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गाँधी के जन्म के बाद डेढ सौ साल का भारत

प्रमोद कुमार
हमेशा अपने विचारों, शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखें। हमेशा अपने विचारों को शुद्ध करने का लक्ष्य रखें और सब कुछ ठीक हो जायेगा।
- महात्मा गाँधी
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इतिहास का मौलिक उद्देश्य ही अपने वर्तमान को जानना होता है न कि अपने अतीत को। निःसन्देह, सभी भारतीयों को यह जानने का अधिकार है कि क्या कारण है कि पूरे विश्व में जिस महान भारतीय व्यक्तित्व के बारे में इतनी अपार श्रद्धा उपस्थित है, उसके बारे में स्वयं अपने देश भारत में क्यों इतनी भ्रान्तियाँ व विसंगतियाँ पैदा हो गई हैं?
ढ्ढढ्ढ
यद्यपि, गाँधी के जन्म को डेढ सौ बरस व्यतीत हो चुके हैं, तथा भारत को आजाद हुए भी सत्तर वर्ष से अधिक हो चुके हैं, और इस समाज की सामन्तवादी मानसिकता और सामाजिक विषमता से ग्रस्त वह अति - भ्रष्ट, मात्र उपाधिधारक कुशिक्षित तबका जो केवल बल, अधिकार, राजसत्ता, तथा आर्थिक सत्ता की महत्त्वाकांक्षाओं से संचालित है व मानव स्वतंत्रता, धार्मिक सद्भावना व भारत की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विभिन्नताओं के खिलाफ है, उनके विचारों से निरन्तर दूर होता जा रहा है, जबकि, उनके 1919 से 1922 तक सत्य, अहिंसा व हिन्दू-मुसलिम एकता के मूल्यों पर आधारित आन्दोलनों के बाद ही, विश्वप्रसिद्ध फ्राँसीसी दार्शनिक व 1915 में नोबल पुरस्कार प्राप्त रोम्या रोलां ने महात्मा गान्धी नामक पुस्तक लिख दी थी, जिसका भारत में अनुवाद और प्रकाशन 1924 में ही हो चुका था। रोम्या रोलां ने लिखा था, अब कुछ शेष है, तो बस सूली। उन्होंने आगे लिखा, प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि यदि वह यहूदी न होते, रोम ने उन्हें सूली पर नहीं चढाया होता। ब्रिटिश साम्राज्य प्राचीन रोम से बेहतर नहीं है।1
गाँधी को भी, रोम्या रोलां की भविष्यवाणी के अनुसार, ईसा मसीह की भाँति सूली ही नसीब हुई। लेकिन उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य ने नहीं, एक कट्टर हिन्दू ने तीन गोलियाँ मारकर 30 जनवरी 1948 को, जब वह बिडला हाउस, दिल्ली में दैनिक प्रार्थना के लिए जा रहे थे, सूली पर ही चढा दिया था।
इसी प्रकार गाँधी के 70वें वर्षगाँठ पर विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आईंस्ंटीन ने यह भविष्यवाणी की थी कि आने वाली पीढियाँ सम्भ्वतः यह विश्वास नहीं कर पाएँगी कि माँस और रक्त का एक ऐसा भी व्यक्ति कभी इस पृथ्वी पर विचरण करता था। ऐसा लगता है इस भविष्यवाणी के भी सत्य होने का समय आ चुका है।
1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब हिटलर की वायुसेना लन्दन पर निरन्तर बमवर्षा कर रही थीं, ब्रिटिश साम्राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंसटन चर्चिल को द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीकी सहायता प्राप्त करने हेतु मजबूर होकर अमरीकी राष्ट्रपति एफ.डी. रुजवेल्ट के साथ अटलान्टिक चार्टर के घोषणा पत्र पर 14 अगस्त 1941 को हस्ताक्षर करना पडा था। इस घोषणापत्र में द्वितीय विश्वयुद्ध के समापन के बाद उपनिवेशों को समाप्त करने की भी एक शर्त थी। वास्तव में, रुजवेल्ट यह जानता था कि यदि तत्कालीन उपनिवेश समाप्त नहीं होंगे, तो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, उस समय नाजीवाद से पीडित ब्रिटेन, एक बार पुनः सबसे बडी विश्वशक्ति बन जाएगा। उसी के परिणामस्वरुप, द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात दुनिया के सभी एशियाई, अफ्रीकी और दक्षिण अमरीकी उपनिवेशों को धीरे-धीरे समाप्त किया गया।
भारत भी 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्त हो गया। भारत में ब्रिटिश उपनिवेश तो समाप्त हो गया, लेकिन आजाद भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर में बनाये गए सभी कानून एवम प्रशासनिक, राजनीतिक व शैक्षिक व्यवस्था यथावत जारी रहे। जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत के परम्परावादी गैर-बराबरी वाले सामाजिक मानस के साथ-साथ एक अति-पाखण्डी, ज्ञान विरोधी अति-भ्रष्ट वर्ग का भी जन्म हो गया।
अग्रेजों ने लोकतांत्रिक ब्रिटेन में जो व्यवस्था बनायी थी, उसके पूरी तरह विपरीत व्यवस्था ब्रिटिश भारत के लिये बनायी थी। जैसे लोकतांत्रिक ब्रिटेन में कलक्टर की व्यवस्था नहीं थी, (जो आज भी नहीं है।) लेकिन सामन्ती भारत में इस लोकतंत्र विरोधी व्यवस्था को बनाया गया था। ब्रिटेन में स्थानीय निकाय पूरी तरह अधिकार सम्पन्न होते हैं, लेकिन भारत में स्थानीय निकायों के पास कोई अर्थपूर्ण अधिकार नहीं होता। लोकतांत्रिक ब्रिटेन में गैर-तकनीकी सरकारी नौकरियों की नियुक्ति प्रक्रिया एकल खिडकी व्यवस्था पर आधारित है, लेकिन सामन्ती भारत में गैर-तकनीकी सरकारी नियुक्ति प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर यह नियुक्तियाँ कर एक प्रकार से परम्परावादी जाति व्यवस्था निर्मित की जाती हैं। भारत की आजादी के बाद से आज तक केन्द्र में और प्रान्तों में जो भी सरकारें, चाहे जिस भी राजनीतिक दल की हों, आती रहीं, जो न केवल गाँधी के विचारों की धुर विरोधी रहीं, बल्कि उनका औपनिवेशिक चरित्र भी बरकरार रहा। इसमें केवल इतना फर्क रहा कि ब्रिटिश औपनिवेशिक युग में भारत की लूट का पैसा गोरे अंग्रेजों के पास ब्रिटेन चला जाता था, जबकि आजादी के बाद वही पैसा भारत के भूरे अंग्रेजों के पास जाने लगा था। गाँधी जन्म के बाद के इन 150 वर्षों में औपनिवेशिक-प्रशासनिक, औपनिवेशिक-शैक्षिक व औपनिवेशिक-आर्थिक व्यवस्था के कारण भारत में दो समाजों - एक अति अमीर सामन्ती मानस वाला ज्ञान विरोधी, पाखन्डी इण्डिया व दूसरा अति निर्धन अशिक्षित व अज्ञानी भारत- का निर्माण हो चुका है। परिणाम सामने है।
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समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक सदभाव और अहिंसा के मूल्यों में प्रगाढ विश्वास रखने वाले गाँधी अपने समाज के रुढिवादी विश्वासों, सामाजिक विसंगतियों, विषमता के मूल्यों और अपने प्रारम्भिक जीवन में ही अर्जित जीवन मूल्यों के अंर्तविरोधों का शिकार होने के लिये अभिशप्त थे। दक्षिण अफ्रीका में अपना सत्य के साथ प्रयोग प्रारम्भ करने के पूर्व ही गाँधी के भावी व्यक्तित्व की नींव पड चुकी थी। बहुत छोटी आयु में ही उन्हें दो पूरी तरह विपरीत सभ्यताओं का साक्षात्कार करने व उन्हें स्वयंमेव आत्मसात करने का अवसर प्राप्त हो गया था। पूर्वी सभ्यता की अहिंसक आध्यात्मिकता व धार्मिक-बहुलता तथा पाश्चात्य सभ्यता की स्वतंत्रता, समानता व इहलौकिकवाद के प्रति ऐतिहासिक प्रतिबद्धताओं ने गाँधी में एक विखण्डित व्यक्तित्व का निर्माण करने के स्थान पर उन्हें सत्य के साथ प्रयोग करने की दिशा में अग्रसरित कर दिया था। इस दिशा में चलने का निर्णय पूर्णतः उनका अपना स्वयं का निर्णय था। वास्तव में, उनके इसी निर्णय ने एक ऐसे महामानव का निर्माण कर दिया था, जिसे भली-भाँति समझने के लिए ही पूरे विश्व के आश्चर्य चकित अध्येयता आज भी प्रयास कर रहे हैं।
यद्यपि उनके पिता और पितामह दोनों, अपनी छोटी-सी रियासत पोरबन्दर के दीवान (प्रधानमंत्री) थे, तथापि गाँधी की राजनीतिक और आध्यात्मिमक हैसियत को बीसवीं सदी के सामन्ती, औपनिवेशिक व भौतिकतावादी3 हिन्दू मानस ने जिंदगी भर स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार के एक विशिष्ट समाज में भौतिक सुख के त्याग की तरफ उनके झुकाव ने सभी तरफ से उनके उपहास और विषभरे आक्रमण को ही न्यौता दिया।
उनका परिवार हिन्दूधर्म की एक निरीश्वरवादी शाखा जैन पन्थ का अनुयायी था, जो अपने दैनिक जीवन में हिंसा के तिरस्कार को अपने बुनियादी सिद्वांतों में से एक मानता है। उनकी माँ पुतली बाई प्रणामी नामक एक अल्पज्ञात मतावलम्बी सम्प्रदाय से आती थीं, जो अपने बुत रहित मंदिरों में कुरान और वैष्णव धर्म के पवित्र ग्रंथों को समान आदर प्रदान करता था। प्रणामियों के उपदेशों में सभी पन्थों को मानने वाले लोगों के बीच शंाति और सद्भावना की शिक्षा भी शामिल थी। अहिंसा अर्थात किसी भी प्रकार के जीव को चोट न पहुँचाने का विचार, सादगीपूर्ण जीवन, कठोर शाकाहार तथा नियमित उपवास, जैनों और वैष्णवों दोनों के साझा मत थे। अतः यह आश्चर्य नहीं कि उनका प्रारम्भिक जीवन अपने चारों ओर मौजूद अनेकानेक बहुदेववादी वातावरण से प्रभावित रहा, जो उनके सत्य के साथ प्रयोग की उनकी खोज के लिए उत्तरदायी था।
अपनी सारी जिदंगी गाँधी ने किसी एक अकेले संगठित धर्म का अनुगमन नहीं किया। इसके विपरीत उन्हें हिन्दू धर्म की सभी शाखाओं और सहयोगी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त हुई। ऐसे संयोगों ने ही उनमें सभी विश्वासों के प्रति सहिष्णुता की भावना भर दी। यद्यपि अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में ही उन्होंने अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता का भाव अपनाना प्रारम्भ कर दिया था, तथापि इसका किंचित भी यह अर्थ यह नहीं था कि उनका ईश्वर में कोई जीवंत विश्वास था। मनुस्मृति से साबका पडने के बाद गाँधी ने स्वयं घोषणा कर दी थी कि वे कुछ - कुछ निरीश्वरवाद की ओर उन्मुख हो चुके थे।4 उन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा- सत्य के साथ मेरा प्रयोग नामक पुस्तक में लिखा था, मेरे इस तथ्य कि मैं दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु था का अर्थ नहीं था कि मेरी ईश्वर में कोई जीवन्त आस्था थी। इसी समय मैने मनुस्मृति को पढा, जो मेरे पिता के संग्रह में थी। रचना (इस ब्रह्माण्ड की) तथा ऐसी ही अन्य कहानियों ने मुझे बहुत प्रभावित नहीं किया, बल्कि इसके विपरीत इसने मेरे अन्दर कुछ-कुछ नास्तिकता की ओर झुकाव उत्पन्न कर दिया।5
यद्यपि वे एक घोषित निरीश्वरवादी नहीं थे, तथापि विश्वविख्यात निरीश्वरवादी ब्रैडला के प्रति उनके मन में गहरा आदर था। जनवरी 1891 में उन्होंने ब्रैडला की अंत्येष्टि में भाग लिया था। गाँधी के अनुसार ब्रैडला जैसे निरीश्वरवादी के लिए सत्य का वही स्थान था, जो औरों के लिए ईश्वर का होता है। परंपरागत धर्मों के अर्थ में वह एक धार्मिक व्यक्ति नहीं थे। वस्तुतः वे तो एक घोषित ईश्वरवादी भी नहीं थे।
जिस गाँधी ने 1920 में धर्म और राजनीति की अविभाज्यता की स्पष्ट रूप से पैरवी की थी और 1921 में खुले आम घोषणा की थी कि उनका आंदोलन एक धार्मिक आंदोलन है, 1947 में यह प्रतिपादित करने लगे थे कि धर्म हर व्यक्ति का अपना निजी मामला है। उसे राजनीति या राष्ट्रीय मामलों से कभी नहीं मिलाना चाहिये। 1947 तक वे पूरी तरह समझ चुके थे कि राज्य को निसंदेह धर्म-निरपेक्ष होना चाहिए। वे यहीं नहीं रूके बल्कि यह घोषणा करने के लिए और आगे बढे कि असलियत में जितने दिमाग है, उतने ही धर्म है।6
1909 तक भावी भारत के बारे में गाँधी ने एक दृष्टिकोण बना लिया था, जो यूरोप व भारत दोनों की सभ्यताओं की विसंगतियों से अलग था। गाँधी ने इसे ही 1909 में प्रकाशित अपने हिन्द स्वराज में प्रकट कर दिया था। अभी तक किसी भी भारतीय दार्शनिक के पास भावी भारत के बारे में कोई कल्पना उपस्थित नहीं थी। ध्यान रहे, उस समय तक रुस की 1917 की सोवियत क्रान्ति भी नहीं हुई थी, जो कार्ल माक्र्स के साम्यवादी सिद्धान्तों पर आधारित थी।
यद्यपि अपने विश्वासों के प्रति उनकी प्रतिबद्वता सन्देहरहित थी, तथापि उन्होंने अपने उन प्रयोगों को त्यागने में जरा भी देर नहीं लगायी, जो व्यवहार में उनके द्वारा घोषित सत्य से मेल नहीं खाते थे। सत्य के प्रति उनकी निष्ठा इतनी गहरी थी कि उन्होंने उसे ही अपना ईश्वर घोषित कर दिया था। वे समस्त जीवन इसी सत्य के साथ प्रयोग करते रहे। गाँधी ने कभी भी ईश्वर को अपना सत्य नहीं माना। उनका सत्य कोई पारलौकिक ईश्वर नहीं, वरन् युद्ध, हिंसा और शोषण से मुक्त मानव समाज का ही एक मनुष्य था। यही उनके ईश्वर का नगर था7 जिसे वह इसी भौतिक संसार में निर्मित करना चाहते थे। अपने समस्त जीवन इसी मानव का निर्माण करना ही उनका उद्देश्य रहा, जो उनका साध्य और उनका सत्य रहा। इस साध्य को प्राप्त करने का एक अकेला साधन अहिंसा था। इस पथ के अनुयायियों को ही उन्होंने सत्याग्रही की उपाघि दी थी।
दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने यह जाना कि एक मनुष्य के रुप में ब्रिटिश शासन के अधीन उनके पास कोई अधिकार नहीं था। गाँधी व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे, जो राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति के किसी भी प्रकार के केंद्रीकरण के कारण सतत् खतरे में बनी रहती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता की खोज के अपने प्रयास में उन्होंने यह पाया कि हिंसा की अवधारणा का पूर्ण अस्वीकार अत्यन्त आवश्यक है।
गाँधी सत्ता लोलुप नहीं थे। अपनी पूरी जिंदगी गाँधी सत्ता और अधिकार के विचार मात्र को ठुकराते रहे। व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए घातक सभी प्रकार की सत्ता उन्हें अस्वीकार्य थी। वे शक्ति के केंद्रीकरण को सत्ता का एक अनिवार्य तत्त्व मानते थे और किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था में या राज्य में किसी भी रूप में शक्ति का केंद्रीकरण उन्हें सदैव अनाकर्षित करता रहा। उन्होंने उसे मूलतः बर्बरों का बल कहा। अतः उनका राजनीतिक दर्शन सदैव मानव स्वभाव तथा प्रकृति दोनों की दो सनातन शक्तियों बल व हिंसा की अस्वीकार्यता के चारों तरफ घूमता रहा।
वर्तमान भारत में गाँधी के बारे में प्रचलित भ्रान्तियों का जन्म, उनके अपने जन्मवर्ष 1869 के बारह साल पूर्व, 1857 में ही हो चुका था। 1757 में, भारत में, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन की स्थापना के 100 साल बाद, 1857 में भारत के दोनों प्रमुख सम्प्रदायों - हिन्दू और मुसलमानों - ने मिलकर एक ऐसा विद्रोह कर दिया था, जिससे पूरा ब्रिटिश समाज 1947 तक आतंकित रहा। उसी आतंक का प्रभाव था कि अपने पूरे औपनिवेशिक शासनकाल में उनकी औपनिवेशिक सरकारों की नीतियों व कानूनों का निर्माण उसी आतंक को केन्द्र में रखकर बनायी जाती रहीं। उसका एकमात्र उद्देश्य मात्र इतना ही रहा कि उनके औपनिवेशिक शासनकाल में फिर कभी हिन्दू और मुस्लिम समाजों के मध्य वह एकता और सद्भाव न उत्पन्न होने पाये जो 1857 में उत्पन्न हो गई थी। 1857 के बाद अपने भारत जैसे उपनिवेश, जिसे ब्रिटिश ताज का जवाहारात भी कहा जाता था, के लिये ब्रिटिश संसद द्वारा बनाये गए समस्त कानूनों का एकमात्र उद्देश्य यही रहा कि किसी भी प्रकार उनके उपनिवेश की विविध संस्कृतियों, सम्प्रदायों, व जातियों के मध्य उसी प्रकार की एकता न उत्पन्न हो जाए, जो 1857 में उत्पन्न हो गयी थी। 1858 की साम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा, 1909 का अधिनियम, 1932 का कम्युनल एवार्ड, व 1935 का भारत सरकार अधिनियम कुछ ऐसे ही प्रमुख कानून थे।
अपनी इस नीति को भली-भाँति जारी रखने के लिए, यह आवश्यक था, कि भारतीय उपनिवेश के निवासियों में भी उनकी नीतियों के समर्थक होते। 1 नवम्बर 1858 को साम्राज्ञी विक्टोरिया ने जो घोषणा की थी, उसमें सजा और पुरस्कार की नीति भी शामिल थी, जिसमें 1 जनवरी 1859 तक आत्मसमर्पण कर देने वाले विद्रोहियों को आम क्षमा प्रदान करने तथा शेष को सजा देने की नीति सम्मिलित थी। इस घोषणा के तत्काल बाद विद्रोह का नेतृत्व करने वाले सामन्तों, भूमिधरों, जमीन्दारों व राजाओं-महाराजाओं ने आत्म समर्पण कर आम माफी एवम् अपनी और शेष विद्रोहियों की भूमि और सम्पत्ति प्राप्त कर लेने के हकदार बन गये। जबकि, जिन आम विद्रोहियों ने आत्मसमर्पण नहीं किया उनको फाँसी और काले पानी की सजा देना प्रारम्भ कर दिया गया। इससे आम विद्रोही जनता में अपने कायर व अवसरवादी सामन्तों, भूमिधरों, जमीन्दारों व राजाओं-महाराजाओं के प्रति जो सामन्ती-निष्ठा 8 उपस्थित थी, वह समाप्त होने लगी। यूरोप में यही ऐतिहासिक सामन्तवाद 1351 में, जब काली मौत नामक प्लेग की महामारी फैली थी, समाप्त होना, प्रारम्भ हुआ था, जो 1789 में, फ्रांस की क्रान्ति के बाद पूरी तरह समाप्त हो गया था। अर्थात इस प्रक्रिया में कुल 438 वर्ष लगे थे। इस प्रकार यदि देखा जाए, तो भारत में अभी भी वही ऐतिहासिक सामन्ती दौर चल रहा है, जो 1858 में समाप्त होना प्रारम्भ हुआ था और जिसे भारत में भी समाप्त होने में कुल लगभग 438 वर्ष लगेंगे। चूंकि 1858 से अबतक कुल 161 वर्ष बीत चुके हैं, अर्थात भारत के इस मध्यकालीन सामन्ती दौर को कम से कम लगभग 277 साल और लगने हैं।
जो भी हो, 1858 के बाद 1947 तक के औपनिवेशिक काल में भारत में अभी भी वही सामन्ती दौर ही चल रहा था, जबकि ब्रिटेन में स्वतंत्रता, समता, पर आधारित लोकतांत्रिक युग पूरी तरह स्थापित हो चुका था। इसी लोकतांत्रिक दौर में गाँधी कानून की शिक्षा प्राप्त करने के लिये 1888 में, केवल उन्नीस वर्ष की आयु में, ब्रिटेन गये थे। लोकतांत्रिक ब्रिटेन के स्वतंत्रता व समता वाले समाज से पूरी तरह प्रभावित गाँधी ने, जो भारतीय समाज में पूरी तरह अनुपस्थित था, उन दोनों पाश्चात्य, यूरोपीय अथवा ब्रिटिश मूल्यों को भी पूरी तरह आत्मसात कर लिया। इस प्रकार गाँधी नामक एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण हुआ, जो पूर्वी और पाश्चात्य दोनों सभ्यताओं के लिये अनोखा था, और जिसको भली-भांति समझने का प्रयास आज आधुनिक विश्व-सभ्यता के दार्शनिक कर रहे हैं।
हालांकि, ब्रिटेन एक सच्चा लोकतंत्र था, लेकिन अपने ब्रिटिश नागरिकों व अपने औपनिवेशिक नागरिकों के प्रति उसका रवैया पूरी तरह पक्षपातपूर्ण था। ब्रिटेन के विद्वानों के अतिरिक्त आम नागरिकों की सोच भी इसी आधार पर पैने रुप में विभाजित थी। दक्षिण अफ्रीका के गोरे गाँधी को कुली बैरिस्टर कहकर बुलाया करते थे। इसी दक्षिण अफ्रीका में गाँधी ने विश्व के, उस समय के, अपराजेय साम्राज्य और दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार के विरुद्ध अपना अंहिसक राजनीतिक आन्दोलन प्रारम्भ किया था, जिसके लिए उन्होंने विश्व इतिहास को अभी तक ज्ञात हिंसक आन्दोलनों के स्थान पर उस अहिंसा का अन्वेषण किया था, जिसे केवल धर्म और पारलौकिक मामलों के लिये प्रयुक्त करने की परम्परा थी। यह गाँधी स्वयं का अपना अन्वेषण था। अंहिंसा के युद्ध (आन्दोलन)का मैदान निर्मित कर गाँधी ने अंग्रेजों को एक ऐसे युद्ध के मैदान में ला दिया था, जिसमें वे बिलकुल प्रशिक्षित नहीं थे। अन्यथा हिंसक युद्धों व आन्दोलनों के लिये वे भली-भाँति इतने प्रशिक्षित थे कि लगभग अपराजेय बन चुके थे। इसे ही अपने विशिष्ट सत्य के साथ जोड कर उन्होंने अपने इस विशेष आन्दोलन का नाम सत्याग्रह रखा था। उनके सत्य और अहिंसा का उत्स पारलौकिक नहीं इहलौकिक था। उनके इस सत्य में अखण्ड मानव कल्याण का उद्देश्य ही सन्निहित था, जो उनका साघ्य था, और इसे इसी जन्म में प्राप्त कर लेने का साधन भी इहलौकिक ही था, जिसका कोई भी सम्बन्ध धर्म, अध्यात्म, पाखण्ड अथवा परलोक से नहीं था। यह बात उन्होंने 1909 में ही अपनी रचना, हिन्द स्वराज में स्पष्ट कर दी थी, कि असलियत में जितने दिमाग है, उतने ही धर्म हैं। निःसन्देह, उनकी सोच की सभ्यता न सुकरात, थामस मूर, वालतेयर और रुसो जैसे पाश्चात्य दार्शनिकों के निकट थी, न किसी भी पूर्वी दार्शनिक के। अपने इसी सत्य और अहिंसा में उन्होंने हिन्दू-मुसलिम एकता की बात भी जोड कर दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार को अपने घुटनों पर ला दिया था। ब्रिटिश साम्राज्य युद्ध व हिंसक आन्दोलनों से लडने में पारंगत थी। लेकिन उसने अहिंसा नामक अस्त्र से लडना अभी तक नहीं सीखा था। युद्ध के इस मैदान का निर्माण गाँधी ने स्वयं किया था। इसके आयुध व नियम भी स्वयं उनके द्वारा बनाये हुए थे। उन्हीं अज्ञात अस्त्रों का प्रयोग गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में किया था। दक्षिण अफ्रीका के उस सर्वथा नवीन प्रकार के आन्दोलन ने अत्यन्त अल्प आयु के गाँधी को अत्यन्त अल्प अवधि में पूरे विश्व में विख्यात कर दिया था।
अपने द्वारा अन्वेषित इन आयुघों- सत्य, अहिंसा और हिन्दू-मुसलिम एकता के साथ वह 1915 में भारत आये। उनका अपना देश एक बिलकुल एक अलग प्रकार का देश था। यह न केवल एक धुर सामन्ती समाज था, बल्कि एक औपनिवेशिक राज्य की, प्रत्येक प्रकार के अवगुणों का भी शिकार था। उस औपनिवेशिक परन्तु लोकतांत्रिक व आधुनिक विज्ञान के वरदानों के प्रति समर्पित ब्रिटिश समाज के लिये भारतीय जाति व्यवस्था में अन्तर्निहित विसमता, विज्ञान विरोधी आम सोच, धार्मिक अन्धविश्वास व पाखण्ड के प्रति अगाध आस्था, साम्प्रदायिक व जातिगत विभिन्नताओं वाले लोगों का सदियों से बिना किसी समस्या के साथ-साथ रहना, और अपनी-अपनी निर्धनता से अप्रभावित होकर जीवनयापन करना, जैसे विषय आश्चर्यचकित कर देने वाले थे। 1915 से 1919 तक गाँधी ने अपने इस औपनिवेशक गुलामी का दंश झेल रहे समाज को देखने और समझने का प्रयास किया। उन्हें जीवन में पहली बार अपने समाज के मेहनतकश लोगों की निर्धनता की पीडा का अहसास हुआ। उनकी इस पीडा का ही परिणाम उन निर्धनों ही जैसे जीवन जीने के विचार तथा चरखा का अन्वेषण था। गाँधी समय-समय पर अपने समाज की अनेक समस्याओं जैसे - अछूत समस्या, ऊँच-नीच की समस्या, बाल विवाह, विधवा-विवाह, आम महिलाओं की दशा, और आधुनिक शिक्षा की निर्धनता, शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखना आदि- के विरुद्ध आवाज उठाते रहे। इन समस्याओं का निराकरण ही उनके रचनात्मक कार्यक्रमों का केन्द्रबिन्दु होते थे। यह सारे कार्यक्रम ही उनके आत्मा की आवाज थी।
गाँधी के व्यक्तित्व का निर्माण क्रमशः एक, उनकी अन्तरात्मा, दूसरा, उनका दिमाग से हुआ है। उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता को अपने दिमाग समझा था, लेकिन अपने समाज को उन्होंने अपनी अन्तरात्मा की आवाज से समझने का प्रयास किया था। पाश्चात्य सभ्यता में रचे-बसे, स्वतंत्रता और समानता व इहलौकिकवाद के मूल्यों तथा उन्हीं पर आधारित लोकतंत्र को तो उन्होंने आत्मसात कर लिया था, लेकिन स्वयं अपने पूर्वी समाज के ऊँच-नीच पर आधारित सामन्ती व भौतिकतावादी मानसिक मूल्यों, औपनिवेशिक कानूनों द्वारा ग्रसित समाज के अन्तर्विरोधों, सत्ता के वास्तविक चरित्र, जाति व्यवस्था के दर्शन, आधुनिक औद्योगिकीकरण के परिणामों आदि को समझने में उनकी अन्तरात्मा की आवाज बहुत कुछ असफल रही।
ढ्ढङ्क
गाँधी ने अपने समाज में अपना पहला राजनीतिक आन्दोलन 1917 में ही करारबद्ध मजदूर प्रणाली के विरुद्ध उठाया था। और वायसराय को युद्ध की अवधि में उसे तत्काल स्थगित कर देने के लिए विवश होना पडा था। बाद में, जनवरी, 1920 को उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। 1917 में ही उन्होंने स्थानीय स्तर पर- चम्पारन में नील के किसानों के लिए, अहमदाबाद में मिल मजदूरों के लिये व खेडा में किसानों के लिए, प्रारम्भ कर दिया था। यह आन्दोलन उनके ब्रिटिश लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरुप, उनके दिमाग की उपज थी, जिसमें उन्हें पूरी सफलता मिली। लेकिन 1919 में उन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर अपना आन्दोलन प्रारम्भ किया, जो अपने उद्देश्य में सफल नहीं रही।
वह, निसंदेह, न्यायमूर्ति श्री रौलट की अघ्यक्षता में बनी सेडिशन कमेटी के रिपोर्ट से विचलित थे, जो चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रकाशन के एक सप्ताह के भीतर प्रकाशित हुई थी। न्यायमूर्ति रौलट की सिफारिशों से गहरे आघातित गाँधी ने रौलट बिलों के प्रतिरोध के लिए 6 अप्रैल 1919 को एक अखिल भारतीय हडताल का आह्वान कर दिया था। एक राजनीतिक विरोध के लिये भारत के समस्त लोगों को शामिल करने वाला गाँधी का ऐसा आह्वान केवल भारत के इतिहास का नहीं अपितु पूरे विश्व में अपने ढंग का पहला आन्दोलन ही था। अभी तक आम भारतीय धारणा यही थी कि राज्य के राजनीतिक जीवन से स्वयं को पर्याप्त दूरी पर ही रखा जाए। ग्रामीण लोगों में आम तौर पर तुलसीदास की यह पंक्तियां उद्धृत की जाती थीं कि कोउ नृप होय हमैं का हानि। (कोई भी राजा बने, इससे कोई फर्क नहीं पडता।) यही मनोविज्ञान भारतीय जनमानस में पैठी हुई थी। निस्संदेह गाँधी की एक सबसे महान उपलब्धि यही थी कि उन्होंने पहली बार भारत के राजनीतिक जीवन में आम जनता की भागीदारी की नींव रख दी थी।
गाँधी के लिए सत्य एक सार्वभौमिक साध्य था, जिसे सभी प्रकार की हिंसा की समाप्ति द्वारा प्राप्त किया जा सकता था। उन्होंने सत्य को अपना ईश्वर घोषित कर रखा था, जिसे अन्य किसी रास्ते से नहीं केवल अहिंसा के द्वारा ही अन्वेषित किया गया था। यह सत्य था न कि ईश्वर जिसकी खोज के लिए उनका पूरा जीवन समर्पित था। सत्य की निरंतर खोज के लिए हिंसा, विशेषकर बर्बरों का बल की संपूर्ण अस्वीकृति आवश्यक थी। चूँकि उपरोक्त दोनों आदर्शों में से किसी के भी साथ समझौता निश्चय ही सत्याग्रह की आत्मा को क्षति पहुँचाता, सत्याग्रहियों को अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होने में किसी भी प्रकार की हिंसा के प्रयोग की अनुमति नहीं थी। उनका सत्याग्रह एक विलक्षण दिमाग की उपज था, जिसे मानव जाति के इतिहास में कदाचित ही अनुभव किया गया था, जिसपर तत्कालीन राजनीतिक दलों व संगठनों के साधारण नश्वर दिमाग वाले लोगों द्वारा न विश्वास किया गया, न समझा गया। इतिहास में, और ब्रिटिश राज के इतिहास में भी, किसी भी राज्य के पास, चाहे वह लोकतांत्रिक हो या और किसी अन्य तरह की, जनता के आंदोलन को कुचलने के लिए हिंसात्मक दमन ही अब तक का एकमात्र ज्ञात उपाय था। ब्रिटिश प्रशासन ने जलियांवाला बाग हत्याकांड में इसी उपाय का प्रयोग किया था। किंकर्तव्यविमूढ सरकारी मशीनरी, जिसे विश्व के सर्वाधिक सभ्य राष्ट्रों में से एक समझा जाता था, को हिंसा के अतिरिक्त और कोई अन्य विकल्प नहीं ज्ञात था, ने दमन का परंपरागत तरीका ही अपनाया, जिसे गाँधी ने शैतानी करार दिया। रातों-रात गाँधी के व्यक्तित्व ने अखिल भारतीय प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली।
इसके तत्काल बाद बिना किसी रक्तपात के स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए असाधारण स्वतंत्रता संग्राम प्रारम्भ हो गया। स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों के बहिष्कार ने उन्हें सुनसान कर दिया। दिन-प्रति-दिन लोगों का पारा चढने लगा था। सरकारी तंत्र को वही रास्ता अपनाने पर बाध्य होना पडा, जो उसे मालूम थाः दमन का रास्ता । गाँधी समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पैठ जमाने में व्यस्त थे, खासकर उन हिस्सों में जिनकी अब तक सामाजिक या राजनीतिक निर्णयों में कोई भूमिका नहीं रही थी। छुआछूत को मिटाने के उनके आह्वान ने उनके समर्थन के आधार को जमीन से जुडे लोगों तक फैला दिया था। स्वदेशी, सत्याग्रह और सद्भाव (हिंदू-मुसलिम एकता) के उनके आह्वान को जनता से मिले प्रत्युत्तर ने केवल समूचे भारत में ही नहीं वरन् ब्रिटेन में भी प्रशासन को हिलाकर रख दिया था।
गाँधी को अपने इस आन्दोलन में कांग्रेस के भीतर के तमाम लोगों - जो वास्तव में केवल राजनीतिक सत्ता के लिये गाँधी के आन्दोलन से जुडे थे, अथवा जो पूरी तरह भौतिकवादी स्वार्थों से संचालित थे, अथवा जो रुढिवादी सोच के पोषक थे, अथवा सामन्तवादी मानस से ग्रस्त थे - से भारी विरोध का सामना करना पडा। लेकिन यह वह लोग थे जिन्हें भारत के आम निर्धनों, किसानों, मजदूरों व महिलाओं से न कुछ लेना-देना था, न उनको उन नेताओं में कुछ भी अपना लगता था। यही कारण है कि गाँधी पूर्व के सभी नेतागण, भारत में गाँधी के आगमन के बाद अत्यन्त अल्प समय में बौने होकर रह गये थे। गाँधी के बिना उनमें से किसी की भी स्वतंत्र हैसियत नहीं बची थी। प्रत्येक ऐसे नेता के लिये गाँधी समर्थक होना अथवा गाँधी विरोधी होने में से एक पक्ष चुन लेना, उनकी मजिबूरी बन चुकी थी।
8 फरवरी को गाँधी जब प्रस्तावित अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए बारडोली में थे, तब उन्हें संयुक्त प्रांत (अब उ.प्र. में) के गोरखपुर जिले के एक गाँव चौरी-चौरा में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में पता चला। हिंसा की इस घटना में सत्याग्रहियों ने एक पुलिस थाने में बाईस सिपाहियों को जिंदा जला दिया था। इस घटना से स्तब्ध और आहत गाँधी ने तत्काल आंदोलन को रोक देने का अहम फैसला कर लिया। गाँधी के आह्वान पर, कांग्रेस के बहुसंख्यक नेताओं ने अपनी अच्छी-खासी आमदनी वाले काम छोड दिये थे। बदले में राजनीतिक सत्ता मिलने के बजाय उन्होनें बिना किसी आशा के स्वंय को जेल में पाया था। तमाम नेताओं ने अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए पत्र भेजे। उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में हो रही अपनी कडी आलोचना का व्यक्तिगत अपमान झेलना पडा। उनके तमाम समर्थकों ने, उनकी पीठ के पीछे उन्हें तानाशाह और डिक्टेटर कहना प्रारम्भ कर दिया था। अब वे भारत के निर्विवाद नेता नहीं रहे थे। उनका करिश्माई आभामंडल चौरी-चौरा की हिंसा से उतना धूमिल नहीं हुआ था, जितना कि बारडोली के फैसले के कारण उन नेताओं में व्याप्त हताशा से। प्रशासन अब गाँधी के चमत्कार से भयभीत नहीं था। फिर भी उन्हें गिरफ्तार करने के लिए उन्हें एक माह से कम का समय नहीं लगा। गाँधी को 10 मार्च, 1922 को गिरफ्तार किया गया तथा छह वर्ष की साधारण कैद की सजा दी गयी। उन पर यंग इंडिया में लिखे गये, उनके तीन लेखों - टैंपरिंग विद् लायल्टी (निष्ठा के साथ छेडछाड), दि पजल एण्ड इट्स सल्यूशन (पहेली और उसका हल) और शेकिंग द् मेंस (शेर के अयाल को हिलाना)-के लिए अपराधी घोषित कर दिया गया था। गाँधी ने आरोप को माना और बाद में दिये गये एक वक्तव्य में बंबई की घटनाओं, मद्रास की घटनाओं और चौरी-चौरा की घटनाओं के सिलसिले में अपने पर मढे गये सारे दोषों को स्वीकार कर लिया। दिसम्बर 1922 में गया कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर प्रत्येक प्रमुख कांग्रेसी नेता उपस्थित था, सिवाय गाँधी के, जो अकेले जेल में थे। यह न तो भाग्य की विडम्बना थी और न घटनाओं का विचित्र संयोग कि जब असहयोग आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था, तब गाँधी को छोडकर सारे नेता सीकचों के पीछे थे और जब आंदोलन स्थगित हुआ तो गाँधी को छोडकर सभी नेता जेल के बाहर थे। 1 जनवरी, 1923 को स्वराज पार्टी का गठन कर लिया गया। गाँधी के कट्टर समर्थक भी आश्चर्यजनक रूप से तटस्थ रहे और स्वराजवादियों (अर्थात बदलाव चाहने वालों का) का कौंसिल परिषद के चुनावों में भाग लेने वाला प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया।
गाँधी यह देखने में विफल रहे थे कि समस्त मानव इतिहास सत्ता के लिए संघर्ष का इतिहास है। मनुष्य समाज की रचना के समय से ही परिवार सहित सभी संस्थाओं में, जहाँ एक से अधिक लोग होते है, नियंत्रण का अधिकार पाने के लिए, एक अंतहीन सत्ता संघर्ष करता ही रहता है, पर उन्होंने तो मनुष्य समाज के बुनियादी तत्व सत्ता और सत्ता के लिए संघर्ष की अवधारणा को ही ठुकरा दिया था। और यहीं मानव समाज पशु समाज से बुनियादी रूप से भिन्न होता है। मानव समाज का बुनिवादी तत्त्व-सत्ता संघर्ष पशु समाज में अनुपस्थित होता है, जहाँ हिंसा को जीवन निर्वाह के लिए, न कि शक्ति पैदा करने या सत्ता की जोड-तोड के लिए अपनाया जाता है। सत्ता या शक्ति बुनियादी रूप में मानवीय, अविनाशी और अविभाज्य है। अपने मूल स्वभाव से ही सत्ता वशीभूत करने वाली होती है और वह अपने पास तब तक शक्ति का अधिक से अधिक केंद्रीकरण करती रहती है, जब तक कि वह निरंकुश नहीं हो जाती। यह कोई अजूबा या पहेली नहीं है कि सत्ता के आर्थिक और राजनीतिक ताकत के त्याग ने गाँधी के इर्दगिर्द एक आध्यात्मिक आभा मंडल की सृष्टि कर दी थी, जिसे अनादिकाल से ही भारतीय समाज के एक विशाल वर्ग द्वारा एक सर्वोच्च प्रकार की सत्ता के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक सत्ता को ठुकराने के अपने प्रयास में, गाँधी ने अनजाने ही अपने चारों ओर एक आध्यात्मिक सत्ता को एकत्र कर लिया था। लेकिन गाँधी के आगमन के पूर्व तक भारतीय राष्ट्रवादियों का एक मात्र उद्देश्य राजनीतिक सत्ता में उत्तरोत्तर भागीदारी तक ही सीमित था। गाँधी के संपूर्ण राजनीतिक जीवन में गाँधी और अन्य लोगों के बीच लक्ष्यों का यह अंतर्विरोध बना ही रहा।
तबतक 1917 में दुनिया की पहली माक्र्सवादी क्रान्ति रुस में हो चुकी थी, और सोवियत संघ का निर्माण हो चुका था। वहाँ जिस प्रकार क्रान्ति के दौरान भूमि सहित समस्त संपत्ति का हिंसक बँटवारा किया गया, जार के परिवार सहित समस्त सामन्तों, जमींदारों व जागीरदारों की हत्या की गई, और एक विसमता मूलक समाज में जिस प्रकार समता की स्थापना की गई, उसने भारत व ब्रिटेन सहित पूरी दुनिया के पूँजीपतियों, उद्योगपतियों, सामन्तों, राजशाहियों, जमींदारों व जागीरदारों को भावी आतंक से भर दिया। हालांकि, पाश्चात्य यूरोप में 1789 की फ्राँसीसी क्रांति ने वहाँ से सामन्तों, जमींदारों, जागीरदारों, धार्मिक व राजनैतिक राजशाहियों, के पूरे वर्ग को समाप्त कर दिया था तथा उनका स्थान औद्योगिक क्रान्ति के बाद जन्में आधुनिक उद्योगपतियों व पूँजीपतियों ने ले लिया था, लेकिन भारतीय समाज अभी भी सामन्तों, राजशाहियों, जमींदारों व जागीरदारों के चंगुल में फँसा हुआ था। यूरोप जैसा पूँजीपति व उद्योगपति वर्ग भारत में अभी निर्माण की प्रक्रिया में ही था। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश औपनिवेशिक राज्य ने इन सबको यद्यपि राजनीतिक सत्ता से युक्त नहीं रखा था, लेकिन अभी भी आम जनता न केवल उनके प्रति सामन्ती-निष्ठा से बँधी हुई थी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य और उनकी प्रजा बनी हुई थी।
1919 से 1922 तक के गाँधी के अहिंसात्मक आन्दोलन ने जब ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति उपस्थित भारतीय निष्ठा को पूरी तरह समाप्त कर दिया था। लेकिन आम लोगों में धार्मिक अन्धविश्वासों के प्रति निष्ठा अभी भी बची हुई थी। इस आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश प्रशासन ने किसी भी प्रकार उपस्थित सामुदायिक सद्भाव को बिगाडने का पूरा प्रयास किया था, लेकिन इसमें वह पूरी तरह असफल हुआ था। गाँधी के आमरण अनशन व उनके सामयिक निर्णयों के कारण हिन्दू-मुसलिम एकता का उनका औजार पूरी तरह कुन्द नहीं हो पाया था। लेकिन, चौरी-चौरा में इस आन्दोलन को हिंसक बनाने की नीति सफल रही। अपने नव-अन्वेषित सिद्धान्तों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण जब गाँधी ने अपना आन्दोलन वापस ले लिया, ब्रिटिश साम्राज्य ने राहत की साँस ली, और गाँधी के आन्दोलनों से अत्यन्त आतंकित ब्रिटिश प्रशासन ने भारतीय उपनिवेश में अपने समर्थकों की तलाश प्रारम्भ कर दी। ब्रिटिश प्रशासन को ऐसे लोगों की तलाश थी जो उन्हें समय रहते, गाँधी के विलक्षण दिमाग में क्या चल रहा था, उससे अवगत करा सकें। वे गाँधी के विलक्षण दिमाग को, जिसमें नित नये-नये विलक्षण विचार उत्पन्न होते रहते थे, उनका चालाक दिमाग कहते थे। इस अभूतपूर्व षडयंत्र में उन्हें भरपूर सफलता मिली, क्योंकि ऐसे भारतीय षडयंत्रकारियों में तथाकथित गाँधी-समर्थक व गाँधी-विरोधी दोनों सम्मिलित थे।
1919 से 1922 तक चले, गाँधी के जिस आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश प्रशासन इतना आतंकित था कि उसने गाँधी को बन्दी बनाने के लिये पूरे एक माह का समय लिया था। आन्दोलन के दौरान उसने लगभग सभी महत्त्वपूर्ण नेताओं को बन्दी बना लिया था, लेकिन गाँधी को बन्दी बनाने का उसका साहस नहीं हुआ था। वहीं 1930 के नमक आन्दोलन के दौरान उसने गाँधी को आन्दोलन प्रारम्भ होते ही बन्दी बना लिया था। 1930 के नमक आन्दोलन के बाद 1942 के भारत-छोडो आन्दोलन के दौरान आन्दोलन प्रारम्भ होने के छह घण्टे के अन्दर ही उन्हें बन्दी बना लिया गया था। वास्तव में, तब तक, उन षडयंत्रों के कारण गाँधी के करिश्माई राजनीतिक आन्दोलन असफल होने लगे थे, और उनसे ब्रिटिश प्रशासन का भय पूरी तरह समाप्त हो चुका था।
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इसके लिये, 1922 में उनकी गिरफ्तारी के बाद, 1930 में उनका नमक आन्दोलन प्रारम्भ होने से पूर्व ब्रिटिश प्रशासन ने दो काम किए थे। पहला, 1922 में जब गाँधी ने अपना आन्दोलन वापस ले लिया, पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगे कराने में ब्रिटिश प्रशासन को उन षडयंत्रकारियों का भी सहयोग मिलने लगा था, और पूरे भारत में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ-सी आ गई। इस प्रकार गाँधी का महत्त्वपूर्ण औजार- हिन्दू-मुसलिम एकता, तार-तार हो गई। दूसरा, 1930 में ब्रिटिश प्रशासन ने कांग्रेस के अन्दर व बाहर, दोनों तरफ ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थकों की तलाश प्रारम्भ कर दी। भारत के तत्कालीन वायसराय ने 2 जून, 1930 को तत्कालीन भारत सचिव को सूचित किया था-
मुझे विश्वास है कि हम मात्र दमनात्मक कार्यवाही से वास्तविक समस्या को हल नहीं कर सकेंगे और इसलिए यह आवश्यक है कि रचनात्मक कार्यवाही की संभावनाओं की जाँच कर ली जाए।
दमनात्मक उपायों के साथ-साथ इरविन की प्रस्तावित रचनात्मक कार्यवाही का लक्ष्य कांग्रेस के भीतर-बाहर तथा व्यापारिक हलकों में सहयोगियों को तलाशना था, जो गाँधी को बिना शर्त आंदोलन त्यागने के लिए राजी कर सके।
अपने तार में वायसराय ने आगे लिखा, पिछले कुछ दिनों के दौरान मैने कांग्रेस और बंबई के व्यापारिक हलकों में सम्पर्क रखने वाले कई आनेवालों से भेंट की है; जो स्थिति के प्रति गहरा चिंताजनक रूख रखते हैं। सारे इस बात के लिए बहुत आतुर हैं कि आंदोलन को समाप्त करने के लिए कुछ किया जाना चाहिए।9
1919 से 1922 तक चलने वाले गाँधी के आन्दोलन से पहले इस समाज में 1857 के विद्रोह के बाद से ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध छिटपुट हिंसक कार्रवाईयाँ चल रही थीं, जिसका चरित्र पूरी तरह धार्मिक था,ं और जिसमें अधिकांशतः निम्नमध्यम वर्गीय व अल्प शिक्षित उन युवाओं की भागीदारी होती थी, जो अत्यन्त साहसी और आत्म-बलिदानी होते थे। उन युवाओं को यह विश्वास था कि चन्द अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर वे उन्हें इतना आतंकित कर देंगे कि अंग्रेज भारत छोडकर ब्रिटेन पलायन कर जाएँगे। इसीलिए अपने देश के लिये जान दे देनें में वे अपना स्वर्ग देखते थे। उन्हें यह अन्दाज नहीं था कि ब्रिटिश साम्राज्य हिंसक आन्दोलनों से भयभीत होने वाला समाज नहीं था। इस दौर में उन्होंने वायसराय सहित अनेक ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी थी। इस विरोध पर यूरोप में उस समय चलने वाले अराजकतावादी आन्दोलनों, जैसे कारबोनेरी आदि का पूरा प्रभाव था। लेकिन गाँधी का अहिंसक आन्दोलन प्रारम्भ हो जाने के बाद इन आत्म बलिदानी, साहसी युवाओं ने गाँधी का रास्ता पकड लिया था। 1922 में आन्दोलन के वापस ले लेने से, यह युवा वर्ग भी अत्यन्त निराश हो गया था। उन हताश युवकों ने भी गाँधी का मार्ग त्याग कर पुनः हिंसक मार्ग अपना लिया। उन साहसी और आत्मबलिदानी युवाओं को सोवियत संध की 1917 की साम्यवादी क्रान्ति आकर्षित करने लगी थी। यह ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता तथा भारत के सामन्ती वर्गों-राजशाहियों, जमीन्दारों, जागीरदारों व नवीनतम जन्म लेने वाले उद्योगपतियों व पूँजीपतियों के लिये खतरे की घण्टी थी।
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन सोवियत साम्यवादी क्रान्ति से अत्यन्त आतंकित हो चुका था। 1917 में ही उसके भारत सचिव ने भारतीय जनता के प्रति उत्तरदायी सरकार बनाने की दिशा में सुधार करने का आश्वासन दे दिया था, जिसका परिणाम 1919 का भारत अधिनियम था। लेकिन इसके साथ ही इस समाज को हिंसक आन्दोलनों की दिशा में बढने से रोकने के लिए रौलट अधिनियम भी 1919 मे ही लाया गया था, जिसके विरोध में गाँधी ने 1919 का अहिंसक आन्दोलन प्रारम्भ किया था।
सोवियत संध की क्रान्ति के दर्शन के पीछे कार्ल माक्र्स के साम्यवादी विचारों का प्रभाव था। माक्र्स का भी वही उद्देश्य था, जो गाँधी का था। एक ऐसी मानव सभ्यता का निर्माण, जिसमें मानव द्वारा मानव का शोषण सम्भव न हो। दोनों में अंतर यदि कुछ था, तो वह उसके तरीके में था। गाँधी का तरीका पूरी कडाई से अहिंसा के पालन का था, जबकि माक्र्स व उसके अनुयायीयों को किसी भी तरीके से परहेज नहीं था। उसी माक्र्स ने धर्म को जनता की अफीम भी बताया था। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासकों ने कार्ल माक्र्स के उक्त विचार को आधार मानकर गाँधी और उनके विचारों के धुर विरोधियों को उनकी धार्मिक आस्था का लाभ उठाकर उन्हें धर्म के नामपर विभाजित करने हेतु भी षडयंत्र प्रारम्भ कर दिया। भावी भारत में लोकतंत्र व माक्र्सवादी साम्यवादी क्रान्ति की स्थापना के भय से ग्रसित राजशाहियों व सामन्तों को ब्रिटिश साम्राज्य ने न केवल भरपूर मदद की, बल्कि उन्हें गाँधी के भावी अहिंसक आन्दोलनों को असफल करने के लिए गाँधी के पीठ पीछे चलने वाले ब्रिटिश षडयंत्रों में भी औजार की तरह उपयोग किया।
इस प्रकार के ब्रिटिश षडयंत्र में मूल रुप से तत्कालीन नव-पूँजीपति, नव-उद्योगपति, सामन्ती मानसिकता से ग्रस्त लोकतंत्र विरोधी नेतागण भी सम्मिलित थे। आश्चर्य नहीं कि 1919 से 1922 तक चलने वाले गाँधी के अहिंसक आन्दोलनों के विपरीत 1930 के नमक आन्दोलन व 1942 के भारत-छडो आन्दोलनों को वह सफलता नहीं मिली। 1930 के आन्दोलन की असफलता व अपने तथाकथित समर्थकों के दोहरे चरित्र को देखते हुये ही गाँधी 1934 में ही अहमदाबाद के साबरमती आश्रम को त्यागकर वर्धा के निकट मगनबाडी नामक गाँव में बस गए थे। निःसन्देह, 1942 के बाद गाँधी के राजनीतिक चमत्कार करने की क्षमता समाप्त हो चुकी थी और वह मात्र एक आघ्यात्मिक नेता, महात्मा, होकर रह गये थे।
अन्ततोगत्वा, राजनीतिक सत्ता के लन्दन से दिल्ली स्थानान्तरित हो जाने के पश्चात उन तत्त्वों के द्वारा जो इस बात से भयभीत थे कि कहीं उस समय गठित संविधान सभा के द्वारा ऐसे प्रथम लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना न हो जाए जो गाँधी की दृष्टि व दर्शन के अनुरुप समता, स्वतंत्रता तथा सामुदायिक सद्भावना के मूल्यों पर आधारित हो एक षडयंत्र के तहत ही गाँधी को एक कट्टर हिन्दू के द्वारा भौतिक रुप से भी समाप्त करा दिया गया।


संदर्भ -
1. रोम्या रोलां, महात्मा गाँधी (कैथरिन डी. ग्राथ द्वारा हिन्दी में अनुदित; तथा एन. एन. चटर्जी द्वारा इन्ट्रोडक्शन व टिप्पणी सहित), 1924, शिवलाल अग्रवाल एण्ड कं., आगरा।
2. उपरोक्त, पृ. 165.
3. प्राचीनकाल से ही भौतिकतावाद अथवा ‘अर्थ’ को हिन्दूंसमाज के चार आर्यसत्यों - धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष - में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है।
4. गाँधी, एम. के., एक आत्मकथा अथवा सत्य के साथ मेरे प्रयोग की कहानी, नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, पृ. 29.
5. उपरोक्त, पृ. 29.
6. हालांकि, यह बात जो 1909 में लिखी गई, वह अपने हिन्द स्वराज में भी कह चुके थे।
7. 3-4 सदी में सुप्रसिद्ध ईसाई सन्त आगस्तीन द्वारा लिखित सिटी आफॅ गॉड। सन्त आगस्तीन, जिसे परलोक में प्राप्त करना चाहते थे, उसका निर्माण गाँधी इसी मृत्युलोक में करना चाहते थे।
8. ‘सामन्ती-निष्ठा’, के लिये देखें, श्रीवास्तव, प्रमोद कुमार, नेशनलिज्म इमैजिन्डः हिडेन इम्पैक्ट्स ऑफ 1857, साउथ एशिया रिसर्च, खण्ड- 38(3): नवम्बर 2018, पृ.-18.
9. इण्डिया आफिस रिकार्डस् एण्ड लाइब्रेरी, लन्दनः वायसराय से, 2 जून, 1930, संख्या 467-एस., एल/पी ओ/6/52/(2), उपरोक्त, पृ.30, गाँधी के पीठ पीछे, 1922 से 1942 तक चलने वाले इस प्रकार के षडयत्र को जानने के लिए पढे लेखक की पुस्तक, महात्मा बिट्रेड, नेशनल पब्लिशिंग हाउस,2005, 2007, नई दिल्ली।
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सम्पर्क : पी 204, शारदा अपार्टमेन्ट,
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