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महात्मा गाँधी का हस्तक्षेप

कुमार प्रशांत
मौन सबसे सशक्त भाषण है. धीरे-धीरे दुनिया आपको सुनेगी।
- महात्मा गाँधी
यह महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती का वर्ष है। सीधा-सा मतलब यह कि आज गाँधी होते, तो 150 साल के होते! देखा है किसी 150 साल के आदमी को? सोचा है कभी कि 150 साल का आदमी कितने काम का होगा? और आलम यह है कि सारे लोग- वैज्ञानिक भी, समाजशास्त्री भी, राजनेता भी, आचार्य और पंडित भी और अपना मुँह छिपाते-चुराते पाखंडी राजनेता भी कहते हैं कि हमारे वक्त के सवालों के जवाब यहीं कहीं गाँधी के पास हैं। ऐसा क्यों हैं ? ऐसा इसलिए है कि महात्मा गाँधी ने हमारे जीवन के और हमारे समाज के प्रायः हर मामले में लगातार हस्तक्षेप किए; और इस तरह किए कि अब वे मिटाए नहीं मिट रहे हैं।
उनके बिना हम मजे से जी रहे थे। हमारे आला हिंदुस्तानी अंग्रेज बने रह कर, अंग्रेजों की सोहबत का पूरा आनंद लेते हुए, उनसे सालाना जलसों में जंग भी कर लेते थे; संगीत भी चल रहा था, साहित्य भी; विज्ञान भी चल रहा था, व्यापार भी; रायबहादुरी भी चल रही थी और रायसाहबी भी। इस आदमी ने आ कर मुसीबत पैदा कर दी। इसने बताया कि जिससे लड रहे हो, जिससे असहमत हो तुम उसके जैसे बन और रह कैसे सकते हो? इसने कह दिया कि देश के सिपाही बनना हो तो भाषा बदलो, कपडे बदलो, तीज-त्योहार, रीत-रिवाज बदलो। इसने ही यह कीडा हमारे मन में डाल दिया कि जैसे आजादी का कोई विकल्प नहीं है वैसे ही लडाई लडने का भी कोई विकल्प नहीं है। और फिर यह भी समझाया कि लडाई में कायरता, क्रूरता या चालाकी नहीं, वीरता, सत्य और धीरता से काम लेना होगा। जरा सोचिए तो कि किसने और कब कहा था कि दुश्मन से लडने में भी कायरता, क्रूरता, चालाकी, हिंसा, झूठ की जगह नहीं है? ये सारी बलाएँ गाँधी ही हमें सौंप गये हैं।
दुनिया में कहीं गाँधी नहीं हुए, लेकिन आजादी तो सबको मिली। फर्क यह हुआ कि दूसरों की आजादी आजादी ही रह गई, हमारी आजादी नई संभावना बन गई। हालांकि हमें आधी-अधूरी आजादी मिली और वह भी बहुत रक्त-रंजित मिली, लेकिन उसकी संभावनाओं की चर्चा तब भी और आज भी दुनिया भर में चलती है। उस लडाई की संभावना को समझने में दिग्गज लगे हुए हैं जिसमें लडते तो पूरी ताकत से हैं, लेकिन इस बद्धता के साथ कि सामने वाले वाले की जान नहीं लेनी है। यह लडाई का अलग ही तरीका है जो गाँधी से पहले संसार जानता नहीं था। गाँधी ने पहली बार हमें सिखाया कि बहादुरी जान लेने में नहीं, देने में है। आप जीते किस तरह हैं यही नहीं, आप मरते किस तरह हैं, यह भी आजादी का दिल और दिमाग बनाता है। इसलिए गाँधी के लिए साध्य-साधन विवेक आदर्श का नहीं, व्यवहारिकता का सवाल बन जाता है। तुम गलत या अशुद्ध रास्ते चल कर अपने पवित्र साध्य तक पहुँचोगे, तो पाओगे कि उस रास्ते ने ही तुम्हारे साध्य का स्वरूप बदल देगा, यह कहने का साहस और उस पर टिके रहने का आत्मविश्वास गाँधी से मिला है संसार को।
उसने कहा कि अहिंसा अगर रणनीति है, तो धेले भर भी इसकी कीमत नहीं है; और इससे भी सच्ची बात यह कि यदि यह रणनीति है, तो हमारे-आफ काम की नहीं है, क्योंकि रणनीति तो रणक्षेत्र में उतरा सैनिक या सेनापति, दुश्मन की क्षमताओं और अपनी सीमाओं को देख-समझ कर बनाता है। इसलिए कभी, किसी काल में, किसी के काम आई अहिंसा की रणनीति आज हमारे काम आएगी, यह कैसे संभव है ? अहिंसा जब मूल्य बन कर हमारे पास आती है, तब वह पहले हमें एक नया इंसान बनाती है और फिर लडाई में झोंक देती है। कल तक जो लडाई जमाना हथियारों से लड रहा था, गाँधी ने वही लडाई बिना हथियारों के लड कर दिखाई। फिर हमने देखा कि लडाई अहिंसक बनी नहीं कि सारे बाह्य हथियार गिर गए और इंसान खुद ही हथियार बन गया। हिंसा अपने हाथ में संहार या प्रहार का कोई-न-कोई साधन ले कर अस्तित्व ग्रहण करती है और परमाणु बमों तक पहुँचती है; अहिंसा अपने हाथ में कुछ भी दूसरा नहीं लेने से शुरू होती है और अंततः इंसान को ही हथियार बना लेती है। तब तुम्हारा चलना, बोलना, कहना यानी कि तुम्हारा होना ही वह कसौटी बन जाता है जहाँ से अहिंसा जन्म भी लेती है और परवान भी चढती है।
बैरिस्टर मोहन दास से महात्मा गाँधी तक के सफर में हम जो देख नहीं पाते हैं वह है गाँधी की खुद से हुई भयंकर लडाई ! संसार में शायद ही कहीं किसी इंसान ने खुद से ऐसा युद्ध लडा होगा। बुद्ध भी ऐसे ही युद्ध में लगे इंसान हैं, लेकिन गाँधी से उनकी लडाई कुछ आसान बन जाती है क्योंकि उन्होंने लडाई का मैदान बदल लिया; जीवन के नहीं, वे वैराग्य के साधक बन गए। गाँधी इसी सांसारिक मैदान में खडे रहते हैं और हमारी आँखों के सामने अपनी साधना का सारा युद्ध लडते हैं। वे कुछ सिद्धि पा कर हमारे बीच नहीं आते हैं कि मुझे उपलब्ध हुआ ज्ञान आपको देता हूँ। वे लोक-अखाडे में ही अपना ज्ञान खोजते हैं, पाते हैं और लोक को उसमें दीक्षित करते हैं। अगर मैं कहूँ कि लोक का दीक्षित होना ही उस ज्ञान की असली कसौटी है, तो भी गलत नहीं होगा। जिसे लोक अपना न सके, बरत न सके और रोज-रोज के जीवन में जिसका इस्तेमाल न कर सके, गाँधी के लिए वैसा ज्ञान काम का नहीं है। मूल्य का स्वभाव ही है कि वह मूल को छूता है, रणनीति हमेशा चमडी तक पहुँच कर दम तोड देती है।
जीने के लिए साँस की शर्त है। ऑक्सीजन का सिलिंडर ले कर घूमना उसका विकल्प है ही नहीं। हिंसा-अहिंसा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। हिंसा या क्रोध या घृणा की लाचारी यह है कि उसकी उम्र बहुत कम होती है। आप कितने वक्त तक नाराज या किसी के प्रति घृणा पाले रख सकते हैं? आप पूरा जोर लगा लें तो भी यह भाव दम तोडने लगता है, इसकी व्यर्थता महसूस होने लगती है। आपमें इतना मानसिक/ नैतिक बल न हो कि आप इसे स्वीकार कर लें और पीछे हट जाएँ, यह बात दीगर है। दक्षिण अफ्रीका के जनरल स्मट्स ने यही तो लिखा था बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गाँधी को कि तुमसे मेरी लडाई है, लेकिन मैं लडूँ कैसे तुमसे कि तुम ही हो कि जो मेरे हर संकट में मेरी ढाल बन जाते हो ! हिंसा बदला लेने का सुख देती है, वक्ती जीत का अहसास भी कराती है, लेकिन टिकती नहीं है। अहिंसा एक साथ ही या साथ-साथ ही दोनों पक्षों को विजय तक ले जाती है।
आधुनिक अर्थशास्त्र और अर्थशास्त्री परेशान हैं कि विकास के लिए पूँजी निहायत जरूरी है, लेकिन उसी पूँजी का जैसे ही संचय होता है, वह व्यवस्था को दीमक की तरह चाटने लगती है। पूँजी चाहिए, लेकिन उसका केंद्रीकरण नहीं चाहिए। माक्र्स ने अपना निदान सामने रखा कि पूँजी को व्यक्ति के नहीं, राज्य के हाथ में रहना चाहिए। साम्यवाद इसी दर्शन की पैदावार है। व्यक्ति के हाथ से निकल कर पूँजी राज्य के हाथ में तो पहुँची, लेकिन दुनिया ने देखा कि उससे एक नये किस्म का पूँजीवाद पैदा हुआ जिसे स्टेट कैपटलिज्म कहते हैं। यूगोस्लाविया की साम्यवादी क्रांति के जनकों में एक मिलोवान जिलास अपनी किताब में लिखता है कि राज्य के हाथ में पूँजी देने का हमारा जो साम्यवादी प्रयोग हुआ, उसने समाज में एक नया ही वर्ग खडा कर दिया है जिसके हाथ में पूँजी और सत्ता का ऐसा केंद्रीकरण हुआ है कि जैसा इतिहास में पहले कभी हुआ नहीं था। इसने समाज को एक नई गुलामी में डाल दिया है। गाँधी कहते हैं कि उत्पादन को हम जितना विकेंद्रित करेंगे, पूँजी का भी उतना ही विकेंद्रीकरण होगा। समाज उन छोटी-छोटी पूँजियों को नियंत्रित कर, अपनी स्वतंत्रता, समता और आवश्यकता को सँभाल सकेगा। वे बताते हैं कि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की दूरी को पाटे बिना एकत्रित पूँजी के दुष्परिणाम से बचना संभव ही नहीं है। गाँधी का खादी-ग्रामोद्योग कपडा बनाने और पापड बेलने के लिए नहीं था, वह पूँजी और सत्ता की दुरभिसंधि को काटने की युक्ति थी। आज जब दुनिया भर में मंदी छाई है और इतनी लंबी चलती जा रही है कि सारी दुनिया के सारे अर्थशास्त्री मिल कर भी कोई रास्ता तलाश नहीं पा रहे हैं, गाँधी का यह अर्थशास्त्र प्रयोग के लिए सबको ललकार रहा है।
गाँधी का राष्ट्रवाद व्यक्ति की निजी गरिमा व स्वाभिमान से जुडता है, उसे भीड के साथ नहीं जोडता है। गाँधी सुराज नहीं, स्वराज्य की बात करते हैं, बल्कि यह भी कहते हैं कि स्वराज्य ही सुराज है। आज बडे शोर-शराबे के साथ जिसे राष्ट्रवाद कह कर हमें पिलाया जा रहा है, दरअसल वह राष्ट्र को खंड-खंड अपनी मुट्ठी में करने की कुटिल चाल भर है; अपनी सांप्रदायिकता को छिपाने का फूहड उपक्रम भर है।
स्वराज्य में चयन की स्वतंत्रता होती है, राष्ट्रवाद में आपका चयन होता है। राष्ट्रवाद के लिए धर्म एक हथियार है कि जिससे अपने से असहमत या अलग किसी की भी गर्दन काटी जा सकती है। अगर धर्म इस काम नहीं आता हो या नहीं आ सकता हो, तो इन सारे धर्मावलंबियों को धर्म छोडने या बदलने में क्षण भी न लगे! गाँधी कहते हैं कि आदमी के भीतर, हर आदमी के भीतर छिपी संभावनाओं को उजागर करना ही सबसे बडा धर्म है।
गाँधी के साथ हमारी मुश्किल यूँ आती है कि वह हमारे पढने मात्र से, कोरी ध्यान- साधना से, कर्मकांड से, धार्मिक-सांप्रदायिक प्रतीकों से चिपकने से हाथ आता ही नहीं है। उसे समझना हो कि उसके पास पहुँचना हो, तो वह उसके साथ चले बिना संभव नहीं है। गाँधी की पूजा नहीं, गाँधी की दिशा में छोटा-बडा सफर ही उन्हें ही नहीं, हमें भी जिंदा रख सकेगा।
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