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सभ्यता की खोज

कनक तिवारी
खुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, सामंजस्य में हों।
- महात्मा गाँधी
1. शुरुआत से ही गाँधी में पूरे जीवन आधुनिक पश्चिमी या मशीनी सभ्यता से द्वन्द्व की पृष्ठभूमि छाई हुई है। गाँधी का यह तनाव पूरी पुस्तक में लगातार सघन है और उनके चेहरे पर खींची चिंता, विदू*प और चुनौती की लकीरें भी। आधुनिक राजनीतिक विचार को यह फिलासफी एक अपराजेय योगदान के रूप में सदैव रेखांकित की जाएगी। आधुनिक सभ्यता के कुछ कंटीले लक्षण थे जिन्होंने गाँधी को युवावस्था में ही एक राजनीतिक चिंतक बनने पर मजबूर किया अथवा उनके लिए इस तरह का चुनौतीपूर्ण प्रतिकूल मौसम मुहैया कराया। यह भी सही है कि गाँधी की समीक्षा अनायास, आक्रमणकारी, कठोर और भावुक भी रही है और वह भी सहसा, लेकिन नकारात्मक नहीं। सरसरी तौर पर पढने से गाँधी से कई बिंदुओं पर असहमत होने का जी भी चाहता है, लेकिन गाँधी की अपनी प्रस्थापनाएँ उनकी सरल लगती जटिल बुद्धि से सहसा उपजीं कि एक अनुसंधानशील पाठक को भी गाँधी से छिटकने में पसीना आ जाता है। यह भी सही है कि आधुनिक सभ्यता की आलोचना के बरक्स गाँधी के द्वारा वैकल्पिक मॉडल दे देने से आधुनिक सभ्यता के पक्षकारों को गाँधी के मॉडल का तुलनात्मक और सांगठनिक अध्ययन करना भी आवश्यक हो जाता है।
2. गाँधी की यह चतुर व्यूह-नीति एक पॉजिटिव परिकल्पना के रूप में भी स्थापित होती है। इस तरह गाँधी आधुनिक सभ्यता के फकत आलोचक नहीं हैं। वे खुद के विचार दर्शन को एक वैकल्पिक मॉडल की आधार भित्ति के रूप में आलोचना के जंगल में छोड देते हैं, जिससे गाँधी और आधुनिक सभ्यता के बीच आवश्यकतानुसार चुनाव भी किया जा सके। गाँधी ने नागरिक आजादी, समानता, अधिकार, आर्थिक बेहतरी, स्त्री स्वातंत्र्य और धार्मिक सहिष्णुता आदि पर अपने विचार परीक्षण हेतु प्रस्तुत किए हैं, जिससे यह न समझा जाए कि गाँधी केवल आलोचना करते नकारात्मक विचारक हैं। गाँधी के लिए आजादी स्व-राज से संयुक्त परिकल्पना है। उनके यहाँ अधिकार और कर्तव्य में पारस्परिकता है। ठीक उसी तरह जैसे ज्ञान और नैतिकता में, आर्थिक तरक्की और चारित्रिक प्रगति में, धार्मिक स्वतंत्रता और मजहबों के आपसी सद्भाव में तथा नारी स्वातंत्र्य और मानवता के व्यापक संदर्भों में।
3. दक्षिण अफ्रीका के शुरुआती वर्षों से ही अपने ऐतिहासिक तर्क में गाँधी ने आधुनिक सभ्यता को पूरी तरह अपने पंजों के तर्कशास्त्र में दबोच लिया था। उन्होंने यह पाया था कि उसमें कई खराबियाँ, कमियाँ और विसंगतियाँ हैं। वे उसकी कुछ अच्छी विशेषताओं के ऊपर हावी होकर दुनिया की जिंदगी में सडांध पैदा कर रही हैं। समकालीन यूरोप और अमेरिका दूसरी ओर औद्योगीकरण, वैज्ञानिक प्रगति और उत्पादन के शिखर पुरुष बने विश्व वातायन में कुलाँचे भर रहे थे। पश्चिम के लोग सोच ही नहीं सकते थे कि तकनॉलॉजी के जरिए प्रकृति पर क्रमषः नियंत्रण करते हुए जो सामाजिक बदलाव वे ताबडतोड किए जा रहे हैं, उनमें खोट की संभावना भी कोई ढूँढ रहा होगा। गोरे चेहरों की लाली में केवल उनकी उपलब्धि का रक्त संचार नहीं था। उसमें उगने वाले कल के सूरज के अरुणोदय का साक्षात्कार भी किसी आख्यायिका की भूमिका की तरह वक्त ने लिख दिया था। एक युवा भारतीय वकील अपने चालीसवें वर्ष में प्रगति और विकास की पूरी अवधारणा को उलट पलट करने का दुस्साहस करता हुआ एक कालजयी कृति उनकी ही झोली में डालेगा। यह उनके लिए एक अजूबा सिद्ध हुआ। ऐसा करने में गाँधी एक पुरातनवादी सैद्धान्तिक होने से कहीं ज्यादा एक उत्तर-आधुनिक विमर्श बेहद सपाट, कामचलाऊ और गैरअलंकारिक गुजराती भाषा में एक काठियावाडी वणिक की व्याख्यात्मक वृत्ति और समाजशास्त्रीय समझ के साथ शुरू करते कहते हैं। उनमें नीति या धर्म की बात ही नहीं। सभ्यता के हिमायती साफ कहते हैं कि उनका काम लोगों को धर्म सिखाना नहीं है। कुछ लोग मानते हैं कि धर्म तो ढोंग है। दूसरे कुछ लोग धर्म का दम्भ करते हैं, नीति की बात करते है। फिर भी, मैं बीस वर्ष के अनुभव के आधार पर कहता हूँ कि नीति के नाम पर अनीति सिखाई जाती है। यह तो बच्चा भी समझ सकता है कि नीति ऊपर बताई बातों मे हो ही नहीं सकती। सभ्यता को तो इसी की चिन्ता है कि शारीरिक सुख कैसे मिले। यही देने का प्रयत्न करती है किन्तु वह सुख नहीं मिल पाता।
4. स्वराज के सिलसिले में की गई सभ्यता समीक्षा गाँधी के जीवन का सबसे घुमावदार मोड है। उसकी वजह से आधुनिक सभ्यता की जीवंतता और नैतिक विश्वसनीयता को लेकर गहरे संदेह उठ खडे हुए। यह संयोग था अथवा गाँधी की भविष्य दृष्टि कि उनकी थ्योरी के प्रकाश में आने के कुछ वर्षों बाद ही धरती की छाती पर प्रथम विश्व युद्ध का कैंसर फूट पडा। अपने तमाम दावों और प्रतिदावों के बावजूद आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को राष्ट्र-राज्यों और औपनिवेशिक तथा दास-राज्यों के बीच आपसी सहमति, सांस्कृतिक सहनशीलता और राजनीतिक सहिष्णुता की समझ का कोई स्पेस नजर नहीं आता। गाँधी आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की देह में उग आई स्वार्थपरकता, लोलुपता और आत्मतुष्टि जैसे घावों पर मरहम लगाने के बदले उसकी पूरी शल्य क्रिया किए जाने के हिमायती बनकर अपने सभ्यता संबंधी चिकित्सकीय ज्ञान का झंडा गाडते हैं। आगे चलकर द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्धों के रास्ते चलते इसी आधुनिक सभ्यता का शीशमहल अपनी कमजोर बुनियाद के कारण भरभरा कर गिर पडता है। यह दुनिया ने तो बीसवीं सदी के छठवें दशक के बाद देखना शुरू किया, लेकिन उसे गाँधी ने उस सदी के पहले दशक में ही देख लिया था।
5. असल में हिन्दुस्तान की आ*ाादी का एक बहुत बडा संदर्भ दो विपरीत सभ्यताओं के संघर्ष से रहा है। गाँधी के लेखे भारत की गुलामी केवल राजनीतिक गुलामी नहीं थी। वह भले उस तरह दिखी हो। दरअसल पश्चिम की सभ्यता ने अमरबेल की तरह भारतीय सभ्यता के बोधिवृक्ष को नाग बनकर डस लिया है। यही हमारी असली गुलामी रही है। इस गुलामी को सबसे मजबूत, कालजयी और बल्कि क्रूर लगती भाषा में गाँधी चुनौती देते हैं। उन्होंने साफ कहा कि पश्चिम की सभ्यता एक चांडाल सभ्यता है। वह शैतानियत की सभ्यता है। इस सभ्यता से मुक्ति पाए बिना आ*ाादी की कोई कल्पना नहीं हो सकती। बीसवीं सदी के भारतीय वांङ्मय में किसी भी देशभक्त भारतीय ने विश्व संसद में खडे होकर इस तरह का तेजतर्रार आक्रमण पश्चिमी सभ्यता के मुँह पर तमाचा मारने की शैली में नहीं किया। यह केवल तकनीक नहीं थी। यह केवल रणनीति नहीं थी। गाँधी अपनी आत्मा की गहराइयों में डूबकर आश्वस्त थे कि हिन्दुस्तान भौतिक धरातल पर राजनीतिक आ*ाादी भले ही हासिल कर ले, उसकी पुख्ता सांस्कृतिक दीवारों के अन्दर दीमकों की फौजें उग आई हैं। स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो की धर्म सभा में भारतीय संस्कृति का कीर्ति ध्वज पश्चिम की छाती पर गाढा था। उनका भी स्वर इतना तल्ख नहीं था। गाँधी की निष्कपट भाषा में एक तरह का तेजाब था। महर्षि अरविन्द ने पश्चिम की सभ्यता पर भारतीय हथियारों से आक्रमण किया। तब उनके मन में भी इतनी तीक्ष्णता नहीं थी। इसी तरह अन्य सभी मनीषियों के बारे में कहा जा सकता है। उसका अन्यथा कारण यही था कि गाँधी को छोडकर भारतीय प्रज्ञा के उनके समकालीन सभी व्याख्याकारों ने आ*ाादी की जद्दोजहद में सडक आन्दोलन नहीं किए थे। सभी ने अपनी संवेदना और कल्पनाशीलता के साथ गिरे हुए हिन्दुस्तान के लोगों का साक्षात्कार अवश्य किया था। गाँधी ने पश्चिमी सभ्यता के साँपों और बिच्छुओं का डंक अपनी आत्मा की परतों पर सीधा-सीधा सहा था।
6. गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी नस्ल द्वारा जिस तरह *ालील किया गया था, वह केवल गाँधी के अनुभव का ही जखीरा था। उसकी सर्वव्याप्ति से आजिज आकर एक आश्वस्त स्थापना गाँधी ने की थी कि जब तक पश्चिम की यह जंगली, नाशवान और भौतिक सभ्यता भारतीय परिवेश से नष्ट नहीं कर दी जाती, तब तक भारत की आ*ाादी का कोई सवाल ही नहीं है। यदि हम धैर्यपूर्वक सोचें तो समझ में आ जायेगा कि यह ऐसी सभ्यता है कि इसकी लपेट में पडे हुए लोग अपनी ही सुलगाई अग्नि में जल मरेंगे। पैगम्बर मुहम्मद की शिक्षा के अनुसार इसे शैतानी राज्य कहा जा सकता है। हिन्दू धर्म इसे घोर कलियुग कहता है। मैं आफ सामने इस सभ्यता की हूबहू तरवीर नहीं खींच सकता। यह बात मेरे बूते के बाहर की है। परन्तु यह आप समझ सकते हैं कि इसके कारण अंग्रेजी सडांध ने घर कर लिया है। यह सभ्यता नाशकारी और नाशवान है। इससे दूर रहना ही अच्छा है और इसी से अंग्रेजों की पार्लियामेंट और दूसरी पार्लियामेंटें निकम्मी हो गईं हैं। उक्त पार्लियामेंट वहाँ की गुलामी को सूचित करती है, यह निश्चित है। यदि आप पढें और सोचें, तो आपको भी ऐसा ही लगेगा। इसमें आप अंग्रेजों का दोष न निकालें। उन पर तो दया की जानी चाहिए। यों वे बा-होश लोग हैं; इसलिए मैं मानता हूँ कि इस जाल से निकल आएँगे। वे साहसी और परिश्रमी हैं। उनके विचार मूलतः अनीतिपूर्ण नहीं हैं। इसलिए उनके प्रति मेरे मन में उत्तम विचार ही हैं। उनका दिल खराब नहीं है। सभ्यता उनके लिए असाध्य रोग नहीं है,परन्तु अभी वे उस रोग से ग्रस्त हैं, यह तो भूलना ही नहीं चाहिए।
7. यह भी विचित्र किन्तु सत्य है कि अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के शुरुआती दौर में गाँधी ने शीर्ष समाजविज्ञानियों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों तथा राजनीतिविज्ञानियों और कानून की स्थापित परंपराओं और स्थापनाओं से सीमित और चयनित परहेज भी किया। सयानी बुद्धिचातुर्य की काठियावाडी वणिक वृत्ति ने समकालीन जिंदगी में तलाश कर अपनी वैचारिक समझ के अनुकूल समर्थक लेकिन ढूँढ निकाले। पश्चिम की मशीनी सभ्यता से मुठभेड करती छह पुस्तकें तलस्तोय और बाकी यूरोप के कई मझोले दर्जे के विचारकों की हैं। आजादी के विकास की चिंता गाँधी को दक्षिण अफ्रीका के दिनों से रही है। वे जानते हैं अंगरेज चला भी जाए। न तो वह सब कुछ ले जा सकता है और न ही भारतीयों में इतना माद्दा है कि वे पूरा नया विकल्प एक ढाँचे की तरह खडा कर लें। तुर्ष बहुल विधान बुद्धि के बौद्धिकों और परम्पराओं के लगभग अभाव के भी कारण भारतीय संविधान की रचना में यूरो-अमेरिकी आयात और आयतें हैं।
8. गाँधी विचार एक लगातार वाचाल भाष्य भी है। गाँधी को लगता रहा होगा कि उन्हें भविष्य की समस्याओं के लिए भी उतना ही प्रासंगिक रहना होगा। दुनिया आज गाँधी के जिस पाठ को लेकर विमर्श में मशगूल है, वह हिन्दी, गुजराती, अंगरेजी भाषाओं में लिखा गाँधी विचार का कोला*ा है। गाँधी ने अंगरेजी अनुवाद वाले हिन्द स्वराज की जो भूमिका लिखी है, वही बाद में गाँधी विचार के प्राण केन्द्र के रूप में संसार में अधिकृत तौर पर प्रचारित होती गई है। गाँधी ने आजीवन मुख्यतः तीन, चार तर्क समाविष्ट किए थे। एक यह कि उनके विचार मुख्यतः कुछ पश्चिमी विचारकों से आयातित हैं। उन्हें गाँधी ने अपनी आत्मा की धमन भट्ठी में संपादित, संशोधित और व्यवहार्य बनाया। दूसरा यह कि कुछ विचार तो पश्चिम के अनुकूल बुद्धिजीवियों की किताबों को पढने के पहले ही बन चुके हैं और कुछ उनको पढने के बाद। इस तरह पुस्तक में मौलिकता और आरोपित प्रेरणाओं का सार्थक और समानुपातिक घालमेल है। गाँधी ने लेकिन उन महत्त्वपूर्ण प्रतिकूल किताबों का जिक्र तक नहीं किया, जिनकी सभ्यता-दृष्टि की आलोचना वे अन्यथा कर सकते थे। तीसरी बात यह भी कि पुस्तक में पश्चिम की आधुनिक मशीनी सभ्यता के भारतीयों पर हो गए विध्वंसक असर का गाँधी असरदार जनोन्मुखी उल्लेख अपनी निर्दोष भाषा में करना चाहते हैं।
9. गाँधी की क्लासिक कृतियाँ पुस्तकालयों में सामग्री की तरह संग्रहित किए जाने के बदले आह्वान करती हैं कि अपनी प्रतिक्रिया से गाँधी को अवगत कराया जाए और वे आभारी ही होंगे। पहले गाँधी महत्त्वपूर्ण सूत्र बिखेरते हैं। बाद में वही बात बार-बार कह पाते हैं। दूसरी बात वे यह भी कहते हैं कि आधुनिक सभ्यता की जो गहरी आलोचनात्मक समझ उनकी हो गई है, वह क्रमशः पहले से ज्यादा कठोर होती जा रही है। तीसरा दुखद उल्लेख गाँधी करते हैं कि हिन्द स्वराज में जिस सुराज की उन्होंने कल्पना की थी और जिसके लिए वे प्रतिबद्ध रहे हैं, वह हिन्दुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक गाँधी स्थगित कर रहे हैं और संसदीय पद्धति के तथाकथित स्वराज्य को पाने को लेकर वे एक तरह से इतिहास बल्कि अपने विचारों से समझौता कर रहे हैं। वे पहली बार यह साफ करते हैं कि यंत्रयुगीन सभ्यता के सख्त विरोध को लेकर वे समझौता नहीं करना चाहते। इसी तरह वे तत्कालीन न्याय पद्धति में बिल्कुल विश्वास नहीं करते और कहते हैं कि उसके नष्ट हो जाने से उन्हें प्रसन्नता होगी। गाँधी अपना प्रसिद्ध जुमला स्वैच्छिक गरीबी, स्वैच्छिक सादगी और स्वैच्छिक धीमी गति, यंग इंडिया के 26 जनवरी 1921 के प्रसिद्ध भूमिका-लेख में इंजेक्ट करते हैं। अहिंसा के तत्व पूरे मन से नहीं लागू तो हो पाए, फिर भी वह उनका अकेला सिद्धांत है जिस पर अमल करने का हौसला भारत ने दिखाया है-ऐसा भी गाँधी ने कहा।
10. आधुनिक सभ्यता का विमर्श, इतिहास के मुकाबले संस्कृति की वरीयता, धर्म के समाजीकरण, मशीनों और यंत्रों की उपयोगिता, सेक्युलरिज्म और विशेषकर हिन्दू-मुसलमान के रिश्ते सहित समाज के नव धनाढ्य वर्गों की पेशेवर वृत्ति, शैक्षिक संस्कारों की संभावनाओं, नागर सभ्यता का प्रतिशेध, ग्रामीण सभ्यता के स्खलन होने की चिंताएँ आदि कुछ ऐसे बिन्दु हैं जो गाँधी दर्शन में बेतरतीब, गैर आनुपातिक और गैर आरगेनिक ढंग से भी सूत्रबद्ध और विस्तारित हुए हैं। स्वैच्छिक सादगी का आह्वान करने वाले गाँधी शुरुआती जीवन में अंगरेजी वस्त्रों और भौतिक सुविधाओं से लैस रहे हैं। धीमी गति का पाठ पढाने वाले गाँधी के जीवन में ते*ा गतिमयता रही है। वह भारत में किसी अन्य विशिष्ट व्यक्ति में देखने नहीं मिलती। स्वैच्छिक गरीबी का उनका उद्घोष अलबत्ता उनके जीवन में अमल में रहा। इसका यह आशय नहीं है कि राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते गाँधी अपने जीवन की आंतरिक लय के साथ नहीं थे। यह भी उनकी असफलता या अस्वीकार्यता है कि वे सामाजिक जीवन में सादगी का फलक लाखों अनुयायियों और करोडों देशवासियों में विस्तारित नहीं कर पाए।
11. गाँधी बेहद तरतीबवार अध्ययनशील और अध्यवसायी थे। उनकी पैनी दृष्टि ने ईसाइयत बनाम आधुनिक (पश्चिमी) सभ्यता के बीच भेद करना समझ लिया था। दक्षिण अफ्रीका की छोटी-छोटी सभाओं, निजी मुलाकातों और अपने पत्र इंडियन ओपिनियन में गाँधी लगातार यह राय व्यक्त करते रहे कि औद्योगिक और तकनीकी गतिविधियाँ ईसाइयत के मूल्यों का प्रचार या परिष्कार नहीं करतीं। उन्होंने कहा कि विज्ञानजनित सभ्यता ने माइट इ*ा राइट और सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट नामक दो घातक नारे उछाले हैं। उनका ईसाइयत के मूल्यों से कुछ लेना देना नहीं है। गाँधी के अनुसार आधुनिक सभ्यता इतिहास और परंपराओं के विरुद्ध भी आचरण कर रही है। उसकी गति Centifugal केंद्रापसारी अर्थात् अपने केंद्र से बाहर फैलने की होती है जबकि भारत जैसी महान सभ्यताएँ दूर से आती हुईं सभी शक्तियों को अपने अंदर Centipetal केंद्राभिसारी बनाकर समाविष्ट करने की इच्छा रखती हैं। गाँधी ने इतिहास को धर्म की तरह नहीं लेकिन धर्म को इतिहास की तरह समझने, पढने और रेखांकित करने की लगातार कोशिशे कीं। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, तमिल और लातीनी तक की अध्यवसायी पढाई की थी। गाँधी ने यह *ारूर माना कि महाभारत, उपनिषद, रामायण और भागवत को पढे बिना वे नहीं रह सकते थे, लेकिन बाइबिल का उनका अध्ययन किसी वरिष्ठ ईसाई पादरी से कम नहीं था। गाँधी के समय भारतीय इतिहासकारों में कोई बडा नाम नहीं था। लिहा*ाा गिबन का डिक्लाइन एण्ड फॉल ऑफ रोमन एंपायर इतिहास की पुस्तकों में गाँधी के लिए सबसे पसंद का रहा है।
12. 1908 में गाँधी ने जोहानिसबर्ग में यंगमेन क्रिश्चियन्स एसोसियेशन की सभा में आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को ईसाई सभ्यता से अलग करते हुए उसकी कडी आलोचना की थी। माइट इ*ा राइट और सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के जो दो जुमले पश्चिम में अपना बौद्धिक आतंक और अनुगमन तय कर चुके थे। उनके बरक्स गाँधी का सिद्धांत भौतिक शक्तियों की श्रेष्ठता की बुनियाद पर ही शक करता है। मैकियावली ने भी तो शक्ति की श्रेष्ठता का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। डार्विन से लेकर एडम स्मिथ तक में सर्वशक्तिमान व्यक्ति को ही जीने का तुलनात्मक बेहतर अधिकार है-समझाया जा रहा था। गाँधी पहली बार एक बडे विकल्प के रूप में पाश्चात्य राजनीतिक अवधारणाओं के संज्ञान में आते हैं। उनकी अनदेखी करना संभव नहीं हुआ है। गाँधी ने कहा कि आधुनिक सभ्यता माइट इ*ा राइट और सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के दोषपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित है। इन सूत्रों में गाँधी को हिंसा ही हिंसा नजर आई। पश्चिमी सभ्यता गिद्ध की तरह डैने पसारती है, जबकि भारतीय सभ्यता प्रत्येक विचारधारा को आत्म केन्द्रित करती है। दोनों सभ्यताओं के बीच दीखता यह विभेद गाँधी के मानस में वर्षों से पक रहा था।
13. हिन्द स्वराज की दार्शनिक पृष्ठभूमि में लेकिन तोलस्तोय का ही बोलबाला है। इस बात के निश्चित प्रमाण हैं कि गाँधी ने हिन्द स्वराज को लिखने के पहले भारतीय धर्म और दर्शनशास्त्र का व्यापक अध्ययन किया था। उसमें गीता, उपनिषदों, मनुस्मृति, रामायण और पातंजलि योग दर्शन का तो शुमार है ही। अपने हम उम्र लेकिन तीक्ष्ण बुद्धि के गुजराती धर्मनिष्ठ दार्शनिक व्यापारी श्रीमद् राजचंद्र के विचारों का गाँधी पर सबसे *यादा गहरा असर पडा। गाँधी ब्रिटिश शासन को ही भविष्य में जाकर अपने नैतिक सुधार और प्रशासनिक ढाँचे में परिवर्तन करने के लिए प्रेरित, मार्गदर्शित और उत्कंठित करते हैं। एक गुलाम देश के किसी जननेता द्वारा इस तरह की समझाइश देने का आचरण किया जाना दास देश के राजनय में एक अपवाद की तरह दिखाई पडा है। तोलस्तोय की शब्दावली से ऋण लेते हुए गाँधी कहते हैं कि भारत में ब्रिटिश हुकूमतशाही के कारण शैतानियत की आधुनिक सभ्यता और ईश्वरीय प्रकृति; (Kingdom of God) की प्राचीन भारतीय सभ्यता के बीच मूल्य-युद्ध चल रहा है। भारतीय अप्रत्यक्ष रूप से आधुनिक सभ्यता और उसमें निहित हिंसक प्रयोजनों तक को आत्मसात करते जा रहे हैं, ये सब लाक्षणिकताएँ गाँधी को अंगरेज कौम में भी दिखाई दी थीं। गाँधी हत्यारी आधुनिक सभ्यता और आत्महंता भारतीय मनोवृत्तियों के मूल्य युद्ध के संघर्ष बिन्दु पर खडे होकर यह घोषणा करते हैं कि आधुनिक सभ्यता सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक और शैक्षिक हिंसाओं की प्रयोगशाला है। गाँधी यह रहस्योद्घाटन भी करते हैं कि निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत अफ्रीका के ट्रांसवाल के जनसंघर्ष से विकसित और व्याख्यायित हुआ है।
14. गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर आधारित गिरिराज किशोर के उपन्यास पहला गिरमिटिया में एक दिलचस्प दृश्य है। ईसाइयत की बारीकियों में बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप में रचे बसे लगते गाँधी को देखकर मेटिल्डा नामक महिला ने (जो काल्पनिक या वास्तवित न जाने क्या थी? के यहाँ गाँधी पेइंग गेस्ट थे) ईसाई पादरियों को बुला लिया। उसकी मासम समझ थी कि बैरिस्टर को ईसाई बनाया जा सकता है। छोटे-छोटे पादरियों ने गाँधी से लंबी जिरह और ईसाइयत के गुणों की प्रतिष्ठा उनके सोच में इंजेक्ट करने की कोशिश की। वे प्राथमिक तौर पर गाँधी के धर्म परिवर्तन को लेकर उम्मीद*ादा ही थे। लंबी वर्जिश के बाद लगभग सबसे बडे पादरी ने सबको बाहर बुलाकर एकांत में कहा कि इस आदमी का धर्म परिवर्तन नहीं हो सकता, क्योंकि यह ईसाइयत की तात्त्विकता को हमसे ज्यादा समझता है। कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी आज तक यह आरोप लगाते हैं कि हिन्दू धर्म को देखने की गाँधी-दृष्टि में ईसाइयत या इस्लाम का पुट है। सभ्यता की समीक्षा करते गाँधी की तकनीक की फाउंड्री और आंतरिक थियेटर को नहीं समझने वाले लोग हिन्दू धर्म की व्यापक प्रसरणशीलता और स्वीकार्यता से बेखबर एक कूढमगज, कूपमंडूक संसार उगाते रहे हैं। अब तो उनका संसार बहुत विराट होकर ब्रह्मांड तक फैल रहा है!
15. गाँधी के अनुसार समकालीन भारत को न केवल आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को आलोचनात्मक दृष्टि से समीक्षित करना चाहिए, बल्कि भारत की सदियों पुरानी सभ्यता को भी अपनी समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं रखना चाहिए। भारत की परंपराओं में जो कुछ भी बासी और सडांध युक्त हो रहा है, उसे छोड देने में गाँधी संकोच नहीं करते। जो पुरानी वस्तुएँ तिरस्कृत होनी है, उनमें से गाँधी सामंतवादी शासन को भी गिनते हैं। उसे वे औपनिवेशिक शासन से भी ज्यादा खतरनाक समझते हैं। स्वार्थी और झूठे धार्मिक शिक्षकों, मुल्ला मौलवियों और पंडितों वगैरह से छुटकारा पाने की बात भी गाँधी ने कही है। सभी तरह की सामाजिक कुरीतियों जिसमें स्त्रियों और बच्चों के प्रति अन्याय और नियोग आदि की पद्धतियाँ शामिल हैं को गाँधी ने कभी भी समर्थन नहीं दिया। इनमें वैधव्य का जीवन और देवदासी प्रथा तथा बहुपत्नी विवाह वगैरह भी शामिल हैं। गाँधी ने जाति आधारित श्रम व्यवस्था को भी नहीं बख्शा।
16. तोल्स्तोय समेत पश्चिम के कई बुद्धिजीवी रहे हैं जो पश्चिम में रहकर भी दूसरे पश्चिम; (Other West) में रहते थे और आधुनिक सभ्यता का निषेध करते थे। मैक्स वेबर का निबंध साइंस ए*ा ए वोकेशन जो 1918 में म्यूनिख युनिवर्सिटी में दिए गए उनके भाषण का पाठ है, तोल्सतोय की आधुनिकता को एक बहुत बडी चुनौती के रुप में चित्रित करता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के मित्र राष्ट्रों की चंडाल चैकडी ने आत्मग्लानि के साथ यह महसूस किया था कि प्रगति, विकास, विज्ञान, उद्योग वगैरह की डींगें मारने के बावजूद यूरोप अपनी सभ्यता के अंतर्विरोधों के कारण सिहर गया था। तोल्स्तोय ने मूलतः यही तर्क दिया था कि विज्ञानसम्मत आधुनिक सभ्यता अपनी बुनियाद में इसलिए खोखली है क्योंकि विज्ञान यह तो बता सकता है कि हर समस्या के कितने विकल्प हैं। यह बताना लेकिन विज्ञान के बूते के बाहर है कि कौन-सा विकल्प अपना लेने के लिए श्रेयस्कर होगा। आधुनिक सभ्यता खुद विकल्पों की तलाश में रही है और नैतिक मूल्यों से स्खलित हो जाने के कारण उसका त्रासद पराभव हुआ है। गाँधी की तरह तोल्स्तॉय ने भी नैतिक मूल्यों को ही आधुनिक सभ्यता का विकल्प माना है।
17. गाँधी 1908 में ही इस बात को रेखांकित कर चुके थे कि पश्चिमी सभ्यता बमुश्किल सौ पचास बरस उम्र की है। अन्य विचारकों से अलग हटकर गाँधी औद्योगिक क्रांति को केवल आर्थिक घटनाओं का कारक नहीं मानते थे। उनकी समझ थी कि इसकी वजह से नई जीवन पद्धति, नया सामाजिक दृष्टिकोण, यहाँ तक कि धर्म, नैतिकता और विज्ञान के दृष्टिकोण में अंतर भी हो जाता है। तकनॉलॉजी, राजनीति और अर्थशास्त्र का सांस्कृतिक फलितार्थ भी गाँधी के चिंतन क्षितिज के बाहर नहीं था। उनके लिए इसलिए प्रकृति एक स्वायत्त इकाई थी जिसके अपने खुद के कानून शाश्वत रहे हैं। इस प्रकृति पर विजय पाने, उसे आधिपत्य में लेने की मानवीय आवष्यकता, इच्छा और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा एक साथ रही हैं। इस दृष्टिकोण की वजह से राजनीति की व्याख्याएँ टूटीं और बनीं हैं और अन्य सामाजिक लक्षणों के मुकाबले आर्थिक क्रांति के न्यूक्लियस में आ जाने से विद्यमान राजनीतिक व्याख्याओं को समाज सापेक्ष होते हुए सेकुलर चरित्र भी धारण करना पडा। आर्थिक समृद्धि की इच्छा की संतुष्टि को राजनीति के मुख्य उद्देष्यों में शामिल किया गया। धर्म को उसके मध्ययुगीन आडंबर से मुक्त करते हुए सामाजिक और मनोवैज्ञानिक उपयोग की वस्तु समझा गया। औद्योगिक क्रांति ने श्रम के संबंध में चली आ रही मान्यता को बदल दिया। उसे अब उत्पादन के मुख्य स्त्रोतों में गिना जाने लगा और इसलिए शक्ति तथा पूँजी को भी। मानवीय श्रम लेकिन अशिक्षितों और पिछडों के अस्तित्व के प्रस्फुटन का पर्याय ही समझा गया। मशीन और मनुष्य के रिश्ते का नया समीकरण लिखने में आधुनिकता एक बडा कारण सिद्ध हुई।
18. आधुनिक सभ्यता के खतरों को गाँधी भारत को भी सूचित करना चाहते थे जिस तरह औपनिवेशिक खतरों को। भारतीयों के मन में यह गलतफहमी पैठ गई थी कि आधुनिक सभ्यता तो निर्दोष परिकल्पना है, भले ही उपनिवेशवाद एक बुराई हो। गाँधी ने सीधा प्राथमिक तर्क किया कि आधुनिक सभ्यता उपनिवेशवाद की ही तो देन है। उन्होंने कहा कि मेरे देशवासी यह कितना गलत समझते हैं कि अंगरेज को भारत से खदेडने के लिए आधुनिक सभ्यता और आधुनिक तकनीकों का ही सहारा लेना चाहिए। यही बात उन्होंने 1914 में गुजराती हिन्द स्वराज के दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखी। ब्रिटिश लोग हमारी बरबादी के कारण नहीं हैं। यह तो हम खुद हैं जिन्होने आधुनिक सभ्यता की गुलामी स्वीकार कर ली है।
गाँधी दर्शन को समझने की एक कुंजी यह भी है कि दुनियावी लालचों को छोडकर नैतिक जीवन के मूल्यों को तरजीह देनी चाहिए और इस तरह के जीवन में हिंसा के लिए कोई गुंजाइश नहीं है चाहे वह श्वेत हों अथवा अश्वेत। 1929 में गाँधी ने लौटकर फिर कहा पश्चिमी सभ्यता बेहद उबाऊ है। इसका एक अस्पष्ट खाका मैंने हिन्द स्वराज में खींचा है। समय बीत जाने पर भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं है। गाँधी ने 1939 में हिन्द स्वराज का जिक्र करते हुए पुनः स्पष्ट किया उस आश्चर्यजनक रूप से सरल (इतनी सरल कि उसे मूर्ख किताब कहा जा सकता है) पुस्तक को समझने की कुंजी यही आत्मस्वीकारोक्ति है कि उसके जरिए अज्ञान के अँधे युग में जाने का आग्रह नहीं है। परंतु उसमें यह देखने का प्रयत्न है कि शिथिलता और सरलता में भी कितना सौंदर्य होता है। उसे मैंने अपने आदर्श के रूप में संजो लिया है। मैं आपसे प्रार्थना करूँगा कि आप हिन्द स्वराज को मेरी आँखों से पढें। और उसमें यह अध्याय देखें कि भारत को कैसे अहिंसक बनाना है। आप कारखाने पर आधारित सभ्यता के आधार पर उसे अहिंसक नहीं बना सकते, लेकिन उसे स्वयं आत्मनिर्भर गाँव के आधार पर अहिंसक बना सकते हैं।
19. नैतिक क्षरण और आधुनिकता का ढोल पीटने की प्रवृत्ति के बावजूद यह ज्यादा दुखदायी है कि पश्चिमी सभ्यता धोखेबाजी और एक तरह के जादूटोना करने की वृत्ति से बनी है-ऐसा भी गाँधी का मूल कथन है। गाँधी ने केवल आधुनिक सभ्यता की भौतिक उपलब्धियों के सामने प्रश्नवाचक शब्द नहीं बिखेरें और न ही उसकी श्रेष्ठता और स्थायित्व को लेकर। गाँधी ने उससे बहुत आगे बढकर यही कहा कि आधुनिक सभ्यता में गाफिल मनुष्य दिवास्वप्न देखने का आदी हो जाता है। नींद में आदमी जो सपना देखता है, उसे वह सही मानता है। जब उसकी नींद खुलती है, तभी उसे अपनी गलती मालूम होती है। ऐसी ही दशा सभ्यता के मोह में फँसे हुए आदमी की होती है। हम जो बातें पढते हैं, वे सभ्यता की हिमायत करने वालों की लिखी बातें होती हैं। उनमें बहुत होशियार और भले आदमी हैं। उनके लेखों से हम चौंधिया जाते हैं। यों एक के बाद दूसरा आदमी उसमें फँसता जाता है। यहाँ तक कि आधुनिक सभ्यता तपेदिक की बीमारी है जिसमें बहता हुआ मनुष्य क्षय की लाली के विश्वास में खो जाता है। उन्होंने स्कूलों, विधायिकाओं, सेनाओं, धार्मिक स्थलों, जेलखानों और अस्पतालों तक में जो कुछ अनैतिक घटित हो रहा है उसको लेकर भी मनुष्य की जिज्ञासा की चादर पर सवाल छितराये। उन्होंने आधुनिक सभ्यता से पीडित व्यक्तियों की ऐसे बीमार लोगों से तुलना की जो उससे छूटने के लिए छटपटाते तो हैं, लेकिन बस छटपटाते ही रहते हैं। उन्होंने कहा कि लाखों बीमार व्यक्ति मिलकर भी एक स्वस्थ व्यक्ति का उत्तर नहीं हैं।
20. एरिक फ्रॉम ने भी तो यही तर्क दिया है कि यदि लाखों व्यक्ति किसी खास तरह की मानसिक बीमारी से पीडित हैं, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि वे सब मानसिक रूप से स्वस्थ हैं। यह कटाक्ष आधुनिक सभ्यता की मृगतृष्णा के पीछे भागते हुए हर व्यक्ति के लिए दोहरी नसीहत की तरह है। गाँधी के सन्दर्भ में यह कि मृगतृष्णा का जल कोई जल नहीं है अर्थात् वह केवल जल होने का बोध है। उसी तरह जैसे आधुनिक सभ्यता मनुष्यों की सभ्यता नहीं है, वह केवल सभ्यता होने का बोध है। दूसरा सवाल यह कि जो प्यासा है, उसकी प्यास को यह विवेक भी होना चाहिए कि ऐसा तरल पदार्थ वांछित पेय नहीं हो सकता, जो तृष्णा को बढाए। अर्थात यदि सभ्यता के संस्कार चाहिए तो उसके लिए संस्कारों की सभ्यता से रहित पश्चिम के पास देने के लिए कुछ नहीं है।
21. दार्शनिक विवेचन का हिस्सा स्वराज की समझ और परिभाषा तथा पुनर्परिभाषा से शुरू होता है। इसी तरह सभ्यता की जाँच और परिभाषा के लिए भी दो अध्याय लिखे हुए हैं। हिन्द स्वराज के सोलहवें और सत्रहवें अध्याय में सभ्यता-कथा का क्लाइमैक्स आता है जब गाँधी हिंसक आंदोलनों के मुकाबले सत्याग्रह की गरिमा स्थापित करते हैं। गाँधी ने मूलतः इसी बिंदु का परिष्कार करने के लिए हिन्द स्वराज को कथित रूप से लिखा होगा। लेकिन उसका फलक धीरे धीरे विस्तृत होता गया। गाँधी कहते हैं आप मानते हैं कि साधन और साध्य, जरिया और मुराद के बीच कोई संबंध नहीं है। यह बहुत बडी भूल है। इस भूल के कारण जो लोग धार्मिक कहलाते हैं, उन्होंने घोर कर्म किये हैं। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। मेरे लिए समुद्र पार करने का साधन जहाज ही हो सकता है। अगर मैं पानी में बैलगाडी डाल दूँ, तो वह गाडी और मैं दोनों समुद्र के तले पहुँच जायेंगे। जैसे देव वैसी पूजा-यह वाक्य बहुत सोचने लायक है। उसका गलत अर्थ करके लोग भुलावे में पड गये हैं। साधन बीज है और साध्य-हासिल करने की चीज-पेड है। इसलिए जितना सम्बन्ध बीज और पेड के बीच है, उतना ही साधन और साध्य के बीच है। शैतान को भजकर मैं ईश्वर-भजन का फल पाऊँ, यह कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए यह कहना कि हमें तो ईश्वर को ही भजना है, साधन भले शैतान हो, बिलकुल अज्ञान की बात है। जैसी करनी वैसी भरनी। स्वराज पाने के अन्य साधन जिनमें शैक्षणिक सुधार और मशीनों का उपयोग शामिल हैं, भी पुस्तक का अंश हैं।
22. सामाजिक जीवन में राजनीति ने सबसे महत्तर भूमिका हथिया ली। लेकिन गाँधी के अनुसार राजनीति को ऐसी भूमिका तब मिलनी चाहिए, जब वह धर्म की मर्यादा में रहे। यहाँ धर्म से आशय आधुनिक धर्म से है जिसमें स्वतंत्रता, समानता और प्रगति के सभी संभावित तत्वों का समावेश हो। गाँधी आग्रहपूर्वक कहते हैं कि जब तक भारतीय इस तरह की मनोवृत्ति का धर्म विकसित नहीं करते, वे अपनी बेहतर संस्कृति के बावजूद आधुनिकता और औपनिवेशीकरण से संघर्ष नहीं कर सकते। सच्ची सभ्यता कौन-सी है? वाले तेरहवें परिच्छेद में गाँधी इस सवाल का जवाब देते हैं सभ्यता वह आचरण है जिससे आदमी अपना फ*ार् अदा करता है। फ*ार् अदा करने के मानी हैं नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इन्द्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपने को (अपनी असलियत को) पहचानते हैं। यही सभ्यता है। इससे जो उलटा है वह बिगाड करने वाला है। गाँधी कहते हैं कि सभ्यता एक व्यक्ति अथवा राष्ट्र के दुबारा उठ खडे होने में मददगार हो सकती है, लेकिन उसकी बुनियाद नैतिकता में हो। ऐसा भारतीय सभ्यता के साथ है। यदि इसी सभ्यता का पुनराविष्कार किया जाए, तो भारत का भविष्य सम्मानजनक हो सकता है। गाँधी अपनी बेलाग भाषा में यह सलाह देते हैं किसी भी देश में किसी भी सभ्यता के मातहत सभी लोग संपूर्णता तक नहीं पहुँच पाए हैं। हिन्दुस्तान की सभ्यता का झुकाव नीति को मजबूत करने की ओर है, पश्चिम की सभ्यता का झुकाव अनीति को मजबूत करने की ओर है, इसलिए मैंने उसे हानिकारक कहा है। पश्चिम की सभ्यता निरीश्वरवादी है, हिन्दुस्तान की सभ्यता ईश्वर को मानने वाली है।
23. गाँधी विचार में तो आधुनिक रामायण, महाभारत और उनमें साथ बुद्ध की जातक कथाओं, ईसप के गल्प, हितोपदेश और पंचतंत्र के सूत्र और गुर अंतर्निहित हैं। गाँधी ने पूरी जीवनयात्रा में खुद से जिरह की और खुद से छिटकने की कोशिश भी। दक्षिण अफ्रीका लौटते पानी के जहाज के वे अठारह रचनात्मक दिन गाँधी के अर्थ में स्वराज का एक प्रयोग भी हैं, जब वे हिन्द स्वराज का ड्राफ्ट तैयार कर रहे थे। गाँधी पूरी तौर पर अपनी आत्मा और विवेक के नियंत्रण में रहते थे। यह अलग बात है कि पश्चिमी सभ्यता इसे निरी बकवास भी समझती रही है। गाँधी के देश के अधिसंख्य लोग भी इस बनावट के हैं कि वे चाहकर भी खुद पर स्वराज नहीं कर सकते। पश्चिमी सभ्यता पर गाँधी यह आरोप भी मढते हैं कि उसकी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। बडे-बडे दावे करने के बाद भी सभ्यता के कोई चाक्षुष फल दिखाई नहीं देते। उस सभ्यता ने अकारण ही पारम्परिक ग्रामीण संस्कृतियों का विनाश कर दिया। गाँधी को लेकर यह भी कहा जा सकता है कि उन्हें एक सत्य शोधक हने के नाते पश्चिमी सभ्यता की आलोचना किए बगैर अपना एक वैकल्पिक मॉडल खडा कर देना चाहिए था। इस संभावित आरोप का उत्तर वर्षों बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर से हुई एक जिरह में गाँधी ने दिया था। उन्होंने कहा था कि उनके लिए सत्य को स्वीकार करना और झूठ का अस्वीकार करना एक जैसी स्थितियाँ हैं। उन्होंने सभी धर्मों का उल्लेख करते हुए यह कहा था सभी धर्म हमें शिक्षा देते हैं कि दो विरोधी शक्तियाँ लगातार हम पर प्रभाव डालती हैं और यह मनुष्य का ही हुनर है कि वह उन शक्तियों में से किसका स्वीकार करे और किसका अस्वीकार।
24. पश्चिम के ज्ञानोदय युग में भी इरेस्मस ने यह माना था कि भद्र व्यक्तियों को भ्रष्ट दुनिया के खिलाफ आलोचना करने का अधिकार तो कम से कम है। गाँधी की समीक्षा आधुनिक सभ्यता के खिलाफ लेकिन अरण्य रोदन की तरह नहीं है। वह निराशा का दर्शन या हताशा का चित्रण नहीं है। तोल्स्तोय की तरह गाँधी भी इस मत के थे कि ताबडतोड प्रतिद्वंद्विता के नाम पर औद्योगिक देशों की महत्त्वाकांक्षाओं ने आम आदमी का जीवन तबाह कर दिया है। स्वतंत्रता के नारों का जयघोष करता हुआ हर व्यक्ति अपनी बुनियाद में आखिर गुलाम ही है। उनका यह संयुक्त मत था कि मनुष्य के जीवन के विकास के लिए आंतरिक शक्तियों की स्वतंत्रता पहली शर्त है। स्वतंत्रता की समझ को बाहर से आरोपित नहीं किया जा सकता। इसलिए यह जरूरी और संभव है कि मनुष्य अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के नाम पर अपने लालच पर नियंत्रण करे। गाँधी ने कुछ चिढकर यहाँ तक कहा कि धर्मों के नाम पर हुई विकृतियों, अंधविश्वासों और पाखंडों से मानवता का जितना भी नुकसान हुआ है, उससे कहीं ज्यादा नुकसान आधुनिक, औपनिवेषिक और औद्योगिक पश्चिमी सभ्यता ने किया है। उन्होंने तल्खी में हिन्द स्वराज में लिखा यह सभ्यता तो अधर्म है और यह यूरोप में इस हद तक फैल गई है कि वहाँ के लोग अर्ध-विक्षिप्त से दिखाई देते हैं। उनमें सच्ची शक्ति नहीं है; अपनी शक्ति वे नशे के बल पर कायम रखते हैं। एकान्त में बैठ ही नहीं सकते। स्त्रियों को, जिन्हें घर की रानियाँ होना चाहिए, गलियों में भटकना पडता है, या मजदूरी के लिए जाना पडता है। इंग्लैंड में ही चालीस लाख रंक अबलाएँ पेट के लिए सख्त-मजदूरी करती हैं और इस कारण इस समय सफ्रेजेट (मताधिकार) का आन्दोलन चल रहा है।
25. उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के मुहाने पर अपने बहुत से समकालीनों से अलग खडे गाँधी औपनिवेशिक आधुनिकता के सामने घुटने टेकने से इंकार करते हैं। भारत तथा यूरोप के अपने बहुत से समकालीनों से अलग हटकर गाँधी आधुनिक सभ्यता द्वारा अर्जित की गई तथाकथित प्रगति का निषेध करते हैं। उन्हें कथित उच्च आधुनिकता से एलर्जी भी रही है। तकनीकी विशेषज्ञों, इंजीनियरों और संस्थानों के प्रबंधकों सहित उपलब्ध वैज्ञानिक ज्ञान के समुच्चय से उत्पन्न नवोदय और उसकी उपलब्धियों (जिसमें प्रकृति पर विजय पाने के मंसूबे शामिल हैं) गाँधी को चमत्कृत नहीं करते क्योंकि गरीबी को दूर करने के लिए समृद्धि का कोई सत्य आधुनिकता के हाथ नहीं लगा है। अपने समकालीन विचारक मैक्स वेबर की तरह गाँधी आधुनिक सभ्यता को लोहे के पिंजडे में कैद मानने जैसी त्रासद राय भी नहीं रखते। गाँधी लेकिन वेबर से यह सहमति तो व्यक्त करते हैं कि आधुनिकता अपनी डींगें और छलाँगें मारने के बावजूद धर्म और दर्षन तथा मिथकों को तिरस्कृत करने के अपराध से बरी नहीं की जा सकती।
26. गाँधी ने देखा कि राजाओं और उनकी तलवार की बनिस्पत नीति का बल ज्यादा बलवान है। इसलिए उन्होंने राजाओं को नीतिवान पुरुषों, ऋषियों और फकीरों से कम दर्जे का माना। गाँधी लिखते हैं-ऐसा जिस राष्ट्र का गठन है वह राष्ट दूसरों को सिखाने लायक है, वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है। यह लिखकर गाँधी ने पुनर्जागरण और नवजागरण से जुडे विचारों का ही ताकतवर समर्थन और नेतृत्व किया। पश्चिम की सभ्यता को चाण्डाल सभ्यता कहते हुए उन्होंने लिखा पहले जब लोग लडना चाहते थे तो एक दूसरे का शरीर बल आजमाते थे। आज तो तोप के एक गोले से हजारों जानें ली जा सकती हैं। यह सभ्यता की निशानी है। पहले लोग खुली हवा में अपने को ठीक लगे उतना काम स्वतंत्रता से करते थे। अब हजारों आदमी अपने गुजारे के लिए इकट्ठा होकर बडे कारखानों में या खानों में काम करते हैं। उनकी हालत जानवर से बदतर हो गई है। उन्हें सीसे (शीशे) वगैरह के कारखानों में जान को जोखिम में डालकर काम करना पडता है। इसका लाभ पैसेदार आदमी को मिलता है। पहले लोगों को मारपीट कर गुलाम बनाया जाता था। आज लोगों को पैसे और भोग का लालच देकर गुलाम बनाया जाता है। आगे गाँधी लिखते हैं यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धर कर बैठे रहेंगे तो सभ्यता की चपेट में आए लोग खुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे। पैगम्बर मोहम्मद साहब की सीख के मुताबिक यह शैतानी सभ्यता है। हिन्दू धर्म इसे निरा कलजुग कहता है। यह सभ्यता दूसरों का नाश करने वाली और खुद नाशवान है।
27. इसमें संदेह नहीं है कि गाँधी उन हिंदुस्तानी नेताओं में थे जिन्होंने रूस में क्रांतिकारी घटनाओं के विकास को ध्यान से देखा था। लाक्षणिक है कि रूस की वास्तविक परिस्थिति के ध्यानपूर्वक अध्ययन और रूसी साहित्य के विशेष रूप से लेव तोल्स्तोय और मैक्सिम गोर्की की कृतियों के अध्ययन की बदौलत उन्होंने प्रथम रूसी क्रांति के आते कदमों की आहट को पहले ही सुन लिया था। दोनों की रचनाओं में युवा गाँधी ने अपने को परेशान करने वाले सवालों के उत्तर खोजने की कोशिश की। हालांकि स्पष्ट है कि तॉल्स्तोय उनके मन के अधिक निकट थे। फिर भी इंडियन ओपिनियन अखबार के 1 जुलाई 1905 के अंक में उन्होंने गोर्की की रचनाओं की प्रेरणादायी शक्ति का उल्लेख किया उन्होंने लिखा कि वे जनता को जुल्मी शासन के खिलाफ उठाती हैं और यूरोप में कोई अन्य लेखक नहीं है जो जनता के अधिकारों का इतना प्रबल समर्थक हो। (महात्मा गाँधी की रचनाएं खंड 5 नई दिल्ली 1957, पृष्ठ 5)
28. हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका द्वारा एटम बम गिराए जाने की निंदा करके महात्मा गाँधी ने आम निशस्त्रीकरण के विचार का समर्थन किया जिसका प्रस्ताव सोवियत संघ ने रखा था। गाँधी ने परमाणु हथियारों पर पाबंदी लगाने की माँग भी की। 20 अप्रैल 1947 को उन्होंने एटमी हथियार जमा किए जाने से पैदा होने वाले खतरे के बारे में सावधान किया। उन्होंने कहा इधर पश्चिम की अकल साथ नहीं दे रही। एटम बमों की संख्या बढने से वह घबरा रहा है क्योंकि उनका मतलब तो ना सिर्फ पश्चिम बल्कि सारी दुनिया का पूरा विनाश होगा। (महात्मा गाँधी, विश्व शांति का अहिंसात्मक मार्ग, अहमदाबाद 1959 पृ. 439) 7 जुलाई 1946 को उन्होंने कहा था जिस एटमी ऊर्जा का अमेरिका वैज्ञानिक फौजी विनाशकारी उद्देश्यों से उपयोग कर रहे हैं, उसे दूसरे वैज्ञानिकों को मानवतावादी हितों में इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए सभी संभावनाएँ मौजूद हैं (पृष्ठ 31)।
29. सोवियत भारतीय मैत्री के स्रोत में यह चेलिशेव, लीतमान ने लिखा है कि महात्मा गाँधी हिंदुस्तान और सोवियत संघ के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के पथ प्रदर्शक थे। उन्होंने यह भी लिखा है कि हिंदुस्तान के आम साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के नेता के रूप में महात्मा गाँधी संघर्ष के ऐसे तरीके अपनाते थे, जो आंदोलन में भाग लेने वाली सभी सामाजिक शक्तियों के मनोभावों और आकांक्षाओं के अनुकूल थे। संघर्ष के उनके तरीके को सत्याग्रह सिविल नाफरमानी या सविनय अवज्ञा आंदोलन कहा गया। तीसरे, चैथे और पाँचवें दशकों में हिंदुस्तान भर में फैले आंदोलन सचमुच आम आंदोलन थे। सामाजिक हैसियत, लिंग, धर्म, विश्वास, जात पांत आदि के फर्क के बावजूद लाखों करोडों हिंदुस्तानियों ने उनमें भाग लिया। इन आम अहिंसात्मक कार्रवाइयों के दौरान उनमें शामिल हुए लोगों ने अपार वीरता, सच्ची, निस्वार्थ भावना और आत्म बलिदान की उत्कंठा प्रदर्शित की। इन आंदोलनों में लोगों ने निर्भयता, साहस और वीरता के पाठ पढे। आखिरकार उन्होंने हिंदुस्तान में उपनिवेशवाद के सदियों पुराने आधार को नष्ट कर डाला। बाद में यह भी हुआ कि हिंदुस्तान में स्वाधीनता संग्राम के समय गाँधी ने अपने द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा और अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध शब्द अनुपयुक्त बताए थे ।अहिंसा के सिद्धांत को वह क्रियाशील, सक्रिय और सर्वाधिक कारगर सिद्धांत मानते थे।
30. गाँधी पश्चिम की आधुनिक मशीनी सभ्यता के पूरी तौर पर खिलाफ थे। उन्हें अंगरेज हुक्मरानों से नहीं, अंगरे*ायत से नफरत थी। नफरत नहीं शायद परहेज था। उनकी आलोचना का व्यवहारशास्त्र रचनात्मक कार्यक्रम में विस्तृत था। गाँधी समाजवादी या कम्युनिस्ट नहीं थे। वे काठियावाडी वणिक कुल में जन्म लेने के कारण शायद पूँजीवाद से पूरी तौर पर नफरत भी नहीं कर पाए थे। इसलिए वे गरीबी के बँटवारे के बदले खुशहाली के समान वितरण के पक्ष में थे। देश के गरीब उनके यथार्थ की सांख्यिकी थे। उनकी मानसिक बीजगणित का पडाव या उनकी बौद्धिक वर्तुल ज्यामिति का सीमांकन नहीं। यह सही है कि गाँधी के शरीर को नाथूराम गोडसे ने मारा। यह एक घृणित और अक्षम्य अपराध है। लेकिन अपनी हत्या के कुछ वर्षों पहले से गाँधी अपनी मातृ संस्था के लिए बोझ बन गए थे। गाँधी-नेहरू पत्र व्यवहार इसका सबसे पुख्ता प्रमाण है। दक्षिणपंथी व्याख्याकार जिस तरह सरदार पटेल को गाँधी के सबसे निकट प्रचारित करते हैं, यह नहीं बताते कि कई अर्थों में सरदार पटेल ने भी अपने नेता से किनारा कर लिया था, यहाँ तक कि भारत के विभाजन के सवाल को लेकर भी।
31. अंगरेजों ने चाहे जितना जुल्म किया हो, गाँधी ने कभी उससे हार नहीं मानी। सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह, आमरण अनशन, प्रभातफेरी, जुलूस वगैरह के जरिए एक ठोस संघर्षशील जनमत खडा करने में बापू को विश्व इतिहास में शायद सबसे बडी सफलता मिली। नए अमेरिकी हथकंडों में अंगरे*ाों से *यादा क्रूरता है। श्रमिकों के कानूनों में परिवर्तन और कटौती कर दी गई है। विशेष आर्थिक क्षेत्र जैसे जनविरोधी प्रयोग किए जा रहे हैं। शहरों में धनाढय बस्तियों के विकास को देश का विकास कहा जा रहा है। देश की प्राकृतिक संपदा को औने पौने बेचने के अभियान से देश की सकल संपदा के उत्पाद और विनिमय दरें तय की जा रही हैं। अधमरे लोगों को भुखमरी के धीमे *ाहर से नेस्तनाबूद किया जा रहा है। उच्चतर शिक्षा केवल धनाढय वर्गों के लिए धीरे-धीरे सुरक्षित की जा रही है। राज्य का लोक स्वास्थ्य के प्रति कोई संवैधानिक कर्तव्य दिखाई नहीं पडता। निजी अस्पतालों में मरने को शहादत की तरह समझाया जा रहा है। बेरोजगारी से लडने के लिए शासकीय प्रकल्प लगभग बौने हैं। गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को सरकारी तंत्र में अनाज देने तक में हेराफेरी की जा रही है। देश के मंत्री आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। अन्वेषण और सतकर्ता की सारी सरकारी एजेंसियाँ संदिग्ध चरित्र की हैं। देश महसूस कर रहा है कि कोई गाँधी नहीं है जो उसे उन रास्तों पर फिर से चलने की हिम्मत दे, जिसके कारण अंगरे*ा यहाँ से चला गया था।
32. गाँधी ने कभी कहा था कि वे तो रामराज्य का यानी दुनिया में ईश्वर के राज्य का ख्वाब देखते हैं। वही आजादी है। स्वर्ग में यह राज्य कैसा होगा सो मैं नहीं जानता। बहुत दूर की चीज जानने की मुझे इच्छा भी नहीं। अगर वर्तमान, दिल को काफी अच्छा लगता हो तो भविष्य उससे बहुत अलग नहीं हो सकता। इसलिए राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक सियासी, माली और इखलाकी तीनों तरह की आजादी ही सच्ची आजादी है।..... हिन्दुस्तान की आजादी से मतलब है सारे हिन्दुस्तान की आजादी। आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। हर एक गाँव में जमहूरी सल्तनत का या पंचायत का राज होगा। उसके पास पूरी सत्ता या ताकत होगी। इसका मतलब यह है कि हर एक गाँव को अपने पाँवों पर खडा होना होगा। अपनी *ारूरतें खुद पूरी करनी होंगी, ताकि वह अपना सारा कारोबार खुद चला सके। यहाँ तक कि वह सारी दुनिया के खिलाफ अपनी हिफाजत खुद कर सके।..... जिस समाज का हर एक आदमी यह जानता है कि उसे क्या चाहिए और उससे भी बढकर जहाँ यह माना जाता है कि बराबरी की मेहनत करके भी दूसरों को जो चीज नहीं मिलती है, वह खुद भी किसी को नहीं लेनी चाहिए, वह समाज जरूर ही बहुत ऊँचे दरजे की सभ्यता या तहजीब वाला समाज होना चाहिए।
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