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तीन कविताएँ

राजेन्द्र उपाध्याय
सीढियाँ रहीं हैं घर में शुरू से
सीढियों का रिश्ता है घर से शुरू से
सीढियाँ रहीं हैं जैसे रही हैं पीढियाँ
सीढियाँ रहीं है जैसे रही हैं नाडियाँ शरीर में

दादा के पास थी लकडी की सीढी
जिस पर चढकर वे जाते थे कवेलू फेरने
बारिश से पहले

दादी पूछती थी क्या सब्जी बनेगी आज
घर में तो कोई सब्जी नहीं है
तो दादा उस सीढी पर चढकर जाते थे छत पर
जहाँ से वे बडे-बडे कददू उतार लाते थे।

मैं जान नहीं पाता था
रात को कौन आकर छत पर उनको रख जाता था ?

सीढियों पर चढकर जाता था मोर को देखने
जामुन पर चढने के लिए भी वो काम आती थी।

नाना अक्सर उस सीढी से चढते थे झंडा फहराने
पर कभी-कभी कुएँ की सफाई करने उतरते भी थे उससे
दादा और नाना सोने की सीढियों का सपना देखते थे
और स्वर्ग तक सीढी बनाने वाले रावण की कहानियाँ


सुनाते थे
सीढियाँ रही हैं दादा के घर में
सीढियाँ रही हैं दादी के घर में
सीढियाँ रही हैं नाना के घर में
सीढियाँ रही हैं नानी के घर में

लकडी की सीढी चली गई
दादा दादी नाना नानी के साथ
लोहे की सीढी आ गई मामा मामी चाचा चाची के पास

मेरे पास कोई सीढी नहीं
जिससे मैं उम्र की सीढियाँ चढूँ
या उतरू।

एक कुएँ के अंधेरे में उतरना है अब
बगैर सीढी के
वहाँ से वापस नहीं लौटा जा सकता
क्योंकि सीढी नहीं है।

राजधानी में नहीं रहती सीढियां घरों में
कभी-कभी चलती फिरती दिख जाती है
कहीं पुताई के लिए जाती हुई
या कहीं आग बुझाने के लिए जाती हुई

कहीं-कहीं राजमार्गो पर भी दिख जाती हैं वे
जब कोई बल्ब बदलना होता है
राजधानी में गाडियाँ ढोती हैं सीढियों को

कभी-कभी किसी बनते मकान में
मजदूर इस्तेमाल करते हैं सीढी
सीढी और बीडी मजदूर के ही काम आती है
कभी किसी नाटक में मंच पर दिख जाती है कोई सीढी
अभिनेता जिससे कई तरह के काम लेते हैं
बैठते हैं दौडते हैं खडे हो जाते हैं उस पर
लुकाछिपी का खेल खेलते हैं प्रेमी
कभी वह पेड हो जाती है
और रेल बस की सीट भी ।

सफाई वाले आते हैं हमारे घरों में
सीढियाँ लेकर
सोचता हूँ उनसे ले लूँ सीढी
कुछ देर उस पर चढूँ, उतरू, इतराऊँ ।


2. दरवाजे : पाँच कविताएँ

दरवाजे रहे हैं हमेशा घर में
क्या घर नहीं थे
तब भी थे दरवाजे?

मेरे दादा के मकान में नहीं थे दरवाजे
अगर होंगे, तो भी वे दिखते नहीं थे
उनका मकान हमेशा सब तरफ से खुला था
सूरज और चाँद और सितारों के लिए

वहाँ आने के लिए दस्तक देने की जरूरत नहीं थी
यहाँ तक कि आवारा कुत्ते और गाएँ भी चली आती थीं
और रोटी पाती थी
दुत्कारी नहीं जाती थी।

अब शहर में दुत्कारी जाती हैं औरतें-माएँ-पागल औरतें
अब शहर में देखता हूँ हर तरफ दरवाजे
उनमें से कई मेरे लिए हमेशा-हमेशा के लिए बंद हैं।

मंत्रालय और मूत्रालय एक साथ दरवाजों में बंद हैं
कोई कोई दरवाजा तो खुलते ही बंद हो जाता है।

अपनों के लिए बंद कर लिए जाते हैं दरवाजे
बेटा बुजुर्ग बाप को पागल करार देता है
माँ के लिए भी दरवाजे खोलने से पहले
बेटा अपनी बीबी से पूछने जाता है।

ईश्वर अगर आधी रात को दस्तक देता है
तो भी उससे उसका नाम पूछा जाता है।

रावण सरेआम जूते पहनकर चौके तक चला आता है
और सीता के साथ अट्टहास करता है।

2

मैं उसके भीतर जाने की सोचता रह जाता हूँ
कहीं-कहीं तो खडे होते ही खुल जाते हैं दरवाजे
कहीं-कहीं तो लाख कोशिश करो नहीं खुलते

इस जन्म में मेरे लिए बंद रहे कितने दरवाजे
शायद अगले जन्म में खुलेंगे
जब अच्छी किस्मत लेकर जन्म लूँगा।

खुल जा सिमसिम का वरदान मुझे नहीं मिला

दरवाजे ही एक दिन दीवार बन जाते हैं
जानते हैं सामने दरवाजा है
पर पत्थर की दीवार लगता है

दरवाजे हमें हमेशा ऊपर नहीं ले जाते
अंधेरे तहखानों में पाताल में भी ले जाते हैं।

दरवाजों से सावधान रहो
एक बार उनके भीतर गए
कि वापस लौटना मुश्किल होगा।

3

दरवाजे होते थे गाँव में
आसानी से खुल जाते थे
एक पतली-सी साँकल से बँधे होते थे
कोई बाहरवाला भी उसे खोलकर
भीतर आ सकता था।

शहर में होते हैं लोहे के दरवाजे
जिनके सामने मैं हमेशा लाचार खडा रहता हूँ
खुलेंगे भी कि नहीं
एक बार एक दरवाजे के सामने मैं रातभर खडा रहा
वह सुबह भी नहीं खुला।

शहर में होते हैं ऐसे दरवाजे
कि पता भी नहीं चलता कि बंद हैं या खुले हैं
उनके भीतर एक हँसता खेलता परिवार इस तरह बंद
रहता है गोया कोई न हो
और जिस घर में कोई नहीं होता
वहाँ लगता है भीतर चूल्हा जल रहा है
और रोटी पक रही है ...

शहर का अपना एक दरवाजा भी होता है
जैसे दिल्ली दरवाजा
मगर ऋतुएँ हर दरवाजे को मानने से इंकार करती हैं
हवा भडभडाती है जोर से दरवाजे
लाख बंद करो फिर भी खोल देती है बारिश
याद दिलाती हुई
देखो पिछली बार भी ऐसी ही आई थी
और अगले बरस भी आऊँगी।

4

मेरे लिए सबसे पहले एक स्त्री ने खोला दरवाजा
तब से हर दरवाजा खुलता चला गया
मैं बढता ही चला जा रहा हूँ।

कहीं न कहीं कोई न कोई स्त्री हमेशा रही
जिसने मेरी दस्तक सुनी
और दौडी चली आई।

अगर स्त्रियाँ न होतीं, तो शायद मेरे लिए
बंद ही रहते इस दुनिया के दरवाजे।

एक स्त्री ने ही बंद किया मेरे लिए
आखिरी दरवाजा।

5

मकानों से भी महँगें उनके दरवाजे होते हैं
कोई उन्हें खोलने से भी डरता है।

लकडी के, लोहे के, शीशे के, नक्काशीदार होते हैं दरवाजे
चाँदी के सोने के भी होते हैं।

भगवान के दरबार के भी महँगें होते हैं दरवाजे
कपाट बंद होते हैं जब भगवान सोते हैं।

बंद दरवाजों में होती हैं मंत्रणाएँ
लिखी जाती हैं राजाज्ञाएँ
फिर उनको प्रसारित किया जाता है
भोंपू बजा बजाकर।

ऐसा तो यह संसार है
जिसका एक दरवाजा स्वर्ग में खुलता है
तो एक नर्क में
एक पाताल में तो एक सातवें आसमान में।

कोई कोई दरवाजा नदी की ओर खुलता है
तो कोई समुद्र की ओर भी
कोई मस्जिद की ओर तो कोई मंदिर की ओर।


3. नदियों के किनारे

मैं नदियों के किनारे पैदा नहीं हुआ तो क्या हुआ
नदियों की तलाश में बीत गया मेरा सारा जीवन ।
नदियों के किनारे मेरा घर न हुआ तो क्या हुआ।
नदियों के किनारे पैदा होते हैं महापुरूष
महाकवि पैदा होते हैं

उनकी कविताओं में एक सरिता बहती है
मेरी कविताओं में बहती है आँसुओं की सरिता।
सरयु का नाम राम से, जमुना का कृष्ण से,
साबरमती का नाम गाँधी से जुडा है।
अब गाँधी से जुडी है साबरमती
कृष्ण के साथ बहने के लिए ही बहती रही जमुना
देवताओं के लिए ही धरती से निकली गंगा
सरस्वती अब केवल किताबों में बहती है।
मेरे साथ नहीं चली कोई नदी दूर तक
दो कदम भी नहीं चली वह
मैं ही उसकी तलाश में भटकता रहा जन्म भर।
अगर कोई नदी साथ चलती, तो जिंदगी की नाव ठीक से चलती।

नदियों के पानी से अपने घाव धोते हैं शहीद
तो उनका पानी खून से लाल हो जाता है।

कोई मजदूर जब उसमें डुबकी लगाता है
तो नदी उसके लिए अपना आँचल फैला देती है।
नदी अपने साथ बहाकर ले जाती है स्त्रियों के आँसू
इतनी ममतामयी नदी
क्या कभी किसी पहाड से निकली थी
मैं अक्सर सोचता रह जाता हूँ।

नदियाँ निकलती हैं
स्त्रियों के भीतर के किसी उदास कोने से
तुम्हारे मलमली दुपट्टे से निकलती है मखमली नदी
किसी पठार से नहीं, रेगिस्तान से नहीं
पत्थरों की किसी कंदरा से नहीं।

क्या तुम्हें नदियों की ममता ही दिखती है
उनकी क्रूरता नहीं
उनका बिफरना नहीं जाना
उनका रौद्र रूप नहीं देखा
वे जब बिफरती हैं तो अपने साथ बहा ले जाती हैं किनारे
किनारों के सब मजबूत वृक्ष
उनके लावे में आते ही राख हो जाते हैं।

वे इतिहास की उलटी धारा में बहने लगती हैं
वे दशिाएँ बदल लेती हैं तबाही मचा देती हैं
और इतिहास और भूगोल सब बदल डालती हैं।
मेरी कविताओं में आओ ऐसी ही कोई नदी
अपने साथ लावा लेकर ।
***
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