fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

गाँधी-नेहरू संवाद : आधुनिक परियोजना के लिए अनिवार्य संसाधन

पुरुषोत्तम अग्रवाल
अपने ज्ञान पर जरुरत से अधिक यकीन करना मूर्खता है। यह याद दिलाना ठीक होगा कि सबसे मजबूत कमजोर हो सकता है और सबसे बुद्धिमान गलती कर सकता है।
- महात्मा गाँधी
1
बहुत-से लोगों का मानना है कि गाँधीजी भारतीय, विशेषकर हिन्दू परंपरा में सहज रूप से स्थित थे, जबकि नेहरू को इस परंपरा की कोई परवाह नहीं थी। एक निहायत ही बेतुका वक्तव्य नेहरू के साथ चिपका दिया गया है, और बहुत से नेकदिल लोग भी इस चिपकाहट को स्वीकार किए बैठे हैं। आपने भी यह सुना ही होगा कि नेहरू कहते थे, मैं शिक्षा-दीक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुसलमान और हिन्दू तो बस एक्सिडेंट से हूँ।
मैं यह दावा तो नहीं कर सकता कि मैंने नेहरू का लिखा-बोला एक शब्द पढा है, लेकिन यह जरूर है कि बहुत पढा है नेहरू के बारे में और उनका अपना लिखा-बोला। सत्रह साल पहले, जनसत्ता में अपने कॉलम मुखामुखम में नेहरू के बारे में पहली बार ठीक से लिखा था, उसके बाद पिछले पाँचेक साल से तो काफी ध्यान से नेहरू और उनके समय को समझने की कोशिश की है। पिछले बरस प्रकाशित पुस्तक, हू इज भारत माता इसी कोशिश का नतीजा है।
नेहरू के लिखे-बोले में कहीं भी यह वाक्य मुझे नहीं मिला।
असल में यह वाक्य नेहरू के नाम पर चिपकाया था, हिन्दू महासभा के नेता एन.बी. खरे ने सन् 1950 में। यह बात नेहरू के कई जीवनीकारों ने नोट भी की है, इन जीवनीकारों में, इस समय भाजपा के नेता एम.जे. अकबर भी शामिल हैं। ( नेहरू : दि मेकिंग ऑफ इंडिया, रोली बुक्स, नयी दिल्ली, 2002, पृ. 27.)
एल्ट न्यूज नामक पोर्टल ने इस वाक्य को चिपकाए जाने की गंभीर पडताल की है, और इसका स्रोत असंदिग्ध रूप एन.बी. खरे को पाया है। (https://www.altnews.in/did-jawaharlal-nehru-ever-say-i-am-english-by-education-muslim-by-culture-and-hindu-by-accident/)
सांप्रदायिक और दक्षिणपंथी, पीछे देखू सोच नेहरू के निधन के इतने अरसे बाद भी उनके पीछे क्यों पडी रहती है, यह अपने आप में महत्त्वपूर्ण सवाल है, इसका उत्तर खोजने की कोशिश मैंने हू इज भारत माता की प्रस्तावना में की है। लेकिन, गाँधीजी के साथ नेहरू के संवाद को असाध्य मतभेद के रूप में देखना और नेहरू को तरजीह देने को गाँधीजी की भयानक भूल मानना केवल सांप्रदायिक दक्षिणपंथियों तक सीमित नहीं है। ऐसा मानने वालों में कुछ गाँधीवादी भी शामिल हैं, कुछ अध्येता भी तो कुछ लिबरल टिप्पणीकार भी।
यह संक्षिप्त लेख इसी सवाल तक सीमित है कि गाँधीजी और जवाहरलालजी एक-दूसरे से साझी भावभूमि पर संवाद कर रहे थे, या एक दूसरे को गलत साबित करने के लिए विवाद?
2
कहा जाता है कि गाँधीजी के विपरीत नेहरू कुछ अधिक ही आधुनिक थे और इस वजह से भारत और भारतीय जनता को समझ नहीं सके। मजेदार बात यह है कि दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक ही नहीं गाँधीजी की मेधा के जबर्दस्त रूप से कायल होने का दावा करने वाले गाँधीप्रेमी यह भी मान लेते हैं कि गाँधी इतने भोले थे, या जवाहर के मोह से इतने ग्रस्त थे कि इतने असाध्य मतभेदों के बावजूद जवाहरलाल नेहरू को पुरजोर ढंग से अपना उत्तराधिकारी घोषित कर गये।
बात 25 जनवरी 1942 की है। वर्धा में एआईसीसी की बैठक में गाँधीजी ने दो टूक घोषणा की, न तो राजाजी, न सरदार, मेरा उत्तराधिकारी होगा जवाहर..। इस घोषणा का संदर्भ था, कांग्रेस के बडे नेताओं के बीच तीखा विवाद जो कुछ ही दिन पहले बारदोली में, कार्यसमिति की बैठक में हुआ था। विवाद का विषय था, उस समय प्रस्तावित आंदोलन (जो भारत छोडो आंदोलन के नाम से जाना गया) की रणनीति। नेहरू का स्पष्ट कहना था कि छुटपुट हिंसक घटनाओं के कारण समूचे आंदोलन को स्थगित करने की वह गलती दोहाराई नहीं जानी चाहिए, जो असहयोग आंदोलन के समय, चौरी-चौरा कांड के बाद की गयी थी। इस आग्रह को गाँधीवादी सोच के सीधे नकार के रूप में देखा गया और बाकी नेताओं तथा नेहरू के बीच तीखी झडपें हुईं। गाँधीजी स्वयं इस बैठक में नहीं थे, लेकिन कार्यकारिणी के प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के लिए वर्धा में आयोजित एआईसीसी में उन्होंने अपनी राय रखी, और रेखांकित किया कि आखिरकार यह प्रस्ताव सभी नेताओं की समझ के आधार पर बनी आम राय को ही व्यक्त करता है, और नेहरू की बात को अहिंसा विचार के नकार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने बाकायदा उन नेताओं के नाम लिये जिन्हें कुछ लोग नेहरू की तुलना में गाँधीजी के अधिक निकट मानते थे, अब तो और ज्यादा मानते है। गाँधीजी ने स्पष्ट किया कि उनके उनके उत्तराधिकारी तो नेहरू ही होंगे, सरदार पटेल या राजगोपालाचार्य नहीं। गाँधीजी का यह पूरा भाषण भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित कलेक्टेड वर्कस ऑफ महात्मा गाँधी के इक्यासीवें खंड में संकलित है। इसे आप हू इज भारत माता में भी पढ सकते हैं।
यहाँ गयारह साल पहले के कराची कांग्रेस के प्रस्ताव को याद कर लेना भी बाजिब होगा। यह प्रस्ताव भारतीय संविधान की भाव-भूमि और वैचारिक दिशा का पूर्वाभास देता है। इसमें स्वाधीन भारत की सरकार के सर्वधर्म समभावी होने के साथ ही, छुआछूत उन्मूलन, लैंगिक समानता, काम के घंटों के नियमन, लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा आदि की भी बातें रेखांकित की गयी हैं। इसका मसौदा नेहरू और बोस ने मिल कर तैयार किया था, और सरदार पटेल की अध्यक्षता में इसे पेश किया था गाँधीजी ने। इस बात को याद रखें, तो हम समझ सकते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं के मतभेद किसी सत्ता-लिप्सा या ओछेपन से नहीं जन्मे थे। वे एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे सहयोगियों के सच्चे मतभेद थे, जिनमें आम राय की संभावना भी थी, और दूसरे के तर्क से प्रभावित होकर मतांतरण की भी।
विडंबना यह है कि गाँधी-नेहरू मतभेदों को मन-मुटाव का रूप देने के लिए कुछ अध्येता स्वयं गाँधीजी पर सत्ता-लिप्सा का आरोप लगाने की हद तक जाने में संकोच नहीं करते। स्टेलने वोल्पार्ट ने गाँधीज पैशन (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, 2002) शीर्षक से गाँधीजी की जीवनी लिखी है। उनकी व्याख्या है, कि जब गाँधीजी कहते थे कि किसी हरिजन लडकी को भारत का राष्ट्रपति होना चाहिए और वे स्वयं उसके सचिव का काम करेंगे, तो आशय यह था कि उन्हें गवर्नर जनरल बनाया जाए! नेहरू और पटेल ने जानबूझ कर गाँधीजी की इस आकांक्षा की उपेक्षा की। स्वाभाविक रूप से वोल्पार्ट के निशाने पर पटेल से भी ज्यादा नेहरू हैं, फरमाते हैं कि चूँकि गाँधी मानते थे कि जिन्नाह नेहरू से बेहतर प्रधानमंत्री होंगे, इसलिए नेहरू ने उन्हें कभी माफ नहीं किया और अड गये कि किसी सूरत में गाँधी भारत के राजप्रमुख ( हैड ऑफ स्टेट) न बनने पाएँ। (देखें, पृ. 246-49)
यह बिल्कुल सही है कि गाँधीजी आजकल के कुछ एनजीओ प्रेरित नेताओं और बुद्धिजीवियों की तरह यह कतई नहीं मानते थे कि सत्ता या शक्ति अपने आप में जहरीली होती है। वे जानते थे कि सामाजिक परिवर्तन एक तरह की शक्ति-साधना भी है। लेकिन वे यह भी जानते थे कि राजसत्ता ही शक्ति का एकमात्र रूप नहीं है। गाँधीजी ने जिस तरह की नैतिक शक्ति-साधना की, उसका मर्म वोल्पार्ट से कहीं बेहतर गाँधीजी के हत्यारे ने समझा था, जो जानता था कि इस आदमी का नैतिक प्रभाव अकाट्य है। गाँधीजी को वैचारिक और नैतिक रूप से परास्त करना उसके लिए असंभव था। गाँधीजी की हत्या गोडसे के फासिस्ट प्रोजेक्ट की नैतिक और बौद्धिक दरिद्रता का सबसे बडा प्रमाण है।
वोल्पार्ट जैसी व्याख्या करते हैं, वैसी ही व्याख्याओं से त्रस्त होकर नीत्शे ने कहा होगा कि किसी टेक्स्ट की ऐसी भी व्याख्या संभव है कि टेक्स्ट तो गायब हो जाए, बस व्याख्या ही व्याख्या बची रह जाए।
खैर, गाँधीजी के लिए परंपरा में स्थित होने या भारतीयता से जुडे होने का अर्थ पश्चिम का पूर्ण नकार हरगिज नहीं था; उन्होंने अभारतीय टॉल्स्टॉय, रस्किन और निस्संदेह ईसामसीह के प्रति अपनी कृतज्ञता को कभी छुपाया नहीं। जब गाँधी की अहिंसा पर अभारतीय होने के आक्षेप लगाए गये, उन्होंने दोटूक कहा, मुझे इस बात पर कोई शर्म नहीं होगी, अगर किसी को मेरी अहिंसा मेरी पश्चिमी शिक्षा का परिणाम लगे। मैं न तो सभी पश्चिमी विचारों को त्याज्य मानता हूँ और न ही पश्चिम से आने वाली हर चीज को अनिवार्यतः अशुभ। (यंग इंडिया, 11 अक्तूबर, 1928, राजमोहन गाँधी द्वारा उद्धृत, मोहनदास : ए ट्रू स्टोरी ऑफ ए मैन, हिज पीपुल एंड ऐन एंपायर, पेंग्विन, दिल्ली, 2006, पृ. 318)।
गाँधी और नेहरू ही नहीं, स्वाधीनता आंदोलन के किसी भी नेता या विचारक की बौद्धिक निर्मिति में पश्चिमी विचारों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। गाँधी और नेहरू ही नहीं, सुभाष बोस और सरदार पटेल भी इंग्लैंड से ही पढ कर आए थे। जो इंग्लैंड नहीं गये थे, उन्होंने भी शिक्षा पश्चिमी ढंग पर बने संस्थानों में ही प्राप्त की थी। असली सवाल यह है कि उस शिक्षा से जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया, उस पर तर्क और विवेक के साथ विचार किया या नहीं? अपने समाज की समस्याओं को समझा या नहीं? भारतीय बौद्धिक परंपरा और जीवन-दृष्टि से से सार्थक संवाद का रिश्ता बनाने की कोशिश की या नहीं? ध्यान रहे कि भारतीय का अर्थ केवल वैदिक या ब्राह्मण परंपरा तक सीमित नहीं रह सकता। भारतीय में वैदिक ही नहीं, बौद्ध और जैन चिंतन परंपरा और जीवन-दृष्टि भी शामिल है। और भी महत्त्वपूर्ण बात यह कि भारतीय का अर्थ केवल प्राचीन नहीं होता। अंग्रेजी राज स्थापित होने के ठीक पहले का भारतीय समाज बौद्धिक रूप से विपन्न समाज नहीं था। भारतीय मेधा की अभिव्यक्ति केवल संस्कृत में ही नहीं, देशभाषाओं में भी हुई है। देशभाषाओं में सुरक्षित बौद्धिक विरासत को नकार कर भारतीय मेधा का बोध असंभव है। कबीर, जायसी, तुलसीदास, मीरांबाई, नरसी मेहता, अक्क महादेवी, ज्ञानेश्वर, तुकाराम आदि में से किसी ने भी संस्कृत में रचना नहीं की है, और इनमें से किसी ने भी केवल प्राचीन संस्कृत या अरबी-फारसी ज्ञानकांड का हिन्दी, मराठी, गुजराती आदि में अनुवाद भर भी नहीं किया है। तुलसी कृत रामचरितमानस हो या सरलादास कृत महाभारत, वे केवल संस्कृत में उपलब्ध कथा के अनुवाद नहीं हैं। देशभाषाओं में रचने वाले निस्संदेह परंपरा से संवाद कर रहे थे, लेकिन अपने मौलिक सोच के साथ, अपने विशिष्ट योगदान के साथ। दूसरे शब्दों में,स्वाधीनता आंदोलन के दौर में, और आज भी जिस भारतीय मेधा से संवाद की जरूरत थी, और है, उसकी निर्मिति में वाल्मीकि, व्यास, बुद्ध, महावीर ही नहीं, कबीर जायसी, मीरां और नानक का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। भारतीय चित्त प्राचीन काल के बाद निस्तेज होकर नहीं बैठ गया था, उसकी सोच का एक महत्त्वपूर्ण (संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण, लेकिन उपेक्षित) पडाव आरंभिक आधुनिक काल भी था।
गाँधी और नेहरू दोनों इस बात का मर्म अपने अपने ढंग से समझते थे। गाँधीजी के चित्त और संस्कार के निर्माण में नरसी मेहता और मीराबाई के योगदान को कौन नकार सकता है? गुजराती और हिन्दी के भक्त कवियों को उन्होंने गीता के पहले पढा था। गीता उन्होंने अंग्रेजी में पहले पढी थी, संस्कृत में बाद में।
नेहरू ने स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सेदारी के साथ ही अध्ययन व मनन-चिंतन के जरिए भारतीय होने के मायने की खोज की-डिस्कवरी ऑफ इंडिया (हिन्दुस्तान की कहानी) लिखी गयी अहमदनगर जेल के दिनों में, लेकिन वह भारतीयता के आशय की आजीवन खोज की परिणति थी। इस खोज के दौरान उपजे संदेह, प्रश्न और विचार डिस्कवरी ऑफ इंडिया में ही नहीं, नेहरू के अनेक लेखों, पत्रों, उनकी आत्मकथा और ग्लिम्प्सेजि ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री (जेल में रहते हुये अपनी किशोर वय पुत्री इंदिरा प्रियदर्शिनी को लिखे गये अद्भुत ज्ञानवर्धक पत्रों का संग्रह) में बिखरे हुए हैं। जब उन्होंने अप्रैल-सितम्बर, 1945 में अहमदनगर किले की जेल में पाँच महीने बिताए और इस दौरान डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखी, तब तक उनके विचार तमाम प्रश्नों, प्रति प्रश्नों और नवीन जानकारियों के साथ भारतीय सांस्कृतिक अनुभव पर परिपक्व हो चुके थे। भारत की खोज नामक पुस्तक असल में नेहरू की भारत-संकल्पना की व्यवस्थित अभिव्यक्ति है। यह संकल्पना केवल बौद्धिक आयास से नहीं, भारतीय जनमानस के साथ सतत संवाद से निर्मित हुई है। दूसरी ओर, इस जनमानस में नेहरू की अब तक बनी हुई उपस्थिति भारतीय जनजीवन के वास्तविक मुहावरे के साथ उनके गहरे संवाद की ही परिणति है। इस मुहावरे को नेहरू सहज रूप से जीते थे; उन्हें अपनी भारतीयता का ढोल पीटने की जरूरत नहीं पडती थी, यह संवाद उनके जीवन में और शब्दों में, उनके विट में बोलता था।
एक बार जब नेहरू बिहार में थे, तो उनकी एक पब्लिक मीटिंग में भीड का उत्साह उपद्रव का रूप ले रहा था। बाबू जगजीवनराम ने अपने स्वागत वक्तव्य में नेहरू का स्वागत करते हुए कहा, महात्मा बुद्ध और सम्राट अशोक के बिहार में पंडितजी का स्वागत है। भीड के उत्साही उपद्रव से चिढ चुके नेहरू ने अपना भाषण यह कहते हुए शुरु किया : बाबूजी ने मेरा स्वागत बुद्ध और अशोक के बिहार में किया है, लेकिन आप लोगों की हरकतों से तो लगता है कि मैं जरासंध के मगध में आ गया हूँ।
इस विट की मार वे समझ सकते हैं जो जरासंध की कथा से वाकिफ हैं। आप चाहें तो इसकी तुलना इन दिनों के एक महान हिन्दुत्ववादी नेता के इतिहास-ज्ञान से कर सकते हैं जिन्होंने एक चुनावी भाषण में सिकंदर को पाटलिपुत्र तक पहुँचा दिया था, ताकि कम से कम चुनाव के दौरान, बिहार के लोग यह सुख प्राप्त कर सकें कि उन्होंने ही सिकंदर को परास्त कर भारत से भगाया था। नेहरू की भारत-संकल्पना की निर्मिति में गाँधीजी, टैगोर, मौलाना आजाद, राजाजी, सरदार पटेल, आचार्य नरेन्द्रदेव जैसे सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श और विश्व इतिहास तथा विचार-परंपरा के व्यापक अध्ययन के साथ भारत भर के आम लोगों के साथ नेहरू के गहरे, सतत संफ का भी बेहद मानीखेज योगदान है। सबसे महत्त्वपूर्ण है गाँधीजी के साथ नेहरू का सतत संवाद। इस संवाद को कुछ लोग भारतीय परंपरा और पश्चिमी आधुनिकता के बीच विवाद के रूप में भी देखते हैं। सवाल यह है कि क्या गाँधीजी ने भारतीय परंपरा को और नेहरू ने पाश्चात्य आधुनिकता को जस का तस अपना लिया था?
इस पर विचार करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। सबसे पहले तो यह कि बिना परंपरा के कोई आधुनिकता नहीं होती, और हर परंपरा में आधुनिकता की संभावना होती है। दूसरी बात यह कि परंपरा कोई किसी खास वक्त में जमी रह गयी बर्फ नहीं, बल्कि एक निरंतरता होती है, इसीलिए उसे परंपरा कहते हैं, इसी अर्थ में वह इतिहास से अलग होती है। राखी का त्यौहार कब से मनाया जाता है, यह इतिहास का प्रश्न है, हम राखी का त्यौहार मनाते हैं, यह परंपरा है। निरंतरता में चुनाव का सवाल हमेशा बना रहता है। पुरखों की हर रीत हर समयखंड के लिए मान्य परंपरा हो, यह जरूरी नहीं। दुनिया भर के अनुभवों और ज्ञान से बने विवेक के आधार पर तय किया जाना चाहिए कि परंपरा में क्या मान्य होगा क्या नहीं। यह भी सच है कि जिसे कई बार पुरखों की रीत मान लिया जाता है, वह केवल किसी स्थिति विशेष में अपनाई गयी समझ होती है।
किसी परिवार में विवाह हो रहा था, ऐन फेरों के वक्त कहीं से एक बिल्ली आ कर मंडप में बैठ गयी। उसे भगाने में खतरा यह कि अपनी छलाँगों से विवाह सामग्री को इधर उधर न बिखेर दे, कहीं कुछ अपवित्र न कर दे। किसी समझदार बुजुर्ग ने पास पडी एक टोकरी से चुप्पे से बिल्ली को ढक दिया, फेरे संपन्न हो गए, टोकरी उठा कर बिल्ली को भगा दिया गया। कालातंर में, जिन वर महोदय के विवाह में यह हुआ था, उनके बेटे के ब्याह का दिन आया। धूमधाम से बारात लेकर पहुँचे। फेरों के समय समधी से कहा, जी, हमारे कुल की रीत है, परंपरा है कि फेरे तभी पडते हैं जब बिल्ली ढकी जाए। सो, अब झटपट एक ठो बिल्ली और एक ठो टोकरी का इंतजाम किया जाए; तभी फेरे पड पाएँगे।
गाँधीजी के बहुत से तथाकथित प्रशंसक उनके परंपरा-बोध पर अपनी यही बिल्ली-टोकरी रीत किस्म की समझ आरोपित करते हैं, और फिर नेहरू पर परंपरा की उपेक्षा का तथा गाँधी पर नेहरू के प्रसंग में नासमझी और अदूरदर्शिता का भी आरोप लगाते हैं।
गाँधीजी ने अपना परंपराबोध रोजमर्रा के जीवन से ही नहीं, अध्ययन, मनन और विवेक से अर्जित किया था। वे परंपरा के नाम पर प्रचलित हर मान्यता और व्यवहार को स्वीकार कर लेने के बजाय अपने विवेक की कसौटी पर उसे परखते थे। उनकी विवेक-प्रक्रिया भी सतत विकासमान थी यह बात उनके जीवन के हर मोड पर साफ देखी जा सकती है।
दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में साबरमती के किनारे कोचरब में अपना पहला आश्रम बनाया। आश्रम में अन्य लोगों के अलावा एक अछूत दम्पती दादू भाई और उनकी पत्नी भी थे, जो चर्मकार ढेढ जाति से थे। अछूत दम्पती की आश्रम में मौजूदगी से कस्तूरबा तक असहज थीं। गाँधी के आश्रमवासियों, समर्थकों ने भी कहा कि वो गाँधी के कार्यक्रमों से दूरी बना लेंगे, अगर अछूत दंपती आश्रम में रहा तो। आर्थिक सहयोग देने वालों ने सहयोग रोकने की धमकी तक दे डाली। परम्परावादी गाँधी ने विनम्रता से उनकी बात मानने से इंकार कर दिया, आप अपना चंदा अपने पास रखें, इस दंपती को आश्रम से निकालने का प्रश्न ही नहीं। (राजमोहन गाँधी, मोहनदास पृ. 195)। यह भी याद कर लें कि गाँधीजी की जान लेने का पहला प्रयास 25 जून 1934 को पूना में हुआ, जिसका कारण गाँधीजी का यह अपराध था कि वो परम्परा सम्मत छुआछूत के खिलाफ आन्दोलन चला रहे थे।
उस वक्त मान्य परम्परा के अनुसार तो महिला को अपने घर तक सीमित रहना चाहिये। कुछ राष्ट्रवादी, परंपरावादी विचारक आज भी यही कहते हैं कि भई, महिला की सही जगह तो घर के भीतर ही है; जबकि, गाँधी ने न केवल अपने पहले आश्रम की स्थापना और पहले सत्याग्रह-चंपारन सत्याग्रह- से शुरु कर बाद तक महिलाओं की भागेदारी को प्रत्येक सामाजिक राजनीतिक गतिविधि की प्रामाणिकता के लिये प्राथमिक शर्त बनाया। उनके अनुसार किसी भी सार्वजनिक गतिविधि की सार्थकता का एक मानक महिलाओं की भागीदारी भी था।
गाँधीजी भली-भाँति समझते थे कि परम्परा कोई ठहरा हुआ वक्त नहीं, बल्कि सतत धारा है। प्राचीन ग्रंथ और कर्मकांड का महत्त्व है, लेकिन परम्परा तो वे तभी बनते हैं, जब ऐतिहासिक रूप से विकसित होते हुए दैनिक जीवन में स्थान पा जाएँ। इस प्रक्रिया में परम्पराएँ कभी-कभी इतना बदल जाती हैं कि उनका मूल रूप ही पहचान में न आए। गाँधीजी ने भारतीय समाज की वर्चस्ववादी परम्पराओं की बजाए वर्चस्व के प्रतिरोध वाली उदार परम्पराओं से खुद को जोडा। बिना नैतिकता के मापदंड पर खरा उतरे, किसी भी परंपरा का अंधानुकरण उन्हें स्वीकार न था। उन्होंने भारतीय परम्परा को देशभाषाओं में रचे गये भक्ति साहित्य की संवेदना के माध्यम से देखा, जिसमें भारत की अपनी देशज आधुनिकता के बीज छुपे हुए थे। गुजराती भक्त नरसी मेहता का भजन वैष्णव जन हो ते ने कहिए तो उनकी सिग्नेचर ट्यून ही बन गया। (देशज आधुनिकता की अवधारणा के विस्तार के लिए देखें, मेरी पुस्तक, अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2009)।
3
भारतीयता से आशय क्या है? जिसे भारतीय परंपरा कहा जाता है, उसका विशिष्ट सार क्या है?
रेमंड श्वाब ने 1950 में, एशिया खासकर भारत के साथ यूरोप के संफ और यूरोपीय मानस पर उसके प्रभाव का गंभीर अध्ययन प्रकाशित किया। इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ का अंग्रेजी अनुवाद चौंतीस बरस बाद, 1984 में एडवर्ड सईद द्वारा लिखित प्रस्तावना के साथ प्रकाशित हुआ-यूरोप्स रिडिस्कवरी ऑफ इंडिया एंड दि ईस्ट-1660-1880। कई और महत्त्वपूर्ण बातों के साथ, श्वाब अपने यूरोपीय पाठकों को याद दिलाते हैं, भारत के सामने इतिहास ने सवाल उसी तरह के ही पेश किये थे, जैसे हमारे सामने, लेकिन भारत ने उन सवालों के जवाब अलग तरह के दिये।
श्वाब भारतीयता की जिस खूबी को रेखांकित कर रहे हैं, वह है अतिरेकों के व्यामोह से मुक्ति, सत्य के अंतिम, एकाधिकारी ज्ञान के दावों के मोह से मुक्ति। ऐसे परिपक्व बोध का श्रीगणेश ऋग्वेद से ही हो जाता है, जहाँ नासदीय सूक्त घोषणा करता है कि अस्तित्व के सभी रहस्यों का ज्ञान तो इसके अध्यक्ष तक को नहीं है। फिर बुद्ध का अतिरेकी सोच के विपरीत सम्यक का आग्रह, महावीर का अनेकांतवाद, अभिनवगुप्त का कथन कि किसी परिघटना का सम्यक वर्णन किसी एक ही तरह से नहीं होता, कई तरीके हो सकते हैं। इस बौद्धिक परिवेश ने इसलाम और ईसाइयत सरीखी एकेश्वरवादी चिंतन परंपराओं पर भी गहरा असर छोडा है, उनमें भी अन्य आस्थाओं तथा परंपराओं से सम्मानपूर्वक संवाद करने की उत्सुकता जगाई है। विधना के मारग हैं जेते/ सरग नखत, तन रोआँ जेते- आस्थावान मुसलमान जायसी का यह कथन इस उत्सुकता के अनेक प्रमाणों में से एक है। नेहरू ने हिन्दुस्तान की कहानी जिस तरह कही, उसके मारल ऑफ दि स्टोरी के तौर पर यही रेखांकित किया कि, सत्य के कई पहलू हैं, उस पर किसी एक आदमी या राष्ट्र का एकाधिकार नहीं है। (हिन्दुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, नयी दिल्ली, पृ. 771).
यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि अपनी इस पुस्तक (डिस्कवरी ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान की कहानी) में नेहरू अंग्रेजों से पहले के भारत को जड समाज या अर्थव्यवस्था मानने से साफ इंकार करते हैं, इस बात को साफ पहचानते हैं कि भारत में स्थानीय रिवाजों का बहुत महत्त्व था और अंग्रेजी राज ने बेहतरीन रिवाजों की बजाए बदतरीन को बढावा ही नहीं दिया, बल्कि उनमें से कई को कोडिफाई करके स्थायी बना दिया। वे यह भी पहचानते हैं कि जैसा दक्षिण में था, वैसा ब्राह्मण प्रभुत्व उत्तर में नहीं था। अस्राखान में भारतीय व्यापारी बसे हुए थे. यह सूचना मुझे तो पहले पहले डिस्कवरी ऑफ इंडिया पढ कर ही मिली थी। ( देखें, मेरा यात्रा-वृत्तांत, हिन्दी सराय : अस्त्राखान वाया येरेवान, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2013)।
पुरुषार्थ चतुष्ट्य ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की धारणा को रेखांकित करते हुए नेहरू उस पश्चिमी मिथ्या-प्रचार का भी खंडन करते थे, जो भारतीय संस्कृति को निरी परलोक-परक संस्कृति बताया करता था।
फिर भी, कुछ लोगों के लिए नेहरू पश्चिमीकृत हैं, भारतीय होने पर आत्मग्लानि से ग्रस्त हैं। वास्तविकता यह है कि ऐसे लोगों को चिढ नेहरू के इतिहास-बोध से नहीं, बल्कि उनकी समावेशी भारत-संकल्पना और और भविष्य-कल्पना से है। अपनी परंपरा से प्रेम का अर्थ नेहरू के लिए उसमें निहित अन्यायों को जायज ठहराना या वैदिक काल में अंतरिक्ष-यान या महाभारत में इंटरनेट जैसी अहमकाना फैंटेसियों को बढावा देना नहीं था। वे अतीत से संवाद करते थे, भविष्य के लिए सही सबक सीखने की दृष्टि से, न कि अतीत को वापस ले आने के लिए।
और इस अर्थ में कुछ मतभेदों के बावजूद गाँधी और नेहरू की भावभूमि एक ही थी। गाँधीजी का मुहाविरा जाहिर है, जुदा किस्म का था। नेहरू बुनियादी तौर से रेशनल-बुद्धि-विवेकवादी मुहावरे में बात करते थे, गाँधी आस्था-अंतरात्मा की आवाज के मुहावरे में। लेकिन न तो नेहरू का रेशनलिज्म मनुष्य को रोबो बनाने की चाह रखता था, न गाँधी की अंतरात्मा की आवाज मानवीय विवेक को खारिज करती थी। सच तो यह है कि चाहे सांप्रदायिकता के सवाल पर हो, चाहे छुआछूत के सवाल पर-गाँधीजी की अंतरात्मा की आवाज मानवीय विवेक को ही स्वर देती थी। गाँधीजी यह भी जानते थे कि गंभीर मतभेद हाँ में हाँ मिलाने वाले भक्ति-भाव से ज्यादा कीमती होते हैं। वे वादे-वादे जायते तत्वबोध का मर्म समझते थे, और यह तथ्य भी कि उनके साथ नेहरू के मतभेद किसी ओछी महत्त्वाकांक्षा से नही, बल्कि गंभीर चिंता और तीक्ष्ण प्रज्ञा से उत्पन्न हैं। आखिरकार नेहरू ने ही कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में कहा था कि भारतीय समाज में दूरगामी परिवर्तन भारतीय मेधा (इंडियन जीनियस) के हिसाब से ही होंगे।
इन दोनों के मतभेदों की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति अक्तूबर 1945 के पत्र-व्यवहार में देखी जा सकती है। गाँधी नेहरू को 1909 में लिखी गयी पुस्तक हिन्द-स्वराज की याद दिलाते हैं, नेहरू पलट कर गाँधी को याद दिलाते हैं कि स्वयं आपने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हिन्द-स्वराज में प्रस्तावित सामाजिक संगठन पर जोर नहीं दिया है। स्वाधीन भारत का मॉडल हिन्द-स्वराज नहीं हो सकता। इस पत्र-व्यवहार को वे लोग बहुत याद करते हैं जिनकी मान्यता है कि नेहरू को उत्तराधिकारी घोषित कर गाँधीजी ने भयानक भूल की।
रोचक बात यह है कि इस पत्र-व्यवहार की परिणति गाँधीजी द्वारा 13 नवंबर 1945 को लिखे गए पत्र में होती है। गाँधी स्पष्ट कहते हैं कि यदि हम दोनों के रास्ते अलग हैं तो हमें खुल कर अपने-अपने रास्ते चलना चाहिए। लेकिन, साथ ही यह भी कहते हैं कि, कल जो बातचीत हम दोनों के बीच हुई है, उससे ऐसा लगता नहीं कि हम दोनों की दृष्टि के बीच कोई बडा अंतर है। यह कहने के बाद गाँधी नेहरू के साथ कल हुई बातचीत को मिनिट करते हैं, 1. तुम्हारा कहना है कि सबसे बडा सवाल मनुष्य के आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक विकास को सुनिश्चित करना है, मेरी पूर्ण सहमति है। इस प्रक्रिया में हर व्यक्ति को समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिएँ। 2. इसके लिए गाँव और शहर में समानता जरूरी है। 3.आदर्श समूह या गाँव स्वायत्त तो हो सकता है, लेकिन परस्पर निर्भरता के व्यापक संदर्भ में ही.. (टुगेदर दे फौट : गाँधी नेहरू कारेस्पांडेंस 1921-1948 सं.उमा आयंगर, ललिता जकारिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सटी प्रेस, नयी दिल्ली, 2011, पृ. 456-7)
यह संवाद तेजी से बदलती राजनीतिक परिस्थिति के कारण व्यवस्थित रूप से जारी नहीं रह पाया, 1948 में गाँधीजी की हत्या कर दी गयी। लेकिन, गाँधीजी इस चिट्ठी में जो बात नोट कर रहे हैं, वह सही है, उनके और नेहरू के बीच औद्योगीकरण को लेकर गंभीर मतभेद थे, किन्तु देश और दुनिया की भविष्य-दिशा को लेकर दोनों की सोच में कोई बडा अंतर सचमुच नहीं था।
गाँधी की सभ्यता-समीक्षा बहुत गहरे अर्थ में मूलगामी-रेडिकल-है। लेकिन यह समीक्षा यूरोप या भारत की नहीं, उपभोग को ही जीवन का लक्ष्य मानने वाली सोच और उससे परिचालित औद्योगिक संस्कृति की है। बहुत ही रोचक बात है कि ऐन ऐसे उपभोगपरक विकास के सपने बेचने वाले, पर्यावरण-चिंताओं की खिल्ली उडाने वाले लोग गाँधी को नेहरू के बरक्स अडाते हैं, गाँधी को परंपराप्रेमी और नेहरू को परंपरा के प्रति उदासीन बताते हैं।
फिर से एकबार कहें, गाँधी परंपरा से विवेक का रिश्ता बनाते हैं, भारतीय परंपरा में विकसित हो रही देशज आधुनिकता के तत्वों को अपनाते हैं। भारतीय परंपरा के प्रति उनके लगाव को बाकी सारी सभ्यताओं पर इसे थोप देने की फैंटेसियों से जोड कर देखना गाँधीजी के प्रति भारी अन्याय है। याद रखना चाहिए कि अपने समकालीन यूरोप की औद्योगिक सभ्यता और भौतिकवादी संस्कृति की आलोचना करते हुए गाँधी यूरोप को वेद की महानता के पाठ नहीं पढाते, बल्कि ईसा मसीह के सच्चे पथ की याद दिलाते हैं।
नेहरू गाँधीजी की अंतर्दृष्टियों के मर्म को पहचानते थे। 1960 में एक लंबी बातचीत में पत्रकार आर. के. करंजिया बार-बार नेहरू-दृष्टि की बात करते हैं, और नेहरू उतने ही पुरजोर ढंग से इस बात को नकारते हैं, उनका स्पष्ट कथन है, कि नेहरू-दृष्टि जैसी कोई अलग चीज नहीं, वह गाँधीजी की दृष्टि का एक रूप है। इसी क्रम में वे करंजिया से कहते हैं कि, इस समय सबसे बडी चुनौती हमारी टेक्नॉलॉजिकल सभ्यता के सामने मौजूद आध्यात्मिक रिक्ति का सामना करने की है। (दि माइंड ऑफ मिस्टर नेहरू, जॉर्ज एलेन एंड अनविन, लंदन, 1960, पृ.25)
आज 2020 में हम समझ सकते हैं कि चुनौती की यह पहचान कितनी दूरदर्शी थी। इस आध्यात्मिक रिक्ति के ही कारण, तरह-तरह के बाजीगर दुनिया भर में लोगों का दैहिक, भौतिक और भावनात्मक दोहन कर रहे हैं। युरगन हैबरमास को याद करते हुए कह सकते हैं कि इस रिक्ति का संबंध आधुनिकता की परियोजना के अधूरेपन से है। इस परियोजना की सीमाओं को दूर करने की जरूरत है, इसे पूरी करने की जरूरत है। यह जरूरत विश्व भर की, और समाज विशेष की परंपराओं से संवाद किए बिना संभव नहीं, यह याद रखते हुए कि हर परंपरा में आधुनिकता की संभावना होती है, और बिना परंपरा के कोई आधुनिकता नहीं होती।
गाँधी-नेहरू संवाद भारतीय संदर्भ में ही नहीं आधुनिकता की विश्वव्यापी परियोजना को सही दिशा में ले जाने के लिए, इसे पूरा करने के लिए अनिवार्य संसाधनों में से एक है।
***
सम्पर्क - बी-5/ए, ग्राऊण्ड फ्लोर,
कैलाश कॉलोनी, नई दिल्ली-११००४८