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गाँधी का सुनना

उदयन वाजपेयी
मौन सबसे सशक्त भाषण है. धीरे-धीरे दुनिया आपको सुनेगी।
- महात्मा गाँधी
1.
आज आफ जीवन का बेहद महत्त्वपूर्ण दिन है। आप अपने औपचारिक अध्ययन का एक चरण पूरा कर व्यापक संसार में प्रवेश करने की देहरी पर खडे हैं। मैं आप सबों का इस व्यापक संसार में स्वागत करता हूँ और आपको शुभकामना देता हूँ।
विश्वविद्यालय का संसार अपेक्षाकृत सुरक्षित संसार होता है, पाठ्य-पुस्तकें और विश्वविद्यालय का अनुशासन इसे किसी हद तक परिसीमित करते हैं। शिक्षक भी इसी परिसीमन को पुष्ट करते हैं। पर ऐसे शिक्षक भी सौभाग्य से होते ही हैं जो विश्वविद्यालय के परिसीमित क्षेत्र को उसके बाहरी अपेक्षाकृत खुले हुए संसार से जोडने का अनोखा कार्य भी करते हैं।
विश्वविद्यालय के परिसीमित संसार से बाहर आते ही आपका सामना व्यापक संसार से होगा। उस व्यापक संसार का कोई निश्चित रूप नहीं है। उसे न ऊँच-नीच की दीवारों में बाँधा जा सकता है, न किसी तरह की पुस्तकों में, न किन्हीं बँधे-बँधाए अनुशासन में और न किन्हीं शिक्षकों के साये में। आप उस अरूप व्यापक संसार से किस तरह संवाद करेंगे, किस तरह उसका सामना करेंगे और उसे अपने और औरों के लिए जीने योग्य बनाएँगे, यह आपकी उस योग्यता पर तो निर्भर होगा ही, जो आपने इस विश्वविद्यालय में रहते हुए हासिल की है, इससे कहीं अधिक बडी भूमिका आपकी उस सहज बुद्धि की होगी जो आपको प्रकृति से मिला उपहार है। दरअस्ल आप स्वयं खुद को मिला प्रकृति का उपहार ही हैं। मुझे नहीं लगता कि जीवन को इस उपहार के लिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञ हुए बिना सहज रूप से जिया जा सकता है। प्रकृति के आपको दिये इस उपहार का स्वरूप ही ऐसा है कि उसे प्रकृति से नैरन्तर्य में ही सहजता से सम्हाला जा सकता है। मेरे एक फ्राँसीसी जैववैज्ञानिक मित्र पियेर सुनीगो हैं। वे फ्राँस के एक शहर नॉन्त में कुछ हफ्तों मेरे साथ थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि उन्नीसवीं शताब्दी में जीव-विज्ञान में मनुष्य के शरीर को समझने के लिए उसकी कल्पना रोबोट की तरह की गयी थी। रोबोट का वह मॉडल अब झूठा पड गया है, इसलिए जैव-वैज्ञानिकों का यह मत है (जिसमें खुद पियेर सुनीगो प्रमुख हैं) कि अब मनुष्य के शरीर को किसी और मॉडल में देखने की जिरूरत हैं। जैव-वैज्ञानिकों ने इसका हल निकाल लिया है। अब कुछ जैव-वैज्ञानिक मनुष्य के शरीर को वन की तरह देखते हैं क्योंकि शरीर का सीमान्त निर्धारित करना सम्भव नहीं है। शरीर को
वन की तरह देखने का यह ढंग बहुत अर्थपूर्ण हैं। जिस तरह वन का अपने चारों ओर की भूमि से नैरन्तर्य होता है, उसी तरह मनुष्य का भी प्रकृति के साथ अपने होने मात्र से जुडाव हैं। इस जुडाव को महसूस करके ही हम प्रकृति से मिले अपने जीवन के उपहार को *यादा गहरायी से जी सकते हैं। यह शिक्षा हमें जितनी विश्वविद्यालय के परिसर में मिल पाती है, उससे कहीं अधिक यह आपको हमारे देश के लोक जीवन में, वहाँ की गीतों, नृत्यों, कथाओं आदि में मिल सकती है।
बाहर का व्यापक संसार अपने आप में उतना सुन्दर या असुन्दर नहीं है, जितना आप उसे बना सकते हैं। कम-से-कम खुद अपने लिए बना सकते हैं।
2.
सालों पहले अमेरिका के एक ऐसे ही दीक्षान्त समारोह में बोलते हुए महान रूसी कवि जोसेफ ब्राड्स्की ने कहा था कि विश्वविद्यालय के परिसर के बाहर सहारा मरूस्थल जैसा बडा ऊब का, बोरडम का साम्राज्य फैला हुआ है जिसका विश्वविद्यालय के बाहर आते ही सामना करना पडता है। मैं सालों पहले उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ था। पर धीरे-धीरे मुझे यह समझ में आने लगा कि यह बात पश्चिमी सभ्यता पर निश्चय ही लागू होती थी, पर भारत में यह अब तक उतनी लागू नहीं हो सकती। पश्चिमी सभ्यता ने अपने पारम्परिक प्रतीक चिह्नों को इतना अधिक मिटा दिया है और साथ ही अपने जीवन को इतना अधिक व्यवस्थित कर लिया है कि वहाँ के रोजिमर्रा जीवन में बूझने को बहुत कम बचा है। इसके विपरीत भारतीय समाज आज भी ऐसे असंख्य संकेत चिह्नों और प्रतीकों से अटा पडा है, जिसे आधुनिक मनीषा ने अब तक नहीं समझा है। हमारे चारों ओर आज भी ऐसे सैकडों तीज-त्यौहार, अनुष्ठान और प्रतीक बिखरे पडे हैं जिन्हें नये आलोक में बूझा जाना बाकी है। दूसरे शब्दों में यह एक ऐसा संसार है जो अपने सुने और समझे जाने का इन्तजिार कर रहा है, वह इन्तजिार कर रहा है कि आप विश्वविद्यालय की चौहद्दी से बाहर आकर उसे सुने, देखें और समझने का प्रयास करें।
विश्वविद्यालयों के बाहर का भारतीय समाज आज भी ऐसे असंख्य संकेत चिह्नों से भरा पडा है, जिन्हें आधुनिक मनीषा ने अब तक नहीं समझा है। दूसरे शब्दों में यह संसार अपने सुने और समझे जाने का इन्तजार कर रहा है। वह इन्तजार कर रहा है कि आप विश्वविद्यालय की चौहद्दी से बाहर आकर उसे सुने, देखें और समझने का प्रयास करें।
3.
हमारे शिक्षितों ने इस भारतीय संसार या सभ्यता को अपनी-अपनी तरह से अनुकूलित करने का, अपने-अपने हितों में ढालने का प्रयास जिरूर किया है, पर उसकी आवाजि सुनने की कोशिश बहुत कम की है। इसकी आवाजि अधिकांशतः अनसुनी ही रह गयी है। धीरे-धीरे आधुनिक मनीषा को यह महसूस होना शुरू हो गया कि इस संसार बहुविध आवाजिों को सुनने की जिरूरत ही नहीं है। मानों इतनी प्राचीन सक्रिय सभ्यता बिना किसी गहन विवेक के चल रही हो। मानो यूरोप से आया ज्ञान ही अन्तिम ज्ञान हो, यह बात अलग है कि स्वयं यूरोप ने अपने ज्ञान को एक स्थिर आधार देने की मंशा से ही यूनानी ज्ञान परम्परा का अन्वेषण और अनुकूलन किया था।
आखिर हमें अपने चारों तरफ फैले इस संसार को सुनना क्यों महत्त्वपूर्ण है? इसे बिना सुने भी बहुतों का काम तो चल ही रहा है। आगे भी चलता रहेगा। पर क्या यह बात सच नहीं कि अधिकांश भारतीय इस आधुनिक व्यवस्था में अपने को असहज महसूस करते हैं? क्या यही कारण नहीं कि हममें अपने अन्वेषणों आदि के प्रति पर्याप्त आत्मविश्वास नहीं है? शायद इसीलिए अपनी सभ्यता की आवाजि को सुनना, अपने चारों ओर फैले संसार को सुनना आवश्यक है। जितना उस संसार के लिए उतना ही खुद हमारे लिए भी।
4.
हम जब भी किसी को ध्यान से सुनते हैं, हम अनायास ही उसी की तरह महसूस भी करने लगते हैं। मसलन जब हम किसी कारीगर को ध्यान से सुनते हैं, न सिर्फ उसे बल्कि उसके काम को ध्यान से सुनते हैं, उसके सुख उसकी पीडा को हम भी थोडी देर के लिए ही सही उसी कारीगर की तरह महसूस करने लगते हैं। हम थोडी देर के लिए ही सही उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और इस तरह अपना विस्तार करते हैं। इसी रास्ते हमें यह भी अनुभव होता है कि हममें कितने अधिक विस्तार की, व्यापक हो जाने की वह सम्भावना थी जो सुनने के अभाव में उद्घाटित ही नहीं हो पाती। अब यह शरीर क्रिया विज्ञान के शोधों से पता चल गया है कि जब भी हम किसी के प्रति संवेदनशील होते हैं, हमारे मस्तिष्क की ठीक वही तन्त्रिकाएँ (न्यूरॉन) सक्रिय हो जाती हैं जो उस समय उस व्यक्ति के सक्रिय हैं, जिसके प्रति हम संवेदनशील हुए हैं। इन तन्त्रिकाओं को दर्पण तन्त्रिका (मिरर न्यूरॉन) कहा जाता है। संयोग से इनकी खोज वायालूर रामचन्द्रन नामक एक भारतीय मूल के अमरीकी जैव वैज्ञानिक ने की है।
यह भी संयोग नहीं कि जब आप कोई उपन्यास पढते हैं (जो दरअसल आपका अपने मन में उसे सुनना ही है) आप उसके चरित्रों के सुख-दुःख, हास्य और विडम्बना को अपने सुख-दुःख, हास्य और विडम्बना की तरह ही अनुभव करने लगते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो यह सम्भव ही नहीं था कि राम के सीता से वियोग पर आप आँसू बहाते, एना कैरेनीना के प्रेम की विडम्बना पर विचलित होते।
सुनना या पढना अन्य व्यक्ति में अपने को और अपने में अन्य व्यक्ति को अनुभव करने की अनोखी कला है।
5.
यहाँ मैं आपको अपने संसार, सभ्यता और प्रकृति को सुनने की सिर्फ एक मिसाल दूँगा। वह इतनी उज्ज्वल मिसाल है कि मुझे उम्मीद है कि उसके आलोक में आपको सुनने का महात्म अनुभव हो सकेगा।
मैं यहाँ मोहनदास करमचन्द गाँधी का जिक्र कर रहा हूँ। गाँधी ने सैकडों पन्नों में लेख, किताबें, चिट्ठियाँ आदि लिखी हैं। उससे कहीं अधिक बोला भी है जो अब अभिलिखित होकर सौ से अधिक खण्डों में प्रकाशित हो चुका है। यह आम जानकारी है। कई लोग उन्हें मार्गदर्शक मानते हैं। कई खलनायक। कई लोग उन्हें उपदेशक मानते हैं। कई देश के विभाजन का दोषी। हम इन दोनों ही तरह के लोगों को अभी छोड देते हैं* पर इतनी बडी संख्या में इन दोनों तरह के लोगों के होने से यह बात तो सहज सिद्ध हो जाती है कि गाँधी ने ऐसा अवश्य कुछ किया था जिसके कारण उनकी प्रशंसा या घनघोर निन्दा करना जिरूरी जान पडता है। साधारण चिन्तकों-नेताओं के साथ ऐसा नहीं होता। वे अपना तमाम जीवन अपने साधारण विचारों के प्रति लोगों के समर्थन को जुटाने में ही व्यय कर देते हैं। कई साल पहले पेरिस मुझे वहाँ रहती विश्वविख्यात लेखक एलीन सिक्सू से मिलने का संयोग हुआ। उसके बाद से ही हमारी ऐसी मैत्री हुई कि मैं जब भी वहाँ गया, उनके साथ लम्बी बातचीत की। इन्हीं बातचीतों में एक बार उन्होंने मुझे बताया कि वे बांग्लादेश के बनने में श्रीमती इन्दिरा गाँधी की साहसी भूमिका से प्रभावित होकर उन पर नाटक लिखने की मंशा लिए भारत आयी थीं। उन्होंने यहाँ आकर कई लोगों से श्रीमती गाँधी के विषय में बात की। सिक्सू बोलीं, उनके बारे में हर व्यक्ति एक-सी बात ही करता था। इससे मुझे यह पता लग गया कि इन्दिरा गाँधी वास्तविक नायक नहीं थीं और इसलिए हमने उन पर नाटक लिखने का विचार त्याग दिया। यह बात गाँधीजी के बारे में न स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान और न कभी और कही जा सकती है।
6.
यह जानना बेहद आवश्यक है कि गाँधी के उनके तमाम आन्दोलनों और चिन्तन की दिशा किस ओर थी? क्या वे भारत को सिर्फ स्वतन्त्र कराने के उद्देश्य से वह सब कर रहे थे? यह सच है कि गाँधी भारत को अंग्रेजिी राज से स्वतन्त्र करने की आकांक्षा से ही सक्रिय थे, पर उनका इससे कहीं अधिक व्यापक प्रयोजन थाः वे भारत को उसके अपने स्वरूप में लाने के प्रयास में जिये और उसी प्रयास में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
वे अपने सहज ज्ञान से यह समझ गए कि भारत अब वह नहीं रहा है जो अंग्रेजी शासन के दौरान हो गया है। वह इसके पहले वह तक कुछ और ही था। हमें उसकी नये सिरे से पडताल और कल्पना करना चाहिए और उसी रास्ते पर चलते हुए नये भारत की निर्मिति के व्यापक उपक्रम में जुटना चाहिए। आधुनिक भारत की यह निर्मिति पश्चिम की अन्धी नकल से मुमकिन नहीं है, इतना उन्हें निश्चित तौर पर एहसास था।
यह देश कैसा रहा था?
क्या वह बहुत से धर्मों का समागम भर था। या हिन्दुओं का साम्राज्य? क्या वह केवल आध्यात्मिक भूमि था जैसा कि विवेकानन्द, सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विचारक कहा करते थे? या एक पिछडा हुआ इलाका भर था जैसा कि 1823 में ब्रिटेन की संसद में भारत के ईसाईकरण की बहस के दौरान विक्टोरियाई इंग्लैण्ड के पिता कहे जाने वाले ब्रिटिश सांसद विलियम विल्बरफोर्थ ने कहा था?
या वह कुछ और था?
गाँधी उन पहले चिन्तकों में थे जिन्हें यह ज्ञान था भारत टुकडा संस्कृति नहीं रही है। वह दीर्घकाल से एक सभ्यता थी और है। और जैसा कि सभी सभ्यताएँ होती हैं, भारत भी एक सम्पूर्ण संस्कृति रही हैं जिसमें न सिर्फ आध्यात्मिक उन्नति हुई है, दर्शन की बारीकियाँ खोजी गयी हैं, उसकी भौतिक संस्कृति भी, उसका लोक कौशल और शिक्षा व्यवस्था भी अत्यन्त उन्नत रही हैं। इतना ही नहीं संसार के यूरोप-केन्द्रित होने के पहले वैश्विक संस्कृति में भारतीय सभ्यता का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। यह संयोग नहीं है कि सन् 1735 तक यह देश समूची दुनिया में एक सशक्त औद्योगिक देश की तरह जाना जाता था।
इसका यह अर्थ नहीं कि उसमें दोष नहीं थे पर वे दोष उसके गुणों से *यादा नहीं थे और उन दोषों को भी केवल तब दूर किया जा सकेगा जब उन्हें भारतीय सभ्यता की अपनी अद्वितीयता के बीच रखकर परखा जाएगा। वर्ना हम कुछ दोषों को इस तरह दूर करेंगे कि तुरन्त ही नये दोष उत्पन्न हो जायेंगे।

7.
यह देश कृषि प्रधान उतना नहीं रहा जितना कारीगर प्रधान, शिल्प प्रधान या कला प्रधान देश था। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि गाँधी ने इस तथ्य को समझा था और जाहिर है उनकी यह समझ उनके इस सभ्यता और उसके सदस्यों को सुनने के फलस्वरूप ही आयी होगी।
भारत को कृषि प्रधान देश की तरह चित्रित करना उन अंग्रेजों के हित में था जिनके देश में औद्योगिक क्रान्ति के कारण ऐसी वस्तुओं का उत्पादन होने लगा था जिनकी खपत केवल तब हो सकती थी जब भारत जैसी सभ्यता की उत्कृष्ट कारीगरी को दरकिनार किया जाता। यहाँ यह याद रखने की बात है कि औद्योगिक क्रान्ति मूलतः सार्वभौमिक डिजाइन को सारी संस्कृतियों पर उनकी अपनी आवश्यकताओं को भूलाकर आरोपित करने का यूरोप का हिंस्र उपक्रम था। भारत में कारीगरी न सिर्फ उत्कृष्ट कोटि की थी, उसमें असीम वैविध्य था। मसलन भारत के विभिन्न अंचलों में अलग-अलग तरह का कपडा बुना जाता था, अलग-अलग तरह का लकडी, लोहे, पीतल आदि का काम हुआ करता था। ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि सारे देश में एक जैसी डिजाइन आरोपित की गयी हो, हर अँचल में उसकी अपने परिवेश, रुचि और सांस्कृतिक समझ के अनुरूप विभिन्न वस्तुओं की डिजाइन तैयार की जाती थी। दूसरे शब्दों में भारत एक अत्यन्त डिजाइन वैविध्य सम्पन्न संस्कृति रही है। औद्योगिक क्रान्ति के हितग्राहियों के लिए ऐसी संस्कृति घातक ही कही जाएगी। जिस सभ्यता में डिजाइन का ऐसा वैविध्य हो, वहाँ औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप तैयार एक-सा डिजाइन कैसे स्वीकृत हो पाता? औद्योगिक क्रान्ति के अपने उत्पादों को भारतीय जीवन पर लादने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने भारत की कारीगरी को नष्ट किया और उसकी एक नयी तस्वीर स्वयं भारतीयों के मन में अंकित कीः इसे कृषि प्रधान देश बता दिया।
1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आने पर गोखले की सलाह पर गाँधी सीधे-सीधे राजनीतिक आन्दोलन में हिस्सेदार होने के स्थान पर करीब दो वर्षों तक भारत को समझने भारत भ्रमण पर, भारत के देशाटन पर निकल गये थे। बीस वर्षों के आसपास दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करने के बाद भारत आये गाँधी को भारतीय सभ्यता को ध्यान से सुनना अनिवार्य लगा था। यहाँ के कारीगरों को, किसानों को, यहाँ की स्त्रियों को, यहाँ की तमाम व्यवस्थाओं को, यहाँ के पेडों, पक्षियों और यहाँ के कण-कण को उन्होंने हजार कानों से सुना था। यह सिर्फ इसलिए नहीं था कि उनके पास सुनने की अपूर्व कला थी, वे यह जानते थे कि लम्बे समय से यहाँ के लोगों को सुना ही नहीं गया है। वे यह भी जानते थे कि ऐसी समृद्ध और सुचारू व्यवस्था गहरी समझ और ज्ञान की निरन्तरता के बिना बन नहीं सकती थी।
गाँधी ने अंग्रेजों की व्यवस्था के बोझ तले चुप हो गयी भारतीय सभ्यता को सुनना शुरू किया था और जीवन की अन्तिम साँस तक वे यही करते रहे। इसीलिए वे इस सभ्यता पर उससे कहीं अधिक विश्वास कर सके जो उनके यहाँ सक्रिय होने के पहले तक के चिन्तक या राजनेताओं को था।
वे उसी तरह भारतीय सभ्यता के तमाम पक्षों को ध्यान से सुनते रहे जैसे बाद के समय में अनुपम मिश्र तालाबों को उनकी अनुपस्थिति में सुनते थे। वन्दना शिवा बीजों के पुरुखों को सुनती हैं। यह इसी सुनने का फल है कि गाँधी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में कृषि में उपयोगी हल को चुनने के स्थान पर कारीगरी में प्रयुक्त होने वाले चरखे को चुना था। यह चरखा ही था जिसके अन्तस को सुनकर भारतीय नागरिकों और ग्रामिणों में अपनी अवरुद्ध कारीगरी के लिए आत्मविश्वास जाग पाता।
8.
गाँधी की ऐसी बहुत-सी तस्वीरें हैं जिनमें वे बोल रहे हैं, पर ऐसी तस्वीरों की भी संख्या कम नहीं जिनमें वे सुन रहे हैं। गाँधी पर बनी रिचर्ड एटिनबरो की फिल्म मुझे कई कारणों से पसन्द नहीं है पर उसका एक दृश्य हर बार आँखों को भिगो देता है जहाँ गाँधी अपने आश्रम में बैठे चम्पारन से आए राजकुमार शुक्ल को अंग्रेज शासकों के अधीन उस इलाके के किसानों की दुर्गति को पूरी करुणा के साथ सुन रहे हैं। उन्होंने अगर राजकुमार शुक्ल से चम्पारन इलाके के निलहे अंग्रेज साहबों के अत्याचारों और वहाँ के किसानों की भीषण दुर्दशा के विषय में ध्यान से न सुना होता, वे निलहे अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन के लिए चम्पारन जैसे छोटे-से गाँव शायद न गये होते। वे यह समझ गए थे कि चम्पारन के किसानों की दुर्दशा में भारत के तमाम किसानों की पीडा व्यक्त हो रही है और उनकी स्थिति को सुधारने के आन्दोलन का असर पूरे देश के किसानों के आत्मविश्वास पर पडेगा।
9.
आधुनिक राजसत्ता और उससे जुडी व्यवस्थाएँ बनाने का दायित्व मूलतः कुछ लोगों के ऊपर ही रहा है। ये वे लोग रहे हैं जिन्होंने राजनीतिक सिद्धान्त बनाये और उन्हें सारे समाज पर लागू किया। यूरोप में ऐसा करने की परम्परा भी रही है पर भारत में ऐसा होना अंग्रेजों के आने के बाद ही अधिक होने लगा। इस व्यवस्था में यह मान्यता स्वीकृत है कि राजनीतिक विचार करने की सामर्ध्य और अधिकार केवल कुछ लोगों को है। बाकी लोगों का काम सुनना है। अंग्रेजों के भारत आने के बाद से अंग्रेजों और अंग्रेजियत में शिक्षित भारतीयों ने साधारण भारतीय जनों को केवल सुनाने का काम किया है। मानो उनके अलावा और किसी ने अपने समाज की स्थिति पर विचार ही न किया हो। यह पिछले दो सौ वर्षों में कुछ अधिक ही हो गया है। गाँधी ने भारत आते ही इस स्थिति को बदल दिया। उन्होंने साधारण भारतीयों को सीखें देने और अन्य तरह की बातें सुनाने के स्थान पर उन्हें सुनना शुरू कर दिया। यह भारतीय राजनीति और सामाजिक तन्त्र में बिलकुल नई घटना थी इसीलिए जब गाँधी ने भारतीयों को सुनना शुरू किया तो यहाँ के पुरखे भी लौट-लौटकर उन्हें इस सभ्यता के विषय में बताने लगे। इस सुनने के कारण ही गाँधी को इस देश के साधारण लोगों में गहरा विश्वास हो गया और उन्होंने जल्द ही कांग्रेस को अंग्रेजी पढे-लिखे लोगों के छोटे-से क्लब के स्थान पर लाखों तथाकथित साधारण भारतीयों के विचार-विमर्श का मंच बना दिया। इसी रास्ते यह सम्भव हो सका कि स्वतन्त्रता का आन्दोलन देश के कोने-कोने में फैल सका।
10.
सुनने के महत्त्व को जानने के लिए हमें यह याद कर लेना चाहिए कि संसार के प्राचीन और उत्कृष्ट ग्रन्थों में एक वेदों को भी सुना या देखा ही गया था। उन्हें लम्बे समय तक याद सुना-सुनाया ही जाता था। इसी कारण उन्हें श्रुति ग्रन्थ कहा जाता है। वैदिक ऋषियों या विद्वानों ने अपने चारों ओर और साथ ही अपने भीतर की प्रकृति को पूरी तल्लीनता से सुना था, तभी उस ज्ञान का उन्हें अनुभव हुआ था जिसे वेद नाम से पुकारा जाता है।
11.
अन्त में मैं आपको एक छोटा-सा वाकया सुनाना चाहता हूँ।
कुछ वर्ष पहले किसी कविता समारोह के लिए पेरिस जाते हुए रास्ते में मेरी तबियत बिगड गयी। दवाई की गुँजाइश नहीं थी। मैं जहाज की सीट पर चुप बैठा रहा। कुछ देर बाद मुझे लगा मानो मेरा शरीर किसी तरह की पुकार लगा रहा है। बीमार शरीर अपने उपचार के लिए पुकार लगाता ही है। यह मुझे तभी महसूस हुआ था। हममें से अधिकतर उसे सुन नहीं पाए थे क्योंकि हमें सुनने की प्राचीनतम और श्रेष्ठ कला नहीं आती है।
लेकिन यदि हमें अपने शरीर के भीतर से आती आवाज को सुनना हो, तो हमें सुनने की आदत होनी चाहिए। यह आदत केवल दूसरों को सुनने से आ सकती है। गाँधी का यही रास्ता था। वे भारतीयों को, उनकी सभ्यता को तो सुनते ही थे, उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को भी पूरी ईमानदारी से सुना था। शायद इसीलिए वे अपने भीतर की आवाज को भी सुन लेते थे।
भीतर की आवाज सुनने के लिए बाहर की आवाजों को सुनने की आदत होना चाहिए।
गाँधीजी यह कर सके थे, इसीलिए वे यह पूरी दृढता से कह सके कि उनकी मुक्ति का मार्ग भारतवासियों की मुक्ति से होकर गुजरता है।

***
- ग्वालियर के आई.टी.एम. विश्वविद्यालय में 23 नवम्बर 2019 को दिया गया दीक्षान्त व्याख्यान।
सम्पर्क - एस-90/45, तुलसी नगर,
भोपाल, ४६२००३
मो. ९७५३८८२३४३