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नुक्ताचीं!

सुधांशु गुप्त
सपनों और हकीकत के बीच महज दो कदम का फासला होता है। लेकिन सपनों की घडी अलग होती है। वहाँ दो कदम की दूरी हजारों किलोमीटर की भी हो सकती है और यह भी हो सकता है कि यहाँ के कुछ मिनट सपनों में पूरे जीवन के बराबर हों।
***
मैं लेटा हुआ था। लेकिन मेरी आँखें खुली थीं। अचानक मुझे अहसास हुआ कि मैं किसी गाडी में लेटा हूँ। किसी भव्य-सी कार में। कार चल रही है। बहुत धीमे-धीमे। मैं सीट पर ही उठ कर बैठ गया। गाडी में पिछली तरफ आमने-सामने दो सीटें थीं। दोनों भव्य। मुझे नहीं पता मैं कहाँ जा रहा हूँ। ड्राइवर की तरफ मेरी पीठ है। लेकिन मुझे ड्राइवर की और गाडी चलने की कोई आवाज नहीं आ रही। मैंने मुडकर ड्राइवर को देखने की कोशिश की। मुझे आश्चर्य हुआ। ड्रायवर की सीट खाली थी। मैं बिना ड्रायवर के कहाँ जा रहा हूँ। वह भी इतनी भव्य गाडी में बैठकर। मैंने कार के शीशे से बाहर झाँककर देखने की कोशिश की। बाहर अंधेरा था। अंधेरा इतना घना नहीं था कि कुछ दिखाई न दे। मुझे सडक दिखाई दे रही थी। अँधेरा भी काला नहीं था, बल्कि नीला-सा था। सडक निरंतर ऊपर की ओर जा रही थी। मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि मैं किसी पहाडी स्थल पर जा रहा हूँ। लेकिन अकेला तो मैं कभी घूमने नहीं गया। इस पहाडी सडक के दोनों तरफ खाइयाँ भी मैं देख पा रहा था। अचानक मैंने सडक और खाइयों से अपना ध्यान हटाकर अंदर की ओर किया। मुझे आश्चर्य हुआ। साथ ही खुशी भी। कार में एक लडकी बैठी हुई थी।
मैंने पूछा- अरे, तुम इस वक्त कहाँ जा रही हो?
मैंने तुम्हें बताया तो था, मैं हर वक्त यात्रा में रहती हूँ....
लेकिन यात्रा का कोई पडाव तो होता होगा ना....
मुझे नहीं मालूम... मेरी यात्रा का पडाव कहाँ है... कहाँ होगा... मेरे लिए तो यात्रा में बने रहना ही पडाव है... इसलिए मैं यहाँ-वहाँ भटकती रहती हूँ....
लेकिन इस वक्त आप अकेली नहीं हैं... मैं भी आफ साथ हूँ...।
मुझे उसकी हँसी की आवाज सुनाई दी। कार में अंधेरा होने की वजह से उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। उसने फिर कहा, यह तुम्हारा भ्रम है कि तुम मेरे साथ हो। कोई भी, कभी भी किसी के साथ नहीं होता... न तुम मेरे साथ हो और न मैं तुम्हारे साथ....
लेकिन तुम...
तुमने यह मान लिया है कि मैं तुम्हारे साथ हूँ... लेकिन ऐसा है नहीं ...यह तुम्हारा भ्रम है....
लेकिन आप हो तो सही....
हाँ, हूँ तो सही, लेकिन होने और न होने के बीच बहुत बारीक-सी रेखा होती है... वह रेखा मिटती है तो व्यक्ति उपस्थित हो जाता है... अन्यथा वह अनुपस्थित रहता है...
तो मैं क्या मान कर चलूँ...मेरे लिए आप उपस्थित है या अनुपस्थित....
यह आफ ऊपर निर्भर है.... आप जो मानना चाहें मान सकते हैं... मुझे तो दोनों ही स्थितियाँ एक जैसी लगती हैं....
शायद मुझे भी, क्योंकि जब आप अनुपस्थित होती हैं तब मैं आपसे उसी तरह बातें करता हूँ जैसे आपकी उपस्थिति में... मुझे आपसे बातें करने के लिए आपकी उपस्थिति की कोई जरूरत नहीं है....
फिर क्यों हर समय मेरी उपस्थिति की उम्मीद लगाए रहते हो...
मैं कोई उम्मीद लगाता हूँ... कभी मैंने आपसे कहा कि मैं आपकी हर समय उपस्थिति चाहता हूँ... आप समझदार हैं, इतना अवश्य समझ गई होंगी कि मैं आपको पसंद करता हूँ यानी आपसे बातचीत करना पसंद करता हूँ... लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं हुआ कि...
मैं अकेला ही बोलता रहा, पता नहीं कब तक। अचानक मैंने गर्दन उठाकर सामने देखा, तो वहाँ कोई मौजूद नहीं था। यानी वह जा चुकी थी। पता नहीं वह थी भी या नहीं।
गाडी हल्की-सी काँपी। मेरी नींद खुल गई। मुझे लगा पलंग हिला है। शायद भूकंप आया हो। लेटे-लेटे ही मैंने मोबाइल में समय देखा। ढाई बज रहे हैं। पता नहीं तुम कहाँ होगी, क्या कर रही होगी। मेरे मन में यह भी आया कि कहीं तुम्हारे साथ कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई। मुझे तुम्हारी चिंता हुई। लेकिन अब सपनों के साथ मेरा इतना अच्छा रिश्ता बन गया है कि अब वे मुझे अधिक परेशान नहीं करते, डराते नहीं। मैं दोबारा सोने की कोशिश करने लगा।
सुबह मेरी नींद थोडी देर से खुली। पहला ख्याल मुझे यही आया कि उसे फोन करना है। मैंने बिस्तर पर लेटे-लेटे ही व्हाट्सअप कॉल कर दिया। फोन पहली बेल पर ही उठ गया।
सब खैरियत है... मैंने पूछा। शायद मेरी आवाज में उसे कुछ घबराहट सुनाई पडी हो।
हाँ, बिल्कुल ठीक है, क्यों क्या हुआ...
आप कहीं जा रही हैं क्या?
हाँ, मैं हिमाचल जा रही हूँ...सैन्ज वैली
फ्रैंड्स के साथ या...
फ्रैंड्स के साथ नहीं, फ्रैंड्स से बचने के लिए ही जा रही हूँ... मैं दो दिन अपने साथ रहना चाहती हूँ... एकांत में... भीड से दूर।
एकांत में तो आप भीड के साथ भी रह सकती हैं
रह तो सकती हूँ, लेकिन रहना नहीं चाहती...मुझे अकेलापन बेहद पसंद है...अपने साथ रहना... और इस समय वहाँ बर्फ गिर रही होगी...मैं अपना फोन भी बंद रखूँगी... लौटकर बात होगी...।
आपको एकांतवास के लिए शुभकामनाएँ...।
उसने थैंक्यू कहकर फोन काट दिया।
वह एकांतवास में चली गई, मुझे यहाँ एकांतवास में छोडकर।
मैं सोचता रहा कि वह अकेले क्यों सैन्ज वैली चली गई। मन में अनेक तरह की शंकाएँ भी उठीं। मुझे लगा निश्चित रूप से वह अपनी फ्रैंड्स के साथ ही गई होगी। या यह भी हो सकता है कि किसी ब्वॉय फ्रैं ड के साथ गई हो। उसके जैसी लडकी का ब्वॉय फ्रेंड होना भला कौन नहीं चाहेगा! वह सुंदर है, समझदार है, बुद्धिमान है, अच्छी कविताएँ लिखती हैं। लेकिन अगर ऐसा होता तो वह यह बात मुझे बता भी सकती थी। लेकिन उसके लिए हर बात मुझे बताना क्यों जरूरी है! उसकी अपनी जिंदगी है। वह जैसे चाहे जिए...मैं कौन होता हूँ उसके जीवन में हस्तक्षेप करने वाला। मेरे मन के किसी कोने में यह विचार भी आया कि काशः हम दोनों साथ गए होते! लेकिन ऐसा संभव नहीं था। अगर मैं उससे साथ चलने के लिए कहता भी तो वह न जाने कितने ही किन्तु-परन्तु में समझा देती कि मेरा साथ जाना ठीक नहीं है। हर बात समझाने का तरीका उसे आता है।
*
मेरी उससे कोई पुरानी जान-पहचान नहीं है। मैं तो उसे जानता तक नहीं। बमुश्किल तीन महीने हुए होंगे। लेकिन आत्मीयता अगर होनी होती है, तो दो मुलाकातों में हो जाती है अन्यथा आप किसी के साथ पूरी जिंदगी गुजारने के बाद भी आत्मीयता खोजते रहते हैं। मैं लिखने-पढने से संबंधित काम करता हूँ.फ्री लांसिंग। जहाँ जो काम मिल जाता है, कर लेता हूँ। एक दिन उसका फोन आया। किसी मित्र ने ही उसे मेरा नाम सुझाया था। उसे कुछ कॉन्टेंट हिन्दी में लिखवाना था। इसी सिलसिले में मैं उससे मिला था। मैंने उस पर *यादा ध्यान नहीं दिया था। बस उसकी आँखें थीं, जो मुझे याद रह गईं। काली और एकदम शांत आँखें। ठहराव लिए हुए। उसकी आँखों में सपने भी दिखाई नहीं दिए थे। या वह अपने सपनों को छिपाना सीख चुकी थी। जहाँ हम पहली बार मिले थे, वह एक अजीब-सा कमरा था। उस कमरे में कुछ लोग बैठे हुए थे। शायद तीन लडके थे और वह अकेली लडकी। मुझे उसी से बात करनी थी। बात हुई और मुझे काम मिल गया। मैंने समय पर करके भी दे दिया।
नुक्ताचीं...। नुक्ताचीं नहीं है उसका नाम!
एक दिन उसका फोन आया, सर, मैंने सारा मैटर चैक कर लिया है, सब बढिया है, आपने अच्छा लिखा है, लेकिन कुछ जगह नुक्ते नहीं लगे...।
मैंने पूछा, कहाँ-कहाँ नुक्ता नहीं लगा...मुझे थोडा आश्चर्य भी हुआ और थोडा-सा गुस्सा भी आया।
खुदा पर, खान पर, जन्दगी पर...और भी कुछ शब्द हैं, मैं जानती हूँ कि आपको पता है कि कहाँ-कहाँ नुक्ता लगना चाहिए....लेकिन हिन्दी वाले नुक्ता लगाना भूल जाते हैं....मैं आपको मेल कर रही हूँ.... जिन शब्दों पर नुक्ता लगना है, उन पर मैंने रेड मार्क कर दिया है.... आप थोडा जल्दी कर देंगे, तो अच्छा रहेगा....।
कोई बात नहीं, आप भेज दीजिए मैं सब पर जहाँ नुक्ता लगना है, वहाँ लगा दूँगा...।
थैंक्यू सर
लेकिन एक बात बताओ...आप उर्दू जानती हैं क्या...।
सर, मैं उर्दू ही नहीं जानती, और भी कई भाषाएँ जानती हूँ.... उर्दू, फारसी, जर्मन, फ्रेंच, संस्कृत, हिन्दी और इँग्लिश तो आप देख ही चुके हैं...।
उसने नुक्ते लगा दिए। काम फाइनल हो गया। मैं उसे भूलने लगा। मुझे उसके बारे में कुछ भी याद नहीं रहा। हाँ, एक बात उसकी याद रह गयी कि कहाँ नुक्ता लगाना है। उसके बाद से मैं कभी नुक्ता लगाना नहीं भूला।
जैसे अचानक आकाश से कोई तारा टूट कर गिरता है, ठीक उसी तरह एक दिन उसका फोन आया। उसने कहा, मुझे ब्रेख्त की एक किताब खरीदनी है...ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर से...अगर आप फ्री हैं, तो क्या हम मिल सकते हैं...।
कोई एक घंटे बाद हम दोनों कॉफी हाउस में बैठे थे। मैंने पहली बार उसे ध्यान से देखा। दोनों तरफ कंधों पर झूलते बाल, लंबी नाक, जो चेहरे के संतुलन को बिगाड नहीं रही थी, दायीं तरफ के बाल चेहरे को इस तरह घेरे हुए थे मानो उन्हें बाँयीं तरफ की हिफाजत करनी हो, आँखों की पुतलियाँ ब्लैक थीं, लेकिन उनके पीछे का रंग ऐसा था जैसे किसी ने काले रंग में तब तक सफेद रंग मिलाया गया हो, जब तक काला रंग लुप्त न हो गया हो। उसके पूरे चेहरे में गजब का संतुलन था। कहीं से कुछ भी बेतरतीब नहीं था। उसने देखा कि उसके चेहरे पर एक मंद-सी मुस्कान तब भी बनी रहती थी, जब वह मुस्करा नहीं रही होती। वह कुछ पल तो उसे ही देखता रहा। यह देखना उसकी आँखों से भी नहीं छिपा। उसने मेरा ध्यान भंग करने के लिए कहा,
आप कौन-सी कॉफी लेंगे...
मैं तो नार्मल कॉफी लूंगा...और आप....
अमेरिकानो, ब्लैक विदाउट शूगर....
लडका आया और दो कॉफी रख गया। अमेरिकानो उसकी तरफ और नार्मल कॉफी मेरी तरफ। कुछ देर हम कॉफी पीते रहे।
आपको मेरी बात का बुरा तो नहीं लगा, कॉफी पीते-पीते ही उसने पूछा।
किस बात का....
मैंने आपको नुक्ता लगाने के लिए कहा था ना...
तो इसमें बुरा मानने की क्या बात.... जहाँ-जहाँ आपने बताया था, वहाँ-वहाँ नुक्ता लगना ही चाहिए था....
चलो छोडो....लेकिन आपको एक मजेदार बात बताऊँ... उसने अपनी दोनों आँखें मुझ पर टिक लीं।
बताइये....
मेरे अधिकांश फ्रैंड मुझे नुक्ताचीं कहते हैं, क्योंकि हर चीज में नुक्ताचीनी करती हूँ... वे सब मुझे नुक्ताचीं के नाम से ही पुकारते हैं....
वह हँस दी। बहुत जोर से नहीं, न ही खिलाखिलाकर। कुछ इस तरह जैसे उसका पूरा चेहरा बिना शोर किए मुस्करा रहा हो। उसकी आँखें, उसके गाल, उसके होंठ, उसके बाल सब कुछ मुस्करा रहा था। लेकिन पूरे संतुलन के साथ। वह कुछ पल उसकी ओर निहारता रहा। शायद उसे भी इसका अहसास हो गया था। अचानक उसने मुस्कराना बंद कर दिया और कहा, आप चाहें तो आप भी मुझे नुक्ताचीं कह सकते हैं।
उसने धीरे से कहा, नुक्ताचीं....।
बात दरअसल यह है कि हमें अपना भाषा का सम्मान करना चाहिए, उसे सही लिखना और सही उच्चारित करना चाहिए...जो लोग ऐसा करते हैं मैं उनसे बहुत प्रभावित होती हूँ...।
तब तो आप मुझ से प्रभावित नहीं हुई होंगी...।
ऐसी बात नहीं है....फिर किसी से प्रभावित होने के लिए उसे जानना समझना होता है....अभी तो हमारी एक दो मुलाकातें ही हुई हैं....लेकिन लगता है आप मुझ-से बहुत प्रभावित हो गये हैं.....।
इसके बाद फिर वह काफी समय तक नहीं मिली। मैंने भी उसे फोन नहीं किया। न ही उसका कोई फोन आया। मैं उसे भूलने लगा था। लगभग भूल ही गया था। कभी-कभी तो मन में यह ख्याल भी आता कि वह सचमुच थी या नहीं। इतने अच्छे लोग दुनिया में कहाँ होते हैं। लेकिन कहते हैं कि जब आपकी किसी से मिलने की आस खत्म होने लगती है, तभी वह मिल जाता है। वह अजीब-सा दिन था। आकाश में बादल थे। बारिश रुक-रुक कर हो रही थी। वह रूमानी मौसम कतई नहीं था। एक उदासी वाला मौसम था। वह जनपथ पर घूम रहा था। शायद उसे किसी किताब की तलाश थी। वह फुटपाथ पर सजी किताबों को देख रहा था। उस दुकान पर उसके अलावा दो तीन लोग और थे। दुकान पर कुछ किताबें आगे की ओर सजी हुई थीं और कुछ पीछे स्टॉल के भीतर रखी थीं। वह आगे रखी कुछ किताबों को देख रहा था। उसके नजरें नीचे थीं। अचानक उसका ध्यान फर्श पर गया। उसे ब्राउन कलर के बूट दिखाई दिए। अचानक उसके मन में खुशी की एक लहर पैदा हुई। उसने अपनी आँखें बूट से ऊपर की ओर उठाई। वह नुक्ताचीं ही थीं।
अरे! आप यहाँ, मैंने संकोच से कहा।
उसने किताबों की दुनिया से बाहर आते हुए आश्चर्य से मुझे देखा। लगा जैसे वह किसी दूसरे ग्रह से बाहर निकली हो।
अरे आप...कैसे हैं आप...
मैं अच्छा हूँ, आप कैसी है नुक्ताचीं....
वह मुस्कराई। पहले की ही तरह।
क्या खरीद रही हैं, मैंने फिर पूछा।
ब्रेख्त की कुछ कविताएँ पढने का मन हो रहा है, वह खोज रही थी।
कॉफी पिओगी...अमेरिकानो....
आज नहीं फिर किसी दिन, मेरे कुछ फ्रैं ड्स मेरा इंतजार कर रहे हैं, मुझे जाना होगा...बॉय...फिर किसी रोज मिलेंगे।
वह चली गई। पता नहीं कहाँ। यह भी नहीं पता वह कहाँ से आई थी। पता नहीं कौन-सी यात्रा पर निकली होगी। यह भी नहीं पता कि फिर उससे मुलाकात होगी या नहीं। मैं कॉफी हाउसों और किताबों की दुकान पर उसे खोजता रहा। लेकिन वह नहीं मिली।
पता नहीं कितना समय बीत गया। नुक्ताचीं नहीं मिली। पर वह अब भी मेरे साथ है। अब मैं कभी नुक्ता लगाना नहीं भूलता। मुझे पता है जेहन ऐसे नहीं ऐसे लिखा जाता है जहन। जब भी मुझे उसकी बहुत ज्यादा याद आती है मैं गालिब की यह गजल सुनता हूँ। सुरैया की आवाज में...नुक्ता-चीं है गम-ए-दिल उस को सुनाए न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने, मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ ज*बा-ए-दिल उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने...। मुझे विश्वास है कि वह एक दिन एक दिन जरूर मिलेगी-बेशक सपने में ही।
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सम्पर्क - 64-सी, दादा फ्लैटस्,
झिलमिल कॉलोनी, दिल्ली-११००९५
मो. ९८१०९३६४२३