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गाँधी उसे बेबी पार्लियामेण्ट कहते थे

ध्रुव शुक्ल
मेरे लिए हर हर वो शासक विदेशी है जो जनता की राय की अवहेलना करता है।
- महात्मा गाँधी
महात्मा गाँधी पार्लियामेण्टों की माता कहलाने वाली ब्रिटिश संसद को बेबी पार्लियामेण्ट कहते थे। सात सौ साल से चली आ रही यह संसद बडी कब होगी .. यह बडी बातूनी है और प्रजा को थमा दिया गया ऐसा खिलौना जान पडती है जो भारी खर्चे में डालता है। यह संसद केवल स्वार्थ साधने वालों के लिए है, किसी धर्मनिष्ठ आदमी के लायक नहीं।
1909 में हिन्द स्वराजय पर विचार करते हुए महात्मा गाँधी उन सभी स्वराज्य विरोधी आधुनिक व्यवस्थाओं को प्रश्नांकित कर रहे थे जो फिरंगियों ने भारत में कायम की थीं.. वे चेतावनी दे रहे थे कि बडे शहरों में लोग सुखी नहीं होंगे, उनमें धूर्तों की टोलियाँ और वेश्याओं की गलियाँ पैदा होंगी। गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। गाँधी देश के देहातों में स्वराज्य को प्रकाशित होता देखते थे जहाँ प्रजा अपने आसपास के जल-जंगल-जमीन के स्वभाव के अनुकूल जीवनयापन करती है। फिर उसे डाक्टर नहीं चाहिए क्योंकि प्रकृति ही उसे स्वास्थ्य प्रदान करती रहेगी। उसे वकील नहीं चाहिए, वह तो आपसी संवाद से हल खोज लेने की कला का विकास करके अदालतों से दूर ही बनी रहेगी। वहाँ बच्चों की शिक्षा श्रम में डूबे उस पारंपरिक ज्ञान से होगी, जो गाँव के जेठे-सयानों से उत्तराधिकार में मिलता रहता है।
महात्मा गाँधी ने पदयात्रा को ज्यादा महत्त्व दिया, रेलगाडी को नहीं। वे जान गए थे कि रेलगाडयिों में ठूँसकर यात्रा पर निकला जीवन एक दिन महामारी का शिकार जरूर होगा। जहाँ तक हाथ-पाँव जाते हैं, वहीं तक वास्तविक जीवन है, हमारी देह ही वाहन है उसे किसी और वाहन की जरूरत ही नहीं । जीवन की रीत ही कुछ ऐसी है कि कोई किसी को गुलाम नहीं बना सकता, वह तो जन्मजात स्वराजी है। जो लोग अपने इस स्वराज्य को नहीं पहचान पाते, वे दूसरों की गुलामी स्वीकार कर लेते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी करते हुए महात्मा गाँधी जब कस्तूरबा के साथ भारत यात्रा करके लौटे, तो उनने यही जाना कि देश के गाँवों में जीवन बसर करने वाले लोग किसी के गुलाम नहीं हैं, वे तो अपने काम में लगे हुए हैं। फिरंगी उनके साधनों पर हमला कर रहे हैं। उनके साधनों की रक्षा करना ही स्वराज्य की सच्ची लडाई हो सकती है। यह लडाई उनके टूटते हुए आत्मबल को बढाकर ही लडी जा सकती है। महात्मा गाँधी ने सबके आत्मबल को बढाने के लिए अहिंसा, सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह और अपरिग्रह जैसे हथियारों की याद दिलाई जो अपनी-अपनी देह से ही गढे जा सकते हैं। इन्हें धारण किये रहने से ही वास्तविक स्वराज्य पाया जा सकता है और अवास्तविक परराज्य को त्यागा जा सकता है।
धर्मपाल को सुनते और पढते हुए यह समझ और गहरी होती जाती है कि .. गाँधीजी में कई सौ वर्षों बाद सम्पूर्ण भारतीय समाज ने अपनी अभिव्यक्ति पायी। गाँधीजी की आत्मकथा पढता हूँ, तो उसकी प्रामाणिकता पर भरोसा होता है। वे अपनी कमियाँ सबको दिखाते हैं, तो शायद इसलिए कि हम सब कम से कम यह स्वीकार करने में संकोच न करें कि सब अपनी प्रकृति के अनुरूप होते हैं और कभी एक जैसे नहीं हो सकते, फिर भी हमें साथ रहना है और रहने की जो जगह हमें मिली है, अपनी सारी कमियों के बावजूद उसे झाड-बुहारकर ठीक रखना है। उसके बिना हमारा जीवन चल नहीं सकता।
यह जो दुनिया हमें मिली है इसमें जीवन को सहज सहकार से ही सुन्दर बनाया जा सकता है। जीवन अपने स्वभाव को कभी नहीं बदलता, वह तो उसी का प्रवर्तक है। पर अपने स्वभाव को पहचानकर अनुकूल और प्रतिकूल का निर्णय तो किया ही जा सकता है। अगर यह निर्णय नहीं किया जा सकता तो मनुष्य होने का क्या अर्थ रह जाएगा। गाँधीजी हमें उस निर्भयता की ओर ले गये जहाँ अपने स्वभाव को पहचानकर अपनी देह से मनुष्य होने का प्रमाण दिया जा सकता है। गाँधीजी यह प्रमाण देने के लिए ही वे विधियाँ खोजते और बताते रहे, जो सबके काम की हैं।
गाँधीजी ने वह आधार भी सामने रखा जिसके बिना जीने की विधियाँ नहीं खोजी जा सकतीं। उन्होंने याद दिलाया कि संसार जीवन को साध लेने की जगह भर है और साधन सबको मिले हुए हैं। उन साधनों के बीच से सिर्फ अपने पोषण के लिए ही चीजें उठाई जाए जिससे कि वे हमेशा सबके लिए बची रहें। उनकी लूट और व्यर्थ संग्रह की किसी को छूट नहीं। अगर कोई व्यक्ति और राज्य ऐसा करता है तो समझो कि वह दुनिया के अंत की तैयारी में लगा हुआ है।
धर्मपाल विकल हैं कि इस दृष्टि के प्रकाश में हमें आज भी अपना पथ खोज सकना चाहिए। वे हमसे कह रहे हैं कि दुनिया में उन्माद, लूट और विध्वंस के बीच भी उन ओझल होते जा रहे पथों की तरफ भी तो मुडना चाहिए, जो एक शांत, सरल और सुंदर दुनिया की ओर हमें ले जा सकते हैं। वे ध्यान दिला रहे हैं कि हम सदियों से बहुत-सी दुनियावी अवधारणाओं के भ्रमजाल में फँसे हुए हैं और हम अपने धर्मग्रंथों के बोझ से भी दबे हुए हैं। हमारे ऊपर उन राजनेताओं और प्रशासकों का भी भार है जिन्हें पाल-पोसकर ब्रिटिश हुकूमत हमारे मत्थे मढ गयी है। वे स्वीकार कर रहे हैं कि व्यापक संसार से संबंध तोडना भी संभव दिखाई नहीं देता पर हम उन अवधारणाओं से अभी भी बाहर निकल सकते हैं जो व्यर्थ ही हमें अपने संरक्षण में लिए हुए हैं।
हमें अपने भीतर यह उम्मीद तो जगाना ही होगी कि हम अपनी प्रकृति और मानस के अनुरूप अपनी धारणा में वापस लौटकर अपनी सुरक्षा और समृद्धि के उपकरण गढते हुए दुनिया के साथ खडे होने को आतुर हों। भारत में गाँधीजी ने लोगों के आत्मबल के सहारे फिर-से खडे होने की इच्छा को ही तो जगाया था। अपनी जीवन-दृष्टि और स्थानीय साधनों के अनुरूप लोगों को संगठित किया था। गाँधीजी ने भारतीय और यूरोपीय सभ्यता के लक्ष्य और काम करने के अंतर को समझकर स्वधर्म के निर्वाह और परधर्म की भयावहता की याद दिलाई। इसी का वर्णन उनकी छोटी-सी पुस्तक हिन्द स्वराज में हुआ है।
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