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संस्कृत में गाँधीपरक साहित्य

राधावल्लभ त्रिपाठी
हमेशा अपने विचारों को शुद्ध करने का लक्ष्य रखें और सब कुछ ठीक हो जायेगा।
- महात्मा गाँधी
गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से वापसी भारतीय इतिहास के लिये ही नहीं भारतीय साहित्य के लिये भी एक युगांतरकारी घटना थी। बीसवीं शती के पूर्वार्ध में राष्ट्रीयता की भावना के अभूतपूर्व उन्मेष का भी गहरा असर संस्कृत के इस समय के साहित्य पर पडा। सत्याग्रह आन्दोलन तथा गाँधी के जीवन दर्शन ने सारे देश को प्रेरणा के सूत्र में बाँध दिया। इस काल का संस्कृत साहित्य इस युगनिर्माता महापुरुष के चरित्र और संदेश से अत्यधिक प्रभावित हुआ तथा उसे केन्द्र में रखकर स्वाधीनता संग्राम पर अनेक काव्य संस्कृत में लिखे गए। वस्तुतः बीसवीं शताब्दी में जो अपार साहित्य संस्कृत में सिरजा गया, उसका एक बडा हिस्सा में गाँधीमय है। गाँधी के जीवन और कर्म को ले कर तो सैंकडों की संख्या में महाकाव्य, खंडकाव्य और नाटक आदि संस्कृत में लिखे गए, गाँधीदर्शन से परोक्षतः प्रभावित रचनाएँ उससे भी अधिक हुईं। बीसवीं शताब्दी के संस्कृत महाकवियों में गलगलि रामाचार्य, क्षमा राव, भगवदाचार्य, मथुराप्रसाद दीक्षित आदि श्रेष्ठ गाँधीवादी साहित्यकार हैं।
संस्कृत में गाँधी के पहले गाँधी का अवतार
गाँधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, और फिर गोखले से आशीर्वाद लेकर इस देश की राजनीति में सक्रिय हुए, इसके कुछ पहले से ही संस्कृत साहित्य में गाँधी के आने की आहट सुनाई पडने लगती है। संभवतः संस्कृत के पंडित और कवि गाँधी के होने की सभावना को भाँप रहे हैं।
कूर्मांचल के कवि लोकरत्न पंत गुमानी की संस्कृत में चौबीस रचनाओं के अतिरिक्त दो कृतियाँ मिश्रित भाषा में, छह हिंदी में तथा चौदह कुमाऊनी में हैं। इनका जन्म काशीपुर, नैनीताल में 1891ई. में हुआ। वे एक अद्भुत और विलक्षण कवि हैं। गुमानी कवि वास्तव में संस्कृत जगत् के गुमान हैं, हिंदी समाज के अभिमान हैं, और कुमाऊँनी का ठाठ और ठसक हैं। जब गुमान, अभिमान, ठाठ और ठसक ही चले गए, तो गुमानी कवि को भी बिसरा दिया गया, यों भी उन्हें याद ही बहुत कम रखा गया था। पर एक अर्थ में भारत में गाँधी की वापसी के पहले वे संस्कृत और हिंदी कविता के एक गाँधी भी रहे हैं।
अपने संस्कृत काव्य अङ्गरेजराज्यवर्णनम् में गुमानी कवि ने अंग्रेजी राज्य की कवि ने समीक्षा की है। कवि ने निर्भीकता के साथ अंग्रेज के गुण व दोष गिनाए हैं।
शूरेऽनुरक्तप्रकृतिः कृतज्ञः
सम्मानयेच्चेद् गुणिनं फिरङ्गी
स्यात् किञ्चिदूनं न तदेति मन्ये
श्रीरामराज्यादिदमीयराज्यम्।।
(शूर जनों में स्वभाव से अनुराग रखने वाला कृतज्ञ फिरंगी यदि गुणीजनों का सम्मान करने लग जाए, तो मैं समझता हूँ कि उसका राज्य रामराज्य के घट कर नहीं होगा।)
न वेदकुशलं न च स्मृतिविदं न तन्त्रोद्धरम्
न शास्त्रविहितश्रमं न समधीतसाहित्यिकम्।
लिखन् पठति यावनीमपि य आङ्गरेजीं लिपिं
तमेव बत मन्यते बुधजनं फिरङ्गीजनः।।
(फिरंगी न तो वेद में कुशल पंडित को, न स्मृतियों के जानकार को, न तंत्रों में अधिकार रखने वाले को ही, न शास्त्र में निष्णात व्यक्ति को न साहित्य को अधीती को ही कुछ समझता है। वह तो जो अंग्रेजी की यावनी लिपि लिख ले व पढ ले उसी को ज्ञानी मानता है।)
वस्तुतः अपनी स्पष्टवादिता के साथ यथार्थ का उद्घाटन करते हुए गुमानी कवि ने फिरंगी या अंग्रेज पर जैसी फब्तियाँ कसी हैं, वह संस्कृत साहित्य में अपूर्व ही है।
महामहोपाध्याय लक्ष्मणसूरि (1859-1919) उन्नीसवीं व बीसवीं शताब्दी के साहित्यकारों में अग्रगण्य हैं। जार्जशतक काव्य और कृष्णलीलामृत महाकाव्य उल्लेखनीय हैं। पर वे एकदम पारंपरिक पंडित हैं, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने महामहोपाध्याय की पदवी से नवाजा। उन्होने संस्कृत में दिल्लीसाम्राज्य (1912 ई.) जो उस समय की राजनीतिक घटनाओं का एक खाका प्रस्तुत करता है। जाहिर है कि लक्ष्मणसूरि अपने समय की राजनीति से परिचित हैं। उन्होने अनेक संस्कृत रचनाओं के साथ घोषयात्रा नाम से एक नाटक लिखा है, जो डिम कोटि का रूपक है। यह महाभारत की कथा पर आधारित है। इसका अन्य नाम युधिष्ठिरानृशंस्य भी है। महाभारत में आनृशंस्यं परो धर्मः - आनृशंस्य ही परम धर्म है - यह वाक्य बार बार आता है। आनृशंस्य अहिंसा और करुणा का मिश्रित भाव है। लक्ष्मण सूरि के नाटक में दुर्योधन के दुश्चरित तथा युधिष्ठिर की करुणा की पराकाष्ठा चित्रित है। दुर्योधन पांडवों को नीचा दिखाने के लिये घोषयात्रा (पिकनिक) का आयोजन करता है। वह वन में जा रहा है, तभी उसे डींग हाँकते देख कर गंधर्व चित्ररथ धर दबोचता है। चित्ररथ पांडवों से सहानुभूति रखता है, वह अर्जुन का मित्र है और सोचता है कि दुर्योधन की धरपकड से युधिष्ठिर प्रसन्न होंगे। पर युधिष्ठिर तो गाँधी की तरह उल्टा ही सोचते हैं, और उनके कहने पर अर्जुन चित्ररथ से युद्ध कर के दुर्योधन और उसके कौरव वीरों को छुडा कर ले आता है। चित्ररथ इस बात पर चकित है कि जिस चचेरे भाई ने देश से निकाल बाहर किया, राज्य हडप लिया, उसको बचाने के लिये युधिष्ठिर की आज्ञा से उनके भाई मुझी से उलझ पडे।
संभवतः इस लेखक का आकलन गलत हो, पर लगता है कि लक्ष्मण सूरि अपने समय के राजनीतिक परिवेश की ओर इशारा करते हुए युधिष्ठिर के माध्यम से गाँधीवादी मूल्यों को इस नाटक में प्रतिष्ठित कर रहे हैं।
श्रीधर पाठक (1859-1928) हिंदी के प्रख्यातकवि हैं। संस्कृत में इनकी गोखलेप्रशस्तिः, आराध्यशोकाञ्जलिः, भारतसुषमा, मातृपादवन्दनम्, मनोविनोदः, भारतसुषमा आदि मुक्तकविधा की रचनाएँ प्रकाशित हैं। गोखलेप्रशस्तिः की रचना 11.3.15 ई. की तिथि पर की गई। इसमें पंचचामर छंद में आठ पद्य हैं। यह गोपालकृष्ण गोखले की देशसेवा और महनीय व्यक्तित्व की भावपूर्ण समाशंसा है। इस कविता में पाठक गोखले को भारतीयमानवाधिकारवादिनां वरम् कहते हैं - भारत के लोगों के मानवीय अधिकारों को ले कर वाद उठाने में गोखले आगे हैं। पाठक एक सचेत कवि हैं। गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में उस समय तक जो करिश्मा कर दिखाया, उसका उन्हें पता न हो, यह तो हो नहीं सकता। इसलिए उनकी यह कविता गोखले की प्रशस्ति और गाँधी की अगवानी दोनों पाठक गाँधी के भारतीय राजनीति के रंगमंच पर प्रवेश की ओर भी इशारा कर रहे हैं। इसे मेरा कयास मान कर खारिज भी का जा सकता है।
ए.आर. राज वर्मा (1863-1918) का परिचय आङ्गलसाम्राज्य महाकाव्य तथा गैर्वाणीविजयनाटक के प्रसंग में ऊपर दिया गया है। केरल वर्मा इनके चाचा थे। बचपन से ही संस्कृत में श्लोक रचना करने लग गए थे, और बालकवि की उपाधि से विभूषित किये गए। राज वर्मा ने नारायणभट्ट पर शोधकार्य किया। उद्दालकचरितम् इनका गद्यकाव्य है।
गुमानी कवि की ही तरह इस महाकवि ने आङ्गलसाम्राज्य में अंग्रेजी राज की समीक्षा की है।
आङ्गलसाम्राज्यम् महाकाव्य में 23 सर्ग हैं। प्रथम सर्ग में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत प्रवेश वर्णित है, जिसके अंतर्गत इंग्लैंड में वणिक्संघों की भारतयात्राएँ, सूरत में उनके द्वारा व्यवसाय हेतु निवास, डच, पुर्तगाली व फ्रैंच व्यवसायियों के उनकी स्पर्धा, बंबई पर उनका कब्जा और बंगाल उनकी घुसपैठ का वर्णन है। द्वितीय सर्ग की संज्ञा आदिचरितानुवर्णनम् है, इसमें अंग्रेजों के आगमन से पहले का भारतीय इतिहास वर्णित है। विहगावलोकन की शैली में कवि ने इसमें अलक्षेंद्र (सिकंदर) का भारत आगमन, मौर्यसाम्राज्य , बौद्ध धर्म का आविर्भाव और प्रसार, मुहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण तथा मुगलकाल तक के इतिहास का सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है। तृतीय से अष्टम सर्ग तक ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में साम्राज्यवादी विस्तार का चित्रण है। नवाब सिराजुद्दौला आदि से संबंधित घटनाओं तथा प्लासी के युद्ध का मार्मिक चित्रण कवि ने किया है। नवम सर्ग महाराष्ट्र में घटी घटनाओं पर केंद्रित है। दसवें से बारहवें सर्ग तक अंग्रेजों के साथ हैदर अली तथा टीपू सुल्तान के संघर्ष का निरूपण है। आगे के सर्गों में क्रमशः सारे भारत पर अंग्रेज किस तरह कब्जा करते गए - यह वृत्तांत निरूपित है। उन्नीसवें सर्ग में सिखों का दमन तथा बीसवें में डलहोजी के चरित का निरूपण है। इक्कीसवें सर्ग मे 1857 के स्वाधीनता युद्ध का चित्रण करते हुए अंतिम दो सर्गों में कवि ने महारानी विक्टोरिया के प्रभुत्व के निरूपण के साथ महाकाव्य समाप्त किया है।
इस महाकाव्य में बताया गया है कि भारत में अंग्रेजी राज ने किस तरह अपनी जडें जमाईं। अंग्रेजों को वणिक या बनिया कहा गया है। अंग्रेज बनियों की शासन नीति के विषय में कहा गया है-
विद्येव दुर्विनीतानां सिद्धिश्रीरिव रागिणाम्।
वणिजां प्रभुशक्तिः सा कापथानभजत् क्षणात्।
(दुर्विनीतों की विद्या तथा रागी की सिद्धि के समान उन अंग्रेज वणिकों का वह प्रभुशक्ति शीघ्र ही कुपथगामिनी हो गई थी।)
किस तरह अंग्रेज उँगली पकड कर पहुँचा पकडने की नीति से एक एक कर के भारत के नगरों को अपने साम्राज्य में हडपते चले गए, इसके विषय में मुहावरेदार शैली में वर्मा कहते हैं
आस्थाय कोणानिह भिक्षुपादप्रसारणन्यायमथाचरन्तः।
शनैः शनैरर्जितभूविभागाः समारुरुक्षन् परमं पदं ते।।

(अंग्रजों ने पहले इस देश के कुछ कोनों पर कब्जा किया, फिर भिक्षुपादप्रसारण न्याय या अंगुलि पकड कर पहुँचा पकडने के तरीके से धीरे-धीरे और भू-भाग पर काबिज होते हुए परम पद तक जा पहुँचे)
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लगा कर बींसवीं सदी के पहले दशक के बीच संस्कृत में लिखी गई इन रचनाओ में गाँधी का प्रत्यक्ष जिक्र नहीं है, पर इनमें भारतीय राजनीति में गाँधी के आने की आहटें अवश्य हैं।
संस्कृतकविता में गाँधी लहर
गलगलि रामाचार्य बीसवीं शती के सबसे बडे महाकवियों तथा मुक्तककवियों में गणनीय हैं। इनका स्वराज्यरत्नाकरः गाँधीजी के जीवन और आदर्श से प्रेरित लहरीकाव्यों का संग्रह है। इसमें निम्नलिखित पाँच लहरी काव्य हैं - स्वदेशीयलहरी, श्रीगान्धीटोपीलहरी, श्रीचक्रलहरी, बहिष्कारलहरी तथा कारागृहलहरी। गलगलि रामाचार्य के पुत्र पंढरीनाथ गलगलि विनोबा भावे से हुई अपनी चर्चा के उल्लेख साथ बताते हैं कि विनोबा भावे ने स्वराज्यरत्नाकर काव्य गाँधीजी को बताया था, और उसमें से कुछ पद्य अनुवाद करते हुए उनके सामने पढे भी थे। श्रीगान्धीटोपीलहरी में सदा गान्धीटोपी ज्वलतु हृदि पापीयसि नृणाम् इस चतुर्थ चरण को सुनते हुए आनंदित हो कर गाँधीजी हँसते रहे, फिर उन्होंने दो तीन बार गाँधीटोपी लहरी और संपूर्ण स्वराज्यलहरी का पाठ भी किया।
स्वदेशीयलहरी स्वदेशी आंदोलन का शंखनाद है। इसकी रचना रामाचार्यजी ने 1921 ई. में की थी। इतिहास का बोध, स्वातंत्र्य की ऊर्जा और विदेशी शासन के लिये धिक्कार के स्वर इसमें अनगुंजित हैं। स्वीदेशीयोद-ञ्चद्वसनसुरधेनुं श्रय सदा - (स्वदेशी के उजले वस्त्रों की कामधेनु का सदा आश्रय लो)- यह चतुर्थ चरण इसकी समस्त 52 शिखरिणियों में दोहराया गया है। मेंचेस्टर की फेक्टरियों की बंद कराने वाली तथा जापान को धनगणना के जपानन्द से विधुर बना देने वाली स्वदेशी रूपी कामधेनु का आश्रय लेने के लिये आह्वान करता हुआ कवि कहता है -
रयोदञ्चन्मञ्चास्तरनिखलयन्त्राणि सहसा
खिलीकुर्वाणां स्वप्रसृमरमहिम्ना हि परितः।
जपानं तन्वानां धनगणजपानन्दविधुरं
स्वीदेशीयोदञ्चद्वसनसुरधेनुं श्रय सदा।।
उपमाएँ, रूपक, उत्प्रेक्षाएँ जैसे गलगलिजी के लेखनी की अनुचर बन कर चली आती हैं। मैनचेस्टर के लिये मंचास्तरण - यह संस्कृतीकरण किया गया है। जपान और जपानंद में यमक अलंकार साधा गया है। स्वदेशी कपडे को कामधएनु बता कर रूपक अलंकार लाया गया है।
तुरीं सास्नां रम्यां सुकृतकृतमूरीकृतवती
स्फुरद्धामा वेमाभिधरुचिर श्रृंगार तरुचिः।
अभीष्टान् पर्याप्तान् वितरति सपर्यापरनृणां
स्वीदेशीयोदञ्चद्वसनसुरधेनुं श्रय सदा।।
तुरी, सास्ना (ताने बाने) पर रम्य सुकृत को
स्वीकार कर चुकी
चमकते करघे के रुचिर श्रृंगार पर रुचि के साथ
आदर दे चुकी
सपर्याकरने वाले लोगों को पर्याप्त मनचाहा देने वाली
स्वदेशी के उजले वस्त्रों की कामधेनु का
सदा आश्रय लो।
गाँधी टोपी का ऐसा स्तवन कदाचित् अन्यत्र नहीं मिलेगा जैसे श्रीगान्धीटोपीलहरी, में गलगलिजी ने किया। सदा गान्धीटोपी ज्वलतु हृदि पापीयसि नृणाम् की चतुर्थचरण में आवृत्ति के साथ इस काव्य में शिखरिणी छंद की मधुरिमा को ओजस्विता में कवि ने ढाल दिया है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-
यदालोकादेव प्रसभमधिकारोद्धतजनः
प्रसर्पत्कोपान्धो भवति गुरुतापाकुलधिया।
सहस्रांशोर्विष्वक्प्रसृतमहसः कौशिक इव
सदा गान्धी टोपी ज्वलतु हृदि पापीयसि नृणाम्।।
अधिकार के मद से उद्धत लोग जिसकी झलक भर से
बढते ताप से आकुल बुद्धि और भीतर उफनते क्रोध
से अंधे हो जाते हैं,
वह फैलती किरणों वाले सूरज के सामने
उल्लू की तरह होते हैं
वह गाँधी टोपी पापी हृदय को भीतर जलाती रहे।।
नये युग की नई गीता
पण्डिता क्षमाराव (1890-1954) की साहित्य साधना ने संस्कृत साहित्य में नवोन्मेष के अनुद्धाटित द्वार खोले हैं। इनके पिता शङ्कर पांडुरंग पंडित इस युग के सर्वोच्च संस्कृत विद्वानों में से थे, पर उनके देहावसान के कारण तीन वर्ष की आयु में ही क्षमा पिता की छत्रछाया से वंचित हो गयीं। इनका बचपन घोर अभावों में बीता और विवाह के पश्चात् परमसमृद्धि और वैभव का अनुभव इन्होंने किया। पर पति के असामयिक निधन के कारण गार्हस्थ्य जीवन का सुख भी चिरकालिक नहीं रहा। अपने समय के राष्ट्रिय आन्दोलन से क्षमा प्रभावित हुईं और गाँधीजी के पास स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने की अनुमति प्राप्त करने के लिये गईं। पर गाँधीजी ने उन्हें पारिवारिक दायित्व पूरे करने का निर्देश दिया। स्वराज्य आन्दोलन के स्थानीय नेताओं ने उन्हें गन्दी बस्ती में प्रौढ लोगों के बीच जा कर उन्हें साक्षर बनाने का काम सौंपा।1 क्षमा राव स्वाधीनता आंदोलन में किसी न किसी रूप में सक्रिय रहीं।
राष्ट्रप्रेम के भान कर पाने की कसक उनके सत्याग्रहगीता, उत्तरसत्याग्रहगीता और उत्तरजयसत्या-ग्रहगीता जैसे महाकाव्यों में झलकती है। यह क्षमादेवी के नारीहृदय की संवेदना और अनुभूतिप्रवणता ही थी, जिसके कारण गीता की विधा को उन्होंने राष्ट्र के नवजागरण के शंखनाद से गुंजित करते हुए नवयुग का नया काव्य रचा। पति के साथ उन्होंने योरोप का भ्रमण किया। अंग्रेजी साहित्य तथा आधुनिक जीवन और आधुनिक विधाओं से उनके सम्पर्क ने भी उनके रचनासंसार के उन्हीं के समय के अन्य संस्कृत कवियों से भिन्न आयाम दिए।
गाँवों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आंदोलन करने वाले देशभक्तों से मिलने के लिये गुजरात के विभिन्न अँचलों में उन्होंने भ्रमण किया। अपने महाकाव्य सत्याग्रहगीता में क्षमाराव स्वयं बताती हैं कि उन्हें कांग्रेस की ओर से बोर्सद गाँव के शिविरों में घायल देशसेविकाओं की स्थिति देखने के लिये भेजा गया था। क्षमा राव ने इन शिविरों जा जा कर स्वयंसेविकाओं तथा गाँव की स्त्रियों से बातचीत की। इस यात्रा में कस्तूर बा इनके साथ थीं। उनके इस यात्रा के अनुभव ग्रामज्योतिः तथा कथापञ्चकम् इन दो कथासंग्रहों में प्रतिफलित हुए हैं।
क्षमा राव ने संस्कृत, अंग्रेजी तथा मराठी में रचनाएँ की। अंग्रेजी में अनेक मौलिक नाटकों के अतिरिक्त अपनी कतिपय संस्कृत रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद भी उन्होंने किया। किंतु उनका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व मौलिक अवदान संस्कृत के साहित्यकार के रूप में ही है। संस्कृत में उन्होंने अनेक विधाओं में लेखनी चलाई। विधाओं के अनुसार उनकी रचनाएँ इसप्रकार हैं -
महाकाव्य - सत्याग्रहगीता (1932), उत्तरसत्याग्रहगीता (1948), स्वराज्यविजय (1962), श्रीतुकारामचरितम् (1953), श्रीरामदासचरितम् (1950) तथा श्रीज्ञानेश्वरचरितम् (1953)।
खंडकाव्य - मीरालहरी (1944)
कथासग्रह - कथापञ्चकम् (1933),
ग्रामज्योतिः (1955) तथा कथामुक्तावली (1955)
जीवनी - शङ्करजीवनाख्यानम् (1939)
यात्रावृत्तांत - विचित्रपरिषद्यात्रा (1939)
पण्डिता क्षमाराव की स्वातन्र्त्य आन्दोलन तथा गाँधी चरित्र पर महाकाव्यत्रयी यथार्थबोध तथा भाषा की सहजता के कारण उल्लेखनीय है। यह महाकाव्यत्रयी संस्कृत साहित्य में अभिनव सोपानसरणि का निर्माण है। एक तो कवि क्षमा ने गाँधीजी के युग और समाज तथा संघर्ष को प्रत्यक्ष देखा , जाना,समझा और परखा है। दूसरे स्वाधीनता संग्राम और गाँधीजी के चरित्र के प्रति गहरी आस्था से भी वह प्रेरित है।
सत्याग्रहगीता और उसकी परंपरा
क्षमादेवी 1929 ई. में एक दिन भोर में सागर के किनारे टहल रहीं थीं। तभी उन्होंने लाठीचार्ज की आवाजें सुनीं। सत्याग्रह के संग्राम का बिगुल उनकी भीतर भी बजा। उनके मन में यह विचार आया कि व्यास ने कुरुक्षेत्र के युद्ध को ले कर गीता रची, तो सत्याग्रह के नये संग्राम को ले कर नई गीता कोई क्यों नहीं लिखता? गीता का स्वाध्याय वे नियम से करती थीं ऐसे में गीता में कृष्ण की संदेश उनके भीतर गूँज उठा -
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।
तथा -
तस्माद् युद्धाय युज्यस्व।
क्षमादेवी ने स्वयं अपनी पहली महाकाव्यात्मक संस्कृत रचना सत्याग्रहगीता की रचनाप्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए इस प्रसंग की चर्चा की है।2 तब से उन्होंने स्वयं को संस्कृत लेखन के लिये अर्पित कर दिया। अंग्रेजी के महान् साहित्यकार सामरसेट माम ने भी क्षमा राव को सलाह दी थी कि वे केवल संस्कृत में ही लिखा करें।
सत्याग्रहगीता की रचना क्षमाराव ने 1931 ई. में की। गाँधीजी की दांडी यात्रा इसका प्रेरणा स्रोत थी। नमकसत्याग्रह ने सारे देश को आंदोलित किया था। क्षमा राव ने नये युग की नई गीता का इस घटना को प्रस्थानबिंदु बनाया। कृष्ण की गीता के ही समान सत्याग्रहगीता में भी 18 अध्याय हैं। श्लोक संख्या गीता से किंचित् न्यून (659) है। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ गाँधीजी के आंदोलन से लगा कर में गाँधी इरविन समझौते तक की घटनाओं का वर्णन क्षमा राव वे इस काव्य में किया है। भारत में ब्रिटिश शासन के भय से कोई भी प्रकाशक इस कृति को प्रकाशित नहीं कर सकता था। क्षमा राव के पास अपने पति का संबल था, पेरिस के चार वर्ष के प्रवास में वहाँ सिल्वाँ लेव्ही जैसे संस्कृतमनीषी की शुभकामनाएँ उन्हें मिलीं थीं। उन्होंने अपनी इस रचना को पेरिस में छपने के लिए भेजा। संस्कृत में लिखी उनकी यह अनोखी कृति 1932 में पेरिस से छपी। योरोप की धरती से छपने वाला आधुनिककाल में रचा संस्कृत का यह पहला महाकाव्य था और आज तक एकमात्र आधुनिक संस्कृत महाकाव्य बना हुआ है, जिसे योरोप से प्रकाशित किया गया।
वास्तव में सत्याग्रहगीता का प्रकाशन संस्कृतसाहित्य के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। फ्राँस में प्रकाशित होने के कारण फ्राँस के साहित्यजगत् में भी इस कृति की चर्चा हुई।
विषयवस्तु- सत्याग्रहगीता के आरंभिक पाँच सर्गों में देश में हो रही उथलपुथल का चित्रण है। जमींदारों के अत्याचारों का वर्णन रोंगटे खडे कर देने वाला है। पाँचवंक अध्याय में कर्नल डायर की क्रूरताओं का कच्चा चिट्ठा बहुत साहस के साथ लिखा गया है। सातवें अध्याय में मलाबार में मोपला और हिंदुओं के बीच हुए दंगों का वर्णन है। आठवें सर्ग में साइमन कमीशन और देश में उस पर हुई व्यापक विरोधात्मक प्रतिक्रिया का चित्रण है। क्षमा राव उस समय मुंबई में थीं। उन्होने इस अवसर का आँखों देखा चित्र अंकित करते हुए लिखा है -
सैमनीयस्य सङ्घस्य जिज्ञासोर्भारतस्थितमॅ।
बहिष्कारः कृतो लोकैर्निश्चितं नायकैर्यथा।
सैमनप्रमुखे सङ्घे मुम्बापुरमुपागत।।
श्मशानमिव साक्षात् तत् कृष्णध्वजमयं बभौ।।
बद्धवातायनद्वारां निवृत्तनिखिलोद्यमाम्।
पुरीं शून्यामपश्यंस्ते दग्धां पाम्पेपुरीमिव।। (8.15-17)
(जैसा नेताओं ने निश्चित किया था, भारत की स्थिति जानने के लिये आये साइमन कमीशन का लोगों ने बहिष्कार किया। मुंबई में साइमन की अगुवाई में जब कमीशन के सदस्य आए, तो सारी मुंबई काले झंडों से पटी श्मशान की तरह लग रही थी। लोगों ने द्वार और खिडकियाँ बंद कर लिये थे, कामकाज समेट लिया था। उन लोगों ने जली हुई पांपेनगरी की तरह सारा शहर सूना देखा।)
नवे अध्याय में वाइसराय इर्विन के संदेश और उस पर कांग्रेस के नेताओं की प्रतित्रि*या का वर्णन है। दसवें में गाँधीजी द्वारा वाइसराय को लिखे गए पत्र का प्रभावशाली अनुवाद किया गया है। गाँधीजी की भाषा पारदर्शी व बेबाक है। वे कहते हैं -
निरङ्कुशाः प्रवर्तन्ते यस्मिन् राज्येऽधिकारिणः।
शासनं तद्वरं नष्टं प्रजाहितविवर्जितम्।। 10.17
(प्रजाहित से विवर्जित ऐसे राज्य का तो नष्ट हो जाना अच्छा, जिस के अधिकारी निरंकुश हो कर काम करें।)
सत्याग्रह के दर्शन का सार क्षमाराव ने यहाँ उनके शब्दों में प्रस्तुत कर दिया है -
दुर्बला ननु गण्यन्ते शान्तिमार्गावलम्बिनः।
परं सत्याग्रहाद् विद्धि नास्ति तीव्रतरं बलम्।। 10.25
शांति के मार्ग पर चलने वालों को निर्बल समझा जाता है, पर यह जान लो कि सत्याग्रह से बढ कर और कोई बल नहीं है।)
गाँधीजी स्पष्ट और दो टूक शब्दों में इरविन को दस दिन का समय देते हैं और कहते हैं -
पत्रमेतदनादृत्य यदि स्थास्यसि निर्दयः।
अधर्मस्य फलं घोरं प्रतीक्षेथा धु*वं ततः।। 10.38
यदि मेरे इस पत्र का अनादर कर के निर्दय बन कर रह जाओगे, तो अपने अधर्म के घोर फल को भोगने के लिये प्रतीक्षा करते रहना।)
ग्यारहवें सर्ग में दांडी यात्रा के लिये गाँधीजी के प्रस्थान का ओजस्वी चित्र खींचा गया है। नमक सत्याग्रह की सफलता के साथ ही गाँधीजी को यरवदा जेल में बंद कर दिया जाता है। नमकसत्याग्रह के सारे देश में प्रभाव तथा उसके पश्चात् होने वाली घटनाओं का चित्रण बारहवें अध्याय में किया गया है। क्षमा राव बंबंई में रह कर लिख रहीं थीं, अतः वहाँ घटित होने वाले वृत्तांतों का उन्होने प्रत्यक्षदृष्टवत् वर्णन किया है। जनजागरण तथा शराब की दूकानों पर धरने की घटनाओं से अंग्रेज शासन किस तरह भीतर भीतर दहल गया है - यह पढते हुए हम अनुभव करते हैं। तेरहवें अध्याय में धरीवाल सैनिकों के निःशस्त्र भारतीयों पर गोली चलाने के इंकार और सैनिकों को मृत्युदंड तथा कारावास आदि दंड दिए जाने की घटनाएँ वर्णित हैं। पेशावर में इनकी सहानुभूति में लोगों का जुलूस और उस पर गोलियों की बौछार का वर्णन करते हुए कवि का क्षोभ शब्दों में फूट पडा है। उसे इस बात पर आश्चर्य है कि इस प्रकार के नृशंस कार्य करने वाले लोग अपने आपको मसीही धर्म के अनुयायी कहतें हैं। क्षमा देवी का साहस यहाँ अद्भुत है। जिस धर्म के के अनुयायी देश की धरती पर राज कर रहे हैं, उसी के नाम पर किये जाने वाले पाखंड और दमनचक्र का कच्चाचिट्ठा उन्होंने खोल कर रख दिया है।
किमुत्तरं प्रदास्यन्ते शासका दुष्टबुद्धयः।
स्वकर्मणां परे लोके येशुक्रिस्तानुयायिनः।।
किं धर्मेण प्रभोर्येशोस्त्यक्तासोः प्राणिनां कृत।।
तदौदार्यविरुद्धं चेद्वर्तेरन्ननुयायिनः।। 13. 27-28
क्रैस्तवेदेन किं कार्यं दशाज्ञाभिश्च किं फलम्।
को वाऽर्थश्चरितैः पुण्यैर्येशुक्रिस्तमहात्मनः।।
किं वा धर्मोपदेशेन प्रार्थनामन्दिरेण वा।
किं च पातेन जानुभ्यां किं वा ध्याननिमीलनैः।।
किं दृष्टान्तैरुदारैस्तैः किं येशोः कीर्तितैर्गुणैः।
सत्यदानदयाधर्मक्षमाधृतिमुखैरपि।। 13.30-32
(ये दुष्टबुद्धि शासक अपने इन कर्मों का क्या उत्तर देंगे, जो अपने आप को यीशु के धर्म का अनुयायी बताते हैं? प्राणियों के लिये अपने प्राण देने वाले प्रभु यीशु के धर्म का क्या लाभ यदि उनके अनुयायी उनकी उदारता के विपरीत आचरण कर रहे हों?
क्रिस्तुवेद या बाइबिल का क्या काम, दस आज्ञाओं का क्या फल और धर्म के उपदेश से भी क्या करना तथा महात्मा क्राइस्ट के पावन चरित से भी क्या प्रयोजन? घुटनों के बल प्रार्थना के लिए गिरने और ध्यान में आँखें मूँदने से क्या तथा ऊँचे-ऊँचे दृष्टांत बखानने और यीशु के गुणों के कीर्तन से भी क्या जिनमें सत्य, दान, दया, धर्म और धैर्य का संदेश दिया जाता है?)
चौदहवें अध्याय में शोलापुर में जन आंदोलन व अंग्रेज शासकों द्वारा न्याय की धज्जियाँ उडाते हुए निर्दोष लोगों को फाँसी पर चढाने की घटनाएँ वर्णित हैं। पंद्रहवें अध्याय में कवि ने बंबई में लाठीचार्ज की घटनाओं के वर्णन के साथ देशसेविकाओं पर बर्बर अत्याचार का चित्रण किया है। अवंतिका नामक कार्यकर्त्री का साहस अप्रतिम है। इन सब घटनाओं की मीमांसा कवि ने एक दार्शनिक की भाषा में की है-
अलं शमयितुं दीपं बालोऽपि श्वासलेशतः।
निर्वापयितुमर्कस्य ज्योतिस्तु प्रभुरस्ति कः।।
भिन्द्यात् प्रायेण मल्लोऽपि शिलास्तम्भं बृहत्तरम्।
कल्पान्तेऽपि न शक्तः स्याद् वक्रीकर्तुं मनागपि।।
जलमुत्क्वथितं क्वापि पुनर्गच्छति शीतताम्।
मनस्तु क्षुभितं नृणां न निवर्तेत लक्ष्यतः।।
शक्यो वारयितुं चापि कथञ्चिद् वडवानलः।
न तु मोहयितुं शक्यः सकृज्जागरितो जनः।।15.24-27
(जलते दीपक को कोई बच्चा भी एक फूँक से बुझा सकता है। पर सूर्य की ज्योति को बुझाने में कौन समर्थ होगा? कोई पहलवान शिलास्तंभ को तोड सकता है, पर वह पत्थरको टेढा कर डाले यह नहीं हो सकता। उबलता हुआ जल फिर से शीतल हो सकता है। पर जनता का मन एक बार विक्षुब्ध हो गया, तो फिर उसे बहलाया नहीं जा सकता।)
सोलहवें अध्याय में विदेशी वस्त्रों का व्यापार रोकने के लिए सेवयंसेवकों द्वारा माल की ढुलाई करने वाले वाहनों की रोक का विशद वर्णन है। बाबू नामक युवक का आत्मबलिदान बहुत संवेदनशीलता के साथ कवि ने यहाँ चित्रित किया है। बाबू विदेशी कपडे ले जा रही गाडी के आगे लेट जाता है, ड्रायवर उस पर गाडी चला देता है। मूर्चि्छत बाबू को अस्पताल ले जाया जाता है, जहां वह दम तोड देता है। इस घटना से शहर में सनसनी फैल जाती है। बाबू के अंतिम संस्कार के समय श्मशान में भीड उमड पडती है। व्यापारी लज्जित हो कर विदेशी वस्त्रों का व्यवसाय बंद कर देते हैं। सत्रहवें अध्याय में स्वाधीनता संग्राम में स्त्रियों के अपूर्व साहस का आँखों देखा वर्णन है। यह विवरण आत्मकथात्मक भी है। क्षमा देवी को नेताओं ने बोर्सद नामक गाँव में दश सेविकाओं पर हुए अत्याचारों और उनकी वर्तमान स्थिति देखने के लिये भेजा था। क्षमा देवी लिखती हैं -
पर्याटिषं प्रतिग्रामं सह पत्न्या महात्मनः।
पांसुदूषितमार्गेण गाढदुर्भिक्षशंसिना।। 17.47
(महात्मा की पत्नी कस्तूरबा के साथ मैं गाँव-गाँव में धूलधूसरित मार्गों पर, जो घोर दुर्भिक्ष की सूचना देने वाले थे, घूमती रही।)
क्षमा देवी ने घायल स्त्रियों से भेंट की। वे कई शविरों में गईं। इन अनुभवों को उन्होंने ग्रामज्योतिः की कहानियों में भी सँजोया है।
अठारहवें अध्याय में पूना में गाँधीजी के आगमन के साथ लोगों में अपार उत्साह और गाँधी जी के दर्शन से कवि के मन में उपजी भावधारा की व्यक्ति है। गाँधीजी का अलौकिक विग्रह क्षमा देवी ने पूरी आस्था के साथ प्रस्तुत किया है। इसके पीछे गीता में कृष्ण का यह कथन गुंजित है कि धर्म की हानि व अधर्म का अभ्युत्थान होने पर मैं अवतार लेता हूँ।
निक्षिप्तं विधिना तेजस्तस्मिन् गान्धौ महात्मनि।
जन्मभूमिं तमोग्रस्तां विद्योतयितुमात्मनः।।
न परं भारतं वर्षं विदूरा अपि भूमयः।
भासिताः सत्यदीपेन ज्वालितेन महात्मना।।
तस्मादधर्मनाशाय प्रशान्तेः स्थापनाय च।
गान्धीरूपेण भगवानवतीर्णः किमु स्वयम्।।
18.15-18
(गाँधी महात्मा में विधाता ने तेज स्थापित कर दिया है, जिससे वे तमोग्रस्त अपनी जन्मभूमि को आलोक दे सकें। केवल भारतवर्ष ही नहीं दूर-दूर के देशों की भूमियाँ भी महात्मा के द्वारा प्रकाशित सत्य के दीप से आलोकित हैं। इसलिए लगता है कि क्या अधर्म के नाश व शांति की स्थापना के लिये स्वयं भगवान् ही गाँधी के रूप में अवतरित तो नहीं हो गए?
इस शुभाशा के साथ क्षमा राव ने काव्य समाप्त किया है-
सत्यं विजयतां लोके मुक्तं भवतु भारतम्।
नन्दन्तु सुखिनः सर्वे देशजाश्च विदेशजाः।। 18.19
जीवन्तोऽपि न जीवन्ति परदास्यधुरन्धराः।
पारतन्र्त्यमुदाराणां मरणादतिरिच्यत।।। 1.36
क्षमा राव की भाषा प्रखर और पैनी है, शैली यथार्थवादी। उपमान और बिंब उसमें आते हैं,पर अनायास और सहज बन कर। सत्याग्रहगीता में गाँधीजी का चरित्र केंद्र में है,सत्याग्रह की कुरुक्षेत्रभूमि सारा देश है, इसके पहले संस्कृत के किसी महाकाव्य में देशव्यापी उथलपुथल और सामाजिक जागरण का ऐसा चित्रण नहीं हुआ।
क्षमादेवी ने सत्याग्रहगीता की रचना के बाद उत्तर-सत्याग्रहगीता थिरुवेन्नियलल्लूर के गाँधी मिशन के अनुरोध के कारण लिखी। पाँच महीने की अल्पावधि में 47 अध्यायों का विशाल महाकाव्य लिख डालना एक असाधारण रचनात्मकता का परिचायक है। क्षमा राव ने इस काव्य की रचना के लिये पट्टाभिसीतारमैया के कांग्रेस के इतिहास तथा हरिजन के पुराने अंकों का अध्ययन किया। उत्तरसत्याग्रहगीता में कुल 1989 श्लोक हैं। सत्याग्रहगीता का समापन जिस प्रसंग से क्षमा राव ने किया था, वहीं से यह काव्य आरंभ होता है।
पहले अध्याय से अट्ठाइसवें अध्याय तक दांडी यात्रा के पश्चात् देश में जन्मी नई चेतना का निरूपण है। शेष अध्यायों में मंदिरों में अछूतों का प्रवेश, चंपारण सत्याग्रह, विश्वयुद्ध, जिन्ना का मुसलमानों के प्रति आह्वान, भारत छोडो आंदोलन का आरंभ तथा अंति सैंतालीसवें अध्याय में गाँधीजी की सेवाग्राम वापसी वर्णित है।
सत्याग्रहगीता की तुलना में क्षमा राव की भाषा में यहाँ काव्यात्मकता तथा प्रौढता अधिक विकसित रूप में है। घटनाओं में प्रामाणिकता है। यमक तथा उपमा आदि अलंकारों का स्वभावरमणीय प्रयोग है, अंलकारों के विन्यास से कथाप्रवाह अवरुद्ध नहीं हुआ है। उदाहरणार्थ-
स्वराज्यविजयः स्वाधीनता आंदोलन तथा गाँधीजी के चरित्र को ले कर क्षमादेवी द्वारा प्रणीत महाकाव्यत्रयी की अंतिम कडी है। सत्याग्रहगीता तथा उत्तरसत्याग्रहगीता की श्ाृंखला में इसे उत्तरजयसत्याग्रहगीता के नाम से भी जाना जाता है। इसमें 54 अध्याय हैं। इसका कलेवर पिछले दोनों महाकाव्यों से बडा है, तथा इतिहास व घटनाओं का कलेवर भी दोनों काव्यों की अपेक्षा विस्तीर्ण है।
यह काव्य गाँधी व जिन्ना की विभाजन के विषय में वार्ता के विफल होने की घटना के वर्णन से आरंभ होता है तथा गाँधीजी के निर्वाण पर समाप्त होता है।
सेवाग्राम का वर्णन तथा गाँधीजी के विचारों व संदेशों का प्रभावशाली निरूपण इस काव्य में हृदयग्राही है। चौथे अध्याय में हिटलर के निधन के समाचार के साथ विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय विश्वव्यापी प्रतित्रि*याओं का वर्णन करते हुए क्षमा लिखती गाँधीजी की मनोवेदना, देश की जनता से उनका तादात्म्य तथा उनके चरित्र की उदात्तता का चित्रण क्षमा ने इस काव्य अधिक तल्लीन हो कर किया है। धरती का उच्छ्वास और इतिहास का करुण क्रंदन हम इसे पढते हुए सुनते हैं। गाँधीजी के भीतर की करुणा का संवेदनशील चित्रण क्षमा राव ने किया है। उन्होंने छंद और लय की भूमि पर करुणा के निर्झर प्रवाहित कर दिये हैं। उदाहरण देखें -
एकदा ब्रीहिकेदारे पादचारेण गच्छतः।
मुनेर्दृक्पथमाजग्मू रुदत्यो दुःखिताङ्गनाः।।
कथाः सर्वस्वनाशस्य निवेद्यामूर्महात्मन।।
ब्रूहि नः किन्नु कर्तव्यमित्यपृच्छन् सगद्गदम्।।
हस्तेन निर्दिशन्नूर्ध्वं नभः पर्यश्रुलोचनः।।
सोऽब्रवीत् प्रार्थ्यतामीशो बिभीतास्मान्न चान्यतः।। 28.30-35
(एक बार धान के खेत की मेड पर पैदल चलते हुए मुनि के दृष्टिपथ में रोती हुई दुखी स्त्रियाँ आ गईं। उन्होंने अपना सर्वस्व नष्ट हो जाने का कथा मुनि को सुनाई और फिर गद्गद स्वर में पूछा कि बताइये हम क्या करें। गाँधीजी की आँखों में आँसू भर आए, उन्होंने हाथ से ऊपर आकाश की ओर संकेत किया, फिर बोले- ईश्वर से प्रार्थना करो, केवल उसी से डरो और किसी से नहीं।)
नाथूराम गोडसे के द्वारा गाँधीजी की हत्या से कवि विचलित है। स्वराज्यविजय में महात्माके निर्वाण का वर्णन करने के बाद कवि क्षमा राव कहती हैं -
धन्याः किल वयं सर्वे युगेऽस्मिन् प्राप्तसम्भवाः।
चरन्तः क्ष्मातलं तस्य पावितं पादरेणुभिः।।
परस्सहस्रवर्षोर्ध्वं स्मरिष्यन्ति जनाः किल।
महात्मानमिमं गान्धिं जनांश्च समकालिकान्।।
स महापुरुषो लोकैः पूजितः सकलप्रियः।
निजघ्ने देशजेनेति भारतस्य त्रपाकरम्।।
तत्रापि हिन्दुनैकेन हिन्दुष्वपि महत्तम।।
उद्यतो हस्त इत्येष कलङ्को वागगोचोरः। 54.2-5
(हम सब धन्य हैं, जो इस युग में जन्मे, हम उस धरती पर चल रहे हैं जो उनके (गाँधीजी के) चरणों की धूल से पवित्र हो गई है। महात्मा गाँधी को और उनको समय के लोगों को लोग हजारों वर्षों के बाद भी याद रखेगें। भारत के लिये यह लज्जाजनक है कि उन सब को प्रिय और समस्त लोक में पूजित उन महात्मा को उन्हीं के देश के एक व्यक्ति ने मार डाला। यह सारे हिंदू समाज पर ऐसा कलंक है जिसे शब्दों से कह पाना भी असंभव है।
स्वामी भगवदाचार्य (1880-1977) बीसवी शताब्दी के अग्रगण्य महाकवि हैं। गाँधीवादी विचारधारा में उनकी सुदृढ आस्था थी, तथा अपनी आस्था को उन्होंने रचनायात्रा तथा कर्म के द्वारा चरितार्थ भी किया। उनका जन्म स्यालकोट में हुआ, जो वर्तमान में पाकिस्तान का भाग है। उनका पूर्वाश्रम का नाम सर्वजित था। उन्होने संस्कृत का अध्ययन अपने पितृव्य से काशी में तथा अपने अग्रज से रावलपिंडी में किया। ये स्वामी भवदेव के नाम से आर्यसमाज में दीक्षित हो कर कुछ काल तक दयानंद के अनुवर्ती रहे, बाद में रामानंद संप्रदाय में दीक्षा ले कर स्वामी भगवद्दास कहलाये। गाँधीजी के साबरमती आश्रम में कुछ समय इन्होने अध्यापन भी किया। सत्याग्रह आंदोलन में इनकी भरपूर भागीदारी रही। श्रीमहात्मागान्धिचरित उनका तीन खंडों में विशाल महाकाव्य है। रामानंददिग्विजय महाकाव्य उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण रचना है। श्रीमहात्मागान्धिचरित के तीन खंडों को क्रमशः भारतपारिजात, पारिजातापहार तथा पारिजातसौरभ- ये नाम दिये गए हैं। तीनों में क्रमशः 25, 29 व 20 सर्ग हैं। भारतपारिजात तथा पारिजातापहार सर्वप्रथम दक्षिण अफ्राकी से कीनिया नगर से छपे। भारतपारिजात में गाँधीजी के जन्म से लेकर दाँडी यात्रा तक का वृत्तांत है। पारिजातापहार में 1932 के भारत छोडो आंदोलन तक कथायात्रा को आगे बढाया गया है, तथा अंतिम खंड पारिजातसौरभ में भारत छोडो आंदोलन के बाद से गाँधीजी की मृत्यु तक का वृत्तांत है। कवि गाँधीजी को भारतरूपी उद्यान में । विकसित पारिजात पुष्प से उपमित करता है, वह उन्हें यतिक्षीतीश्वर (धरती पर सारे संन्यासियों के ईश्वर) भी कहता है।
भगवदाचार्य स्वयं सत्याग्रह आंदोलन में सम्मिलित थे। गाँधी के मुख से सत्याग्रह के स्वरूप को उन्होंने भारतपारिजात में विस्तार से समझाया है। गाँधी साहित्य का भी अच्छा अध्ययन भगवदाचार्य ने किया है। अनेक प्रसंगों में उन्होने गाँधी के पत्रों व लेखों को अनूदित कर दिया है। अंतिम खंड में गाँधीजी के कारुणिक अवसान के समय नेहरूजी के कथन है -
संस्कृत नाटक- आजादी के पहले आजादी की परिकल्पना
हम देखते हैं कि गाँधीजी के भारतीय राजनीति में अवतरण के पहले ही संस्कृतके ने नये साहित्य में गाँधी के आगमन का पूर्वरंग रच दिया गया था। उसी तरह संस्कृत के बीसवीं शताब्दी के नाटकों में कम सेकम एक ऐसा है, जो भारत को स्वतंत्रता मिलने के एक दशक पहले ही गाँधीजी के सत्यारह आंदोलन के परिणामस्वरूप अंग्रोजों के भारतछोड कर चले जाने और भारत के संवतंत्र हो जाने का दृश्य प्रस्तुत करता है। यह नाटक मथुराप्रसाद दीक्षित का भारतविजयम् है। उ.प्र. के हरदोई जिले के भगवन्तनगर में जन्मे म.म. मथुराप्रसाद दीक्षित (1878-) लाहौर के एडिसन कालेज में संस्कृत का अध्यापन करते रहे। 1921ई. में असहयोग आंदोलन में सम्मलित होने के लिये उन्होंने नौकरी छोड दी। पृथ्वीराजरासो के समीक्षित संपादन के लिए 1936ई. में महामहोपाध्याय की पदवी से अलंकृत हुए। ये तारणीश महाविद्यालय सोलन में प्रधानाचार्य रहे। संस्कृत में इनके चौबीस ग्रंथ प्रकाशित हैं, जिनमें से छह मौलिक नाटक हैं। ये नाटक ऐतिहासिक, राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक विषयों से संबद्ध हैं। छह अंकों का भारतविजयः 1937 ई. जप्त कर लिया गया, क्योंकि इसमें स्वाधीनता संग्राम का चित्रण करते हुए नाटककार ने तिलक के आशीर्वाद से गाँधीजी के सत्याग्रह आंदोलन के द्वारा भारत के स्वतंत्र होने का दृश्य प्रस्तुत किया था। दस वर्ष बाद जब इस नाटक की परिकल्पना वास्तविकता में परिणत हुई, तो इसका पुनः प्रकाशन किया गया।
इसके प्रथम प्रकाशित संस्करण की भूमिका में देवीराम मेहता, पूर्व प्रायवेट सेक्रेटरी, बघाट नरेश, सोलन ने लिखा है- महामहोपाध्याय श्रीयुत पंडित मथुराप्रसाद दाक्षित ने यह नाटक मेरे राजदरबार सोलन में 1937 ई. में लिखा था। इस नाटक में अंग्रेजी राज्य में भारत की दुर्दशा, कांग्रेस का स्वातंर्त्ययुद्ध और अंत में महात्मा गाँधी के हाथों शासनसूत्र दे कर अंग्रेजों के चले जाने का दृश्य दिखाया गया है,। अंग्रेजों की कूटनीतिज्ञता और सांप्रदायिक अनैक्य से शासन करने की नीति को देखते हुए उस समय मैंने पंडित जी की कल्पना को कोरी कल्पना समझी और मूल पुस्तक को जप्त कर लिया।
तदनन्तर 1942में जलवायु परिव्रतन के लिए गवर्नमेंट संस्कृत कालेज के प्रिंसिपल, संस्कृत के प्रकांड विद्वान् महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज एम.ए. का जब सोलन (शिमलाः में आना हुआ था, तब उक्त पुस्तक मैंने उन्हें दिखाई थी। कविराजजी ने पंडितजी से पूछा भी था कि आपने किस आधार पर कल्पना की है कि अंग्रेज बिना संघर्ष के ही भारत छोड कर चले जाएँगे? तब पंडितजी ने कहा था कि कांग्रेस का अहिंसामूलक सत्याग्रह दिनों दिन जोर पकडता जा रहा है, अतः अंत में सरकार पंगु हो जाएगी, और विवश हो स्वराज्य दे कर अंग्रेजों को भारत छोडना पडेगा। कविराजजी ने पंडितजी की विद्वत्ता और ऐतिहासिक नाटक की लेखनशैली की प्रशंसा की।
आगे देवीलालजी ने बताया है कि 1946 में कांग्रेस का अभ्युदय देख कर उन्होंने पुस्तक पंडितजी को वापस कर दी थी। दीक्षितजी ने 1946 में फिर से इस पुस्तक को प्रकाशित कराने का प्रयास किया, पर अंततः इसका प्रकाशन 1947 में ही हो सका।
नाटककार ने प्रस्तावना में सूत्रधार और नटी के संवाद के द्वारा भारतमाता की वेदना का वर्णन किया है। छह अंकों के इस नाटक में प्रत्येक अंक में अलग-अलग दृश्य हैं। पारसी नाटकों की शैली में पटाक्षेप और पटोद्घाटन के द्वारा दृश्यों की समाप्ति व आरंभ करा गया है। अंग्रेजों के द्वारा मुगल बादशाह को धोखा देकर भारत में धीरे-धीरे काबिज होते जाने की घटनाएँ अलग- अलग दृश्यों में चित्रित हैं, जिनके बीच-बीच में बेडियों में जकडी भारतमाता का प्रवेश और करुण क्रंदन का के दृश्य हैं। फिरंगियों के द्वारा भारतीय जुलाहों से जबरजस्ती, लूटखसोट और अत्याचोरों के दृश्य रोंगटे खडे करने वाले हैं। ये दृश्य बंगला नाटक नीलदर्पण की याद दिलाते हैं। शिराज (सिराजुद्दौला) के साथ हुए छल, वाट्सन और क्लाइब के साथ अमीचंद तथा मीर जाफर की मिली भगत, नंद कुमार का अदालत में बयान से पलटना, वारेन हास्टिंग्स का भारत के लिये करुणा का भाव, 1857 की क्रांति पर केंद्रित है, मंगल पांडे आदि क्रांतिवीरों का प्रवेश इनसब दृश्यों को पाँछ अंकों मेंसमेटकर नाटककार दीक्षित ने छठे अंक में कांग्रेस की स्थापना तथा ह्यूम के अवदान का चित्रण करते हुए खुदीराम बोस और तिलक की बातचीत के द्वारा अंग्रजों के विरुद्ध चल रहे संघर्ष की सूचना दी है। इसके साथ ही गाँधीजी के सत्याग्रह आंदोलन, स्वदेशी का प्रचार, विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के दृश्य हैं। मदनमोहन मालवीय के अवदान का भी चित्रण नाटककार ने इस प्रसंग में किया है। भारतमाता साहस के साथ विदेशी को ललकारती है, विदेशी कुपित हो कर तलवार से उस पर वार करने के लिए झपटता है, तत्क्षण सुभाष चंद्र बोस का अवतरण मंच पर होता है, वे विदेशी को भगाते हैं। अंतिम दृश्य में विदेशी गाँधीजी को सत्ता सौंप कर भारत छोडता है, तिलक स्वर्ग से उतर कर गाँधीजी को आशीर्वाद देते हैं, गाँधीजी के द्वारा भारतमाता की सुंदर वंदना के साथ नाटक समाप्त होता है।
नाटककार दीक्षित ने स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं को इतिहास की समझ के साथ इस नाटक में प्रस्तुत किया है, साथ ही भारत के विगत तीन सौ वर्षों के अतीत की भी प्रभावशाली झलक उन्होंने इसमें दी है।
वीरप्रताप, वीरपृथ्वीराज, शंकरविजय, भक्तसुदर्शन, गान्धीविजय, भूभारोद्धरणम् आदि दीक्षित जी की अन्य नाट्यकृतियाँ हैं। वीरप्रताप में सात अंकों में राणाप्रताप का शौर्यसमन्वित जीवनचरित प्रस्तुत किया गया है। शंकरविजय में छह अंक हैं, तथा शंकराचार्य और मंडनमिश्र के बीच हुआ शास्त्रार्थ मुख्य रूप से चित्रित है। भूभारोद्धरणम् एक दुःखांत नाटक है, जिसमें यादववंश के विनाश की घटना चित्रित की गई है। वीरपृथ्वीराजविजयनाटकम् भी दुःखांत नाटक है।
दीक्षितजी के गान्धीविजय नाटक में दो अंक हैं। नाटक में दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी द्वारा आरंभ सत्याग्रह आंदोलन के प्रसंग को रूपायित किया गया है तथा परतंत्र भारत - दुर्दशा का चित्रण हृदयद्रावक है।
सुसंहतभारतम्
पुल्लेल रामचंद्रुडु का सुसंहतभारतम् एक पूर्णाकार संस्कृतनाटक है, जो भारतके स्वाधीनता संग्राम को विषय बनाकर लिखा गया। इसके केंद्र गाँधी का चरित्र है, चर्चिल और गाँधी के पात्रों को नाटककार ने आमने सामन रखते हुए नाटककार ने दोनों के चरित्र का वैषम्य बखूबी दिखाया है।
अन्य गाँधीपरक रचनाएँ
गाँधीजी के जीवन,कृतित्व और विचारों को ले कर अगणित प्रबंधात्मक और मुक्तक रचनाएँ इसके बाद संस्कृत में होती रही हैं। प्रबंधात्मक रचनाओं में से अनेक में गाँधी की एक नायक के रूप में प्रत्यक्ष छवि है, कई रचनाएँ ऐसी हैं, जिनके नायक अन्य महापुरुष हैं, पर गाँधी से भी उका संबंध जुडता है।
1962 में प्रकाशित गान्धीचरितम् महाकाव्य के प्रणेता साधुशरण मिश्र हैं। इसमें उन्नीस सर्ग हैं।
श्रीनारायणविजयम् महाकाव्य के प्रणेता के. बालराम पणिक्कर हैं। इस महाकाव्य में दक्षिण के समाजसुधारक, संत तथा वेदांतविद् नारायण गुरु का जीवनचरित 21 सर्गों तथा 1500 पद्यों में निबद्ध है।
नारायण स्वामी के जन्म, शिक्षा, विवाह, ईसाई मत के अनुयायियों आदि से उनके संवाद, अद्वैताश्रम व संस्कृत पाठशाला की उनके द्वारा स्थापना, गाँधीजी से उनकी भेंट आदि वृत्तांतों के साथ नारायण धर्म की स्थापना और नारायण स्वामी की महासमाधि के वर्णन के साथ यह महाकाव्य समाप्त हुआ है। कवि ने स्वयं इस पर टीका भी लिखी है।
बोम्मलापुर वैंकटराम भट्ट (1915) ने मोहनायनम् महाकाव्य में गाँधीजी का समग्र चरित निबद्ध किया है। जी. वी. ठेकेदार (1916) ने गाँधीजी पर महात्मायनम् (1991) नाम से महाकाव्य लिखा है। स्वातन्र्त्यवीरगाथा (1992) मधुकर शास्त्री के गान्धीगाथा महाकाव्य में बारह सर्ग हैं। गाँधी के जन्म व बाल्य से लगा कर उनके जीवन के उत्तरार्ध तक की घटनाओं का विशद व मार्मिक चित्रण इस काव्य में किया गया है। छंदों की दृष्टि से मधुकर शास्त्री ने गाँधिगाथा (1973) में हिंदी के नये गए छंदों का प्रयोग किया है।
राष्ट्रपतिसभागौरवम् कांग्रेस की स्वर्णजयंती (1935) के अवसर पर लिखा गया, तथा 1938 में प्रकाशित हुआ। इस प्रबंधकाव्य के प्रणेता लक्ष्मीनारायण शानभाग हैं। स्वातन्र्त्यपथ, शान्तिप्रार्थना, श्रीसुभाषचन्द्रप्रशस्तिः इसमें संवलित हैं। इसमें लाजपतराय, गाँधी, नेहरू, सुभाष बोस आदि के जीवचरित निरूपित हैं, जो 1885 से लगा कर 1935ई. की अवधि में कांग्रेस के अध्यक्ष रह।। महात्मा गाँधी का महिमामय व्यक्तित्व इस काव्य में केंद्र में है। महात्मा गाँधी के अवदान तथा आदर्श के लिये कवि के मन में स्पृहा है। मुखपृष्ठ पर ही उसने काव्य के प्रेरणा सूत्र के रूप में यह पद्य प्रस्तुत किया है-
सत्याहिंसातत्त्वावबोधेस्त्रिवेणे-
रित्थं धृत्वा भारते या पताका।
स्वातन्र्त्यं या स्वाश्रितेभ्यो ददाना
सर्वोत्कृष्टा राजते भूतलेस्मिम्।।
स्वाधीनता संग्राम के इतिहासनिरूपण की दृष्टि से कवि श्रीप्रीतमलाल नरसिंहलाल कच्छी का मातृभूमिकथा नामक काव्य भी उल्लेखनीय है। श्री कच्छी का जन्म गुजरात के जूनागढ में वि.सं. 1940 में हुआ। सन् 1911 में ये इंदोर नगर के एक विद्लय में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए, तथा बाद में खरगौन जिले में एक विद्यालय में प्राचार्य रहे उन्नतिशतक, भक्तिशतक, शान्तिशतक, आराधनाशतक, श्रीमद्होल्करवंशप्रशस्तिकाव्य - ये इनकी अन्य रचनाएँ हैं।
मातृभूमिकथा में 608 पद्य हैं। इसमें अशोक के काल से लेकर 1930 तक की ऐतिहासिक घटनाओं का अंकन है। आर्यकाल, मुहम्मदीयकाल तथा आङ्गलकाल इन भागों में इसे विभाजित किया गया है। रालेट एक्ट के विरुद्ध जलियावाला बाग में हुई सभा पर बर्बर गोलीकाण्ड की घटना का मार्मिक चित्रण कवि ने किया है। गाँधी इरविन सन्धि तथा असहयोग आन्दोलन का भी विवरण इस काव्य में दिया गया है।
नारायण प्रसाद त्रिपाठी की श्रीभारतमाला (ज्ञानमण्डल, काशी,1939 ई.) में स्वतन्त्र भारत के स्वप्न और राष्ट्र के नवनिर्माण की आकांक्षा को अभिव्यक्ति दी गयी है। भारतीय कृषकों की दयनीय दशा का करुण चित्रण इस काव्य में कवि ने किया है-
बालकृष्ण भट्ट टिहरी गढवाल के अन्तर्गत ग्राम जलोली के निवासी थे तथा राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, टिहरी गढवाल में प्राचार्य रहे। राष्ट्रवादी धारा की रचनाओं में इनका स्वतन्त्रभारतम् काव्य उल्लेखनीय है। स्वतन्त्रभारतम् पूर्वपीठिका तथा उत्तरपीठिका- दो भागों में विभाजित है। इसकी रचना स्वतन्त्रता प्राप्ति के अवसर पर हुई, किन्तु उत्तरपीठिका में शनैः शनैः परिवर्तन करते हुए कवि ने इसमें देश की 1996 ई. तक की प्रमुख घटनाओं तथा विभिन्न क्षेत्रों में हुई प्रगति का उल्लेख यथावसर प्रस्तुत कर दिया है। पूर्वपीठिका में 582 तथा उत्तरपीठिका में 466 पद्य हैं। भारत के स्वाधीनतासंग्राम के रोमांचक वर्णन के साथ स्वर्णिम अतीत की झलक भी इसमें दी गई है। स्वाधीनता प्राप्ति के अनन्तर हुए दंगों तथा देश में नैतिक अवमूल्यन पर कवि ने हार्दिक क्लेश व्यक्त किया है। यवनों तथा अंग्रेजों के द्वारा भारतीय जनता पर किए गए अत्याचारों का वर्णन यहाँ बडा हृदयद्रावक है।
केशवन् नायर के निवेद्यम् (1970) में विविध शीर्षकों के अंतर्गत स्फुट रचनाएँ हैं। इनमें भारतीय प्रतिज्ञा चीन के आक्रमण को ले कर ओजस्विनी अभिव्यक्ति है। निवापाञ्जलिः में गाँधीजी की निर्घृण हत्या पर मार्मिक शोकोद्गार है। नाथूराम गोडसे को मर्त्यराक्षस तथा हिंदुमत का कंटक बताते हुए कवि ने उचित ही कहा है -
नाथुराम इथि मर्त्यराक्षसः कोपि हिन्दुमतकण्टकोशुचिः।
देवकल्पमवधीन्महात्मजिं लोकसेवनरतं शुचिस्मितम्।।
रमेशचंद्र शुक्ल (ज. 1909) ने नाटक, निबंध, काव्यशास्त्र, पुराण, मुक्तक, लघुकाव्य, इतिहास आदि विविध विधाओं व विषयों को ले कर लेखन किया। इनके गान्धिगौरवम् (1969) में 125 इंद्रवज्रा छंदों में गाँधी का गौरवगान है। लालबहादुरशास्त्रिचरितम् इनका चरितकाव्य है। इसमें 186 पद्य हैं। शास्त्री जी की ताशकंदयात्रा व निधन के करुणामय विवरण के साथ काव्य का अवसान होता है। शुक्ल जी के नवभारतपुराणम् में तीन सौ पद्य तथा 11 अध्याय हैं। इसे उमा और महेश्वर के संवाद के रूप में रचा गया है। इसमें आधुनिक संस्कृत कवियों का विवरण दिया गया है। भूवैभवम् इनका ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रबंधात्मक काव्य है। इसमें अनेक महापुरुषों, संतों, कवियों दार्शनिकों आदि के जीवन व कर्तृत्व पर प्रकाश डालते हुए उनकी स्तुति व प्रशस्ति की गई है। भारतपाकयुद्ध को ले कर शुक्ल जी ने 208 पद्यों का बाङ्गलादेशः नामक काव्य लिखा। इसमें बांग्लादेश के शरणार्थियों की समस्या के करुणामय निरूपण के साथ पाकिस्तान से हुए युद्ध का ओजस्वी चित्रण है। तथा इनका भरतचरितामृतम् 235 पद्यों में रामायण की कथा को आधार बना कर भरत के चरित की प्रस्तुति है। विभावनम् नामक शतककाव्य में इन्होंने कवि ब्रह्मानंद शुक्ल को श्रद्धांजलि अर्पित की है। इसी श्रेणी का अन्य काव्य इन्दिरायशस्तिलकम् तथा नेहरूवृत्तम् हैं।
डा. वेंकट राघवन् (1908-1979) का परिचय तथा उनकी महाकाव्य और नाटक रचनाओं का विवरण इस खंड के पिछले अध्यायों में दिया गया है। इन्होंने विविध विषयों पर बहुसंख्य कविताएँ लिखीं हैं। मीनाक्षीसुप्रभातम्, कामाक्षीमातृकास्तवः, आदि सर्वथा पारम्परिक काव्य का बन्ध प्रस्तुत करते हैं। खण्डकाव्यों में महात्मा काव्य महात्मा गाँधीजी के नेतृत्व और दर्शन को सरल, प्रासादिक शैली में अनुष्ट्प् छन्दों में निरूपित करता है।
रतिनाथ झा (जन्म 1922) बस्ती जिले के निवासी थे तथा काशी हिन्दूविश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे। अरविन्दशतकम्, मालवीयप्रशस्तिः, महात्मागान्धी-शतकम्, बापूशतकम्, महावीराभ्युदयमहाकाव्यम् आदि के अतिरिक्त इनकी अनेक स्फुट कविताएँ यत्र-तत्र प्रकाशित हैं। भोलानाथ मिश्र के गाँधीगरिमा (1950), भारतीयसर्वस्वम् (1983), इन्दिराकाव्यम् (1988) आदि काव्य या काव्यसंकलन प्रकाशित हैं।
चारुदेव शास्त्री (1896) का गान्धीचरितम् 1939 ई. में लिखा गया। यह संपूर्ण रचना अत्यंत प्रशस्त और प्रांजल गद्य में है। इसमें छह अध्यायों में गाँधी के जन्म से लेकर सत्याग्रह आंदोलन के आरंभ तक की घटनाएँ यथार्थ की मीमांसा के साथ निरूपित हैं। राजहंस द्वारा प्रणीत गान्धीगीता या अहिंसायोगः (लाहौर, 1945) में गीता के समान 18 अध्याय हैं। जिस प्रकार गीता में कुरुक्षेत्र में अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है, उसी प्रकार चंपारण के सत्याग्रह के अवसर पर राजेंद्रप्रसाद गाँधीजी से प्रश्न करते हैं। अहिंसा के स्वरूप विवेचन में परिकर अलंकार का प्रयोग सुन्दर रूप में किया गया है । यथा-
अहिंसा शोणिताकाङ्क्षा शुभयित्री रिपोरपि ।
अहिंसा निष्त्रि*या नैव प्रत्रि*या शक्तिशलिनी।
नेयं निवृतमास्ति प्रवृत्तिः परमा मता । (3/41)
महाराष्ट्रनिवासी जयेश (1904) की मोहनमञ्जरी में गान्धीपरक 117 कविताएँ हैं। जयेश ने ही भारतमञ्जरी तथ महापुरुषायणी इन दो काव्ग्रंथों की रचना भी की, जिनमें राष्ट्र की गाँधीवादी दृष्टि से विभावना तथा राष्ट्रसेवकों के चरितत्र निरूपित हैं।
श्रीपाद शास्त्री हसूरकर ने भारतरत्नमाला पुस्तक श्ाृंखला प्रस्तुत की। बी.एल शास्त्री के गान्धीविजयः नामक काव्य में 106 पद्य हैं। इसमें गाँधीजी का जीवनदर्शन, उनके आंदोलन व सिद्धांतों की प्रतिपादन सरल शैली में है। कहीं कहीं असंस्कृत शब्दों का प्रयोग भी कवि ने किया है। जैसे
हा सर्वतो दास्यममी भजन्ते
कुलीति कौलीन्यमतो लभन्त।।
विगर्हिता जीवनयापनाय
करातिभारेण भवन्ति खिन्नाः।। 56
गाँधीनिर्वाणकाव्यम् में 50 पद्य हैं। इनके रचयिता शम्भु शर्मा है। साम्प्रदायिक दंगों, रक्तपात और हिंसा का दुःखद चित्रण करते हुए कवि राष्ट्र में सौहार्द और एकता की स्थापना चाहता है।
गाँधीजी के चरित्र पर लिखे गए अन्य काव्य हैं- गाँधी गीता (अनन्तविष्णु काणे), गान्धीशतश्लोकी (गणपति शङ्कर शुक्ल), गान्धीमाहात्म्य (विजय-राघवाचार्य), मोहनपञ्चाध्यायी (1931 ई.), मोहनगीता (सुरेन्द्रसेवी, 1945 ई.), गान्धीप्रवहणम् (महाभिक्षु), वर्णव्यवस्था (दीपचन्द्राचार्य, 1933 ई.) आदि।
सत्याग्रहनीतिकाव्य (1939 ई.) काव्य की रचना श्री सत्यदेव वशिष्ठ ने हैदराबाद के जेल में रहकर की। काव्यरचना का प्रयोजन बताता हुआ कवि कहता है-
काव्यनिर्माणचातुर्यं कवीनां धर्म उच्यत।।
किं तया काव्यनिर्मित्या देशजाती न धारयेत्।।
राष्ट्रोन्निनीषया काव्यं कुर्वन् विज्ञानवर्धनम्।
तृणाय मन्यते राज्यं कविः सत्याप्तिलिप्सया।।
( सत्या.नीति. 1/12/34,35)
यह एक अर्थ में प्राचीन काव्य की शिल्प परकता काव्यनिर्माण चातुरी का विरोध है। काव्य देश और जाति के उद्धार के लिए प्रवृत्त नहीं तो इस चातुरी से क्या लाभ?
राष्ट्रचिन्तन को रचना की अनिवार्य प्रेरणा मानना संस्कृत कविता के क्षेत्र में नूतन प्रतिमान का आधान है। वाशिष्ठजी कविता से शब्दजाल को भी दूर करने का संकल्प व्यक्त करते हैं-
शब्दजालमपाकृत्य साधुशब्दविभूषितम्।
कृतं काव्यं प्रसादाय नहि क्लेशाय चेतसः।। 5.4.37
सत्याग्रहज्ञानजुषो नरा ये तच्चावने नालमिहास्ति लक्ष्मीः।
नूनं दवाग्नेः शमने समर्थो वायुः कदाचिन्न समृद्धवेगः।।
गाँधीजन्मशती के अवसर पर गाँधीशांति प्रतिष्ठान की ओर से विभिन् भाषाओं में गाँधीजी को ले कर विरचित साहित्य का सर्वेक्षण कराया गया, उसके अंतर्गत संस्कृत में गाँधीजी के ले कर लिखे गए 29 काव्यों का विवरण दिया गया है। पर पत्रपत्रिकाओं में गाँधीजी को ले कर असंख्य रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं, 1944 में गाँधीजी को अभिनंदन ग्रंथ समर्पित किया गया, उसमें सभी भारतीय भाषाओं से गाँधी को ले कर लिख गई कविताएँ संग्रहीत की गईं थीं, उसमें संस्कृत के 13 कवियों की रचनाएँ थीं। इनमें काशी के महादेव शास्त्री व गोपाल शास्त्री दर्शन केसरी, शांतिनिकेतन के विधुशेखर भट्टाचार्य तथा जयरुर के भट्ट मथुरानाथ शास्त्री जैसे श्रेष्ठ कवि सम्मिलित थे।
व्यासराज शास्त्री के महात्मविजयः में गाँधीजी के माहात्म्य को इस प्रकार हृदयंगम कराया गया है-
महात्मगान्धिर्महितापदानः
क्षितौ समन्तात् प्रथिताभिधानः।
मनोवचः कर्मभिरेकरूपो
महात्मनामप्यभवन्महात्मा।।
त्वय्यम्ब भूयो मम जन्म भूया-
दितीव धात्रीमुपगूहमानः।
श्रीरामरामेति गिरन् विशोकः
शोकाम्बुधौ लोकममज्जयत् सः।।
जयराम व्यंकटेश की मोहनमञ्जरी (1970) में मोहनदास के मनोमोहक स्वरूप का यह चित्ताकर्षक चित्र अंकित किया गया है-
अर्धाम्बरत्वेन निवेदितं वपुः
सन्धार्य निष्काञ्चनलाक्षिकं ननु।
यातो यदा वर्तुलसन्निवेशकम्
मुमोह सभ्यान् कृतनाममोहनः।
अंत्यानुप्रास की छटा भी इस काव्य में उतनी ही मोहक है-
कृशाङ्गयष्टिस्तु करे च यष्टिः
तथापि धर्माचरणे समष्टिः।
जनस्य कार्ये कृतजीवनेष्टिः
अभूच्च रम्या हि तवाङ्गयष्टिः।।
पं. ब्रह्मानन्द शुक्ल बीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ संस्कृतपण्डितों तथा महाकवियों मंो गणनीय हैं। इन्होंने 111 पद्यों में गान्धिचरितम् काव्य लिखा है (खुरजा, 1964)। इसी श्ाृंखला में डा रमेशचन्द्र शुक्ल ने 125 पद्यों में गान्धिगौरवम् (1969 ई.) रचना की है। आचार्य रमेशचन्द्र शुक्ल ने लालबहादुरशास्त्रचरितम् तथा बाङ्गलादेशः शीर्षक खण्डकाव्यों की भी रचना की है।
केशिराजु वेंकटनसिंह अप्पाराव ने पञ्चवटी नामक काव्य में गाँधीजी के जीवन दर्शन को सुन्दररूप में प्रस्तुत किया है। गाँधीजी की सत्य, अहिंसा आदि के विषय में अवधारणाएँ यहाँ रमणीय दृष्टान्तों के द्वारा काव्यात्मक बना कर हृदयङ्गम करायीं गयी हैं। रामराज्य का स्वरूप कवि ने इसप्रकार प्रतिपादित किया है-
स्वार्थायान्याफतिपरान् यः करोत्यसुरोसौ त्यागेनान्यानुफतिपरान् यः करोत्येष देवः। सर्वेषामभ्युफतिपराः कस्यचिन्नापकारं विश्वप्रीतिं विदधति जना यत्र तद् रामराज्यम्।। (61)
मोहनगीता अथवा अहिंसागीता के प्रणेता इंद्र लाहोर में टी.एस. कालेज में संस्कृत के प्राध्यापक थ।। 1945 में अंग्रेजी अनुवाद के साथ उन्होंने इस गीता का प्रकाशन किया। मोहनगीता भी श्रीमद्भगवद्गीता की भाँति- मोहनप्रादुर्भाव, अहिंसामीमांसा, अहिंसाप्रयोगः, सत्यमीमांसा, सत्यप्रयोगः, उपवासनिज्ञानम्, दीनार्तिनाशनम्, ईश्वरनिरूपणम्, अविद्यार्तिनाशनम्, रोगार्तिनाशनम्, दारिर्द्यार्तिनाशनम्, अस्पृश्यार्तिनाशनम्, रामराज्यसमाजनिर्माणम् - इन अठारह अध्यायों में विभक्त है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन्, विधुशेखर भट्टाचार्य आदि ने इस काव्य की सराहना की है। प्रथम अध्याय में दीनबंधु एंर्ड्यूज तथा रवींद्रनाथ टेगोर का संवाद है।3 जिसमें रवींद्रनाथ एंर्ड्यूज गाँधीजी के स्वराज्यसंग्राम के विषय में प्रश्न करते हैं। एंर्ड्यूज उन्हें दादाभाई नौरोजी आदि नेताओं के किये पूर्व में किये गए संघर्ष की विवरण देते हैं। शनैः-शनैः इस विवरण में ओजस्विता का संचार होचा जाता है. तिलक के विषय में कहा गया है -
स्वाराज्यं जन्मसिद्धो मेऽधिकारोऽहं ग्रहीष्ये तत्।
इत्युच्चैः सिंहनादेनाघोषयन् स महारथः।।
महाराष्ट्रे महाज्योतिः कश्चित् प्रादुर्बभूव ह।
बालगङ्गाधरो लोकमान्यो लोकशिरोमणिः।।
(1.20-21)
इन समस्त महापुरुषों की तुलना में मोहनदास के विषय में कहा गया है -
एतान् सर्वानतिऋम्य भानुमानिव संस्थितः।
स्वभासा भासयंल्लोकं भारतं तु विशेषतः।। 1.36
इह त्वया रचनया शक्तिः काचित् प्रदर्शिता।
सर्वथाऽभिनवां मन्ये त्वदीयामीदृशीं कृतिम्।।
कैलास इव शुभ्रश्रीरुत्तुङ्गो हिमश्ाृङ्गवत्।
स्वाभासा भासयल्लोकं भारतं तु विशेषतः।।
देशदारिर्द्यसन्तापविदीर्णहृदयो यती।
तपःकृशशरीरेण देशदुःखं प्रकाशयन।।
विश्वकल्याणचिन्तायां शाश्वतं मग्नमानसः।
दूरदर्शी मुनिः कश्चिदाकाशभ्रष्टदेवता।।
महान् बुद्ध इवाबद्धो बन्धुत्वे प्राणिभिः सह।
भूतानां भूयसां भूयो भूमानं भावयन् भृशम्।।
सेवाधर्ममनासक्तियोगं कर्मार्चनाविधिम्।
भगवान् वासुदेवोऽन्योऽवतीर्ण इव भारत।।
महात्मा मोहनो गान्धीनामा विश्वविमोहनः।।
समुत्थानाय दीनानां स्नातन्र्त्यस्थापनाय च।
विश्वप्रेमप्रसाराय सम्भूतः सोऽधुना युग।। 1.37-43
अन्य अध्यायों में भी संवाद की शैली में ही गाँधीजी के जीवन संघर्ष का विवरण दिया गया है। अंतिम अध्याय में एंडर्ज पुन अवतरित हो कर घोषणा करते हैं-
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमध्यात्मसुन्दरम्।
मोहनं मोहनस्याहं संहृष्यामि पुनः पुनः।। 18.77
मोहनः सत्यसत्त्वस्थः सत्यं विजयतेतमाम्।
नायको मोहनो यत्र विजयस्तत्र वै ध*ुवः।। 18.76
वंगपंडु नायडु के द्वारा विरचित गान्धेयचरितम् सरल सहज प्रासादिक शैली में स्वतंत्रतासंग्राम का विवरण है। वंगपंडु नायडु आंध्र के एक विद्यालय में अध्यापक थे। इनके गान्धेयचरितम् में रामायण की तरह पाँच कांड हैं, प्रथम और अंतिम कांडों के नाम बालकांड तथा उत्तरकांड ही हैं, बीच के कांडों के शीर्षक ज्योतिर्मयकांड, अन्धकारक्षणकांड तथा स्वातंर्त्यसमरकांड हैं। परिशिष्ट में 141 पद्यों में गाँधीगीता भी जोडी गई है। गांधेयचरितम् रघुवंश से प्रभावित है। आरंभ में ही कवि कहता है-
गान्धेयचरितं वक्ष्ये स्वल्पज्ञानसमन्वितः
अल्पप्लवेन पाथोधिं तितीर्षुरिव दुस्तरम्।।
(देवतास्तुतिकाण्ड, 1.12)
(स्वल्पज्ञान से समन्वित मैं गाँधी के चरित को बताऊँगा, छोटी-सी नाव से दुस्तर सागर को पार करना चाहने वाले के समान)। इसी प्रकार रघुवंशीय राजाओं का कालिदासकृत चरित्रनिरूपण इस काव्य में गाँधीजी के चरित्रवर्णन में संक्रांत कर लिया गया है -
प्रजानामेव सेवार्थं वादिनः करमग्रहीत्।
अधिकं जलमुत्स्रष्टुमादत्ते हि दिवाकरः।।
ज्योतिर्मयकाण्ड, (2.8)
(जनता की सेवा के लिए ही वे वादी से फीस लेते थे, जैसे अधिक जल की वर्षा के लिये सूर्य पानी सोखता है।)
गूढाकारेङ्गितश्चासौ गुप्तमन्त्रविशारदः
सामाद्युपायप्रारम्भाः अनुमेयाः फलेन हि।। 2.9
(उनका आकार व संकेत गुप्त रहते थे, अपने रहस्य व छिपा कर रखने में निपुण थ।। साम आदि उपायों से उनके द्वारा आरंभ किए गए कार्य उनके परिणामों से ही जाने जदा सकते थे।)
राजकीयेषु द्वेष्येऽपि शिष्टोऽभूत् तस्य सम्मतः।
खलः प्रियोऽपि तस्यासीत् त्याज्यः सर्वकुलेष्वपि।। 2.14
(राजनीति में उनके लिए शत्रु भी यदि वह सुसंस्कृत होता, तो सम्मान्य था, यदि प्रिय व्यक्ति भी दुष्ट होता, तो सारे कुल से त्याज्य था।)
प्रजानामेव सेवार्थं संस्थितो रक्षको भयात्।
स पिता सर्वलोकानां विश्रुतो बापुसंज्ञया।। 2.18
(जनता की सेवा के लिए वे भय से रक्षक बन कर खडे थ।। सारे लोगों के लिये पिता के समान होने से वे बापू के नाम से ख्यात हो गय।।)
गाँधी जी के स्वप्न में भारतमाता के प्रकट होने का प्रसंग भी रघुवंश में कुश के सम्मुख अयोध्या नगरी के प्रकट होने के वृत्तांत का अनुकरण है।
उत्थाय गान्धिस्तु विलोक्य दीना-
मित्थं जगादाद्भुतमग्रचित्तः।
का त्वं शुभे कस्य वधूर्वरासि
को वा भवत्याश्च विचारहेतुः।।
स्वातन्र्त्यसमरकाण्ड चतुर्थः सर्गः 4.4.4
इस काव्य में अनेकत्र अव्याकरणिक प्रयोग हैं, जैसे याचन्ति वीरमुष्टिञ्च वार्षिकं प्रतिवत्सरम्- उत्तरकाण्ड, यहाँ जबरन् वसूली के लिए वीरमुष्टि शब्द बनाया गया है (1.19)।
धर्मदेव विद्यामार्तण्डकृत महापुरुषसङ्कीर्तनम् सात खण्डों का काव्य है। इसमें गाँधीजी का व्यक्तित्व तथा चरित्र केन्द्र में है, उसके साथ साथ महामना मालवीय, राजेन्द्रप्रसाद, जवाहरलालनेहरू, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन आदि के जीवन और कृतित्व का भी निरूपण किया गया है। गाँधीजी की अनेक जीवनियाँ लिखी गईं, जिनमें वासुदेवशास्त्री बागेवाडीकर का श्रीगान्धिचरितम् प्रामाणिकता व गद्य की सारग्राहिता की दृष्टि से उल्लेख्य है।
शिवगोविंद त्रिपाठी के गान्धीगौरवम् महाकाव्य में आठ सर्गों तथा 792 पद्यों में गाँधी का समग्र जीवन चरित निबद्ध है। गाँधीवादी विचारधारा का इसमें विशेष रूप से प्रतिपादन है। गाँधी को मुरारि के अवतार के रूप में कवि ने चित्रित किया है।
ओट में गाँधी
संस्कृत में गाँधीजी के समकालीन अनेक रचनाकारों ने ऐसी रचनाएँ भी प्रचुर मात्रा में कीं, जिनका सीधे गाँधीजी से कोई संबंध नहीं है, पर रचनाकार के मानस गाँधी मौजूद हैं, इसलिए रचना में उनकी उपस्थिति परोक्ष रूप में झलकती है।
भारतवसुन्धरासान्त्वनम् के प्रणेता ताराचरण भट्टाचार्य काशीप्रसाद भट्टाचार्य के पुत्र तथा वामाचरण भट्टाचार्य के अनुज थे। उनका जन्म 1885 ई. में काशी में हुआ। इन्होने दशकुमारचरितम् पर संस्कृतटीका के अतिरिक्त संस्कृत नाटकों में रंगमंचीय प्रयोग के अवसरों पर गेय अनेक गीतियाँ लिखीं थीं, जो अप्राप्त हैं।
भारतवसुन्धरासान्त्वनम् या भारतगीतिका इनका राष्ट्रभाव से ओतप्रोत काव्य है। इस काव्य में आद्यंत अंत्यानुप्रास का सरस प्रयोग है तथा गेयात्मकता विशेष गुण है। संपूर्ण काव्य में बंगदेश में प्रचलित कोई गेय छंद (12, 11, 12, 10 मात्रा) अपनाया गया है। 167 छंदों के इस काव्य में भारतीय वसुंधरा के सौंदर्य, राम, श्रीकृष्ण, बादरायण, अर्जुन, समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन, भोज, पृथ्वीराज, शिवाजी आदि के अवदानों का वर्णन के साथ भारत के पंडितों क वैदुषी व कलावैभव के निरूपण के साथ काव्य का उपसंहार किया गया है।
सुधीसुधानिधि के उपनाम से विख्यात काशीनाथ द्विवेदी (1897-1969) का महाकाव्य रुक्मिणीहरण श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह की पौराणिक कथा पर लिखा गया है। विधवा की वेदना तथा पुरुष के पुनर्विवाह पर भी रुक्मिणीहरण महाकाव्य में श्रीकृष्ण टिप्पणी करते हैं, धर्म की विडम्बना करने वालों पर उनके मुख से तीखी चोट करायी गई है। वे अस्पृश्यता तथा जातिवाद का विरोध करते हैं।
इंद्रदेव द्विवेदी इंद्र (1940-1996) ने महाकाव्य, नाटक, खंडकाव्य, मुक्तक आदि विविध विधाओं में रचनाएँ कीं। सुदामचरितम् इनका इक्कीस सर्गों का महाकाव्य है। इसमें 1500 पद्य हैं। उपजाति, वसंततिलका, वंशस्थ, शिखरिणी आदि छंदों का प्रयोग हुआ है। आधुनिक भावबोध तथा साम्यवादी दृष्टि का भी प्रक्षेप पौराणिक कथा में कवि ने किया है। में कृष्ण और सुदामा की कथा आधुनिक परिप्रेक्ष्य के साथ निरूपित है। प्रबंधवक्रता का अच्छा निर्वाह इसमें किया गया है। गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव इन्द्रदेव द्विवेदी इन्द्र की रचना पर देखा जा सकता है।
रामजी उपाध्याय ने द्वा सुपर्णा तथा हरिश्चन्द्रकथा नाम से दो उपन्यास संस्कृत में लिखे। दोनों में गाँधी के दर्शन कागहरा असर है। सुदामा और उसकी पत्नी कौमुदी में लेखक ने गाँधी और कस्तूरबा की छाया झलका दी है।
कुछ महाकाव्य उन्नीसवीं और बीसवीं के समाजसुधारकों, संतों या महापुरुषों के जीवन को ले कर बडी संख्या में संस्कृत में महाकाव्य लिखे गए। इनमें भी प्रकारांतर से गाँधी तथा गाँधी के जीवनदर्शन की छाया है। रामावतारशर्मा की भारतगीतिका शीर्षक रचना नये युग के अनुरूप भारतीयों को प्रबोधित करती है-
अलं भारतीया मतानां विभेदै-
रलं देशभेदेन वैरेण चालम्।
अयं शाश्वतो धर्म एको धरायां
न सम्भाव्यते धर्मतत्त्वेषु भेदः।।
इस काव्य की तुलना हिंदी में मैथिलीशरण गुप्त की भारतभारती से की जा सकती है। देशवासियों के लिए नवजागरण का शंखनाद करते हुए गुप्तजी की ही तरह शर्माजी कहते हैं-
किं पूर्वसूरिभिरभूत् कृतमत्र देशे
द्वीपान्तरेषु च कियत् क्रियतेऽधुनाऽपि।
आलोच्य सर्वमिदमङ्ग विधत्त यत्नं
यत्नेन सर्वमपि सिध्यति नात्र शङ्का।। 14।।
शिवप्रसाद भारद्वाज का भारतसन्देशः स्वतन्त्र भारत की नव चेतना का काव्य है। इसमें 320 मंदाक्रांता पद्य हैं। इस काव्य में स्वाधीन भारत की आकाँक्षाएँ चित्रित है तथा नवनिर्माण की समाशंसा की गई है। इसके प्रथम भाग में सारे देश के प्रमुख नगरों का वर्णन करते हुए कवि ने राष्ट्र में ही सर्वतोमुखी प्रगति का दिग्दर्शन प्रस्तुत किया है। दूसरे खण्ड में देश के नागरिकों के नाम राष्ट्रपति के सन्देश का सुन्दररूपान्तर प्रस्तुत किया गया है। राष्ट्रभक्तिपरक लघुकाव्यों में ए.वि. कृष्ण वारियर की राष्ट्रवैजयंती स्वातंत्रताप्राप्ति के पश्चात् रची गई। इसके के भागों में से पहले भाग में अहिंसात्मक आंदोलन से स्वतंत्रताप्राप्ति व राष्ट्रगौरव का गान है, दूसरे में आसेतुहिमाचल भारत की यात्रा करते हुए देश के सौंदर्य का उद्घाटन है। त्रिवर्ण वैजयंती या तिरंगे झंडे के फहराने पर स्वांतर्त्य की अनुभूति में कवि प्रफुल्लित हो कर स्फीत प्रसन्न पदावली में उसका यशोगान इसप्रकार करता है ङ्क्त
इयं भारती भासतां वैजयन्ती
जयन्ती मनो मानवानां विशन्ती।
स्वतन्त्रान् सतो राष्ट्रतन्त्रप्रवीणान्
सृजन्ती हरन्ती समस्तं जनाधिम्।।
गणपतिशंकर शुक्ल के द्वारा रचित भूदानयज्ञगाथा भी इसी प्रकार की खण्डकाव्य है। इसमें विनोबा के भूदान यज्ञ का विवरण भी दिया गया है तथा अहिंसा का स्वरूप और हमारे समय की अन्य विचारधाराओं-साम्यवाद, समाजवाद आदि के परिप्रेक्ष्य में उसकी विशेषता का निरूपण भी किया गया है। अत्यन्त सरल भाषा में कवि ने अपने वैचारिक दर्शन को प्राचीन पौराणिक आख्यानों से उदाहरण लेते हुए सुन्दर ढंग से प्रकट किया है-
भगवान् वामनः किन्तु करुणाप्रेमशक्तितः।
रक्तपातं विना लेभे न विजयं सहजेन हि।। (77)
भारतीय इतिहास का स्वाधीनता युग तक चित्रण करने वाली काव्यकृतियों में उमाशंकरकृत काव्यकलिका की चर्चा भी की जा सकती है। इस खण्डकाव्य में तीन सर्ग हैं। पहले सर्ग में भारत का प्राचीन काल से लेकर संक्षिप्त इतिहास, दूसरे सर्ग में सन् 47 के पश्चात् घटी स्थितियों का चित्रण है तथा तृतीय सर्ग में विश्वशान्ति के निर्मित से की गयी पं. नेहरू की इस यात्रा का चित्रण किया गया है। समूचे विश्व मं नये उभरते हुए परिदृश्य को नेहरू जी के विशद वक्तव्य के द्वारा कवि ने उपस्थापित किया है-
देशैरत एव शान्त्यै ग्रहणीया सहयोगभावना।
जनहानिनिरोधहेतवे नवसिद्धान्तमिमं करिष्यथ।।
नारायण प्रसाद त्रिपाठी की श्रीभारतमातृमाला में राष्ट्र के स्वप्न और आकाँक्षाओं को कवि ने सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्ति दी है। भारतीय किसानों की दीन दशा का मार्मिक चित्रण इस काव्य में किया गाय है।
यतीन्द्रविमल चौधुरी (1908-1965) ने देश की सांस्कृतिक अस्मिताओं तथा इतिहास का नवान्वेषण अपनी नाट्यकृतियों में किया है। महिमयभारतम्, मेलनतीर्थम्, सुभाषसुभाषम्, रक्षकश्रीगोरक्षम्, निष्किञ्चनयशोधरम्, आनन्दराधम्, भारतलक्ष्मीः तथा दीनदासरघुनाथम् इनके मुख्य नाटक हैं। श्रीअरविंद, विवेकानंद, राजेंद्रप्रसाद आदि महापुरुषों के जीवन पर भी इनकी नाट्यकृतियाँ हैं। महिमयभारतम् में नवभारत के जागरण का चित्रण है। मेलनतीर्थम् में संस्कृति की विकास यात्रा की झाँकियाँ हैं। महिममयभारतम् तथा मेलनतीर्थम् दोनों नाटकों में नवभारत के निर्माण की आशाओं और राष्ट्र की आकांक्षाओं की प्रेरणा है। परिकल्पना की दृष्टि से नाटककार ने इनमें से पहले में वैदिककाल से ले कर आधुनिक युग तक के भारत की छवियाँ चार दृश्यों में प्रस्तुत की हैं। मेलनतीर्थम् के दस अंकों में वैदिककाल ले लगा कर नेहरू के राष्ट्रनिर्माण के प्रयासों की घटनाओं को दस अंकों में समाहित किया गया है।
गद्यकार के रूप में रामकरण शर्मा की उपलब्धियाँ विशिष्ट हैं। संस्कृत में उनके दो उपन्यास प्रकाशित हैं- सीमा (1987) तथा रयीशः (1994)। यद्यपि इनमें उपन्यास की आधुनिक शैली को अपनाया गया है, पर साथ ही इनमें अन्तर्गुम्फित प्रतीकात्मकता इन्हें प्राचीन भारतीय रूपकात्मक कथाओं के निकट ले आयी है। ये उपन्यास आधुनिक विश्व में भौतिकता के प्रसार और उसके दुष्परिणामों पर चेतावनी हैं तथा तपस् और त्याग की भारतीय दृष्टि को स्थापित करते हैं।
गाँधीविहीन संस्कृत साहित्य
आज के संस्कृत साहित्य का एक बडा हिस्सा ऐसा भी है, जिसमें गाँधी की या तो कोई छाया ही नहीं है, यदि है, तो उपेक्षा, विरक्ति और चिढ उसके पीछे है। इस साहित्य के सृजनकर्ताओं के दो वर्ग हैं- एक तो वे जो आजादी की लडाई के दौर में सुभाष और सरदार भगतसिंह के क्रांतिकारी दल के साथ थे, दूसरे वे हेगडेवार और गुरु गोववलकर से प्रभावित हैं। पहले वर्ग के बडे रचनाकार योगी अरविंद और हरिदत्त पालीवाल निर्भय तथा रामनाथ पाठक प्रणयी आदि हैं। योगी अरविंद की सशस्त्र क्रांति का उद्यम करने वाले के प्रति सहानुभूति रही, वे
हरिदत्त पालीवाल निर्भय तो सक्रिय रूप में क्रांतिकारियों के दल में थे, कई बार जेल गए, बहुत यातनाएँ सहीं।
यह सावरकर की प्रशस्ति में महाकाव्य लिखने वाले, गोडसे के भक्तों का कथित संस्कृत साहित्य है। मेरी राय में वह सत्साहित्य नहीं है। उन लोगों की चर्चा कर के मैं इस लेख को कलंकित नहीं करना चाहता। भारत में रह कर संस्कृत पढ कर यदि यह नहीं समझा कि इस देश की नियति गाँधी से बँधी और बनी है, और गोडसे जैसों ने अपनी नासमझी, मूर्खता और कठमुल्लापन के चलते उसका विनाश किया है, - तो न संस्कृत पढने सीखने का कोई अर्थ है, न संस्कृत में लिखने का।
गाँधी पर फुटकर रचनाएँ
ऊपर पुस्तकाकार प्रकाशित रचनाओं का ही प्रायः जिक्र किया गया है। उन्नीसवीं शताब्दी केउत्तरार्ध से बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक संस्कृत में चार सौ से अधिक पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक या अनियतकालीन पत्रिकाएँ निकलीं। इनमें स्वतंत्रता संग्राम को लेकर ढेरों रचनाएँ प्रकाशित हुईं। इनमें गाँधी को ले कर भी गद्य या पद्य में बहुत सी चनाएँ छपीं। इनका लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के लिये एक बडी कार्ययोजना अपेक्षित है।
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