fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

हमारी दादी

सुमित्रा गाँधी कुलकर्णी
गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है।
-महात्मा गांधी
मेरा छोटा भाई कनु कान्हा और में बापूजी के तीनों आश्रम-साबरमती, मगनवाडी और सेवाग्राम-में लम्बे अरसे तक बापूजी और दादी के साथ रहे हैं। गुजराती में दादी को मोटीबा अर्थात बडी माँ कहकर पुकारा जाता है, तो हमारी उम्र के बच्चे कस्तुरबा गाँधी को मोटीबा कहकर बुलाते थे। साबरमती के आश्रम के समय मैं इतनी छोटी थी कि उन दिनों के हृययकुंज निवास का मुझे स्मरण नह है। यही सुना था की हृदयकुंज के बरामदे में मैंने घुटनो के बल दौडना सीखा था। लेकिन सेवाग्राम आश्रम और मोटीबा की स्मृति मेरे दिमाग में स्पष्ट जडी हुई है। मैं और कनु हमेशा मोटीबा के छोटे घर में उनके साथ रहते थे। घर क्या था, एक मध्यम आकार 10312 फीट का एक कमरा और साथ में एक संकरा छोटा-सा कमरा, जहाँ मोटीबा और हम सब लोगों के सोने के लिए गदियाँ, तकिए और कम्बल तरतीब से जमा कर रखे होते थे। हम सब चटाई डालकर जमीन पर सोते थे। इसलिए हमारे घर में पलंग और खाट नहीं थे। वही पर मोटीबा की टिन की छोटी-सी पेटी रहती थी। बडे कमरे में एक नन्हा-सा आला था। जहाँ कुमकुम से ऊँ लिखा था और दादी वहाँ पर नियम से दीप जलाती थीं। एक छोटी खिडकी जैसी अलमारी थीं जिसमे तीन फट्टे लगे थे। एक में दादी के कपडे और दूसरे में मेरे और कान्हा के कपडे और तीसरे पर नैपकिन, तौलिया, एकाध चादर बस, इतना उस घर का परिग्रह था। मगर हम लोगों के लिए वही सबसे सुन्दर आरामदेह घर था।
कमरे के पीछे बाँस की चटाई का घेरा डालकर कच्चा-सा बाथरूम था जिसमें पत्थर की एक चौकी पर बैठकर नहाया जा सकता था। नल नह था, तो दो बाल्टी में पानी भरा रहता था। पानी बहने की कोई व्यवस्थित नाली भी नह थी; पीछे के गुलाब, मेंहदी के झाड में गंदा पानी जाने की व्यवस्था थी। इसलिए वहाँ हाथ-मुँह घुल सकते थे। नहाने के लिए, दूर कुँए के पास दो तीन कोठरीयाँ बनी थी। वहीं हम सब नहाते थे। दिन में एक-दो बार बैलों से चलनेवाला रहट चल जाता था, तो पास ही गाय-बैलों की साफ-सुथरी नाँद से पानी भर जाता था और उसमें नल से पानी लिया जा सकता था अन्यथा मैं और कनु तथा सभी आश्रमवासी बडे आराम से कुएँ से पानी खींचना जानते थे। मुझे मोटीबा के बाथरूम में डर लगता था। क्योंकि वहाँ पर एक काफी बडा रंग-बिरंगा कान-खजुरा रहता था। बिच्छुओं के टपकने और साँप के आने की वहाँ पर पूरी सम्भावना थी। इस आलीशान व्यवस्था में मैंने, कान्हा और हमारी छोटी बहन उषा ने कई महीनों मोटीबा के साथ रहकर बिताए थे।
हमारी मोटीबा सत्तर वर्ष की उम्र में भी बडी नाजुक और सुंदर थी। उनकी बडी-बडी आँखे, सुडौल नाक, चिबुक, और सुंदर भाल बडा आकर्षक था। ऊँची नहीं थीं, लेकिन एकदम सप्रमाण थीं। उनके हाथ, पाँव और उँगलियाँ बिल्कुल कमल-नाल के समान लम्बी और पतली थीं। इतनी उम्र में भी उनके आँखे तीक्ष्ण थीं। पढते समय उन्हे चश्मा पहनना पडता था, लेकिन बाकी समय वे बिना चश्मे से ही अपना काम कर पाती थीं। वे बडी चपल थीं। धीरे-धीरे या ढीला-ढाला चलना उन्हें आता ही नहीं था। हमारा आश्रम भी छोटा नहीं था। खासे बीस-पच्चीस एकड में बसे हुए छोटे-छोटे मकानों में गृहस्थी का संसार बँटा था। रसोई, सब्जी काटने का बरामदा, भोजन का बरामदा, नहाने की खैलियाँ, बरतन माँजने का स्थान, बापूजी का कमरा, मेहमान घर और गौशाला, सब कम-से-कम बीस-तीस या चालीस-पचास गज दूरी पर था या और भी ज्यादा दूरी पर थे। इन सब जगहों पर समय-समय पर दादी को काम पडते ही थे। रात को हम तीनों भाई-बहन प्रार्थना-भूमि पर दादी और बापूजी के बिस्तर के बीच सोते थे, ताकि साँप-बिच्छु से हमारा बचाव हो। सर्दियों में और बरसात में बापूजी की कुटी के चौडे बरामदे में हमारा बिस्तर लगता था।
मोटीबा सुबह चार बजे प्रार्थना से जो उठती थीं, तो शायद दोपहर को दस-पन्द्रह मिनट आराम करने के सिवाय रात तक काम करती थीं। बापूजी का नाश्ता तैयार करती बाद में नहा-घोकर ऊँ के सामने दिया जलाकर सब्जी काटने और रसोई बनाने में मदद करती थीं। खंडु मामा और मणिबाई करके दो हरिजन रसोई में सहायता करते थे, लेकिन मुख्यतः दादी और अन्य आश्रमवासी स्त्री-पुरूष खाना बनाते थे। बापूजी की सुखी पापडनुमा रोटी-खाखरा, मोटीबा स्वयं ही बनाती थी और उनकी उबली सब्जी का रस, लहसुन आदि भी खुद ही तैयार करती थी। कभी-कभी बकरी के दूध को गाढा कर इसमे गुड डालकर बापूजी के लिए चाकलेट बना देती थीं। भोजन के बाद बापूजी उसे खाते थे और हम तीनों के मुँह में भी एक-एक टॉफीनुमा टुकडा खुद देते थे। दोपहर को मोटीबा बापूजी के पैरो में घी लगाती थीं। बापूजी जब तक सो नह जाते थे, तब तक पंखा झलती और मक्खी उडाती, वही बैठी रहती थीं।
हमारे झोपडे मिट्टी, गारे और बाँस के बने थे। हमारे आश्रम में कही बिजली भी नहीं थी तो मक्खी, मच्छर दूर करने के लिए पंखा झलना आवश्यक हो जाता था। उसके बाद थोडा आराम करके मोटीबा स्वंय काफी पीती थी और हम बच्चों को मूँगफली या चने का नाश्ता देती थीं। फिर वे नियम से बैठकर सूत कातती थीं और ठीक पाँच बजे शाम का भोजन परोसती थीं। जब बापूजी घूमने जाते थे, तब मोटीबा मरीजों से मिलने जाती थीं। धूल भरी सडकों पर चप्पल पहनकर तेज चलने से बापूजी के पाँव धूल से एकदम सन जाते थे। इसलिए घूमने के बाद बापूजी स्टूल पर बैठते थे और मोटीबा नीचे बैठकर उनके पाँव धो देती थीं। दादी इस काम को ऐसी तन्मयता और कुशलता से करती थीं कि मुझे कभी नहीं लगा की उसमे कही दासता का भाव था। कितना ही निम्न कार्य क्यों न हो, दादी और प्रत्येक आश्रमवासी उसे बडे गौरव के साथ करते थे जिसमे तुच्छ काम भी शोभनीय हो उठता था। शाम को छह बजे प्रार्थना होती थी। उसमे हर एक जन उस दिन के अपने काते हुए सूत लिखवाता था। रामधुन और रामायण के बाद प्रार्थना शुरू होती थी। वह रामायण और रामधुन का सुन्दर स्वर आज भी मेरे कानों में बसा है।
शाम की प्रार्थना के बाद दादी प्रार्थना-भूमि पर ही बैठी रहती और वहाँ उनका दरबार लगता था। आश्रम की सारी महिलाएँ थोडी देर बैठकर दिन-भर में क्या हुआ, कौन आया, कौन गया, किसका पत्र, कौन बीमार है आदि सारे समाचारो की रिर्पोट होती थी। मोटीबा की गोद में या पास में बैठे-बैठे मैंने भी अनेक बार इन महिला महफिलों की चर्चा सुनी थी। सर्दियों के दिनों में हमारे खंडु मामा मिट्टी की बनी एक अंगीठी में चूल्हे के बचे अंगारों को डालकर प्रार्थना भूमि में दे जाते थे। उस अलाव पर सारी औरते हाथ सेंकती थी। मुझसे वैसी अंगीठी की सिकाई आज भी सहन नहीं होती है। उन दिनों सहन नहीं होने पर या तो दादी के आँचल में छिपकर सो जाती थी, ताकि आँच ना लगे या फिर उनकी पीठ से चिपककर बैठती थी, तो गरमाई रहती थी, लेकिन आँच से बच जाती थी। इसके बाद दादी बापूजी के सिर में तेल लगाती और फिर में पैरों में घी लगाती थी। इससे बापूजी का ब्लड प्रेशर सँभलता था। घी लगने के बाद मोटे साफ कपडे से पाँव को इतनी बारीकी से पोंछना होता था कि कहीं नाखून या उंगलियों के बीच या पैरों के पीछे चिकनाई नहीं रहती थी। इस पराकाष्ठा का पौछना मात्र दादी ही कर सकती थी। कभी-कभी मैं भी मालिश करने का ढोंग करती थी, लेकिन इसमे कोई दम नहीं था। बापूजी को अवश्य अच्छा लगता था कि उनके पैरो के साथ खिलवाड करते हुए भी मैं बडों की सेवा करने का संस्कार पा रही थी। यह सब निपटाने के बाद ही मैंने मोटीबा को बिस्तर में जाते हुए देखा है। मैं नहीं सोचती हूँ कि सारे आश्रम में किसी ने भी मोटीबा को बेकार बैठे देखा होगा। वे जो कुछ भी करती थी, वह सब कुशलता से और व्यवस्थापूर्वक करती थीं।
मोटीबा अत्यन्त सादगी में भी बहुत ही सुन्दर, सुघड दिखती थीं। उन्हें दबे रंग पसंद नहीं थे। ज्यादातर उनकी सफेद साडी में एक-डेढ इंच चौडी लाल किनारी होती थी। उनका साडी बाँधने का तरीका भी बडा व्यवस्थित था। शायद ही किसी ने मोटीबा का खुला सिर देखा होगा। मोटीबा के कंघे का पल्ला या कमर मे बँधे आँचल को कभी अपने स्थान से गिरते या फिसलते किसी ने नहीं देखा था। रात को सोते समय भी दादी का सिर ढँका रहता था। अगर कोई आश्रमवासी मैले-कुचैले कपडे पहनता या बालों को ठीक तरह से सवाँरकर नहीं रखता, तो दादी सहज भाव से पुछ लेती थीं कि कपडे ठीक क्यों नहीं पहनते हो? यह क्या लथर-पथर लपेट रखा है? मोटीबा के खून में आलस्य का नामोनिशान नहीं था। साबरमती में सारे मजदूर निकालकर स्वावलंबन का प्रखर प्रयोग हुआ था। तब गोशाला का काम आश्रमवासियों पर आ गया। दूसरे दिन मोटीबा भी गोशाला पहुँच गयी। गोशाला व्यवस्थापक सकपकाये कि बा को क्या काम दिया जाए? मोटीबा समझ गयीं। पूछने लगी काम क्यों नहीं बताते? गाय के लिए ग्वार का दलिया पीसना नहीं है?
व्यवस्थापक बोले, लेकिन बा, आप तो।....
दादी ने कहा, नहीं, नहीं। लाओ। मैं पीसती ह।
मोटीबा जाकर चक्की पर बैठ गयी और भजन गाते-गाते पीसने लगी थीं।
वैसे ही प्रवास में जहाँ जाती, वहीं रसोईघर में मोटीबा काम में हाथ बँटाती थी और तब सब बहनों को लेकर सभा-सम्मेलन में जाती थीं। मोटीबा की इस सील एकात्मता ने देश के हजारो गाँवो के गरीब, मामुली औरतों के दिल जीत लिये थे और वे लोग मोटीबा से हिम्मत और आश्वासन पाते थे। इस वजह से प्रभावित होकर अनेक महिलाओं ने सत्याग्रह में काम किया था। उन औरतों ने लाँठिया खाईं, जेल गयीं, लेकिन अपने पति और परिवार को सरकार से माफी माँगने या लगान भर देने से वे महिलाएँ रोकती थी और उन पुरुषों का साहस टिकाए रखती थीं। इस प्रकार महीला फ्रंट को मजबूत करने का बहुत बडा श्रेय मोटिबा का था। बाद में दादी की वृद्धाव्यस्था का ख्याल कर सेवाग्राम में उनके लिए स्वतंत्र और समीप शौचालय की व्यवस्था की गयी थी। लेकिन दादी उसका उपयोग नहीं करती थी। उनको पसंद नहीं था कि कोई उनका मल-मूत्र साफ करे। रात को पाँट भी वे खुद ही साफ करती थी। मोटीबा को किसी से मदद लेना अच्छा नहीं लगाता था। इतनी वृद्धा हो गयी थी, लेकिन अपना काम स्वंय करने का आग्रह रखती थीं।
मैं और मेरे भाई-बहन अवश्य आश्रम में कुछ महीने रहते थे। कनु तो खैर सालों बापूजी के साथ रहा था। वह तो ज्यादा दादा-दादी का बेटा था। इसलिए जब मेरे पिताजी को पत्र लिखता था, तो मोटीबा की नकल कर वह भी पिताजी को आशीर्वाद भेजता था। यह सब होते हुए भी हमारे रहने-खाने का खर्च मेरे पिताजी आश्रम को चुकाते थे। आश्रम सार्वजनिक फंड से चलनेवाली सामाजिक संस्था थी। वहाँ पर आम जनता और पुत्र-पौत्र का अन्तर करना अनुचित था। इसलिए जितने दिन हम रहते थे उतने दिन का हमारे खाने-पीने का खर्चा हमारे पिताजी से वसूल होता था और महात्मा गाँधी के सेवाग्राम आश्रम से उस रकम की रसीद भी मिलती थी। दादी को बुरा लगता था, लेकिन वे दिल कडा करके हमारा भोजन-खर्च दफ्तर में जमा करवा देती थी। दोनों समय के भोजन के वक्त मैं और कनु तथा उषा बापूजी के आसपास और दादी के निकट बैठते थे। बापूजी हमारे स्वास्थ्य और योग्य आहार-विहार पर ध्यान देते थे और उबली हुई पालक और कद्दू की बेनमक सब्जी खाना सिखाते थे। प्रत्येक सोमवार को मोटीबा का व्रत होता था, तो उनके लिए आलू या जमीकंद उबालकर उसमे घी-जीरे का तडका लगाकर नमक, कालीर्मिच पडती थी। उस सब्जी का स्वाद भी अजब होता था और मोटीबा बेधडक हम लोगों को भी एक-एक चम्मच सब्जी खाने को देती थीं। तब बापूजी कहते तू इन बच्चों की आदत बिगाडती है। लेकिन दादी कहती, अरे दूसरे दादा-दादी के घरों में तो पोते-पोतियों को मिठाईयाँ मिलती हम-तुम तो इन बच्चों को बेनमक उबला पालक देते हो। इसलिए अगर मैं दो-चार आलू दे दूँगी, तो कोई नुकसान नहीं हो जाएगा।
तब बापूजी हँस देते। हम बच्चे दादी की छत्रछाया में प्रश्रय पाकर खुश हो जाते। सेवाग्राम में मुझे, कान्हा और उषा को कभी कोई अभाव नहीं लगा। मोटिबा के लाड-प्यार से हमे पता ही नह चला कि कहीं कोई कमी थी या दूसरे प्रकार के दादा-दादी भी हो सकते थे। हम तीनो अपने परिव्राजक, संसार-मुक्त दादा-दादी से परम संतुष्ट थे।
हमारा परीवार और पूरा आश्रम शुद्ध खादीधारी था। उसमे भी मोटिबा की चुस्ती गजब की थी। एकाध बार लेखों में कही उल्लेख मिलता है कि मोटीबा को खादी का महत्त्व समझाने में और छुआछूत छोडकर हरिजनों को अपनाने में बापूजी को काफी समय लगा था। मुझे लगता है, इसमें कुछ गलत खबर रही होगी। क्योंकि माटीबा स्वभाव से सादी थी। उन्होंने तो बापूजी के कहने पर जूते-मौजें पहने थे और पारसी वेश-भूषा पहनना स्वीकार किया था। काँटे-छुरी जैसी विचित्र चीजों से खाना सीख लिया था, तो खादी पहनने में तो कठिनाई ही नहीं थी। वास्तव में मोटीबा ने खादी पहनना पहले शुरू किया था, क्योंकि उन्होंने तो आठ-दस नम्बर कि सूती कम चौडी खादी में पाँच गज का आडा-जोड लगाकर दो किलो वजन की टाटनुमा साडी पहनना आरंभ किया था। इसके बहुत देर बाद गंगाबहन मजूमदार ने चौड पने की खादी तैयार कर बापूजी को धोती बनाकर दी थी। 1918 में हमारे घर में खादी का जो प्रवेश हुआ था कि घर में दूसरा कपडा ही नहीं आता था। हमारे घर की रसोई की चिन्धियाँ भी खादी की थीं। एक बार मोटीबा के पाँव की छोटी उंगली में चोट लग गयी। खादी की मोटी चीर से मोटीबा घाव बाँधने का प्रयास कर रही थीं तो किसी महीला ने उन्हें मलमल की पटटी दी कि घाव पर रगड नहीं लगेगी और सरलता से बँधेगी भी और उँगली पर टिकी रहेगी, लेकिन दादी ने खादी की पटटी का ही आग्रह रखा। जैसे-तैसे उसी मोटी खादी की चीर से काम चलाया लेकिन मलमल को हाथ नहीं लगाया। बहुत ही नियमितता से मोटीबा चरखा कातती थीं। शाम को प्रार्थना में उनके तार हमेशा सबसे ज्यादा होते थे। रोज लगभग चार-पाँच सौ तार कातती थीं। मोटीबा कहती थीं कि वे बापूजी के अन्य कामों में तो मदद नहीं कर पाती, लेकिन वे चरखा तो चला ही सकती थी और सूत के धागे से ही स्वराज आने वाला था। आरंभ में उतनी भारी साडी धोना कष्टमय लगता था, तो कईं बार बापूजी कहते थे, ला, मुझे दे दे, मैं तेरी साडी धो दूँगा। लेकिन दादी बापूजी से ऐसा निम्न काम करवाकर उनका अमूल्य समय बिगाडना नहीं चाहती थीं।
जब मोटीबा आगाखान जेल में थीं, तब उन्होंने आश्रमवासिनी एक महिला को सेवाग्राम में पडी अपनी पेटी में रखे कपडों के बारे में सूचना लिख भेजी थी। बापूजी के हाथ से कती और मेरे लिए खास तौर पर तैयार की गयी साडी तो मुझे जेल में भेज ही देना। मृत्यु के बाद ेमेरी देह पर वह साडी लपेटनी है। आमतौर पर मोटीबा बापूजी के हाथ के कते सुत की बनी साडी पहनती थी। चिता पर जब चढी, तब भी बापूजी के हाथ की कती साडी पहनी थीं। अंतिम जेलवास में से मोटीबा ने कई लोगों को पत्र लिखे थे, लेकिन नीचे एक ही पत्र की नकल दे रही हूँ। इस देश की सत्याग्रही स्त्रियों के दिल की लाचारी और त्याग की पराकाष्ठा की इस पत्र में झलक है।

आगाखान जेल
सोमवार, ९.८.४३
चि.कशी,
तारीख २२.७.४३ का तुम्हारा पत्र मिला। पढकर आनन्द हुआ। बारिश और हवा वगैरा को देखते हुए मेरी तबीयत ठीक है। खाँसी आती है। दुर्गा के (स्व. महादेव काका की पत्नी) समाचार जाने। वहाँ सब मजे में हैं, जानकर आनन्द हुआ। उसको (दुर्गा) और बाबला को (उनका बेटा नारायण) और दूसरों को भी मेरे शुभ आशीर्वाद। वैसे मुझे तो लगता है कि उसे (दुर्गा काकली को महादेव काका की मृत्यु के बाद) ग्रामसेवा में अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए वहीं (वेडछी, गुजरात में) रहेगी। जहाँ भी रहे सुखी रहे, तो बस है। हमने सुना था कि सावित्री (जमनालाल बजाज की पुत्रवधू) फिर से मंदिर (जेल) में गयी है। आश्रम में सबको आशीर्वाद। दूसरे, मेरी पेटी खोलना और उसमे चार-पाँच साडियाँ है। उसमे से दो काली किनार की हैं सो बुआजी बापूजी की बहन को ओर कोई चार गज का टुकडा है, वह भी भुआजी को भिजवा देना। और दुसरी दो लाल किनार की है, उनमे से एक रामी (हरिलाल काका की छत्तीस वर्षीय ज्येष्ठ कन्या-पौत्री) को और एक मनु हरिलाल काका की दूसरी बेटी उम्र तीस वर्ष-दुसरी पौत्री) को भिजवा देना। और मेरी पेटी में गोरखपुर की बडी गीता है, और अलमारी में लाल किनार का खेस है, सूती है, उसे शांतिकुमार (सिन्धिया स्टीम नेवीगेशन के मालिक) के पास भिजवा देना, तो वह यहाँ भेज देंगे। अब बापूजी का जन्मदिन आएगा। इसलिए बुआजी को (दादी की ननद) और लडकियो को कुछ देने की मेरी इच्छा है। इसलिए यह लिखा है। दूसरे एक खाकी रंग का टुकडा भी है, वह रामी को दे देना। इनके सिवा मेरे कुछ जाकिट (ब्लाउज) हों, और तुम्हे देने जैसे लगें, तो दे देना। लाल किनार और बडा अर्ज जिसका है, वह रामी को दे देना। मेरा आस्तीनवाला भूरे रंग का स्वेटर, वह भी भेज देना।
डाँक्टर, मनु भाई हीराबहन को आशीर्वाद।
आज तो वीरपसली (रक्षा बंधन) है। तुमने भी मनाई होगी?
बा और बापू का आशीर्वाद
इस प्रकार हरिजनों के बारे में भी मोटीबा का कोई विरोध नहीं था। आखिरकार 1896 से अफ्रीका के घर मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा हर जाति के हिन्दु मोटीबा के साथ उनके घर उनके घरों में रहते थे, खाते-पीते थे और मोटीबा तरह-तरह से परधरमी-परजात के साथ लोगों की सेवा करती थी, तो उन्हें हरिजन स्पर्श से कोई एतराज नहीं था। अगर होता, तो वे भी बापूजी की बहन के साथ राजकोट रहने चली जाती या मगनलाल गाँधी की पत्नी के समान रोना-धोना मचाती। मोटीबा ने ऐसा कुछ नहीं किया था। हरिजनों के विषय में मोटीबा ने बापूजी का पूरा साथ दिया था। मोटीबा को सफाई का बहुत आग्रह था। मुँह से पीये हुये जूठे गिलास मटके में नहीं डालना और भोजन परोसते समय कडछुल-चम्मच जूठी थाली को छु न जाए, यह सब आधुनिक सफाई के सर्वमान्य नियम हैं। मोटीबा का आग्रह था की ऐसे सूक्ष्म नियमों की आदत सब लोगों को होनी चाहिए फिर चाहे वह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई हो या ठाकुर, ब्राह्मण, हरिजन हो। आश्रम में आनेवाले सब लोगों को माटीबा ने धीरे-धीरे सफाई और सुघडता की आदत सिखाई थी। इसलिए मोटीबा के मन में हरिजनों और गैर-हरिजनों में कोई भेदभाव था, यह कहना गलत होगा। अछुतों को छूने में उन्हें कोई आपति नहीं थी, इसलिए सेवाग्राम की रसोई में खंडु मामा और मणिबाई चौके में बैठकर रोटियाँ बेलते थे। वास्तव में खंडु मामा और मणिबाई हम बच्चों को चौके में घुसकर यहाँ-वहाँ हाथ लगाने पर झिडकते रहते थे। हम बच्चों को उन्हें तंग करने में आनन्द आता था। मेरे व कनु के लिए तो खंडु मामा वास्तव में हमारे परिवार के सदस्य थे। हमे मालूम नहीं था कि वे नौकर थे। नौकर कैसे होते है यह भी हम नहीं जानते थे।
मोटीबा को रामायण सुनना और उसका अर्थ समझना बहुत अच्छा लगता था। चम्पारन के नील सत्याग्रह के समय मोटीबा ने बिहार के गाँवों में रहकर उन गरीबों की सेवा करते-करते टूटी-फूटी हिन्दी सीख ली थी। बाद में राजेन्द्रबाबू स्वंय बैठकर मोटीबा को रामायण सिखाते थे। इसलिए मोटीबा को तुलसीकृत रामचरितमानस से विशेष लगाव था। सेवाग्राम के काम से भरे-पूरे दिनों में भी मोटीबा समय निकालकर शाम की प्रार्थना में पढे जानेवाले हिस्से को पहले ही अपने कमरे में पढकर प्रार्थना में जाती थी। अकेले में कोई-न-कोई उन्हें दस दिन की रामायण को अर्थ समझा देता था। प्रार्थना में मोटीबा सस्वर रामायण गाने में हिस्सा लेती थी। उनका कंठ मधुर था। वैसे ही मोटीबा को भागवत-पारायण करना भी पसंद था। उन्होंने दो-तीन बार पूरी रामायण और भागवत का स्वंय पाठ किया था। समाज की दृष्टि में हमारी दादी अशिक्षित थीं, लेकिन वे नियम से गुजराती, हिन्दी अखबार पढती और देश की वास्तविक स्थिति से भली-भाँति परिचित होती थी। इसके उपरान्त धीरे-धीरे करके मोटीबा गुजराती का हरिजन बन्धु पूरा पढ डालती थी, ताकि बापूजी के बातों से वे पूरी तरह परिचित रहे। महायुद्ध के समाचार पढकर बडी दुखी होती थी और कहती थी, यह लडाई दुनिया को तबाह करके ही बंद होगी। अकाल के समाचार पढकर मोटीबा ने सेवाग्राम के पत्र में लिखा, बंगाल के समाचार सुनकर तो दिल फटता है। वहाँ तो आसमान फट पडा है। न जाने इश्वर क्या कर रहा है।
1939 में राजकोट के ठाकुर साहब ने प्रजा पर अत्याचार किए। इससे वहाँ की जनता ने सत्याग्रह करने का निर्णय किया था। सरदार पटेल उस सिलसिले में राजकोट गए थे। मोटीबा ने यह सब अखबारों में पढकर स्वयं निर्णय कर लिया कि राजकोट तो उनका वतन है। वे राजकोट जाकर वहाँ की जनता का सत्याग्रह में साथ देंगी। बापूजी और सरदार ने उन्हें बहुत रोका, लेकिन मोटीबा तो राजकोट गयी और सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया। गनीमत थी की साथ में मृदुलाबाहन साराभाई और मणिबहन पटेल थीं, तो दादी एकदम अकेली नहीं थी। देवदास काका मोटीबा को मिलने राजकोट गए थे। वहाँ की दशा देखकर काका की आँखे छलछला गयी थीं। लेकिन मोटीबा ने कभी इन तकलीफों का उल्लेख तक नहीं किया। इन दिनों में मोटीबा रोज बापूजी को पत्र लिखती थीं और बापूजी भी सारे प्रवास और व्यस्तता में से समय निकालकर मोटीबा को प्रतिदिन लम्बे पत्र लिखते थे। इन पत्रों का संग्रह मेरे मणिलाल काका ने छपवाया था। उन प्रेम-पत्रों को पढने से हृदय गद्गद् हो जाता है। तब विचार आता है कि कैसी महिला वह थीं? उनकी भक्ति कैसी विशिष्ठ थी। उसकी श्रद्धा कैसी उत्कट और उनके पति का उनसे कैसा अनुराग रहा होगा? मुझे लगता है ऐसा प्यार, ऐसा समर्पण विरल था।
आजकल के सभ्य समाज में अंग्रेजी का एक शब्द रूढ हो गया है और आधुनिक महिला के जीवन में खासतौर पर वह तकिया कलाम बन गया है। वह शब्द है नरवस हो जाना और दूसरा शब्द है टेंशन हो जाना। इन दोनों शब्दों को तो ऐसा फैशन हो गया है कि पढी-लिखी, अनपढ, ग्रामीण, शहरी, गरीब, अमीर, सब इस शब्द का बेहिचक प्रयोग करते हैं। जहाँ शब्द है, वहाँ भाव भी अनिवार्य होता है। आज का कल्पित भाव आनेवाले कल की आदत बनकर अन्तरमन पर छा जाता है। कुछ ऐसी प्रक्रिया में हम सब हर हालत में नाखुश हो जाते है, टेंशन खडा कर लेते हैं, परेशान रहते हैं। हमारी दादी ने तो शायद इन दोनों शब्दों को सुना ही नहीं था। बहरहाल मोटीबा कभी नवरस नहीं होती थी और टेंशन शब्द क्या होता है, यह उन्हे मालूम ही नहीं था। मोटीबा की जिन्दगी में अनेक विपतियाँ आईं, लेकिन वे कभी घबरायी नहीं, उन्हे टेंशन शब्द का भाव भी पता नहीं था। इसलिए ऐसे टेंशन या नरवस होने के भाव का वर्णन करने या समझ पाने का उनके पास समय नहीं था। जो सामने आया, उसे कर गयी-कभी शिकायत नहीं की, कभी वर्णन नहीं किया।
शायद 1935 में बापूजी कलकता से बहुत बीमार होकर सेवाग्राम लौटे थे। उनकी अस्वसथता और कमजोरी देखकर कई आश्रमवासी घबरकार रोने लगे थे कि बापूजी के मरने के बाद क्या होगा? लेकिल मोटीबा घबराना जानती ही नहीं थी। उन्होंने तो स्फूर्ति से अपने पति की सेवा-सुश्रूषा आरम्भ कर दी और बडी चौकस व्यवस्थित नर्सिंग करके उन्होंने बापूजी को फिर से स्वस्थ कर दिया था। 1920 में भी बापूजी ऐसे ही बीमार थे और 1933 के हरिजन उपवास के बाद बापूजी ने जिन्दा रहने की उम्मीद भी छोड दी थी। उपवास के आरम्भ में मोटीबा साबरमती जेल में थीं और बापूजी यरवदा जेल में उपवास कर रहे थे। तब मोटीबा ने अपने हाथ से लिखी डायरी में 3 मई, 1933 को लिखा है,
चार बजे प्रार्थना। गीता पढी। नित्यकर्म। कॉफी पी। अखबार पढा। भोजन। कल अखबार से पता चला कि बापूजी हरिजनों के लिए दूसरा उपवास करनेवाले हैं। 8 मई, 1933 सोमवार के दिन से शुरू होगा। बापूजी का अपने साथियों पर से विश्वास उठ गाया है। बापूजी के पास जाने की बहुत चिन्ता बनी रहती है। बापूजी का यह सवाल, यह तपश्चर्या बहुत कठिन है।
8 मई, 1933
चार बजे प्रार्थना। गीता पढी। आज से बापूजी का महायज्ञ शुरू होता है। हमने यहाँ जेल में प्रार्थना की थी। आशा थी कि मुझे बापूजी के पास ले जायेंगें।
10 मई, 1933
कल रामदास मिलने आया था। इस बार मेरे नसीब फूट गये है। नहीं तो सरकार मुझे क्यो न ले जाती? क्या करूँ? बहुत चिन्ता होती है। इस बार भी मैं दूर हूँ। मैंने बापूजी को तार दिया है कि मुझे आफ पास आना है। यहाँ मेरा जी घबराता है। उनका तार आया, धीरज रखो। दूसरा तार आया कि हम सरकार से अनुग्रह नहीं माँग सकते, शान्ति रखो। फिर तो मैं सूत कातती हूँ। प्रार्थना करती ह, और कुछ अच्छा ही नहीं लगता है।
यह चिन्ता तो तब थी, जब वे बापूजी से दूर एक जेल में लाचारी की हालत में थी। लेकिन एक बार मोटीबा अपना कर्तव्य कर पाने की स्थित में होती थीं, तो उनकी चिन्ता आदि सब गायब हो जाते थे। बापूजी के अनेक उपवासों में मोटीबा साथ रहीं और बडी तन्मयता से बापूजी की सेवा करती थी। बापूजी जीवन और मृत्यु के बीच द्वंद्व में होते थे, तब मोटीबा विहल नहीं होती थी, बल्कि दिल कडा करके सेवा-सुश्रूषा में लग जाती थी। मन के टेंशन पर ऐसा अधिकार रखने के लिए अद्भुत वीरता की आवश्यकता होती है। मोटीबा में ऐसी वीरता कूट-कूटकर भरी थी। साबरमती जेल की डायरी के पन्ने मोटीबा की मानसिक व्यथा को प्रकट कर देते है। तब वे अपने-आपको धैर्य दिलाती और जेल के साथियों से कहती, वैसे कोई तकलीफ तो नहीं होगी। महादेव वहाँ है। सरदार वहाँ है और सरोजिनीदेवी हैं। लेकिन मैं होऊँ तो फर्क पडे न? उस मैं होऊँ के अर्थ वाक्य में जो वेदना है वह लम्बे-चौडे वर्णन से भी समझ नहीं आएगा। उस काल की मोटीबा जैसी मिट्टी की उन महिलाओ की तपस्या कुछ अलग तेजस्विता और धैर्य का दर्शन कराती है।
हमारी मोटीबा मानवता की प्रतिमूर्ति थीं। उनकी हाजरी के कारण आश्रम-जीवन मधुर, सहृदय बना रहता था। बापूजी का जीवन तो तपश्चर्यारत था। लेकिन तपस्वी के प्रखर वैराग्य की शुष्कता या कर्कशता उनके जीवन में नहीं आयी थी। प्रेम और करूणा से बापूजी का जीवन परिपूर्ण था। उसका श्रेय हमारी दादी को था। मोटीबा ने अपनी नम्रता, कर्तव्यपरायणता, प्रखर निष्ठा, मनोबल और सहनशीलता से बापूजी को पराभूत कर रखा था। इसी कारण इस देश के लाखों लोगों के लिए बापूजी पितातुल्य थे। बापूजी के जीवन में पिता की करूणा और वात्सल्य के गुप्त ग्रहय स्रोत को मोटीबा ने जगाये रखा था। इसलिए मोटीबा सारे आश्रम की बा माँ बन गयी थी। मुझे लगता है कि मोटीबा के बिना बापूजी के आश्रम में इतने सारे लोग आकर रह नहीं सकते थे। बापूजी तो प्रखर तप्त सूर्य समान थे। उनके उस तपः पूत तेज के निकट रहना कठिन कसौटी थी। लेकिन मोटीबा उस प्रचण्ड तेजस्विता के ताप को अपने उपर लेकर आश्रमवासियो को बचा लेती थीं।
पंडित मोतीलाल नेहरू कई-कई दिन तक साबरमती आश्रम में रह लेते थे क्योंकि मोटीबा उनका साथ देती थी। अन्यथा उनके लिए तो आश्रम एकदम ही शुष्क स्थान बन जाता। सेवाग्राम में बापूजी की कुटी तक पहुँचने के लिए पहले मोटीबा की कुटी आती थी। वे अपने बरामदे में बैठकर चरखा चलाती थी और जाने-अनजाने सभी का मधुरता से स्वागत करती थी और खाने-पीने और रहने की व्यवस्था करती थी। बापूजी के साथ तो मेहमानों को मात्र चर्चा करने का काम रहता था। बाकी सारी कठिनाइयाँ मोटीबा हल कर लेती थी। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्य कभी मोटीबा से मिले बगैर नहीं रहते थे। इन सब मेहमानों में सरदार और जवाहरलाल, राजेन्द्रबाबू, कृपलानीजी विशेष थे। राजाजी तो समधी ही थे। मोटीबा सबकी इच्छा अनुसार चाय-कॉफी बनाकर पिलाती थीं। इन सबमें सरहद के बादशाह खान मोटीबा के विशेष मित्र थे। बादशाह खान छह फीट से ज्यादा उँचे थे। मोटीबा मुश्किल से चार फीट आठ या दस इंच रही होगी। मगर दोनो में भारी मित्रता थी। बादशाह खान जब भी पेशावर से आते, तो मोटीबा के लिए बादाम, किशमिश, अखरोट और ईरान की नरम काली खजूर लाते थे। इन अप्राप्य मेवों का काफ ी हिस्सा मैं और कनु ही खिसका लेते थे। मोटीबा की महिला मित्रों में दादाभाई नौरोजी की तीन पौत्रियाँ, गोसीबन, सरोजिनी नायडू, मोतीलाल नेहरू की पत्नी स्वरूपरानी, राजेन्द्रबाबू की पत्नी राजवंशी देवी और जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती विशेष थी। ये सब मित्र महिलाएँ थीं, बाकी सब स्त्रियाँ बेटी या बहुएँ होती थीं। इन सब लोगों के लिए मोटीबा ही आश्रम का बहुत बडा आर्कषण थी। अगर मोटीबा आश्रम में न होती तो शायद ही किसी आश्रमवासी को हिन्दू वार-त्यौहार पता चलता। त्यौहार के दिन मोटीबा कुछ-न-कुछ प्रसाद बनाकर आश्रमवासियों को दे देती थीं, तो आश्रम में आनन्द-मंगल का वातावरण बना रहता था। घनश्यामदास बिडला तो हमेशा ही कहते थे कि सेवाग्राम आश्रम में सभी खब्ती लोग बसते थे। लेकिन मात्र बा समझदार थीं, तो आश्रम अखरता नहीं था। बापूजी भी कहते थे, मेरे और बा के निकट सम्पर्क में आनेवाले लोगों में ऐसे लोगो की संख्या ज्यादा है जिन्हें जितनी श्रद्धा मुझमें है उससे ज्यादा बा पर है। मोटीबा अपने इन सब मित्रों से हिन्दी, गुजराती में बातें करती थीं। लेकिन जहाँ जरूरत पडती थी, वहाँ बेधडक अंग्रेजी भी बोल देती थी। हालांकि उन्होंने अंग्रेजी पढी नहीं थी, लेकिन इधर-उधर के अंग्रेजी शब्दों से बखूबी काम चला लेती थी। बापूजी के अफ्रीका के मित्र पोलाक की पत्नी मिलि ने मि.गाँधी दि मैन किताब लिखी थी। उसमें उन्होंने मोटीबा की अंग्रेजी का वर्णन किया, वह बडा रोचक है। मैंने स्वंय मोटीबा को राजाजी के साथ अंग्रेजी में कई बार बोलते सुना है। मोटीबा के मन में डर या संकोच नहीं था, तो वे कुछ भी कहती थी, तो अच्छा जँचता था।
1922 से 1924 तक बापूजी जेल में थे। कैदियों की खुराक की कुछ माँगो के सिलसिले में बापूजी भोजन छोडकर मात्र दूध पी रहे थे, तो उनका वजन एक सौ चार से नब्बे पौंड हो गया था। मोटीबा बापूजी से मिलने जेल में गयी थीं। सीढी पर चढत हुए बापूजी के पैर लडखडाये, तो मोटीबा के कारण पूछने पर अनिच्छा से बापूजी को सब बताना पडा। तब साथ में अंग्रेज जेलर चल रहे थे। उन्होंने मोटीबा से कहा, मि.गाँधी ने यह जो बताया उसमे मेरा दोष नहीं है। तब मोटीबा ने कहा, आई नो, माई हस्बैंड आलवेज मेक मिश्चिफ। इस टूटी-फूटी अंग्रेजी ने उस अंग्रेज का दिल जीत लिया। जानती हूँ मेरे पति हमेशा झमेला खडा करते हैं। ऐसा अंग्रेजी में कहकर मोटीबा ने बापूजी के जीवन का निरूपण ही कर दिया था।
आमतौर पर समाज में कहा जाता है कि स्त्रियों का परिग्रह ज्यादा होता है। मोटीबा इस नियम के एकदम विपरीत थी। अगर उन्हे अफ्रीका में आभूषण रखने की चिन्ता थी, तो वह अपनी सजावट के लिए नहीं, बल्कि अपनी आनेवाली पुत्रवधुओं के लिए, रस्म-रिवाज की रक्षा के लिए उनका परिग्रह था। बाद में भी मोटीबा एक-दो साडियाँ बचाकर रखती थीं, ताकि हरीलाल काका की बेटियाँ जब कभी मायके आये, तो उन्हें देने के लिए कुछ पास में होना चाहिए। लेकिन इसके अतिरीक्त मोटीबा की अपनी आवश्यकताएँ वास्तव में बहुत की कम थी। चुस्त आश्रमवासी भी मोटीबा की सादगी और अपरिग्रह को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे। लम्बे और कडे सफर की तैयारी करते समय बापूजी कहा करते थे, बा हम सबको पराजित कर देती है। इतना कम सामान और इतनी कम आवश्यकता किसी की नहीं है। मैं सादगी का ऐसा आग्रह रखता हूँ, लेकिन बा के मुकाबले में मेरा सामान दुगुना है। हमारी सजग कोशिश के बाद भी हम बा की स्वाभाविक किन्तु अचूक रूप से स्वच्छ और भव्य सादगी के साथ किसी तरह की होड में नहीं टिक सकते हैं। बापूजी के पूरे दल में बा का बिस्तर सबसे छोटा होता था और उनकी नन्ही-सी पेटी कभी अव्यवस्थित या ठूँसी-ठाँसी नहीं होती थी।
इस भौतिक परिग्रह से उपर उठकर हमारी मोटीबा ने अपनी आकांक्षाओं और अभिलाषाओं को भी छोड दिया था। बापूजी को इसकी कदर थी। एक बार हाल में ही भर्ती हुए आश्रमवासी ने बापूजी से पूछा, अगर चाय-कॉफ ी नुकसान देती है तो बा क्यों पीती है? बापूजी ने फौरन उतर दिया, तुम्हें क्या पता कि बा ने क्या-क्या नहीं छोडा है। उसकी यह आदत रह गयी है। मैं उसे यह भी छोड देने को कह, तो मुझ जैसा जालिम कौन होगा? बाद में मोटीबा ने अपनी कॉफ ी भी छोड दी थी। और जरूरत होने पर तुलसी और कालीमिर्च का कहवा पीकर संतोष कर लेती थीं। यह कॉफ ी आदि तो नगण्य वस्तुएँ हैं, लेकिन मोटीबा ने तो जनता की खातिर अपना सर्वस्व देकर अपने पति के समूचे जीवन को ही देश पर न्यौछावर कर दिया था। बापूजी की सेवा कर उनकी सीमित शक्ति का संचय करना ही मोटीबा के जीवन का एकमात्र ध्येय बन गया था। उनमें न की आसक्ति थी न परिग्रह, न ही त्याग करने का कोई अंहकार था। अपने अह्म को जीत लेना श्रेष्ठ साधना होती है। हमारी निरक्षर दादी को यह सहज साघ्य थी।
***
यह अंश सुमित्रा गाँधी कुलकर्णी की चर्चित पुस्तक महात्मा गाँधी मेरे पितामह (व्यक्तित्त्व और परिवार) से लिया गया है।