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हिन्दी साहित्य में गाँधी-चिंतन की अनुगूँज

श्रीभगवान सिंह
खुद वो बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।
- महात्मा गाँधी
साहित्य के सन्दर्भ में महात्मा गाँधी पर तीन दृष्टियों से विचार किया जा सकता है। पहली दृष्टि में वह गाँधी जो एक व्यक्ति के रूप में अपने जीवन काल में ही साहित्य की विविध विधाओं में वण्र्य विषय बनते रहे और यह काम केवल हिन्दी साहित्य में ही नहीं, भारत की अन्य भाषाओं में भी हुआ। वर्ष 2019 में 31 जनवरी से 2 फरवरी तक साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ने Gandhi in Indian Literature विषय पर त्रिदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमें मैं भी हिन्दी कथा साहित्य पर गाँधी के प्रभाव पर बोलने के लिए आमंत्रित था। उस संगोष्ठी में मलयालम, तेलगु, बंगला, गुजराती, तमिल आदि भाषाओं के विद्वानों के वक्तव्यों को सुन कर मुझे पता चला कि गाँधी एक प्रभावशाली राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में पूरे भारतीय साहित्य को प्रभावित कर रहे थे। दूसरी दृष्टि है साहित्य एवं कला के संबंध में गाँधी का अध्ययन और सोच। हालांकि इसे लेकर मैंने गाँधी का साहित्य और भाषा चिंतन (सर्वसेवा संघ, वाराणसी से प्रकाशित) जैसी पुस्तक लिखी है। तीसरी दृष्टि है गाँधी के विचारों की प्रतिच्छाया या अनुगूँज की साहित्य-सृजन में तलाश करना जो इस आलेख का विषय है, अतएव मैं अपना विवेचन इसी विषय पर केन्द्रित रखूँगा।
गाँधी-साहित्य के अध्येताओं को पता होगा कि उनके चिंतन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष था आधुनिक पश्चिमी सभ्यता द्वारा मशीनीकरण के रूप में मानव-समाज के समक्ष प्रस्तुत की गई मशीनी सभ्यता की कठोर आलोचना। यूरोप की धरती पर पैदा हुई जिस औद्योगिक क्रांति से पूरा विश्व चमत्कृत, मोहाविष्ट था, उसे बहुत गहराई से परखते हुए गाँधी ने 1909 में अपनी पुस्तक हिन्दी स्वराज में उसका इन शब्दों में पोस्टमार्टम करके रख दिया था यंत्रों से यूरोप उजड रहा है और वहाँ की हवा भारत में आ गई है। यंत्र आधुनिक सभ्यता की निशानी है और वह महापाप है, ऐसा मैं तो बहुत साफ देख सकता हूँ। यदि यंत्रों की यह हवा ज्यादा चली, तो भारत की बडी शोचनीय स्थिति हो जाएगी। ....मेरी बात आपको कठिन जान पडेगी, किन्तु यह कहना मेरा कर्त्तव्य है कि भारत में मिलें कायम करने के बजाय मैनचेस्टर को अभी और रूपया भेजते रहकर उसका सडा हुआ कपडा इस्तेमाल करते रहने में हमारा भला है क्योंकि उसका कपडा इस्तेमाल करने में केवल हमारा पैसा जाएगा। यदि हम भारत में मैनचेस्टर बना डालें, तो पैसा भारत में रहेगा, किन्तु वह पैसा हमारा खून चूस लेगा।
1909 में यांत्रिक सभ्यता के प्रति गाँधी का जो आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रकट हुआ वही 1925 ई. में प्रेमचंद के प्रकाशित उपन्यास रंगभूमि में प्रकट होकर सामने आया। ध्यातव्य है कि इस उपन्यास की कथा का मुख्य विषय है उद्योगपति जॉन सेवक द्वारा सूरदास की जमीन हथिया कर उस पर सिगरेट की फैक्ट्री खोलना। सूरदास जॉन सेवक के हाथों अपनी जमीन बेचने को तैयार नहीं होता क्योंकि वह अपने गाँव में कारखाना खुलने को शुभ नहीं मानता क्योंकि इसमें उसे अनिष्ट ही अनिष्ट दिखाई पडता है। लेकिन जॉन सेवक और सामंत महेन्द्र कुमार की एकता सूरदास की जमीन जबरन ले लेने में सफल होती है और कारखाना खुल जाता है। तत्पश्चात गाँववालों को विस्थापित किया जाता है किन्तु सूरदास एक सत्याग्रही जैसा अपने झोपडे को बचाने के लिए डटा रहता है और अन्त में कलेक्टर की गोली का शिकार होकर मर जाता है। इसे बहुतों ने औद्योगीकरण की विजय के रूप में देखा है, लेकिन मुझे तो इसमें गाँधी की यह आशंका मूर्त होती दिखाई देती है कि यदि हम भारत में मैनचेस्टर बना डालें, तो पैसा भारत में रहेगा, किन्तु वह पैसा हमारा खून चूस लेगा।
अपने अंतिम उपन्यास गोदान में भी प्रेमचंद मशीनीकरण के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रकट करने से नहीं चूकते। ध्यातव्य है इस उपन्यास में उद्योगपति मि. खन्ना एवं उसके शक्कर मिल का जिक्र आ जाता है। इस मिल में जब मजदूर छँटनी के विरोध में हडताल करते हैं, तो हर जोर-जुल्म की टक्कर में हडताल हमारा नारा है का अनुपालन करते हुए लेखक हमें मजदूर वर्ग की जीत एवं उद्योगपति की शिकस्त से अवगत कराएगा, लेकिन ऐसा न करके लेखक मिल में आग लगवा देता है जिसके मलबे पर मिल मालिक खन्ना को हम विलाप करते हुए देखते हैं। ध्यान रहे रंगभूमि का सूरदास उद्योगवाद का विरोध करने के कारण मारा जाता है किन्तु गोदान (1936) तक आते-आते प्रेमचंद इस नृशंस मशीनीकरण से निजात पाने में ही मनुष्य-समाज का मंगल देखने लगे थे, तभी तो गोदान के एक पात्र प्रो. मेहता के मुख से वे यह कहलवाते हैं-राजनीतिज्ञों की निशानी अब केवल लुप्त साम्राज्यों के खंडहर रह गये हैं और आविष्कारों ने मनुष्यों को मशीन का गुलाम बना देने के सिवा और क्या समस्या हल कर दी ? पुरूषों की रची हुई इस संस्कृति में शांति कहाँ है, सहयोग कहाँ है।
यांत्रिक सभ्यता मशीनीकरण की निर्मम आलोचना का स्वर इस दौर की जिस दूसरी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कृति में मिलता है वह है जयशंकर प्रसाद की कामायनी। उल्लेखनीय है कि कामायनी के मनु ने सारस्वत प्रदेश में यंत्रों का निर्माण विकास कर जनता के लिए अपनी समझ में अच्छा ही किया, किन्तु इस यांत्रिक विकास के दोहनकारी चरित्र के संबंध में उसे जनता का यह उपालम्भ सुनने को मिलता है-
प्रकृति शक्ति तुमने यंत्रों से सबकी छीनी
शोषण कर जीवनी बना दी जर्जर झीनी।
मनुष्य की सुख-सुविधा के लिए मनुष्य द्वारा निर्मित यंत्र ही उसके कंधों पर किस तरह यातनादायक जुए की तरह आ पडे हैं, इसे रहस्य सर्ग की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है-
श्रममय कोलाहल, पीडामय विकल प्रवर्तन महायंत्र का,
श्राण भर भी विश्राम नहीं है प्राण दास है क्रिया तंत्र का।
यहाँ सतत संघर्ष विकलता, कोलाहल का यहाँ राज है
अंधकार में दौड लग रही मतवाला यह सब समाज है।
प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि गाँधी ने मिल एवं मशीन के विकल्प के रूप में देश के सामने चरखा और खादी को रखा यानी सूत कातने, बुनने जैसे कार्य को स्वराज्य प्राप्ति के साथ-साथ देश के आर्थिक स्वाबलम्बन के लिए और विशेषकर गरीबों तथा स्त्रियों की आर्थिक मुक्ति के लिए अमोघ अस्त्र बताया और 1920 में शुरू किए गए असहयोग आंदोलन के समय से लेकर जीवनपर्यन्त वे देश के चप्पे-चप्पे में घूम कर चरखा और खादी का प्रचार करते रहे। इसका प्रभाव भी उस दौर की साहित्यिक रचनाओं में देखा जा सकता है। मसलन, गोदान में ही प्रेमचंद खन्ना की शक्कर मिल में आग लगवा देते हैं, किन्तु गाँधी के चरखा को बचा लेते हैं। उल्लेखनीय है कि गोबर मिस मालती के यहाँ नौकरी करते हुए अपनी बहन की शादी में गाँव जाने के लिए छुट्टी का आग्रह करता है, तो मालती उसे बहन को उपहार स्वरूप देने के लिए सोने का कंगन के साथ एक चरखा भी देती है। गौरतलब है इस उपन्यास का अंतिम शब्द चित्र- धनिया यंत्र की भाँति उठी, आज जो सुतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रख कर सामने खडे दातादीन से बोली-महाराज, घर में गाय है न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गो-दान है। धनिया का सुतली बेचना गाँधी के सूत कातो-बुनो अभियान को ही तो प्रतिध्वनित करता है। कर्मभूमि के अमरकांत और सुखदा भी खादी कातने-बुनने एवं बेचने का काम करते हैं। प्रेमचंद की होली का उपहार, आखिरी तोहफा, आहूति, तावान, पत्नी से पति जैसी कहानियों में भी गाँधी के चरखे एवं खादी का प्रभाव मौजूद है।
सूत कातने-बुनने का कार्य प्रसाद की कामायनी जैसी पौराणिक आख्यान से सम्बद्ध काव्यकृति में भी दिखाई देता है। गौरतलब है ईर्ष्या सर्ग में श्रद्धा का यह कार्य-चित्र-
तुम दूर चले जाते हो जब
तब लेकर तकली यहाँ बैठ,
मैं उसे फिराती रहती हूँ
अपनी निर्जनता बीच पैठ।
मैं बैठी गाती हूँ तकली के
प्रतिवर्द्धन में स्व-विभोर
चल री तकली धीरे-धीरे
प्रिय गये खेलने को अहेर।
श्रद्धा के हाथों में तकली देख कर मुझे उस गाँधी का स्मरण हो आता है जिन्होंने जनवरी 1928 में साबरमती आश्रम में अपने तीसरे पुत्र रामदास के विवाह सम्पन्न हो जाने पर वर-कन्या को उपहार में खुद के काते सूत की माला, गीता की एक-एक प्रति, आश्रम-भजनावलि की एक-एक प्रति के साथ एक-एक तकली दी थी।
कातने-बुनने के प्रति अनुराग-लगाव मैथिलीशरण गुप्त के साकेत की सीता में भी परिलक्षित होता है। गौरतलब है अष्टम सर्ग में सीता का यह उद्गार-
सब ओर लाभ बोध-विनिमय में-
उत्साह मुझे है विविध वृत संचय में।
तुम अर्द्धनग्न क्यों अशेष समय में
आओ, हम कातें-बुनें गान की लय में।
निकले फूलों का रंग, ढंग से ताया,
मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया।
सच कहें तो श्रद्धा हो या साकेत की सीता, उर्मिला जैसी स्त्री चरित्र हों, सबका व्यक्तित्व सत्याग्रह-युग के संयम, शील, सादगी, त्याग, अपरिग्रह, अहिंसा आदि के मूल्यों से निर्मित प्रकाश-पुंज है जो गाँधी चिंतन के प्रभाव का प्रमाण है।
हिन्दी साहित्य पर गाँधी के विचारों एवं कार्यों का गहरा असर डालनेवाला वह पक्ष भी रहा है जिसका संबंध उनके द्वारा राष्ट्रव्यापी स्तर पर चलाये जा रहे अस्पृष्यता-निवारण आंदोलन से था। वैसे गाँधी ने 1915 में ही अहमदाबाद में स्थापित कोचरब सत्याग्रह-आश्रम में ही अस्पृश्यता उन्मूलन की मुहिम शुरू कर दी थी जब बहुतों के विरोध एवं बहिष्कार की धमकियों के बावजूद उन्होंने अछूत दम्पति दादू भाई दानी बहन तथा उनकी बेटी लक्ष्मी को आश्रम में रहने दिया। उनकी बेटी को तो गाँधी जी ने बाद में गोद भी ले लिया। इस अस्पृश्यता विरोधी मुहिम को गाँधी ने 1920 के असहयोग आंदोलन के दौरान राष्ट्रव्यापी अभियान में तब्दील कर दिया और आजीवन इस मोर्चे पर वे डटे रहे। वे देश में जहाँ भी जाते अस्पृष्यता को हिन्दू धर्म का कलंक बताते हुए इसे मिटाने की और अन्त्यजों को बराबरी का दर्जा देने की गुहार लगाते। गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, बंगाल, उडीसा, उत्तर भारत आदि सभी प्रदेशों में अछूतपन को धर्म विरोधी सिद्ध कर उसे मिटाने की अपील करते। इसका देश पर व्यापक असर भी हुआ और साहित्यकारों ने भी अपनी रचनाओं में अस्पृश्यता विरोधी स्वर मुखरित करना शुरू किया। 1930-32 के आसपास प्रेमचंद द्वारा लिखी गई ठाकुर का कुआँ, सद्गति, दूध का दाम जैसी कहानियाँ अस्पृष्यता विरोधी चेतना को ही व्यक्त करती है। गोदान में भी प्रेमचंद सीलिया के माध्यम से इस दलित विमर्श को रखते हैं जब सीलिया के घरवाले उसके ब्राह्मण प्रेमी मातादीन को पकड कर उसे जाति भ्रष्ट करने के लिए उसके मुँह में हड्डी का टुकडा ठूस देते हैं और सीलिया के पिता हरखू का आक्रोश इन शब्दों में फूट पडता है- हम उनका और अपना रक्त एक कर देंगे।
दरअसल अन्त्यजों के अंदर सवर्णों द्वारा किये गये अत्याचार के कारण जो आक्रोश था उसकी परिणति को भांपते हुए ही गाँधी ने अक्टूबर 1931 में लंदन में जब वे गोलमेज सम्मेलन में काँग्रेस के प्रतिनिधि होकर गये थे, कहा था- डॉ. अम्बेडकर की बात का मैं बुरा नहीं मानता। हर एक अस्पृश्य की तरह डॉ. अम्बेडकर को मुझ पर थूकने तक का अधिकार है और वे मुझ पर थूकें, तो भी मैं हँसता रहूँगा। फिर एक दूसरे अवसर पर यह कहा-डॉ. अम्बेडकर के प्रति मेरे मन में बडा सम्मान है। उन्हें कटु होने का पूरा अधिकार है। अगर वे हमारा सिर नहीं फोड देते, तो इसको उनका बहुत बडा आत्मसंयम मानना चाहिए।
1931 में थूकने और सिर फोडने की बात कह कर गाँधी ने जहाँ एक तरफ अछूतों के इतने उग्र हद तक जाने का संकेत दे दिया था, तो दूसरी तरफ सवर्ण हिन्दुओं को भी चेताया था कि अगर उन्होंने अछूतों के प्रति अपना रवैया नहीं बदला, तो आनेवाले दिनों में अछूतों द्वारा उनके सिर फोडे जाएँगे, उनके मुँह पर थूका जाएगा। इसे ध्यान में रखें तो मानना पडेगा कि 1936 में लिखे गोदान में अपने दलित विमर्श के अन्तर्गत प्रेमचंद चर्मकारों द्वारा मातादीन के मुँह में हड्डी का टुकडा डलवा कर गाँधी के उन्हीं शब्दों को रचनात्मक शिल्प में ढालते प्रतीत होते हैं। हालांकि प्रेमचंद के समय में अछूतों को ऐसी उग्रता सामाजिक यथार्थ का अंग नहीं बन पाई थी, फिर भी उनके ऐसे उग्र रूप का कल्पित चित्र प्रस्तुत करके सवर्ण हिन्दुओं को प्रेमचंद सावधान करते हैं कि अगर उन्होंने अछूतों के साथ स्वेच्छाचार-व्यभिचार का व्यवहार नहीं बंद किया, तो आनेवाले दिनों में उन्हें अछूतों के ऐसे ही आक्रोश एवं आक्रमकता का शिकार होना पड सकता है।
गाँधी के अछूतोद्वार आंदोलन ने प्रेमचंद के अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान, जैनेन्द्र जैसे अन्य सवर्ण साहित्यकारों की रचनाशीलता को प्रभावित किया था। यहाँ उल्लेखनीय है निराला की यह कविता-
जल्द-जल्द पैर बढाओ, आओ-आओ।
आज अमीरों की हवेली
किसानों की होगी पाठशाला
धोबी, पासी, चमार, तेली
खोलेंगे अंधेरे का ताला।
निराला ने चतुरी चमार जैसी कहानी लिखी जिसमें उन्होंने खुद अछूत बालकों को पढाने, उनके हाथ का पकाया खाना खाने का जिक्र किया है। यही नहीं, 1940-41 के आसपास अज्ञेय द्वारा लिखित उपन्यास शेखरः एक जीवनी में भी गाँधी के अछूतोद्धार आंदोलन का प्रभाव इस रूप में देखा जा सकता है जब विद्रोही शेखर अछूतों की बस्ती में जाकर उनके बच्चों को पढाने के लिए रात्रि-पाठशाला चलाता है।
यह तथ्य भी गौरतलब है कि अछूतोद्वार अभियान के अन्तर्गत ही गाँधी ने हरिजनों के लिए मंदिर-प्रवेश का आंदोलन चलाया जिसका पंडे-पुजारियों ने काफी विरोध किया। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों ने गाँधी के जाने पर काले झंडे दिखाये थे। इसे लेकर जयशंकर प्रसाद ने एक दिल दहला देने वाली कहानी लिखी-विराम चिह्न। अछूतों के मंदिर-प्रवेश आंदोलन को सीधे-सीधे इस कहानी का विषय बनाया गया है। इस कहानी में राधे नाम का अछूत युवक अपनी गरीब बूढी माँ के मना करने के बावजूद अछूतों के जत्थे के साथ मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास करता है जहाँ उसका सामना मंदिर के द्वार पर भगवान की पवित्रता की रक्षा के नाम पर तैनात लठैत पंडों से होता है और इसका परिणाम होता है-लट्ठ चले, सिर फटे। राधे आगे बढ ही रहा था कि कुँज बिहारी ने बगल से घूम कर राधे के सिर पर करारी चोट की। वह लहू से लथपथ वहीं लोटने लगा। इसे दलित चेतना की हिन्दी की पहली सशक्त कहानी कहने में कोई अत्युक्ति नहीं होगी।
मंदिरों में अस्पृश्यों के प्रवेश पर लगाई गई पाबंदी को लेकर आक्रोश का भाव कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की इस कविता में भी देखा जा सकता है-
कह देता है किन्तु पुजारी यह तेरा भगवान नहीं है।
दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है।।
मैं सुनती हूँ जल उठती है मन में यह विद्रोही ज्वाला।
यह कठोरता ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला।।
यह निर्मम समाज का बँधन
और अधिक अब सह न सकूँगी।
यह झूठा विश्वास,
प्रतिष्ठा झूठी इसमें रह न सकूँगी।।
ईश्वर भी दो हैं,
यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
किन्तु देवता यह न समझना
तुम पर मेरा प्यार नहीं है।
स्पष्टतः यह एक सवर्ण की शिकायत है, फरियाद है अछूतों की तरफ से निर्मम समाज का बँधन को लक्ष्य करके। आज के दलित लेखक भले ही यह कहें कि दलितों की तरफ से सवर्णों को कोई फरियाद-अनुरोध करने की जरूरत नहीं, लेकिन यह तो स्वीकार करना ही पडेगा कि गाँधी के अछूतोद्वार आंदोलन ने सवर्णों की मानसिकता में सोच में गुणात्मक परिवर्तन ला ही दिया जिससे वे अछूतों के विपक्ष में आवाज उठाना अपना मानवीय एवं लेखकीय दायित्व समझने लगे।
गाँधी के चिंतन एवं कर्म का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष था पतिताओं का उद्धार । यों तो सतीदाह बाल-विवाह आदि के विरोध में तथा विधवा-पुनर्विवाह के समर्थन में राजा राम मोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती आदि स्वर मुखरित कर चुके थे, किन्तु वेश्याओं के उद्धार का मुद्दा समाज-सुधार आंदोलन का अंग नहीं बन पाया था और इस अनछुए कार्य को किया गाँधी ने। 1921 में बारीसाल (जो अब बंग्लादेश में है) में रात के दस बजे करीब एक सौ वेश्याओं के साथ दुभाषिये के जरिये बातचीत करके जो अनुभव गाँधी ने प्राप्त किये उसे 11 सितम्बर 1921 के नवजीवन (गुजराती पत्र) में इस प्रकार रखा था-ये बहनें जानबूझ कर इस पाप में नहीं पडी। पुरूषों ने उन्हें इसमें गिराया है। जिनको इस बात पर दर्द होता है उन्हें चाहिए कि वे प्रायश्चित के रूप में इन पतित बहनों को हाथ बढा कर सहारा दें। जब-जब इन बहनों का चित्र मेरी आँखों के सामने आता है तब-तब मुझे ख्याल होता है कि अगर ये मेरी बहनें या बेटियाँ होतीं तो ! और होतीं तो क्यों वे हैं ही, उनको उठाना मेरा काम है। प्रत्येक पुरूष का काम है।.....स्वराज्य का अर्थ है पतितों का उद्धार।
यही नहीं दक्षिण भारत में प्रचलित देवदासी प्रथा का विरोध करते हुए गाँधी ने 16 अप्रैल 1925 के यंग इंडिया में लिखा-दक्षिण यात्रा में मुझे जितने अभिनंदन-पत्र मिले उन सब में अत्यन्त हृदयस्पर्शी वह था जो देवदासियों की ओर से दिया गया था। देवदासियों को वेश्या शब्द का सौम्य पर्याय ही समझिए।.... यह अत्यन्त लज्जा, परिताप और ग्लानि की बात है कि पुरूषों की विषय-तृप्ति के लिए कितनी ही बहनों को अपना सतीत्व बेच देना पडता है। पुरूष ने विधि-विधान के इस विधाता ने अबला कही जानेवाली जाति को बरबस जो पतन की राह पर चलाया है, उसके लिए उसे भीषण दंड का भागी होना पडेगा।.... मैं हर युवक से वह विवाहित हो या अविवाहित, जो कुछ मैंने लिखा है, उसके तात्पर्य पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ। इस सामाजिक रोग, नैतिक कोढ के संबंध में मैंने जो कुछ सुना है, वह सब मैं नहीं लिख सकता। विषय बडा नाजुक है, पर इसी कारण इस बात की ज्यादा आवष्यकता है कि सभी विचारशील लोग इसकी ओर ध्यान दें।
गाँधीजी ने इस नैतिक कोढ की तरफ सभी विचारशील लोगों से ध्यान देने का जो आह्वान किया, उसके प्रभावस्वरूप हिन्दी में कई रचनाएँ लिखी गई। मसलन, प्रेमचंद की कहानी है दो कब्रें। यह कहानी माया पत्रिका के जनवरी 1930 के अंक में छपी थी। संक्षेप में इस कहानी में कुलीन वर्ग के कुँवर रनवीर सिंह जुहरा नाम की वेश्या से प्रेम करते हैं, फिर उससे विवाह भी करते हैं। फिर उन दोनों की बेटी सुलोचना से यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रामेन्द्र प्रेम विवाह करते हैं। हालांकि वेश्या जीवन की समस्या को लेकर प्रेमचंद 1918 में सेवा सदन जैसा उपन्यास लिख चुके थे, लेकिन उसमें वेश्या का विवाह किसी कुलीन वर्ग के व्यक्ति से नहीं दिखा सके थे। दो कब्रें कहानी में वे ऐसा कर सकें, तो मानना पडेगा कि इसके पीछे प्रेरक शक्ति गाँधी की थी, जो वेश्याओं का हाथ थाम कर उद्धार करने की गुहार लगा रहे थे।
वेश्या उद्धार को लेकर जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखी सालवती कहानी भी उल्लेखनीय है। कहानी की कथा का संबंध उस काल से है जब वैशाखी गणराज्य में वहाँ की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी को नगर वधू के पद पर उसकी इच्छा के विरूद्ध आसीन कर दिया जाता था। सालवती ऐसी ही सौंदर्य प्रतिमा है जो सौंदर्य-प्रतियोगिता में विजय प्राप्त कर नगरवधू बन जाती है। लेकिन वह मणिधर नामक सामंत युवक से प्रेम करती है और उसके बच्चे की माँ भी बन जाती है। चूँकि नगरवधू के लिए माँ, बहन जैसे रिश्तों स्वीकृत नहीं थे, इसलिए वह अपने बच्चे को पालने के लिए दूसरी औरत को सौंप देती है।
घटनाक्रम आगे बढता है-मगध के साथ हुए युद्ध में मणिधर वीर गति को प्राप्त हो जाता है। इधर सालवती दुबारा नगरवधु चुन ली जाती है, लेकिन इस बार वह ऐसे रिवाज का तीव्र प्रतिवाद करती हुई इसे समाप्त करने का अनुरोध करती है। राज्य सभा के सामने समस्या आती है कि शीलखंडिता युवतियों के लिए कैसी व्यवस्था की जाए, तो अभय नाम के युवक ने यह समाधान दिया कि हम आठ मगध-युद्ध के खंडित शरीर विलांग कुलपुत्र हैं और हम इन आठ शील खंडिता अनंग की पुजारिनों को पत्नी रूप में स्वीकार करने को तैयार है। राज्य परिषद उन्हें इसकी अनुमति प्रदान करती है और आठ वेश्याएँ आठ युवकों द्वारा अपनी-अपनी पत्नी के रूप में अंगीकार कर ली जाती है। इस प्रकार प्रसादजी ने इतिहास के गडे मुर्दे उखाड कर गाँधी की वेश्या उद्धार वाली गुहार को साहित्य के क्षेत्र में क्रियात्मक रूप दिया है। इसके अतिरिक्त भगवतीचरण वर्मा का चित्रलेखा चतुरसेन शास्त्री का वैशाली की नगरवधू जैसे उपन्यास रामवृक्ष बेनीपुरी का अम्बपाली जैसा नाटक पतिताओं के उद्धार को ही लेकर लिखे गए।
पति-पत्नी के संबंध विच्छेद, स्त्री के सशक्तीकरण आदि को लेकर भी गाँधी अपने विचार प्रकट करते रहे जिनकी अनुगूँज हिन्दी रचनाशीलता में सुनी जा सकती है। पति से मतभेद होने पर पत्नी का संबंध-विच्छेद के अधिकार को गाँधी ने 21 अक्टूबर 1926 के यंग इंडिया में छपे लेख में इन शब्दों में उचित ठहराया-पति तो अपने को निरंकुश समझता है। वह अपने को अपनी जीवन सहचरी से सलाह लेने के लिए बँधा नहीं मानता। मैं समझता हूँ कि इस स्थिति से उबरने का रास्ता है। मीराबाई ने मार्ग दिखा दिया है। जब पत्नी अपने को गलती पर न समझे और जब उसका उद्देश्य अधिक ऊँचा हो, तब उसे पूरा अधिकार है कि वह अपने मन का रास्ता अख्तियार कर ले और नम्रता से परिणाम का सामना करे। गाँधी का यही स्वर ही जयशंकर प्रसाद के नाटक ध*ुवस्वामिनी में प्रकट होता है जब ध*ुवस्वामिनी अपने नालायक कायर पति का परित्याग करते हुए यह कहती है-मैं केवल यह कहना चाहती हूँ कि पुरूषों ने स्त्रियों को अपनी पशु-सम्पति समझ कर उन पर अत्याचार करने का जो अभ्यास बना लिया है वह मेरे साथ नहीं चल सकता। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, अपने कुल की मर्यादा नारी का गौरव नहीं बचा सकते तो मुझे बेच भी नहीं सकते। हाँ, तुम लोगों को आपत्ति से बचाने के लिए मैं स्वयं यहाँ से चली जाऊँगी। अन्ततः वह अपने पति राजा रामगुप्त का परित्याग कर, देवर चंद्रगुप्त के साथ परिणय-सूत्र में बँध जाती है।
गाँधी स्त्री-समाज से लगातार यह अपील करते रहे कि वह समस्त श्ाृंगार-प्रसाधनों आभूषणों का परित्याग कर अपने आत्मबल का विकास करे। गाँधी की ऐसी परिकल्पित स्त्री का ही चित्र निराला अपनी कविता तोडती पत्थर में प्रस्तुत करते हैं जिसमें एक युवा मजदूरन के हाथों में न मेंहदी है न कलाई में चुडियाँ, न बालों में गजरा, है तो हाथ में गुरू हथौडा जिससे वह पत्थर प्रहार करती है-प्रकरान्तर से वह इस श्रम से पत्थर जैसे निष्ठुर बने हुए समाज पर प्रहार करती है।
यों तो गाँधी के सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, स्वराज्य, स्वदेशी आदि को लेकर जो विचार थे, उनका प्रभाव भी साहित्य-सृजन पर देखा जा सकता है, किन्तु इस सबके विशद विवेचन के लिए एक पुस्तक तैयार करनी होगी। अब जो चीज एक पुस्तक की अपेक्षा रखती हो, वह भला एक लेख में कैसे अँट सकती है। अतएव इस चर्चा को यहीं विराम देते हुए और बातों की चर्चा करने का दायित्व अन्य लेखकों को सौपता हूँ।
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102, अम्बुज टॉवर,
तिलकामाँझी, भागलपुर-812001
मो0 9801055395