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गाँधी : धर्म और स्त्री संबंधी विचार

हितेन्द्र पटेल
जिस दिन से एक महिला रात में सडकों पर स्वतंत्र रूप से चलने लगेगी, उस दिन से हम कह सकते हैं कि भारत ने स्वतंत्रता हासिल कर ली है।
- महात्मा गाँधी
गाँधी जब आत्मकथा लिखने का मन बना रहे थे किसी ने उनसे कहा कि आत्मकथा तो पश्चिमी समाज में लिखने का रिवाज है। हमारे यहाँ तो आत्मकथा नहीं लिखी जाती । इसका तर्क यह दिया गया कि विचार तो बदल सकते हैं और ऐसे में अपनी आत्मकथा में वे चीजें लिखी जा सकती हैं, जिस पर बाद में खुद आत्मकथा लेखक का ही विश्वास न रहे। गाँधी को इस बात में कुछ तत्त्व दिखा लेकिन फिर उन्होंने तय किया कि चूंकि उनका उद्देश्य असली आत्मकथा लिखना नहीं है, बल्कि अपने किए गए प्रयोगों के बारे में लिखना है, इसलिए वे आत्मकथा लिख सकते हैं। वे मानते थे कि उनके जीवन में प्रयोगों के अलावा कुछ नहीं है, इसलिए उनके प्रयोगों की कहानी ही उनकी आत्मकथा बनी।
गाँधीजीवन भर अनवरत प्रयोग करते रहे और जीवन के भिन्न-भिन्न पडावों पर उन्होंने अपने लिए कुछ विशेष लक्ष्य भी रखे । गाँधी के जीवन और उनके दर्शन के गंभीर अध्येता उन संदर्भों और निहितार्थों को ध्यान में रखकर ही उनके व्यक्त विचारों का अध्ययन करते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे गाँधी के भीतर विरोधाभास भी ढूँढ लेते हैं।
गाँधी के जीवन में कई अध्याय हैं। उनमें से एक अध्याय 1922 में पूरा हो गया है। जब उन्होंने तय किया कि देश को राजनीतिक आंदोलनों से अधिक रचनात्मक कार्यों के आधार पर सत्याग्रह के लिए तैयार करने की जरूरत है। इसके बाद सामाजिक सुधार, खादी और स्वछता आदि पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया। अगले आठ साल वे इसी में जुटे रहे। 1930 के बाद गाँधी कई अन्य चीजों में जुटे और फिर कभी राजनीतिक आंदोलन के दबाव से निकल नहीं पाये। भारत विभाजन के प्रश्न के गंभीर हो जाने के बाद गाँधी एक तरह से राजनीतिक प्रक्रिया में केन्द्रीयता खो देते हैं, हालांकि जनता में उनके प्रभाव में कोई कमी नहीं आई थी, तब जाकर वे फिर से अपनी सोच में कई ऐसे विषयों की ओर वे लौटे, जिन्हें वे 1918-1929 के बीच महत्त्व देते थे।
इस रचनात्मक कार्यों पर केन्द्रित आठ वर्षों की अवधि मं9 गाँधी के कथनों पर गौर से विचार करने के लिए उनकी श्रीलंका यात्रा पर कम ध्यान दिया गया है। इस आलेख में उसी पर मुख्यतः केन्द्रित करके गाँधी के धर्म और स्त्री संबंधी विचारों की एक संक्षिप्त चर्चा की गई है।
गाँधी को 1927 के जून महीने में जाफना के तीन नौजवानों ने श्रीलंका आने का निमन्त्रण दिया। एक महीने बाद उन्हें फिर से आने के लिए अनुरोध किया। साथ ही यह लिख कर भेजा कि खादी के लिए काम करने हेतु अच्छी खासी रकम भी श्रीलंका से मिल पाने की उम्मीद है।1 श्रीलंका में नवम्बर में पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। हजारों लोग उनके स्वागत के लिए आए। कोलंबो के टाउन हाल में उनका सम्मान किया गया। वे पहले अश्वेत व्यक्ति थे जिन्हें इस तरह म्युनिसिपैलिटी द्वारा सम्मानित किया गया। विद्योदय कॉलेज के बौद्ध पंडितों द्वारा भी उनका भव्य स्वागत हुआ और पाँच सौ बौद्ध भिक्षुओं ने अपने पीत वस्त्रों में उनकी भव्य प्रशस्ति की।2 इस यात्रा के बारे में महादेव देसाई ने विस्तार से लिखा जिसे पुस्तकाकार छापा भी गया। देसाई ने लिखा है कि जिस तरह का सम्मान गाँधीजी का वहाँ हुआ, वह भारत में हुए सम्मान से किसी तरह से कम न था। हिंदुओं द्वारा गाँधी के साथ बौद्ध और ईसाई लोगों की गाँधी के स्वागत की होड-सी लग गई। ढाई सप्ताह की इस यात्रा में गाँधी ने जो कुछ कहा जिसके आधार पर गाँधी के धर्म और स्त्री संबंधी विचारों को समझने में मदद मिलती है। गाँधी के कुछ ऐसे विचार भी हैं, जो अन्यत्र इतनी स्पष्टता से कम ही आए हैं, इसलिए इस यात्रा में गाँधी के वक्त विचारों पर अलग से भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
गाँधी का धर्म और उनका धरम3
अपने विवरण में महादेव देसाई ने लिखा है कि गाँधीजी इस बात को समझ नहीं पाते थे कि ईश्वर ने जो असली मंदिर बनाए हैं, जो प्रकृति के सौंदर्य के रूप में उपलब्ध है, उसे छोडकर मनुष्य ईंट गारे से बने मंदिर में अपने ईश्वर को ढूँढते हैं। अपने एक भाषण में वे श्रोताओं से कहते हैं कि वहाँ आते हुए उन्होंने प्रकृति का ऐसा सौंदर्य देखा जैसा उन्होंने जीवन में नहीं देखा था, पर वे इस बात से हैरान हैं कि उस सौन्दर्य से अभिभूत होकर झूमने के बजाए स्त्री और पुरुष मद्यपान करके झूम रहे हैं !
गाँधी के बारे में अब यह मान्य होना चाहिए कि धर्म का उनके लिए अर्थ आत्म-ज्ञान ही था। इस संबंध में गाँधी बहुत स्पष्ट हैं। अपनी आत्मकथा में भी वे इस बात को स्पष्ट रूप से कहते हैं।4 धर्म की बात करते हुए राम नाम तक जाते हुए गाँधी बहुत सहजता से इसे भाय-मुक्ति से जोडते हैं। उन्होंने लिखा है कि वे भूत-प्रेत से बहुत डरते थे और रंभा नमक एक सेविका से उन्हें इस भय से मुक्ति का एक मंत्र मिला- रामनाम का जाप। इस रामनाम ने उन्हें हर भय से मुक्ति दिलायी। बाद में तेरह साल की उम्र में उन्होंने लढा महाराज के रामायण पाठ को सुना जिसका उन पर गहरा प्रभाव पडा। महाराज के बारे में कहा जाता था कि रामायण पाठ से ही उन्हें कुष्ट रोग से मुक्ति मिली थी। जब उनका परिवार पोरबंदर आ गया, तब रामायण पाठ बंद हुआ और भागवत पाठ एकादशी के दिन शुरू हुआ। मदन मोहन मालवीय के भागवत पाठ का उन पर बहुत प्रभाव पडा था। राजकोट ने उन्हें अन्य मतों- हिन्दू धर्म के अन्य पंथों के प्रति सहिष्णु बनाया। राम और शिव के मंदिरों में वे जाते थे। जैन भिक्षु उनके पिता के पास आते थे और उनके यहाँ भोजन करते थे। उनके पिता के मुसलमान और पारसी मित्र भी उनसे धर्म पर चर्चा करते थे जिसे उनके पिता ध्यान और रुचि से सुनते थे। पिता की सेवा करते हुए किशोर गाँधी को उन्हें सुनने का मौका मिलता था। ईसाई धर्म से उनका संफ नहीं हुआ था और वे इस धर्म को नापसंद करते थे। उन दिनों ईसाई प्रचारक हाई स्कूल के पास खडे होकर हिन्दू धर्म और उनके देवताओं की निंदा किया करते थे जिसे गाँधी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे।5
गाँधी ने इस बात का उल्लेख अपनी आत्मकथा में करना जरूरी समझा है कि धर्मों के प्रति सहिष्णुता का अर्थ यह नहीं था कि वे किसी ईश्वर में विश्वास करते थे। मनुस्मृति पढकर उन्हें अरुचि ही हुई और वे अनीश्वरवाद के प्रति झुके।6 सत्य और नैतिकता ने उसी समय उनके भीतर स्थान बना लिया, ऐसा उन्होंने लिखा है। एक शिक्षाप्रद गुजराती पद्य ने उन्हीं बहुत प्रभावित किया था। उसमें एक पंक्ति है कि हर अच्छा मनुष्य जानता है कि सभी मानव एक ही हैं, इसलिए वह किसी भी बुराई के बदले भी भलाई ही करता है।
ईसाई मित्रों से हुए दक्षिण अफ्रीका में हुई बहसों में से सबसे महत्त्वपूर्ण वह बहस है जिसे गाँधी ने अपनी आत्मकथा में दर्ज किया है। उनके ईसाई मित्रों को लगता है कि हिन्दू धर्म कभी भी किसी को शांति नहीं दे सकता क्योंकि उन्नति और मुक्ति के सारे प्रयास व्यर्थ हैं। इन प्रयासों से मानव मुक्ति संभव नहीं। इससे बेचैनी से मुक्ति नहीं मिलेगी और पीडा का अंत नहीं होगा; एकमात्र उपाय है अपने सारे पापों को ईसा मसीह पर डाल देना। वही एकमात्र पापमुक्त ईश्वर संतान हैं। वही सबके पापों को अपनी पीठ पर ढोता है, ढो सकता है। गाँधी इसे अस्वीकार करते हुए कहते हैं कि वे अपने पापों के फल से मुक्ति नहीं चाहते। उन्हें तो पाप से ही मुक्ति चाहिए। इसके लिए बेचैन रहने की पीडा उन्हें मंजूर है।
गाँधी हिन्दू धर्म के इतिहास को लेकर स्वाभिमान से भरे थे। इसका प्रमाण है उनका बौद्धों के बीच दिया गया भाषण। उन दिनों इस बात का बहुत प्रचार था कि अतीत में देश की एक गौरवशाली धार्मिक और दार्शनिक परंपरा- बौद्धों को हिंदुओं ने जबरन दबा दिया। जिाहिर है, उस समय गाँधी जैसे नेता से यह अपेक्षा की गई थी कि वे बौद्ध धर्म के बारे में कुछ अच्छी और हिंदुओं के इस कुकृत्य के बारे में वे कुछ कहेंगे। गाँधी ने जो कुछ कहा है उसे बहुत ध्यान से समझने की जिरूरत है। वहाँ के बौद्धों ने उनसे कहा था कि बौद्धों के साथ अन्याय हुआ है और गाँधी को उनकी मदद करनी चाहिए। गाँधी ने जिन शब्दों में श्रीलंका के बौद्धों के समक्ष अपनी बात रखी है उसे देखें - यह मेरा दृढ विश्वास है कि बौद्ध धर्म का या बुद्ध की शिक्षा का सम्पूर्ण विकास भारत में हुआ है। दूसरा कुछ हो भी नहीं सकता था, क्योंकि बुद्ध खुद हिंदुओं के बीच के हिन्दू थे। हिन्दू धर्म का सर्वश्रेष्ठ उनके यहाँ है। उन्होंने उन शिक्षाओं के लिए अपना जीवन दे दिया जो वेदों में दफन थीं... उनके महान हिन्दू स्पिरिट ने वाग्जाल को हटाया, उन निरर्थक शब्दों से मुक्ति दिलाई, जिसने वेद के स्वर्णिम सत्य को ढँक रखा था। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दू धर्म ने बुद्ध की शिक्षा को सही रूप में आत्मसात किया। आज के बौद्ध धर्म में से जिस हिस्से को हिन्दू धर्म ने अस्वीकार किया वह बुद्ध के जीवन और शिक्षण के मूल में नहीं है।7 वे इस बात को नहीं मानते हैं कि भारत में बौद्ध धर्म का अवसान हुआ है। उनकी यह मान्यता है कि बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म का ही एक हिस्सा था और उसने हिन्दू धर्म को पुष्ट और परिष्कृत इस रूप में किया कि अब हिन्दू धर्म प्राक बुद्ध काल के हिन्दू धर्म में लौट नहीं सकता। यानी, बुद्ध ने हिन्दू धर्म को परिष्कृत किया, उसे मजबूती दी ।
बौद्धों को फटकारने से भी गाँधी संकोच नहीं करते। उनको संबोधित करते हुए गाँधी ने अस्पृश्यता के प्रश्न पर बौद्धों को फटकार लगाते हुए कहा कि छुआछूत को मानते हुए कोई बौद्ध नहीं हो सकता। एक बडे पदाधिकारी के हवाले से गाँधी ने कहा कि कुछ ऐसे बौद्ध हैं जिन्हें अस्पृश्य जाति की महिलाओं को शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने के लिए कपडे पहनने पर आपत्ति है। बौद्धों और हिंदुओं दोनों की इस मामले में उन्होंने बहुत सख्त आलोचना की।8
गाँधी ने अपने धर्म को सभी धर्मों से जोडने की भी कोशिश अपने भाषणों में की है। वे कहते हैं कि जब वे अपने सनातनी होने की बात करते हैं, तो लोग समझ नहीं पाते कि मेरे पास इस्लाम, ईसाई और जोरास्ट्रियन धर्म के लिए भी स्थान है। उनका धर्म व्यापक है, जो किसी भी धर्म का विरोध नहीं करता, यहाँ तक कि बहुत ही फनेटिक मुसलमान का भी नहीं। किसी फेनेटिक को भी वे निंदा का पात्र नहीं मानते थे और चाहते थे कि वे उसकी बात को उसकी तरफ से समझने की कोशिश करें।9 इसी दृष्टि का विस्तार करते हुए वे आगे कहते हैं कि उनके हिसाब से उन्हें हर किसी से प्रेम करना चाहिए, सिर्फ भारत के लोगों से ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लोगों से, जो किसी भी धर्म के मानने वाले हों। वे उस व्यापक उदारता के लिए अपील करते हैं और मानते हैं कि वे इसी के लिए प्रयत्न कर रहे हैं।10 इस व्यापकता को सहज और सुलभ मानते हुए गाँधी ने अपने भाषणों में कहा है कि जो धर्म प्रचारक हैं, वे भूल करते हैं। वे अपने गोस्पेल और अपनी धार्मिक परम्पराओं के साथ, जिसे उन्होंने कई पीढियों में निर्मित किया है, वे लोगों तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। गाँधी कहते हैं कि ईसाई धर्मग्रन्थों की बातें उनके लिए नई नहीं हैं, उसे वे बहुत विस्तार से बचपन में ही सुन चुके हैं, उसमें उन्हें नया कुछ भी नहीं लगता। इन शिक्षाओं और भागवत गीता की शिक्षा में उन्हें कोई अंतर समझ में नहीं आता है।
गाँधी ने उस समय तक मुस्लिम लीग के राजनीतिक चुनौती का सामना नहीं किया था और वे अपने विचारों को बिना अधिक दबाव के इस यात्रा के दौरान व्यक्त करते हुए दिखलाई पडते हैं। वे कहते हैं कि हमलोग (कांग्रेस ) प्रयास कर रहे हैं- हम लोग प्रांतवाद को दबाने की चेष्टा कर रहे हैं; नस्लवाद को दबाने की चेष्टा कर रहे हैं; हमलोग धर्मवाद (रिलीजियन्लिज्म)11, (अगर इस शब्द को इस रूप में रखा जाए ) को दबाने की चेष्टा कर रहे हैं। इतना कहने के बाद गाँधी ने कहा- हम लोग राष्ट्रवाद को उसके समग्र रूप में रखने की कोशिश कर रहे हैं, पर यह स्वीकार करना होगा कि इसे करने में हम अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। इस पूरे काम में वे राजनीति को बहुत महत्त्वपूर्ण मानते हैं। गोखले को याद करते हुए वे कहते हैं कि राजनीति खाली समय में किया जाने वाला काम बन गया है, जो कि ठीक नहीं है। इस काम को समाज के सबसे योग्य और समर्पित लोगों द्वारा एक पूर्णकालिक काम के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
इस क्रम में वे स्त्री को पुरुष के समकक्ष होने की बात करते हैं। पर सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा उनके वक्तव्य का वह है जिसमें उन्होंने कहा है कि सामाजिक समस्याओं के प्रश्न को इससे जोडकर देखना ही होगा। वे श्रीलंका निवासियों को कहते हैं कि श्रीलंका की जलवायु के हिसाब से किसी भी तरह मद्य पान को सही नहीं ठहराया जा सकता । गाँधी उन लोगों की आलोचना करते हैं जो मानते हैं कि शराब को सीमित मात्रा में लेने में कोई दिक्कत नहीं। वे कहते हैं कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकी, यूरोपियनों और भारतीयों को, जिनमें डाक्टर, वकील और बैररिस्टर भी शामिल थे, नशे में नालियों में लोटते देखा है, जिन्हें पुलिस उठाकर ले जाती थी, ताकि शर्मिंदा न होना पडे। गाँधी मद्यपान के पूरे विरुद्ध हैं।
अस्पृश्यता के प्रश्न को वे बार बार उठाते हैं और इस बात की निंदा करते हैं कि रोडियाओं को अस्पृश्य समझा जाता है और उनकी महिलाओं को शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने की अनुमति नहीं है। इस क्रम में गाँधी ने आगे कहा कि लोकतन्त्र असंभव है, यदि शक्ति को सबके साथ साझा न किया जाए। हालांकि वे चेताते भी हैं कि लोकतन्त्र को भीडतंत्र में तब्दील नहीं होने देना चाहिए। वे चाहते हैं कि जिसे अस्पृश्य कहा जाता है उनको इस लोकतन्त्र में लाने का दायित्व कांग्रेस का है। (यह संदेश वे श्रीलंका कांग्रेस को दे रहे हैं।)12
स्त्री और गाँधी की स्त्री दृष्टि
स्त्री के संबंध में भी गाँधी के विचारों को उनके श्रीलंका प्रवास के दौरान दिए गए वक्तव्यों से जोड कर देखना सहायक है।
श्रीलंका की यात्रा के दौरान गाँधी के साथ कस्तूरबा को देखकर किसी को लगा कि वे गाँधी की माँ हैं। एक ने पूछ भी लिया, जिसके उत्तर में गाँधी ने कहा- हाँ, वह मेरी माँ हैं। चालीस बरस पहले मैं अनाथ हो गया था, पिछले तीस बरस से वह मेरी माँ हैं। बरसों से आपसी समझ से हमलोग पति पत्नी नहीं रहे। उसने मेरी माँ का स्थान ले लिया है।
जीवन आनंद और उपभोग नहीं है, बल्कि दायित्व और सेवा है। जिस चीज से मनुष्य जानवर से अलग है वह यही है कि मनुष्य आनन्द और भौतिक लालसाओं को नियंत्रित करने के लिए संयम की जरूरत को समझता है।
स्त्रियों की एक सभा में गाँधीजी ने पुरुषों की पसंद के हिसाब से अपने को सजाए (गाँधी की भाषा में लदे) स्त्रियों को देखा। उन्होंने उनको संबोधित करते हुए कहा -मैं तुमसे कहता हूँ कि अगर दुनिया में अपनी कोई भूमिका चाहती हो तो अपने को पुरुषों को अच्छा लगाने के लिए अपने ऊपर की इस लदाई को अस्वीकार करना होगा। अगर मैं स्त्री के रूप में जन्म लेता, तो मैं पुरुषों की इस धारणा के खिलाफ उठ खडा होता और विद्रोह करता कि स्त्रियाँ मनोविनोद के लिए जन्म लेती हैं। मैं मानसिक रूप से एक स्त्री बन चुका हूँ, ताकि स्त्री के हृदय में प्रवेश कर सकूँ।13 इसके आगे गाँधी कहते हैं - मैं अपनी स्त्री के हृदय में प्रविष्ट नहीं हो पाता, अगर मैं उससे वैसा ही व्यवहार करता जैसा मैं पहले किया करता था। मैंने अपना व्यवहार बदला और उसके सारे अधिकार को उसके पास फिर से वापस होने दिया। इसके लिए मैंने अपने तथाकथित पति होने के सारे अधिकारों को छोड दिया। आज वह मेरी तरह ही सहज (सिम्पल) है। स्त्रियों को संबोधित करते हुए वे कहते हैं कि, अपनी इच्छाओं की पुरुषों की दासी मत बनो। अपने को सजाओ मत, अपने को सुगंधित जल से मत नहलाओ। तुम्हें अगर सचमुच की सुगंध की चाह है, तो इसे अपने हृदय से निकालने वाली सुवास को आने दो। इस सुगंध से तुम पुरुषों को ही मोहित नहीं करोगी, बल्कि पूरी मानवता को कर सकोगी। यह तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है। पुरुष का जन्म स्त्री से होता है, वह उसी की अस्थि मज्जा से बना है। अपने को पहचानो।14
अन्यत्र उन्होंने यह भी कहा कि एक इंसान और जानवर के बीच का एक बडा अंतर जिसे प्राचीन युग से मनुष्य ने बनाया है वह है कि मनुष्य विवाह संस्था का सम्मान करता है और इसके अनुरूप आचरण के लिए अपने ऊपर संयम के लिए बनाए नियम का अनुपालन करता है।15
उपस्थित प्रबुद्ध स्त्रियों का आह्वान उन्होंने समाज को सुधारने के लिए आगे आने को कहा और यह भी जोडा कि उन्हें निर्भय होकर अपने समाज के लोगों, गरीब स्त्रियों की मदद में जुट जाना चाहिए।
श्रीलंका यात्रा के दौरान उनके दिए गए वक्तव्यों की गंभीर व्याख्या शायद गाँधी के अध्येताओं के लिए उपयोगी होगा, ऐसा कहना गलत नहीं होगा।16 जिस बेबाकी से और साथ ही सद्भावना के साथ गाँधी ने संवाद किया है उसमें गाँधी के विचार बहुत स्पष्ट रूप में आए हैं।
सन्दर्भ
1. यह सही प्रमाणित भी हुई । ढाई हफ्ते के बाद कोलंबो से उन्हें 86,000 रुपए मिले। देसाई ने कहा कि उसके बाद हमें लगा कि जाफना जाकर यह राशि लाख पार करेगी या नहीं। वहाँ उन्हें सभी ओर से समर्थन और सहयोग मिला। लाख से बहुत अधिक की राशि उन्हें मिली। (महादेव देसाई, विथ गाँधीजी इन सीलोन, एस गणेशन, मद्रास, 1927, पृ 38)
2. महादेव देसाई, विथ गाँधीजी इन सीलोन, एस गणेशन, मद्रास, 1927, पृ. 2
3. गाँधी की उदार धार्मिकता को समझने के लिए उनके धर्म को धरम के रूप में देखते हैं, जिसमें हर धर्म के विचारों के लिए स्थान है।
4.M. K. Gandhi, The Story of My Eperiments with Truth (मूल गुजराती से अ्ग्रेजी में अनुवाद महादेव देसाई द्वारा), नवजीवन कार्यालय, 1933 (1927 में पहली बार प्रकाशित), पृ. 80.
5. गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका गए, तब भी वे अपने गले में तुलसी-माला पहने रहते थे और एक ईसाई मित्र मिस्टर कोट्स के बहुत कहने पर भी उन्होंने उसे अपने गले से नहीं उतारा। उन्हें लगता था कि ऐसा करने से उनका अहित होगा। (देखें उपरोक्त, पृ 289-290)
6. वही, पृ 86
7. यह चकित कर देने वाला लगभग हिन्दू वादी वक्तव्य गाँधी ने बौद्धों की सभी में श्री लंका में दिया है। इस तरह के कई वक्तव्य हैं उस यात्रा के दौरान के जिसपर ध्यान देने की जरूरत है। खास तौर पर प्रबुद्ध और सम्पन्न स्त्रियों की सभा में वे जिस तरह स्त्रियों के अपने को सँवारने के लिए लताड लगाई है, वह ध्यान देने योग्य है। गाँधी इस तरह की स्पष्टता के साथ और लगभग डाँटते हुए 1927 के बाद कम ही बोले। महादेव देसाई द्वारा संकलित इस पुस्तक पर विद्वानों का ध्यान न जाना अचरज की बात है। देखें - महादेव देसाई, विथ गाँधीजी इन सीलोन , एस गणेशन, मद्रास, 1927 (विशेष रूप से देखें अध्याय 3, और पृष्ठ संख्या 54-57)
8. वही , पृ 84
9. देखें , पृ 29
10. वही , पृ 30
11. गाँधी कम्यूनलिज्म (सांप्रदायिकता) और नैशनलिज्म पदों के प्रयोग से प्रायः परहेज करते थे, लेकिन श्रीलंका यात्रा के दौरान वे इसका प्रयोग करते हैं। ध्यान देने से ऐसा प्रतीत होता है कि वे धर्मवाद (रिलीजनिज्म) और कम्यूनलिज्म के बीच एक संबंध को देख रहे थे। एक भाषण में वे कहते हैं कि कम्यूनलिज्म पूरी तरह राष्ट्रवाद का उल्टा है। कम्यूनलिज्म का उत्साह के साथ समर्थन करने वाले गलत करते हैं और यह हमारे बडे देश (भारत) में होता है। वे कहते हैं कि हम इसको धब्बा मानते हैं, पर तीस करोड की बडी आबादी वाले देश की तुलना में एक कम आबादी के देश श्रीलंका में इसका होना उन्हें और दुखी करता है। (देखें वही , पृ 95)
12. वही, पृ 96-98
13. वही, पृ 18
14. वही
15. वही, पृ 68
16. इन पंक्तियों के लेखक के अनुसार इन भाषणों को अब तक बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया है। रामचंद्र गुहा ने भी, जिन्होने इस पुस्तक का हवाला दिया है, सिर्फ एक प्रसंग का जिक्र किया है जिसमें एक स्त्री ने गाँधी के इस आग्रह को मानने से इंकार कर दिया कि वह सिर्फ खादी वस्त्र ही पहनेगी। हिन्दू धर्म के पक्ष में गाँधी के वक्त विचारों को सामान्यतः कम ही उद्धृत किया जाता है, ऐसा भी कभी-कभी लगता है। गाँधी हमेशा हिन्दू धर्म की बुराइयों पर सकारात्मक होकर बोलते थे। उनका उद्देश्य उदार हिन्दू धर्मा की उदारता को और अधिक व्यापक रूप देना होता था। स्त्री संबंधी उनके विचारों में भी गाँधी की एक सकारात्मक दृष्टि ही थी जो प्रतिपक्ष (पुरुष) के दोषों पर केन्द्रित होने के बजाए स्त्री को अपनी शक्ति को पहचानने की ओर ले जाती थी।
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सम्पर्क - अध्येता, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान,
शिमला-१७१००५
मो. ९८३६४५००३३