fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

गाँधी का साहित्य चिन्तन और उसका प्रभाव

श्रीप्रकाश मिश्र
आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए। मानवता सागर के समान है; यदि सागर की कुछ बूँदें गन्दी हैं, तो पूरा सागर गंदा नहीं हो जाता।
- महात्मा गाँधी
महात्मा गाँधी के चिन्तन के चार स्तम्भ है, सत्य, अहिन्सा, प्रेम और सत्याग्रह। इनमे सत्याग्रह साधन है, प्रकिया है और सत्य, अहिन्सा तथा प्रेम सारतत्व। अनमे साहित्य सत्य के कोटि का वस्तु है। साहित्य के सत्य की कोटि के दो रूप होते हैं एक जागतिक यथार्थ, दूसरा जागतिक आदर्श-यानी जो इस जगत में बुरा हुआ है उसका संहार एवं जो अच्छा हुआ है उसका उन्नयन। पहला जगत के है की बात करता है, दूसरा चाहिए की। यह चाहिए जब है पर आधारित होता है, तभी उसका कोई मतलब होता है, अन्यथा मिथ्या है। यह चाहिए एक तरफ नैतिक बोध रचता है। दूसरी तरफ जीवन मूल्य। वह उनकी स्थापना करता है, प्रतिदर्श मॉडल प्रस्तुत करता है और उसकी ओर समन्वय होता है, तब वह सत्य की कोटि के विस्तार पाकर अहिन्सा, प्रेम और सत्याग्रह में संक्रमित हो जाता है। साहित्य के संदर्भ में गाँधीजी का अभिप्रेत यही था।
दूसरी बात यह है कि गाँधीजी अंतरात्मा पर जोर देते थे। इस अन्तरआत्मा से चित्र और मानस सम्बद्ध है। इस दृष्टि से उनके लिए साहित्य मनुष्य के अन्तःकरण और आभ्यांतरीकरण से सम्बद्ध है, उसकी बाह्य स्थिति से कुछ कम। इस चित्र और मानस से संयुक्त भारत की आत्मा कुछ दूसरे ढंग की रही है-कुछ अधिक की समावेशी। इसलिए यहाँ की हर कला, हर साहित्य एक सरलता की माँग करता रहा है- गतिशील सरलता की- जिससे कि निरंतर परिवर्तित होकर उसे वृहद रूप से ग्रहण कर सके।
तीसरी बात यह है कि जागतिक सत्य के बारे में गाँधीजी के कुछ स्पष्ट विचार थे। वे विचार उनके अध्ययन से बने थे, सोच से बने थे, अनुभूति से बने थे, आजादी की लडाई के दौरान अनुभव से बने थे और एक बेहतर दुनिया की तलाश के इरादे से बने थे। उनसे उनका आग्रह सरलता का बढा था, अहिन्सा पर बढा था, सहिष्णुता पर बढा था, भाई-चारे पर बढा था, लौकिकता पर बढा था, ग्रामीण समाज पर बढा था, वहाँ पर व्यक्ति की जो स्थिति थी, उस पर बढा था। उनका मानना था की वे हिन्दू है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे तमाम मजूसी मतों के विराधी है। उल्टे वे उनके .... वाक्यों को अपने जीवन में उतारते थे और उम्मीद करते थे कि दूसरे भी उतारेंगे। वे अपने को वैष्णव कहते थे। इसका मतलब यह नह था कि वे शैव, बौद्ध, जैनी या सिक्ख आदि से घृणा करते थे। बल्कि सबके साथ समवाय की बात करते थे। वे वर्ण व्यवस्था में विश्वास करते थे। इसका मतलब यह नह कि वे उच्च वर्ण के लोगों को अधिक सम्मान देते थे और निम्न वर्ण के लोगो की उपेक्षा करते थे। इसके उलट वे उनसे अधिक प्यार करते थे। इन तमाम बातों से उनकी दृष्टि मतनिरपेक्ष बनती थी, ऊँच-नीच के भेद की श्ाृंखला को तोडती थी, जो आजादी की लडाई के विचार-स्तम्भ थे। इनने कुछ नकारों को जन्म दिया था, जैसे साम्प्रदायिकता, छुआछूत, अमानवीय स्थितियाँ, गरीबी, शोषण, वर्चस्व। वही कुछ सकारात्मक मूल्यों को आत्मसात करने की बात कही थी, जैसे स्वतंत्रता, समानता, सौहार्द*, जनतंत्र, समाजवाद आदि। इसका मिला-जुला रूप नागरिक राष्ट्रवाद, तदनुभूतिक राष्ट्रवाद, अंतः मत-मातान्तर और अंतः संस्कृति का बनता था। कहना ना होगा कि आधुनिक भारत और उसके जनतांत्रिक मूल्य तो पश्चिम से आये थे, वे वही नह रह गये थे, जो वहाँ थे। उनका उपयग विदेशी सत्ता उखाड फेंकने के लिए हुआ, इसलिए उनका स्वरूप काफी बदल गया। यही नह, वे तमाम मूल्य नितान्त पश्चिम से ही आये हुए नह थे। तमाम समुदायों ने जो आन्दोलन चलाया था सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए, उनकी भी भूमिका थी उन मूल्यों को रूप देने में। गाँधीजी ने हमेशा उन मूल्यों की वकालत की थी। साहित्य में वे इन्ही मूल्यों का प्रतिबिम्बन और अभिव्यक्ति की उपेक्षा रखते थे। उनका रेफलेक्शन भी उनसे प्रभावित नये भारतीय साहित्य में खूब देखने को मिलता है।
2
उनके विचारों का भारतीय साहित्य में, विशेषकर हिन्दी साहित्य में किस तरह से परावर्तन हुआ है, अब में कुछ उसकी बात करना चाहता हूँ। विश्व के साहित्य का इतिहास देखने पर पता चलता है कि उत्तम औीर विश्ष्टि साहित्य तब लिखा जाता है, जब समाज आन्दोलित रहता है, किन्ही बडी घटनाओं या पुरूषों द्वारा मथा जा रहा होता है। गाँधीजी का उदय न केवल स्वतत्रंता संग्राम के मंच पर हुआ, वरन् वे उसके अगुवा बने। अचानक लगा कि वे बुद्ध, शंकराचार्य और तुलसी की श्ाृंखला के एक बडे सामाजिक नेता है। इसलिए उनका प्रभाव जीवन के विविध पक्षों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से पडा। भारतीय साहित्य उससे अछूता न रहा। बंगाली में शरतचंद्र से लेकर जरासंध तक, उडिया में सचिन राउतराम से लेकर गोपानाथ महांती तक, तमिल में सुब्रद्धमण्यम भारती और उनके साथ के रचनाकार, मलयालम में बल्लतोल, कुमारन आसान के पीढी के रचनाकार, मराठी में कैशव सुत से कुसुमाग्रज तक के रचनाकार, गुजराती में उमाशंकर जोशी और उनके साथ के रचनाकार, असमिया में वीरेन्द्र भटाचार्य आदि, उनसे प्रभावित होकर लिखने वाले लोग रहे हैं। यहाँ तक कि अंग्रेजी में राजा राव और मुलकराज आनन्द ने उनसे प्रभावित होकर लिखा। यह प्रभाव उनके व्यक्तित्व व कर्तृत्व के साथ-साथ उनके विचारो और जीवन को देखने के कोण से उत्पन्न था।
गाँधीजी की उपस्थिति ने हिन्दी के नये रचनाकारों को तो प्रभावित किया ही, जो पहले से लिख रहे थे, उनको भी प्रभावित किया। हिन्दी साहित्य की मुख्य धारा कविता रही है और वह अब भी है। पहले से भातेंन्दु के काल से लिख रहे कवियों में श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, गया प्रसाद शुक्ल सनेही प्रमुख थे। गौर से देखने पर लगता है कि वे गाँधीजी से कम देश-भक्ति, दुःखी- मारी जनता और ब्रिटिश शासन के विराध से अधिक प्रभावित थे। सीधे-सीधे गाँधीजी से प्रभावित होकर लिखने वालो में की दो धाराएँ बनीं और दोनों के निर्माण में महावीर प्रसाद द्विवेदी की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंन गाँधी के विचारों और व्यक्तित्व को बडी गंभीरता से लिया था और उसकी गहराई को साहित्य की और मोडना चाहा था।
गाँधीजी के भारतीय परिदृश्य पर आने के बाद हिन्दी कविता में तीन प्रवृत्तियाँ देखने को मिलीं। दोनों का सम्बन्ध महामानव से था, तीसरे का लघुमानव से। महामानवीय दो प्रवृत्तियों में एक का सम्बन्ध मैथिलीशरण गुप्त से लेकर रामधारी सिंह दिनकर तक था, जिसमे पुराने भारतीय मिथकिय पात्रों को समसामयिक बनाकर इस देश की दुर्दशा और उसके प्रतिकार में चल रही आजादी की लडाई को प्रकारान्तर से गौरवान्वित किया गया। उसी का विस्तार आगे कुछ संदर्भों में धर्मवीर भारती, श्री नरेश मेहता, और कुँवर नारायण की रचनाओं में हुआ। दूसरी प्रवत्रि छायावाद की थी। इसमे जयशंकर प्रसाद ने मनु को मिथ से उठाकर अधिक लौकिक बनाकर पेश किया, जो एक नयी सभ्यता रचेगा। उनके नाटक और चिन्तनदायक लेख भी प्रवृत्ति के द्यौतक थे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने राम और तुलसी जैसे व्यक्तित्वों को लौकिक और समकालीन बनाकर वही काम किया। साहित्य के मूल्यांकन के लिए, जो मानदण्ड रामचन्द्र शुक्ल ने गढा, वह भी गाँधी के व्यक्तित्व से अनुप्रेरित था। यह सब आदर्श के स्तर पर था। जगत् की वास्तविकता के स्तर पर रचना की प्रेमचन्द ने। उसके यथार्थ और यथातथ्य का खुलासा करते हुए जो समाधान प्रेमचंद ने रखा वह गाँधी के आदर्शों की और उन्मुख था। प्रेमाश्रम, सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि ही नहीं, गोदान पर भी उसका असर है। कहानियों और लेखों में उसकी पूरी रूनझुन है। गाँधी नगर समाज की जगह ग्रामीण समाज पर जोर देते थे। उसकी पूरी अभिव्यक्ति उनके लेखन में है। वही स्थिति जयशंकर प्रसाद के उपन्यासों और तमाम कहानियों की है। वही प्रवृत्ति रेणु, शिवप्रसाद सिंह, लक्ष्मीनारायण लाल मार्कण्डेय और श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों में पसरी। छायावाद के दौर में जो तमाम उपन्यास और नाटक इतिहास को लेकर लिखे गए, सामाजिक विसंगतियों को लेकर लिखे गये, मूल्यों की टकराहट को लेकर लिखे गए, वे उसी प्रभाव के अंतर्गत थे। नीतिकाव्य में तथा प्रकृति को लेकर लिखी कविताओं में उस महामानवीय प्रवृत्ति की समुचित अभिव्यक्ति सुमित्रानन्दन पंत और दिग्गज समकालीन कवियो में हुआ है।
एक तीसरी प्रवृत्ति एक तरह से बालकृष्ण शर्मा नवीन और मानवलाल चतुर्वेदी से आरम्भ होती है और अज्ञेय पर आकर पूरी होती है। अज्ञेय से वह नयी धारा में रूपांतरीत हो जाती है। इनमें सोहनलाल द्विवेदी, सियारामशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, श्यामनारायण पाण्डेय आदि ढेर सारे कवि आते हैं। इसमें माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन पहले तिलक से प्रभावित कवि थे, पर उनके न रहने पर वे गाँधी से प्रभावित हुए। राष्ट्रीयता की भावना उनके लेखन का बीज था। वे जगत का कल्याण महामानव में न देखकर लघुमानव में देखते थे। लघुमानव उसे कहा गया जो बडे व्यक्तित्व के लोग न होकर वे छोटे-छोटे लोग थे, जो अपने अधिकारों के प्रति चेतन थे और उन्हे शांतिपूर्ण ढंग से प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध थे। वही कुछ ऐसे लोग भी थे, जो शान्तिपूर्ण मार्ग की जगह हिन्सक मार्ग अपनाने की भी वकालत करते थे। आलोचना में यदि महाकाव्यात्मक व्यक्तित्व के महामानक की स्थापना रामचन्द्र शुक्ल ने की थी, तो छोटे पर चेतन मनुष्य की स्थापना विजयदेव नारायण साही ने की थी। विद्यानिवास मिश्र अपने साहित्य चिन्तन में इसी लघुमानव के करीब थे, और इस करीबी का कारण डा. राममनोहर लोहिया का समाजकारी ढंग था इतिहास और परंपरा को देखने का। यही साही और विद्यानिवास मिश्र को करीब लाता था। वही विद्यानिवास मिश्र कांग्रेस के भीतर के समाजवादियो के भी साथ थे और इस स्थापना में आधुनिकता लोकचित्र और अनन्तचेतना को मिलाकर मानते हैंकि हम जिसे भारतीय साहित्य कहते हैं, वह नाना द्वन्द्वों, संघर्षों के उपरान्त भारतीय चित्र में इसे समग्र जीवनबोध की अभिव्यक्ति बना है। विद्यानिवास मिश्र की काल सम्बन्धी अवधारणा और उसका साहित्य में दखल वहीं से अनुशासित है। कहना न होगा कि गाँधी नगर जीवन, नगर चित्र और नगर सोच की जगह गा*मीण लोक जीवन, लोकमन, लोकचित्र और लोकसोच पर जोर देते थे। विद्यानिवास मिश्र असके कायल थे और साहित्य पर अपनी बात कहने के लिए लोकमन और लोकचित्र को अपनाते थे, वहीं से देखते थे। वे कहते थे कि गँवार होना तमान लोगों के लिए विशेषण है, पर हमारे लिए संज्ञा हैं। वही हमारे खडे होने की जमीन है। तीसरे चित्र और मानस पर जोर देकर गाँधी समावेशी साहित्य पर जोर देते थे, जो मनुष्य के अन्तःकरण और अभ्यन्ता से अधिक सम्बद्ध है।
आगे इस तीसरी प्रवृत्ति का पूर्ण खुलासा भवानीप्रसाद मिश्र, प्रभाकर माचवे, विष्णु प्रभाकर और रघुवीर सहाय की रचनाओं में हुआ। इसमे भवानीप्रसाद मिश्र का आदर्श थाः
जिस तरह हम बोलते हैं
उस तरह तू दिख,
और उसके बाद भी,
हमसे बडा तू दिख।
यह गाँधी के आदर्श मनसा, वाचा, कर्मणा के समुच्चय की काव्याभिव्यक्ति है। दूसरे, उन्हें नगर जीवन से बडी श्किायत थी, क्योकि वहाँ पूँजीवाद की आँच महसूस होने लगी थी। वे पश्चिमी आधुनिक सभ्यता पर बडी जलती हुई टिप्पणियाँ करते थे। प्रकृति और ग्राम्यबोध पर जोर देते थे।
भवानीप्रसाद मिश्र का लहजा अगर गंभीरता का है तो प्रभाकर माचवे का हास्य और व्यंग्य का। उसका आधार आधुनिक जीवन की विषमता, विसंगति और विडम्बना है। विष्णु प्रभाकर ने जो गद्य लिखा है, वह गाँधीवादी दृष्टि से जीवन को देखकर लिख है। रघुवीर सहाय ने गाँधी चिन्तन के समाजवादी पक्ष को सम-सामयिक बनाकर अपनी कविता लिखि है। और उसे नगरबोध को अभिव्यक्ति दी है। इसी धारा से विजयदेव नारायण साही श्रीकांत वर्मा और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना प्रकारान्तर से जुडते हैं।
इधर साहित्य लेखन में गाँधी का प्रभाव चाहे जितना कम हो गया है, साहित्य चिन्तन में उनका प्रभाव मरा नह है। रघुवीर चौधरी जैसे रचनाकारों का कहना है कि गाँधी का चिन्तन माक्र्स के बाद का है, इसलिए समकालीन जगत् के लिए अधिक प्रासंगिक है। साहित्य की आलोचना में वह प्रवृत्ति नये तरह से विकसित हो रही है। दार्शनिक स्तर पर धर्मपाल और मूंल्याकन के स्तर पर विजय बहादुर सिंह और श्री भगवान सिंह उसको लेकर बडे सक्रिय हैं।
धर्मपाल साहित्य विशेषज्ञ नहीं है, पर इस संदर्भ में उनका यह कथन सर्वथा ध्यान देने योग्य है, भारतीय सभ्यता का जो पुराना इतिहास है, उसे भारतीय चित्र और काल की ही एक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। उसकी पुष्टि उसके साहित्य से होती है। इस साहित्य में भारतीयता के सहज चित्र और काल की झलक मिलती है। हो सकता है कि भारतीय साहित्य में जो है, वह सबका सब सीधे चित्र और काल से सम्बन्धित न हो। इस विशाल साहित्य में अनेक विषयों पर अनेक प्रकार की बातें हैं। पर वे सभी बातें इस भारतीय चित्र को बनाने में, योग्य बनाने में योग देती हैं और काल के सहज धरातल से संसार की भारतीय सभा के अनुरूप, भारतीय मुहाविरे में ही कही गयी है। जो बाते इस साहित्य में बहुत मौलिक दिखाई देती हैं, जो सारे कथन के आधार की तरह लगती हैं और जो विभिन्न साहित्य में बार-बार दुहराई जाती हैं, वे बातें भारतीय चित्र और काल का सहज परिचायक होंगी ही।
श्री भगवान सिंह अपनी बात कुछ इस तरह से रखते हैं कि विभिन्न जातियों, समुदायों के बीच संघर्षों के मध्य आदान-प्रदान के उदाहरणों की भरमार है, जिसकी अभिव्यक्ति लोक जीवन में होती है। साहित्य में उसी की अभिव्यक्ति देश-काल-परिस्थिति की आवश्यकता के अनुसार होती है। जब कोई बडा व्यक्तित्व सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक जीवन में दखल देता है। तब साहित्य भी उससे प्रभावित होता है और उसकी अनुगूँज दूर तक जाती है। गाँधी का व्यक्तित्व ऐसा ही था और वह आजतक चल रहा है, राजनीति से उन्हें हटा दिया जाने के बावजूद। दरअस्ल गाँधी के बाद आते हैं, इसलिए वर्ग संघर्ष की जगह समावेशी समाज और आत्मबल से भरा मनुष्य अधिक प्रासंगिक है। साहित्य में उसी की अभिव्यक्ति की जरूरत है। वही समय के अधिक निकट और अनुरूप होगा। लोकचित्र उसी से अनुशासित रहेगा। जरूरत है उसको विकसित करने की।
विजयबहादुर सिंह कहते हैं कि गाँधीजी ने जगत् को माया नहीं माना। इसलिए उनकी दृष्टि से न तो साहित्य को सत्य का मिथ्यारोपण माना जा सकता है, न ही राजनीति और समाजनीति का प्रतिपक्ष। उसे एक स्वायत्त सत्ता मानना होगा, जो ईश्वरकृत सृष्टि के सामानान्तर सृष्टि करता है, उसकी खामियों से निजात दिलाने के लिए तथा उन खामियों को विरूद्ध लडनेवालों में शौर्य भरने के लिए। इसलिए अलग से वर्ग-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, पर्यावरण-विमर्श जैसे अलगाव मूलक विमर्शों की वहाँ जरूरत नहीं पडी, न आगे पडनी चाहिए।

सम्पर्क - 406, त्रिवेणी रोड,
कीटगंज, इलाहबाद (उ.प्र)-२११००३ मो. ९४५११४२६४७