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गाँधी का अंतिम दिन

सुशोभित
अभेद्य अंधकार के बीच मेरा विश्वास सबसे उज्ज्वल है।
- महात्मा गाँधी
30 जनवरी 1948 को गाँधीजी रोज की तरह तडके तीन बजकर तीस मिनट पर उठ गए थे!
चार माह पूर्व ही नियम-संयम, व्रत-उपवास से उजली उनकी देह ने इस धरती पर 78 वर्ष पूर्ण किए थे। इस कृशकाय देह में एक विराट संकल्प घनीभूत हुआ था। गाँधीजी के जीवन के सभी कृत्य उसी आत्मबल से सप्राण और सजल थे। 78 वर्ष के इस जीवन में उन्होंने इतना कार्य किया था, जितना कोई डेढ सौ सालों में नहीं कर सकता। उन्होंने असंख्य शब्द लिखे और बोले, अगण्य व्यक्तियों से संवाद किया, अनगिनत मीलों की यात्राएँ की, बीसवीं सदी के केंद्र में सबसे सार्थक, सक्रिय और सार्वजनिक जीवन उन्होंने जिया।
और इस जीवन की वह अंतिम भोर थी! जनवरी की सर्दियां थीं और दिल्ली नींद में डूबी थी। इतिहास स्वयं से अनभिज्ञ था। नियति एक संगीन चुप्पी साधे हुए थी। किंतु क्या सभी उससे अनजान थे? सबसे बढकर गाँधीजी, जो उस पूरे दिन आसन्न मृत्यु के संकेत किसी न किसी माध्यम से देते रहे थे?
उस दिन भी गाँधीजी रोज की तरह तडके साढे तीन बजे उठे। तब क्या उन्होंने सोचा होगा कि आज रात इसी देह में सोना नहीं होगा? क्या उनकी चेतना के भीतर किसी अंश को इसकी प्रतीति रही होगी? एक सुदीर्घ जीवन का अंतिम दिन क्या ऐसी ही धोखादेह सरलता से आरम्भ होता है?
रोज हम नींद से जागते हैं। कुछ देर हमारी चेतना तंद्रिल रहती है। फिर हम प्रकृतिस्थ होते हैं। हमें प्रतीति होती है कि रात को जहाँ हमने काम छोडा था, वहीं से अब फिर शुरू करना है। हम इस जीवन को जानते हैं, पहचानते हैं, इसमें सम्मिलित चेहरों और स्थानों को एक तारतम्य में चिह्नित करते हैं। अगर रोज सुबह नींद से जागना एक यात्रा पर निकलना है, तो रोज रात को सो रहना घर लौट आने की तरह है। किंतु एक दिन ऐसा भी आता है, जब हम लौटकर घर नहीं आते? तब हम कौन हैं?
मैं बिडला हाउस की उस तस्वीर को देखता हूँ, जो 30 जनवरी 1948 की शाम को त्रासदी के बाद उतारी गई थी। प्रार्थना सभा का मंच सजा था, किंतु गादी खाली पडी थी। गाँधीजी को रोज की तरह वहाँ प्रार्थना करने आना था, किंतु वे वहाँ नहीं पहुँच सके। उनकी अनुपस्थिति वहाँ मंचासीन थी। कुछ था, जो अपूर्ण रह गया। कोई लौटकर घर नहीं आया। एक कहानी पूरी नहीं हुई। तब हम स्वयं से पूछें कि पूरा होना क्या होता है और अधूरा होना क्या होता है?
देह एक आयु जीकर मर जाती है। किंतु जो चेतना में रहता हो, उसके लिए तो यह सब यात्राएँ ही हैं। उसके लिए आना और जाना कैसा? क्या गाँधीजी उसी चेतना के शुद्ध भाव में परिनिष्ठित नहीं हो चुके थे?
और इसके बावजूद-- जीवन का अंतिम दिवस होने के बावजूद-- देह की शर्तें तो पूरी करना होती ही हैं। तो गाँधीजी साढे तीन बजे उठे। प्रार्थना की। मुँह-हाथ धोकर कांग्रेस पुनर्संगठन के मसविदे पर काम करने बैठ गए, जो वे बीती रात पूरा नहीं कर पाए थे। ठीक पौने पाँच बजे उन्होंने नियमानुसार गर्म पानी, शहद और नींबू का रस लिया। वे अभी-अभी उपवास से उठे थे और देह दुर्बल थी, तो सुबह की सैर को नहीं गए, कमरे में ही टहलते रहे। उन्हें खाँसी आई। लौंग का चूर्ण समाप्त हो गया था। मनुबहन लौंग पीसने लगीं। कहा, रात के लिए भी बना लेती हूँ, आप पीकर सो जाइयेगा। गाँधीजी बोले, कौन जानता है रात पडने तक जीता भी रहूँगा या नहीं?
कौन जानता है? कौन जान सकता है? संध्यावेला में पंछी अपने नीड में लौटेगा या नहीं? किंतु दैनन्दिन के दुःखों का ऋण तो तब भी मनुष्य को चुकाना होता है।
गाँधीजी ने जब अपने जीवन का अंतिम स्नान किया, तो एक उज्ज्वल प्रसन्नता उनकी देह पर आच्छादित हो गई। उनका वजन लिया गया, जो 109 पौण्ड निकला। सुबह साढे नौ बजे उन्होंने भोजन किया- उबला हुआ साग, कच्ची गाजरों का रस, चार टमाटर, बकरी का 12 औंस दूध और घृतकुमारी का काढा। एक तपस्वी का आहार। खाते-खाते भी वे काम करते रहे। कांग्रेस-विधान के मसविदे की प्रत्येक धारा को पढकर उसमें सुधार करते रहे। भला किसलिए? कांग्रेस को अब उनकी और उनके विधान की क्या आवश्यकता रह गई थी? और रहती भी तो गाँधीजी की नियति में कल की सुबह कहाँ लिखी थी?
साढे दस बजे गाँधीजी खटिया पर लेटे और नींद आने से पहले अपना दैनिक बांग्ला पाठ तैयार करते रहे। जागे तो सुधीर घोष ने उनको समाचार पत्र-पढकर सुनाए। पंडित नेहरू और सरदार पटेल के मतभेदों की खबरें सब तरफ थीं। तीसरे पहर कोई आया और आगामी यात्राओं के बारे में बात करने लगा। गाँधीजी ने कहा, सब कुछ ईश्वर के हाथ में है, दिल्ली छोड सकूँगा मुझको तो यह भी भरोसा नहीं।
दोपहर डेढ बजे गाँधीजी ने पेट पर मिट्टी की पट्टी रखवाई। धूप तेज हो गई थी, तो नोआखाली टोप से चेहरा ढक लिया। कोई पत्रकार चला आया। उसने एक खबर का हवाला देकर पूछा, तो आप परसों सेवाग्राम जा रहे हैं? गाँधीजी ने कहा, हाँ अखबारों में तो यही सूचना है कि गाँधी पहली फरवरी को सेवाग्राम जाएगा, लेकिन मैं जानता नहीं कि वह गाँधी कौन है।
सीलोन से एक सज्जन आए, जिनकी बिटिया ने गाँधीजी से ऑटोग्राफ माँगा और उन्होंने खुशी-खुशी दस्तखत किए। फ्राँस के विश्ववंद्य छायाचित्रकार ऑनरी कार्तिएर ब्रेसां आए और गाँधीजी की तस्वीरें उतारीं। फिर मार्गरेट बुर्के-व्हाइट आईं और गाँधीजी से बात करने लगीं। क्या यह भी नियति का ही कोई सुचिंतित प्रयोजन था कि 30 जनवरी के उस दिन तत्कालीन विश्व के ये दो सबसे बडे छायाचित्रकार ऐन दिल्ली में मौजूद रहना थे?
देखते-देखते चार बज गए। सरदार पटेल आए। गाँधीजी उनके साथ बातचीत में डूब गए। पंडित नेहरू शाम को प्रार्थना सभा के बाद बिडला हाउस आने वाले थे। गाँधीजी सरदार को समझाते रहे। समय हाथ से रेत की तरह फिसल रहा था। पाँच बज गए। प्रार्थना सभा का समय हो गया। आभा ने गाँधीजी को घडी दिखाई, किंतु उनका ध्यान नहीं गया। दस मिनट ऊपर हो गए, तब वे अपराध-बोध से भरकर उठे। एक सेविका ने आकर कहा- काठियावाड से दो कार्यकर्ता भेंट करना चाहते हैं। गाँधीजी बोले, प्रार्थना के बाद जीवित रहा, तो उनसे अवश्य मिलूँगा।
अगर प्रार्थना के बाद जीवित रहा तो? जबकि महज पाँच मिनट बाद अठहत्तर वर्षों का यह यशस्वी जीवन उनके हाथ से छूट जाने वाला था।
क्या गाँधीजी ने स्वयं को मृत्यु को सौंप दिया था? हाँ, यकीनन। किंतु यह 30 जनवरी को नहीं हुआ था। उन्होंने बहुत पहले ही वैसा कर दिया था। नोआखाली जाने से पहले भी उन्होंने एक सुंदर मृत्यु के बारे में बात की थी। गाँधीजी के पुत्र देवदास गाँधी ने कहा था यह आरोप बडी आसानी से लगाया जा सकता है कि भारत-सरकार बापू की रक्षा करने में विफल रही, किंतु बापू जैसे थे और जैसा जीवन जीते थे, उसमें भला उनकी रक्षा कैसे की जा सकती थी? वे खुला और पारदर्शी जीवन जीते थे और लोगों के बीच रहते थे। वे किसी सुरक्षा-घेरे में रहने वाले विशिष्टजन थोडे ना थे। गाँधीजी का जीवन सदैव ही संकट में था, किंतु उन्होंने इसकी चिंता करना छोड दिया था।
तब मुझको लगता है कि गाँधीजी मृत्यु के समक्ष भी सत्याग्रही सिद्ध हुए थे। उन्होंने मृत्यु से कहा कि चाहो तो आकर मुझे ले जाओ, मैं बीच में व्यवधान नहीं डालूँगा। अगर मृत्यु मुँह चुरा लेती तो उनसे हार जाती। और अगर मृत्यु उन्हें आकर ले जाती तो वे मृत्यु से बडे हो जाते। जैसे कि वे 30 जनवरी 1948 के बाद से हो गए हैं। आखिर एक सत्याग्रही की परिभाषा यही तो है कि उसकी नैतिक निष्ठा प्रतिपक्ष से ऊँची रहती है और कथासूत्र उसी के हाथ में रहते हैं। गाँधीजी ने मृत्यु को अपनी उघडी हुई छाती सौंपकर उसे हरा दिया था।
कहने को आप कह सकते हैं कि 30 जनवरी 1948 को जब गाँधीजी तडके साढे तीन बजे उठे तो वह इस धरती पर उनका अंतिम दिन था। किंतु जो चेतना उनके माध्यम से इस धरती पर आई थी, उसकी यात्रा इससे कहीं बडी और व्यापक थी। हमें गाँधी को नहीं देखना चाहिए, गाँधी की यात्रा को देखना चाहिए। हमें गाँधी की खडाऊ को गादी पर नहीं रखना चाहिए, गाँधीमार्ग पर चलना चाहिए। हमें गाँधी-तत्व को आत्मसात करना चाहिए। हममें से कोई भी गाँधी नहीं हो सकता, किंतु गाँधी-तत्व की प्रतीति हमें बेहतर मनुष्य होने में सहायता कर सकती है।
गाँधी-तत्व से हमें सत्यनिष्ठा, अहिंसा, करुणा, और सबसे बढकर आत्मपरीक्षण की शिक्षा मिलती है। जिसकी आत्मा में मैल हो उसे मृत्यु अपने साथ पाश में बांधकर ले जाती है। किंतु वह न्योता तो एक शुद्ध चेतना का ही स्वीकारती है, जिसने एक सुंदर जीवन जिया हो। गाँधी का जीवन सुंदर था। गाँधी सुंदर थे।
30 जनवरी को मृत्यु गाँधी के सामने सिर नवाकर आई थी। और वे उसी उज्ज्वल प्रसन्नता के साथ उसके साथ गए थे, जो कि स्नान से धुली देह में चली आती है। 30 जनवरी की यह तिथि एक स्मारक है। हमें इसे अपने प्राणों में एक मोरपंख की तरह सम्हालकर रखना चाहिए, जैसे कि हमने सहेज रखे हैं गाँधीजी का चश्मा, घडी, खडाऊ, लोटा, चरखा और चरणचिह्न!
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लेखक की शीघ्र प्रकाशय पुस्तक गाँधी की सुन्दरता का एक अंश।
सम्पर्क - 12, अभिवन इन्क्लेव,
छतीसगढ कॉलोनी, भोपाल-४६२०४१।
मो. ९९८१७९३९३६