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गाँधी और हमारा समय

शशिभूषण मिश्र
अहिंसा मानवता के लिए सबसे बडी ताकत हैं। यह आदमी द्वारा तैयार विनाश के ताकतवर हथियार से अधिक शक्तिशाली हैं।
- महात्मा गाँधी
हम जो कुछ करते हैं और जो कुछ कर सकते हैं, उसका अंतर मिट जाए, तो संसार की ज्यादातर समस्याओं को हल किया जा सकता है।1
- महात्मा गाँधी
मानवीय कर्तव्य और नागरिकता बोध की अनूठी संगति का नाम है गाँधी। समाज और दुनिया को अपने नैतिक पराक्रम से बदलने की उम्मीद है गाँधी। मनुष्य की गरिमा को बनाए-बचाए रखने के साथ समाज को टूटने और ढहने से बचाने का यत्न है गाँधी। आनुभविक अंतरंगता और दृष्टिपरक सम्पन्नता का साझापन है गाँधी। अदम्य साहस और उन्नत मनोबल का प्रतिमान है गाँधी। रूढिबद्ध विश्वास प्रणाली को बदलने की चेतना है गाँधी । कथनी और करनी की अभिन्नता का पर्याय हैं गाँधी। पर पीडा के आनुभूतिक प्रस्थान बिंदु है गाँधी।
दुनिया में शायद ही ऐसा कोई आन्दोलनकारी रहा हो जिसने इतने स्तरों पर एक साथ काम किया हो! मानव जाति के तमाम मुक्ति आंदोलनों में गाँधी जैसा दृष्टांत दुर्लभ है। उनके प्रयोगों में जीवन की ठोस समस्याओं के समाधान के चिह्न छिपे हैं। आज जिस मेक इन इण्डिया और स्किल इण्डिया का अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा है इन प्रयोंगों को अमल में लाने पर गाँधी बहुत पहले जोर दे चुके हैं। वह गाँवों को एक मजबूत आर्थिक इकाई के रूप में विकसित किए जाने के पक्ष में थे, लेकिन आजादी के चौहत्तर सालों बाद भी हम ऐसा नहीं कर पाए और आज गाँव से बहुत बडी जनसंख्या का पलायन बदस्तूर जारी है। इस पलायन के चलते शहरी-व्यवस्था मटियामेट हो चुकी है और हमारे शहरों में बडे बडे स्लम एरिया उभर रहे हैं। शहरों में स्लम एरिया जिस गति से बढ रहे हैं उससे शहरी नियोजन के समक्ष चुनौती बनी ही रहेगी। आज भारतीय समाज आर्थिक असमानता के जिस बिंदु पर पहुँच गया है, उसे पाट पाना संभव नहीं दिखता। इसीलिए गाँधीजी इस बात को रेखांकित करते थे कि, हमारा पूरा कार्यक्रम आर्थिक समानता की ठोस बुनियाद पर नहीं बनाया गया, तो यह रेत पर बना ढाँचा रह जाएगा। उनकी आर्थिक-दृष्टि अनुभवमूलक थी और इसी अनुभव की उपज थी- स्वदेशी की अवधारणा। इस स्वदेशी के गहरे रचनात्मक आशय हैं वह आज के राजनीतिक मुहावरे की तरह नहीं है जिसे बडे जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है। गाँधी की स्वदेशी नीति के अनुसार यदि कुटीर उद्योगों को बढावा दिया गया होता, तो आज ग्रामीण बेरोजगारी की इतना भयावह रूप न देखना पडता । ट्रस्टीशिप का विचार उनकी आर्थिक-समझ का ऐसा अवलोकन बिंदु है जिससे हम उनकी सोच की रेंज को महसूस कर सकते हैं। ट्रस्टीशिप से गाँधीजी का अभिप्राय था कि व्यापारियों और उद्योगपतियों को अपने उद्यम से लाभ कमाने के साथ उसका उपयोग समाज के सभी वर्गों के आर्थिक उन्नयन में करना चाहिए। उनके इस विचार का सम्मान करते हुए तत्कालीन उद्योगपति टाटा ने अपने सभी शेयरधारकों को ट्रस्ट में रखा था ताकि मुनाफे से कमाए गए धन का एक हिस्सा समाज के विकास में लगाया जा सके।
गाँधी की विश्वदृष्टि ने उन्हें पूरी दुनियाँ में मान्यीकृत किया। उनकी अद्भुत वैश्विक प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता के कारणों की पडताल करते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार गुहा लिखते हैं कि, वह साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलनकारी, समाज सुधारक,धार्मिक चिन्तक और एक मसीहा थे। उन्होंने दुनिया के इतिहास में सबसे ज्यादा हिंसक सदियों में से एक में विरोध के एक ऐसे अस्त्र का आविष्कार किया जो अहिंसा पर आधारित था। गौरतलब है कि अपने और पराए के भेद से परे रहने वाले गाँधी को मानने वालों की संख्या कभी घटी नहीं, बढती ही गयी। चिन्तक और इतिहासकार सुधीरचन्द्र के शब्दों में कहा जाए तो, गाँधी कितने भी आदर्शवादी या स्वप्नदर्शी क्यों न रहे हों, उनका व्यावहारिक-बोध अद्भुत था। अद्भुत इसलिए कि जहाँ और लोग अपने समय की व्यावहारिकता की सामान्य समझ से ही संभव-असंभव का भेद निर्धारित कर लेते थे और उसी के आधार पर अपनी योजनाएँ और रणनीति बनाते थे, गाँधी बिलकुल नयी और उस समय तक अकल्पनीय संभावनाओं को भी सूँघ लेते थे। 2
गाँधी औपनिवेशिक व्यवस्था की नीतियों और खामियों को तो देख ही रहे थे उस आंतरिक उपनिवेशन की प्रक्रिया को भी देख रहे थे जिसकी जडें पूरे भारत में रजवाडों,जमीदारों और उनके चाटुकारों-कारिंदों के रूप में फैली थी। वह बहुत गहरे तक देख पा रहे थे कि छुआछूत और जातिप्रथा की कठोर प्रणाली वाले इस देश में गरीब-गुरबों की हालत कितनी बदतर है और अगर हमें आजादी मिल भी गयी तो क्या इस वर्ग को सही अर्थों में आजादी मिल पाएगी? इसीलिए वो अस्पृश्यता की समस्या को राष्ट्रीय धरातल पर हल करना चाहते थे। वह इस बात पर जोर देते रहे कि जब तक इस देश में अस्पृश्यता का कलंक नहीं मिटता तब तक स्वराज की प्राप्ति बहुत मुश्किल है। गाँधीवादी चिन्तक कुमार प्रशांत लिखते हैं कि, गाँधी ने जिस दिन हरिजन यात्रा निकाली उसकी तूफानी गति और दिनानुदिन बढते प्रभाव के सामने हिंदुत्व की सारी धर्मांध जमातें निरुत्तर हो गयीं। 3
गाँधी के स्वराज को समझना इतना आसान नहीं है। स्वराज गाँधी की अंतर्दृष्टि की उपज है। वह कहते थे कि, स्वराज तो सबको अपने लिए पाना चाहिए। दूसरे लोग जो स्वराज दिला दें, वह स्वराज नही परराज्य है । इसलिए सिर्फ अंग्रेजों को बाहर निकाला कि आपने स्वराज पा लिया, ऐसा अगर आप मानते हो तो वह ठीक नहीं है।4 उनका स्वराज समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खडे आदमी के आँसू पोछने से शुरू होकर दलित-आदिवासी, मजदूर-किसान, गाँव, राष्ट्र, संविधान और समूचे लोकतंत्र तक फैला है। वह स्वराज के प्रश्न को तत्कालीन औपनिवेशिक व्यवस्था के सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों और भाषायी साम्राज्यवाद से नाभिनालबद्ध मानते थे। वह कहते थे- करोडों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी..यह कितने दुःख की बात है कि हम स्वराज की बात भी पराई भाषा में करते हैं...हमें अपनी सभी भाषाओं को उज्ज्वल बनाना चाहिए। सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी चाहिए।5 वह अंग्रेजी भाषा के नहीं उसके अहंकार और श्रेष्ठता के विरोधी थे। अपनी आत्मकथा में वह लिखते हैं कि, भाषा पद्धतिपूर्वक सिखाई जाए और सब विषयों को अंग्रेजी माध्यम से सीखने-सोचने का बोझ हम पर न हो।6 मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में गाँधीजी ने जो तर्क दिए; वे इतने समावेशी हैं कि यदि इन्हें लागू किया गया होता तो आज बहुत हद तक भाषा का दलिद्दर दूर हो गया होता। आज जिस अतिवादी भाषा नीति को थोपने का विरोध किया जा रहा है उसके मूल में गाँधी के भाषा संबंधी विचारों को गंभीरता से अमल में लाने की प्रवृत्ति रही है।
गाँधी गरीब और अमीर के बीच संघर्ष के बजाए सामजिक न्याय और बंधुत्व पर बल देते थे। वह कहते थे कि, मैं इस बुनियादी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि अगर आप सचमुच कोई महत्त्वपूर्ण काम करना चाहते हैं, तो आपको तर्क से नहीं हृदय से काम लेना चाहिए। वह श्रमजीवियों के लिए सत्याग्रह को सशस्त्र क्रान्ति से ज्यादा महत्त्वपूर्ण अस्त्र मानते थे; क्योंकि यह घृणा, हिंसा और अमानवीयता रोकने वाला अस्त्र है। क्या मारकाट किसी व्यवस्था का विकल्प बन सकती है? मारकाट में विश्वास रखने वालों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि हिंसा में सबसे अधिक हताहत मासूम, निरीह और कमजोर लोग क्यों होते हैं? क्यों बर्बर और ताकतवर बच निकलते हैं! इतिहास में बात के कितने दृष्टांत हैं कि साम्प्रदायिकता और हिंसक घटनाओं में सबसे अधिक यातना बच्चों और महिलाओं को भोगनी पडी है; इसलिए इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि हिंसा मनुष्यता विरोधी होती है, वह कोमलता का विनाश करती है और घृणा फैलाती है। किसी भी सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। गाँधीजी इसीलिए आन्दोलन के दौरान और उनके अंतरालों में रचनात्मक कार्यों पर जोर देते थे ताकि उस आन्दोलन में किसी भी हाल में मनुष्यता का बोध खंडित न हो।
आज के समय में सभ्यता का जिस तरह मशीनीकरण हुआ है और जीवन जिस तरह मशीनों की गति से भाग रहा है उसमें दूसरों के लिए हमारे पास अवकाश ही नहीं रह गया है। पूछा जाना चाहिए कि केवल अपने बारे में सोचना क्या मनुष्य होने की अर्हता है? सच तो यह है कि यांत्रिक होते जीवन में अब अपनों के लिए भी जगह सिकुडती जा रही है। गाँधी इसी यांत्रिक सभ्यता के विरोधी थे। विदेशी प्रवास के दौरान उन्होंने बहुत गहरे तक महसूस कर लिया था कि भारतीय समाज का विकास मौलिक तरीकों से ही हो सकता है, इसी कारण वह पश्चिमी सभ्यता के मोह से बचने की सलाह देते हैं, पर इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज भारत की बहुत बडी आबादी अमेरिकी जीवन शैली के व्यामोह में फंसी है। जो लोग गाँधी को मशीनों और तकनीक का विरोधी मानते हैं उन्हें गाँधी के इस कथन पर ध्यान देना चाहिए -मेरा उद्देश्य मशीन को नष्ट करना नहीं उसे सीमाओं में बाँधना है..अगर मशीन झोपडियों में रहने वाले करोडों लोगों के बोझ को हल्का करती है और श्रमजीवी का श्रम कम करती है, तो मैं मशीन का स्वागत करता हूँ.. अगर गाँव के हर घर में बिजली आ जाए और गाँव के लोग बिजली से खेत जोतने के साधन और औजारों का इस्तेमाल करें तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। उनकी इस मान्यता में कितना बल है कि-मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है, बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है, उससे है। आज तो जिन्हें मेहनत बचाने वाले यंत्र कहते हैं, उनके पीछे लोग पागल हो गए हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूँ , परन्तु वह किसी खास वर्ग की नहीं, बल्कि सारी मानव जाति की होनी चाहिए।7
एक आ*ााद और एकीकृत भारत के लिए गाँधी ने ताजिंदगी संघर्ष किया।8 आज हमारी जिम्मेदारी है कि गाँधी की विरासत को अक्षुण्ण रखें। उनके भीतर इस बात की चिंता बराबर मौजूद रही कि भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के वो लोग जो उनके साथ हैं, आजादी के बाद उनसे भिन्न नेतृत्व चाहेंगे। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान वह बराबर कांग्रेस को चेताते रहे कि जब तक भारत स्वतंत्र न हो कांग्रेस को ऐसे कार्यक्रमों और नीतियों से बचना चाहिए जिनसे भारतीय समाज के अन्दर निहित सामूहिक शक्ति कमजोर पडती हो । गाँधी पर मानीखेज लेखन करने वाले इतिहासकार सुधीर चन्द्र की उस टिप्पणी को वाबस्ता कर रहा हूँ जिससे गाँधी और कांग्रेस के आपसी संबंधों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है -सदा ही कांग्रेस के साथ उनका रिश्ता आवाजाही का रहा। तीसेक साल के दौरान वह जितना कांग्रेस में रहे थे उतना ही बाहर भी रहे थे। बार बार बौखलाई और झीखी थी कांग्रेस उनसे।9 यह तथ्य है गाँधी का झुकाव कांग्रेस के प्रति नहीं भारतीय समाज के प्रति रहा, वह कांग्रेस को राजनीति का मंच नहीं बनने देना चाहते थे।
नए भारत में हमें गाँधी की समरस और सहिष्णु दृष्टि की बहुत जरूरत है। उनके जीवन से हमें बहुत सीखने की आवश्यकता है। रेखांकनीय पहलू है कि वह पहले ऐसे विचारक हैं जिन्होंने घरेलू श्रम की महत्ता को पहचाना।10 अधिक से अधिक उपभोग करने और संसाधनों की जिस तरह बर्बादी करने के हम आदी हो गए हैं, इस बारे में गाँधी से ये बात सीखने की है कि कम से कम संसाधनों और सुविधाओं से कैसे काम चलाया जा सकता है! हम जिस तरह प्रलोभनों में फँसकर अपनी दिशा बदल लेते हैं उस पर भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। गाँधी प्रलोभन के बरक्स रूचि विकसित करने पर जोर देते थे। समय बर्बाद करने और योजना विहीन व्यक्तियों के लिए गाँधी एक सीख हैं। उनके समय-नियोजन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। अक्षर ज्ञान का सवाल हो या लिखावट का, जीवन का शायद ही कोई जरूरी मुद्दा हो जो गाँधी की दृष्टि से ओझल हुआ हो!
पिछले तीस सालों में यदि कोई जन आन्दोलन भारत में खडा हुआ, तो उसके केंद्र में भी गाँधी हैं। अन्ना हजारे के नेतृत्व में जो बडा आन्दोलन खडा हुआ उसके मूल में गाँधीवाद ही है। अन्ना की पहचान गाँधीवादी मूल्यों से बनी और उसी के बल पर वह जनता के बडे हिस्से को प्रभावित कर सके। इस आन्दोलन को उदहारण के तौर पर रखते हुए हमें समझना होगा कि संवेदनात्मक विचारशीलता के रास्ते दुनिया को बेहतर बनाने के किसी भी प्रयास में गाँधी की अनिवार्यतः रहेगी। उनका जीवन मानव-समाज की बेहतरी के लिए समर्पित रहा- मैंने एक ऐसा रास्ता दिखाने की कोशिश की है जो शांतिपूर्ण, मानवीय और उदात्त है। इसे ठुकराया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो विकल्प होगा - एक रस्साकसी, जिसमें हर कोई दूसरे को गिराने की कोशिश करेगा।’ वह साधारण जीवन के हामी होकर भी असाधारण थे। कॉलिन्स और लापियर ने गाँधी की असाधारणता पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि- वह संसार के सबसे असाधारण मुक्ति आन्दोलन के कोमल स्वभाव के मसीहा थे.. जिस शताब्दी में चारो ओर हिंसा का बोलबाला था उसमें गाँधी ने एक विकल्प के रूप में अहिंसा के सिद्धांत को सामने रखा । उन्होंने सशस्त्र विद्रोह के बजाए नैतिक आन्दोलन के सहारे, आतंकवादियों के बमों के धमाकों के बजाए अवहेलनापूर्ण मौन के सहारे इस महाद्वीप से अग्रेंजों को खदेड देने के लिए जन साधारण को संगठित करने के उद्देश्य से इस अस्त्र का उपयोग किया था।11
गाँधी सनातनी हिन्दू जरूर थे पर उनकी सनातनी हिन्दू की कसौटी इतनी खरी थी कि हिन्दुत्ववादी उसके पास तक फटकने की जुर्रत न कर सके । संत कबीर की तरह गाँधी भी कठमुल्ले और धर्मभीरु लोगों की आँख में गढते रहे । अहिंसा और सत्य के बिंदु पर इन दोनों समाज सुधारकों में दुर्लभ समानता है। सांच कहै तो मारन धावे, झूठै जग पतियाना वाला कबीराई अनुभव गाँधी के जीवन से भी गहरे तक जुडा है। कुमार प्रशांत का मानना है कि सनातनी हिन्दू और पक्के मुसलमान दोनों एकामत थे कि गाँधी को उनके धार्मिक मामलों में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है, किन्तु बावजूद इसके संगठित धर्मों के खिलाफ उनका संवाद-संघर्ष निरंतर चलता रहा। वह बराबर हिन्दू धर्म की कालातीत हो चुकी, प्रतिगामी प्रथाओं से जूझते रहे। आज जो भी लोग गाँधी की अप्रासंगिकता का हास्यस्पद जुमला उछाल रहे हैं उन्हें इतिहासकार, कथाकार और अकार पत्रिका से संपादक प्रियंवद के विचारों को जरूर पढना चाहिए कि, गाँधी भविष्य के भारत में या कि भविष्य की दुनिया में किस रूप में बचेंगे, यह कोई एक व्यक्ति, दल या राज्य तय नहीं करेगा। यह इतिहास तय करेगा जो हर झूठ को बीनकर फेंक देने की कला जानता है।12
आज गाँधी की अनथक आन्दोलनधर्मिता से जितना सीखने की जरूरत है उससे ज्यादा उनकी मौलिकता और प्रयोगधर्मिता को आत्मसात करने की। प्रयोगधर्मिता और मौलिकता गाँधीवाद के मूल में है । खादी, चरखा, दस्तकारी, सत्याग्रह, अछूतोद्धार, बुनियादी शिक्षा, नयी तालीम, ट्रस्टीशिप, उपवास, शराबबंदी जैसे औजार उनकी मौलिक दृष्टि की ही उपज हैं। ये ऐसे अस्त्र हैं जिनसे मनुष्य न केवल आत्मचेतस बनता है, बल्कि आत्मनिर्भर भी बनता है। ये आत्मगौरव और आत्मविश्वास पैदा करने वाले ऐसे औजार हैं जिनकी मानव इतिहास में कोई मिशाल नहीं। ये ऐसे औजार हैं जो किसी को क्षति पहुँचाए बिना मानवजाति का विकास करते हैं। मानवजाति के भविष्य की कोई भी अहिंसक और कल्याणकारी योजना गाँधी-दृष्टि के बिना संभव नहीं हो सकती ।


सन्दर्भ
1. रामचंद्र गुहा,गाँधी भारत से पहले,अनुवादक,सुशांत झा,पेंगुइन बुक्स,गुडगांव,प्रथम हिन्दी संस्करण,2015 भूमिका से
2. सुधीर चन्द्र,गाँधी एक असंभव संभावना,राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली,संस्करण, 2011,पृष्ठ-34
3. कुमार प्रशांत,हिन्दू गाँधी का धर्म, नया ज्ञानोदय,भारतीय ज्ञानपीठ,दिल्ली,सितम्बर,2019,पृष्ठ-67
4. मोहनदास करमचंद गाँधी,हिन्द स्वराज, अनुवादक, अमृतलाल ठाकोरदास नाणावती,सतीश बुक डिपो,नयी
दिल्ली,संस्करण,2010,पृष्ठ-89
5. उपर्युक्त,पृष्ठ-83-84
6. मोहनदास करमचंद गाँधी,सत्य के प्रयोग,नवजीवन ट्रस्ट, संस्करण,1957,पहली आवृत्ति,2010,पृष्ठ-14
7. मोहनदास करमचंद गाँधी,हिन्द स्वराज,उपर्युक्त,पृष्ठ-84
8. रामचन्द्र गुहा,भारत गाँधी के बाद,अनुवादक,सुशांत झा,पेंगुइन प्रकाशन,गुडगांव, प्रथम हिन्दी संस्करण, 2012, पृष्ठ-27
9. सुधीर चन्द्र, गाँधी एक असंभव संभावना, उपर्युक्त, पृष्ठ-20
10. जया पाण्डेय,असमानता की हर कुरीति के खिलाफ, समयांतर, दिल्ली, अक्टूबर, 2019, पृष्ठ-36
11. कॉलिन्स और लापियर,बारह बजे रात के, अनुवादक, हरिपाल त्यागी, राधकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण, 1998, पृष्ठ-19-20
12. प्रियंवद,अकार, 53,गाँधी अंक, कानपुर, अगस्त, 2019, पृष्ठ-53
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सम्पर्क - सहायक प्रोफेसर-
हिन्दी,राजकीय महिला स्नातकोत्तर महविद्यालय,
बांदा, मोबाईल 9457815024