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गाँधी : न्याय की आवाज

नंदकिशोर आचार्य
थोडा-सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।
- महात्मा गाँधी
शुरू में परिचय में कहा गया कि मैं गाँधीवादी हूँ। लेकिन मुझ में गाँधीवादी होने का साहस अभी तक नहीं आया है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि मैं गाँधीवादी नहीं हूँ। मैं उन्हें समझने की कोशिश करता रहा हूँ और यह नहीं कह सकता हूँ कि पूरा समझ लिया है क्योंकि जब भी दुबारा पढता हूँ, दुबारा समझने की कोशिश करता हूँ, तो कोई न कोई ऐसा कोना दिखाई देता है जो पहले नहीं दिखाई दिया था या कोई ऐसी प्रासंगिकता दिखाई देती है जो पहले नहीं समझी गई थी। तब ऐसा लगता है कि लगातार समझते रहना चाहिए और फिर उन लोगों को भी जिन्होंने उन पर विचार किया, न केवल विचार किया बल्कि नए तरीके से व्याख्या करने की कोशिश की। जैसे मैं लोहिया को भी मानता हूँ और विनोबा को भी मानता हूँ, तो उनको भी पढने की कोशिश करता हूँ और कुछ हद तक एम.एन. राय को भी पढने की कोशिश करता हूँ जो कि उनके विरोधी माने जाते थे। मेरे हिसाब से मूल्यों के स्तर पर कम थे और दार्शनिकता के स्तर पर ज्यादा थे, लेकिन ये सब करते हुए भी मैं यह नहीं कह सकता कि मैंने उनको ठीक तरीके से समझा है। इसलिए अभी मैं जो कुछ सोच रहा हूँ, वहीं कहूँगा।
हम आज के सदंर्भ में गाँधी की सार्थकता या प्रासंगिकता की बात करते है। एक तो प्रासंगिकता शब्द बडा ही विचित्र शब्द है। प्रासंगिकता किसे कहेंगे? मान लीजिए कि कोई आदमी बीमार है और वह दवा नहीं लेना चाहता, तो क्योंकि वह दवा नहीं लेना चाहता तो क्या दवा अप्रासंगिक हो गई है या कुछ उसके विचार में ऐसा है जो अप्रासंगिक है। यह हम को समझने की कोशिश करनी चाहिए। अक्सर लोग कहते हैं, खासकर युवा वर्ग मित्रों से जब भी मिलता हूँ, वे कहते हैं हम गाँधी से कनेक्ट फील नहीं करते, यह आजकल कनेक्ट शब्द बहुत चलता है, तो गाँधी से कनेक्ट फील नहीं करते। तो मैंने कहा ठीक है, कोई जरूरत नहीं है कि आप गाँधी से कनेक्ट फील करें, आप मानवाधिकार को स्वीकार करते हैं या नहीं करते? मानवाधिकार तो नई परिभाषा, नई धारणा है। तो वे कहते हैं कि मानवाधिकार को तो हम स्वीकार करते हैं, तो मैंने कहा गाँधी और मानवाधिकार में क्या फरक है? इन दोनों के बीच अंतर क्या है और कहाँ अंतर है? क्या यह चीज आप मुझे बताएँगे। तो वे कंफ्यूज हो जाते हैं क्योंकि जितनी बातें मानवाधिकार की हैं जितने उसके चार्टर है, जितनी उसकी संवेदनाएँ हैं, जितनी उसकी घोषणाएँ हैं, उन सब में आपको गाँधी दिखाई देगा। चाहे गाँधी का नाम कहीं नहीं हो। कोई चार्टर ऐसा नहीं है जो हिंसा का समर्थन करता हो, कोई ऐसा चार्टर नहीं है जो पूँजी के केन्द्रीकरण का समर्थन करता हो, कोई ऐसा चार्टर नहीं है जो नस्लवाद का समर्थन करता हो, जातिवाद का समर्थन करता हो, सांप्रदायिकता का समर्थन करता हो, युद्घ का समर्थन करता हो। पूरे मानवाधिकार विमर्श में कहीं इन चीजों का समर्थन नहीं है। बल्कि यह है कि इन चीजों को दूर करने के लिए ही मानवाधिकार की आवश्यकता है, तो वे बोलते हैं, हाँ, हम मानवाधिकार को तो स्वीकार करते हैं। तो मेरा कहना होता है कि आपका मतलब यह है कि आप लंगोटी नहीं पहनना चाहते, लाठी लेकर नहीं चलना चाहते। मैंने कहा कि कोई हर्ज नहीं है आप लंगोटी न पहने, लाठी लेकर न चलें। यह गाँधी से कनेक्ट फील करना नहीं है। आप लाठी लेकर चल रहे हैं या नहीं, चश्मा पहन रहे हैं या नहीं, यह जो नकल की प्रवृत्ति हमारे यहाँ आ गई है, तो वह कोई गाँधीवादी नहीं है। गाँधी टुडे या आज के संदर्भ में गाँधी की बात करते हैं, तो हमें आज को समझना जरूरी है।
गाँधी सत्य एवं अहिंसा की बात करते थे यह तो सब जानते है, लेकिन आज के संदर्भ में क्या और कहाँ इस्तेमाल हो सकता है? तो यह आज क्या है और क्या गाँधी इस आज को पहचानते थे? अभी किसी ने कहा सही कहा था कि उनकी चिंताएँ देश को लेकर तो हैं, वे तो हैं ही। लेकिन 1931 में वह लंदन गए थे राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के समय, तो उस समय उन्होंने वहाँ भारतीय विद्यार्थियों की एक सभा को संबोधित किया था। उस सभा में उन्होंने यह कहा था कि मुझे भारत की आजादी से भी अधिक चिंता मनुष्य की प्रकृति के, मानव-प्रकृति के बर्बरीकरण की है, क्योंकि जो भारत में अंग्रेजी शासन था वह भी मानव प्रकृति के बर्बरीकरण का ही नतीजा था। कोई भी विदेशी शासन मानव प्रकृति के हिंसक होने का ही नतीजा होता है। इसलिए वे यह कह रहे हैं कि मुझे इसकी चिंता ज्यादा है। क्योंकि क्या होता है कि एक परम मूल्य होता है, दूसरे कुछ संदर्भगत मूल्य होते हैं तो भारत की आजादी उनके लिए संदर्भगत घटना थी क्योंकि उसके माध्यम से वह उन मूल्यों को साकार होता हुआ दिखा सकते थे या देख सकते थे जो कि उनके लिए पूरी मानव जाति के लिए आवश्यक मूल्य थे और वह था पूरी मानव जाति का सत्यनिष्ठ और अहिंसक होना। अहिंसा के सकारात्मक अर्थों में पूरी मानव जाति का प्रेम में होना। पूरी मानव जाति का सहकार में होना यह उनके जीवन का मूल्य था और इसलिए हम यह कह सकते हैं कि वह बर्बरीकरण से अधिक चिंतित थे, अब हमें देखना है कि बर्बरीकरण के कितने रूप है भारतीय समाज में और वैश्विक समाज में भी। एक बडा रूप जो दिखाई देता है आजकल जिसे हम सब जानते हैं वह आतंकवाद का है। आजकल हमारे यहाँ एक छोटा आतंकवाद भी शुरू हो गया है 10-20 इकट्ठा होकर किसी के कहने पर किसी को मार डालते हैं लिंचिंग जिसे कहा जाता है वह भी एक तरह का आतंकवाद ही है क्योंकि ऐसा नहीं है कि कोई गुप्त संगठन बनाएँगे तभी आतंकवाद होगा। यह भी आतंकवाद है कि 10-20 लोगों ने मिलकर एक आदमी को मार डाला और वह भी बिना जाने कि सच क्या है और सच जान भी लिया तो मारने का हक किसने दिया। तो यह भी एक प्रकार का आतंकवाद है हमारे पास ताकत है हम मार सकते हैं। यही तो पूरी दुनिया का साम्राज्यवाद कहता है कि हमारे पास ताकत है, हम मारेंगे। वही चीज हमारे यहाँ छोटे लेवल पर हो रही, तो एक प्रकार से यह हिंसा का प्रत्यक्ष रूप है जो लिंचिंग से लेकर बडे आतंकवादी स्वरूप में आता है और राष्ट्रों के आपसी युद्घों के स्वरूप में भी आता है उसे हम आतंकवाद नहीं कहते जबकि है वह भी आतंकवाद ही, क्योंकि ताकतवर राष्ट्र कमजोर राष्ट्र को दबा रहा है। तो है यह भी एक प्रकार का आतंकवाद है। ताकत ही वहाँ पर प्रमुख है आतंकवाद का मतलब क्या है? इसका मतलब है ताकत से आपको झुका सकते हैं। इसकी सीधी-सीधी परिभाषा यह है कि जो अपनी ताकत से झुका सकता है वह आतंकवाद, फिजिकल ताकत जिसे हम कहते हैं। तो हम यह कह सकते हैं कि गाँधी उस बात को तब समझ रहे थे। मानव प्रकृति के बर्बरीकरण को और उनके बारे में चिंतित थे। अब आप यह देखें कि मानव प्र*कृति का जो बर्बरीकरण है वह आज हमें एक तो प्रत्यक्ष हिंसा के रूप में दिखाई दे रहा है जिसके ये रूप हम देख रहे हैं, लेकिन उससे भी अधिक खतरनाक रूप है अप्रत्यक्ष हिंसा का। इसको हम अक्सर हिंसा मानते ही नहीं है और यह अप्रत्यक्ष हिंसा मौटे तौर पर दो प्रकार की मानी जाती है। Johan Galtung ने इस पर विस्तार से विचार किया है उसको आप कभी पढे तो आँखें खुलेंगी आपकी।
एक है स्ट्रक्चरल वायलेंस जिसे ढाँचागत या संरचनात्मक हिंसा कहा जाता है और दूसरी जिसे इससे भी महत्त्वपूर्ण मैं मानता हूँ वह है कल्चरल वायलेंस- सांस्कृतिक हिंसा। स्ट्रक्चरल वायलेंस का मतलब यह होता है कि हमारी जो संरचनाएँ, सामाजिक ढाँचा है, आर्थिक ढाँचा, राजनीतिक ढाँचे हैं। ढाँचे का मतलब है उसकी प्रक्रियाएँ भी और परिणाम भी। सब उसमें शामिल है। उदाहरण के लिए हम आर्थिक ढाँचे की बात करें। आर्थिक ढाँचे में कितनी हिंसा है या कि नहीं है। उसके पीछे हमारे यहाँ जो विकास का मॉडल चल रहा है पूरी दुनिया में विकास की जो प्रक्रिया चल रही है उसको लेजिटिमेसी कौन देता है, उसको वैधता या औचित्य कौन देता है। उसको वैधता और औचित्य देता है यह विश्वास कि यहीं एकमात्र विकास का तरीका है तो यह हमारी विश्वास प्रणाली में हिंसा है कि इस हिंसा के बिना विकास संभव नहीं है। आजकल इस को कहा जाता है- विकास की कीमत। कुछ अरसे पहले सिंगरौली का अध्ययन कुछ समाजवादी मित्रों द्वारा किया गया था। तब एक पुस्तक निकली थी विकास की कीमत। विकास की कीमत क्या है? तो वह कहते हैं कुछ तो आपको आदिवासियों को विस्थापित करना होगा। लोगों को स्थान से हटाना होगा। लोगों के खेत भी हटेंगे, सेज इत्यादि में। यह तो विकास की कीमत है। इसको तो करना पडेगा। इसके बिना विकास नहीं होगा और इस बात को लगभग हमारे सारे नीति-निर्माता आँख बंद कर स्वीकार करते हैं, कि हाँ इसके बिना विकास नहीं हो सकता। तो मैं पूछता हूँ कि ठीक है भाई नहीं हो सकता तो जो कीमत दे रहा है लाभ उसको मिलेगा कि किसी और को मिलेगा? सामान्य कायदे की बात है न कि जो कीमत देता है। लाभ उसी को मिलना चाहिए। तो कीमत तो कोई और दे रहा है। विकास की कीमत तो कोई और चुका है और उसके लाभ आप लोगों को मिल रहे हैं, तो यह कौन सा आर्थिक व्यवहार है। इतनी ईमानदारी तो आर्थिक व्यवहार में रखिए कि जो कीमत दे रहा है, लाभ भी उसी को मिले। लेकिन वह उसको नहीं मिल रहा है। यह आर्थिक संरचना है और इसके पीछे दूसरा टेक्नोलॉजी का सवाल है। हम सब ने, पूरी दुनिया ने मान लिया कि बहुत एडवांस टेक्नोलॉजी की जरूरत है। टेक्नोलॉजी का विकास ही विकास का आधार है। इसके बिना विकास नहीं हो सकता। विकास का मतलब है उत्पादन में वृद्घि। पहले इसको ग्रोथ कहते थे आजकल विकास कहने लगे। इसका मतलब यह है कि अधिक से अधिक उत्पादन वृद्घि हो जाए और इसका तरीका यह है कि अधिक से अधिक एडवांस टेक्नोलॉजी अपनाई जाए। अधिक से अधिक एडवांस टेक्नोलॉजी का मतलब होता है कम से कम मानवीय हस्तक्षेप। ऑटोमेशन जितना बढेगा उतनी ही एडवांस टेक्नोलॉजी। आजकल तो कहा जाता है हाई रेट ऑफ टेक्नोलॉजीकल ट्रांसफॉरमेशन। यह तब होगा, जब मनुष्य का हस्तेक्षप कम से कम होता जाएगा। अब मित्रो, मनुष्य का हस्तक्षेप कम से कम होता चला जाएगा तो आपको रोजगार कौन देगा? क्या ऊपर से टफगा? आप ऐसी टेक्नोलॉजी अपनाएँगे जो उत्पादन तो करेगी, लेकिन इसमें मनुष्य कम से कम होगा, लेबर कम से कम होगी। उसके दो लाभ होते हैं एक तो एक बार इन्वेस्टमेंट किया आपने, फिर चलाते जाइए। दूसरा यह होता है कि उसमें लेबर से प्रॉब्लम नहीं है। कोई आए दिन हडतालें, दाम बढाने, उनकी मजदूरी बढाने की कोई झंझट नहीं है। उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है। जितना कम रोजगार देंगे, उतनी कम आफ सामने दिक्कतें आएँगी। इस प्रकार दोनों तरीके आफ हित में हैं। ऐसी स्थिति में आप लोगों को अपनी जगह उखाड रहे हैं- रिसोर्सेज के लिए, प्राकृतिक संसाधन के लिए। जॉब दे नहीं रहे क्योंकि आपकी टेक्नोलॉजी जॉब देगी नहीं, दे नहीं सकती, कभी नहीं दे सकती। तो जो आप उत्पादन करेंगे वह किसके लिए करेंगे। वह इकोनॉमी कब तक चल सकती है जो उत्पादन तो करती है लेकिन उसका खरीदार मार्केट में नहीं है। मार्केट मं उसका खरीदार होगा कहाँ से? एक खास छोटे से वर्ग को छोडकर अधिकांश उसके खरीददार हो नहीं सकते क्योंकि उनके पास रोजगार ही नहीं है। खरीदार नहीं है तो इकोनॉमी गिरेगी कि टिकेगी? खुद अपने आप में यह देखने की, समझने की बात है, जिसकी तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता है और न ही हम पश्चिम से सीखने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने जो किया है, उससे क्या भुगता है, हमको तो पश्चिम दिखाई देता है बहुत विकसित। आप देखें कितने आदिवासी कबीले, जर्मनी के, फ्राँस के इन सब देशों के नष्ट हो गए। अंग्रेजी में जिसका Extinct कहा गया है। Extinction हो गया उनका कोई नहीं जानता वे कहाँ है? खुद हमारे यहाँ अब कुछ जातियाँ Extinct हो गई है कैसे हो जाते है श्व3ह्लद्बठ्ठष्ह्ल? आप इलाके से निकले कोई कहाँ गया कोई कहाँ गया तो समुदाय के रूप में आप समाप्त हो गए। मनुष्य के रूप में, एक सांस्कृतिक समाज के सदस्य के रूप में आप Extinct हो गए। आप अपनी भाषा भूल गए। अभी Ganesh N. Devy का रिसर्च आया था। कुछ साल पहले तो उनका यह कहना है कि लगभग 220 बोलियाँ 1950 से लेकर 2010 तक केवल भारतवर्ष में नष्ट हो चुकी है। जब बोलियाँ नष्ट होती है, तो बोलियाँ नष्ट नहीं हुई है उनको बोलने वाला समाज नहीं रहा। अब जब बोलने वाला नहीं रहा तो वह नष्ट हो गई। उन बोलियों में जो ज्ञान था वह भी नष्ट हो गया। हर बोली हर भाषा कुछ ज्ञान को समाहित करती है। वह ज्ञान परंपरा उस भाषा में रहती है। उस भाषा के नष्ट होते ही वह ज्ञान परंपरा नष्ट नष्ट हो जाती है। तो इतना नुकसान तो हमने कर लिया। पर्यावरण की तो बात ही छोड दीजिये। उसके बारे में आप सब जानते हैं। वह भी विकास की कीमत है।
तो यह सारा हमारी आर्थिक संरचना की प्रक्रिया है। इस आर्थिक संरचना की प्रक्रिया में कितनी हिंसा है, कितनी बर्बरता है, देखिए बर्बर आप केवल मनुष्य के प्रति ही नहीं होते हैं, प्रकृति के प्रति भी होते है। पेड-पशुओं के प्रति भी होते है और बर्बरता एक स्वभाव है और वह अगर आपमें है, तो आप मनुष्य के प्रति भी होंगे। दूसर के प्रति भी होंगे और अक्सर अपने प्रति भी होंगे। दूसरों के प्रति बर्बर होना आत्मिक स्तर पर अपने प्रति भी बर्बर होना है। इसलिए हम मनोविज्ञान में पर हिंसा एवं आत्महिंसा में भेद नहीं करते हैं। प्रोजेक्शन अलग-अलग है किंतु प्रवृत्ति मूलतः वही है जैसा कि मैंने कहा कि सांस्कृतिक हिंसा इसको वैधता देती है क्योंकि हमने मान लिया है कि जीडीपी का बढना, उत्पादन का बढना, डेवलपमेंट, टेक्नोलॉजी का लगातार एडवांस होना/ बढना, यहीं मनुष्य के भविष्य के लिए अच्छा है। इसको लेकर कोई सवाल नहीं है। इसको लेकर सर्वस मति लगभग है और माफ कीजिएगा हमारे माक्र्सवादियों में भी यहीं सम्मति थी और पूँजीवादियों में भी यही स मति थी। मैंने एक बार एक लेख लिखा था। मैंने उसमें लिखा था कि माक्सर्वाद की बुनियादी मान्यता यह है कि जो भी परिवर्तन समाज में घटित होता है उसके पीछे औद्योगिक संबंधों का परिवर्तन होता है और औद्योगिक संबंध आधारित होते है means and tools या production forces पर। तो मैंने एक सवाल उठाया था जिसको हमारे मित्र गणेश मंत्री ने बहुत पसंद किया था। मैंने उसमें यह कहा कि यह कैसे संभव हो सकता है था कि जिन आधारों पर पूँजीवाद का विकास हुआ है जिन means and tools या Production forces के आधार पर पूँजीवाद का विकास हुआ उन्हीं means and tools के आधार पर आप समाजवाद का विकास करना चाहते हो। या तो आप की धारणा गलत है या आपका तरीका गलत हो गया। और मैं यह मानता हूँ कि तरीका गलत हो गया। अगर एक विकेन्द्रीकृत अर्थ व्यवस्था होती। साधन हमारे विकेन्द्रीकृत होते तो एक विकेन्द्रीकृत अर्थ व्यवस्था एक समाजवादी समाज पैदा करती। आज 21वीं सदी में जो नए माक्र्सवादी पैदा हुए हैं वे मानने लगे हैं कि हमें छोटे स्तर पर करना चाहिए। वह नाम नहीं लेते गाँधी का। नाम अभी माक्र्स का ही चलता है। तो चलाइये, इसमें कोई हर्ज नहीं है। हमें नाम से मतलब नहीं है। हमें मतलब है कि बात समझ रहे हैं कि नहीं समझ रहे हैं। किसी का भी नाम चलाइये लेकिन करो तो सही। अगर यह नहीं करते तो नाम का कोई मतलब नहीं रहता। इस प्रकार से एक बात को हमें समझने की जरूरत है कि इसके पीछे एक सांस्कृतिक हिंसा, हमारी विचार प्रणाली मैं जो हिंसक सिद्घांत बैठ गए हैं कि यही सही आर्थिक सिद्घांत हैं। यह हमने मान लिया है।
दूसरा हमने यह मान लिया है कि कॉम्पीटीशन जरूरी है। कॉम्पीटशन समाज के विकास के लिए आवश्यक है। आज तक हम पढते आए थे कि सहकार समाज के विकास के लिए आवश्यक है। cooperation समाज के विकास के लिए जरूरी है। अब हम पढते हैं कि कॉम्पीटीशन समाज के विकास के लिए जरूरी है। अब वह कहते हैं कि प्रतिद्वन्दिता तो मत कहो प्रतिस्पर्धा कह दो। प्रति तो उसमें है ही इसमें कोई संदेह नहीं है।
दूसरा आप देखेंगे राजनीतिक हिंसा, हमारी राजनीतिक संरचना में कितनी हिंसा है। हम कहते है हम डेमोक्रेसी में हैं। बीसवीं शताब्दी के आखिरी दौर से लेकर और अभी तक राज्य जितना ताकतवर हुआ उतना दुनिया में कभी नहीं था। जिसे आप Monarchy कहते हैं वह इतनी ताकतवर नहीं थी जितना आज राज्य ताकतवर हो गया है। राज्य भी वह राज्य जो वास्तव में (माफ कीजिएगा) इंटरनेशनल कॉरपोरेट्स के एजेंट की तरह कार्य कर रहे हैं। सभी राज्य दुनिया के, मैं केवल भारत की बात नहीं कर रहा हूँ सभी कर रहे हैं। सब कुछ तय करते हैं कि कॉपरेट्स क्या चाहते हैं? अभी कुछ साल पहले डेविड कोरटेन की किताब आई थी। आप लोग पढिए इसको यदि कहीं मिल जाए। When corporates rule the world किताब का शीर्षक है अर्थात कॉरपोरेट्स दुनिया का शासन कैसे चला रहे हैं। तो सारी दुनिया में कॉरपोरेट का राज चल रहा है। आर्थिक पॉलिसी ही नहीं अन्य भी क्योंकि आर्थिक केवल आर्थिक नहीं होता है। आपको जमीन चाहिए अगर तो केवल आर्थिक मसला नहीं है, उसके लिए आपको कानून भी बनाना पडेगा। उसके लिए आपको राज्य की सहायता की जरूरत होगी। 50 तरीके के साधन आपको चाहिए। वे राज्य आपको देगा/ दिलाएगा। तो राज्य क्या कर रहा है। वह एक तरह से उनकी पॉलिसी के मुताबिक अपने कानून बनाने की कोशिश कर रहा है। यह बात लास्की ने बहुत पहले कही थी कि राज्य वर्गीय हितों का रक्षक है। वहीं रूप हमको सामने दिखाई दे रहा है। इसके पीछे एक वैध सांस्कृतिक हिंसा काम कर रही है। हम ने यह मान लिया है कि पार्लियामेंट इज सुप्रीम पार्लियामेंट जो करती है, वह तो पार्लियामेंट है, हमनें चुनी है, हमारे रिप्रेजेंटिव है, वह कर रहे हैं क्योंकि वह कर रहे हैं इसलिए लोकतांत्रिक है जो भी किया जा रहा है लोकतांत्रिक है, क्या वास्तव में ऐसा होता है?
क्या पार्लियामेंट स्वयं अलोकतांत्रिक नहीं हो सकती? क्या इतिहास में नहीं हुई है? आफ ही अपने देश में जब इमरजेंसी लगी थी तो पार्लियामेंट का कार्यकाल समाप्त हो चुका था 1976 में। 1971 में चुनाव हुए थे तो कार्यकाल पूरा हो चुका था। उस समय की सरकार ने, जिसे हम कई लोग आज की सरकार से भी बेहतर मानते है, एक कानून पारित किया था कि लोकसभा का कार्यकाल 5 के बजाए 6 साल के लिए होगा। हो गया। मैं आपसे पूछता हूँ वे अगर एक साल बढा सकते हैं तो 10 साल भी बढा सकते हैं। कानूनी बाधा क्या है। जब कॉन्स्टिट्यूशन में अधिकार है कि आप 1 साल के लिए बढा सकते हैं तो आप 10 साल के लिए भी बढा सकते है। उसका भी उदाहरण देता हूँ आपको। 1848 में फ्रांस में क्रांति हुई तो नेपोलियन बोनापार्ट के भतीजे नेपोलियन थर्ड, लुई नेपोलियन जिनको कहा जाता है जब वे राष्ट्रपति चुने गए उसके बाद वहाँ के पार्लियामेंट ने एक प्रस्ताव पारित किया कि इनका कार्यकाल 10 साल होगा। वह दोबारा चुनाव कभी नहीं लडे और कार्यकाल 10 साल हो गया। थोडे दिन बाद फ्रांस में एक और प्रस्ताव पारित किया गया कि लुई नेपोलियन तो जिंदगी भर राष्ट्रपति रहेंगे। चलिए, जिंदगी भर रख लीजिए। आप लोगों को आश्चर्य होगा यह जानकर कि थोडे दिनों बाद में एक और प्रस्ताव पारित किया पार्लियामेंट ने कि अब वह राष्ट्रपति नहीं सम्राट नेपोयिलन कहलाएँगे यानी गणतांत्रिक तरीके से Monarchy स्थापित हो गई। हिटलर सत्ता में आया था चुन कर के। मुसोलिनी ने भी चुनाव की प्रक्रिया अपनाकर के अपने को मजबूत किया था। कब्जा तो बिना चुनाव की प्रक्रिया के किया बाद में चुनाव की प्रक्रिया अपनाकर अपने को मजबूत किया। तरीका बदल दिया था आनुपातिक पद्धति से चुनाव होगा वगैरह वगैरह। यह डिटेल में जाकर समझने की जरूरत होती है। पर मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि पार्लियामेंट का होना लोकतांत्रिक होने का सबूत नहीं होता है। लोकतंत्र होने का सबूत है मेरी आवाज सुनी जाती है कि नहीं सुनी जाती। मेरे साथ न्याय होता है कि नहीं होता है। मेरे हित अर्थात सबके हितों का ध्यान रखा जा रहा है या नहीं। आज आप स्वयं देखिये कि आप राज्य के सामने अपने को कितना असहाय महसूस करते हैं। हर व्यक्ति संप्रभु है। लोकतंत्र का सिद्धांत है कि हर व्यक्ति संप्रभु है। वह अपनी संप्रभुता हस्तांतरित करता है पार्लियामेंट को, राज्य को, सरकार को। तो यह जो डेलीगेटेड संप्रभुता है, यह जैसे हमेशा के लिए हो गई है राज्य नामक संस्था में। अब मेरी कोई संप्रभुता नहीं, अब तो जो राज्य कहेगा मुझे करना है, नहीं तो मैं कानून तोड रहा हूँ। देशद्रोही वगैरह-वगैरह 50 तरह के आरोप लगेंगे। छोटी-छोटी बातों पर आजकल देशद्रोह के आरोप लगाए जाने लगे हैं, तो उसे हम कैसे लोकतंत्र कहेंगे। किसी भी पार्टी का शासन हो। मैं किसी पार्टी विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ। मैंने देखा है कि सभी राजनीतिक दल सत्ता में आकर लगभग यही सब करते हैं। तरीके थोडे ऊपर-नीचे होते हैं। कुछ लोग सॉफ्टली करते, तो कुछ लोग हार्डली करते हैं लेकिन करते वही है। इसलिए गाँधी हिन्दस्वराज में पार्लियामेन्ट के लिए बहुत कडे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।
एक और है सामाजिक हिंसा। हमारी जातियों की ऊँच-नीच, स्त्रियों के प्रति, बच्चों के प्रति भेदभाव, दफ्तर में काम करने वाले चपरासी को कोई आप कह कर नहीं बुलाता है। सभी उसको तुम कहते हैं। वह अगर अफसर को तुम कह दे, तो तुरंत एक्शन हो जाएगा। क्यों भाई एक डिग*ेटी है उसकी भी। आप कहने में क्या बिगडता है। उम्र में बडा हो सकता है। 60 साल के रिटायरमेंट के नजदीक हो, तो भी तुम ही कहते हैं। तो यह क्या है क्योंकि हमारा एक विश्वास है कि जो नीचा है पद में, स्थिति में, हैसियत में उसे तुम कहा जाएगा और जो ऊँचा है उसे आप कहा जाएगा। तो एक प्रकार से यह हमारे सामाजिक अंतर वैयक्तिक व्यवहार में भी हिंसा आ गई है। परिवार में हिंसा, धर्म के आधार पर हिंसा यह सब सामाजिक हिंसा है और इन सब के लिए लेजिटिमेसी है हम भले यहाँ बैठकर अनुचित कह दें, अभी उसको, लेकिन उसकी लेजिटिमेसी है। कहते है कि शास्त्र ने कहा है कि अस्पृश्यता होनी चाहिए, शास्त्र कहते हैं कि अस्पृश्यता वाजिब है या वर्ण व्यवस्था इसमें यह होना चाहिए, वह होना चाहिए, फलां-फलां शास्त्र में यह लिखा है, फलां स्मृति में यह लिखा है, हमारी परंपरा कहती है कि यह होना चाहिए और हम अपनी परंपरा में यहीं मानते आए हैं। इसलिए अब इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। सारी दुनिया का इतिहास परिवर्तन का इतिहास है, पर आप कहते हैं कि हमारी परंपरा में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। अपने को बदल चुके हैं पूरे जीवम में, जीवन शैली में बदल चुके हैं, लेकिन इस परंपरा में परिवर्तन नहीं करेंगे। यह हमारी परंपरा है। इस मंदिर में, इस मस्जिद में स्त्रियों का प्रवेश नहीं हो सकता। तो यह क्या है और इसके लिए आप शास्त्र का सहारा लेते ह तो यह जो शास्त्र है यह भी कई बार सांस्कृतिक हिंसा को लेजिटिमेसी देने के लिए इस्तेमाल होते हैं। इसलिए गाँधी कहते हैं कि शास्त्र में कोई भी चीज अहिंसा के विरुद्ध, विवेक के विरुद्ध है तो मैं उसे स्वीकार नहीं करता हूँ। उनसे कहा गया कि अस्पृश्यता के लिए तो शास्त्रों में उल्लेख मिलता है, तो उन्होंने कहा कि मैं ऐसे शास्त्रों को नहीं मानता, स्वीकार नहीं करता, यह कहने के लिए एक साहस चाहिए जब अंतिम बार गाँधी को मारा गया, उसके पहले कितनी बार गाँधी को मारने की कोशिशें हुई, केवल राजनीतिक कारणों से नहीं, केवल इसलिए नहीं कि वे मुसलमानों के पक्षधर माने जाते, इसलिए भी कि वे मंदिरों में प्रवेश चाहते हैं, इसलिए भी उन पर आक्रमण हुए। तो एक प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि यह जो सारी हिंसा है यह मनुष्य जाति के बर्बरीकरण का रूप है या कह लीजिए हिंसा के रूप है और इसलिए सब अन्याय है। गाँधी के लिए इसलिए इन सब का विरोध करना, इन सब के प्रति आफ मन में जागृति पैदा करना, उसके लिए आंदोलन करना, उसके लिए समाज को तैयार करना, वह समाज आपका हो चाहे दक्षिण अफ्रीका हो, चाहे कहीं का भी हो। आदमी काम तो किसी स्थान विशेष पर करता है, लेकिन वह होता सारी दुनिया के लिए है। एक लेबोरेटरी में जो प्रयोग करते हैं, उससे जो निकलता है वह पूरी दुनिया के लिए होता है वैसे ही इस तरह कोई प्रयोग गाँधी कर रहे हैं तो चाहे वह भारत में कर रहे होंगे, दक्षिण अफ्रीका में कर रहे होंगे किंतु वह पूरी दुनिया पर लागू होता है क्योंकि वहाँ भी मनुष्य है, यहाँ भी मनुष्य है तो यह जो गाँधी करने की कोशिश कर रहे हैं वह अन्याय का न्यायपूर्ण प्रतिरोध है। इसलिए मैं हमेशा मानता हूँ कि गाँधी अन्याय के विरुद्ध खडे होने का नाम है। जितने प्रकार के अन्याय जहाँ-जहाँ भी दिखाई दे रहे हैं और उन सब का मैं मानता हूँ कि हर आदमी गाँधी हो सकता है। यह जो कहते हैं न कि हर कोई गाँधी तो नहीं हो सकता। ऐसा नहीं है। हर आदमी गाँधी हो सकता है अपने वृत में, अपने संदर्भ में, अपने आसपास की दुनिया में और इतना बहुत है। इतना भी करने लग जाएँगे तो पूरा देश गाँधी हो जाएगा। मुझे नहीं मालूम कि हम होने को तैयार है या नहीं।
उज्जैन में दिये व्याख्यान का संशोधित रूप।
सुथारों की बडी गुवाड,
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