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लियो तोलस्तोय और महात्मा गाँधी

शंभू जोशी
दुनिया के सबसे सात सत्य-काम
के बिना धन, अंतरात्मा के बिना सुख, मानवता के बिना विज्ञान, चरित्र के बिना ज्ञान, सिद्धांत के बिना राजनीति, नैतिकता के बिना व्यापार, त्याग के बिना पूजा।
- महात्मा गाँधी
अधिकांश रचनाकारों और विश्लेषकों ने गाँधीजी-तोलस्तोय के बीच पत्र व्यवहार, गाँधीजी की आत्मकथा को ही उद्धृत किया है। इनकी आपसी दार्शनिक समानताओं, विभिन्नताओं पर काफी कम लिखा गया है। महात्मा गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह की लडाई की आधारभूमि तैयार कर रहे थे, उसी समय तोलस्तोय अपने साहित्य के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व के लिए एक नैतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हो चुके थे। गाँधी के मन में अंकुरित हो रहे अहिंसा संबंधी विचारों के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक आयामों को दृढता देने का काम तोलस्तोय के विचारों ने किया। इस स्थिति को बताते हुए अर्नेस्ट जे. सिम्पसन ने लिखा कि- आज यह विश्वास करना कठिन प्रतीत होता है कि तोलस्तोय को 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में विश्व में एक महानतम नैतिक बल की भाँति स्वीकार जाता था।1
समकालीन पूँजीवादी सभ्यता की प्रखर आलोचना के बाद, और अमीर और खूब माल उडाने वाले लोगों की संस्कृति का त्याग करने के बाद, तोलस्तोय कई बार अपने विचार प्राचीनकाल की जनता की सभ्यता के मूल की ओर लगाते; और उसी में वे उन जीवनदात्री शक्तियाँ को देखते, जो कि मानवजाति के भावी पुनर्नवीकरण के लिए जरूरी समझते थे। पूर्व की जनता की समाज व्यवस्था में, उनके परम्परागत शांतिमय स्वभाव और परिश्रमशीलता में उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में भी उन्हें वे शक्तियाँ दिखाई देती थीं। इसी में से तोलस्तोय की एशिया और अफ्रीका के देशों के प्राचीन दर्शन, नीतिशास्त्र, साहित्य, कला, लोकसाहित्य में, जिन्हें वे आदर से पूर्वी विद्या और ज्ञान कहते थे, विशेष रूचि बढती गई।
महात्मा गाँधी ने तोलस्तोय के साथ-पत्र व्यवहार किया। अक्टूबर, 1909 को गाँधी ने दक्षिणी अफ्रीका में चल रहे अपने अहिंसक आंदोलन के बारे में तोलस्तोय को पत्र लिखा। सितम्बर, 1909 में पत्र का जवाब देते हुए तोलस्तोय ने अपनी सहानुभूति भारतीयों के प्रति व्यक्त की। गाँधी ने दूसरा पत्र 10 नवम्बर, 1909 को लिखा। फिर अप्रैल, 1910 में लिखा। तोलस्तोय ने गाँधी के नाम अपना अंतिम पत्र 7 सितम्बर, 1910 को भिजवाया। इस पत्र में तोलस्तोय ने प्रेम की शिक्षा के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए। तोलस्तोय का लिखा ए लैटर टू ए हिंदू बहुत प्रसिद्ध हुआ। गाँधी ने स्वयं इसका गुजराती में अनुवाद भी किया। तोलस्तोय ने भारतीय जनता को संदेश दिया- बुराई का विरोध मत करो, परन्तु उसमें हिस्सा भी मत लो, शासन, न्यायालय, कर वसूली आदि के हिंसात्मक कार्यों में भाग मत लो, और सबसे बडी बात है कि सेना में भाग न लो और दुनिया में कोई ताकत तुम्हें गुलाम नहीं बना सकती।2
गाँधी ने इसी पत्र के गुजराती अनुवाद की भूमिका में लिखा कि-
जो कुछ तोलस्तोय कहते हैं सब स्वीकार करना आवश्यक नहीं है। उनके कुछ तथ्य सही नहीं है। फिर भी आज की व्यवस्था की आलोचना के मूल सत्य को पहचानना, शरीर पर आत्मा की अदम्य शक्ति की विजय मानना और उसे अमल में लाना है। वह आत्मा के गुण प्रेम की, उस शारीरिक पशु शक्ति पर विजय है, जो हममें दुर्भावना की उत्तेजना बढाती है। इसमें कोई शंका नहीं है कि जो कुछ तोलस्तोय सिखाते हैं उसमें नया कुछ नहीं है। परन्तु पुराने सत्य को जिस तरह से वह व्यक्त करते हैं वह बहुत ही जोरदार है और हमें नवजीवन प्रदान करने वाला है। उनके तर्क अकाट्य है और सबसे बडी बात यह है कि जो कुछ वह सिखाते है, वही खुद करते भी हैं। वे निष्ठा पैदा करने वाली सीख देते हैं। वे प्रामाणिक और छू लेने वाले हैं। उनकी बातों को ध्यान से सुनना चाहिए।3
तोलस्तोय ने अपने जीवन में जिन विचारों के लिए अपना समय लगाया, गाँधीजी ने उन्हें न केवल अपनाया, बल्कि नई परिस्थतियों के मुताबिक ढाल कर अद्वितीय बना दिया। गाँधीजी ने तोलस्तोय के प्रभाव को स्वीकार करते हुए कहा कि द किंगडम ऑफ गॉड इज विदीन यू ने उनका मन मोह लिया। इस पुस्तक ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। मार्जरी साईक्स ने लिखा- ... गाँधीजी की विचारधारा में तोलस्तोय के योगदान का विशेष महत्त्व इसमें नहीं है कि उससे रस्किन के शरीरश्रम के सिद्धांत की पुष्टि हुई, बल्कि इसमें है कि उन्होंने पर्वत प्रवचन में निहित सच्चे ईसाई नीति-धर्म के रूप में अप्रतिरोध की जोरदार हिमायत की थी। उनकी यह पुस्तक 1891 में प्रकाशित हुई और उसमें न केवल युद्ध का बल्कि हर प्रकार की हिंसा का जोरदार खंडन किया गया ह और कहा गया है कि शक्ति का प्रयोग करने वाली सरकारें बुनियादी रूप में अनैतिक है और गरीबों तथा जरूरतमंदों को हानि पहुँचाकर धनिकों और शक्तिशाली लोगों के लाभ के लिए जिंदा हैं।4
विलियम स्टुअर्ट नेल्सन ने अपने लेख दी ट्रेडीशन ऑफ नॉन वायलेंस एंड इट्स अंडरलाईंग फोर्सेज में लिखा-
गाँधीजी ने तोलस्तोय की पुस्तक दी किंगडम ऑफ गॉड इज विदीन यू तथा अन्य पुस्तकों में क्या पाया? उन्होंने केवल एक चीज पायी, वह यह कि तोलस्तोय की दृष्टि में ईसाई वही था जो हिंसा को त्याग देता है, यहाँ तक कि अपने पडौसियों से झगडे बचाता है और इस प्रकार स्वयं भी स्वतंत्रता प्राप्त करता है तथा विश्व को भी स्वतंत्र करने में सहायक होता है।5
गाँधीजी ने तोलस्तोय शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में एक लेख लिखा जो 10 सितम्बर 1928 को प्रकाशित हुआ। यह लेख गाँधी की तोलस्तोय के प्रति श्रद्धा को बताता है -
तीन पुरूषों ने मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव डाला। उनमें पहला स्थान मैं रायचंदकवि को देता हूँ, दूसरा स्थान तोलस्तोय को और तीसरा रस्किन को।.. उनकी (तोलस्तोय की) जिस किताब का मुझ पर बहुत प्रभाव पडा उसका नाम है द किंगडम ऑफ गॉड इज विदीन यू । इसका अर्थ है कि ईश्वर का राज्य तुम्हारे हृदय में है, यदि हम उसे बाहर खोजने जाएँगे, तो वह कहीं नहीं मिलेगा। इसे मैंने चालीस वर्ष पहले पढा था। उस समय मेरे मन में कई-एक बात को लेकर शंका उठती रहती थी; कई मर्तबा मुझे नास्तिकतापूर्ण विचार भी सूझते रहते थे। विलायत जाने के समय मैं हिंसक था, हिंसा पर मेरी श्रद्धा थी और अहिंसा पर मेरी अश्रद्धा। यह पुस्तक पढने के बाद मेरी यह अश्रद्धा चली गयी। फिर मैंने उनके अन्य ग्रंथ पढें। उनके जीवन में मेरे लेखे दो बातें महत्त्वपूर्ण थी- (1) वे जैसा कहते थे, वैसा ही करते थे। (2) वह इस युग की सत्य की मूर्ति थे। उन्होंने सत्य को जैसा माना तद्नुसार चलने का उत्कट प्रयास किया। सत्य को छिपाने या कमजोर करने का प्रयत्न नहीं किया।
यदि हम तोलस्तोय के जीवन से लाभान्वित होना चाहते हैं तो उनके जीवन में उल्लिखित तीन बातें सीखनी चाहिए।
(1) संयम का मार्ग
(2) सत्य की आराधना
(3) ब्रेडलेबर। 6
इसके अलावा इंडियन ओपीनियन में उनको श्रद्धांजलि देते हुए लिखा गया कि.
तोलस्तोय का विशेष रूप से यह कहना था कि शरीर बल की अपेक्षा आत्मबल अधिक शक्तिशाली होता है, यही सब धर्मों का सार है। संसार से दुष्टता मिटाने का मार्ग यही है कि बुरे के साथ हम बुराई के बदले भलाई करें। दुष्टता अधर्म है। अधर्म का इलाज अधर्म नहीं हो सकता है, धर्म ही हो सकता है। धर्म में तो दया का ही स्थान है। धार्मिक व्यक्ति अपने शत्रु का भी बुरा नहीं चाहता। इसलिए सदा धर्म पालन करते रहना ही इष्ट हो तो नेकी ही करनी चाहिए।7
सी. एफ. एण्ड्रूज8 ने लिखा कि तोलस्तोय से गाँधी ने सादे जीवन, अहिंसात्मक आचरण के तार्किक आधार और प्रेम की सर्वव्यापकता को सीखा। तोलस्तोय व थोरो की तरह गाँधी ने भी अपना जीवन न्यूनतम आवश्यकताओं तक सीमित किया। तोलस्तोय की रचनाओं, गीता, सरमन ऑन द माउंट के प्रभाव से गाँधी ने दरिद्रतम, निम्नतम और वंचित समुदाय से खुद को एकाकार किया।
बी.आर.नंदा9 की पुस्तक महात्मा गाँधी - एक जीवनी 5 में उन्होंने गाँधीजी पर तोलस्तोय की पुस्तकों द किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू और व्हाट आई बिलीव’ के प्रभावों की चर्चा की। उनके अनुसार द किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू के विचारों पर गाँधीजी मुग्ध हो गए। इस अकेली पुस्तक से गाँधीजी ने ईसाई धर्म के बारे में जितना सीखा और समझा, वह क्वेकर मित्रों द्वारा दी गयी ढेरों किताबों से भी नहीं जाना जा सका था। तोलस्तोय ने व्हाट आई बिलीव में इस बात पर भी जोर दिया कि ईसा केवल औपचारिक धर्म के संस्थापक ही नहीं थे, बल्कि उनके उपदेशों में बडे दार्शनिक, नैतिक और सामाजिक सिद्धांत समाए हुए है। तोलस्तोय की पुस्तकों ने गाँधी पर बहुत प्रभाव डाला। यह अवश्य है उनके अपरिपक्व विचारों को प्रौढता तोलस्तोय की कृतियों के अध्ययन से ही मिली। आधुनिक राज्य की संगठित अथवा प्रच्छन्न हिंसा और नागरिक के सविनय अवज्ञा अथवा असहयोग के अधिकार-संबंधी अपने विचारों का समर्थन गाँधीजी को तोलस्तोय की किताबों में मिला। आधुनिक सभ्यता और औद्योगीकरण से लेकर यौन-संबंधों और शिक्षा आदि अनेक विषयों की तोलस्तोय ने जो मीमांसा की, उससे गाँधी पूरी तरह सहमत थे।
इसी तरह विसेंट शीन10 ने भी गाँधी एवं तोलस्तोय की चर्चा करते हुए लिखा कि-
उन्होंने (गाँधीजी) तोलस्तोय की कृति द किंगडम ऑफ गॉड इज विदीन यू पढ डाली थी और उसने उनके मन को इतना मथ डाला था, जितना कि ईसाई मत के रूढिवाद तर्कों ने भी उन्हें प्रभावित नहीं किया था। तोलस्तोय का तर्क (यदि व्यक्ति ‘सरमन ऑन द आउंट के अनुसार आचरण करे, तो प्रशासन, पुलिस, सेनाएँ आदि निरर्थक सिद्ध होगीं) गाँधी की सहज अनुभूति से मेल खाता था और हालांकि उन्होंने अभी तक कोई आदर्श नहीं बनाया था, फिर भी इसमें संदेह की गुजांइश कम ही है कि वे तोलस्तोय ही थे, जिन्होंने इस ओर उन्हें प्रेरित किया होगा।
रोम्याँ रोलां11 ने भी स्वीकार किया कि गाँधी ने तोलस्तोय , थोरो, एडवर्ड कारपेंटर को पढा व उनसे बहुत खुराक पाई। वह इससे आगे बढकर कहते हैं कि, इतनी आलोचना से अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि हिंदुत्व के छद्म वेश में उनका वास्तविक हृदय उदार क्रिश्चियन का था। तोलस्तोय यदि कुछ और दयालु होते, कुछ और शांत और सार्वजनीन अर्थ में कुछ और स्वाभाविक रूप से क्रिश्चियन होते तो वे गाँधी होते, क्योंकि तोलस्तोय स्वभाव से इन बातों में बहुत कम थे, यद्यपि अपनी इच्छा और साधना से उन्होंने इस घाटे को बहुत-कुछ पूरा कर लिया था। महात्मा गाँधी और तोलस्तोय की तुलना करते हुए रोम्याँ रोलां लिखते हैं- गाँधी का सबकुछ स्वाभाविक है, सरल, विनयी और पवित्र है, यहाँ तक कि युद्ध के समय भी उनमें वही पवित्र भाव बना रहता है; लेकिन तोलस्तोय का विद्रोह, अहंकार के विरूद्ध अहंकारी का विद्रोह है, उनमें क्रोध के विरूद्ध क्रोध है, आवेश के विरूद्ध आवेश है, यहाँ तक कि अहिंसा का प्रचार करते हुए भी उनमें एक प्रकार की हिंसा का भाव बना रहता है।12
मार्क थॉम्सन13 ने थोरो के प्रभाव के बारे में लिखा कि 19वीं सदी के मानवतावादी चिंतकों जैसे-तोलस्तोय, कारपेंटर, थोरो आदि के औद्योगिक सभ्यता की भौतिकतावादी चमक-दमक की आलोचना, प्रकृति की ओर लौटने व सादा जीवन व्यतीत करने ने गाँधीजी को प्रभावित किया। तोलस्तोय , रस्किन व थोरो की रचनाओं से गाँधीजी के इस विचार को दृढता मिली कि आत्म-त्याग और व्यक्तिगत गरिमा का सम्मान एक अहिंसक कार्य में अन्तर्भूत है। टॉलस्टाय व गाँधी के बारे में लिखते हुए थॉम्सन तोलस्तोय के जीवन में विकसित हुए विचारों को बताते है। साथ में यह भी स्पष्ट करते है कि तोलस्तोय यह कभी नहीं बता सकें कि राज्य के वैध अत्याचार के खिलाफ एक संगठित अहिंसक आंदोलन कैसे किया जाए? तोलस्तोय के अप्रतिरोध के विचार को हिंदू व जैन के अहिंसा सिद्धांतों के साथ जोडकर गाँधीजी ने प्रत्यक्ष कार्रवाही की तकनीक में बदल कर युगांतकारी काम किया है। गाँधीजी के सत्याग्रह में केवल हिंसा का त्याग ही नहंी वरन विपक्षी को बदलने के लिए आत्मपीडन एवं स्वार्थरहित सेवा भी है। इस प्रकार गाँधीजी ने तोलस्तोय के समाज के मानवीकरण से उपाय के रूप में आत्मपीडन की व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के विचार को आगे बढाया।
डॉ. कालीदास नाग14 ने दोनों ही व्यक्तियों के संक्षिप्त जीवन चरित्र एवं आपसी पत्र-व्यवहार को प्रस्तुत किया है। दोनों के बारे में वे कहते हैं कि-
तोलस्तोय 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध के प्रोफेट थे और गाँधी 20 वीं सदी के पूर्वार्द्ध के। दोनों ने ही असमानता, धार्मिक आडम्बर व विकृत नैतिकता तथा मानव चरित्र पर आधुनिक उद्योगवाद के घातक प्रभावों के खिलाफ आवाज उठाई व विरोध किया।
उन्होंने गाँधी - तोलस्तोय के बीच हुए पत्र-व्यवहार को भी इस पुस्तक में प्रस्तुत किया और ए लैटर टू ए हिंदू को भी शामिल किया है।इस पुस्तक में उन्होंने गाँधी द्वारा लिखी गयी प्रस्तावना को भी शामिल किया है जिसके साथ गाँधीजी ने लैटर को अनुवाद कराकर द. अफ्रीका में प्रचारित किया था। इस प्रस्तावना में गाँधीजी के विचारों पर तोलस्तोय की झलक आसानी से देखी जा सकती है। डॉ. नाग ने यह दिखाने का प्रयास भी किया कि ब्रेड लेबर, धर्मों के व्यापक अध्ययन, प्रेम आदि अनेक बातों में उनमें समानता थी। इसी पुस्तक की प्रस्तावना में एम. एस. अने ने लिखा कि वेद, उदनिषद, मुहम्मद साहब का जीवन, जरथ्रुस्त्रा, लाईट ऑफ एशिया, बाइबिल ये सभी समान स्त्रोत रहे हैं जिनसे गाँधी और तोलस्तोय दोनों ही अपने ज्ञान की पिपासा शांत करते हैं और अपने को प्रबोधित महसूस करते है।15
राम झा16 ने गाँधीजी एन्काउंटर विथ वेस्टर्न थोट्स आलेख में यह दिखलाने की कोशिश की कि इस बात का जिक्र मिलता है कि गाँधीजी की मुलाकात एसेक्स में एल्मर मॉड से हुई थी और गाँधीजी ने उनसे अप्रतिरोध व सत्याग्रह के अंतर पर चर्चा करते हुए बताया कि तोलस्तोय का विचार धार्मिक परिशुद्धता (Religion Perfectionism) पर आधारित है और संगठित बुराई के खिलाफ किसी संघर्ष की अनुमति नहीं देता। यहीं पर यह सत्याग्रह में निहीत सामाजिक संघर्ष से भिन्न हो जाता है।
माइकल रेंडल17 ने अपनी पुस्तक सिविल रेजिस्टेन्स में तोलस्तोय के बारे में कहते हैं कि तोलस्तोय का पूरा बल वैयक्तिक प्रयास पर है जो चेतना के अनुसार परिणाम की परवाह किए बगैर कार्य करता है। तोलस्तोय ने असहयोग की महत्ता प्रकट की। तोलस्तोय की निष्क्रिय प्रतिरोध की समझ युद्ध या शोषण से व्यक्ति के मना करने या इन चीजों के लिए उत्तरदायी राज्य को कर ना चुकाने तक थी। गाँधी ने तोलस्तोय के इस सही कर्म को संगठन के आधार के लिए तोहफे के रूप में ग्रहण किया और इसे भारतीय जनता की प्रतिक्रिया की भावनात्मक समझ के साथ जोडा। इसने गाँधी को ऐसा राजनीतिक नेता बनाया जिसकी इच्छा न तो तोलस्तोय ने कभी की थी और न ही वह ऐसा करने में समर्थ थे।
अध्येताओं के विभिन्न उल्लेखों के आधार पर हम यह देख सकते हैं कि दोनों ही विचारक प्रतिरोध के स्वरूप को धार्मिक-दार्शनिक आधारों से प्राप्त करते हैं। दोनों ही विचारकों का अध्ययन क्षेत्र काफी व्यापक था, विशेषतः धार्मिक अध्ययन। तोलस्तोय धर्मों का गहराई से अध्ययन करते हैं। ईसा की शिक्षाओं को नयी व्याख्या के साथ प्रस्तुत करते हैं। साथ ही चर्च द्वारा की गयी व्याख्या के अंतर को भी बताते हुए उसे चुनौती तक देते हैं। इसी तरह गाँधीजी ने भी धर्मों का व्यापक व गहन अध्ययन किया था। तोलस्तोय व थोरो के ग्रंथों को भी गाँधी ने पढा व प्रभावों को स्वीकार किया। भारतीय धर्म ग्रंथों, गीता, उपनिषद के अलावा कुरान, बाईबिल के पर्वत प्रवचन से गाँधीजी को नवीन दिशा मिली साथ ही गाँधीजी ने भी इन पर अपनी मौलिक टिप्पणियाँ लिखने का प्रयास किया।
तोलस्तोय ने राजनीतिक अर्थशास्त्र को झूठा विज्ञान बताकर आलोचना करते हुए पाठकों से अनुरोध किया कि वह उस विज्ञान का अध्ययन करें, जो सभी व्यक्तियों के कल्याण से संबंध रखता हो। गाँधी ने भी राजनीतिक अर्थशास्त्र के नैतिकता से पृथक होने को आडे हाथों लिया और उसे अनैतिकता का स्रोत बताया। हिंसात्मक अर्थशास्त्र के स्थान पर अहिंसक अर्थशास्त्र की वैचारिकी प्रस्तुत की, जिसे आगे चलकर डॉ. जे.सी. कुमारप्पा ने आगे बढाया।
तोलस्तोय के लिए उच्चतर उद्देश्य प्रेम व एकात्म की अनुभूति करना है और ठीक इसी प्रकार गाँधी के लिए उच्चतर उद्देश्य प्रेम के नियम का पालन करना है।तोलस्तोय ने अपने उच्चतर उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अहिंसक साधन प्रेम को स्वीकार किया-बिना किसी अपवाद या छूट के। मगर वह भी साध्य-साधन एकत्व तथा पवित्राता को दार्शनिक-सैद्धांतिक रूप न दे सके, यद्यपि व्यवहार रूप में तोलस्तोय के यहाँ यह बात सार रूप में मौजूद है। गाँधीजी के सत्याग्रह में साध्य-साधन की बहस एक नवीन रूप लेती है और दार्शनिक व सैद्धांतिक स्वरूप ग्रहण करती है। गाँधीजी सत्याग्रह की अपनी अवधारणा में साध्य-साधन पवित्रता, साध्य-साधन एकत्व को अनेक बार व्याख्यायित करते हैं। गाँधीजी के अनुसार उनके लिए साध्य और साधन परिवर्तनीय शब्द है।
तोलस्तोय के अप्रतिरोध में प्रतिरोध के लिए कोई स्थान नहीं है यानी वह प्रेम का निष्क्रिय अस्तित्व है। प्रेम उपस्थित है, मगर अपनी निष्क्रियता में। प्रेम तोलस्तोय के यहाँ आत्मबल, शक्ति नहीं बन पाता है, यहाँ बुराई को रोकने का कोई मार्ग नहीं है। वहीं पर गाँधीजी की सत्याग्रह की अवधारणा तोलस्तोय के प्रेम की धारणा को स्वीकार तो करती है, मगर इसमें परिवर्तन करती है। गाँधीजी के सत्यपूर्ण होने में दो चीजें आपस में जुडी हुईं है- सत्य का आग्रह व असत्य का विरोध। यह एक ही चीज के दो पहलू हैं, जो अविभाज्य हैं।
प्रो. नंदकिशोर आचार्य18 ने इसे सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते हुए लिखा-
तोलस्तोय अप्रतिरोध पर बल देते है क्योंकि उनके अनुसार प्रेम में प्रतिरोध के लिए जगह नहीं है। लेकिन गाँधी का बल सत्याग्रह पर है जो एक सकारात्मक अवधारणा है। जो केवल अप्रतिरोध द्वारा नहीं, बल्कि सक्रिय अहिंसात्मक संघर्ष द्वारा अन्याय या असत्य का विरोध और सत्य की स्थापना का आग्रह करती है। यही कारण है कि तोलस्तोय का अप्रतिरोध जहाँ वैयक्तिक स्तर तक सीमित रहता है, वहाँ गाँधी का सत्याग्रह सामूहिक स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का कारक बनता है। रेल के डिब्बे से बाहर फेंक दिए जाने पर गाँधीजी केवल उसे चुपचाप बर्दाश्त नहीं करते, बल्कि ऐसे अन्याय और उसे करने वाली व्यवस्था के विरूद्ध सत्याग्रह करते हैं। इसलिए तोलस्तोय के प्रेम के नियम से सहमति प्रकट करते हुए भी गाँधीजी ने उसे अप्रतिरोध या निष्क्रिय प्रतिरोध की जगह अहिंसक प्रतिरोध, सत्याग्रह और असहयोग की सक्रियता में ढालने का प्रयास किया।... स्पष्ट है कि तोलस्तोय का अप्रतिरोध’ या निष्क्रिय प्रतिरोध और गाँधीजी का अहिंसक प्रतिरोध और सत्याग्रह प्रेम के नियम के दो भिन्न रूप हैं।
तोलस्तोय व्यक्तिगत चेतना (Individual conscience) को जगाने का प्रयास करते हैं, तोलस्तोय के बताए गए जीवन दर्शन के आधार पर कईं देशों में तोलस्तोय के जीवनकाल में ही अनेक तोलस्तोय समूह बने। तोलस्तोय के अप्रतिरोध स्वरूप के आधार पर कोई व्यापक संगठित आंदोलन किसी सत्ता के विरूद्ध नहीं मिलता है। सत्याग्रह इस आधार पर इन दोनों से आगे जाता है कि सत्याग्रह व्यक्तिगत होने के साथ-साथ सामूहिक और सक्रिय भी है। सत्याग्रह व्यक्तिगत, सामूहिक दोनों ही रूपों में संगठित है और व्यवस्थित भी। इसकी सक्रियता इस रूप में अभिव्यक्त होती है कि यह अहिंसा को आधार बना कर बुराई, अनैतिकता, अन्याय, शोषण आदि का विरोध करती है। गाँधीजी द्वारा सम्पन्न असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलन सत्याग्रह के सामूहिक आचरण के स्वरूप व उसकी सक्रियता की बेजोड मिसाल है।
तोलस्तोय के अप्रतिरोध में विपक्षी के प्रति असहयोग परन्तु प्रेमपूर्ण व्यवहार व उसके फलस्वरूप मिलने वाले दंड का सहज स्वीकार है। विपक्षी के प्रति प्रेम अप्रतिरोध की शर्त है। सत्याग्रह इस संबंध में एक कदम आगे जाता है। वह विपक्षी को भी सत्यपूर्ण व्यवहार की ओर अग्रसर करता है। सत्याग्रह अपने तात्कालिक उद्देश्य की पूर्ति तो है ही परन्तु वह उससे भी आगे जाकर विपक्षी नैतिक उत्कर्ष के उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयास है।
अतः यह कहा जा सकता है कि निष्क्रिय प्रतिरोध व अप्रतिरोध का वैयक्तिक चेतना को जगाने के प्रयास व वैचारिक दर्शन से इसे सक्रिय, संगठित अहिंसक सामूहिक प्रयास में व्यावहारिक आंदोलन में रूपान्तरित (transform) करना सत्याग्रह साथ ही साथ गाँधीजी की अनूठी विशिष्टता है। अहिंसा एवं शांति से जुडे विषयों के अध्येताओं ने लियो तोलस्तोय और महात्मा गाँधी के विचारों को स्वतंत्र रूप से और एक-दूसरे के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया है। तोलस्तोय का अप्रतिरोध सिद्धांत ईसा की सीख के आधार पर मनुष्य जाति के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है, तो गाँधी के लिए सत्याग्रह अपने जीवन के चरण उद्देश्य की प्राप्ति का मार्ग हो जाता है। अप्रतिरोध में गाँधी ने जीवन में दृढता, आडम्बरहीनता और धर्म के मूल को देखा और अपने गीता के अध्ययन और जीवन अनुभवों से उसे और अधिक परिष्कृत कर मानवीय इतिहास में बदलाव के साधन के तौर पर प्रस्तुत किया। अध्येताओं ने इन दोनों के बीच के संबंध को बहुत बारीकी से देखा, उनके विचारों के बीच साम्यता और वैषम्य को प्रस्तुत किया। दोनों के मूल विचारों के स्रोतों की चर्चा की और एक संश्लेषण प्रस्तुत किया। वर्तमान हिंसक समय में अप्रतिरोध और सत्याग्रह दोनों ही अवधारणाएँ हमें यह बताती है कि मानवीय जीवन का भविष्य सहयोग और अहिंसा में ही है।
संदर्भ
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3. वही, पृ.-92
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शीन, विसेंट, गाँधीजी- एक महात्मा की संक्षिप्त जीवनी (अनु.- हेमेंद्र), प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, 1994, पृ.-37
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आचार्य, नंदकिशोर, सभ्यता का विकल्प, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 1995, पृ.-22
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सम्पर्क : डी-2, टीचर्स क्वाटर्स, गाँधी हिन्द, पोस्ट हिन्दी विश्वविद्यालय,
वर्धा- ४४२००१, महाराष्ट्र