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क्यों याद करें गाँधी को

सतीश कुमार
एक विनम्र तरीके से भी आप दुनिया को हिला सकते हैं।

- महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधी अतीत ही नहीं, भविष्य भी हैं। गाँधी का वैशिष्ट्य है कि वह गोली से नहीं मरे। गाँधी आलोचना के प्रहारों से भी नहीं मरे। इसका सबसे बडा कारण यह है कि गाँधी वैचारिक आदर्शों एवं मूल्यों के स्वप्नलोकीय चिन्तक नहीं, अपितु उसके प्रयोगधर्मा युग-पुरुष हैं। वह जिन मूल्यों की बात करते हैं, उन्हें पहले जीवन के प्रयोग में तराशते हैं। अतः जिसे प्रयोग में नहीं ढाल सकते, वह कभी नहीं कहते। इसीलिये गाँधी ने अपनी जीवन यात्रा को सत्य के प्रयोग की संज्ञा दी। उनका पूरा जीवन सत्य के सतत संधान की साधना की मिसाल है।

गाँधी सत्य एवं असत्य के बीच द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से चलने वाले मानवीय विकास में सत्य की विजय को अभीष्ट एवं अनुकरणीय समझते हैं और सत्य के साक्षात्कार को ही ईश्वर का साक्षात्कार मानते हैं। वह मानते हैं कि सत्य मतभेदों से ऊपर होता है, क्योंकि वह अस्तित्ववान होता है। इसीलिये सत्य शास्वत होता है और उसकी सार्वभौम मान्यता होती है। गाँधी के व्यक्तित्व की यह दार्शनिकता गाँधी को सतत जीवंत रखती है और गाँधी सतत प्रासंगिक बने रहते हैं। श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों एवं आदर्शों को जीवन के प्रयोग में ढालने की गाँधी की विलक्षण क्षमता को ही दृष्टि में रखकर कभी महान वैज्ञानिक आइन्सटीन ने कहा कि, भावी पीढियाँ मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हमारी तरह ही हाड माँस से बना एक व्यक्ति मोहनदास करमचंद गाँधी हम लोगों के साथ रहा, हमारे साथ साँसें लीं और हममें से हर किसी की तरह इसी पृथ्वी पर विचरण करता रहा। अतः आज जब आदमी की कथनी एवं करनी में बडी खाईं है, तो गाधी प्रासंगिक हैं, जिनसे नई पीढियाँ प्रकाश एवं प्रेरणा ग्रहण कर सकती हैं।

गाँधी मताग्रही नहीं हैं। वह कभी नहीं कहते कि मेरा अनुसरण करो। उनका यही आग्रह है कि सत्य को परखो, उसे प्रयोग में उतारो और फिर उस पर विश्वास एवं उसका अनुकरण करो। गाँधी से सहमत अनुयायियों की बडी जमात रही है, तो उनसे असहमतियाँ ही नहीं, द्वेष रखने एवं उनका विरोध करने वाले भी रहे हैं। गाँधी मतभेद का समादर करते हैं, पर यह भी सच है कि उनसे मतभेद जन्य विरोध भाव के गर्भ से निकली गोलियों ने ही गाँधी का सीना छलनी किया था। यह अलग बात है कि जैसे हनुमान ने अपना सीना चीर कर राम रूपी सत्य का साक्षात्कार कराया, वैसे ही अपने युग के सबसे बडे राम भक्त गाँधी के सीने का भेदन हुआ, तो उससे भी हे-राम ही निकला था। इन सबके बावजूद गाँधी से असहमत भी, आज अपने को गाँधी से सहमत जताते हैं। आज के राष्ट्रीय जीवन का बडा सच यह है कि गाँधी के प्रति एक राष्ट्रीय आम सहमति है। कौन गाँधी को कितना जानता एवं मानता है, इसके मात्रात्मक भेदों के बीच गाँधी साझी राष्ट्रीय श्रद्धा का केन्द्र हैं। उनसे असहमत भी, इस पर सहमत हैं। फलतः जैसे श्री गणेशाय नमः के बिना कोई पूजा शुरू नहीं होती, उसी तरह गाँधी का नाम लिये बिना आज देश में राजनीति की बात नहीं हो सकती है। गाँधी का कितना अनुकरण होता है, यह एक यक्ष प्रश्न भले हो, लेकिन गाँधी के लिए निकलने वाले असहमति के हर आक्रामक स्वर, उनके अपनों द्वारा ही चुप करा दिये जाते हैं। गाँधी के प्रति आस्था और आदर भाव की यह राष्ट्रीय आम सहमति गाँधी की प्रासंगिकता को पुष्ट करती है।

महात्मा गाँधी की प्रासंगिकता कालजयी है। उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और नेतृत्व का समकालीन राजनीति एवं राष्ट्रनिर्माण पर ही गहरा असर नहीं था, बल्कि भावी दिशा का भी वह आदर्श पथ प्रदर्शन करता है। अफ्रीका और भारत की राजनीतिक प्रयोगशालाओं में उन्होंने जो प्रयोग किए, उसके असर से भविष्य अछूता नहीं हो सकता। गाँधी के प्रयोगों में सत्याग्रह का खास महत्त्व है। सत्याग्रह के बिना किसी स्वस्थ लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यदि कहीं सत्याग्रह भाव को जीने की गुंजाइश नहीं है, तो वहाँ बेशक लोकतंत्र के वजूद को लेकर सवालिया निशान का स्याह साया भी होगा।

गाँधी के सत्याग्रह में तीन तत्त्व हैं - सत्य, अहिंसा और प्रेम। सत्य यथार्थ अस्तित्व रखता है, सर्वमान्य होता है। अतः उसका आग्रही होना सहज मानवीय धर्म है। उसे साधने का मार्ग अहिंसा है। गाँधी की अहिंसा सकारात्मक है। वह महज हिंसा का अभाव भर नहीं, उससे ज्यादा है। गाँधी मन में कुविचार, द्वेष, घृणा आदि और यहाँ तक कि दूसरों की जरूरत की वस्तुओं पर एकाधिपत्य या उसे जमा करने को भी हिंसा मानते हैं। वह मानते हैं कि अहिंसा कायरों का गुण नहीं, एक योद्धा का गुण है। अतः उसे वीरोचित गुण मानते हैं। कायर व्यक्ति तो कभी अहिंसक हो ही नहीं सकता। अहिंसा के लिए साहस के साथ धैर्य एवं सहनशीलता भी होनी चाहिये। उससे वह सब कुछ जीता जा सकता है, जो हिंसा से संभव नहीं। हिंसा से शरीर, स्थान, परिस्थिति पर आधिपत्य संभव है, लेकिन सामने वाले के मन, चित्त और आत्मा को नहीं जीता जा सकता। इसके विपरीत अहिंसा से किसी शरीर, स्थान, परिस्थिति के साथ साथ मन-चित्त को भी जीता जा सकता है। अतः यदि हिंसक युद्ध के सैनिक को कडे प्रशिक्षण के अनुशासन से गुजरना होता है, तो अहिंसक युद्ध के सेनानी के लिये और कडा प्रशिक्षण एवं अनुशासन गाँधी जरूरी मानते हैं। गाँधी पहले व्यक्ति नहीं, जिसने दुनिया में अहिंसा की बात की हो। फिर भी कुछ तो बात है कि कि विश्व में अहिंसा की बात होती है, तो गाँधी का नाम पहले आता है, जिन्होंने अहिंसा एवं शान्ति की संस्कृति की बात की थी। साथ ही निजी जीवन से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय फलक तक उसका सफल प्रयोग भी किया। वह खास बात, जो गाँधी के अहिंसा चिन्तन को औरों से अलग करती है, सत्याग्रह की अवधारणा में अंतर्निहित तीसरा तत्व प्रेम है। उसका सीधा अर्थ है कि सत्याग्रह युद्ध में जिस सत्ता या प्राधिकारी के विरुद्ध अहिंसा के अस्त्र का प्रयोग होता है, उसके प्रति सच्चे सत्याग्रही के मन में न तो राग-द्वेष होता है और न तो उसे नीचा दिखाना, अपमानित करना या उस पर विजय स्थापित करना ही उसका लक्ष्य होता है। उद्देश्य एवं आग्रह तो महज इतना होता है कि वह अन्याय के पक्ष से न्याय के पक्ष में आ जाए। आशय स्पष्ट है कि लक्ष्य होता है, उसमें सुधार ले आना। इस तरह गाँधी का सत्याग्रह और सत्याग्रह का दर्शन प्रतिरोध एवं प्रतिवाद की सशक्त एवं प्रभावकारी सीधी कार्रवाई का नायाब अस्त्र बन जाता है। सत्याग्रह की रीति नीति संविधानवादी होती है, किन्तु उसमें बडे बडे सत्ता दुर्गों को भी हिला देने और उन्हें सुधारने या ध्वस्त कर देने की अद्भुत अभ्यांतरिक अंतःशक्ति समाहित होती है। अतः सत्याग्रह की प्रासंगिकता असंदिग्ध एवं कालातीत है।

जिस तरह अहिंसा के सबसे बडे प्रतीक होते हुए भी गाँधी अहिंसा की बात करने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं, उसी तरह उनके सत्याग्रह के स्वरूपों में भी कुछ भी नया नहीं है। असहयोग, बायकाट, सविनय अवज्ञा या उपवास की पद्धतियाँ पारिवारिक-समाजिक जीवन में प्रतिवाद एवं प्रतिरोध के अस्त्र के रूप में परम्परा से प्रचलन में थीं। गाँधी ने उन्हें अपनाया, तो भला उसमें नया या खास क्या था ? बेशक उसमें कुछ खास बात तो थी, जिसने प्रतिवाद एवं प्रतिरोध के पारिवारिक- सामाजिक जीवन के इन परम्परागत अस्त्रों के प्रयोग का गाँधी को ही प्रतीक बना दिया। खास बात शायद यही थी कि गाँधी ने उनका राजनीतिकीकरण करके, उन्हें दुनिया के सबसे बडी एवं सबसे शक्तिशाली उस साम्राज्य सत्ता के विरुद्ध शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष का अत्यन्त प्रभावपूर्ण हथियार बना दिया था, जिनका सूरज कभी डूबता ही नहीं था। फलतः गाँधी का सत्याग्रह देश और दुनिया में सामाजिक राजनीतिक जीवन के बीच प्रतिरोधात्मक अस्त्र के रूप में सार्वभौम महत्ता रखता है। यह सही है कि आज सार्वजनिक जीवन में सत्याग्रह के नाम पर बहुत कुछ ऐसा भी होता दिखता है, जो सत्याग्रह नहीं है। अतः सत्याग्रह के असल सत्य के लिए हमें सदैव गाँधी की ओर मुड कर देखना एवं गाँधी की सत्याग्रह दृष्टि को समझना ही होगा।

आज धर्म और धर्म के साथ राजनीति के रिश्तों के रिश्तों को लेकर मतिभ्रम बहुत व्यापक है। नई पीढी खास तौर पर ऐसे मतिभ्रम का शिकार हो रही है। इस संदर्भ में गाँधी और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं, जिनसे बडा धर्म एवं संस्कृति की प्रयोगिक निष्ठा जीने वाला दूसरा राजनीतिक महानायक आधुनिक भारत में नहीं हुआ। अतः आज के दौर में, विशेषकर नई पीढी के लिये गाँधी की ओर झाँकने एवं उन्हें समझने की ज्यादा जरूरत है। गाँधी को ईश्वर की अविकल सत्ता में विश्वास था और वह धर्म को सत्य एवं प्रेम का प्रतिरूप मानते हैं। उनका मानना था कि ईश्वर के कई रूप हैं, लेकिन उस ईश्वर के दर्शन दरिद्रनारायण में होते हैं। उस दरिद्र नारायण की सेवा में ही ईश्वर साक्षात्कार के विश्वास को जीने के वह कायल थे। गाँधी धर्म व धर्म प्रधान भारतीय संस्कृति के प्राण तत्व आध्यात्मिक एवं नैतिक चेतना के प्रति गहरी निष्ठा जीते हैं। अतः नैतिक धर्म से अनुप्राणित राजनीति में उनका गहरा और अटूट विश्वास था। जहाँ तक राज्य और राजनीति का सम्बन्ध है, उसके साथ धर्म के रिश्ते को लेकर उनका यह कथन अत्यन्त प्रासंगिक है, जो उन्होंने 12 सितम्बर, सन् 1946 को हरिजन में लिखा,

यदि मैं शासक होता तो धर्म और राज्य को पूरी तरह अलग रखता। मैं अपने धर्म प्रति दृढ प्रतिज्ञ हूँ, मैं उसके लिये प्राण दे सकता हूँ, लेकिन यह मेरा निजी विषय है। राज्य को इससे कुछ भी लेना देना नहीं है।

गाँधी के उक्त कथन में धर्म और राज्य या राजनीति के पृथक्करण तथा धर्म के प्रति राज्य के तटस्थ भाव की बेहद सुस्पष्ट सेकुलर अभिव्यक्ति है। यहाँ मैं गाँधी का एक और बेहद चर्चित कथन उद्धृत करना चाहूँगा, जिससे प्रथम दृष्ट्या यह धारणा उभर सकती है कि गाँधी के कथनों में वैचारिक विरोधाभास है, यद्यपि ऐसी धारणा भ्रांत धारणा होगी। गाँधी का वह बहुश्रुत कथन है कि, धर्म के बिना राजनीति विधवा है।

गाँधी के उपर्युक्त दोनों कथनों को लेकर किसी विरोधाभास के भ्रम में उलझने की जगह, गाँधी की धर्म दृष्टि के मर्म को समझना चाहिये। वस्तुतः गाँधी धर्म के दो पक्ष मानते हैं। एक है - सामान्य-धर्म, जिसे नैतिक-धर्म भी कहा जा सकता है। सामान्य- धर्म या नैतिक-धर्म के मूल्य दुनिया के सभी धर्मों में साझे होते हैं। सभी धर्म उसका सदुपदेश करते हैं। नैतिक मूल्यों में किसी भिन्नता, मत मतान्तर और मतभेद की कोई गुंजाइश नहीं होती। यथा सत्य शास्वत है एवं सार्वभौम अस्तित्ववान होता है तथा सभी धर्मों में उसकी महिमा स्वीकृत है। उसके अस्तित्व को हिन्दू सत्य, इसाई सत्य या मुस्लिम सत्य में बाँटा नहीं जाता। अतः गाँधी जब यह कहते हैं कि धर्म के बिना राजनीति विधवा है, तो उनका आशय मात्र नैतिक धर्म से होता है। नैतिक धर्म एवं उसके मूल्यों से निरपेक्ष राजनीति उन्हें ग्राह्य नहीं। हरिजन के ही 23 मार्च, 1947 के अंक में उन्होंने लिखा है कि नैतिकता और धर्म को एक में मत मिलाइये। मेरा विश्वास है कि बुनियादी रूप से नैतिकता सभी धर्मों में साझी है। अतः नैतिकता की शिक्षा देना बेशक राज्य की जिम्मेदारी है, लेकिन धार्मिक शिक्षा देना राज्य का काम नहीं है। वह काम उसे धार्मिक संघों पर छोड देना चाहिये।

गाँधी दृष्टि में धर्म का दूसरा पक्ष है - विशेष-धर्म, जिसे हम संस्थागत-धर्म भी कह सकते हैं। उसका संगठन ईश्वर के विश्वास एवं उसकी सिद्धि की पद्धतियों की प्रत्यक्ष भिन्नताओं पर टिका होता है। इसके सभी पक्षों में विभिन्न संस्थागत धर्मों के बीच मत-मतान्तर होता है। इन भिन्न विश्वासों के सह अस्तित्व में कोई परेशानी की बात नहीं है, लेकिन यह भी सही है कि इनके विश्वासों एवं मतान्तरों को लेकर यदि कठोर मताग्रह सक्रिय अस्तित्व बना ले, तो परस्पर विरोधी साम्प्रदायिकता भी इसी से पनपती है। गाँधी मानते हैं कि अपने धार्मिक विश्वास जीने की स्वतंत्रता व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन राज्य को किसी खास धर्म की विशेष हिमायत एवं संरक्षण से विरत रहकर, सभी के बिना भेद अपने अपने विश्वास जीने के हक को संरक्षण देना चाहिये। अतः जब गाँधी यह कहते हैं कि यदि मैं शासक होता, तो धर्म और राज्य को अलग अलग रखता।.., तो उनका आशय नैतिक धर्म से नहीं, व्यक्ति के भिन्नतामूलक विश्वास एवं प्रयोग वाले संस्थागत धर्म या विशेष-धर्म से है। राज्य एवं राजनीति को उनसे निरपेक्ष रहना चाहिये।

एक भ्रान्त धारणा यह भी है कि भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र में जिस सेकुलर संरचना को, उसमें अंतर्निहित मूलाधिकारों के ढाँचे के माध्यम से अंगीकृत किया गया, उसका गाँधी से कोई वास्ता नहीं है। वस्तुतः संविधान के भाग तीन में वर्णित मौलिक अधिकार ही भारतीय धर्मनिरपेक्षता अथवा पंथनिरपेक्षता या सेकुलरिज्म संरचना का मूल आधार हैं। उसमें उल्लिखित धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के उप भाग का पहला और संविधान का 25 वां अनुच्छेद भारतीय धर्मनिरपेक्षता की नींव का पत्थर है। उसमें प्रत्येक नागरिक के आस्था, विश्वास, उपासना व उसके प्रचार का मौलिक अधिकार उल्लिखित है, लेकिन उसके उल्लेख के बाद पूर्ण विराम नहीं है। उसके बाद कामा या डैश के बाद ब्रैकेट में (1) लिखा मिलेगा। यानी धार्मिक स्वतंत्रता के उस अधिकार के साथ अनुच्छेद 25(1) सीधा जुडा हुआ है, जिसमें चार मर्यादाओं का उल्लेख है, जिनसे नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मर्यादित है। वे चार मर्यादाएँ हैं- लोक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता व मूल अधिकार के अन्य प्राविधान। बात स्पष्ट है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अनुच्छेद 25 में वर्णित अधिकार इन चारों के विरुद्ध नहीं हो सकता है। अतः आस्था, विश्वास, उपासना एवं विश्वासों के प्रचार के इस अधिकार का प्रयोग जब तक इनकी मर्यादा के अधीनस्थ है, तब तक उसे राज्य का संरक्षण प्राप्त होगा एवं जब उन मर्यादाओं का अतिलंघन करने की हद तक जाएगा, तो राज्य की संरक्षणात्मक भूमिका तुरन्त इन मर्यादाओं के रक्षार्थ हस्तक्षेपात्मक भूमिका में तब्दील हो जाएगी। यहाँ मैं गाँधी का एक और कथन उद्धृत करना चाहूँगा, जिससे स्पष्ट होता है कि इन प्रावधानों में गाँधी की भी प्रतिध्वनि आती है। गाँधी ने 12 सितम्बर, 1946 के हरिजन के उसी अंक में लिखा है कि है कि, राज्य आफ धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) कल्याण, स्वास्थ्य, संचार, वैदेशिक सम्बन्ध, मुद्रा और ऐसे तमाम अन्य कार्यों पर ध्यान देगा, न कि आफ और हमारे धर्म पर। यह तो सभी लोगों का निजी विषय है। इस तरह धर्म और राजनीति के रिश्तों पर गाँधी दृष्टि एकदम स्पष्ट है और उसे समझ लेने पर किसी मतिभ्रम के लिये जगह शेष नहीं बचती। धर्म उनके लिए जीवन में जीने का विषय है, राजनीति का नहीं। राज्य एवं राजनीति के लिए तो केवल नैतिक-धर्म सापेक्षता ही ग्राह्य है। राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता का गाँधी के लिए आशय न तो धर्मविहीनता है और न ही धर्मान्धता।

महात्मा गाँधी एक जननायक थे, जिन्होंने भारत में जनान्दोलनों की राजनीति शुरू की और भारतीय स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन को एक जनान्दोलन बनाया।

फलतः उनके चिन्तन एवं रीति नीति में जनाभिमुखता का गहरा पुट था और वह आम आदमी को केन्द्र में रखकर फैसले लेने के हिमायती थे। उनके राजनीतिक- आर्थिक कार्यक्रमों में उनकी यह सोच बुनियादी कसौटी की तरह काम करती थी। गाँधी मानते थे कि निर्णय लेने की कसौटी सिद्धान्त होने चाहिये, लेकिन सिद्धांत के आधार पर भी कभी कभी फैसले लेने में द्वन्द्व होता है। ऐसी स्थिति में जब द्वन्द्व का सामना हो और यह तय करने में मुश्किल हो कि क्या फैसला लिया जाए, तब फैसले तक पहुँचने के लिए महज एक ही कसौटी अपनानी चाहिये। आप सबसे गरीब और निरीह आदमी का चेहरा याद कीजिए जो आफ *ोहन में हो और यह विचार कीजिए कि क्या आफ फैसले से उसे लाभ होगा? क्या आफ फैसले से उसके जीवन की स्थितियों में कोई सुधार आएगा ? यदि आपको लगता है कि हाँ उसे लाभ होगा, तो संशय की कोई गुंजाइश नहीं बचती और बेशक वह निर्णय ही सर्वोत्तम एवं श्रेयस्कर होगा और आप वही निर्णय लें। सार्वजनिक एवं राजनीतिक पदाधिकार पर रह कर फैसले लेने की गाँधी की यह कसौटी सर्वकालिक महत्ता व प्रासंगिकता रखती है। हमारे युवा जो जीवन में ऐसी अधिकारसंपन्न स्थिति अर्जित करते हैं, जहाँ बैठकर उन्हें सार्वजनिक महत्त्व के फैसले लेने हों, तो यह कसौटी उन्हें गाँठ बाँधकर रखनी और सदा प्रयोग में लानी चाहिये।

हमारी संस्कृति में एक उक्ति बहुत प्रचलित रही है - अति सर्वत्र वर्जयेत। निजी या सार्वजनिक जीवन की कोई सोच हो एवं कार्य अथवा वैचारिक अभिमत के आग्रह हो, अतिवाद सर्वत्र बुरा होता है। अतः अतिवादी प्रवृत्तियों से आदमी को बचना चाहिये। गाँधी अतिवादी या परस्पर विरोधी विचारों के बीच समन्वयी चेतना के एक प्रेरक प्रतिमान रहे हैं। भारतीय पुनर्जागरण आन्दोलनों के बाद उभरी राष्ट्रीय चेतना से उपजी उदारवादी एवं अतिवादी राष्ट्रवाद की चिन्तनधाराओं का द्वन्द्व एवं टकराव बहुत गहरा था। कांग्रेस के भीतर उन दोनों वैचारिक धाराओं के प्रतिनिधि नरम दल और गरम दल के मध्य सीधा टकराव दिखाई देता है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में गाँधी के नेतृत्व के उदय एवं स्थापित होने के बाद इतिहास के पन्नों पर नरम दल और गरम दल की लकीरें नहीं दिखाई देतीं। गाँधी दोनों के उत्तमांश के संगम और दोनों की नकारात्मक एवं जड प्रवृत्तियों से मुक्ति के प्रतीक महानायक की तरह राष्ट्रीय आन्दोलन की पुंजीभूत धारा का नेतृत्व करते हुये, उसे मुकाम तक पहुँचाते हैं। जो नेता मतभेदों के चलते साथ बैठ नहीं सकते थे, गाँधी उन सबको साथ लेकर चलते हैं। डा.अम्बेडकर से उनके वैचारिक मतभेद गहरे और स्पष्ट थे, लेकिन जब संघर्ष से मिली आजादी का संहिताकरण कर उसे व्यवस्थागत आकार देने का वक्त आया, तो गाँधी की सलाह से ही अम्बेडकर को उसकी प्रारूप रचना में महत्त्वपूर्ण युग दयित्व से जोडा गया। इस तरह तीव्र मतभेदों के बावजूद गाँधी तथा अंबेडकर के बीच पूना पैक्ट स भारतीय संविधान सरचना तक समन्वय की एक चेतना भी सक्रिय दिखाई देती है, जिसका आधुनिक भारतीय राष्ट्रनिर्माण पर गहरा एवं दूरगामी असर पडा। गाँधी के व्यक्तित्व, कृतित्व व चिन्तन में हमें समन्वयी गतिशीलता की ऐसी चेतना के अनेक दृष्टांत नजर आते हैं, जो नई पीढी के लिये द्वन्द्व एवं टकराव की ओर ले जाने वाली प्रवृत्तियों से बचकर समन्वय की गतिशील प्रेरणा प्रदान करते हैं। पारिवारिक से राष्ट्रीय जीवन तक में समन्वयी चेतना पर आधारित सोच के ऐसे संस्कार का सर्वकालिक महत्त्व होता है और गाँधी उसकी प्रेरक मिसाल हैं।

आज सन् 2020 की दुनिया जब कोविड महामारी के कठिन संक्रमणकाल से गुजर रही है, तब देश एवं दुनिया के लिये गाँधी एक बार फिर और ज्यादा प्रासंगिक नजर आने लगे हैं। इस महामारी की मार से आहत होकर जब भूमंडलीकरण की खामियाँ आइने की तरह साफ दिखने लगी हैं और आर्थिक ढाँचे के चरमराने के उभरे खतरों के साथ शहरीकरण का खोखलापन एवं आम आदमी की बदहाली प्रत्यक्ष है, तो गाँधी के ग्राम सुदृढीकरण तथा स्वावलम्बन, स्वदेशी व आत्मनिर्भरता के चिन्तन की महत्ता भी प्रासंगिक बन कर हमें गाँधी मार्ग से तालमेल बैठाते हुये विकास की रीति नीति बनाने की नसीहत देती है। चीन की आक्रामकता के समक्ष हिंसक प्रतिउत्तर की तुलना में गाँधी के बायकाट के मार्ग का हल्का-सा स्वावलम्बन भी बेहतर असरकारी रहा। आज के हालात में स्वदेशी, स्वावलम्बन व आत्मनिर्भरता के नारे यद्यपि एक बार फिर मुखर हुए हैं, लेकिन गाँधी मार्ग के मर्म को ईमानदारी से स्पर्श किए बिना उनकी सफलता संदिग्ध है और उसके बिना ऐसे नारों के भी जुमला बनने का ही खतरा ज्यादा है। आज जिस तरह शहरों से बेहाल नजारों के साथ वापस गाँव की ओर बहुत बडी आबादी के लौटने के हालात उभरे हैं, उसने विकास की रीति-नीति को भी ईमानदारी से गाँधी की ओर लौटने एवं ग्राम विकास की संरचना के विकेन्दित नियोजन की दिशा में सार्थक पहल को जरूरी बना दिया है। दुर्भाग्य से अभी इसके कोई लक्षण सामने नहीं आ रहे हैं और उठते कदम इसके उलट सन्देश ही दे रहे हैं, जिससे उक्त नारों को लेकर गंभीर सवालिया निशान न*ार आता है।

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सम्पर्क - शिव निलय, एन-10/79,

डब्लूबी-1,आर.के.पुरम,न्यू कॉलोनी,

काकरमता, डीएलडब्लू,वाराणासी-221004

मो. ९४१५६२६७०२