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महात्मा गाँधी से सीख

सलेम नंजुदइयाह सुब्बाराव
हमेशा अपने विचारों, शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखें।
- महात्मा गाँधी
भारत सरकार का प्रकाशन विभाग जब गाँधी वांङ्मय छापने लगा, तो 101 मोटी-मोटी किताबें बनवाई। फिर भी और किताबें लिखी जा रही हैं।
मेरे जीवन में गाँधी का क्या प्रभाव पडा? मुझे एक बात स्वीकारनी है कि रामकृष्ण परमहंस-विवेकानंद के माध्यम से मैं गाँधी पर पहुँचा। 10-11 साल का था, तब मेरे दो बडे भाईयों के साथ रामकृष्ण वेदांता आश्रम जाने लगा 1940 के दिनों में बैंगलौर में। वहाँ मंदागेरे सुब्रह्नण्यम से परिचय हुआ। सुब्रह्नण्यम का परिवार गाँधी विचार से जुडा था और उनके घर में उन दिनों कोई 9-10 चरखे पडे थे, बडे चरखे, आज ऐसे छोटे पेटी वाले चरखे नहीं मिलते। उनका घर हमारे स्कूल के नजदीक था, तो दोपहर छुट्टी के समय वहाँ जाकर सूत कातने लगे। न चरखे का सिद्धांत जानते, न गाँधी जी के विचार को। चरखे से कता अपना काता सूत का कपडा बन गया और उसे पहनने में क्या आंनद।
वही खादी कपडा पहनकर 9 अगस्त 1942 की सुबह हमारे स्कूल के लडकों के साथ भारत छोडो यात्रा में चल रहा था, तो मेरी खादी प्रेम के कारण अंग्रेज पुलिस ने मुझे पकड ले गए।
अंग्रेज पुलिस के लॉकअप में बैठकर मैं सोचने लगा- किस अपराध के लिए मुझे गिरफ्तार किया? भारत माता की जय, वंदेमातरम् की उद्घोषणा के लिए। फिर मुझे कुछ करना है। बाहर आया, तो युवा संघठन से जुडा युवा फांउडेशन। लेकिन यूरोप की लडाई में सोवियत रशिया ब्रेहन के साथ जुडा, तो भारत में भी कम्युनिस्ट पार्टी व अंग्रेजों के साथ हो गया। फिर मैं राष्ट्र सेवादल में गया। बाद में कांगे*स सेवादल, फिर गाँधी शांति प्रतिष्ठान।
1970 से गाँधी शांति प्रतिष्ठान में हूँ। गाँधी जीवन के दो मुख्य संदेशः-
1. मेरा जीवन ही मेरा संदेश है
2. जो मैंने किया, कोई साधारण व्यक्ति कर सकता है।
जीवन संदेश का एक उज्ज्वल संदेश फेन्नर ब्रोकवे (Ferner Brokeway) जो एक ब्रिटिश संसद के सदस्य थे, फेन्नर गाँधी विचार के नजदीक इतने आए कि सफेद गाँधी टोपी पहनकर संसद जाते थे। वह टोपी अब भी लंदन के भारतीय विद्या भवन में रखी है।
30 जनवरी को लंदन में फेन्नर भारतीय विद्या भवन में बोलने लगे, दिन था गाँधी निर्वाण दिवस। शुरू किया, आप जानते हो गाँधीजी एक अद्भुत व्यक्ति थे। लोग उनकी ओर मुँह करके बैठे। एक बार मैं गाँधीजी के पास वर्धा गया, गाँधीजी चरखे पर सूत कातने बैठे थे। मैं भी उनकी तरफ देखते बैठा। मैंने उनसे पूछा, गाँधीजी ईसामसीह ने कहा है तुम्हारे दुश्मन को अपने ही जैसे प्यार करो। आपको कैसे लगता है? स्वभाव के अनुसार वे कुछ बोले नहीं। मैंने फिर से पूछा, बापूजी, मैंने आपसे एक सवाल पूछा है। ईसामसीह बोलते हैं तुम्हारे दुश्मन को अपने जैसे ही प्यार करो। आपकी प्रतिक्रिया क्या है?
गाँधीजी ने कताई रोकी, मेरी ओर देखा और कहा दुनिया में मेरा दुश्मन है ही नहीं। और हँसे। जिस अंग्रेजी साम्राज्य को उन्होंने समाप्त कर दिया, उन्होंने ही अपने संसद के सामने गाँधीजी की प्रतिमा खडी की है क्योंकि गाँधीजी अंग्रेजों से नहीं लडे। अन्याय, शोषण से लडे। अंग्रेज उनके दुश्मन नही थे।
आज महात्मा गाँधीजी के 150वाँ वर्षगाँठ का पर्व पूरे होते 2 अक्टूबर 2020 को हम सबके लिए कितना सुंदर संदेश। कब, कैसे हम सोच सकेंगे मेरा कोई दुश्मन है ही नहीं।
9th क्रॉस, 13वीं लेन, मेन रोड,
श्रीनगर, बैंगलोर-५६००५०
6.9.2020