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कविताएँ

देवेश पथ सारिया
1. साइकिल सवार हम साइकिल सवार हैं
हम पहिये से राब्ता रखते हैं
उसके आविष्कार की मूल भावना के साथ
किसी ईंधन ने अभी नहीं लिया है
पहिये के उत्साह का स्थान हमारे ह्रदय में

हमसे कहा गया था
कि रास्ते पर हमारा दूसरा हक है
पैदल चलने वालों के बाद
फिर भी सडक की पेचीदा गुत्थम ग्रंथियों में
पहले और दूसरे हक की वरीयता को कर दरकिनार
हमें माना गया कुचल दिये जाने लायक
जैसे अभयारण्यों में छीन लिया जाता है
अभय घूमने का हक वन्यजीवों से
पर्यटकों से भरी जिप्सियों के द्वारा

हम साइकिल सवार हैं
हमारे पैरों को रटा होता है
रास्ते पर चढाई और ढलान का मानचित्र
कब बचानी है ऊर्जा
कब चलानी है साइकिल एक रौ में, समतल सडक पर
कब पिंडलियों पर जोर लगाना है
एक गणित जिससे मोटर और स्कूटर वाले
कभी बावस्ता नहीं हो पाते

हम साइकिल सवार हैं
वाहनों के साथ हम चलते हैं
सबसे बाँयें
या (देशांतर में) सबसे दाँये सडक पर
पर्यावरण बचाने को वाहनों से पीछे छूट जाते हुए
इतनी-सी रियायत मिलती है हमें
या हम खुद ले लेते हैं
कि सडक पार करते समय
दुपहिया वाहनों के लिए बत्ती हरी होने से कुछ सेकंड पहले
जेब्रा क्रॉसिंग की बत्ती हरी होने पर
पैदल सवारों के साथ कर लेते हैं पार सडक
कभी-कभी
साइकल की सीट से उतरे बिना भी

हम साइकिल सवार हैं
हमारे भीतर स्कूली बच्चा
और पहिया बनाने वाला आदिम मनुष्य
अब भी हिलोरें मारता है
2. रचनाकार अपरिपक्व मरता है

खंगाले, सँभाले जाने चाहिए
एक ताजा मरे कवि की
अधूरी कविताओं के ड्राफ्ट

आवश्यक नहीं
कि वे सारी कविताएँ लिखी गई हों
जीवन के अंतिम वर्षों में ही
कुछ अटकी रही होंगी बरसों बरस
बाट जोहती नदी के कलकल प्रवाह की
और कवि करता रहा होगा प्रतीक्षा
विचार के उस प्रस्थान बिंदु की
जहाँ वह कविता के चरम पर संतुष्ट हो सके
हाय कि जीवन छोटा पड गया
उन वांछित अनुभवों के लिए

अधपकी रचनाएँ बताएँगी
हर रचनाकार
कुछ अपरिपक्व ही मर जाता है
अतृप्त उडती है कवि की आत्मा

अंत्येष्टि के फौरन बाद
श्रद्धांजलि सभा की जगह
ढूँढों अधूरी कविताओं की
उस डायरी या कंप्यूटर के फोल्डर को

वे कविताएँ नक्शा हैं
उन कोनों-कुजारों का
जहाँ नहीं पहुँच पाया
अरबों वर्ष पुराना सूर्य
जहाँ पहुँचना चाहता था
कुछ दशक जिया कवि
3. चाबी

अमूर्त इतना था
सम्पूर्ण परिदृश्य
कि छायाओं के अगल-बगल छायाएँ
छायाओं के ऊपर और नीचे छायाएँ
बना रही थीं आकृतियाँ

अलग-अलग शेड थे
स्याह रंग के

बंद थे कोटरों में
शहर के सब लोग

फिर एक रात
अंधेरे सींखचों से हाथ बाहर पसार
अमूर्त अंधकार के किरदारों ने
एक-दूसरे से चाबी माँगी

4. पत्ती

पसीने में तरबतर
मैं *ोबरा क्रासिंग पार करने को खडा था
पंद्रह सेकंड के लिए हरी होने वाली
बत्ती की प्रतीक्षा में

अचानक एक पत्ती
सिक्के की तरह हवा में करवटें बदलती
मुझ पर आ गिरी

उस पत्ती ने पोंछ दिया कुछ पसीना
उसके स्पर्श से दौड गयी एक सिरहन
मिल गयी ठंडक
त्वचा के उस हिस्से
और मन के हर कोने को
ताजा गिरी उस पत्ती में
शेष था हरापन
अभी उसे पेड पर कुछ समय और रहना था

पत्ती
जिसने अपना संभावित शेष जीवन
(चाहे वह कुछ घंटे या कुछ दिन ही रहा हो)
मुझे ठंडक देने पर लुटा दिया

*ोबरा क्रासिंग पर खडे
तरबतर मन वाले
इस राहगीर ने
पत्ती को देवदूत कहा
पेड को ईश्वर


5. सतरंगी धोखे

हम जैसी मटमैली मछलियाँ
ना तीन में, ना तेरह में
हाँ, तुम ही वह मछली हो
खूबसूरत, प्यारी-सी
तुम्हारा स्वागत है, कीमत है
इस छोटे मछलीघर में

तुम जब मुँह खोलती हो
सतरंगी रंग छोडती हो
तुम्हारी आभा चौकाती है
मत्दस्यदल को नतमस्तक किए जाती है

मनमौजी तुम्हें नहीं सुहाते
तुम्हें सलाम जो नहीं बजाते

यह जो आभा है तुम्हारी
एक आवरण है
ढकता है जो तुम्हारे
निपट मटमैले मन को

सतरंगी प्रकाश जहरीला है
लील रहा इहलीला है
तुम हौले-हौले मछलीघर की
प्राणवायु को चूस रही हो

तुम्हारे हाथों धीमी मौत मरती
उज्ज्वल मन, मटमैले तन की
ये मछलियाँ मछलीघर की
अब भी तुम पर फिदा हैं

***

सम्पर्क - श्रीमती सरोज शर्मा,
माडा योजना छात्रावास, पोस्ट ऑफिस के पास, राजगढ (अलवर) राजस्थान, ३०१४०८
मो. ८८६९७८०६४९३०