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सनातन गाँधीः महात्मा इन मेकिंग पर पुनर्विचार

अम्बिकादत्त शर्मा
मैं सिर्फ लोगों के अच्छे गुणों को देखता हूँ, ना की उनकी गलतियों को गिनता हूँ।
- महात्मा गाँधी
अहिंसक सत्यानेषी भारत की थाती महात्मा गाँधी को अनेकों नजरिये से देखने-समझने की कोशिश की गई है। उनका जीवन जबकि एक खुली किताब की तरह है। इतनी खुली किताब कि उनके जीवन को पब्लिक और प्रायवेट में विभाजित नहीं किया जा सकता। ऐसे पारदर्शी गाँधी को समझने-परखने का एक बडा ही प्रसिद्ध और प्रचलित तरीका महात्मा इन मेकिंग का है। इसका मतलब यह है कि उन्होंने उस मुकाम को धीरे-धीरे विकसित करते हुए प्राप्त किया है और तब जाकर दुनिया उन्हें महात्मा गाँधी के रूप में जान पायी। यह गाँधी के महात्मा बनने को एक आनुभविक ज्ञानमीमांसा की पद्धति से समझना है। डार्विन के विकासवाद और आधुनिक मनोविज्ञान की कसौटी पर एक व्यक्ति को समझने की कोई दूसरी पर्यवेक्षणीय ज्ञानमीमांसा हो भी नहीं सकती। परन्तु, एक साधारण व्यक्ति को जिस ज्ञानमीमांसा से समझा जाता है, उसी पद्धति से महात्मा के स्वत्व को भी क्या समझा जा सकता है? आज गाँधी का सम्पूर्ण जीवन दुनिया के सामने पूरी तरह अनावृत्त है। क्या उस जीवन-वृत में विन्यस्त व्यक्तित्व निर्माण की कोई ऐसी अभियांत्रिकी निकाली जा सकती है, जिसका विनियोग कर किसी व्यक्ति को महात्मा गाँधी बनाया जा सके। यदि ऐसा किया जाना सम्भव नहीं, तब महात्मा इन मेकिंग के तौर-तरीकों से गाँधी को समझने की यही सबसे बडी विफलता है। अतः आईये, महात्मा इन मेकिंग की ज्ञानमीमांसा पर पुनर्विचार करते हुए व्यक्तित्वान्तरित गाँधी को समझने का प्रयास करें।
ढ्ढ
यदि हम विकासमान महात्मा गाँधी की इस अवधारणा को स्वीकार कर लेते हैं जो आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से व्यक्ति को समझने का सही तरीका है; तो हमें यह भी मानना पडेगा कि उनके विचारों में समय-समय पर बदलाव आया है। उन्होंने अपने दृष्टिकोणों में संशोधन और परिमार्जन किया है। इसके चलते उनके विचारों में पहले और बाद के विचारों में एकवाक्यता नहीं देखी जा सकती। इतना ही नहीं, कोई गाँधी के विचारों में, उनके कर्मों में और समय-समय पर लिए गए महत्त्वपूर्ण निर्णयों में प्रकट-अप्रकट विरोधाभास भी देख सकता है। इन विरोधाभासों के बीच कोई गाँधी को इस रूप में भी देख-समझ और परख सकता है कि वे एक रणनीतिक व्यक्ति थे। परन्तु उनकी रणनीति को कुटिलता या राजनीतिक चतुराई कहा जाए अथवा बुद्ध और कृष्ण का उपाय-कौशल। कुछ लोग गाँधी का मूल्याँकन भारत की आजादी के आन्दोलन की परिसीमा में करते हैं और उस बृहत्तर परिप्रेक्ष्य को नजरन्दाज कर देते हैं जिसकी प्रयोगभूमि उन्होंने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को बनाया था। इस तरह एक बार जब हम भूल और सधार की प्रक्रिया में धीरे-धीरे विकसित होते हुए गाँधी की इस धारणा को पूर्वकल्पित कर लेते हैं, तो उन्हें देखने-समझने के उपर्युक्त सभी नजरिये, वास्तव में, महात्मा इन मेकिंग के ही उप-तरीके बन जाते हैं।
महात्मा गाँधी को देखने-परखने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि उन्हें विकसित होता हुआ, बनता हुआ न मानकर अभिव्यक्तिकरण की प्रक्रिया में प्रकट होते हुए गाँधी के रूप मंक समझा जाए। इस दृष्टि से यह कहना उचित होगा कि विकसित होता हुआ गाँधी महात्मा नहीं, बल्कि अभिव्यक्त होता हुआ महात्मा वास्तव में गाँधी है। तब तो हमें उनके विचार, कर्म और निर्णयों में एकवाक्यता के सूत्र खोजने होंगे। हमें यह भी परखना होगा कि गाँधी का वह सत्य क्या है जिसकी अभिव्यक्ति की प्रक्रिया में उनके जीवन-क्रम को समझा जाए। साथ ही साथ यह भी कि गाँधी उस सत्य में कब और कैसे प्रतिष्ठित हुए। यदि गाँधी को उस नजरिये से देखा-समझा जाए, तो महात्मा इन मकिंग के नजरिये से बनने वाली गाँधी विषयक समझ की सभी निष्पत्तियों के अर्थ ही बदल जाएँगे। तब गाँधी को और गहरे में समझना होगा, ताकि वैचारिक अनन्यता में घटित होते हुए उनके जीवन-क्रम को देखा जाना सम्भव हो सके। इसके लिए उस सत्य को भी जानना जरूरी है जिस सत्य का आत्मक्रियान्वयन करते हुए स्वयं उन्होंने अपने जीवन को सत्य के साथ प्रयोग कहा है।
दुनिया भर के बडे-बडे लोगों ने और उनके ही अन्तरंग व्यक्तियों ने गाँधी के विषय में जो वक्तव्य दिये हैं, वह भी इतने अलग-अलग हैं कि एक ही सख्श के विषय में उन्हें चकित करने वाले वक्तव्य कहे जा सकते हैं। अलबर्ट आइन्स्टाइन जैसे महान् वैज्ञानिक ने उनके विषय में कहा था कि आने वाली पीढी को इस सच्चाई पर विश्वास कर पाना मुश्किल होगा कि मोहनदास करमचन्द गाँधी नाम का कोई व्यक्ति वैसे ही हाड-माँस का पुतला रहा होगा, जैसे हम और आप हैं। यह वक्तव्य गाँधी के विषय में प्रशंसा के भावातिरेक में दिखा गया कोई औपचारिक वक्तव्य नहीं है। ऐसा समझना भी नहीं चाहिए। यह उद्गार उस व्यक्ति के हैं जो वैज्ञानिक विश्वदृष्टि का सबसे बडा पुरोधा था और जिस वैज्ञानिक विश्वदृष्टि के साभ्यतिक विन्यास के गाँधी अपने समय के अकेले सबसे बडे विरोधी थे। गाँधी का यह अकेलापन जीवन भर उनके साथ रहा। यहाँ तक कि घोर राजनीतिक जीवन में भी, क्योंकि राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व भी वह आधुनिक वैज्ञानिक सभ्यता के विरोध की इसी भूमि पर खडे होकर कर रहे थे। गौरतलब है कि इस भूमि पर वह अकेले ही खडे थे। इसी तरह महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाँधी को सत्य का मूर्तरूप (एम्बोडिड ट्रूथ) कहा था। आर.सी.जेनर1 जैसा प्रसिद्ध धर्म वैज्ञानिक भी अपनी रचनाओं में गाँधी को सन्दर्भित करते हुए और युधिष्ठिर फिर लौट आया कहते हैं। पता नहीं गाँधी की मृत्यु के बाद दुनिया भर के लोगों ने किन-किन प्रशंसापरक शब्दावलियों म उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी थी। सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की सम्पादित पुस्तक में वैसे सभी उद्गारों को देखा जा सकता है। यदि उनमें से अधिकांश को प्रशंसापरक औपचारिक वक्तव्य ही क्यों न मान लिया, लेकिन ऊपर मैंने जिन व्यक्तियों को रेखांकित किया है, वे प्रशंसापरक उद्गार से कुछ अधिक अनौपचारिक वक्तव्य हैं और गाँधी की वास्तविकता का स्पर्श करते हैं।
इसके विपरीत गाँधी के विषय में कुछ अप-वक्तव्य भी दिये जाते रहे हैं, जो उनके महत्त्व को कम ही नहीं करते, बल्कि सिरे से खारिज करते हैं। ऐसे वक्तव्य भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं। ग्रेट सोलः गाँधीज स्ट्रगल विद इण्डिया के लेखक लेली वेल्ड2 ने गाँधी को अपनी टिप्पणी में टाँकते हुए कहा है कि गाँधी को उनके ही विरुद्ध उद्धृत करना मुश्किल नहीं है। किसी व्यक्ति के ज्ञान और क्रिया में स्ववचन व्याघात, स्वज्ञान व्याघात और स्वक्रिया व्याघात बताना उसे विरुद्धों की एकता म रूपान्तरित कर देने जैसा होता है। इसी तरह पंडित जवाहरलाल नेहरू तो यह कहने से भी बाज नहीं आते कि गाँधी जी वाज ए पराडॉक्सीकल पर्सनालिटी। यह उस व्यक्ति का वक्तव्य है जिसे गाँधी ने मानों अपना उत्तराधिकरी ही समझा था। यह वही नेहरू हैं जिन्होंने अमेरीकी राजदूत गैल्ब्रेथ को कहते-कहते यह कह गए थे कि मैं भारत का अन्तिम ब्रिटिश शासक (वायसराय) हूँ। राष्ट्रपिता नामक पुस्तक में अपने मंतव्य की तफसील करते हुए नेहरू कहते हैं कि गाँधी जी में एक जबरदस्त आत्मविरोध है। मैं समझता हूँ, सभी विख्यात व्यक्ति कुछ सीमा तक ऐसे ही होते हैं। वर्षों तक मैं इस समस्या से उलझा रहा हूँ कि क्या कारण है कि पददलितों के लिए इतना प्रेम और सहानुभूति रखते हुए भी वह एक ऐसी प्रणाली का समर्थन करते हैं जो उनको जन्म देती है। ऐसी प्रणाली जो उन्हें पैरों तले कुचलती है। क्या कारण है कि अहिंसा के लिए इतना तीव्र लगन होने के बावजूद वह ऐसे राजनीतिक और सामाजिक ढँाचे का समर्थन करते हैं जो पूरी तरह से हिंसा और जोर-जबरदस्ती पर अवलम्बित है.... वे एक दार्शनिक अराजकतावादी हैं।3 इधर हाल के ही वर्षों में सुधीर चन्द्र4 ने एक बडी ही चर्चित पुस्तक लिखी है, जिसका शीर्षक है- गाँधी एक असम्भव सम्भावना। मानो गाँधी नो-प्लेस के अर्थ में यूटोपियन (Utopian) हैं, गुड-प्लेस के अर्थ में इयोटोपियन (Eutopian) नहीं। इतना ही नहीं, आज तो गाँधी को कुत्सित, लाँछित करने वाली अनेकों पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं और धडल्ले से बिक रही हैं। अंग्रेजों ने तो एक समय हिन्दस्वराज पर प्रतिबन्ध लगाया था, लेकिन आजादी के बाद किसी भी सरकार ने राष्ट्रपिता को लाँछित करने वाले साहित्यों पर प्रतिबन्ध लगाने का साहस नहीं दिखायी है।
इसी तरह गाँधी अपने विचारों, निर्णयों और कर्मों से भी हमें चौंकाते हैं। उनके दक्षिण अफ्रीका के जीवन में, फिर भारत में आने के बाद आश्रम के जीवन में और राजनीतिक निर्णयों में हमें अनेकों ऐसे प्रसंग और उदाहरण मिलते हैं, जहाँ हमारी साधारण मानवोचित समझ हतप्रभ होकर रह जाती हैं। महात्मा गाँधी को उनकी निजता में समझने के लिए उनके जीवन के ऐसे प्रसंगों को ठीक से समझना जरूरी है। उदाहरण के लिए अपने हत्यारों को भी क्षमा कर देना। हत्या के प्रयास में छुरा सहित गोडसे5 के पकडे जाने पर उससे यह कहना कि कुछ सप्ताह तुम हमारे साथ रहो, ताकि मैं समझ सकूँ कि तुम्हारे मन में मेरे प्रति इतना बैर क्यों है। इसी तरह हिंसा हो जाने के कारण चौरी-चौरा सत्याग्रह आन्दोलन को बंद कर देना। इस पर रिचर्ड नामक एक अंग्रेज द्वारा यह पूछे जाने पर कि मान लें कि इंगलैंड में सशस्त्र विद्रोह भडक उठता है और उससे आफ देश की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त्र होता है, तब आप क्या करेंगे? गाँधी का उत्तर था कि तब मैं सबसे पहले उस विद्रोह को रोकने, शाँत करने का प्रयत्न करूँगा।6 यहाँ यह समझा जा सकता है कि किसी संघर्ष की वैधता इस बात में नहीं कि विरोधी पर कितनी तेज चोट की जाए, बल्कि वह इस बात से आती है कि आपका संघर्ष आफ अपने जीवन या कर्म और प्रयास के सत्य को किस हद तक पुष्ट करता है। ऐसे ही द्वितीय गोलमेज सम्मलन में भाग लेने के उपरांत शाम को अंग्रेज मजदूरों से गाँधी का मिलने जाना, जबकि ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें ऐसा करने से यह कह कर मना किया गया था कि उन्हें जान का खतरा है। इसी प्रकार नाजी जर्मनी का युद्ध में ब्रिटेन के विरोध में सहायता किये जाने का समर्थन नहीं करना और काश्मीर में सेना भेजने का समर्थन करना भी अनेकों घटनाओं में ऐसी घटना है जो एक साधारण समझ वाले व्यक्ति को चौंका देता है।
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तब महात्मा गाँधी को कैसे समझा-परखा जाए। कहीं ऐसा तो नहीं कि गाँधी के विषय में सबके अपने-अपने झूठ हैं और गाँधी का सच आज भी कहीं छुपा हुआ है। हम अपने व्यक्ति होने की परिसीमा में गाँधी को समझते हैं और इस तरह अपनी ही समझ में उन्हें टाँकते हुए झूठ-पर-झूठ उनपर आरोपित करते चले जाते हैं। वास्तव में गाँधी के व्यक्तित्व को उन प्रचलित कोटियों और पदावलियों में समझा ही नहीं जा सकता, जिनमें आधुनिक मनोविज्ञान द्वारा मनुष्य को समझने के लिए हमें अभ्यस्त कर दिया गया है। आमतौर पर मनुष्य आत्मरक्षा, आत्मप्रेम और आत्मस्वार्थ से संचालित होता है, लेकिन गाँधी के जीवन में अनेकों प्रसंग और उदाहरण मिलते हैं, जिन्हें देख कर ऐसा लगता है कि इन कोटियों को उनके व्यक्तित्व पर लागू नहीं किया जा सकता। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में और कार्ल पॉपर के शब्दों में उनके जीवन के वैसे प्रसंगों को सुपर एरोगेन्ट ड्यूटी कहना ही उचित प्रतीत होता है। यहाँ गाँधी के जीवन के एक प्रसंग को उदाहरित करना बहुत ही प्रासंगिक होगा।
एक समय बापू कस्तूरबा के साथ कटक के गाँवों में प्रवास पर थे। जब कभी वे गाँवों में प्रवास पर होते, तो रात्रि विश्राम के लिए किसी एक गाँव में उनका आश्रम हुआ करता था। एक दिन जब वह दिनभर गाँवों में प्रवास के उपरांत संध्या को आश्रम लौटे रहे थे, तो रास्ते में उन्होंने देखा कि किनारे पर स्थित एक घर में बाहर से दरवाजे में कुण्डा बन्द किया हुआ है, लेकिन अन्दर से कुछ लोगों के घर में होने का संकेत उनकी आपस में बातचीत से मिल रहा है। कस्तूरबा से उन्होंने कहा कि देखो माजरा क्या है? कस्तूरबा जाकर दरवाजा खटखटाईं, तो खिडकी से एक महिला ने झाँका और दोनों को प्रणाम किया। कस्तूरबा उस महिला से पूछीं कि तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे गाँव में बापू आए हुए हैं। सब लोग उनसे मिलते हैं, पर क्या तुम्हें उनसे मिलने की इच्छा नहीं होती? घर में बंद महिला ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा कि इस गाँव और गाँव के लोगों के लिए सौभाग्य की बात है कि यहाँ बापू आए हैं। हम भी उनसे मिलना चाहते हैं लेकिन क्या करें? इस घर में हम तीन महिलाएँ रहती हैं और तीनों के बीच एक ही साडी है। अतः एक समय में कोई एक ही हममें से बाहर जा सकता है। दो लोगों को मजबूरन घर के अन्दर ही रहना पडता है। इसलिए बाहर जाने वाली महिला दरवाजे को बाहर से बंद कर जाती है। बापू यह सब चुपचाप सुनते रहे। कुछ बोल नहीं रहे थे। चुपचाप वे कस्तूरबा के साथ आश्रम लौट आए। रात भर आश्रम में मौन और बहुत बेचैन रहे। दूसरे दिन जब सुबह बापू गाँवों में जाने के लिए निकले, तो उसी दिन से उन्होंने आधी धोती पहनने और आधी धोती ओढने वाला लिबास जीवन भर के लिए धारण कर लिया। आज दुनिया महात्मा गाँधी को उसी वेश में पहचानती है।7 वह दुनिया भर के नंगे-निहंगों को वस्त्र प्रदान नहीं कर सकते थे, लेकिन उनकी पीडा से तदात्म स्थापित कर स्वयं अतिरिक्त वस्त्रों का त्याग और न्यूनतम वस्त्रों से काम चलाने का व्रत उन्होंने उसी दिन से ले लिया। इस इस घटना से गाँधी के व्यक्तित्व पर जो प्रकाश पडता है उससे समझा जा सकता है कि आधुनिक मनोविज्ञान से परिभाषित होने वाले व्यक्ति की तरह उन्हें नहीं समझा जा सकता। इस घटना के प्रति एक साधारण व्यक्ति की जो प्रतिक्रिया हो सकती थी, उससे सर्वथा भिन्न प्रतिक्रिया का बापू की चेतना में घटित होना ही इस बात को दर्शाता है कि वह चेतना की उच्च भूमि पर प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। हमें यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह सम्भव है कि चेतना के दो भिन्न धरातल पर स्थित दो व्यक्ति ऐसा कुछ करें जो बाहर से देखने पर एक ही प्रकार का कर्म दिखाई पडे, परन्तु दोनों के कर्म की कर्मवत्ता और औचित्य एक तरह के मूल्याँकन का विषय नहीं होता।8
महात्मा गाँधी एक विचार-पुरुष, एक प्रज्ञा-पुरुष थे। ऐसे प्रज्ञा-पुरुष जिनमें भारत का सनातन सत्य अपनी सोल्लहों कलाओं के साथ अवतरित हुआ था। केवल अवतरित ही नहीं बल्कि युगानुरूप नवीकृत भी हुआ था। निश्चय ही उनसे पहले और उनके समकालीन अनेक महापुरुष इस देश में हुए और उन सब में वही सनातन सत्य न्यूनाधिक रूप में अभिव्यक्ति पाता था, परन्तु गाँधी में वह सत्य अपनी सम्पूर्णता में भास्वरित हुआ था। किसी व्यक्ति को किसी समृद्ध परम्परा के धारक अथवा वाहक के रूप में समझना अलग बात है लेकिन गाँधी तो ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें देख-समझ कर सनातन भारत को समझा जा सकता है। वह आत्मा की आवाज की तरह सनातन सत्य थे। आत्मा की वह आवाज जिसे अक्सर हम सुन नहीं पाते, लेकिन जो हमारे भीतर सदैव और समान रूप से बोलती है। इसके लिए न तो धरती और न ही हाड-माँस के देह की जरूरत होती है। बस आश्चर्य यही है कि वह आवाज गाँधी के देह को माध्यम बनाकर भारत की वसुन्धरा पर प्रकट हुई थी। इसे भारत भूमि का पुण्य संभार ही कहिए कि समय-समय पर यहाँ ऐसे महापुरुष पैदा होते रहते हैं सम्भवामि युगे-युगे।
भारत की आजादी के आन्दोलन के वे जननायक थे। सम्भवतः वे एक मात्र जननायक थे। उनकी प्रभावमत्ता और जनस्वीकृति इतनी अधिक थी कि वह इस आन्दोलन को किसी भी दिशा में मोड सकते थे। परन्तु, ऐसे राजनीतिक आन्दोलन के प्रति भी उनकी संघर्ष-दृष्टि सर्वथा विलक्षण थी। वह अहिंसक सत्याधारित दृष्टि थी। दुनिया भर के स्वतन्त्रता संघर्ष के इतिहास को सन्दर्भ बनाकर यह बात कही जा सकती है कि ऐसे संघर्षों में स्वतन्त्रता अपने आप में स्वतः प्रामाण्य रूप से साध्यभूत होती है। इतना स्वतःसाध्य कि उसे प्राप्त करने के साधनों के विषय में भी प्रश्न उठाना प्रासंगिक नहीं रह जाता। परन्तु, गाँधी ने जब यह प्रश्न उठाया कि स्वतन्त्रता यद्यपि साध्यभूत है, फिर भी उसे प्राप्त करने के साधनों के औचित्य पर विचार करना उतना ही आवश्यक है जितना कि स्वतन्त्रता वांछनीय है। इस बात को लेकर स्वतन्त्रता आन्दोलन को गति दे रहे अन्य नेताओं से उनके गहरे मतभेद उभर कर सामने आए थे। उन्होंने भारत की स्वतन्त्रता को भारत की अपने स्व में प्रतिष्ठा के रूप में देखा था, जिसमें राजनीतिक पराधीनता अनेकों पराधीनताओं में एक विशेष प्रकार की पराधीनता थी। यदि स्वतन्त्रता के इस सत्य की अनदेखी कर भारत को स्वतन्त्रता मिल भी जाती है, तो गाँधी के नजरिये से वह एक दूसरे प्रकार की परतन्त्रता ही होगी। उनके इस अभिप्राय को उस पत्र के माध्यम से समझा जा सकता है जिसे उन्होंने 1945 में नेहरू को लिखा था -मेरा विश्वास है कि यदि भारत को सच्ची स्वतन्त्रता प्राप्त करनी है, तो उसके माध्यम से संसार को भी स्वातंत्र्य लाभ प्राप्त होना है। इस दृष्टि को आत्मसात् किये हुए वह भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व करने वालों में ही अकेले नहीं थे, बल्कि पूरी दुनिया में शायद अकेले व्यक्ति थे, इस बात को लेकर बाल गंगाधर तिलक से भी उनके गहरे मतभेद थे। तिलक ने यह स्वीकार किया था कि वे सत्य के ऊपर स्वतन्त्रता का वरण करना चाहेंगे। जबकि गाँधी स्वतन्त्रता के ऊपर सत्य को चुनने के प्रबल पक्षधर थे।9 तिलक की इस दृष्टि के बीज उनके गीताभाष्य में भी मौजूद हैं और इस बात को ध्यान में रखकर न केवल उसे पढा जाना चाहिए, बल्कि मूल्याँकन भी किया जाना चाहिए कि तिलक की यह दृष्टि कृष्ण के धर्म-विभाग की अवधारणा से कितनी संगत है जिसके तहत वह अहिंसा की प्रतिष्ठा के लिए सत्य की भी अनदेखी करने का सुझाव देते हैं। इतना ही नहीं, लाला लाजपत राय उस समय के सबसे बडे नेता थे। इतने बडे कि वह गाँधी को परामर्श देने की हैसियत रखते थे।
उन्हीं दिनों जब वह जेल से छूट कर बाहर आए, तो उन्होंने कहा था कि यदि गाँधी इस विचार को नहीं छोडते हैं, तो उन्हें लाला लाजपत राय से अलग होना पडेगा। अतः स्वतन्त्रता के पीछे सत्य को स्वतन्त्रता से ऊपर रखने की और उस साध्यभूत सत्य की प्रतिष्ठा के लिए अहिंसक साधनों से स्वतन्त्रता प्राप्त करने की जो गाँधी की निष्कम्प मूल्य-दृष्टि थी, वह उन्हें दुनिया भर में अकेले व्यक्ति के रूप में खडा कर देती है। यहाँ स्वतन्त्रता के सत्य का मतलब व्यक्ति और राष्ट्र का अपने-अपने स्व में प्रतिष्ठित होना है। यही सच्ची स्वतन्त्रता है। महज राजनीतिक स्वतन्त्रता उसी सीमा तक सार्थक होती है जब वह सच्ची स्वतन्त्रता का सोपान बन सके।
ढ्ढढ्ढढ्ढ
ऐसे महात्मा गाँधी को न तो अवतारी पुरुष, और न ही देवता ही कहा जा सकता है। परन्तु उन्हें हम और आप की तरह साधारण व्यक्ति कहना भी उचित नहीं होगा। वास्तव में गाँधी व्यक्तित्वान्तरित (ट्रांसपर्सन्लाइ*ड) व्यक्ति थे। परन्तु उनके व्यक्तित्वान्तरण को कैसे समझा जाए? शायद इसे समझे बिना उनके विषय में हमारी समझ आधी-अधूरी ही रहेगी और हम अपने झूठ को गाँधी पर आरोपित ही करते रहेंग। लाओत्से अपने घर के दरवाजे के बाहर बैठे थे। एक पत्ते को उन्होंने पेड से टूटकर गिरते हुए निहारा और निहारते हुए ही वे ताओ में प्रतिष्ठित हो गए। इस छोटी-सी घटना से मानो सदा के लिए ताओ में उनका व्यक्तित्वान्तरण हो गया। ऐसे ही सिद्धार्थ गौतम ने बीमार, वृद्ध और मृत व्यक्ति की अर्थी जाते हुए देखा। ऐसे दृश्यों को हम और आप अक्सर देखा करते हैं, लेकिन उनके प्रति हमारी साधारण चेतना में क्या प्रतिक्रिया घटित होती है? हम थोडे समय के लिए दुःखी होते हैं, कदाचित् क्षणिक वैराग्य होता है और ज्यादातर हम इनसे यथासम्भव बचाव के उपायों को खोजते हैं, या फिर सतर्कता बरतते हैं। परन्तु, गौतम की चेतना में सर्वथा भिन्न और मौलिक प्रतिक्रिया घटित हुई और वह प्रतिक्रिया इतनी गहरी कि उन्हें सर्वं दुःखम् का साक्षात्कार हो गया। वे इस दुःख का मूल कारण जानने के लिए महाभिनिष्क्रमण ले लिए। इस तरह गौतम का बुद्धत्व में व्यक्तित्वान्तरण हो गया और आजीवन महाकरुणा के सम्पादन में निरत हो गए, ताकि प्राणिमात्र को दुःख से निदान मिल सके।
इसी तरह ब्रह्मचारी शंकर कालाडी से चलकर नर्मदा के तीरे-तीरे ओंकारेश्वर पहुँचे। वहाँ उन्होंने गोविन्दपाद से आचार्य गौडपाद के अद्वैत दर्शन में दीक्षित हुए। अद्वैत-विचार के प्रचार का गुरू-आदेश प्राप्त कर जब वह काशी पहुँचे तो एक दिन अपने शिष्यों के साथ मणिकर्णिका घाट पर गंगा स्नान कर सीढियाँ चढ रहे थे। रास्ते में श्वपच (चांडाल) अपने चार कुत्तों के साथ खडा था। शिष्यों ने उस अस्पृश्य श्वपच से कहा हटो-हटो। श्वपच ने अकडकर पूछा। किसे हटने के लिए कह रहे हो- आत्मा को या शरीर को। फिर आचार्य शंकर की ओर देखते हुए श्वपच ने पूछा कि अपने शिष्यों को अद्वैत की, सर्वं खल्विदं ब्रह्म की शिक्षा देते हो और वही मुझसे रास्ता छोडने के लिए कह रहे हैं। जब चराचर जगत् ही ब्रह्म है, तो कौन किसे छोडकर कहाँ जाए। बलिष्ट श्वपच के हाथ से रस्सियाँ खींचते हुए कुत्तें भौंकने लगे। मानो वे आचार्य शंकर और उनके शिष्यों से अद्वैत की सही व्याख्या पूछ रहे हों। मध्याह्न सूर्य की तप्त किरणों से दैदीप्यमान शंकर के भाल से स्वेदकण छलक पडे और सनन्दनादि शिष्य सहमे हुए अपने आचार्य की ओर देखने लगे। चारों दिशाएँ द्वादशवर्षीय दण्डी की प्रतिक्रिया सुनने के लिए मानो थम गईं। कशावेशधारी ने अद्वैत का उदान भरते हुए कहा - जो चैतन्य सभी दिव्य शक्तियों में स्पंदित होता है वही क्षुद्र जीव-जन्तुओं में भी।10 इस तरह आचार्य शंकर अद्वैत के बौद्धिक ज्ञान से अद्वैत के पौरुष ज्ञान में रूपान्तरित होकर अद्वैत बोध में व्यक्तित्वान्तरित हुए।
मुझे ऐसा लगता है कि गाँधी का व्यक्तित्वान्तरण भी उस घटना के साथ हुआ था, जब वह प्रिटोरिया जा रहे थे और नेटाल की राजधानी मेरित्जबर्ग स्टेशन पर प्रथम श्रेणी के रेल-कोच में यात्रा करते हुए श्वेतजातीय अँग्रेज रेलगार्ड से पिटे थे और धक्का देकर उन्हें डब्बे से बाहर फेंक दिया गया था। एक युवक दक्षिण अफ्रीका की अनजान धरती पर राजी-रोटी की तलाश में अग्रसर हो रहा था कि एक यात्रा के दौरान उसे श्वेतजातीय रेलगार्ड ने धक्का देकर इसलिए बाहर फेंक दिया, क्योंकि वह प्रथम श्रेणी की टिकट पर यात्रा कर रहा था। ठंडी रात, निशीथ क्षण और प्रकाशहीन स्टेशन पर मृत्यु के भय से काँपते हुए उस युवक का स्वयं से कथोपकथन शुरू हुआ। यह तो नियति का आह्वान है। यह तुम्हारे पुरुषार्थ पर ही निर्भर है कि तुम इस कालसिंह के शिकार बनोगे या स्वयं कालसिंह बनकर अपनी सही भूमिका को धारण करोगे। क्या नियति तुम्हें इस बहाने कोई भूमिका देना चाहती है और यह अवसर तुम्हारे लिए एक पुरुषार्थ का अवसर है। यह नियति की बली है, शेष सब कुछ और सब कोई निमित्त मात्र। फिर क्या था - इस घटना की गहरी वेदना से उस युवक को आधुनिक सभ्यता के आद्यन्त हिंस्र स्वरूप का साक्षात्कार हो गया। वह इस मामूली घटना को उसके मूलगामी स्वरूप में पहचानते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यह एक सभ्यता में गहराई से पैठे हुए महारोग का लक्षण है। यह महारोग है- हिंसा। वह अपने को संकल्पबद्ध किया कि यदि इस गहरे रोग को मिटाने की शक्ति मुझमें है, तो हमें उस शक्ति का उपयोग करना चाहिए। वह युवक इसी संकल्प को जीवन-पथ बना कर बढता ही गया और बाद में इसी युवक को दुनिया महात्मा गाँधी के नाम से जानी।
गाँधी के जीवन की इस घटना की तफसील करते हुए कोई इस बात को समझ सकता है कि एक साधारण व्यक्ति की चेतना में इसकी प्रतिक्रिया किस रूप में घटित हो सकती थी। स्वयं गाँधी एक वकील थे और इस भूमिका में वह इस घटना को अंजाम देने वाले श्वेतजातीय रेलगार्ड पर मुकदमा कर सकते थे। सरकार से हरजाना माँग सकते थे। वह एक पत्रकार लेखक भी थे और इस घटना पर दूसरे दिन अखबार में लेख लिख सकते थे। इस तरह सरकार और जनता के संज्ञान में इस अन्याय को उजागर किया जा सकता था। वह एक छोटे-मोटे नेता भी थे और इस भूमिका में नुक्कड सभाएँ कर सकते थे, ताकि जनता को इस प्रकार के दमन और अन्याय के प्रति एकजुट किया जा सके। उनके सम्पर्क भारत के वैसे कुछ नेताओं से भी थे जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सक्रिय थे। इस भूमिका में वह भारत के नेताओं को उकसा सकते थे कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ किस प्रकार का अन्याय ब्रिटिश राज द्वारा किया जा रहा है। परन्तु, उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। उनके मन पर इस घटना की कितनी मौलिक और मूलगामी प्रतिक्रिया हुई कि उन्हें एक पूरी की पूरी सभ्यता के हिंस्र स्वरूप का साक्षात्कार हो गया और उस हिंस्र सभ्यता के विकल्प में अहिंसक सभ्यता बोध में वह प्रतिष्ठित हो गए। मानो इस बोध में ही उनका व्यक्तित्वान्तरण हो गया। एक बार डॉ. जॉन मोट नाम का अमरीकी डॉक्टर जो था तो मिशनरी लेकिन गाँधी से मिलने वह सेवाग्राम आया था। उसने गाँधी से एक प्रश्न पूछा था कि आफ जीवन में घटित सबसे रचनात्मक अनुभव क्या है? तब गाँधी ने उत्तर में मेरित्जबर्ग की घटना की तफसील करते हुए कहा था कि मैं सक्रिय अहिंसा में उसी दिन प्रतिष्ठित हो गया था।11 ऋग्वेद की एक ऋचा है - तद पश्यत् तद अभवत् तदासीत्- उसने देखा, वही हो गया, क्योंकि वह वही था। व्यक्तित्वान्तरण की प्रक्रिया का गहरा संकेत इस ऋचा में अन्तर्भूत है। परन्तु गाँधी की यह सक्रिय अहिंसा क्या है? वास्तव में सक्रिय अहिंसा चेतना की वह अवस्था है जिसमें परद्रोह का सर्वथा अभाव हो। जब हमारी चेतना में परद्रोह का लवलेश भी नहीं रहता, तब अहिंसा अपने समस्त आनुषंगिक गुणों, अर्थात् प्रेम, दया, करुणा, मैत्री, क्षमा, अभय और शील इत्यादि के साथ अपने-आप सक्रिय हो उठती है। चेतना में परद्रोही भाव ही हिंसा का मूल है और उसका सर्वथा अभाव ही सक्रिय अहिंसा में प्रतिष्ठा है। भारतीय परम्परा में इस परद्रोही प्रवृत्ति को मनुष्य का इतना बडा दुर्गुण माना गया है कि जो पृथ्वी के पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ सहन करते हुए भी अपने को बोझिल नहीं महसूस करती, उससे एक परद्रोही व्यक्ति का बोझ सहा नहीं जाता।12
व्यक्तित्वान्तरण किसी घटना के निमित्त अचानक ही घटित होती है। जब ऐसा घटित होता है, तो फिर वह व्यक्ति उस बोध अथवा सत्य से कभी स्खलित या च्युत नहीं होता जिसका वह इस घटना के निमिश्र साक्षात्कार किया रहा होता है। यह बात सही है कि ऐसा सबके साथ घटित नहीं होता। उन्हीं विरले व्यक्तियों के साथ ऐसा होता है जिनमें पात्रता होती है। उनके जीवन में पहले से ही इस प्रकार के कुछ लक्षण दिखाई पडते हैं। यहाँ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सभी व्यक्तित्वान्तरित व्यक्तियों का सत्य एक ही नहीं होता। अलग-अलग सत्य में, बोध में उनका व्यक्तित्वान्तरण हुआ करता है। गाँधी का व्यक्तित्वान्तरण आधुनिक सभ्यता के सांगोपांग हिंस्र स्वरूप और उसके विकल्प में उन्मीलित अहिंसक सभ्यता के बोध में हुआ माना जा सकता है। उनके सम्पूर्ण जीवन में इसी बोध को रूपायित और चरितार्थ होते देखा जा सकता है। मानो यही उनके जीवन का नियोग बन गया। यहाँ नियोग का तात्पर्य एक ऐसी बोध-भूमि से है जो किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण क्रियाकलापों को अपलक रूप से उत्प्रेरित करती है। यहाँ यह भी समझने की बात है कि व्यक्तित्वान्तरण के पश्चात्् उस व्यक्ति का विकास होता है अथवा उसके भावी जीवन को अभिव्यक्तिकरण अथवा प्रकटीकरण की प्रक्रिया में देखा-समझा जाना चाहिए। वास्तव में होता तो प्रकटीकरण ही है, लेकिन दुनिया अपने नजरिये से उसे विकास समझती है। यदि दुनिया के इस नजरिये को मान भी लिया जाए, तो भी इतना तो मानना ही पडेगा कि विकास भी उसी बोध-भूमि पर होता है जिस बोध में उस व्यक्ति का व्यक्तित्वान्तरण घटित हुआ रहता है।13
व्यक्तित्वान्तरण के पश्चात्् उस व्यक्ति में कुछ ऐसी विशिष्टताओं का उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है जो साधारण व्यक्तियों में नहीं होती। इन्हीं विशिष्टताओं के कारण वह जिस सत्य में व्यक्तित्वान्तरित हुआ रहता है उसका अपने जीवन में सहज रूप से आत्मक्रियान्वयन करता है। इस सन्दर्भ में यहाँ महात्मा गाँधी की कुछ विशेषताओं का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा जो संयुक्त रूप से उन्हें अद्वितीय बनाती हैं। उनकी पहली विशेषता है - एक आदर्श मानव-जीवन की कल्पना के अनुसार अपने आन्तर और बाह्य जीवन के नियोजन में नितान्त निर्मम दृढता। दूसरी विशेषता है - आदर्श कल्पना के अनुसार आचरण में वैयक्तिक और सामूहिक सन्दर्भों को अलग-अलग नहीं रखना। तीसरी विशेषता है - जटिल और भोगपरक जीवन-पद्धति से एक सहज वितृष्णा। चौथी विशेषता है - विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सत्य और आदर्श पर अखण्ड भरोसा। पाँचवीं विशेषता है- वाक जिगु होना। अशोक की शिलालेखों में बुद्ध को वाक जिगु कहा गया है। राम भी वाक जिगु थे। वह दो बार नहीं बोलते थे (रामो द्विर्नभाषते)। सत्य के निर्भ्रान्त बोध-भूमि पर स्थित व्यक्ति ही वाक जिगु होता है। उसकी भाषा में वाक संयम और सपाट-सटीक अभिव्यक्ति के गुण सहज ही होते हैं। महात्मा गाँधी के जीवन में इन पाँचों विशेषताओं को पूरे तौर से लागू होते देखा जा सकता है।14
ढ्ढङ्क
महात्मा बुद्ध जैसे महाभिनिष्क्रमण के पश्चात् मार्ग-सत्य की खोज में कुछ समय तक चक्रमण करते रहे वैसे ही मेरित्जबर्ग की घटना से व्यक्तित्वान्तरित हुए गाँधी आधुनिक सभ्यता के हिंस्र स्वरूप की जमीनी वास्तविकता की जाँच-पडताल के लिए 1893 से 1909 तक मानो भटकते रहे। उन दिनों ब्रिटेन को ही आधुनिक सभ्यता की राजधानी कही जा सकती है। पूरी दुनिया में आधुनिक सभ्यता के विस्तार की भूमिका में ब्रिटेन का कोई शानी नहीं है। उसके उपनिवेशों का फैलाव इतना अधिक था कि कहा जाता है- ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता और हिंसा की अग्नि भी कभी शान्त नहीं होती थी। इस दृष्टि से लन्दन का चतुर्मास प्रवास न केवल गाँधी के लिए बल्कि गाँधी को समझने की दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। आधुनिक सभ्यता की हिंस्र आत्मा का साक्षात्कार तो उन्हें पहले ही हो चुका था लेकिन लन्दन में वह उसके शरीर को भी देख सके। इस प्रवास के दौरान वह किस-किस से मिले और क्या-क्या देखा समझा, इसके विस्तार में न जाकर यहाँ केवल एक घटना का उल्लेख उन्हें समझने में उपयोगी हो सकता है। उन दिनों लन्दन में रह रहे भारतीय युवकों ने विजयादशमी के पर्व को अपनी तरह से मनाने का निश्चिय किया। रामायण पर एक संगोष्ठी के साथ-साथ प्रीतिभोज का भी आयोजन किया गया। करीब सवा सौ भारतीय नवयुवक उस आयोजन में भाग लेने वाले थे। लन्दन में रहते हुए गाँधी भी उनमें से कुछ एक से परिचित हो चुके थे। लिहाजा उन्हें भी आमंत्रित किया गया और संगोष्ठी की अध्यक्षता करने का आग्रह भी किया गया। गाँधी कुछ शर्तों के साथ आमंत्रण स्वीकार किये। शर्त यह कि भोजन निरामिष होगा। विवादास्पद मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होगी। संगोष्ठी में गाँधी के अतिरिक्त फिरोजशाह मेहता, हाजी तबीब, बी.चट्टोपाध्याय और वी.डी. सावरकर समेत पाँच वक्ता थे। सभी वक्ताओं ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए। सावरकर ने अपने जोशीले भाषण में रामायण की कथा का आश्रय लेकर हिंसा-दर्शन का समर्थन किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि शक्ति पूजा के उपरान्त ही राम को रावण पर विजय प्राप्त हुई थी। अतः भारत की मुक्ति भी शक्ति-उपासना से ही सम्भव है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अहिंसा की साधना श्रेयस्कर नहीं। जब गाँधीजी बोलने के लिए खडे हुए, तो आलोचना-प्रत्यालोचना से ऊपर उठकर उन्होंने रामायण का सार-सत्य और अहिंसा की साधना में देखा और राम को सत्य, शील एवं आनृशंस की प्रतिमूर्ति बताया।15 वास्तव में गाँधी इस आयोजन में सम्मिलित होकर हिंसा के दो धडों की पहचान कर लिए थे। एक जो हिंसा की ताकत से गुलाम बनाता है और दूसरा जो उस गुलामी से मुक्ति के लिए भी हिंसा का ही सहारा लेता है। इन दोनों ही प्रवृत्तियों से अन्ततः हिंसा ही प्रतिष्ठित होती है। आजादी के नाम पर हिंसा का समर्थन करने वाले उस समय न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में फैले थे। अतः उन्हें अहिंसा के हथियार से हिंसा से लडने के लिए तैयार करना गाँधी के लिए एक बडी चुनौती थी। सम्भवतः यह गाँधी और सावरकर की अहिंसा और हिंसा के दो छोर के रूप में यह पहली मुलाकात थी।
आधुनिक सभ्यता की राजधानी ब्रिटेन और ब्रिटेन की राजधानी लन्दन में गाँधी का चतुर्मास पूरा हुआ। इसी के साथ मानो मनुष्यता को बिगाडने वालीं हिंस्र सभ्यता की पडताल पूरी हुई। वह आस्वस्थ थे, लेकिन अन्दर से बहुत निराश। 13 नवम्बर 1909 को वह किल्डोनन कैसल जहाज से दक्षिण अफ्रिका लौट रहे थे। राम-रावण युद्ध की पूर्व संध्या भी अमावश की थी।16 राम अगली सुबह होने वाले भीषण युद्ध के विषय में सोचते हुए समुद्र तट पर चिन्ता मग्न थे। वैसे ही 13 नवम्बर 1909 की तिथि भी अमावश थी। गाँधी चिन्तामग्न मनोदशा में समुद्र के ऊपर से गुजर रहे थे। राम को आसुरी सभ्यता के अधिपति रावण से लडना था। गाँधी के समक्ष शैतानी आधुनिक सभ्यता से लडने की चुनौती थी। विचारमग्न गाँधी उच्छवास भरते हुए जहाज के डेक के भीतर दौड पडे। मानो चेतना में घनीभूत विचार वाग्-विग्रहित होने के लिए व्याकुल हो उठे। अन्दर पडे मेज-कुर्सी को जैसे-तैसे सहेजा। आसपास पडे स्टेशनरी पर अपने विचारों को कलमबद्ध करना शुरू कर दिया। विचारों की तीव्रता इतनी अधिक कि उन्हें कलमबद्ध करते हुए जब दायाँ हाथ थक गया तो बायें हाथ से ही सही, लेकिन लिखने का प्रवाह जारी रहा। कृष्णपक्ष की अमावश्या को आरम्भ हुआ यह लेखन शुक्लपक्ष की नवमी को सम्पन्न हुआ। स्टेशनरी के कुल दो सौ पचहत्तर पृष्ठों की पाण्डुलिपि तैयार हुई। इसमें चालीस पृष्ठ बाँए हाथ से लिखा गया था। इसी कृति को दुनिया हिन्द स्वराज के नाम से जानती है। जैसा कि इसके शीर्षक से विदित होता है, यह भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का घोषणापत्र था। यदि वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में इसे मानव मात्र की स्वतंत्रता का घोषणापत्र कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। महात्मा गाँधी आजीवन इस विश्वास से विचलित नहीं हुए कि इस घोषणापत्र में निर्दिष्ट पथ पर चलकर प्राप्त की गई भारत की स्वतंत्रता सच्ची स्वतंत्रता होगी और मानव मात्र को आधुनिक सभ्यता के मोहपाश से मुक्ति दिलाने का सौपान बन सकेगी। अपने सक्रिय और वैचारिक जीवन में उन्होंने जो कुछ भी सोचा-विचारा वह सब इसी घोषणापत्र का भाष्य है और उनके सम्पूर्ण राजनीतिक जीवन की सक्रिय ता इसी घोषणापत्र का आत्मक्रियान्वयन है। इसके बावजूद भी गाँधी का सम्पूर्ण वाङ्मय और उनका सम्पूर्ण जीवन हिन्द स्वराज का सम्पूर्ण भाष्य नहीं कहा जा सकता। एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में हिन्द स्वराज मानों एक अधूरी परियोजना है और मानव जाति सदैव उससे प्रेरणा ग्रहण करती रहेगी।
ङ्क
महात्मा गाँधी ने हिन्द स्वराज में मनुष्य को ही नहीं बल्कि मनुष्यता क बिगाडने वाली आधुनिक सभ्यता की सख्त टीका की है। इस सख्त टीका की मौलिकता इस बात में निहित है कि आधुनिक सभ्यता की हिन्दस्वराजी आलोचना उसकी आत्मा की पकडकर की गई समालोचना है। महात्मा गाँधी से पहले पहले और बाद में बहुतेरे पश्चिमी विचारकों ने भी आधुनिक सभ्यता की आलोचनाएँ की हैं, लेकिन वह सभी उसके देह की आलोचना है। देह-सन्दर्भी आलोचनाएँ देही को खारिज किये बगैर देह में आक्षिप्त विकारों के प्रक्षालन का प्रस्ताव भर होती हैं। लेकिन आत्मा-सन्दर्भी आलोचना देही को ही सिरे से खारिज करती है। यही कारण है कि आधुनिक सभ्यता का देह जैसे-जैसे विस्तारित हो रहा है, वैसे-वैसे आधुनिकता की हिन्दस्वराजी आलोचना के अन्तरार्थ दुनिया के सामने खुलते जा रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि स्वयं आधुनिकता अपने साभ्यतिक विन्यास में अन्दर से उठ रहे हरमेन्युटिकल क्वेश्चन्स के प्रति आत्मचेतन नहीं है? उसे अपने अन्तर्निहित विकारों की आत्मचेतना है। परन्तु उसकी पद्धति ही ऐसी है कि वह अस्तित्वात्मक समस्याओं का सदैव अनुभवमूलक समाधान ही खोजती है। वह भी ऐसा समाधान जो अपने आप में किसी समस्या का एक प्रतिविधान हुआ करती है। महात्मा गाँधी का हिन्दस्वराज आधुनिक सभ्यता के दोशों का समाधान नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक सभ्यता बोध के द्वारा उसका निदान प्रस्तुत करता है। अपने इस वैकल्पिक सभ्यता बोध की रूपरेखा उन्होंने ग्राम स्वराज के रूप म प्रस्तुत की है। यह ग्राम स्वराज कोई बैलगाडी के युग में लौटना नहीं है और न ही यह कोई गवारों की गँवई जीवनशैली है जिसे पिछडेपन का पर्याय माना जाता है। वास्तव में यह आत्मपूरित ग्राम स्वराज है। ग्राम स्वराज म आत्मपूरित (सेल्फ कन्टेंड) विशेषण लगाकर एक ओर उन्होंने देहवासना की सम्पूर्ति में निरत आधुनिक ऐन्द्रिक सभ्यता की जीवन दृष्टि का विलोम प्रदर्शित किया है, तो दूसरी ओर उसके अनुलोम अर्थ में सनातन भारत के जीवन-दर्शन को एक वैकल्पिक सभ्यता बोध के रूप म प्रस्तावित किया है।17 अतएव यह कहना उचित होगा कि महात्मा गाँधी के हिन्द स्वराज का मन-मस्तिष्क आधुनिक सभ्यता के हिंस्र स्वरूप की मूलगामी आलोचना है, जबकि उसका हृदय अहिंसक सत्यान्वेषी भारत का आत्मप्रकाशित धर्म-बोध है। वास्तव में मन-मस्तिष्क आौर हृदय की इसी युति का सन्धारक महात्मा सनातन गाँधी है।
सन्दर्भ एवं पाद टिप्पणी -
1. द्रष्टव्य, स्पालडिंग प्रोफेसर ऑफ इस्टर्न रेलिजन एण्ड एथिक्स एवं विश्व प्रसिद्ध धर्म वैज्ञानिक रॉबर्ट चार्ल्स जेनर की पुस्तक हिन्दुइज्म का 8 वां अध्याय युधिष्ठर रिटर्नस, ऑक्स युनिवर्सिटी प्रेस, 1962, 1966।
2. जोसेफ लेलीवेल्ड, ग्रेट सोलः महात्मा गाँधी एण्ड स्ट्रगल विद इण्डिया नई दिल्लीः हार्पर कालिन्स, 2011, पृ0 22।
3. जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपिता, सस्ता साहित्य मण्डल, प्रकाशन, नई दिल्ली, 8 वां संस्करण, 2013, पृ0 107।
4. सुधीर चन्द्र, गाँधी एक असम्भव सम्भावना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति 2014।
5. 22 जुलाई 1944 को गोडसे ने ऐसा प्रयास किया था, लेकिन भीड म ही पकड लिये जाने क कारण वह अपनी योजना में सफल नहीं हो पाया था।
6. इसका जिक्र रोम्यां रोला की डायरी (17.01.1924) में है। देखें, रोम्यां रोला एण्ड गाँधीः कोरेस्पोंडेंस, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, दिल्ली, पृ0 20, 1976।
7. इस घटना का उल्लेख नारायण देसाई अपनी बापू कथा में बडे ही मार्मिक ढंग से करते थे।
8. इस बात के मर्म को इस उदाहरण के द्वारा अच्छी तरह से समझा जा सकता है। सिद्धार्थ गौतम भी अपनी पत्नि और बच्चे को छोड गृहत्याग किए थे और पॉल गॉगिन भी ऐसा ही किया था। परन्तु दोनों एक ही प्रकार के कर्म चेतना की दो भूमियों पर स्थिर होकर किए थे। इसीलिए गौतम का मूल्याँकन दुनिया बुद्ध के रूप म करती है, जबकि गॉगिन का मूल्याँकन वैसा नहीं किया गया।
9. द्रष्टव्य, रोम्यां रोला एण्ड गाँधीः कोरेस्पोंडेंस, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1976, पृ0 20।
10. आचार्य शंकर की लघु कृति मनीषा पंचक इसी वृतान्त पर निबद्ध रचना है।
11. कृष्ण कृपलानी, गाँधीः एक जीवनी, हिन्दी अनुवाद, नरेश नदीम नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, सम्पूर्ण संस्करण 1997, पृ0 19।
12. रामचरितमानस, बालकांड, 183/3, गिरि सरि सिंधु भार नहीं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।
13. गाँधी ने अपने कुछ वक्तव्यों में अपने विकास की बात की है जैसे वे कहते हैं कि (हरिजन बंधु, 30.04.1993) उमर से मैं भले बूढा हो गया हूँ, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा आन्तरिक विकास होना बंद हो गया है या देह छूटने के बाद मेरा विकास बंद हो जाएगा। मुझे एक ही बात की चिन्ता है, और वह है प्रतिक्षण सत्य-नारायण की वाणी का अनुसरण करने की मेरी तत्परता। इस वक्तव्य का गूढार्थ आन्तरिक विकास, देह छूटने के बाद भी विकास और सत्य-नारायण की वाणी को सुनने की तत्परता है। इन तीनों बातों से विकास का अन्तरार्थ एक विशेष बोध भुमि पर विकसित होना है। इस प्रकार की विकसन प्रक्रिया में पूर्व-पूर्व की अपेक्षा उत्तर-उत्तर की प्रामाणिकता अधिक होती है (मुनीनां उत्तरोत्तर प्रमाण्यम्)। इसीलिए गाँधी ऐसा भी कहते हैं कि किसी पाठक को मेरे दो लेखों म विरोध जैसा लगे, तब अगर उसे मरी समझदारी में विश्वास है, तो वह एक ही विषय पर लिखे हुए दो लेखों में मरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने।
14. महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व की इन विशिष्टताओं में से कुछ का उल्लेख यशदेव शल्य न भी किया है। द्रष्टव्य, समसामायिक चिन्ताएँ, पृ. 3, राका प्रकाशन, इलाहाबाद, 2004।
15. इस संगोष्ठी का उल्लेख और विश्लेषण मनोज कुमार राय ने अपनी पुस्तक हिन्दस्वराजः अमित अरथ आखर अति थोरे में सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया है, पृ. 45-46, लोकायत प्रकाशन, वाराणसी 2015।
16. राम-रावण युद्ध की पूर्व संध्या अमावश की थी, इसका संकेत महाकवि निराला की राम की शक्ति पूजा नामक कविता के इस अंश से विदित होता है-
है अमानिषा, उगलता गगन धन अन्धकार;
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन चार
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल
भुधर ज्यों ध्यान-मग्न; केवल जलती मशाल।
17. यह कोई संयोग नहीं कि आधुनिक सभ्यता क विकल्प म वह सभ्यता बोध जो महात्मा गाँधी के चिन्तन में उन्मीलित हुआ था, उसके बहुतेरे आधारभूत सूत्र वाल्मीकि रामायण में अक्षरशः प्राप्त होते हैं। इस पृष्ठभूमि म गाँधी को समझना वास्तव में सनातन गाँधी को परखना है। साधारणतः ऐसा समझा जाता है कि सत्य ही ईश्वर है महात्मा गाँधी के चिन्तन का मौलिक आधार वाक्य है। परन्तु द्वितीय धर्मराज (सत्ये धर्म इवापरः) राम का आदर्श भी यही ह कि इस लोक म सत्य ही ईश्वर है (सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्म सदाश्रितः, रामायण, अयोध्या कांड, 109/13)। पुनः साध्य-साधना की पवित्रता का सिद्धान्त महात्मा गाँधी के चिन्तन का दूसरा मौलिक सूत्र है। परन्तु साध्य-साधन-विवेक के सम्यक प्रयोक्ता राम ही रहे हैं। सत्य साध्य की सिद्धि सत्य साधनों से ही करने में उनकी दृढ निष्ठा रही है। यह सत्यप्रतिश्रव राम की अटल प्रतिज्ञा है (सत्य प्रतिश्रवः सत्यं सत्येन समयीकृतम्, रामायण अयोध्या कांड, 109/16)। यह भी माना जाता है कि राजनीति में सत्य और अहिंसा का सफल प्रयोग करने की दृष्टि दुनिया भर में महात्मा गाँधी की मौलिक सूझ रही है। परन्तु आश्चर्य है कि राम की राजनीति भी सत्य और अहिंसा की संधारक राजनीति रही है। उनकी घोषणा है कि सत्य और आनृशंस ही सनातन राजवृत्त है, इसलिए राज्य को भी सत्यात्मक होना चाहिए (सत्यमेवानृषंसं च राजवृत्तं सनातनम्। तस्मात् सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोक प्रतिष्ठितः।। रामायण, अयोध्या कांड, 109/10)। इसी तरह महात्मा गाँधी के चिन्तन के अन्यात्य सूत्रों को महाभारत और गीता में भी खोजे जा सकते हैं। वस्तुतः रामायण और महाभारत ही दो ऐसे महाकाव्य हैं जो भारत के सनातन जीवन-दर्शन को सम्पूर्णता में प्रस्तुत करते हैं। अतः सनातन गाँधी को रामायण के सत्य और महाभारत के धर्म से वियुक्त कर भला समझा भी कैसे जा सकता है?
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सम्पर्क - दर्शनशास्त्र विभाग
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)
मो. ९४०६५१९४९८