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गाँधी : साधारण का सौन्दर्य

ब्रजरतन जोशी
विश्व राजनीति के इतिहास और मानचित्र पर भारत इकलौता ऐसा राष्ट्र है जिसने अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता शस्त्रशक्ति के बल पर नहीं वरन् आत्मशक्ति और संयम से प्राप्त की है। संयम, प्रेम और अहिंसा के इस अद्वितीय प्रयोग ने एक नया इतिहास रच दिया।
गाँधी इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं हैं कि उन्होंने आजादी की लडाई का नेतृत्व किया, बल्कि उनकी महत्ता इसमें है कि उन्होंने इस लडाई में संस्कृति के आन्तरिक मूल्यों का आदर्श उपयोग किया। इसके लिए उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह को स्वीकारा। देशाटन किया। संस्कृति को जाना। जाँचा और समझा। इस प्रक्रिया में उन्होंने यह भली-भाँति जान लिया था कि तत्कालीन भारतीय समाज दुर्बलताओं के पाश में हैं। ये दुर्बलताएँ सामाजिक भेदभाव, रुढिवादिता, निर्धनता,धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ आत्मभीरूता के रूप में हमारी स्वतन्त्रता के पथ में बाधा है।
गौर से देखेंगे, तो पता लगेगा कि गाँधी के राजनीतिक आन्दोलनों ने केवल राजनीतिक क्रांति का माहौल तैयार नहीं किया, बल्कि उन्होंने एक साथ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्रांतियों के द्वारा भारतीय मानस को परिवर्तित, परिमार्जित करने की एक गंभीर और सार्थक पहल की। सामान्यतः हम उनके नेतृत्व में हुए राजनीतिक आन्दोलनों की ही चर्चा करते हैं, पर उनके द्वारा समाज के मानस को परिवर्तित करने के लिए, खासकर सवर्णों के मानस परिवर्तन के लिए किए उनके अनशन और कार्यों की तरफ हम कम गौर करते हैं। देखा जाए, तो एक सुदीर्घ अवधि के बाद भारतीय चित्त के रोगों का निदान कोई योग्य नाडी वैद्य कर रहा था। वे एक ऐेसे सजग, सक्रिय और ज्ञानवान वैद्य थे जिन्होंने अस्वस्थ भारत की नब्ज पर न केवल हाथ ही रखा, बल्कि उसके रोग के कारणों की तह में जाकर निराकरण की महत्त्वपूर्ण कोशिशि की। क्योंकि उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक इस देश में अस्पृश्यता है, हम लोगा स्वराज प्राप्ति के लायक ही नहीं हैं। उनकी दृढ मान्यता थी कि अस्पृश्यता उन्मूलन स्वराज का प्रथम पायदान है।
एक विशेष और गौर करनेवाली बात यह भी थी कि भारत की तत्कालीन स्थितियों, परिस्थितियों पर अपने समकालीनों से भिन्न राय रखते हुए भी गाँधी ने समाज की बीमारी के निराकरण हेतु मौलिक उपाय सामने रखे। उन्होंने सदैव ही असहमति का मान रखा और अपने विचार की यात्रा को भी प्रभावित नहीं होने दिया। वे तो सदैव ही कहते थे कि मैं नौसिखिया हूँ। इसलिए हम पाते हैं कि उनकी विचार यात्रा सदैव स्थिर अथवा अपने आप में पूर्ण होने का दंभपूर्ण दावा नहीं करती है।
जनभागीदारी के लिए उनके द्वारा चयन किए प्रतीकों और वस्तुओं का चयन अपने आप में नायाब था। उदाहरण के लिए वे एक ऐसे प्रज्ञावान विचारक थे कि जिन्होंने एक मुठ्ठीभर नमक से देश की आम-आवाम के मन में व्याप्त भय को न केवल दूर ही किया, बल्कि एक सही राह भी सुझायी। अपनी सही और उचित बात कहने का साहस भरनेवाले वे तत्कालीन राजनीतिज्ञों में इकलौते ही थे। नमक जैसी रोजमर्रा वस्तु का उपयोग करते हुए उन्होंने सहजता से ही मानस क्रांति के बीज बो दिए। यह उनकी अभेद दृष्टि का ही कमाल था कि सारी जनता को यह भली-भाँति समझ में आ गया कि नमक और सत्याग्रह का मेल क्या है? उन्हें इसकी व्याख्या नहीं करनी पडी। इसी तरह पैदल चलना, चरखा,खादी अन्तरात्मा की आवाज सुनना उनके द्वारा किए गए ऐसे अभूतपूर्व प्रयोग थे जो सदियों से दिग्भ्रमित हो गए जीवन को पुनः उसकी राह में लौटाने में अहम भूमिका निभा रहे थे। यानी गाँधी का चयन सामान्य, सरल और दैनिक जीवन से जुडा था। हम कह सकते हैं कि वे अस्तित्व के विभिन्न आयामों के साथ कईं मोर्चों पर अपने परिपक्व विवेक और संयम के साथ संघर्ष कर रहे थे और उनके इन्हीं प्रयोगों ने उन्हें विश्व राजनीति के मंच पर एक अद्भुत नायक के रूप में स्थापित कर दिया।
गाँधी के महानायक बनने में अहिंसा की भूमिका सर्वोपरि है। अपनी आत्मकथा में स्वयं बापू ने लिखा है सत्य का पूर्ण भास अहिंसा के पूर्ण साक्षात्कार से ही संभव है। अर्थात् गाँधी के लिए सत्य और अहिंसा दो भिन्न मानवीय मूल्य नहीं हैं। उनके लिए तो वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उनकी अहिंसा में असहमति और विरोध के लिए भी पर्याप्त जगह है। गाँधी अहिंसा का चुनाव केवल स्वतंत्रता संग्राम के लिए नहीं कर रहे थे वरन् उनका लक्ष्य था पाश्विक और पतनशील होती जा रही मानवता की राह में आ रही बाधाओं को दूर करना।
ऐसा जान पडता है कि गाँधी में इतिहास की समझ बहुत ही जबरदस्त थी। वे भली-भाँति जानते थे कि विगत दो शताब्दियों में घटित महान क्रांतियों की विफलता के कारण क्या थे? उन्होंने हिंसक क्रातियों की असफलताओं से अपनी इस समझ को और मजबूत बनाया कि हिंसा की पूर्णाहुति हिंसा ही है। यानी हिंसा से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान सम्भव नहीं है। उनकी दृष्टि दीर्घकालिक थी। वे तात्कालिकता के आग्रह को नहीं स्वीकार करते। उनका सारा जोर किसी भी समस्या के स्थायी, दीर्घकालिक और सात्विक समाधान की तरफ था। इसके अतिरिक्त उनके अहिंसकीय विवेक के निर्माण में हमारी सुदीर्घ परम्परा का प्रभाव भी था।
यहाँ इस प्रश्न का उठना लाजिमी है कि जब सुदीर्घ परम्परा, ठोस आधार पर अहिंसा इस देश और समाज में पनपी, तो आज ये मूल्य कारगर क्यों नहीं हैं? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि दरअस्ल आज सभ्यता होने और दिखने के द्वंद्व के बीच है। गाँधी की अहिंसा एवं उनके द्वारा अपनायी गयी जीवनशैली से स्वयं उनमें एक विशिष्ट आत्मबोध का विकास हुआ है। यह आत्मबोध उन्हें द्वंद्व रहित, कथनी और करनी की एकता, पाखण्ड से दूर साधारण के सौन्दर्य से विभूषित करता है। क्योंकि उस समय जीवन की गति आज की जितनी तीव्र नहीं थी। गाँधी दृष्टि का धीमेपन के साथ विशेष सम्बन्ध रहा है। गाँधी की मान्यता थी कि धैर्य इस संस्कृति का धरम रहा है। इसलिए हमें अपने धर्म से नहीं डीगना चाहिए। इसके उलट आज के देश और समाज में स्व की स्थिति बडी ही भयावह है। आज व्यक्ति के पास स्व के लिए समय ही नहीं है, तो वह अपने देश और संस्कृति के लिए कैसे और किस तरह से विचार कर सकता है। इसलिए गाँधी के मूल्य आज कम प्रभावी है।
यहाँ यह तथ्य भी गौर किया जाना न्यायसंगत होगा कि हमने एक ऐसी जीवनशैली को अपना लिया है कि जिसके कारण किसी भी प्रकार के विचार, दृष्टि और मूल्यों को फलित होने का अवसर ही नहीं मिल रहा है। यह प्रतिस्पर्धा का युग है। हम तो बस साधने में जुटे हैं। याद रखें साधना और फलित होना दो भिन्न क्रियाएँ हैं। हमें इस अंतर को अच्छी तरह जानना और समझना होगा। अगर देश और समाज गाँधी की सुझायी राह पर आगे बढेंगे, तो जीवन में सत्य और अहिंसा का उदय स्वयंमेव ही होगा, हमें उसके लिए अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होगी। हम स्वाभाविक रूप से उन मूल्यों, विचारों और दृष्टि को अपने जीवन में फलता-फूलता पाएँगें।
हमारे जीवन में गाँधी का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि वे कोई कागजी-किताबी सिद्धान्त नहीं गढते, बल्कि उनका प्रत्येक कर्म एक अनूठे प्रयोग की अपनी तरह की दास्तां है। बापू को भारत की जनता ने जो बेशुमार प्रेम और सम्मान दिया, उसके मूल में कथनी और करनी की एकता थी। बापू के बोले शब्द उस समय ही नहीं, आज भी उतने बलशाली हैं।
मेरी नजर में महात्मा गाँधी अकेले ऐसे राजनेता रहे हैं जो हमारी संस्कृति की आन्तरिक ताकत को भली-भाँति जानते थे। लोगों के दिमाग में यह बात थी कि यह जो बोलेगा, वही करेगा। जो बोलेगा, दिल से बोलेगा, जो करेगा, दिल से करेगा। इसलिए उनके चरित्र, भाषा और व्यवहार में हम तो क्या उनके आलोचक भी ढूँढकर भी किसी भी प्रकार का दोहरापन नहीं दिखा पाते हैं।
जब बापू से पूछा गया कि आपका संदेश क्या है? तो यह पूज्य बापू ही थे जो कहते थे कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। अद्भुत व्यक्तित्व के धनी, राष्ट्रपिता की पदवी प्राप्त एक विराट व्यक्तित्व ही ऐसा कह सकता है। गौर कीजिए उन्होंने कोई पंथ, संप्रदाय आदि का सहारा भी नहीं लिया और थोथे उपदेश तो बिल्कुल भी नहीं दिए। उनका कहा, बोला और लिखा केवल भारत या उसकी आजादी सें संबंधित नहीं था, बल्कि वे तो सम्पूर्ण मनुष्य जाति के लिए, उसकी पीडाओं से मुक्ति के लिए लड रहे थे। वे गरीबी, पश्चिम से प्रभावी जीवन शैली और शोषण के विरूद्ध थे। सरलता, सादगी और सच्चाई के साथ संवेदनशीलता से रसा-पगा उनका व्यक्तित्व मनुष्य मात्र को स्वतः ही आकर्षित करता है। उनका सम्पूर्ण जीवन अन्याय के विरूद्ध किए संघर्ष की एक बेमिसाल कहानी है। वे तो मनुष्य की मुक्ति का महायज्ञ कर रहे थे। उनका कर्तृत्व मानव मात्र के लिए था।
आज के हालात में हमें पूज्य बाबू से यह सीख ग्रहण करनी है कि दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें। यानी हमें अपने आप पर विजय पानी है। हमें आधुनिक जीवन शैली के कारण जीवन में आए श्रम और बुद्धि के बीच के अलगाव की पहचान करनी है और खुद को इस हेतु परिपक्व बनाना है, ताकि हम सब सामुदायिक आरोग्य की राह पर आगे बढ सके।
पूज्य बापू ने सदाचार को महत्त्व देकर मानवता को आरोग्य के पथ पर पथारूढ करने की गंभीर पहल की थी। आज की परिस्थिति में हमें बापू के जीवन से यह सीख लेते हुए आगे बढना है कि शांत और संयमित रहकर हम विषम से विषम परिस्थिति का सामना करने में सफल और समर्थ हो सकते हैं।
इस समय पूरा देश ही नहीं वरन् मनुष्य जाति एक महामारी कोरोना संकट से जूझ रही है। हमें मानवता में विश्वास रखते हुए आगे बढना है। हमारी पूरी कोशिश यह होनी चाहिए कि समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ न्याय और समानतापूर्ण व्यवहार हो।
मेरे लिहाज से यह धरती पर गाँधी को समझने, जानने और अपनाने के लिए सर्वाधिक अनुकूल समय है। हम सबको एकमत होकर बापू के बताए मार्ग पर आगे बढना चाहिए।
मधुमती का यह गाँधी आज विशेषांक आप सब के समक्ष प्रस्तुत करते हुए आपार प्रसन्नता है। यह अंक चार खण्डों में है जो क्रमशः मेरे जीवन में गाँधी, गाँधी भाषा और साहित्य, गाँधी आज और गाँधी स्मरण शीर्षकों में है। इस सामग्री में दो महत्त्वपूर्ण व्याख्यान और मधुमती द्वारा सुझाए विषयों पर परिदृश्य के समर्थ विद्वानों के बीस लेख और एक अनुवाद शामिल है। यह अंक राष्ट्रपिता गाँधी को समर्पित है।
शुभकामनाओं के साथ-
- ब्रजरतन जोशी