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गाँधी : कर्म, विचार और दृष्टि

डॉ. बुलाकीदास कल्ला
अपने प्रयोजन में दृढ विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रुख को बदल सकता है।
- महात्मा गाँधी
जीवन में किसी के होने के बारे में जब सोचता हूँ, तो सर्वप्रथम इस जिज्ञासा का उदय होता है कि जीवन में किसी के होने का अर्थ क्या है? जीवन में किसी के होने का अर्थ क्या मात्र शारीरिक उपस्थिति से है? इस विषय पर विचार की प्रक्रिया में जब मैं और गहराई में उतरता हूँ तो प्रश्न उठता है कि होने से हमारा तात्पर्य क्या है? बापू आज सशरीर हमारे बीच नहीं है फिर भी उनकी पावन उपस्थिति चारों ओर है। यानी यह बात तय है कि किसी का होना या न होना केवल दैहिक उपस्थिति पर आश्रित नहीं है, क्योंकि देह तो नाशवान है। व्यक्ति का कर्तृत्व ही वह ऊर्जा है जो मूल्यों, दृष्टि और बोध के माध्यम से हमारे इर्द-गिर्द रूपान्तरित होती रहती है। मेरे अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि मेरे लिए किसी के होने का अर्थ वस्तुतः उसके कर्म, विचार और दृष्टि के होने से है। बापू का मेरे जीवन में होना इसी अर्थ में है। और यह इसलिए संभव है क्योंकि उनके कार्य और विचार मानवता का पथ प्रदर्शन करने में आज भी उतने ही सक्षम है जितने की उनके अपने समय में थे। इसीलिए गाँधी दृष्टि, विचार और मूल्य सभ्यता का विकल्प बनकर उभरे हैं।
मैं अपने निजी जीवन में गाँधी विचार को ऊर्जा का वह अक्षय स्रोत मानता हूँ जो मुझमें अपने जीवन ध्येय के प्रति निरन्तर सक्रियता, सजगता और समर्पण का प्रवाह भरती है। बापू का जीवन आदर्श मानवीय जीवन का जीवन्त उदाहरण है। उनके जीवन की प्रत्येक घटना हमें प्रेम, करुणा और मैत्री के आलोक से भर देती है।
मैं गाँधी विचार और पथ का अनन्य समर्थन इसलिए भी करता हूँ क्योंकि उनके द्वारा आचरित आवश्यक श्रद्धा, विश्वास और प्रेम की त्रयी मुझमें अनूठा संतोष और आनन्द भर देती है। उनके द्वारा सुझाया सत्याग्रह और आत्मबल मुझे रचनात्मक कार्यों के लिए आवश्यक मजबूती प्रदान करता है। आधुनिक जीवनशैली से उपजी विसंगतियों, जटिलताओं और तनावपूर्ण स्थितियों से निपटने में जितनी मदद मुझे गाँधी विचार और दृष्टि से मिलती है, किसी अन्य से नहीं।

मैंने गाँधीजी के जीवन से यह सीखा और समझा कि कैसे एक शांत व्यक्ति भरपूर विपत्ती में भी अपना संयम और संतुलन बनाए रख सकता है। मुझे याद आता है कि नारायण भाई देसाई ने बापू के बारे में लिखते हुए कहा गाँधीजी मन भर उपदेश देने के बजाए एक छटाँक आचरण को अधिक महत्त्व देते थे। कवि कुलगुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारतीय संस्कृति को मानवों का महासागर कहा था। जिस प्रकार सारी नदियाँ समुद्र में जाकर एक हो जाती है ठीक उसी प्रकार भारतीय संस्कृति में सभी धर्म, पंथ, विचार आदि अपने विविधताओं के बाद भी एकत्व में रूपान्तरित हो जाते हैं। यह जुडाव वस्तुतः भावनात्मक जुडाव है। यह गाँधीजी के प्रबल पुरुषार्थ का प्रताप ही था कि उन्होंने इतनी सारी विविधताओं वाले राष्ट को एक पुष्पमाला की भाँति एकता के सूत में पिरो लिया। इसी कारण सुभाषचन्द्र बोस ने उन्हें राष्ट्रपिता कहा।
मैं गाँधीजी के जीवन से इसलिए भी प्रेरणा प्राप्त करता हूँ कि मुझे वे विश्व राजनीति के परिदृश्य में इकलौते व्यक्तित्व के रूप में दिखायी देते है जिन्होंने अपनी अहिंसक व्यूह रचना के द्वारा बरतानिया हुकूमत, जिसके लिए कहा जाता था कि इनके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता, का सूर्य अस्त करने में जबरदस्त भूमिका निभाई। गाँधीजी ने अपने मन, वचन और कर्म की एकता के माध्यम से दुनिया के इतिहास के अध्याय बदल दिए और नयी इबारतें लिख दी। वंचित वर्ग के लिए आशाओं और उम्मीदों की एक ऐसी वर्णमाला हमें दी जिसमें जीवन का विराट वैभव खुल और खिल सके।
मेरे लिए मनुष्य होने का अर्थ है मननशील होना। जब हम मनन करते हैं, तो पाते हैं कि गाँधीजी की अहिंसा ने समस्त वर्गीय, जातीय भेदों के कारण उपजी संरचनात्मक हिंसा का बना-बनाया ढाँचा तोडने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। उन्होंने सदैव ही जोर देकर कहा कि आर्थिक और सामाजिक आजादी के बिना आजादी की लडाई अधूरी है।

मेरे जीवन में गाँधी इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मैं पाता हूँ कि उनकी सम्पूर्ण जीवनशैली और जीवनचर्या पारदर्शिता की अनन्य साधना है। उनका जीवन एक खुली किताब है। उनके द्वारा किए गए उपवासों से उनको कितना शारीरिक फायदा हुआ है या नहीं पर मनुष्यता का स्वास्थ्य अवश्य ही फला-फूला है।
मैं गाँधीजी को प्रकृति का साकार स्वरूप मानता हूँ। जिसका हर कण, कोना जीवन के लिए रसप्राण है। स्वतन्त्रता, समानता और विश्व बन्धुत्व की भावना से भरा उनका जीवन सदैव ही परमार्थ के लिए समर्पित रहा।
आज केवल हमारा देश ही नहीं वरन् सम्पूर्ण मनुष्य जाति महामारी के प्रकोप से पीडित है। ऐसे में मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि यदि हमारी सभ्यता गाँधीजी द्वारा सुझाए एकादश व्रत - जिसमें सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय, अस्पृश्यता-निवारण, परिश्रम, सर्वधर्म समभाव, स्वदेशी शामिल है, की राह पर चले, तो यह पृथ्वी चिरकाल तक सुरक्षित, संरक्षित और सुन्दर रूप में बनी रह सकती है।
गाँधी विचार हमारे समय के लिए इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वह हमें हीनग्रन्थि से मुक्त कर स्वधर्म के पथ पर पथारूढ करता है और हमारी संस्कृति को परिष्कृत और सुसंस्कृत बनाता है।
मेरी राय में गाँधीजी इतिहास के उन अनन्य नायकों में अग्रणी है जिनमें सम्पूर्ण समाज को अपनी पूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है। सारतः गाँधी विचार मेरे लिए साधना, तप, समझ और पुरुषार्थ का वह अक्षय और अजस्र स्रोत जिसकी ऊर्जा से अखिल मानवता ऊर्जवसित होती रही है और रहेगी भी ।
डॉ. बुलाकीदास कल्ला
कला, साहित्य एवं सस्कृति मंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर