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एक्सरे

मदन गोपाल लढा
गाडी अभी आशापुरा गोमट रेलवे स्टेशन पर खडी थी। शायद कोई क्रॉस है वरना एक छोटे-से स्टेशन पर दो मिनट से ज्यादा स्टॉपेज भला क्या होगा। धीरेन ने मन ही मन सोचा और वातानुकूलित डिब्बे की विंडो से बाहर ताकने लगा। उजाड जंगल में छोटा-सा रेलवे स्टेशन। स्टेशन वीरान-सा लग रहा था। भरी दुपहरी में जब यहाँ ऐसा सूनापन पसरा रहता है तब रात में यह सब कितना भयावह लगता होगा। असल में यहाँ कोई बसावट नहीं है। यहाँ से चार किलोमीटर दूर स्थित है पोकरण शहर। शहर की बजाय उसे कस्बा कहें तो बेहतर होगा। धीरेन ने कभी पोकरण नहीं देखा, लेकिन वह उससे अपरिचित नहीं था। वैसे पोकरण को देश में परमाणु परीक्षण के लिए जाना जाता है। धीरेन के लिए पोकरण की पहचान एक नितांत अलग वजह से हैं। मृदुला की डायरी में दर्जनों पन्ने ऐसे हैं जिनमें पोकरण का जिक्र हुआ है। गाडी क्या रुकी, वक्त ही थम गया। थमा भर नहीं, बारह साल पहले जा पहुँचा। मृदुला का बचपन यहीं गुजरा था। उसके पापा आर्मी में थे। वे सात साल यहाँ रहे। मृदुला और उसकी मम्मी भी उनके साथ ही रहे। केंद्रीय विद्यालय में उसने छठी से बारहवीं की पढाई की। फिर बी.एस.सी. के लिए उसने जैसलमेर के कॉलेज में दाखिला ले लिया, लेकिन इस बीच उसके पापा का जम्मू तबादला हो गया। इस वजह से मृदुला व उसकी मम्मी भोपाल चले गए। जहाँ मृदुला के दादाजी का निवास था। उसकी डायरी में जिस भगवती, संतोष व गायत्री का जिक्र सहेलियों के रूप में आया है, वे शायद अभी यहीं रहती हों। यह भी सम्भव है कि शादी के बाद कहीं दूर दिसावर चली गई हों। एक अन्य नाम जिसे वह भूलने की कोशिश कर रहा है वह सरोज भी उस वक्त तो यहीं रहता था। हालांकि मृदुला ने सरोज का जिक्र स्त्रीवाचक संज्ञा के रूप में किया है, पर धीरेन से यह चालाकी छुप नहीं पाई। यही वह प्रस्थान बिंदु था जिससे संदेह का बिरवा अँकुरित हुआ। बिरवा बढता उससे पहले पास वाले ट्रैक पर एक मालगाडी दनदनाती निकल गई। धीरेन मालगाडी को एकटक देखता रहा। कुछ मालगाडियाँ कितनी लंबी होती है। एक दो तीन...पूरे बीस डिब्बों तक गिनकर उसने फिर आगे गिनना छोड दिया। यह गाडी तो खत्म होने में ही नहीं आ रही। कितना भार ढोती ये मालगाडियाँ। हमारी जिंदगी की गाडी भी तो असल में भार ढोने में गुजरती है।
धीरेन को पढने का बहुत शौक था। इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशन के बावजूद उसने पढना नहीं छोडा। जब भी वह सफर में होता तब उसकी बैग में कोई ना कोई किताब जरूर होती। शुरु में वह प्रेरक पुस्तकें पढा करता था। शिव खेडा की यू केन विन उसकी पसंदीदा किताब थी। मृदुला के साहचर्य से उसकी रुचि साहित्य की तरफ मुड गई। मृदुला को कविताएँ पढना पसंद है। उसे बहुत-सी कविताओं के वे अंश याद हैं जिनको वह बात-बात में सुनाती रहती हैं। यू-ट्यूब पर भी वह नामी कवियों का कविता पाठ सुनती रहती हैं। धीरेन को कविताएँ कम समझ में आती हैं। यात्राओं में वह उपन्यास ले जाना पसंद करता है। दोस्तों के साथ गपशप में वह अक्सर अपनी पढी हुई किताबों के किस्से बताता रहता है। उसका दोस्त भावेश तो अक्सर कहता भी है- तुम कुछ भी नया पढ लेते हो, तो हमारी शामत आ जाती है। हमें तुम्हारी कथा सुननी पडती है। मगर मृदुला की डायरी को पढकर ऐसी चुप्पी उसके भीतर गहरा गई जिसके बारे में वह शायद ही किसी से बात कर पाए। मृदुला से भी नहीं।
शायद यही वजह है कि डायरी की बातें उसके मन में गाँठ बन कर बैठ गई है। अकेलेपन में यह गाँठ उसके मन में खटकने लगती है। डायरी में लिखी पंक्तियाँ उसकी निगाहों के सामने फिल्म की तरह चलने लगती है। आज शाम देर तक सरोज व मैं पार्क में बैठी रही और चुहल करती रही। कभी उसे मृदुला सरोज का हाथ थामें सिनेमा हॉल के बाहर निकलती दिखाई देती, आज मरुधरा सिनेमा हॉल में सरोज के साथ हम दिल दे चुके सनम मूवी देखी। सचमुच बहुत मजा आया। वाकई एक यादगार दिन। कुछ पंक्तियाँ ऐसी भी थी जो उसकी नींद उडाने के लिए पर्याप्त थीं, कल हम भोपाल जा रहे हैं। क्या सरोज की बिना हम जी पाएँगे। धीरेन को लगता कि मृदुला ने विवाह के सात सालों में कभी इस बारे में बताया क्यों नहीं। बता देती तो धीरेन उसके बारे में कैसे रिएक्ट करता, ठीक-ठीक कह पाना मुश्किल है। धीरेन सोच रहा था उसने मृदुला से शादी से पहले की जिंदगी के बारे में कुछ भी तो नहीं छुपाया है। उसकी स्कूल लाइफ की पहली गर्ल फ्रैण्ड अरुणा की बात हो या फिर बी.टेक. के दौरान साथ पढी नताशा की कहानी। पापा के रिटायरमेंट से पहले हाउसिंग बोर्ड में निवास के दौरान उसकी लव स्टोरी की हिरोइन रही फैशन डिजाइनर संगीता के तो घर भी ले गया था वह मृदुला को। उसने जब भी मृदुला से शादी से पहले की जिंदगी के बारे में पूछा तब वह बडी चालाकी से बात को टाल जाती, किशोरवय की सामान्य बातों को छोड दें, तो कुछ बताने जैसा है भी नहीं। कभी कभी तो वह जवाब में चुटकी लेती, हम भी तुम्हारी तरह इश्क-विश्क के चक्कर में पड जाते, तो चूल्हा-चौका थोडे ही करते, इंजीनीयर ना बन जाते! हालांकि यह बात केवल कहने को कहती थी वह। बी.एस.सी. के बाद मृदुला ने फिजिक्स में पी.जी. किया और नेट की परीक्षा भी पास कर ली। ओपन यूनिवर्सिटी से उसने लाइब्रेरी सांइस में ग्रेजुएशन डिग्री भी पास कर ली। शादी से पहले उसने एक प्राइवेट युनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन के रूप में ढाई साल काम भी किया। शादी के बाद जबलपुर के नामी साइंस कोचिंग इंस्टीट्यूट में सलेक्शन भी हो गया, लेकिन मम्मी की सलाह के बाद उसने नव्या के स्कूल जाने तक देखभाल के लिए यह चांस छोड दिया। मगर इस डायरी से जो अभरोसा जन्मा, वह शूल बनकर धीरेन के अंतस में चुभ रहा है। इसी चुभन को भुलाने के लिए वह जबलपुर से जैसलमेर जा रहा है। इस ठेठ रेगिस्तानी शहर की यह तीसरी यात्रा है उसकी। पहली दो यात्राओं में तो भाग-भाग कर इधर-उधर तकाया है। सोनार किला तो कभी हवेलियाँ। नेशनल पार्क तो कभी म्यूजियम। कुलधरा तो कभी सम के धोरे। पहली बार आया तब मृदुला के साथ तनोट माता के मंदिर भी जाना हुआ। गढ-कंगूरों के प्रति उसका आकर्षण नहीं के बराबर है। पर्यटन के नाम पर बनावटी नाच-गान भी उसे रास नहीं आता। जो चीज उसे फिर यहाँ खींच लाई, वह है जैसलमेर के लोगों की संजीदगी। यहाँ के कस्बाई मनोवृति के लोग शक्ल से ही नहीं, मन से भी अपनत्व से भरे हुए हैं। दो-चार दिन के प्रवास के बाद आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप इसी धरती के बाशिंदे हैं। जाने किस जादू से ये लोग पराये लोगों को अपना बना लेते हैं। देशी ही नहीं विदेशी पर्यटक भी यहाँ आकर इतना घुलमिल जाते हैं कि भाषा और भूगोल की तमाम दूरियाँ गौण हो जाती है। कई तो हर साल यहाँ आते हैं व कई जाने का नाम ही नहीं लेते।
रेलगाडी में एक किशोर डफली बजाते हुए गाना गा रहा था, परदेसियों से ना अँखियाँ मिलाना, परदेशियों को तो इक दिन जाना। उसने सवारियों की फरमाइश पर कुछ भजन व अन्य फिल्मी गीतों के मुखडे भी सुनाए। गाने सुनाने के बाद वह सबसे पैसे माँगते हुए धीरेन के पास भी आया। धीरेन अक्सर ऐसे लोगों को लोक-कला के संवाहक कह कर प्रोत्साहन की वकालत करता है, किंतु आज बिना पर्स संभाले छुट्टे नहीं होने की बात कहकर आँखें बंद करके बैठ गया। जब रेलगाडी जैसलमेर पहुँची, तब रेलवे स्टेशन पर काफी चहल-पहल मच गई। धीरेन पहले से नियत होटल में पहुँच कर बेड पर लेट गया। अगले तीन दिन उसने जैसलमेर शहर में ही बिताए। जाने क्यों इस बार उसका बाहर जाने का मन नहीं हुआ। सम के उजली रेत के धोरों का वह बहुत दीवाना था मगर उधर जाने का मन भी नहीं बना पाया। शाम को वह गडीसर झील चला जाता और घाट पर अकेले बैठकर पानी को देखता रहता। झील का पानी शांत था। कभी कोई झील में कंकर फेंक देता तो देर तक भँवर उठते रहते। ऐसे ही भँवर धीरेन के मन में उठ रहे थे। एक अलग किस्म की उदासी उसके तन-मन पर तारी थी। उसके पीछे मृदुला की डायरी थी या कुछ और, ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता। यूं तो उसने हर सुबह शाम मृदुला से बात की। एक-दो दफा तो वीडियो कॉल भी किया। उसकी भरसक कोशिश रही कि फोन पर ऐसी कोई बात जाहिर भी न हो। संभवतः हुई भी नहीं होगी। वैसे भी मृदुला के सुझाव पर ही वह जैसलमेर घूमने आया था। उसका कहना था कि दफ्तर के तनाव को दूर करने के लिए चार-पाँच महीनों में एकाध सप्ताह की आउटिंग जरूरी है। वह खुद उसके साथ आने वाली थी मगर ऑफिस में ऑडिट टीम आ जाने से उसको रुकना पडा। इन तीन दिनों में धीरेन ने नया कुछ नहीं पढा। चेतन भगत का एक उपन्यास और मलयालम कहानियों के अंग्रेजी अनुवाद की एक किताब उसकी बैग में अनछुई पडी थी। असल में इस बार पढने का मन ही नहीं हुआ। उसने ज्यादातर वक्त आबिदा परवीन की गजलों को सुनते हुए बिताया।
क्या बात है इस टूर में फोटोग्राफी नहीं की। उसके व्हाट्सएप स्टेटस और एफबी अकाउंट पर कोई अपडेट नहीं देखकर मृदुला ने पिछली शाम पूछा था।
इस बार आँखों से एक्सरे कर रहा हूँ। कहकर उसने बात को टाल दिया।
पोकरण की चमचम बहुत नामी है। यहाँ के हलवाई मिठाई बनाने में बहुत कुशल है। मृदुला की डायरी में संतोष के जीसा के मिष्ठान्न भंडार का जिक्र हुआ है। उनकी दुकान की मिठाई की ख्याति गुजरात-महाराष्ट्र तक रही है। संतोष के बडे भाई के पूना में मिठाई की दुकान करने की जानकारी भी डायरी में कहीं दर्ज है। मृदुला ने आते वक्त चमचम लाने के लिए कहा था। खुद के लिए नहीं, उसके लिए। मृदुला चाय फीकी पीती है। अमूमन मिठाई खाने से बचती है। वह खुद मीठे का शौकीन तो है मगर जाने क्यों यहाँ की चमचम के प्रति उसकी रुचि नहीं जगी। जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर चमचम बिक रही थी। धीरेन ने एक बार लेने की भी सोची मगर फिर टाल दिया।
टूर पूरा करके जब घर पहुँचा तब तक उसका धैर्य जवाब दे चुका था।
कैसा रहा सफर। क्या-क्या देख कर आए इस बार। वो एक्सरे भी दिखाओ जो तुमने आँखों से खींचे हैं। मृदुला ने कॉफी का कप थमाते हुए पूछा।
कुछ खास नहीं देख पाया। यों ही वक्त गुजार दिया। सरोज को ढूँढने की कोशिश की थी, मगर मुलाकात नहीं हुई।
कौन सरोज, जो मेरे साथ पढती थी?
पढती थी या पढता था?
ओह अब समझ आया। मुझे एकबार लगा भी था कि कुछ ठीक नहीं है तुम्हारे साथ। मगर अब पता लगा।
यह मेरे सवाल का जवाब तो नहीं है।
जवाब जैसा कुछ है भी नहीं। तुमने जिस दिन जिद करके मेरी डायरी पढने के लिए ली थी, तभी मुझे चिंता हुई थी इस बात की।
तुमने आज तक मुझसे यह बात क्यों छुपाई?
मैं ही क्यों, कोई भी स्त्री अपने पार्टनर को सब कुछ बताना चाहती है। शादी के पहले ही नहीं, बाद की भी कई बातें मैंने तुमको बताने से परहेज की है। मगर क्यों? जानना चाहते हो तो सुनो। तुम अक्सर चोरी-छुपे मेरे मोबाइल, सोशल अकाउंट आदि को चेक करते रहते हो। मेरे दफ्तरी जीवन की हर छोटी-छोटी बातों को माइक्रोस्कोप से देखते हो। मैं जानती थी कि तुम मेरी स्टूडैंट लाइफ के सामान्य दोस्ताना संबंधों की बात को भी सहजता से नहीं पचा पाओगे।
मृदुला कुछ रूककर फिर बोली, तुमने अपने कॉलेज जीवन के किस्से चटखारे लेकर मुझे सुनाएँ और मैंने सहज भाव से सुने भी। मगर मैं यह सब बात देती तो अपने स्वभाव के कारण तुम इसे इजीली नहीं ले पाते। मैं नहीं चाहती कि हमारी मैरिड-लाइफ में बेमतलब तनाव आए। इसीलिए मैंने उस भूली-बिसरी कहानी को तुमसे छुपाना ही उचित समझा।
धीरेन की आँखें छत पर घूम रहे पंखे पर टिकी हुई थी। वह समाधिस्थ प्रतीत हो रहा था।
कॉफी ठंडी हो गई है। लाओ मैं फिर से गर्म करके लाती हूँ।
मृदुला ने कहा तो धीरेन ने अपना कप उसकी तरफ बढा दिया।
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