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आज के दौर में गाँधी : राजनीति से आगे जहाँ और भी है

आदित्य निगम
पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, फिर वो आप से लडेंगे, और तब आप जीत जायेंगे।
- महात्मा गाँधी
शुरुआत में ही एक बात साफ कर देना जरूरी है। हमारे यहाँ सन्दर्भ सहित व्याख्या करने की पुरानी रवायत है। अपने आप में यह एक अच्छी बात ही है मगर गाँधी और अंबेडकर जैसे कई भारतीय चिन्तकों के बारे में बात करते हुए आजकल एक बडी दिक्कत का सामना करना पडता है। दिक्कत इस बात से पैदा होती है कि अपने इस आग्रह के चलते हम इन चिंतकों को उनके सन्दर्भ में इस तरह कैद कर देते हैं कि हम उनके समय की उनकी मजबूरियों में बँध कर रह जाते हैं. मसलन अक्सर गाँधी पर बात करने के अर्थ यह हो जाते हैं कि हम सिर्फ उन्हें अंबेडकर से हुए उनके टकराव के संदर्भ में ही देखें या अंबेडकर को गाँधी के बरअक्स रख कर ही समझें। अन्यथा गाँधी की हम हिंदुत्व के संदर्भ में चर्चा करें. इन चिंतकों के यह पहलू बेशक उनके चिंतन के बेहद जरूरी आयाम हमारे सामने रखते हैं, मगर यह भी सही है कि इन्हीं विषयों पर उनके चिंतन के निहितार्थ अक्सर बहुत दूर तलक जाते हैं जिन पर तवज्जो देने से हम वंचित रह जाते हैं. इस लेख में मैं गाँधी के चिंतन के कुछ ऐसे पहलुओं पर नजर डालना चाहूँगा जो अक्सर या तो हमारी निगाह से ओझल रहते हैं या फिर उन पर सरसरी ढंग से ही बात हो पाती है। इन में खास तौर पर वह सवाल है जिसे मैं राजनीति का प्रश्न कहना चाहता हूँ- और उससे जुडे हुए कई ऐसे मसले हैं जो आज हमें न सिर्फ आंदोलित कर रहे हैं, बल्कि एक स्तर पर बुरी तरह झकझोर रहे हैं। मेरा यह तर्क रहेगा कि गाँधी के चिंतन में राजनीति (और राज्य) से किनाराकशी एक महत्त्वपूर्ण पहलू है जो आज हमें अपने युग के कई ज्वलंत सवालों को नए सिरे से समझने की दावत देता है।
इससे पहले की मैं आज के दौर में गाँधी की प्रासंगिकता पर चर्चा करूँ, यह मुनासिब होगा कि उस आज को एक बार परिभाषित कर लें, जिस के सन्दर्भ में हम गाँधी को देखना चाहते हैं। ऐसा शायद इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सबकी नजर में यह आज एक नहीं है - सबके वर्तमान अलहदा हैं और राजनीति का वर्त्तमान अलहदा जो अक्सर हमें एक ही वर्त्तमान में झोंकने की कोशिश में हमारी जिंदगियों के रोजमर्रापन को रौंदता चलता है। हमारी खुशकिस्मती है कि आज- जिस आज की तरफ मैं आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ - सारी दुनिया भर में राजनीति पर, राजनीतिक पार्टियों पर, चुनावों और राजनीतिक प्रक्रिया के आम जीवन से कट जाने पर तरह तरह से सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों के प्रति विरक्ति और नकार का भाव कम से कम पिछले दस सालों से दुनिया भर के आंदोलनों में देखने को मिला है, चाहे वह 2011 के अरब बसंत के दमदार जन-उभार रहे हों, चाहे स्पेन और यूनान में उसी बरस होने वाले बडे आंदोलन (जिनसे पोडेमोस और सिरिजा जैसे संगठनों का आविर्भाव हुआ) रहे हों, या फिर हिंदुस्तान में इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के झंडे तले हुआ भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन ही हो। इन सब में यह एक बात समान थी। इधर हाल के दिनों में भी देश भर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में भी वही जज्बा देखने को मिलता है- इनका नेतृत्व भी स्थानीय गैर-सियासी लोग ही कर रहे हैं और याद रखने लायक बात यह है कि इन्होंने ये बीडा तब उठाया जब यह स्पष्ट हो गया था कि संसद में तो दो ही रोज में तमाम पार्टियों की मौजूदगी के बावजूद, बिना किसी हंगामे के यह कानून पारित हो गया था। हिंदुस्तान में तो पार्टियों से मोहभंग की स्थिति और भी पुरानी है और हालिया इतिहास थोडा-सा खंगाल कर देखें, तो साफ हो जाएगा कि 1990 के दशक के बाद से सारे जनपक्षीय आंदोलन पार्टियों के दायरे के बाहर ही पनपे हैं। यह अलग बात है कि चूंकि अभी इस दायरे के बाहर कैसे सोचा जाए यह स्पष्ट नहीं है, इसलिए घूम फिर कर आखिरकार सारा दारोमदार फिर चुनावों और पार्टियों पर आकर टिक जाता है। इस सवाल पर सैद्धान्तिक बहस आज बेहद जरूरी हो गई है।
हमारे इस आज के जिस दूसरे पहलू को मैं सामने लाना चाहता हूँ वह दुनिया के सामने मुँह बाए खडा आबोहवा का संकट है जिसका ताल्लुक कोरोना वायरस ने जो कहर बरपा किया उससे भी है। आबोहवा का संकट आज जिस मुकाम पर पहुँच गया है वह भयावह है। साथ ही उसने भी एक और तरह से आम लोगों की रोजाना जिंदगी को दूभर बना दिया है। एक बिलकुल अलग ढंग से आबोहवा क संकट भी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को तबाही की ओर धकेलता है- शहरों के शहर, क्षेत्र के क्षेत्र सूखते चले जा रहे हैं, उनका पानी या तो खत्म हो रहा है य फिर जहरीला हो गया है। बुंदेलखंड जैसे इलाके से तो दसियों साल पहले पलायन शुरू हो गया था, पंजाब का पानी जो बाकी है जहरीला हो चला है। कुछ बडे शहरों में भी पानी रेलगाडियों में भर कर पहुँचाया जाने लगा है। देश के तमाम शहरों की हवा का प्रदूषण सारी सीमाएँ तोड चुका है और अनगिनत नई बीमारियों को जन्म दे रहा है।
कोरोना वायरस की कहानी भी इस पारिस्थितिकीय संकट की दास्तान से अलग नहीं है : बेलगाम पूँजीवाद ने जिस तरह चारों तरफ अपना साम्राज्य फैलाया है उसी का नतीजा है कि आज हर तरफ वन-जंगल और खास तौर पर बेश-कीमती रेनफोरेस्ट बर्बाद हो रहे हैं और तमाम तरह के गैर-इंसानी जीव अपने प्राकृतिक रिहाइश से वंचित होकर धीरे धीरे विलुप्त हो रहे हैं। इनमें से कई जीव तमाम तरह के वायरसों के पोषक होते हैं - यानी ये तमाम वायरस इनके जिस्म में वास करते हैं। जब उनकी प्राकृतिक रिहाइश लुप्त होती चली जाती है, तब ये वायरस नए मेजबान ढूँढते हैं - और इंसानी दुनिया की तरफ रुख करते हैं। हकीकत तो यह है कि अभी तक हमने जो देखा है, वह शायद ट्रेलर कहने लायक भी नहीं है- फिल्म तो अभी शुरू होनी बाकी है। वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि जिस रफ्तार से पहाडी ऊँचाइयों पर ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उससे भी अभी तक बर्फ की तहों के नीचे निष्क्रिय पडे वायरस जी उठे हैं और उनका भी खेल अभी देखा जाना बाकी है। कोरोना वायरस तो खैर नई चीज है, मगर आबोहवा का यह संकट तो हमारे सामने न जाने कितने समय से खडा घूर रहा है, मगर कमाल की बात यह है कि अभी एक साल भी नहीं हुआ हम एक देशव्यापी चुनाव से गुजरे हैं, मगर उस चुनाव के दौरान किसी भी राजनीतिक दल ने इन ज्वलंत मुद्दों को उठाना तो दूर, उनका जिक्र करना भी जरूरी नहीं समझा। यह सवाल गाँधी के दूसरे बडे सरोकार से भी सीधे-सीधे जुडता है - और यह सरोकार है आधुनिकता और बेलगाम उपभोग की उनकी आलोचना। यह प्रकान्तर से पूँजीवाद की आलोचना भी बन जाती है।
वैसे तो जिस आज की बात मैं करना चाहता हूँ उसके कई पहलू और भी हैं मगर फिलहाल इन दो के इर्द-गिर्द हम बाकियों को भी समेट सकते हैं। कुल मिलाकर इतना तो समझा ही जा सकता है कि हमारा सरोकार यहाँ मूलतः आम लोगों की जिंदगी के रोजानापन की लय और ताल से है - और उसे प्रभावित करने वाली बडी परिघटनाओं से है।
इस आलेख में मैं गाँधी के इन दो बडे सरोकारों- राजनीति और आधुनिकता की उनकी आलोचना - को एक थोडे बडे फलसफाई फलक पर रख कर देखना चाहूँगा। वैसे व्यापक फलसफाई अर्थ में देखें, तो राजनीति के प्रति उनका रवैया और आधुनिकता की उनकी आलोचना, असल में दोनों एक हैं।
लेकिन उस विषय पर आने से पहले मैं उनके एक तीसरे सरोकार की भी थोडी-सी चर्चा करना चाहूँगा जो उनके हिन्दू या सनातन धर्मी होने से ताल्लुक रखती है।
सनातन धर्म और हिंदुस्तानियत
एक अर्थ में इसे सरोकार कहना ठीक न होगा क्योंकि यह उनके आत्म-परिचय और पहचान का हिस्सा है। इस विषय पर थोडी बात शायद इसलिए जरूरी हो जाती है क्योंकि वहाँ से हमें गाँधी के चिंतन के कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दु मिलते हैं। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के दौरान अपने शोषक के बरक्स अपनी पहचान को परंपरा के माध्यम से परिभाषित करना या अपनी परंपरा की प्राचीनता पर गर्व करना तो कोई नई बात नहीं थी, न ही इसमें कुछ बहुत अजीब था। तमाम औपनिवेशित समाजों में पहचान के दावे इसी अंदाज में किए जाते रहे हैं। खुद हमारे देश में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से ऐसे अनगिनत उदाहरण देखने को मिलते हैं जो किसी न किसी रूप में स्रोत तक लौटने की ख्वाहिश रखते थे- बेशक उनमें से कई स्वामी दयानन्द सरस्वती की तरह वेदों की तरफ इसलिए लौटना चाहते थे क्योंकि बाद के हिन्दू धर्म में उन्हें गिरावट और विकार ज्यादा दीख पडते थे। जाहिर है कि दयानन्द सरस्वती की नजर में वर्ण, जाति प्रथा इस गिरावट का एक मूल लक्षण थी और वैदिक धर्म में उन्हें इसके चलन का कोई समर्थन नहीं मिलता था। मगर यह भी सही है कि चाहे दयानन्द सरस्वती हों या स्वामी विवेकानंद - इन सब के हिन्दू धर्म को पुनर्परिभाषित करने के पीछे ईसाइयत का प्रभाव और मूर्तिपूजा का तिरस्कार भी शामिल था। वे हिन्दू धर्म को किसी हद तक एकेश्वरवाद के आइने में ढालना चाहते थे और इस तरह उसे तर्क संगत भी बनाना चाहते थे।
गाँधी इन तमाम धाराओं से सीधे सीधे उलझे बिना हिन्दू धर्म के मूल चरित्र को बरकरार रखना चाहते थे- कम से कम राजनीतिक जिंदगी के शुरुआती सालों मेन। उनके लिए हिन्दू धर्म का मूल चरित्र वह नहीं था जो किन्हीं ग्रन्थों में कैद था बल्कि वह था जो खुद को हिन्दू कहने वाले लोग जीते थे, बेशक उसमें छुआछूत जैसे जघन्य चलन भी शामिल थे जिसे वे खारिज करना चाहते थे। लिहाजा शुरू शुरू में उनकी कोशिश थी कि हिन्दू धर्म से अस्पृश्यता के जघन्य चलन को खत्म कर के उस में आहिस्ता-आहिस्ता बदलाव की तरफ बढा जाए। ऐसा हरगिज नहीं था कि वे उसके बाकी के ढाँचे को ज्यों का त्यों छोड देना चाहते थे या सुधार की जरूरत को नकारते थे। मेरी समझ से गाँधी के लिए धर्म (रिलिजन के अर्थ में) वह ही है जो जिया जाता है और सुधार की अगर जरूरत है, तो उसी बरते जाने वाले अमलों या व्यवहार में है। मगर ऐसा लगता है जैसे वे भाँप गए थे कि जिस समाज में वे सुधार चाहते हैं, वहाँ कह कर या ऐलान कर के सुधार करना एक असंभव काम था जो उन्नीसवीं सदी के राजा राममोहन राय और विद्यासागर से लेकर दयानन्द सरस्वती और विवेकनंद की नाकामी में साफ दिखाई देता है। अंततः आर्य समाज या रामकृष्ण मिशन का हश्र क्या हुआ? उनका असर भी इतना भर ही हुआ कि वे भी अलग संप्रदाय बन कर रह गए और हिन्दू समाज के मूल ढाँचे को किसी भी तरह बदलने में नाकाम रहे। मुमकिन है कि गाँधी ने उन विफलताओं से सबक लेते हुए ही अपनी सोच को ढाला हो।
वजह जो भी रही हो, इतना तो तय है कि गाँधी का सरोकार मूलतः वर्त्तमान से था और शास्त्रगत विद्या या धर्मग्रंथों में नहीं। इसलिए सुधार के अर्थ उनके लिए किसी स्रोत की ओर लौटना नहीं था। वे शायद यह भी समझ गए थे कि खुद को हिन्दू कहने वाले व्यापक जनमानस की अस्थाओं को सीधे-सीधे, एकबारगी, चुनौती देकर कोई सुधार सफल नहीं हो सकता है। इस जनमानस को अगर बदलना है तो यह जरूरी था कि वे खुद को उस तथाकथित सनातनी हिन्दू समाज से जोडें। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सनातन धर्म नाम दरअसल उन्नीसवीं सदी से ही चलन में आता है जिसका मकसद एक तरफ आर्य समाज सरीखे सुधारक आंदोलनों से फर्क करना था और दूसरी तरफ ब्रिटिश शासकों के सामने अपनी प्राचीनता का दावा करना। कुछ हद तक इसके पीछे एक मंशा और थी और वह यह कि हिन्दू नाम दो कारणों से स्वीकार्य नहीं था- पहला यह कि यह एक विदेशी, फारसी मूल का शब्द था और दूसरा यह कि अंग्रेज शासकों ने इसे एक छत्रिनुमा पद की तरह इस्तेमाल करते हुए अलग-अलग संप्रदायों की एक सामूहिक पहचान में बाँध दिया था जो सबको स्वीकार्य नहीं था। खुद गाँधी ने 1921 में अपना परिचय सनातनी या सनातन धर्मावलम्बी कह कर दिया था। मगर जैसा कि अशीष नंदी कहते हैं, गाँधी खुद को सनातनी कहते जरूर थे, मगर वे अपने कर्म से उसकी धुरी बदले दे रहे थे - ब्राह्मण और शास्त्र की केन्द्रीयता की जगह हरिजन व दरिद्र नारायण को तरजीह दे रहे थे।
यह सही है कि दलित मानस के लिए हरिजन शब्द में हमेशा एक किस्म की सरपरस्ती की बू आती है, जहाँ उनकी अपनी एजेंसी विलुप्त रहती है और अंबेडकर की गाँधी के प्रति खीझ बहुत आसानी से समझी जा सकती है। पर गाँधी के नजरिये से देखें, तो वे तो उस सनातनी समाज को संबोधित कर रहे थे जो छुआछूत जैसे चलन में विश्वास करता है उस आधार पर मंदिरों में दाखिले से लेकर कुँए के पानी के इस्तेमाल तक से उन्हें वर्जित करता था। और ऐसा यह समाज इसे शास्त्र-सम्मत मान कर करता था। गाँधी का निशाना इधर था और कई ऐसे मौके आए जब मंदिर-प्रवेश सत्याग्रहों के दौरान हुई बहसों में जब शास्त्रों के हवाले दिये गए, तो गाँधी ने बिना शास्त्रार्थ में उलझे सिर्फ यह कहना उचित समझा कि जो शास्त्र इनकी इजाजत देते हैं, वे उन्हें नकारते हैं। अनिल नौरिया (2006) लिखते हैं कि- दरअसल खुद को सनातनी कहने के बावजूद उन्होंने खुद वर्णधर्म को नहीं माना - उनके अपने आश्रम में तो नहीं ही इसका पालन किया। बल्कि लगातार 1930 के दशक में छुआछूत के खिलाफ यात्राएँ कीं और अभियान चलाए जिसके दौरान उन पर प्राणघातक हमले भी हुए। कहीं पाथराव तो कहीं बम भी फेंके गए। 1945 तक आते-आते गाँधी यह समझ चुके थे कि अंबेडकर का मानना इस मामले में सही था और वर्ण व्यवस्था के रहते छुआछूत का उन्मूलन संभव नहीं है।
आज पीछे मुडकर देखते हैं, तो हमें यह समझने में दिक्कत नहीं होती कि गाँधी का प्रोजेक्ट भी बाकी सुधारकों की कोशिशों की तरह ही नाकाम रहा। मगर फिलहाल यह हमारी बहस का मुद्दा नहीं है। इस वक्त हमारी दिलचस्पी गाँधी के चिंतन में ज्यादा है। गौर करने लायक बात यह है कि गाँधी ने जिस सनातन धर्म को अपनाया, उसे ज्यों का त्यों नहीं अपनाया, बल्कि उनका अमल उसे लगातार बदलने के लिए प्रयासरत रहा और उस धर्म की उनकी व्याख्या में हिन्दू विश्वासों के साथ साथ बौद्ध और जैन मत जैसे गैर-ब्राह्मण श्रमणवादी विचार भी खामोशी से अपना काम करते रहे। यहाँ तक कि ईसाइयत के भी तत्त्व उनके चिंतन में मौजूद थे ऐसा कई अध्येताओं का मानना है।
सनातन धर्म के प्रति गाँधी के रवैये में हमें उनके कुल चिंतन के तो कई सुराग मिलते ही हैं, साथ ही हिंदुस्तान और राष्ट्रियता व राष्ट्रवाद के बारे में भी उनकी सोच का पता चलता है। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि गाँधी ने 1909 में लिखी अपनी किताब का नाम हिन्द स्वराज रखा था। अपने जीवन काल में कभी भी उन्हें इसे बदलने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई। यह तथ्य दिलचस्प इसलिए है, कि इसमें वे भारत नाम की किसी प्राचीन शय के स्वराज की बात नहीं करते हैं बल्कि हिन्द के स्वराज की- हिन्द यानी उनके जमाने का हिंदुस्तान। यहाँ भी गाँधी किसी स्रोत की ओर वापसी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते क्योंकि वे जानते हैं कि उनके आज का हिंदुस्तान किसी गंगोत्री में नहीं मिलेगा, बेशक उस स्रोत का पानी कितना ही शुद्ध हो, क्योंकि हिंदुस्तान तो एक समंदर है जिसमें न जाने कितनी ही नदियों और धाराओं का समागम हो चुका है। किसकी मजाल है कि समंदर को वापस उसके स्रोत तक पहुँचा दे - वो स्रोत जो अपनी शुद्धता के बावजूद (या उसके चलते ही) कभी भी समंदर की तरह अनगिनत प्राणियों को जीवन नहीं दे सकता। गाँधी तो उस हिन्द के कायल थे जिसके बारे में फिराक गोरखपुरी लिखते हैं -
सरजमीन-ए-हिन्द पर अक्वाम-ए-आलम के फिराक
काफिले बस्ते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया।
गाँधी के लिए देश या राष्ट्र न किसी सुदूर अतीत में बसता है और न ही वह इबादत की या पूजा की चीज है, बल्कि वह हमारे वर्तमान का ही अंग है। अकारण नहीं कि और लोगों की तरह गाँधी राष्ट्र के अतीत की खोजबीन में नहीं जुटे - न मिथकीय अर्थ में और न ही आधुनिक इतिहासवेत्ता की तरह। बल्कि इतिहास से वे हमेशा बहुत सावधान रहा करते थे क्योंकि उनका मानना था कि इतिहास में झगडों, युद्धों, और फसादों का ही विवरण होता है, उसके अध्ययन से महज पुराने जख्म कुरेदे जा सकते हैं। अक्सर तोल्स्तोय के उद्धरण को वे दोहराते थे कि सुखी परिवारों का कोई इतिहास नहीं होता। इतिहास तब बनता है जब कोई ऐसी घटना घटे, जहाँ एक भाई दूसरे की जान लेने पर आमादा हो जाए। ऐसा ही राष्ट्र के संदर्भ में होता है। कुछ-कुछ राष्ट्रवाद के सिद्धांतकार अर्नेस्ट रेनन की तरह गाँधी भी मानते थे कि राष्ट्र का वजूद यह माँग करता है कि उसके सदस्य कुछ बातें भूलने के लिए तैयार हों - पुराने जख्मों को बार-बार हरा करते जाने से कोई राष्ट्र नहीं बनता।
दरअसल राष्ट्र का तसव्वुर - जिसे हम अंग्रेजी के नेशन के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं - अपने गहनतम अर्थ में स्रोत की ओर वापसी और प्राचीनता के दावों के साथ जुडा है और सिर्फ अपनी जन्मभूमि यूरोप में नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दुनिया के तमाम राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों में भी उसका यही चरित्र रहा है। दुनिया भर के राष्ट्रवादियों की कोशिश उस गौमुख तक पहुँचने की रही है, जहाँ उन्हें अपनी राष्ट्र की गंगा पवित्रतम रूप में मिल सके। ऐसा करते ही शुद्धता की तलाश शुरू हो जाती है जिसका अंजाम अक्सर एथनिक क्लेंजिंग तक ले जाता है। इस अर्थ में गाँधी दरअसल राष्ट्रवादी नहीं कहे जा सकते हैं। हिंदुस्तान का उनका तसव्वुर दुनिया भर के ज्यादातर राष्ट्रवादियों के अपने राष्ट्रों के तसव्वुर से बिलकुल अलग है। मगर राष्ट्र चूंकि किसी गंगोत्री या गौमुख में बने बनाए नहीं पाए जाते हैं बल्कि एक समूहिक तसव्वुर के जरिए वजूद में आते हैं, इसलिए वह हमेशा ही खतरे में रहता है, हर रोज अपने बाशिंदों और सदस्यों से वफादारी का सबूत माँगता है। इसके बिलकुल विपरीत गाँधी का राष्ट्र कोई ठोस भौतिक चीज नहीं है, बल्कि एक जज्बा है जो बडी बेतकल्लुफी से हर एक को कुबूल कर लेता है। वह विविधता से घबराता नहीं है क्योंकि उसके सदस्यों को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होती है। हमारी तमाम स्थानीय भाषाओं में देस या वतन या नाडु जैसे शब्द हैं जिनके जरिए हम अपनी उस जन्मभूमि को चिन्हित करते हैं, जो वास्तव में हमारी जगह होती है। ये देस, वतन या नाडु अवध या ब्रज या बुंदेलखंड जैसी जगह हो सकते हैं या शायद और भी छोटा, चंद गाँवों का इलाका हो सकता है। ये देस या वतन हम से कभी अपने होने का सबूत नहीं माँगता क्योंकि उसके साथ हमारा रिश्ता राष्ट्र या राष्ट्र-राज्य वाला नहीं होता है। गाँधी के हिंदुस्तान का जज्बा कुछ इसी तरह का था।
राजनीति का सवाल
हमारा यह दावा कि गाँधी राजनीति को खारिज करते हैं- बहुत से लोगों को अजीब लग सकता है। गाँधी राज्य से किनारा करते रहे यह तो लोग मनाने को तैयार हो सकते हैं, मगर राजनीति का भी तिरस्कार करते हैं यह कैसे मान लें? आखिरकार क्या वे हमारी जंगे-आजादी जैसे इतने बडे राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर रहे थे? बेशक यह बात बिलकुल सही है, मगर जैसा कि कईं विद्वान तर्क दे चुके हैं, वे राजनीति को एक ऐसी बुराई की तरह देखते थे जिसे उन्हें मजबूरी में गले लगाना पडा था - मूलतः आजादी की लडाई लडने के लिए। अगर बारीकी से देखें, तो पाएँगे कि दरअसल गाँधी लगातार इस सवाल को लेकर एक द्वंद्व की स्थिति में दिखते हैं। मैं जो कहना चाहता हूँ उसे बेहतर समझने के लिए यह जरूरी ही कि दो बातें ध्यान में रखी जाएँ।
पहली यह कि राजनीति शब्द ने पिछले दशकों में जो व्यापक अर्थ ले लिया है उसे फिर से थोडा संकुचित किया जाए। याद रखने की जरूरत है कि पहले माक्र्सवाद के असर के चलते राजनीति को हर उस जगह देखा गया, जहाँ सत्ता-संबंध मौजूद थे - खासकर वर्ग संबन्धों और पैदावार के रिश्तों के संदर्भ में। फिर उसके बाद नारीवाद ने पर्सनल इज पॉलिटिकल - यानी जाति भी राजनीतिक है - के अपने नारे के जरिए परिवार और नारी-पुरुष संबंधों में मौजूद सत्ता के रिश्तों की ओर ध्यान खींचते हुए उसे भी इस व्यापक अर्थ में राजनीतिक करार दिया। हालांकि इस अर्थ में भी राजनीति पद का इस्तेमाल जरूरी है, यहाँ मेरा आशय, जाहिर है, इस अर्थ से नहीं हैं बल्कि राजनीति की औपचारिक जमीन पर, अर्थात राजसत्ता, सरकार, चुनाव, पार्टी, आदि के स्तर पर जो घटित होता है उससे है। मगर यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि जैसे एक व्यापक अर्थ में राजनीति कहीं भी हो सकती है, उसी तरह यह भी जरूरी नहीं कि राजनीति की औपचारिक जमीन पर जो कुछ भी होता है, उसे राजनीति कहा जा सकता है। राजनीति का अर्थ अगर सत्ता संबंधो में अपनी दावेदारी पेश करने से लिया जाए तो पाएँगे कि राजनीति की औपचारिक जमीन पर अक्सर जो होता है वह इस दूसरे अर्थ में (यानी दावेदारीयों के अर्थ में) राजनीति का ध्वंस ही है। दावेदारियों के अर्थ में राजनीति से गाँधी ने कभी परहेज नहीं किया- बेशक वो दावेदारियाँ उन्हें किसी भी क्षेत्र में पेश करनी पडी हों। गाँधी ने परहेज किया, तो राजनीति की औपचारिक जमीन से, उस में दाखिल होने से। जब तक वे आजादी की लडाई के रहनुमा थे तब तक जिस हद तक अपने दावे पेश करने के लिए जरूरी था वे उसमें दाखिल हुए मगर जैसे ही उन्हें आजादी हासिल होती दिखाई दी, उनहोंने तजवीज रखी कि अब कांग्रेस का काम खत्म हो चुका है और उसे भंग कर के कांग्रेस सेवा दल का गठन करना चाहिए जो गाँव देहात में लोगों की सेवा करे। गाँधी ने न सिर्फ कांग्रेस को भंग करने की बात कही, बल्कि संविधान सभा में भी दाखिल नहीं हुए। दरअसल संविधान सभा की बैठकें जब शुरू हो रही थीं, तब तो वे नोआखली में दंगों की आग बुझाने के लिए चल पडे थे। लेकिन उनका संविधान सभा में शामिल न होना इसलिए नहीं था कि वे नोआखली में थे, बल्कि उसके पीछे राजनीति को लेकर उनकी खास समझ थी।
इससे जुडती है दूसरी बात जिस पर गाँधी के राजनीति के तिरस्कार के संदर्भ में ध्यान देने की जरूरत है। इसे वक्त के एक और पहलू के संदर्भ में समझा का सकता है- रोजाना जिंदगी के वक्त की लय और ताल जो एक खास, धीमी रफ्तार से चलती है जिसमें कई तरह की अंतरक्रियाएँ शामिल होती हैं बनाम राजनीति के धरातल का वक्त जिसकी रफ्तार बिलकुल अलग होती है जहाँ आप हमेशा किसी और ताकत के बरक्स या जरूरत के चलते लगातार हरकत में रहते हैं। अगर रोजाना जिंदगी के वक्त का ताल्लुक जन्म, मृत्यु, शादी-ब्याह, तीज-त्योहारों, नौकरी, स्कूल और रोज की छोटी-छोटी खुशियों और गमों से होता है तो राजनीति का वक्त उथल-पुथल, संघर्षों, टकराहटों, पहचान की दावेदारियों और कुल मिलकर अगर कार्ल श्मिट की भाषा में कहा जाए, तो दोस्त-दुश्मन के फर्क पर आधारित अदावतों का वक्त होता है। उसकी लय और रफ्तार आफ काबू से बाहर ही होती है। गाँधी यह मानते थे कि वास्तव में दोस्ती, मेल-मिलाप, भाईचारे और मोहब्बत आदि की जमीन रोजमर्रा की जिंदगी में ही होती है; राजनीति तो इतिहास की ही तरह सिर्फ संघर्षों और अदावतों को और बढाती है। इसलिए जहाँ जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल समेत आजादी की लडाई के तमाम नेता यह मानते थे कि एक बार आजादी मिल जाए, तो हिन्दू-मुसलमान एकता भी आसानी से कायम की जा सकेगी, वहीं इसके बिलकुल उलट गाँधी का खयाल था कि बिना हिन्दू-मुसलमान एकता कायम किए जो आजादी मिलेगी, वह बेमानी भी होगी और टिकाऊ भी नहीं होगी। तो फिर ये एकता कैसे कायम हो? बकौल गाँधी उस मेल मोहब्बत की जमीन रोजाना जिंदगी ही है। इसीलिए आजादी की लडाई के दौरान ऐसे कई मौके आते हैं, जब गाँधी आंदोलन और राजनीति से अलग होकर रचनात्मक कार्यक्रम में जुट जाते हैं। 1941 में लिखी इसी नाम की पुस्तिका में वे इस बात पर जोर देते हैं। मैंने बहस की सुविधा के लिए ऊपर हिन्दू-मुसलमान सौहार्द का जिक्र किया, मगर गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रम के पहले संस्करण में तेरह सूत्र थे जिनमें सांप्रदायिक एकता पहला था, तो अस्पृश्यता उन्मूलन दूसरे नंबर पर था। मगर उन तेरह सूत्रों में नई तालिम से लेकर खादी व ग्रामोद्योग, आर्थिक गैर-बराबरी, औरतों के प्रश्न आदि कई मुद्दे उठाए गए थे जिनके बिना, उनका कहना था, स्वराज अधूरा ही रह जाएगा। (देखें गाँधी 1945)
मेरी समझ से समय की रफ्तार का मामला गाँधी के लिए केंद्रीय महत्त्व का सवाल था जिसे वे बार-बार हिन्द स्वराज में अलग-अलग तरीकों से रेखांकित करते हैं। यहाँ उसकी तफसील में जाना तो संभव नहीं है, मगर यह बात याद रखने लायक है कि तीन दशक बाद, 1939 में लिखते हुए गाँधी हिन्द स्वराज के बारे में कहते हैं कि इस बेहद सरल किताब को समझने की कुंजी यह जज्ब करना है कि उसमें किसी जाहिल, अंधकारमय युग में लौटने की कोशिश नहीं है। उसमें तो स्वैच्छिक सादगी, स्वैच्छिक गरीबी और धीमेपन में सौन्दर्य तलाशने की एक कोशिश थी। (गाँधी 1977- 242) मैंने अपने एक अन्य लेख में इसे सुस्तकदमी का सौन्दर्यशस्त्र कहा था और मुझे अब भी यह लगता है कि बुनियादी तौर पर आधुनिकता से उनकी यह शिकायत है कि उसने जीवन के रोजमर्रापन को इस तेज दौडती रफ्तार में झोंक कर तबाह कर दिया है।
डेनिस डाल्टन से लेकर बी. एन. गांगुली तक कई अध्येताओं ने गाँधी के राज्य के प्रति रवैये की चर्चा की है और यह तर्क रखा है कि उनका यह रुख अराजकतावादी (अनारकिस्ट) है। एक हद तक यह बात सही जरूर है कि उनके फलसफे में अराजकतावाद के कई तत्त्व देखने को मिलते हैं, मगर यह भी सही है कि वे हिंदुस्तान जैसे बहुलता और विविधतापूर्ण देश में गैर-राजनीतिक रोजानापन को एक खास अहमियत इसलिए भी देते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि तेजी से फैलते विद्वेष की काट ऊपरी और सतही राजनीतिक एकता से नहीं हो सकती। इसके लिए एक किस्म की अध्यात्मिकता, एक खास जज्बा चाहिए, जो उनकी नायाब परिभाषा में उस सार्विक धर्म में ही मिल सकती है जो शायद रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मानुषेर धर्मों या मनुष्य का धर्म के बहुत करीब है। गाँधी मानते हैं कि बाकी की सारे धर्म - इसाइयत, इस्लाम, यहूदी धर्म या खुद उनका सनातन धर्म - सब उस सार्विक धर्म के ही अलग अलग रूप हैं। एक अर्थ में यह अद्वैतवाद की भी विरल व्याख्या कही जा सकती है - ब्रह्म को अगर वह अंतिम सत्या माना जाए, जिसके रूप हमें संसार की विविधता में देखने को मिलते हैं तो उसे कुबूलना शायद सब के लिए संभव न हो, लेकिन यह कहना कि तमाम धर्म/ मजहब एक ही यूनिवर्सल रिलीजन के रूप हैं खुद धर्म को ही निर्गुण बना देता है। धर्म की यह समझ गाँधी की राजनीति की समझ से अकाट्य ढंग से जुडी मालूम होती है।
आधुनिकता की आलोचना और इकोलॉजी
एक अर्थ में गाँधी के जिन विचारों की हम अब तक की चर्चा करते आए हैं वे सभी आधुनिकता की उनकी आलोचना से ही निकलते हैं। चाहे वह धर्म का सवाल हो और समाज व समुदाय के अंदरूनी परिवर्तन का मसला हो, चाहे वह राजनीति को लेकर उनके सवाल हों, दोनों ही सीधे-सीधे आधुनिकता की उनकी आलोचना का ही नतीजा हैं। गाँधी समाज में परिवर्तन जरूर लाना चाहते थे, मगर वे राज्य को इसकी इजाजत नहीं देना चाहते थे कि वह सामुदायिक जिंदगियों में हस्तक्षेप करे। इस मामले में एक हद तक आजादी के आंदोलन के ज्यादातर नेता भी यह मानते थे कि औपनिवेशिक राज्य को समाज में हस्तक्षेप करके उसमें बदलाव लाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए मगर गाँधी जहाँ उनसे अलग थे वह यह कि उनकी निगाह में दिक्कत सिर्फ औपनिवेशिक राज्य को लेकर नहीं, राज्य मात्र को लेकर है। राज्यमात्र को वे आधुनिकता का कारिंदा मानते थे - और यह सही भी है। राज्य की मानी ही आधुनिक राज्य है जो, जिसे मिशेल फूको सत्ता-ज्ञान अथवा पावर-नॉलेज कहते हैं, उसके बूते पर खडा होता है और जो इसी वजह से जन जीवन में हस्तक्षेप को अपना अधिकार मान कर उसे बदलने पर आमादा होता है। पुराने राज्यों या साम्राज्यों को कभी इसकी जरूरत नहीं महसूस होती थी, मगर आधुनिक निजाम उसे नए सिरे से, नए सिद्धांतों की बिना पर गढना चाहता है। गाँधी को यह सूरत कतई मंजूर नहीं थी।
लेकिन गाँधी की आधुनिकता की आलोचना दरअसल इससे बहुत आगे जाती है क्योंकि अहिंसा का उनका फलसफा खुद को सिर्फ मानव समाज तक सीमित नहीं रखता है बल्कि तमाम जीवन रूपों पर लागू होता है- चाहे वह इंसानी हो चाहे गैर-इंसानी। मगर हिंसा-अहिंसा से अलग भी तकनीकी और मशीनीकरण को लेकर उनके जो विचार हैं वे बेशक व्यक्ति की स्वायत्तता के नजरिये से ही पेश किए गए हों, उनका रिश्ता प्रकृति और उसमें इंसानी दखलंदाजी के लिए बिलकुल साफ हैं। ये बात कम-अज-कम आज तो हमारे सामने स्पष्ट है। उन्हें यह शिकायत रहती थी कि मशीनीकरण के चलते जो बडे बडे कारखाने वजूद में आते हैं उसमें मजदूर अपने समय पर काबू खो बैठता है और मालिक का गुलाम बन जाता है।
यह बात सच है की गाँधी ने कभी भी सीधे-सीधे पर्यावरण पर या इकोलॉजी पर कुछ नहीं कहा या लिखा, मगर कुल मिलाकर उनकी आधुनिकता की आलोचना और उसके एक खास पहलू - उपभोग पर नियंत्रण का उनका आग्रह और अपनी जरूरत से ज्यादा उपभोग न करने का उनका आग्रह - कई अर्थों में इकोलॉजी और पर्यावरणीय आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। उनका यह कहना कि पृथ्वी और प्रकृति के पास हम सब की जरूरत के लिए तो पर्याप्त है* मगर हमारी उपभोग की हवस शांत करने के लिए नहीं, बाद के वक्त में आई पर्यावरणीय चेतना के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक बना। डीप इकोलॉजी के प्रवर्तक, नोर्वेजिया के अरने नएस को अपने डीप इकोलॉजी फलसफे के लिए गाँधी के एक अद्वैतवादी कथन से प्रेरणा मिली जिसमें वे कहते हैं कि अहिंसा की शक्ति तक पहुँचने की सबसे बुनियादी बात है समस्त जीवन की आधारभूत एकता में विश्वास। यहाँ न तो हम डीप इकोलॉजी आंदोलन पर विस्तृत बहस में जाना चाहते हैं और न ही गाँधी के तमाम ऐसे विचारों पर जो पर्यावरणीय सरोकारों से ताल्लुक रखते हैं। इन विचारों के साथ हमारे मतभेद हो ही सकते हैं और इन सरोकारों से जुडाव बनाए रखते हुए भी हम इनके प्रति एक आलोचनात्मक नजरिया रख सकते हैं- बल्कि रखना ही चाहिए।
इस लेख में हमारा मकसद सिर्फ गाँधी के विचारों के हमारे आज के साथ बने ऐसे रिश्तों को सामने रखना था जो खुद उनके अपनी नियत और मंशा से बहुत आगे जाते हैं क्योंकि एक अलग ही अंदाज में वे हमे अपने वक्त से दो चार होने में मदद करते हैं और हमें उस तरह पढने की दावत देते हैं जिस तरह गाँधी खुद धर्म और राष्ट्र को देखते हैं - उनमें कैद हुए बिना।
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संदर्भ
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