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हिंदी सिनेमा का विवेचनात्मक कोलाज है सिनेमागोई

गोपाल सिंह चौहान
हिन्दी फिल्म जगत में पिछले कुछ सालों से साहित्यिक हस्तक्षेप चौंकाने वाला रहा है। अचानक ही फिल्मी सितारों से लेकर निर्देशकों पर लिखी जाने वाली किताबें धडाधड बाजार में आने लगी हैं। यह बात दीगर है कि अधिकांश किताबें अंग्रेजी में ही आ रही हैं, मगर हिन्दी अनुवाद भी पाठकों को आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं। रोचक बात यह है कि फिल्मी सितारे खुद किताबें लिख रहे हैं और उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के बहुत सारे अनछुए किस्से उनके प्रशंसकों तक पहुँच रहे हैं। फिल्मों में स्क्रिप्ट और गीत के इतर यह नया नेरेटिव सिनेमाजगत में वैचारिक बोध की जडों को और मजबूत करेगा। नसीरूद्दीन शाह की किताब एंड देन वन डे इस कडी का महत्त्वपूर्ण और गम्भीर उदाहरण है।
आज से लगभग पन्द्रह साल पहले दिल्ली की एक पुरानी किताबों की दुकान में मेरी नजर रिचर्ड एटनबरो की किताब इन सर्च ऑफ गाँधी पर पडी। इस किताब में रिचर्ड एटनबरो की कालजयी फिल्म गाँधी से जुडी बीस वर्ष की यात्रा का बेहद खूबसूरत चित्रण है। बॉलीवुड में ऐसा ही प्रयास राकेश बक्शी ने अपनी पुस्तक डायरेक्टर्स डायरीज के माध्यम से किया है, मगर वो सिर्फ हिन्दी सिनेमा के कुछ जाने पहचाने निर्देशकों के जीवन संघर्षों की कहानी तक सिमटा है। दूसरी तरफ फिल्म समीक्षाओं के स्तर पर भी हिंदी साहित्य जगत में कुछ खास चहल-पहल नहीं है। जयप्रकाश चौकसे पिछले कई सालों से जिस स्तर पर हिन्दी के पाठकों को फिल्मी जगत की दुनिया से रूबरू करवा रहे हैं, वह एक बेजोड प्रयास है।
साहित्य में फिल्म समीक्षा या सिनेमा का गम्भीर विवेचन अपने होने के लिए भले ही संघर्ष कर रहा हो, मगर कभी-कभी साधारण से दिखने वाले प्रयास आपको चौंका देते हैं। अभी हाल ही में सर्जना प्रकाशन से युवा लेखक नवलकिशोर व्यास की पुस्तक सिनेमागोई ने हिन्दी साहित्य जगत के अलावा सिनेमा संसार के किस्से-कहानियों में रूचि रखने वाले रसिकों के एक लम्बे इंतजार को विराम दिया है। कवि एवं लेखक यतीन्द्र मिश्र इस पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि हिन्दी सिनेमा के परिसर में आवाजाही करने वाली नवलकिशोर व्यास की किताब ‘सिनेमागोई’ एक ऐसा आत्मीय-पाठ है, जिससे गुजरकर हम सिनेमा के किरदारों, उनकी कहानियों और उन किस्सों के पीछे चलने वाली सुनहरी यादों के मुखातिब होते हैं।
दरअस्ल हिन्दी सिनेमा लार्जर देन लाईफ जैसा एक कैनवास है जिसमें ना जाने कितने रंग अपनी-अपनी सतहों को खुद ढूँढ कर उनसे चिपक गये हैं। यह कैनवास वक्त के साथ बढता रहता है और नये रंग जुडते रहते हैं। नवल ने सिनेमागोई के माध्यम से इस विशाल कैनवास के कुछ चित्रों एवं चरित्रों की कहानियों को किस्सागोई के बहाने 3डी इफैक्ट की तरह हमारे सामने रखा है कि पाठक उन फिल्मी कहानियों और किरदारों को हर एंगल से गहरे समझ सके।
पाँच खण्डों के पैतालीस आलेखों में बुनी इस कृति सिनेमागोई का सफर गीत-विवेचन से शुरू होता है जिसमें लेखक उन सात गीतों का ऐसा अलहदा विवेचन हमारे सामने प्रस्तुत करता है जैसे लेखक के अन्तर्मन का एक जमीनी हिस्सा इन गीतों से धूप, पानी और खाद लेता हो। पाठक किताब के इस हिस्से को पढते हुए यह महसूस करने को मजबूर-सा हो जाता है कि गीत सिर्फ सुनने का अनुभव नहीं बल्कि गीत के रचाव की समस्त ऊर्जा किसी कॉस्मिक इंटरवेंशन से ही उपजती है। ऐसा हर गीत-संगीत के साथ नहीं घटता, बल्कि बहुत रेयर सीमेट्री से ही संभव हो पाता है। कुछ ना कहो-पंचम का विदा गीत शीर्षक वाले लेख में नवल इस सीमेट्री की बात कुछ यूँ करते हैं -
कुछ ना कहो आरडी के सारे संगीत पर चमकता-दमकता एक ऐसा ही कोहिनूर है। ये गीत दुनियवी नहीं, आसमानी है। प्यार पंख लगा कर आसमान में पहुँचा है, तभी तो सब कुछ तेजोमय है, एकांत में, संसार भर की तमाम चिंताओं से दूर है-क्यारी, सीढियाँ, मोती, झूला घर, लैंडस्केप सब कुछ दिव्य। आमसानी पल, आसमानी सब।
इसी अध्याय में गायक हेमंत कुमार, गीतकार साहिर लुधियानवी, जावेद अख्तर, संगीतकार मदन मोहन के रूहानी गीतों का ऐसा इमोशनल डेलीब्रेशन है जिसको पढते हुए पाठक गीत-संगीत को बियोंड क्रियेटीविटी का आसमानी मेनिफेस्टेशन समझने लगता है। इस पुस्तक को पढते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि लेखक अति भावुकता में अपने हर लेख में कुछ ना कुछ रूहानियत ढूँढ ही लेता है। तुम पुकार लो गाने की चर्चा करते हुए नवल ऐसा ही एक ओवर इमोशनल स्टेटमेंट दे जाते हैं-
हेमंत कुमार की आवाज हिन्दी सिनेमा की सबसे अलग आवाज होगी। उनका गला पवित्रता लिए था।
हालांकि यह लेखक की पसंद-नापसंद का व्यक्तिगत मामला है, मगर फिर भी ऐसे स्टेटमेंट अंडरलाईन किये जाते हैं। स्व से बहु के कम्युनिकेशन में अक्सर यह समस्या कई लेखकों को आती है। इस युवा लेखक की पहली किताब एक तरह से बेनिफिट ऑफ डाउट की हकदार है। इस पुस्तक की इस पृष्ठभूमि को जानना पाठकों के लिए जरूरी होगा कि नवल ने ये लेख एक अखबार के लिए नियमित रूप से लिखे थे और इन्हीं लेखों को संपादित कर सिनेमागोई की शक्ल में हमारे सामने लाया गया है। समाचार पत्रों में कला और साहित्य के लेखों को सामान्य से भी कम जगह मिलती है। इस वजह से शायद इन्हें विस्तार नहीं दिया गया हो, पर किताब के संपादन में इस कमी को पूरा किया जाना चाहिए था। किस्सागोई वाले अध्याय में नसीर-ओम का लेख और अधिक विस्तार की माँग करता है। ओम पुरी और नसीरूदीन शाह की दोस्ती के लंबे और उतार-चढाव वाले सफर को इतना सरसरी तौर पर कह के निकल जाना अखरता है।
पुस्तक का दूसरा अध्याय किरदार कई मामलों में अनूठा है। यहाँ आपको लेखक संजय लीला भंसाली, अनुराग कश्यप, गुरूदत्त, रस्किन बौंड, विशाल भारद्वाज, पंकज कपूर, पीयूष मिश्रा, इम्तियाज अली, अमिताभ बच्चन, ऋषिकेष मुखर्जी, राजेश खन्ना, कंगना रानावत, साहिर लुधियानवी और लक्की अली जैसे दिग्गजों को एक फ्रेश और विवेचनात्मक कोलाज में प्रस्तुत करता है। लेखक ने बहुत ही सावधानी और संवेदनशील होकर इन किरदारों के उस सिनेमा को चुना जो भले ही पॉपुलर न बन पाए हो मगर सिनेमा के सौंदर्य की पराकाष्ठा को छू जाते हैं। लेखक फ्रेम-दर-फ्रेम इन किरदारों को ऐसे पढ रहा है, जैसे थियेटर के सामूहिक एकांत में वह इन सबसे आत्मिक साक्षात्कार कर रहा हो। लेखक जब पद्मावत, गुलाल, तनु वेड्स मनु और जब वी मेट जैसी हिट फिल्मों के बरक्स महज नौ मिनट लंबी शॉर्ट फिल्म महरूनी का बेहतरीन विश्लेषण करता है तो एक तरह से वह सिनेमा की पूरी प्रक्रिया से फ्रेम, टाईम और स्पेस के डिस्टेंस को खत्म करता हुआ मौन को स्थापित करता है जहाँ हिट और फ्लॉप का निर्धारण करने वाले सारे दुनियावी मापदंड भरभराकर गिर जाते हैं। सिनेमा जगत की सारी फिल्में इस धरातल पर एक दूसरे की नियति में तब्दील होती प्रतीत होती है। ब्लू अम्ब्रेला फिल्म का यह डायलॉग इस संदर्भ में बडा मौजूँ प्रतीत होता है जिसे इस पुस्तक में भी शामिल किया गया है -
-चाचा, छाता लेकर कोई फायदा होगा क्या?
इंद्रधनुष को देखकर कोई फायदा होता है क्या?....पानी में ये छोटी-सी कागज की नाव चलाकर कोई फायदा होता है क्या?....वो पहाडी के पीछे सूरज को डूबते देखने से कोई फायदा होता है क्या?.....ओ तेरे जैसे निखट्टू को काम पे रख के कोई फायदा होता है क्या?....आत्मा की शान्ति में नफा नुकसान हीं देखा जाता...
हिट और फ्लॉप से इतर फिल्मकारों की अपनी निजी आवाज और अनोखे कला व्यक्तित्व को लेखक ने जिस तरह रेस्पोंसिव दृष्टि से पहचाना उसकी प्रमुख वजह लेखक का स्वयं थियेटर कलाकार होना है। ऐसी भाषा और विचार दृष्टि अन्यथा दुर्लभ है। नवल व्यास ने स्वयं कई नाटकों के अलावा एड फिल्मों में अभिनय किया है और हाल ही में अमिताभ बच्चन के साथ उनका एक विज्ञापन भी खूब सुर्खयिाँ बटोर रहा है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि लेखक बहुत महीन छलनी से सिनेमा के विभिन्न अदाकारों, उसके संगीत जगत और उनसे कनेक्टेड समस्त रूपकों को अपनी लेखनी से छानते हुए हमारे सामने कुछ इस कदर प्रस्तुत कर रहा है जैसे वह स्वयं इन किस्सों का जरूरी हिस्सा हो। सिनेमा के आर्ग्यूमेंट्स को पाठकों के सामने सिर्फ लेखक की हैसियत से रखना एक कठिन कार्य है मगर नवल के लिए यह इसिलिए आसान बन पाया क्योंकि वे स्वयं रंगमंच के उम्दा कलाकार हैं।
पुस्तक में तीन और अध्याय क्रमशः किस्सागोई, फिल्में और अभिनेता तथा विविध शीर्षक से मौजूद हैं। 144 पृष्ठ में लेखक के पास फिल्मी किस्सों के अलावा भी कहने को बहुत कुछ है। सभी शीर्षक बहुत रोचक हैं और पाठक का ध्यान खींचते हैं। किताब में जितने विषयों को लेखक ने छुआ है उनको पढते हुए पाठक हिन्दी सिनेमा जगत का एक फ्लैशबैक अपने जहन में जरूर महसूस करेगा। बहुत पाठकों के लिए यह एक नोस्टेलजिक अनुभव भी हो सकता है, क्योंकि लेखक स्वयं इस नोस्टेल्जिया को कई दफा रेखांकित भी करता है-
हम सन् 80 के बाद पैदा हुए लडकों का ताजा-ताजा उगा सयानापन युवा लकी में दर्ज है। लकी अली हमारी नाइनटीज के जादुई इंडियन पॉप का वो दिलकश मोह है जो हमसे कभी छूटता नहीं। लकी अली के बहाने हम थोडे-थोडे अभी भी नाइनटीज की दहलीज से चिफ पसरे हुए पडे हैं।
आधुनिक भारत के समस्त विमर्शों में स्त्रियाँ केन्द्र में रही हैं, मगर इस पुस्तक में लेखक से यह एक गम्भीर भूल हुई है। पैंतालीस लेखों में से महज कुछ पन्नों पर गायिका रेखा भारद्वाज, अभिनेत्री मनीषा कोईराला, आशा भोंसले, लता मंगेशकर और कंगना रानावत का एक दो बार नाम आता है। तनु वेड्स मनु के बहाने कंगना रानावत के अभिनय पर थोडी चर्चा जरूर मिलेगी मगर इसके अलावा सिनेमागोई में अभिनेत्रियों या गायिकाओं के संघर्ष और उनकी सफलताओं के किस्सों का सन्नाटा सा है। हिन्दी सिनेमा में ऐसी बहुत सारी अभिनेत्रियाँ हुईं हैं जिनका पूरा दौर फिल्म के हिट होने की गारंटी में गुजरा है। सिनेमागोई मीना कुमारी, शमशाद बेगम, हेमा मालिनी, मधुबाला, वैजयंतिमाला, माधुरी दीक्षित, तब्बू, शबाना आजमी जैसी अनेक फिल्मी हस्तियों के बिना अधूरी-सी जान पडती है।
पुस्तक में हिन्दी फिल्मों में स्त्री की महत्ता का रेखांकन भले ही अनचाहे छूट गया है, पर कवर पेज के रेखांकन चुनते वक्त प्रकाशक की ओर से अनायास ही इसकी भरपाई भी कर दी गई है। युवा चित्रकार अपरा का जीवंत रेखांकन पुस्तक की आत्मा से एकाकार होता दिखाई देता है।
उम्मीद है लेखक अगले संस्करण में किताब में हिन्दी व्याकरण की त्रुटियों को भी दूर करेगें और पुस्तक को गहरा और गंभीर अटेंशन देने के पश्चात बाजार में उतारेंगे। बकौल यतीन्द्र मिश्र यह किताब सिनेमा प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस भाषा और संस्कृति प्रेमी के लिए एक जरूरी दस्तावेज है, जो सिनेमा को समाज का एक बडा प्रतिबिम्ब मानते हैं। ऐसी सुविचारित और सार्थक कृति के लिए रचनाकार और प्रकाशक का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ कि हम सिनेमागोई के बहाने कुछ बेहतर पढ पा रहे हैं।

पुस्तक का नाम : सिनेमागोई
लेखक : नवलकिशोर व्यास
प्रकाशक : सर्जना प्रकाान, बीकानेर
प्रकाशन वर्ष : 2020
मूल्य : 120
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सम्पर्क : उस्ताबारी के अन्दर,
बीकानेर- 334004