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पौत्रवधू की गरिमा : सरस्वती गाँधी

बाबू राज के नायर
एक महिला का सबसे बडा आभूषण उसका चरित्र और उसकी शुद्धता है।
- महात्मा गाँधी

केरल के साथ गाँधीजी के संबन्ध की बात आते ही शरद की शीत किरणों के समान स्वच्छ, शीतल, सुन्दर छवि मेरी स्मृति पटल पर अंकित हो जाती हैं। केरल की राजधानी तिरूवनन्तपुरम नगर के जगति में स्थित वुटलान्ट्स अपार्टमेन्ट वैसे तो आम आवासीय स्थल की तरह ही है, लेकिन उसका महत्त्व तब बढ जाता है जब उसमें रहने वाली एक संभ्रान्त महिला का जिक्र आता है।
महात्मा गाँधी के ज्येष्ट पुत्र हरीलाल गाँधी के ज्येष्ट पुत्र कांतिलाल गाँधी की पत्नी सरस्वती गाँधी ने इसी अपार्टमेन्ट में अपना एकान्त जीवन बिताया था। उस एकांत में भी बापू की यादें उनसे जुडी हुई थी। एक पत्रकार होने के नाते उनका साक्षात्कार पाने और गाँधीजी के साथ के उनके संबंध की हरारत को जानने के लक्ष्य के साथ मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई थी। उस मुलाकात के बाद वुटलान्ट्स अपार्टमेन्ट की फ्लॉट स.102 का दरवाजा मेरे लिए हमेशा खुला रहता था। दुबली-पतली, छरहरे बदन की, सुन्दर, माँ स्वरूप सरस्वतीजी के साथ की मेरी हर मुलाकात मेरे लिए एक नया अनुभव था।
गाँधीजी की पौत्रवधू बनना ईश्वर का वरदान मानने वाली सरस्वती गाँधी की गाँधीजी से पहली मुलाकात उनके मामा, प्रसिद्ध गाँधीवादी जी.रामचन्द्रन के नेय्याटिनकरा में स्थित माधवमन्दिर में हुई थी। अस्पृश्यता के विरोध करते हुए हरिजनों के मन्दिर प्रवेश के आह्वान के सिलसिले में केरल पहुँचे, गाँधीजी ने वह रात उनके इसी मकान में बिताई थी। सरस्वती महात्मा को भक्तिभाव से दूर से ही देखती रही। उन्होंने सपने में भी नह सोचा था कि वे उन महात्मा के परिवार की सदस्या बनेगी। कहाँ केरल की राजधानी तिरूवनन्तपुरम नगर के तय्क्काड में स्थित पत्मालयम के एन.के.कृष्णन पिल्लै और पत्मावती तन्कच्ची की बेटी और कहाँ गुजरात के गाँधी परिवार के महान का पौत्र। गाँधीजी से हुई मुलाकात के एक साल बाद सरस्वती की भेंट उनके पौत्र कांतिलाल गाँधी से हुई। राजाजी की प्रेरणानुसार जी.रामचन्द्रन से अंग्रजी सीखने पहुँचे थे कांतिलाल।
सरस्वती के मामा से अंग्रजी की शिक्षा ग्रहण कर लेने के बाद कांतिलाल गाँधी ने मैसूर के मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया। सरस्वती की माँ की इच्छा थी कि बेटी की शादी कांतिलाल से कराई जाए। कांतिलाल भी सरस्वती को पसन्द करते थे, लेकिन कम उम्र और भाषा की अज्ञानता के कारण पहले वे कुछ हिचकिचाए लेकिन फिर राजी हो गए। शादी के वक्त सरस्वती की उम्र मात्र पन्द्रह साल थी। अपनी भाँजी के पति के रूप में गाँधीजी के पौत्र को पाना, गाँधी भक्त मामा के लिए अत्यन्त खुशी की बात थी। इस प्रकार कांतिलाल की मेडिकल की पढाई के दौरान ही उनकी शादी सम्पन्न हो गई।
विवाह स्थल गुजरात का राजकोट था। गाँधीजी वहाँ थे लेकिन शादी में शरीक नह हुए क्योंकि वधू नाबालिग थी। शादी की सारी रस्म कस्तूरबा गाँधी की देख-रेख में पूरी हुई। कांतिलाल की बहनें जिन्होंने उन्हें पाल-पोसकर बडा किया था, कस्तूरबा के साथ थी। विवाह के अवसर पर सरस्वती ने कस्तूरबा के हाथ की बनी साडी पहनी थी। वही साडी कस्तूरबा की एकमात्र भेंट थी।
शादी के बाद वे गाँधीजी से आशीर्वाद लेने सेवाग्राम पहुँचे। उन्होंने नववधू के शीश पर हाथ रखकर मन ही मन आशीर्वाद दिए। वे मलयालम नह जानते थे, इसलिए कुछ कह नह पाए। उनकी आँखों में सरस्वती ने अपनेपन की, प्यार की, वात्सल्य की झलक देखी थी। उनके लिए वही सब कुछ काफी था।
गाँधीजी अपने पौत्रवधू को इतना मानते थे कि वे जहाँ भी जाते थे, वहाँ से उसके नाम खत जरूर लिखते थे। सरस्वती गाँधी को जब भी मौका मिलता था, वे सेवाग्राम पहुँच जाती थी और बापू का वात्सल्य पाती। गाँधीजी के प्यार भरे आग्रह के कारण ही सरस्वती गाँधी को हिन्दी और गुजराती सीखनी पडी थी। आरंभ में बापू उन्हें केवल अंग्रेजी में लिखा करते थे, लेकिन धीरे-धीरे हिन्दी और अंग्रजी में लिखने लगे। गाँधीजी की हाथ की लिखाई अच्छी नह थी, इसलिए वे सरस्वती के सुन्दर अक्षर की प्रशंसा किया करते थे।
गाँधीजी सेवाग्राम के प्रत्येक व्यक्ति को एक ही नजर से देखते थे। अपने परिवार के सदस्यों को भी वे बाकी सभी लोगों की तरह ही मानते थे। एक बार सरस्वती गाँधी को सेवाग्राम में एक महीने के लिए रहना पडा। महीने के अन्त में गाँधीजी ने अन्य लोगों के साथ उनसे भी भोजन के पच्चीस रूपए की माँग की। यह जानकर कस्तूरबा गाँधी ने गाँधीजी को चिढाया कि वे पौत्रवधू से रूपए माँग रहे हैं। गाँधीजी ने कस्तूरबा को समझाया कि देने के लिए उनके पास भी धन नह हैं। जब यह घटना हुई तब कांतिलाल मेडिकल के विद्यार्थी थे, इसलिए सरस्वती के पास भी इतने रूपए नह थे। अन्त में उनके मामा ने केरल से उनके लिए रूपये भेज दिए थे।
राष्ट्रपिता होने के नाते बापू ने अपने पुत्रों को अन्य से अलग करके नह देखा। उनके पुत्रों को लगता था कि उन्हें वह प्रेम प्राप्त नहीं हुआ जो एक पिता होने के नाते उनसे मिलना चाहिए था। हरीलाल गाँधी पढने में होनहार थे, लेकिन गाँधीजी ने उन्हें आगे पढने का प्रोत्साहन नह दिया। जब हरीलाल ने पिता से आगे पढने की बात कही तब उन्होंने यह कहकर बेटे को निराश कर दिए कि जो पढ लिया है, बहुत है। हरीलाल पढकर पिता की तरह वकील बनना चाहते थे। इंग्लैड जाने का एक अवसर आया तो वे अपने पिता से मिले, लेकिन गाँधीजी ने वह अवसर किसी अन्य के बेटे को दे दिए। इस प्रकार विदेश जाने और वकील बनने की उनकी इच्छा पूरी नह हो पाई।
अपने अन्तिम समय में कुछ दिन हरीलाल गाँधी ने अपने ज्यष्ठ पुत्र के परिवार के साथ बिताया था। कांतिलाल गाँधी मैसूर में मेडिकल के विद्यार्थी थे। एक दिन काँलेज से लौटे, तो उनके साथ फट्टेहाल में उनके पिताजी भी थे। सरस्वती गाँधी भी पति के साथ ही रहती थी, तब तक उनका पहला बेटा भी पैदा हो चुका था। कांतिलाल गाँधी, गाँधीजी के परम भक्त थे। सरस्वती गाँधी के अनुसार तो पति जब उनसे लडते थे, तब भी उपवास को ही शस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते थे।
गाँधीजी के अन्तिम क्षणों में सरस्वती गाँधी उनके पास नह थी। गाँधीजी से उनकी आखिरी मुलाकात मद्रास में एक सम्मेलन में हुई। सम्मेलन स्थल पर गाँधीजी से किसी ने पूछा कि उनके परिवार में कौन-कौन हैं। उन्होंने जवाब में कहा कि वे सबसे बडे हैं और स्टेज पर ही अपने पास बैठकर शैतानी कर रहे सरस्वती के बेटे को अपने से सटाते हुए बोले कि यह सबसे छोटा है।
इस बीच कांतिलाल की मेडिकल की पढाई पूरी हो गई, और वे परिवार समेत आजीविका की खोज में बम्बई चले गए और वहीं बस गए। 38 साल के वैवाहिक जीवन के दौरान सरस्वती गाँधी ने हरदम अपने पति का साथ निभाया और उनकी मृत्यु तक उनके साथ बम्बई में रहीं। पति की मृत्यु के बाद वे अपने पुत्र के पास जाकर रहने लगी। उनके दोनों ही पुत्र शान्तिकुमार और प्रदीप कुमार अमरीका में थे। डाँ. शान्तिकुमार कारडियो वास्कुलर सर्जन थे। उनकी पत्नी सूसन फ्राँस की रहने वाली थी। प्रदीप कुमार चार्टेड एकाउन्टेन्ट था। उनकी पत्नी मंगला भगोलकर मराठी थी।
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कुछ समय अपने पुत्र के परिवार के साथ रहने के बाद अमरीका की ऊब से भयभीत होकर वे स्वदेश लौट आई। वहाँ बेटे और बहु के चले जाने के बाद से उनके लौटने तक वे अकेली हो जाया करती थी। न कोई बोलनेवाला, न कोई मिलनेवाला। अकेले में उनका दम घुटने लगता था। केरल में घर का दरवाजा खोलकर खडी हो जाएँ तो सडक से शोर मचाते हुए जाते बच्चे थे, अगल-बगल में पडोसी थे, बहुत नजदीक ही उनके भाई-बन्धु रहते थे। मन ऊब जाए तो वीणा के स्वरों में खो सकती थी।
लेकिन इन सबसे बढकर जो उनके साथ थीं, वे थीं- गाँधीजी की चिट्ठियाँ, उनके साथ खिंचवाई तस्वीरें और उनसे उठनेवाली यादें। फिर गाँधीजी को आदर की दृष्टि से देखने वालों का प्यार भी उन्हें यहाँ मिलता था। गाँधीजी की पौत्रवधू होने की गरिमा और एक माँ की ममता के साथ मेरा स्वागत करना, बहुत प्यार से आतिथेय धर्म निभाना, बडी रूचि के साथ बापू के बारे में बताना, ये सारे दृश्य आज भी मेरी स्मृति में धुँधले नह हो पाए हैं। रविवार 14 दिसम्बर 2008 को 84 साल की उम्र में ईश्वर को प्यारी होने के साथ उनकी जिंदगी से बापू की यादें चाहे विलीन हो गईं हो, लेकिन आज भी मुझसे उनकी यादें जुडी हुई हैं और जिंदगी के अन्तिम क्षणों तक जुडी रहेंगी।
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सम्पर्क - गीता भवन,
नरागंनम् वेस्ट (पी.ओ),
कोजान्नचेरी, पठानांथित्ता,
केरल- ६८९६४२