उसकी चोट को टटोला।
लगी है, इतनी भी नहीं, परेशान मत हो, सेंटर दिखाओ अंदर से। और कितने लोग हैं यहाँ?’ सोनाली ने अपने पैर को थोडा परे कर लिया।
सब बताता हूँ।
दोनों सेंटर के भीतर दाखिल होने को होते हैं, इतने में राजवीर की नजर एक लडके पर पडती है। वह उसे पुकारता है, अरे मंगरा इधर तो आ जरा।
लडका तुरंत उसके पास आ जाता है और कहता है- जी साहब
ये कौन लडका घूम रहा है पगलाया-सा। देखो, मैडम पर पत्थर भी मारा उसने।
पास वाले गाँव का है, उसने पुरखों का डंडा उखाड लिया खेल-खेल में, पगला गया है तबसे। यहाँ पाहन के पास लाया था उसका परिवार। वहीं से भी भाग कर आ गया होगा, सब ढूँढ रहे थे उसे। मंगरा ने कहा।
अच्छा... चल तू बता देना कि इधर ही घूम रहा है...।
लडका हामी भरता चल देता है और राजवीर व सोनाली ऑफिस में भीतर दाखिल होते हैं। सोनाली अब भी हैरान है, कहती है- डंडा उखाडने से कोई पागल हो जाता है क्या?
अपनी-अपनी मान्यता है। ये लोग पेडों को पूजते हैं, अपने गुरु पर खूब आस्था रखते हैं। जब उनके गुरु यानी पाहन मर जाते हैं, तो ये लोग उन्हें दफनाते हैं और वहाँ एक डंडा गाढ देते हैं। ये मानते हैं कि इनके पूर्वज यहीं बसते हैं, इसलिए ये लोग कभी अपनी जगह छोडकर नहीं जाना चाहते। उस डंडे को कोई उखाड नहीं सकता। जो उसे उखाडता है, पागल हो जाता है, जैसे ये लडका। अब पाहन की पूजा से ही वो ठीक होगा।
दोनों बातें करते-करते सेंटर में भीतर दाखिल होते हैं। सोनाली की नजरें ऑफिस का मुआयना करने के लिए तैयार नहीं, उसका सारा ध्यान बातों में हैं। वो पूछती हैं, तुम इन बातों पर यकीन करते हो?
होने लगा है यहाँ रहते-रहते, वैसे मेरी माँ कहती थीं कि इन बातों पर इतनी जल्दी यकीन नहीं करना चाहिए। एक बार यकीन किया, तो फिर ये अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं। मुझे भी यही लगने लगा है कि पूर्वजों की आत्मा जहाँ बसती हो, वहाँ छेडछाड नहीं करनी चाहिए। कई किस्से देखे हैं मैंने यहाँ ऐसे।
मुझे तो लगता है कि ये लोग पढे-लिखे नहीं, इसलिए इन बातों पर यकीन करते हैं। पढ-लिख जाएँगे तो इन अंधविश्वासों की दुनिया से बाहर निकल आएँगे। क्या काम-धंधा है इनका?
खेती और चटाई बनाने जैसा काम करते हैं। सरकार खूब पैसा जारी करती है इन लोगों के लिए, लेकिन इन लोगों तक पहुँच ही नहीं पाता। नेता लोग इन्हें जमकर दारु पिला देते हैं। बस उसी से खुश हो जाते हैं ये। यहाँ से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। इन आदिवासियों को बाहरी लोग दुश्मन ही नजर आते हैं। पहले पहल तो मैं भी इन्हें दुश्मन ही लगा था। अब मेरी बात सुनने लगे हैं।
यहाँ के लोगों में सोनाली की दिलचस्पी और बढने लगती है, वह पूछती है, ये नक्सली एरिया है क्या?
नहीं, लेकिन कुछ आगे हैं, कभी-कभी आते हैं यहाँ नक्सली। इन लोगों को भी भडकाने की कोशिश करते हैं, लेकिन इन लोगों की अपनी दुनिया है, इन्हें इससे ज्यादा और इससे कम कुछ भी नहीं चाहिए।
अच्छा, तुम्हें लगता है कि पाहन पूजा करेंगे, तो वो लडका ठीक हो जाएगा?
बिलकुल मुझे ऐसा ही लगता है।
मुझे देखना है?
आस्था का इम्तिहान नहीं लिया जाता लडकी, फिर भी देख लेना। अभी तो सेंटर देखो।’
देख रही हूँ, लेकिन अभी तुम्हारी बातों में मजा आ रहा है, यहीं बैठते हैं। कच्चे-पक्के से इस सेंटर में उसने बैठने के लिए एक कोना ढूँढा और राजवीर का हाथ पकडकर बैठ गई, क्या तुम्हें आत्मा-वात्मा जैसी चीजों पर यकीन है?
राजवीर उसकी आँखों में देखता रहा फिर मुस्कुरा दिया।
बताओ?
हम्म... मैं सोचता हूँ कि जो भी ख्याल हमारे जहन में आया है, इसका मतलब ही यही है कि कहीं न कहीं उसका वजूद है।
अजीब बात है, पापा भी ऐसा ही कहते हैं। उन्हें यकीन है कि भूत होते हैं। सोनाली के चेहरे पर तनाव की लकीरें उभर आईं।
चाहता हूँ कि आज रात जब सूरज विदा हो और चाँद हमसे मिलने आए, संग भूत भी आए और तुम.... राजवीर ने उसका मूड बदलना चाहा। एक शरारत नजर आई उसके चेहरे पर।
मैं!! मैं क्या...!! डर कर चिपक जाऊँ तुमसे?
हाँ, थोडा फ्लर्ट करना सीख रहा हूँ, एक छोटी लडकी से दिल लगाया है ना। (हँसते हुए वह फिर से संजीदा हो गया) सोना मुझे लगता है कि तुम्हें एक बार और सोचना चाहिए, मैं सच में ऐसी बातें कर ही नहीं पाता, जो तुम्हारी उम्र के लोगों को अच्छी लगती हैं।
तुम प्लीज ये मत तय करो कि मुझे क्या अच्छा लगता है, क्या नहीं, मुझे बस कोई मेरे पास चाहिए, ठहरा हुआ मेरे आस-पास...इसी जंगल में बस जाएँगे हम दोनों। अब सोनाली मूड बदलने की कोशिश में लग गई।
जंगल अच्छा लगा या मैं?
दोनों...
दोनों हंस पडते हैं, फिर राजवीर, सोनाली को अपने प्रॉजेक्ट्स की डिटेल बताने लग जाता है, इस बीच कुछ लोगों का आना-जाना भी लगा रहता है। राजवीर की इच्छा है कि यहाँ के लोगों का हुनर सारी दुनिया के सामने आए। उसका मानना है कि इनका हुनर सामने तो अभी भी आ ही जाता है, लेकिन ज्यादातर लोग इनकी कला को नहीं पहचानते। ऐसे में इन लोगों को इनके हक का पूरा पैसा नहीं मिलता और न ही इनकी गिनती कलाकारों में होती है।
दोनों सेंटर के बाहर इधर-उधर घूमने लगते हैं, हरियाली के बीच में। तभी राजवीर एक लडके को आवाज देता है, अरे बुधवा, जा मैडम के लिए डुस्का तो ले आ।
ये डुस्का क्या है?
डुस्का यहाँ की पारंपरिक डिश है। चावल से बनती है। कुछ इडली की तरह, चटनी या सब्जी से खाते हैं इसे।
रहने दो ना, काम करो तुम।
मुझे मेरी ही चिंता है इसलिए मंगवा रहा हूँ, तुम्हें भूख लगी और तुम मुझे खा गई तो!
ऐसा... !! तो मंगवा लो। सुनो एक बात बताओ?
पूछो
ये यहाँ के लोगों के नाम कैसे हैं, मंगवा, बुधवा, अब कहीं कोई शनिवार न आ जाए?
हाँ, आ सकता है।
सच में!
हाँ भई, इन लोगों को तारीखें तो याद नहीं रहती, वार याद रहते हैं, जो बच्चा जिस वार को पैदा होता है, उसका नाम उसी हिसाब से रख देते हैं।
तो बहुत सारे मंगवा होंगे।
हाँ, बहुत सारे हैं, लेकिन समझ जाते हैं, किस मंगवा की बातें हो रही हैं।
सोनाली अपनी जिज्ञासा शांत करती जाती है और वो अपने सुझाव रखती जाती है। मन में ताना-बाना बुनने लगती है कि वो यहाँ इस काम में कैसे फिट बैठ सकती है। ये उसे सपनों की दुनिया लगी, एक खूबसूरत-सा सपना। सेंटर से बाहर निकलकर उसने चारों ओर देखा, मिट्टी के घर, चारों तरफ पसरे खेत और पेड-पौधे। लोग कम, पेड ज्यादा। उसके घर में भी बहुत पेड हैं, उसे याद आया कि उसने कभी किसी पेड की डाली पर घर नहीं बनाया।
सोनाली अब राजवीर के साथ घर बसाने के सपने देखने लगी। जंगल का तिलिस्म, आदिवासियों की दुनिया और फूलों के रंग उसे लुभाते रहे। झरनों का संगीत बुलाता रहा। कुदरत कितनी मेहरबान है इस जगह पर, उसे रह-रहकर अपना घर याद आता रहा, वहाँ भी कुदरत मेहरबान है, लेकिन...।
सोनाली को ऐसा लगने लगा था कि कोई तो नाता है उसके घर और इस जगह में, कुछ है जो अजीब है, कुछ है जो करीब है। कुछ....
कहाँ खो गई लडकी... मन नहीं लग रहा क्या? तुमको टाइम नहीं दे पा रहा हूँ ना... सॉरी यार।
नहीं तो... मैं देखती रही दिनभर पेडों का हँसना, रोना, खिलखिलाना...।
गुड... कल इन लोगों का त्योहार देखना, बहुत मजा आएगा।
अच्छा, कौन-सा फेस्टिवल है?
मंडा फेस्टिवल
क्या होता है इसमें?
फसल कटाई पर मनाते हैं इस त्योहार को। कोई फिक्स डेट नहीं है। जून-जुलाई में होता है। असल में हर गाँव में अपने हिसाब से तय होता है। पाहन घोषणा करते हैं ... जानती हो... इस मेले में अंगारों पर चलते हैं आदिवासी, जैसे मैं चल रहा हूँ, अभी।’ कहते हुए बहुत प्यार से देखा उसने और एक-दूसरे की आँखों में रात को डूब जाने दिया।
धम धधधम धम धधधम.... नगाडों की आवाज, जलते हुए कोयले, उठते अंगारे और उस पर चलते गुटवाटोली के लोग। सोनाली ने देखा तो दंग रह गई।
ये जल नहीं जाएँगे? सोनाली ने अचरजभरी आँखों से राजवीर की तरफ देखकर पूछा।
नहीं जलेंगे। इनकी आस्था इन्हें जलने नहीं देगी। ये त्योहार मस्ती के लिए नहीं मनाते। समर्पित होकर मनाते हैं। आठ दिन लगातार उपवास होते हैं। पेडों की पूजा होती है। कुदरत को धन्यवाद दिया जाता है, अच्छी फसल के लिए, दुआ माँगी जाती है। आस्था और तप की ताकत है कि ये लोग इतने दहकते अंगारों पर भी नहीं जलते। करीब दस फुट तक हैं ये अंगारे। राजवीर के चेहरे पर इन आदिवासियों की आस्था का भरोसा नजर आया।
हाँ देख रही हूँ, तुम चले हो इन पर कभी?
न, मेरी हिम्मत नहीं हुई। वैसे भी पूरा समय चाहिए। जो इस तरह की पूजा में शरीक होते हैं, वो ही कर सकते हैं।
किस धर्म के हैं?
सरना.... सरना धर्म। सरना माता को मानते हैं। अपने पूर्वजों को मानते हैं और सबसे बढकर इन जंगलों, पेडों को मानते हैं। आस्था जगी है इनमें कुछ? राजवीर ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए पूछा।
मालूम नहीं... वैसे अच्छा जरूर लग रहा है। दिल्ली में जितनी गाडियाँ हैं, यहाँ उतने पेड। वहाँ शोर है, यहाँ सुकून। सुकून हमारे बस्सी में भी है, लेकिन पता नहीं...! मैं भी पापा की आस्थाओं और उनकी तकलीफों को समझना चाहती हूँ।
समझ जाओगी। अभी शायद उन्हें लगता है कि तुम बच्ची हो। तुम उनसे मेरे बारे में बात करो, फिर देखना वो कैसे अपनी भडास निकालते हैं।
तुम कैसे कह सकते हो कि वो भडास ही निकालेंगे?
तुम करके देखो, पता चल जाएगा।
दोनों देर तक एकटक दहकते अंगारों की ओर देखते रहते हैं।
तभी सोनाली बोली, हो सकता है कि ये लोग ऐसी जडी-बूटी लगाते हों, जिससे आग का असर खत्म हो जाए?
बिलकुल हो सकता है, पर आस्था को परखना नहीं चाहिए। यूँ भी ये मायने नहीं रखता कि ये आग पर चलते हैं, ये मायने रखता है कि वे इससे पहले कुदरत का गान गाते हैं, पेडों से नाता गहरा करते हैं। ये कहने के साथ ही वो सोनाली का हाथ अपने हाथ में ले लेता है।
रांची से दिल्ली की ट्रेन पकडते हुए सोनाली के खयालों में सिर्फ राजवीर ही साथ नहीं रहा, आदिवासी गाँवों की मान्यताएँ और जंगल के पेड भी साथ रहे। साथ रहा, ठंडी हवा का झोंका, पर ना जाने क्यों ठंडी हवाएँ उसे डरा जाती हैं।
दिल्ली में अपना प्रॉजेक्ट पूरा करने के बाद उसने तय किया कि वो राजवीर और पापा की मुलाकात करवाएगी। आखिर कभी न कभी तो दोनों को मिलना ही है। पर जैसा कि हमेशा होता है, इस बार उससे भी ज्यादा बुरा हुआ, पिता ने साफ शब्दों में कह दिया कि उन्हें किसी से नहीं मिलना। नानी से मिलवा दो, वो शादी के बाद मिल लेंगे।
बिफर गई इस बार सोनाली और रोते हुए बोली, ठीक है, मैं तो आफ लिए मर ही गई हूँ, मर ही जाती हूँ, क्रियाकर्म भी मेरा नानी ही कर देंगी। आप अपने दडबे में घुसे रहो बस, ऐसा ही था तो पैदा किया ही क्यों मुझे!
हिचकियाँ ले-लेकर रोने लगी। दूसरी ओर फोन से मनाने की कोशिशें जारी रही।
मैं तुझे कैसे समझाऊँ मेरी बच्ची कि कितना डरता है दिल मेरा... सब खो दिया, बस तुझको नहीं खो सकता। मैं आ जाता हूँ तेरी नानी के यहाँ। बोल?
पिता की डरी हुई भीगी हुई आवाज में अपनापन तो था ही, सोनाली ने अपने आँसुओं को काबू में किया और बोली, एक दिन के लिए वहाँ, फिर अपन साथ चलेंगे नानी के... ठीक है।
तय हो गया कि पहले तो बस्सी ही जाना है। राजवीर दिल्ली पहुँच गया, वहीं से दोनों साथ बस्सी की ओर रवाना हुए। राजवीर कहता रहा- देखना तुम्हारे पिता को मैं पसंद नहीं आऊँगा। न जाने क्यों उसे लग रहा था कि कहीं तो कुछ है, जो ठीक नहीं है।
भुतहा घर, फिर कहती हो कि आवाजें आती हैं...। बस्सी में सोनाली के घर कदम रखते हुए पहली बात यही बोली राजवीर ने।
सोनाली ने भी इस पर गौर किया, कुछ पेड ज्यादा ही डरावने नजर आने लगे थे, पर पेड कोई डराते हैं क्या! डर तो सिर्फ एक ही जगह बसता है, पापा के चेहरे पर, उसने सोचा और राजवीर से पापा को मिलाया।
तीन कप रखे गए मेज पर और चाय के साथ शुरू हो गई यहाँ-वहाँ की बातें। सोनाली के पिता ने जानते हुए भी सवाल किया- क्या करते हो?
जी, एनजीओ में काम करता हूँ।
बहुत घपले होते हैं एनजीओ में।
कहाँ नहीं होते, वो जगह बता दीजिए, वहीं काम कर लूँगा।
राजवीर के इस जवाब के बाद सोनाली के पिता ने मुद्दा बदल दिया। इधर-उधर की बातें होती रहीं। इस बीच राजवीर को लगा कि उसे बता देना चाहिए कि वो डिवोर्सी है। उसके यह बताते ही सोनाली के पिता उखड गए।
उनके हाथ-पैर काँपने लगे, बस इतना मुँह से निकला, ये शादी नहीं हो सकती।
क्यों पापा? सोनाली ने पूछा
मुझसे इजाजत माँगी ही क्यों थी, अगर माननी नहीं थी तो।
सोनाली कुछ समझाती इससे पहले ही उनकी तबियत बिगडने लगी। सोनाली और राजवीर घबरा गए। सोनाली ने तुरंत अपने फैमिली डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर रोशन अच्छे दोस्त भी हैं सोनाली के पिता के, उसके एक कॉल पर वो तुरंत आ पहुँचे। न जाने कौन-कौन से इंजेक्शन दिए, पर तुरंत आराम मिल गया। कुछ दवाएँ और हिदायतें भी दी सोनाली को। सोनाली ने सब समझ लिया और पिता के पास आकर बैठ गई, लेकिन वे नींद की आगोश में जा चुके थे।
कहते हैं नींद में अतीत सामने आ जाता है। सोनाली के अधेड पिता भी अपने अतीत से मिल रहे हैं। 21 साल हो गए होंगे उन बातों को। जगमोहन... यही नाम है उनका। कैसे एक पल में उसकी दुनिया बदल गई थी। उसे साफ सुनाई दे रहा है, मंजरी का रोना और उसकी चीखें। इस घर के हर कोने में बसी थी मंजरी या यूँ कहे कि बसी है। वो देख पा रहा है उसे आज भी।
आओ ना, क्यों दूर खडे हो?, ये मंजरी की आवाज थी।
नहीं, मुझे नहीं भीगना मंजरी को देखकर हँसते हुए कहा था जगमोहन ने।
आओ ना, बारिश में झूले खाने में कितना मजा आता है, देखो तो।
देखो गिर न जाना, इतनी तेज झूला नहीं खाते।
न, मैं नहीं गिर सकती, मेरे पेड हैं ये। मैं इन्हें कितने प्यार से रखती हूँ, ये मुझे सँभालेंगे, गिरने नहीं देंगे कभी। तुम नहीं होते, तो दिनभर इन्हीं से बातें करती हूँ। तुमने सुनी हैं कभी इनकी बातें। इसी आम के पेड ने कहा था मुझे कि झूला डालो मुझ पर, झूला डालो।
मंजरी, तुम पागल हो,
हूँ तो....
हूँ तो.. हूँ तो.. मैं हूँ तो..
वो यहीं हैं, वो यहीं हैं अधकच्ची नींद में सोनाली के पिता फिर बडबडाने लगे। इंजेक्शन का असर है कि होश ठीक से आता भी नहीं और मन की बेचैनी ठीक से सोने भी नहीं देती। न जाने क्यों राजवीर को लगा कि वो इस राज तक पहुँच सकता है। उसने सोनाली के पिता का हाथ कसकर पकड लिया और प्यार से उनके सिर पर हाथ फेरने लगा, पूछा- कौन है वो? बताइए... मुझे भी लग रहा है कि यहाँ कोई है, लेकिन मैं नहीं जानता... आप जानते हैं न?
तुम्हें लगता है ना जगमोहन नींद में ही बडबडाते जा रहे हैं।
हाँ, मुझे लगता है।
साडी में नजर आती है वो। बनारसी साडी में। उसे बहुत पसंद थी ऐसी साडियाँ। जब भी कोई त्योहार होता या कोई खास मौका, वो बनारसी साडी पहनना पसंद करती।
कौन? सोनाली की माँ? पूछते हुए राजवीर ने उनका हाथ और कसकर पकड लिया था।
नहीं... वो सोनाली की माँ नहीं...
तो फिर कौन? ये कहने के साथ ही राजवीर ने सोनाली की तरफ सवालिया नजरों से देखा और वापस पलंग पर अधलेटे जगमोहन पर आँखें ठहर गईं।
मेरी पत्नी धीरे से बुदबुदाए जगमोहन और उनके चेहरे पर खींची तनाव की लकीरें कुछ कम हुई। मानो नींद में भी राहत मिल रही हो, कुछ गुब्बार हल्का हो रहा है। इतना हल्का कि नींद का भारीपन पीछे छूट जाता है। वो धीरे-धीरे आँखें खोलते हैं। मैं कुछ कह रहा था क्या? पूछा उन्होंने।
नहीं... कुछ भी नहीं, कुछ बडबडाए, पर समझ नहीं आया। आप तनाव न लें मेरी वजह से, आपकी मर्जी के विरुद्ध कुछ नहीं होगा। राजवीर ने तसल्ली दी और कमरे से पहले ही बाहर निकल चुकी सोनाली को तलाशने निकल गया।
ढूँढा उसे, छत पर एक कोने में सिमटी हुई है वो, फूट-फूट कर रोये जा रही है। राजवीर को देखते ही लिपट गई, मैं पापा की बेटी नहीं हूँ ना, पापा इसलिए ही मुझे अपने पास नहीं रखते।
पागल हो तुम। अगर उन्हें तुमसे कोई मतलब नहीं होता, तो उन्हें क्या फर्क पडता है कि तुम किसी डिवोर्सी से शादी करो या नहीं। कुछ और बात है सोना, उनकी नींद खुल गई, नहीं तो उनकी नींद ही हमें सब बता देती।
पूनम के चाँद की रोशनी में दोनों एक-दूसरे का चेहरा साफ देख पा रहे हैं। सोनाली की नजरें राजवीर के चेहरे पर अटक जाती हैं और सवाल करती हैं।
नींद में हम छल-कपट से परे होते हैं। बस अपने साथ होते हैं। जो लोग नींद में बडबडाते हैं, उनके दिल की बात जानी जा सकती है। सोनाली हम डॉक्टर साहब से बात करें तो! फैमिली डॉक्टर है ना तुम्हारे, उन्हें सब मालूम होना चाहिए।
सोनाली सहमत नजर आती है, दोनों सुबह का इंतजार करते हैं, डॉक्टर के आ जाने का। डॉक्टर जगमोहन को एग्जामिन करते हैं, उनके कमरे से बाहर निकलकर वो सोनाली से पूछते हैं- कैसी रही तबियत?
अच्छी नहीं थी, मंजरी का नाम ले लेकर बडबडा रहे थे, मैं जानती हूँ कि आप जानते हैं सारी बातें, न जाने क्यों मुझे नहीं बताते। बडी हो गई हूँ मैं, शादी करने जा रही हूँ अंकल... क्या मुझे हक नहीं ये जानने का कि किसकी बेटी हूँ मैं? मेरे लिए न सही तो अपने दोस्त के लिए बता दो, जो हर पल तडपते रहते हैं...।
सोनाली की आँखें बरसने लगीं, आँसू जाया नहीं गए, जो कहानी सामने आई, कुछ इस तरह है-
मंजरी का बचपन इसी घर में बीता। मंजरी के पिता और जगमोहन के पिता में अच्छी दोस्ती थी। एक एक्सीडेंट में मंजरी के माता-पिता की जिंदगी चली गई और मंजरी की जिंदगी इस घर में कटने लगी।
मंजरी और जगमोहन के बीच रिश्ता दोस्ती का था या कुछ और, पता नहीं, पर बहुत प्यारा रिश्ता था, शायद इसलिए जगमोहन के पिता को लगा कि दोनों की शादी कर दी जाए। शादी हो गई, लेकिन शायद यह रिश्ता दोस्ती का था। जिनके बीच बचपन बीतता है, वे दिल में बेचैनी नहीं जगा पाते। जगमोहन की जिंदगी में एक स्त्री आई, वैष्णवी। वैष्णवी किसी सरकारी प्रॉजेक्ट के सिलसिले म यहाँ कुछ महीनों रहने के लिए आई थी। आधुनिक और आजाद खयाल सीमा लांघ गए, होश तब आया जब सोनाली उसके गर्भ में आई। जगमोहन को अपनी गलती का एहसास था, लेकिन अजन्मे बच्चे की फिक्र भी। मंजरी को बताने के सिवा कोई और चारा नहीं था। इस आंगन के पेड-पौधों के बीच रची-बसी मंजरी को जब ये पता चला तो, उसे लगा कि उसकी जडें किसी ने उखाड फेंकीं।
वो पेडों से लिपट कर जोर-जोर से रोई, रातभर रोती रही, जगमोहन की कोई आवाज, कोई दिलासा उसे सुनाई नहीं दे रही थी। दोनों इसी आंगन में रोते-समझाते रहे और न जाने कब आँख लग गई। नींद एक शोर से खुली, किसी पडोसी ने बताया कि मंजरी का एक्सीडेंट हो गया। मंजरी खुद ट्रक के सामने आई थी या बदहवासी की हालत में ये हादसा हुआ था, कुछ पता न चला। जगमोहन की मानसिक स्थिति तब से ही बिगडने लगी थी। मजबूरी बन गई थी वैष्णवी से शादी करना। मंजरी गई, अब कम से कम अपने अजन्मे बच्चे को तो बचा सके। सोनाली का जन्म हुआ, लेकिन वैष्णवी के लिए उसके दिल का अनुराग खत्म होने लगा था, उसे हर ओर मंजरी ही नजर आती। वैष्णवी के पास भी यही पेड-पौधे रहे गए थे बात करने को। एक रोज बेटी को सुलाकर वो इन पेडों से दिल बहला रही थी। पेड से बंधे एक झूले पर बैठ गई और तेज-तेज झूला झूलने लगी।
जगमोहन ने उसे देखकर टोका, ये मंजरी का झूला है, उसकी चीजों को मत छुओ, उसे याद आता रहा कि इसी पेड के नीचे बैठकर वो रातभर रोती रही थी। वैष्णवी का दर्द इन बातों से चरम पर था और झूले का वेग भी उसने चरम पर कर लिया था। रस्सी पुरानी थी, सावन में भीग-भीगकर कुछ गल चुकी थी, एक झटके से टूट गई और वैष्णवी वेग के साथ बगिया में लगे नल से जा टकराई। सिर से खून बह रहा था, कुछ दिन दर्द के झेलने के बाद वो भी मुक्त हो गई। तब से सब यही कहते हैं कि इन पेडों के बीच मंजरी की आत्मा बसती है। इन पेडों पर सिर्फ मंजरी का हक है। सोनाली घुटनों चलने लगी तो वो भी इसी पेड की ओर घिसट कर आती, ऐसे में जगमोहन ने उसे यहाँ से दूर भेज दिया। उसे लगता है कि वो और वैष्णवी, मंजरी के अपराधी हैं और ये पेड इस अपराध के और मंजरी के दर्द के गवाह हैं, ये उसे जरूर सजा देंगे, बल्कि दे चुके। वैष्णवी की जान ले चुके हैं।
वो तो हादसा था न! भीगी हुई आँखों के साथ सोनाली के शब्द आहिस्ता से निकलते हैं।
सब हादसे ही तो होते हैं न, पर कहीं न कहीं अगर हम हादसे की वजह खुद को समझने लगें, तो जिंदगी मुश्किल होने लगती है बेटा। जिस फोटो को देखकर तुम बडी हुई, वो तुम्हारी माँ नहीं, वो मंजरी है। ये घर मंजरी का है। यहीं से उसकी डोली उठी और यहीं उतरी। दो-दो रिश्ते हैं उसके इस घर से। मैं डॉक्टर हूँ, लेकिन इंसान भी हूँ। यहाँ से चली जाओ बेटा। अपनी जिंदगी जियो। यहाँ बहुत सन्नाटा पसरा है, तुम्हें निगल न ले कहीं।
इस सच ने सोनाली की हालत खराब कर दी। उसे लगने लगा कि वो गुनहगार है। उसे लगता कि उसके वजूद ने मंजरी की जान ली। मंजरी... इस घर की असली मालकिन मंजरी। सोनाली की आँखें बरसती ही रहतीं।
कब तक रोना है। राजवीर ने सोनाली के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा।
मेरी माँ, मैं अपनी माँ की तस्वीर भी आँखों के सामने नहीं खींच पा रही हूँ। जिसे महसूसती थी, वो मेरी माँ नहीं है। मेरे वजूद ने उनकी जिंदगी ले ली। मैं अपराधी हूँ... अपराधी ?
पागल मत बनो, इसमें तुम्हारा क्या कसूर।
है, मेरा होना ही मेरा कसूर है।
ऐ पागल
ये भुतहा घर है... तुम चले जाओ यहाँ से।
यार अब बेतरतीब से फैले हुए पेड, पुराना पेंट और घर में सिर्फ एक इंसान रहे, तो घर भुतिया ही लगेगा। हम जिस माहौल में रहते हैं, वैसा ही असर दिखाई देने लगता है। माली को बुलाओ, गार्डन ठीक करवाते हैं और घर में पेंट करवाते हैं। सारे भूत भाग जाएंगे। प्लीज सोनाली... अपने पापा के लिए...। राजवीर ने उसके कंधों को अपने हाथों से थामते हुए गुजारिश की।
तुम्हें पापा की फिक्र है, और पापा को तुम पसंद ही नहीं!!! ठीक होते ही तुम्हें जाने को बोलेंगे, क्यों पसंद नहीं तुम, समझ ही नहीं आया।
मुझे आया है कुछ... उन्हें लगता है कि तुम भी किसी और स्त्री की जिंदगी बर्बाद कर रही हो, किसी की जगह ले रही हो।
ऐसा...! और तुम्हें क्या लगता है?
तुम्हारे लिए नहीं छोडा मैंने अपनी पत्नी को। हम अलग हो चुके थे। मैंने बैक होने की कोशिश इसलिए नहीं की कि मैं किसी अपराध बोध में हूँ, इसलिए की क्योंकि हमारी उम्र में फासला है। शायद तुम्हें बाद में पछतावा हो? तुम्हारे पिता को भी तो पछतावा था न अपनी दोस्त से शादी करने का... सोनाली प्रेम टूटता है, तो सँभलना आसान होता है, शादी टूटती है, तो संभलना बहुत मुश्किल। मैं तुम्हें संकट से जरूर निकालूँगा, लेकिन अब भी यही कहता हूँ कि शादी का फैसला सोच-समझकर लेना...’
राजवीर कुछ ज्यादा ही संजीदा हो गया। अगले दिन भी वह जगमोहन की तिमारदारी करता रहा और घर को थोडा व्यवस्थित करता रहा। उसने माली को बुलवा लिया था।
माली को हिदायतें दी जाने लगीं, माली भी अपनी सलाह देने लगा, साहब ये पेड काट दें, वैसे भी इसकी जडें अब नींव को खोखला कर देंगी, बहुत फैल रही है।
अरे यार, पेडों से बडा प्यार है मुझे, पेड-पौधे की कटाई-छंटाई करो, उन्हें यूँ मत काटो।
देख लो साहब... नींव को खाने लगेगा, तो काटना ही पडेगा।
ठीक है काट दो, इसके बदले में पेड जरूर लगाना।
कोने में लगा देंगे
ठीक है
बरसों पुराने आम के पेड को काटा जा रहा है।
राजवीर अंदर देखने जाता है कि कहीं उसके भावी ससुर की आँख न खुल गई हो, उधर माली का नया मोबाइल बज उठता है। एंड्राॅयड फोन है, उसकी बिल्ली को भूख लगी है। वो सोचने लग जाता है कि उसे क्या समझाया गया था, क्या करना है, कैसे बिल्ली को खाना देना है।
अधकटे पेड को छोडकर वो फोन लेकर साइड की ओर जाता है, वो जा रहा है, सोनाली आगे बढ रही है, कोई चुंबक-सा है जो उसे खींच रहा है, खींच रहा है उस बगीचे की ओर, उस जंगल की ओर ...
धडाम... और जोर की चीख।
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