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अस्पताल के दिन

उदयन वाजपेयी
बिस्तर से उतरना कठिन था। मेरे पेट को जिस जगह से चीर कर सिला गया था, वहाँ भारी दर्द था। वह स्थान दर्द का केन्द्र-बिन्दु था, वहाँ से दर्द हर ओर उसी तरह बार-बार फैल रहा था जैसा पानी में कंकड डालने से तरंगें फैलती हैं। मैं कमर तक हिला पाने में लाचार था। मेरा सिर थोडा ऊपर उठा हुआ था और पैर भी बिस्तर पर कुछ उठे हुए ही थे। सिर के ऊपर दो बत्तियाँ जल रही थीं जिनका पीला प्रकाश छत पर छितर गया था। रात होने को आयी। नींद का नामोनिशान तक नहीं है। ऑपरेशन के बाद मेरे होश में आने पर, जो मुझसे मिलने आये थे, मिलकर लौट गये हैं। वे नीचे कहीं लॉबी में बैठै समय काट रहे होंगे, चौकन्ने होंगे कि कहीं मेरी तबियत के अचानक बिगड जाने की खबर न आ जाए। रात की नर्स आ गयी है। यह छोटे-से कद की अत्यन्त फुर्तीली लडकी है। आँखों में काजल लगा है और यहाँ सघन चिकित्सा इकाई के वार्ड में भर्ती हर मरीज की पूरी मुस्तैदी से देखभाल कर रही है। वह मेरे पास आती है और मुझे चाचाजी कहकर सम्बोधित करती है। मुझे अब तक इसकी आदत नहीं हुई है। मैं थोडा रुककर जवाब देता हूँ मानो किसी और की ओर से दे रहा हूँ। मेरे मन में केशवदास की पंक्तियाँ तैरने लगती हैं: केशव केसनि असकरि/जस अरिहूँ न कराय/चन्द्र वदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाय। इतने दर्द के बीच मुस्कराहट का बुलबुला पता नहीं कहाँ खो जाता है। बत्तियाँ बन्द करती हूँ, आप सोने की कोशिश कीजिए। वह दीवार पर हाथ फेरती है और छत पर जल रही पीली बत्तियाँ बुझ जाती हैं। छत पर बिखरा प्रकाश कहीं दूर सरक जाता है। मुझे दूर-दूर तक नींद की आहट सुनायी नहीं दे रही।
पता नहीं क्यों यह लग रहा है कि किसी तरह सुबह हो जाए, तो काफी कुछ ठीक हो जाएगा। क्या हो जाएगा, इस बारे में मैं सोच नहीं पा रहा। मेरे दिमाग में वह जगह खाली है। रात इतनी धीमी सरक रही है कि लगता है बिस्तर से उतर कर उसे तेजी से आगे ठेलकर दोबारा बिस्तर पर लेट जाऊँ। पर इस समय बिस्तर से उतरना लाना है जू-ए-शीर का जैसा है। वह छोटी-सी नर्स अंशु है। सुदूर केरल से यहाँ दिल्ली में नौकरी करने आयी है। पर वह महज नौकरी नहीं, सेवा कर रही है। सेवा! यह वह काम है जिसकी हममें से अधिकांश को विस्मृति हो गयी है। हम शायद सेवा करने को समय बर्बाद करना मानते हैं। उसे देखने से यह लगता ही नहीं कि यह नाटी-सी छरहरी लडकी हजारों मील दूर से केवल और केवल नौकरी के लिए यहाँ आयी है। पर हो भी सकता है। पिछले कुछ दशकों से जिस तेजी से यह समूचा देश मथा जा रहा है, उस कारण कब, कौन, कहाँ जा पहुँचे, कोई ठिकाना नहीं है।
पास के कमरे से कभी-कभी किसी के कराहने की आवाज आती है। यह पास के कमरे से आ रही है या मेरी ही कराह है जिसे मैं पास से आता सुन रहा हूँ। मेरे चेहरे का ऑक्सीजन का मुखौटा हटा दिया गया है, पर जगह-जगह छिदे हुए शरीर में अनेक प्रकार की दवाईयाँ पतली-पतली नलियों के सहारे भेजी जा रही हैं। पेशाब के स्थान पर कुछ बडी-सी नली लगी है जिससे लगातार नयी लगी किडनी में बनती ढेर-सी पेशाब प्लास्टिक के पारदर्शी थैले में एकत्र हो रही है। तुम्हें लगातार लगेगा कि तुम्हें पेशाब आ रही है, पर वह इस नली के कारण होगा। पेशाब अपने-आप इस नली से प्लास्टिक थैली में जा पहुँचेगी। मेरे शल्य चिकित्सक अनन्त कुमार ने मुझे कहा था। पर अभी ऐसा कुछ नहीं लग रहा। सारे संवेदन दर्द की तीव्रता में डूब-से गये हैं। एक ओर यह पेशाब वाली नली लगी है, दूसरी ओर घाव से निकलती एक और नली। मैं इन दोनों के बीच किसी तरह बिना हिले-डुले बिस्तर पर कुछ उठा हुआ-सा लेटा हूँ। मेरे कमरे में दरवाजा नहीं है। सघन चिकित्सा इकाई के कमरों में दरवाजे नहीं होते ताकि सारे मरीज नर्सों और डॉक्टरों की नजरों के सामने रहे आये। सामने के हॉल के कोने में कुछ डॉक्टर और नर्स बैठे हैं। उन्हें भी मेरी ही तरह रात काटना है। सचमुच यह रात, यह रात पत्थर की है, इसे मुश्किल से ही काटा जा सकेगा। सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का। रात के इस कठोर पत्थर में मेरे पैर जा फँसे हैं और मैं जहाँ का तहाँ लेटा रह गया हूँ। डॉक्टरों और नर्सों की आवाजें कानों में पड रही हैं। मैं कोशिश करके भी समझ नहीं पा रहा कि वे क्या बातें कर रहे हैं। उनकी बातों के बीच-बीच में हँसी का महीन-सा झोंका उनकी बातचीत को रेशम के कपडे-सा ढक देता है।
मुझे थकान के कारण नींद आ रही है। पर दर्द के कारण वह टूटती भी जा रही है। नींद का लगना और टूटना एक साथ हो रहा है। सुबह, पता नहीं कहाँ अटक गयी है, आ ही नहीं रही। डॉक्टरों और नर्सों की धीमी-धीमी आवाजों के बीच मैं और *यादा अकेला होता जा रहा हूँ। अब सुबह के प्रकाश में ही इसे सह सकूँगा। ऐसा क्यों? मुझे पता नहीं पर फिर भी पता है। सुबह के प्रकाश में शायद ऐसी कोई शक्ति अवश्य है। जो अकेलेपन की तीखी नोकों को सोख लेती है। तब अकेलापन होता अवश्य है पर वह गडना बन्द हो जाता है। अस्पताल में आप बिल्कुल अलग तरह से अकेले हो जाते हो। आफ चारों ओर तरह-तरह के डॉक्टर, नर्स आदि रहते हें पर तब भी आप अकेले बने रहते हैं। यह कैसा अकेलापन है, जो इतने सारे लोगों के बीच भी काँपता रहता है? यह शायद दर्द और अनिश्चय का अकेलापन है। आप जानते रहते हो कि अपने दर्द के दरिया में केवल आप ही तैर रहे हो या शायद डूब रहे हो। बाकी सब किनारे खडे आकाश को निहार रहे हैं। वे आपको देखकर भी देख नहीं रहे हैं। कमरे और सामने के हॉल में बुझी हुई पीली रोशनी पसरी है।
सिस्टर अंशु बराबर इधर से उधर भागादौडी में व्यस्त हैं। इन्हें इस तरह तैयार किया गया होगा कि ये सारी रात बिना पलक झपकाए मरीजों की सेवा करती रह सके। कहाँ केरल की हरियाली की ये लडकी और कहाँ यह सूखा-सा वॉर्ड जहाँ यह जीवन काट रही है। वहाँ बहता हुआ पानी है, नारियल के पेड हैं, हरियाली है, कुडियाट्टम नृत्य की गूढ भंगिमाएँ और मद्धिम लय है और यहाँ इस कॉर्पोरेट अस्पताल में दवाइयों की गन्ध, अहमन्य डॉक्टर और टेलिविजन से लगातार गिरता कूडा जैसा कि पेरिस में रहते एक फारसी लेखक ने कभी लिखा था। यह लडकी तो जैसे नर्क में आ गयी हो, पर इसने इसे खुशनुमा बना दिया है। मेरे बिस्तर के सामने घडी लगी है, पर मुझे समय दिखायी नहीं दे रहा। मेरा चश्मा ऑपरेशन के पहले उतार कर शायद मेरे बेटे को या किसी अन्य परिजन को दे दिया गया था। मैं सुबह उसे मँगवा लूँगा। पर यह सुबह होगी कब? वह अचानक पता नहीं कितनी दूर सरक गयी है। कहीं वह रात के भीतर ही तो दुबकी नहीं पडी है और बाहर आना ही नहीं चाहती। मैं दिल्ली में हूँ या उत्तरी धु*व के किसी शहर में जहाँ सुबह को आने में कई बार छह महीने लग जाते हैं। कौन जाने, दर्द में डूबा मनुष्य न स्थान का निश्चय कर पाता है न समय का। वह अस्थान और असमय में रहने को अभिशप्त होता है। दर्द दूसरा काम यह करता है कि वह आपको आफ आसपास से काट देता है। तब आप मानो शून्य में पुच्छल तारे की तरह झूलने लगते हैं।
सिस्टर अंशु की आवाज आ रही है। वे सिरहाने खडी बारीक आवाज में कुछ कह रही हैं। मैंने जब आँखें खोली, तब मुझे पता चला कि वे बन्द थीं। वॉर्ड में हल्का पीला उजाला फैल गया है। मैं चमत्कृत हूँ। मानो सुबह न हुई हो, पृथ्वी का नया जन्म हुआ हो। शायद बीच में मेरी थकान ने मेरे दर्द को पीछे छोड दिया था और मैं कुछ देर सो गया था या शायद हल्की-सी बेहोशी में फिसल गया था। यह सच था कि मेरे चारों ओर के प्रकाश की रंगत बदल चुकी थी। हाँ, यह सुबह ही है जिसमें मैंने अपनी थकी आँखें खोली हैं। आप मुँह धो लीजिए। अंशु कह रही है। उसके हाथ में सफेद कागज के तीन गिलास हैं और मुझे कुल्ला करने के लिए आधे चाँद-सा सफेद प्लास्टिक पात्र। उसने मेरे ऊपर पहिये वाली मेज लगायी और उस पर यह सब रख दिये। मैं बडी मुश्किल से ट्यूब से मंजन निकालने का प्रयास करता हूँ। पास खडी अंशु कुछ देर मुझे प्रयास करने देती है। फिर मेरे हाथ से ब्रश लेकर उस पर मंजन रख देती है। मैं तेजी से दाँतों पर ब्रश घिसना शुरू करता हूँ और कुल्ला कर लेता हूँ। वह कहती हैं, ठीक से करिये। मुझे कुछ और देर दाँत घिसने पडते हैं।
क्या आज भी मुझे खाली पेट रहना है? मैं अपने दाँत साफ करने के औचित्य को समझने के लिए यह पूछता हूँ।
नहीं, आज से आप कुछ पी सकते हैं। जैसे फलों का रस या नारियल पानी!
मैं पूछना चाहता हूँ, और चाय! पर चुप रहा आता हूँ। चाय पिये हुए मुझे दो साल हो गये हैं, तब भी आज उसकी याद आ रही है।
अब सिस्टर अंशु चाहे नारियल पानी पिलाये या रस या कुछ और पर सुबह हो गयी है। मैं दिल्ली में ही हूँ, उत्तरी धु*व पर नहीं।
हाँ, सुबह! धूप के चमकीले धागे पिछली खिडकी से चुपचाप निकलकर मेरे दर्द में डूबे शरीर पर बिखरते जा रहे हैं। घास के तिनकों की तरह।
हाँ, सुबह हो गयी है। काश कहीं से गाय के रंभाने की आवाज आ जाए।
हाँ, सुबह हो गयी है। अब नीले आकाश में पक्षियों की उडानों की लकीरें तिर रही होंगी।
हाँ, यह सुबह ही है। मेरी आँखों को बिना चश्मे भी दूर तक दिख रहा है।
धूप के तिनके बारीक होते जा रहे हैं।
मेला
स्कूल वहाँ नहीं लगता था। वह जगह स्कूल की नयी इमारत के लिए फौज ने दी थी। उन दिनों फौज का बडा अफसर उदार रहा होगा वरना केण्टोमेण्ट में ऐसे स्कूल के लिए इतनी सारी जगह कैसे मिलती जिसमें फौजियों के बच्चों के अलावा बहुत-से गैर-फौजियों के बच्चे पढते हों। स्कूल इस खुली जगह से कुछ दूर लगता था। गैर-फौजियों को सिविलियन कहा जाता था। मैं अपने फौजी स्कूल का सिविलियन था। मैं अकेला नहीं था। स्कूल में कई सिविलियन थे। फौजियों के घर के बच्चे हम लोगों को कुछ अलग मानते थे। शायद कमतर मानते रहे हों। या यह मानते रहे हों कि उनके लिए विशेष तौर पर बने स्कूल में हमने जोर-जबरदस्ती दाखिला ले लिया था। पर ऐसा था नहीं। हमारा स्कूल फौजियों और गैर-फौजियों दोनों के बच्चों के लिए बना था। लेकिन यह उन्हें समझाना मुश्किल था। यह धारणा उनकी आँखों में होती थी, जुबान पर नहीं।
फौजियों के बच्चों को स्कूल लाने और घर ले जाने हरे फौजी ट्रक आते थे जिनके पिछले हिस्सों में लम्बाई में लकडी की बेंचें लगाकर उन्हें बैठने लायक बनाया जाता था। बेंचों के सिरे पर दो लोहे की हरी जाली लगी रहती। दोनों जालियों के बीच दो-तीन सोपान वाली सीढी लटकी रहती। इन पर पाँव रखकर बच्चे ट्रक पर चढकर बेंच पर बैठ जाते थे। कुछ बच्चों को खडा रहना पसन्द था। वे बेंचों के बीच ठीक समय पर ऊपर लटकी रस्सी पकड कर खडे रहते। इन हरे ट्रकों में लडके और लडकियाँ स्कूल आते-जाते थे। फौजी ट्रकों के देर से आने का सवाल ही नहीं था। इससे बच्चों के मन पर फौजी अनुशासन के श्रेष्ठ होने का प्रभाव पडता। वह हमेशा ऐसे ही एक ट्रक के पिछले हिस्से में जाली से सटकर ऐसे बैठती थी कि वह ट्रक के पीछे छूटती सडक और उसके दोनों ओर के लगातार पीछे छूटते दृश्य देखती रह सके और स्वयं भी दिखती रह सके। उसका दिखते रहना संयोग था, उसकी इच्छा नहीं। इतना मैं समझता था। वह पहाडी लडकी फौज के बडे अफसर की बेटी थी। छोटी-छोटी आँखें, छोटे-से गोरे चेहरे पर चमकतीं। गोल-से चेहरे के दोनों ओर से गहरे काले बाल लहराते हुए कन्धों तक आ जाते और ट्रक में आती तेज हवा में हिलते रहते मानो किसी घने वृक्ष के भीतरी पत्ते हिल रहे हों। कई बार उसके बालों पर लाल रिबन चमकता, जो बालों को बाँधे रहता पर खुद हवा के झौंकों से हिलता रहता। उसका कद बहुत नहीं था। ट्रक की बेंच पर बैठने पर वह छोटी-सी दिखायी देती।
हम कुछ दोस्त अपनी साईकिलों पर उसके ट्रक के चलने के पहले ही स्कूल से निकल जाते और फिर कम-से-कम मैं उसके ट्रक के हमारे पास से गुजरने की राह देखता। कई बार वह हरा ट्रक बहुत जल्दी हमारी साईकिलों को पीछे छोडता आगे निकल जाता, कई बार मुझे देर तक इन्तजार करना पडता। मैंने यह सोच रखा था कि ट्रक कितनी ही देर से क्यूँ न आये, मैं पीछे मुडकर नहीं देखूँगा। मुझे खुद पता नहीं था कि मैंने ऐसा क्यों तय कर रखा था। उन दिनों न मै´ जानता था न यूरीडिस को। अगर जानता भी, यह पीछे न मुडने का कारण नहीं होता। जैसे ही हमारे पीछे से किसी ट्रक के आने की आवाज पास आती, मेरी धडकन बढ जाती और मन की सिरहन शरीर में फैलने लगती। जब ट्रक पास से गुजरता मैं थोडा संकोच से आँखें ऊपर उठाकर ट्रक के पिछले भाग में रखी बेंच की ओर देखताः वह वहाँ बैठी होगी और पीछे देख रही होगी। पर ऐसा अक्सर होता कि पास से गुजरता ट्रक किन्हीं दूसरे छात्रों को ले जा रहा होता और उसमें वह कहीं दिखाई नहीं देती। मैं हडबडा कर संकोच छोडकर ट्रक के पिछवाडे में बैठे या खडे एक-एक छात्र या छात्रा को जल्दी-जल्दी देख डालता कि कहीं वह और किसी जगह पर न बैठी हो। *यादातर वह कहीं दिखायी नहीं देती। मुझे तसल्ली हो जाती।
फिर अगले ट्रक का इन्तजार शुरू हो जाता। इस समय मेरे साथ अपनी साईकिलों पर सवार मेरे दोस्त जो भी मुझसे कहते, मैं उसका बिना सुने जवाब देता रहता। तभी एक और ट्रक के पीछे से आने की आवाज मेरे कानों में तेज होने लगती। जब उसका ट्रक पास से गुजरता, वह शायद ही कभी हमें देख रही होती, बल्कि अगर देखती भी होगी, मुझे उसका पता नहीं चल सका। मुझे यही लगता कि उसने कभी उस चलते हरे ट्रक से हमारी ओर नहीं देखा। पर मैं बिल्कुल धीरे से पलकें उठाकर उसे नजर भर देख लेता, फिर कहीं और देखता हुआ उसके ट्रक की बेंच पर बैठे होने की कल्पना करता रहता। यही कुछ क्षण सबसे खूबसूरत होते थे, जब मैं अपने सामने जा रहे ट्रक को देखकर भी नहीं देखता और कल्पना में उसे ही दोबारा पाकर उसके कण-कण को ध्यान से देख पाता। मानो मैंने अपने आगे भागते हुए ट्रक को कल्पना में रोक लिया हो और उसे पूरे विस्तार से देख रहा हूँ।
उन दिनों स्कूल में लडकों-लडकियों के बीच बहुत कम बात होती थी। फौजी घरों की लडकियों और सिविलियन लडकों के बीच कोई खास बात नहीं होती थी। अगर थोडा बहुत होती भी थी, वह केवल अव्वल आने वाले लडकों और फौजी लडकियों के बीच ही होती थी। अव्वल लडकों से ये लडकियाँ कभी-कभी कुछ पढती थीं। इस बहाने उनमें बात हो जाया करती थी। बाकी के लिए कैशोर्य का आकर्षण उन्हें दूर से देखते हुए ही तृप्त हो जाया करता था या उपन्यास पढते हुए। और यह भी सच था कि स्कूल के पुस्तककालय में पुस्तकों के अलावा भी बहुत कुछ देखा जा सकता था।
स्कूल के पास की एक लम्बी-चौडी जगह में स्कूल की नयी इमारत बन रही थी। शायद तम्बुओं में हमें पढाते हुए स्कूल प्रशासन थक गया हो। शायद उन्हें लगा हो कि इमारत बनाने का वादा निभाने का समय आ गया था। उन दिनों स्कूल के प्राचार्य फौज की सेवा से मुक्त गाँधीवादी सज्जन थे। वे खादी के कपडे पहनते और सीधे तनकर चलते।
वे जब भी किसी भूतपूर्व अफसर की तरह छात्रों को केन से पिटाई की सजा देते, पिटाई से पहले वे सच्चे गाँधीवादी की तरह खुद की हथेली पर केन से मारते, फिर छात्र की हथेली को लाल करते। एक बार उन्होंने अपनी हथेली पर इतनी जोर से केन चलायी कि वह मोटी लकडी की केन टूट गयी।
वे नयी इमारत बनने में बच्चों से श्रमदान कराने के पक्ष में थे। श्रमदान का अर्थ था कि हम सभी छात्र कम या अधिक भारी पत्थर उठाकर अपने स्कूल से उस नयी जगह पर ले जाया करते। इनके बीच की दूरी करीब तीन-चार सौ मीटर से अधिक नहीं रही होगी। पत्थर को इतनी दूर ले जाना आसान नहीं होता था। हम रास्ते में पत्थर को बार-बार सडक किनारे रखते हुए रास्ता पार करते। यह सब करते हुए भी मैं चुपचाप यह देखता रहता कि वह कहाँ चल रही है। अगर वह कहीं पास में चल रही होती, मेरा मन खुशी से भर जाता। मैं ऐसा कुछ करना चाहता कि उसके हाथ का पत्थर हल्का हो जाये। वैसा कुछ करना मुझे सूझता नहीं था और मेरा मन उलझ कर रह जाता था। अगर वह बहुत पीछे आ रही होती, मैं बहुत पहले नये स्कूल की जगह पहुँच कर हाथ में उठाया पत्थर नियत स्थान पर पहुँचा कर, उस रास्ते से लौटने लगता जिससे वह आ रही होती। यह रास्ता सडक से स्कूल की नयी जगह के बीच मैदान में बनी पगडण्डी होता। वह इतनी संकरी थी कि उस पर केवल एक बच्चा चल सकता था। जैसे ही सामने से आती हुई वह हाथों में पत्थर उठाये बिल्कुल करीब आती, मैं झटके से पगडण्डी से अलग हो जाता और उसे जाने की जगह दे देता। वह यहाँ भी बिना मुझे देखे चलती जाती मानो मेरा हटना कोई ऐसी बात न हो जिसे वह दर्ज भी करना चाहे।
उस दिन उस नयी जगह पर स्कूल का मेला भरा। खुली जगह पर थोडी-थोडी-सी दूरी पर छात्र-छात्राओं ने तरह-तरह की दुकानें लगायीं थी। कई दुकानों में उनकी मदद के लिए उनकी बहन या भाई भी आये थे। कुछ ने खाने-पीने की दुकानें लगायीं जिनमें घर से बनवा कर समोसा आदि रखे गये थे, कुछ छात्र-छात्राएँ देोसा इडली बनवाने के लिए कारीगर-बावर्चियों को लेकर आए थे और वे दुकानों के पीछे अलाव जलाकर वहीं वह सब बना रहे थे। कुछ ने मिठाइयों की दुकानें लगायी थीं। कई और छात्र-छात्राओं ने तरह-तरह के खेलों की दुकानें लगायी थीं। इनमें एक दुकान लकडी का गोला फेंकने की थी, दुकान के भीतर मेज पर तरह-तरह की चीजें रखी थीं। अगर कोई दूर से किसी चीज पर गोला डाल देता, वह चीज-कोई खिलौना या शरबत की बोतल- उसकी हो जाती।
मेले के दिन हमारे आधे-फौजी स्कूल में मनपसन्द कपडे पहनकर आने की छूट थी। वैसे पढाई के दिनों में सभी को गहरी नीली पेण्ट या स्कर्ट और सफेद कमीज पहनकर आना होता था। सर्दियों में ऊपर से नीली स्वेटर या कोट पहन कर आ सकते थे। मुझे स्कूल के लिए बन्द गले का कोट सिलवाया गया था, जो मुझे नापसन्द था। मैं उसे पहनने में आनाकानी किया करता, पर पिता के डर से उसे मुझे लगभग हर रोज पनाया जाता था। मुझे वह अटपटा जान पडता। शायद इसलिए कि ऐसा कोट कोई और छात्र नहीं पहनता था। शिक्षक लोग मुझे उसे पहने देखकर हल्का-सा मुस्करा देते थे। या शायद मुझे ही ऐसा लगता रहा हो। अलग से दिखायी दूँ, यह इच्छा मुझे नहीं थी बल्कि अलग से दिखने में मुझे पीडा होती थी। मेरी इच्छा होती कि उसे उतारकर रास्ते में कहीं फेंक दूँ। हमारी बस के ड्रायवर और कंडक्टर मुझे पहचानते थे, उनके सामने कोट नहीं फेंका जा सकता था। स्कूल के अहाते में भी यह नहीं किया जा सकता था। सभी मेरे कोट के विषय में जानते थे। मैं मन मारकर कुछ दिनों उसे पहनता रहा। फिर बहनों को मुझ पर दया आ गयी। उन्होंने मेरे लिए सुन्दर नीली स्वेटर बुन दी। मेला सर्दियों में भरा था। उस दिन मनपसन्द रंगीन स्वेटर पहनकर जाया जा सकता था। मुझे अपने कपडों में रुचि नहीं बची थी। मैं उसे अपनी ओर आकर्षित करना नहीं चाहता था। शायद ऐसा करना मेरे दिमाग में आया ही नहीं था। मुझे सिर्फ यह जानने की उत्सुकता थी कि मेले में वह कैसे कपडे पहन कर आती है। इसकी कल्पना एक रात पहले से कर रहा था। मुझे डर था कि कहीं वह रंगीन कपडों में उतनी सुन्दर न लगे, जितनी वह स्कूल की पोशाक में लगती थी। यह सब सोचते हुए मेरा चेहरा शर्म से लाल हो जाता और मुझे वह जलता हुआ महसूस होता।
मैंने सुबह जल्दी उठकर कुएँ पर ठण्डे पानी से नहाया। वे कपडे पहने जिनमें मैं बाजार जाता था। या किसी परिचित के घर। जल्दी-जल्दी नाश्ता किया, माँ से पैसे लिये और साईकिल लेकर मेले की जगह पर भागा। साईकिल कई वर्षों पहले खरीदी गयी थी। तब पिता जीवित थे। वे मुझे साईकिल लेकर कहीं भी जाने नहीं देते थे। उन्हें डर लगा रहता था कि कहीं मैं अपनी बेखबरी में किसी से टकरा न जाऊँ। वे सोचते थे कि मैं अपने विषय में बेहद लापरवाह हूँ। मैं आज तक यह जान नहीं पाया हूँ कि ऐसा सचमुच था या यह उनका अपनी सबसे छोटी सन्तान के प्रति गहरे वात्सल्य से उपजा निराधार भय था। उनके इस डर के कारण मैं अपनी साईकिल घर के बाहर नहीं चला पाता था। मैं उसे घर के आँगन में ही घुमा लेता। उसे बाहर ले जाने की इच्छा मन में ही रही आती। पिता के न रहने के बाद मैंने बस से स्कूल जाना बन्द कर दिया और जिद करके माँ को तैयार कर लिया। मैं साईकिल से स्कूल जाने लगा। बस की अपेक्षा साईकिल से जाने में थोडी अधिक मेहनत लगती थी, पर साईकिल से जाने में मैं कहीं भी रुक कर फूलों वाले पेडों या जमीन से अचानक ऊपर उठ आयी बाम्बियों को, उनके भीतर जाती और उनसे बाहर आती चीटियों को या लहरा कर पहाड के नीचे जाती सडक या लगभग आकाश में धँस गये नीलगिरि के वृक्ष को देर तक देख सकता था। कईं बार मैं रास्ते के ढाबे में जाकर गरम समोसा भी खा लेता और इस तरह अजनबी जगह के खाने में अपने वयस्क होने को चखता।
साईकिल मेले के बाहर टिकाकर मैं इधर-उधर ताकता मेला परिसर में चला गया। छात्रों के माता-पिता या भाई-बहन उनके साथ मेले की सैर करने आये थे और बहुत खुश दिखायी दे रहे थे। इनमें से कुछ को मैं पहचानता था। मैं उन्हें नमस्ते करता हुआ और उनके पास न रुकता हुआ तेजी से घूमने लगा। कोई मुझे देखता तो यही समझता कि मैं किसी खास जगह जा रहा हूँ। पर ऐसा नहीं था। मैं तेजी से सिर्फ यहाँ-वहाँ भटक रहा था। इस बीच मेरे दोस्त मुझे दुकानों पर या यूँ ही राह में रोक लेते पर जब वे पाते कि मैं कहीं और जाना चाह रहा हूँ, वे खुद ही अलग हो जाते। गणित के शिक्षक मुझसे कुछ अधिक देर तक बात करते रहे। उनसे भी मेरी कहीं और जाने की बेचैनी छिपी न रह सकी। उन्होंने किसी तरह अपनी बात जल्दी से खत्म की और एक तरफ चले गये।
वह मुझे कहीं नहीं दिख रही थी।
शायद उसने दुकान लगायी हो, सोचकर मैं एक सिरे से सभी दुकानों में जाने लगा। पहली दुकान के बाहर की जगह पर बीस-पच्चीस कुर्सियों पर लोग बैठे थे। बीच-बीच में लाऊडस्पीकर पर कुछ नम्बर बोले जा रहे थे। जैसे ही नम्बर बोले जाते कुर्सियों पर बैठे लोग अपने हाथों की गुलाबी पर्चियों पर कोई निशान लगा देते और फिर ऊपर देखने लगते। लाऊडस्पीकर के आसपास स्कूल के कुछ लडके-लडकियाँ हर आते-जाते को कुर्सियों पर बैठने का आग्रह करते। मैं उसे देखता हुआ आगे निकल गया। अगली कुछ दुकानों में खाने-पीने की चीजें रखी थीं। मिली-जुली-सी गन्ध वहाँ की हवा में तैर रही थी मैं उन पर भी नहीं रूका।
फिर आयी वह दुकान जिसके आगे की मेज पर तीन राइफलें रखी थीं। दुकान के अन्दर की दीवार पर गुब्बारे टँके हुए थे। एक फौजी अफसर रायफल से गुब्बारे फोडते जा रहे थे और इनाम पाते जा रहे थे। वे हँसते हुए दुकान पर खडे हताश लडके से कह रहे थे।
तुम लोगों ने फौजी-इलाके में निशानेबाजी पर इनाम रखने की जो गलती की है, वही तुम पर भारी पड रही है।
दुकान का लडका उनसे अनुनय कर रहा था कि वे निशाना लगाना बन्द कर दें। मैं पल-दो-पल मुस्कराता वहाँ खडा रहा फिर आगे चला गया। एक के बाद दूसरी दुकान पीछे छूटती जा रही थी। वह कहीं नहीं थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह आयी ही नहीं या आकर पहले ही घर लौट गयी हो, यह हो सकता है क्योंकि फौजी लोग अपनी बेटियों को बहुत बाँधकर रखते हैं। या शायद वह बीमार हो गयी हो। पर कल स्कूल में तो वह ठीक थी। तरह-तरह के विचार चारों ओर घूमने लगे। ऐसे समय में आशंका सबसे पहले तुम्हें घेर लेती हैं, समझ दूर खडी रह जाती है। मैं दोस्तों से भी मिलना नहीं चाहता था। ऐसा अकेलापन भीतर फैलना शुरू हुआ कि लगा सारा अन्तस वीरान हो गया है। मैं घर जाने के लिए साईकिल की ओर बढने लगा। कुछ दूर खडे मेरे चार-पाँच दोस्तों ने हाथ हिलाकर मुझे पास बुलाया। मैं उनके इशारों की अनदेखी कर धीरे-धीरे चलता रहा।
किसी ने कन्धे पर हाथ रखकर मेरा नाम लिया। हाथ पसीने से हल्का-सा गीला था। मैं मुड गया। वह खडी थी। उसकी आँखें क्षणभर को मुझ पर टिकीं, फिर मेले में खो गयीं। वह बहुत सुन्दर नीली पोशाक पहने थी जिस पर हल्के नीले फूल बने थे। गहरे काले बाल खुलकर कन्धों और पीठ पर बिखरे थे मानो पिछली रात के अंधेरे का एक टुकडा उसकी पीठ पर चिपका रह गया हो और रह-रहकर चमक रहा हो। माथे पर चटख लाल रंग की बिन्दी लगी थी और कानों में कुछ अधिक ही लम्बी बालियाँ झूल रही थी। मैंने लगभग हाथों से पकड कर अपनी नजरों को उस पर से हटाया।
वह पूछ रही थी, क्या तुमने... को देखा है?
उसने अपनी किसी सहेली और हमारी सहपाठी का नाम लिया। मैं उसे सुन नहीं पाया। उसकी आवाज में वही अजनबियत थी जो राह में किसी से समय पूछते वक्त होती है। मैं कोई जवाब दे पाऊँ, इससे पहले ही उसे उसकी वह सहेली दिख गयी। वह तुरन्त उस ओर चली गयी।
मैं गुमसुम खडा रह गया। मेरे अन्तस के वीराने में हरीतिमा छाने लगी। क्षण भर में वहाँ चारों ओर वनस्पतियों का विस्तार होने लगा। कलकल करते झरने बहने लगे। पक्षियों की कलरव सुनायी देने लगी। और मुझे लगा कि मेरे भीतर की सुगन्धि ने मुझे हर ओर से किसी महीन रेशम की तरह लपेट लिया है। मैं अन्तरतम तक आवाजों से, रंगों से, गन्धों से भर गया। मानो सारी प्रकृति मुझमें समाती जा रही हो ओर मैं हल्का होकर हवा में उड रहा हूँ और हवा का एक-एक रेशा मेरे गालों से टकरा रहा हो।
मेरे सहपाठी पास आकर खडे हो गये थे। वे कुछ कह पायें, इससे पहले ही मैंने दो के हाथ पकडे और बोला - मैंने आज तक चाय नहीं पी। वहाँ कोने में बिट्ठल ने चाय की दुकान लगायी है, चलो आज पीकर देखें, कैसी लगती है।
दक्षिण अरब
मैं साऊदी अरब जा रही हूँ। सिस्टर एलेक्स बोली।
क्या, आपका यहाँ मन नहीं लग रहा?
मुझे समझ में नहीं आ रहा था, इतना अच्छा अस्पताल छोडकर यह कम उम्र नर्स दक्षिण अरब क्यों जाना चाहती है। क्या उसे पता नहीं है कि वहाँ जाकर उसकी अनेक स्वतन्त्रताएँ छिन जाएँगी। उसे उन कायदों में बँधकर रहना होगा जिनका उसे अभ्यास नहीं होगा। मुझे अपनी ओर अचरज से देखते हुए पाकर वह कुछ देर चुप रही आयी। वह काँच की खिडकी के सामने बैठी थी और उसके दोनों ओर से रोशनी मेरे वार्ड के भीतर जा रही थी। मानो वह रोशनी की धारा के बीच बैठ गयी हो। उसका चेहरा हल्के अंधेरे में था। शायद यही कारण रहा हो कि मैं उसके चेहरे पर भागती मुस्कराहट नहीं देख पाया। जब मैंने उसे ध्यान से देखा, उसकी मुस्काहट के बचे हुए अंश चेहरे पर इधर-उधर बिखरे थे।
उसके पीछे काँच की खिडकी में कुतुबमीनार दिख रही थी, बल्कि ऐसा लग रहा था कि उसके सिर के ऊपर कोई मीनार उग आयी हो। कई बार लगता कि पास के हवाई अड्डे पर उतरते जहाज मीनार से टकरा जाएँगे। पर वे बडी खुबसूरती से उसके पास से होकर हवा में फिसलते-से आगे निकल जाते। मीनार साबूत बची रह जाती। सदियों से मध्यदेश में अगडिया सम्प्रदाय रहा करता है। वे हमेशा से ही लोहा बनाते आ रहे थे जिसे अंग्रेजों ने बन्द करवा दिया। वे यह मानते आ रहे हैं कि बिल्कुल आरम्भ में जब सृष्टि की शुरुआत हुई थी, जब सारे ग्रह आदि बने-बने ही थे, हमारी पृथ्वी अन्तरिक्ष के शून्य में थम नहीं पा रही थी। इस कारण मनुष्य समेत सभी प्रााणी उस पर लडखडाते थे। वे न चाहते हुए भी गिर पडते थे। इस कारण सारा कार्य-व्यापार रुक गया था। जब प्रजापति ने यह समस्या अगडियों के सामने रखी, उन्होंने इसका उपाय खोज निकाला। उन्होंने अपने बनाये लोहे से बहुत बडी कील बनायी और पृथ्वी के बीचों-बीच ठोंक दी। पृथ्वी का हिलना बन्द हो गया और धरती पर चहल-पहल शुरू हो गयी। मुझे कुतुबमीनार उसी कील का बाहर छूट गया हिस्सा लगता है। वही हिस्सा सिस्टर एलेक्स के सिर के ऊपर उगा लग रहा था।
जब उसकी आवाज दोबारा कानों में पडी मैं भूल ही चुका था, हम किस बारे में बात कर रहे थे।
मुझे यहाँ सिर्फ पन्द्रह हजार वेतन मिलता है, इसमें आधे से अधिक मकान के किराये में निकल जाता है। बचे हुए रुपयों में खर्च चलाना कठिन होता है।
उसे सुनते हुए मुझे याद आ गया, हम किस बारे में बात कर रहे थे। अस्पताल में रहते हुए यह अक्सर होता है कि आपका दिमाग किसी एक चीज पर टिका नहीं रहता, लगातार भटकता है। वह कभी किसी चीज पर टिकता है, कभी किसी और चीज पर फिसलता है। यह शायद इसलिए होता है कि आप इलाज के प्रभावों को बहुत बारीकी से परख रहे होते हैं क्योंकि आप उपचार पर पूरा विश्वास करते हुए किसी हद तक अविश्वास भी करते हैं। विश्वास और अविश्वास की धूप-छाँव में भटकता मन अगर किसी खास चीज पर ठहर न पाए तो आश्चर्य कैसा?
पर उसे दक्षिण अरब जाकर क्या मिलेगा?
वह अब मेरे कमरे के सोफे के बायीं और की कुर्सी पर बैठ चुकी थी। मुझे कुछ देर देखती रही मानो तय कर रही हो कि मुझ पर विश्वास किया जा सकता है या नहीं। वह कुछ रुककर दबी आवाज में मानो किसी परदे के पीछे से बोली, सऊदी अरब में, मुझे अडसठ हजार रुपये मिलेंगे। यहाँ से चार गुना *यादा।
वहाँ खर्च भी *यादा होगा।
कितना भी *यादा हो- मैं दो-तीन साल में अपने लायक खूब पैसा जमाकर लूँगी और केरल चली जाऊँगी। यहाँ रही तो यहीं रह जाऊँगी।
एलेक्स दक्षिण अरब होते हुए ही दिल्ली से केरल जा सकती थी। इस बीस-बाईस की लडकी में कैसा आत्मविश्वास है। यह इतनी दूर पराये देश में इसलिए जा रही है कि किसी दिन अपने घर लौट सके।
शाम कुछ देर ठहरी रहने के बाद अचनक रात की गहरायी में डूबने लगी थी। पक्षियों का लौटना शुरू हो गया था। वे झुण्ड के झुण्ड तीर-की-सी तेजी से मेरे कमरे की खिडकी की एक तरफ से दूसरी तक पहुँच कर गायब हो रहे थे। इनके भी कहीं कोई अपने पेड होते होंगे, जिन पर ये रात बिताते होंगे। डाल को थामे हुए पल दो पल आँखें मूँदते होंगे। घोंसले तो वे अपने बच्चों के लिए बनाते हैं।
सिस्टर एलेक्स ने उठकर कमरे को रोशन कर दिया। रोशनी के आते ही शाम की वह फीकी-सी उजास जिसमें निरन्तर अंधेरा घुल रहा था मानो खिडकी के बाहर कूद गयी। मुझे लगा मानो कोई मर्यादा टूट गयी हो। मैं जोर लगाकर कुर्सी से उठ गया और मुश्किल से चलकर बिस्तर की ओर बढने लगा। एक जगह बैठे रहने से शरीर में कहीं न कहीं दर्द का छोटा या बडा कोई न कोई अंगार सुलगने लगता था। एलेक्स ने मेरा कन्धा पकड लिया और मुझे बिस्तर तक ले गयी। वह बिल्कुल चुप थी और फर्श पर सँभलकर चलते मेरे पैरों को ताक रही थी। बिस्तर के पास पहुँचकर मैंने चप्पल से एक पाँव बाहर निकाला और पायदान पर जमाया, फिर दूसरा पैर पायदान की ओर बढा दिया। वह मेरा कन्धा पकडे रही और मैं पूरा घूमकर अनुमान से बिस्तर पर बैठ गया। एलेक्स उल्टी चलती हुई बिस्तर से दूर जाने लगी। काँच की खिडकी के पीछे अंधेरे में टँकी हुई कुछ रोशनियाँ थीं। वह मुडी और दरवाजे की ओर बढने लगी।
मेरे जाने का समय हो गया। वह बोली।
मैं उसे देखता रह गयाः जाती हुई रोशनी की खूबसूरती और अचानक आ गयी ठेर-सी रोशनी की हिंसा के बीच फँसा हुआ मैं यह भूल ही गया था कि हम कुछ ही मिनट पहले उसके भविष्य के बारे में बात कर रहे थे। वह जाते-जाते खुले दरवाजे से टिक कर रुक गयी। वह पहले फर्श की ओर देखती रही फिर मेरी ओर सिर घुमाकर बोली, मैं इन दिनों अक्सर अपने को सऊदी अरब की सडक के किनारे पूरा सिर ढँककर जाते हुए देखती हूँ, पास से तरह-तरह की मंहगी गाडियाँ गुजरती रहती हैं। मेरी सिर्फ आँखे खुली होती हैं, बाकी सब कपडों से ढका रहता है। इन पलों में डर-सी जाती हूँ, मुझे साँस लेने में दिक्कत होने लगती है। लगता है साँस भीतर नहीं खींच पा रही, मेरे मुँह को ढाँपने वाला कपडा बार-बार मेरी नाक में घुस रहा है।....’
वह बोलती हुई भी उसी अवस्था से गुजरने लगी थी, जो वह सुना रही थी। शायद इसीलिए वह बोलते हुए धीरे से चुप हो गयी। मानो उसकी ऊर्जा एकाएक खत्म हो गयी हो।
मैं बिस्तर पर लेटे हुए उसे सुन रहा था। उसके रुकते ही मैं चौंक-सा गया। इस लडकी ने वह सारी तकलीफ अभी से भोगना शुरू कर दी है जिसे ये दो-तीन महीने बाद शायद सचमुच भोगे। तकलीफ की कल्पना और सचमुच की तकलीफ में बहुत अन्तर नहीं होता, यह मैं अपनी बीमारी के दौरान समझ गया था। पर इस किशोरी के साहस की आड में छिपी इसकी थरथराती पीडा को देखकर मैं कुछ पलों के लिए हिल-सा गया। मनुष्यों का हमारा यह संसार लगातार मथा जा रहा है, करोडों लोग यहाँ से वहाँ फेंके जा रहे हैं। कौन कहाँ गिर जाये, कोई ठिकाना नहीं। अब यह मन्थन तो क्या रुकेगा, मनुष्यों को ही इसके बीच धीर होना सीखना होगा। हाँ, धीर कि वह खुद को किसी हद तक जान सके, हवा को त्वचा पर, सुख को अपने मन पर सरकता-सा महसूस कर सके।
वह जा चुकी थी। वार्ड का दरवाजा बन्द हो गया था। अगली नर्स के आने में अभी वक्त था। मैं मुश्किल से अपने बिस्तर से उतरा और खिडकी के सामने सोफे पर बैठ गया। कुछ देर यूँ ही बिना कुछ सोचे ही बैठा रहा। बढते अंधेरे में टिमिटमाती बत्तियों का प्रकाश तेज होता जा रहा था। अचानक यह लगा कि मुझे कहीं लौटना है। कहीं लौटना है। पर देर तक इस एहसास के रहने के बाद भी मुझे यह सूझ नहीं पडा कि मुझे कहाँ लौटना हैः यहाँ अपने बिस्तर पर या इस शहर के अपने अस्थायी डेरे पर या अपने शहर के अपने घर पर या और कहीं। कहाँ लौटना है? या फिर यह एहसास किसी खास जगह लौटने का नहीं था। सिर्फ लौटने का था। किसी भी जगह से बँधा लौटना नहीं, सिर्फ लौटना, सिर्फ समय में फैलता हुआ लौटना।
वार्ड का दरवाजा खुलने की आवाज हुई। खाने की तश्तरी लिए रात की नर्स भीतर आ गयी।
सिस्टर सिस्सी
वे जब सघन चिकित्सा इकाई में आयीं, लगा मानो पूरी इकाई की ऊर्जा का स्तर एकाएक बढ गया है। उनके शरीर की फुर्ती देखते ही बनती थी। उनके चलने में गहरा आत्मविश्वास भी था या शायद मुझे ही लगा हो। मैं अपने ऊँचे बिस्तर पर लेटे हुए, न सो पाने और और कुछ न करने के कारण उन्हें काम करते हुए देख रहा था। यह शायद इसलिए हो रहा होगा कि वे फुर्ती में अधिक आकर्षक हो गयी हों। पर शायद ऐसा था नहीं। चिकित्सा वार्डों में यह अक्सर होता है कि आप किसी भी व्यक्ति या चीज को अचानक बहुत ध्यान से देखने लगते हो मानो उसे देखना आफ लिए जीवन-मरण का प्रश्न हो। शीघ्र ही आपको पता चल जाता हे कि आप जिसे देख रहे थे, उसका कोई विशेष अर्थ नहीं था। पर इससे इतना अवश्य होता है कि कुछ देर तक आपका ध्यान बँधा रहा आता है और इससे भी राहत मिलती है। भटकता ध्यान थकाता है। वह आपकी ऊर्जा का स्तर गिराता है। आप न कुछ सोच पाते हैं, न सोच से निजात पा पाते हैं। न कुछ ठीक से सुन पाते हैं, न सब कुछ अनसुना कर पाते हैं। सिर्फ तरह-तरह के विचारों और आवाजों के भंवर में फँसकर फडफडाते रहते हैं। वे तेजी से यहाँ से वहाँ जातीं, वार्ड के एक छोर से दूसरे की ओर भागतीं और फिर वहाँ से कहीं और चली जातीं। वे कुछ देर के लिए वार्ड में लगभग हर जगह नजर आ रही थीं। वे लम्बी-सी केरल की सुन्दर-सी लडकी थीं और बेहद कर्मठ जान पड रही थीं।
दोपहर में मैं यहाँ रहूँगी!
वे मेरे बिस्तर के पास आकर बोली। यह शायद इस अस्पताल का नियम था कि हर नर्स वार्ड में आने के बाद हर मरीज को अपने आने की सूचना दे।
उनके सहयोग के लिए गोलू नाम का वार्ड ब्वाय था। वह भी कर्मठ जान पडता था। उसने वार्ड में आते ही सफाई शुरू कर दी थी। मुझे लगा कि आज दोपहर एक बेहतर टीम हमारी देखभाल को इस वार्ड में आयी है।
मुझे लाख कोशिशों के बाद भी नींद नहीं आ पा रही थी। मुझे सीधे लेटे रहने में चैन नहीं आ रहा था। पेट फूल-सा रहा था। कुछ तनाव महसूस हो रहा था। इस सबसे मेरा दिमाग भी अपने ही रास्ते पर चल निकला था और कई तरह की कल्पनाएँ करने लगा था। डॉक्टर का मरीज होना इसीलिए उसके लिए बीमारी को कठिन, दुःसह्य बना देता है। सब कुछ न जानते हुए भी उसे जितना पता होता है, उसके आधार पर उसका दिमाग चलता चला जाता है और उसकी उद्विग्नता बढती चली जाती है। इस सब पर मेरा कोई वश नहीं था। इसे मुझे सहना ही है।
सुबह जब बहन मिलने आयी, मैंने उसे चश्मा भेजने को कह दिया था। उसे पता नहीं था कि वह किसके पास हो सकता है। मैंने याद किया और जब कुछ कुछ याद आया, मैं बोला-
मैं जब ऑपरेशन थियेटर जाने लगा, ले जाया जाने लगा, मैंने चश्मा बेटू के हाथ में दिया था। मुझे यही याद है! साथ में वह किताब भी भेज देना जो मैं ऑपरेशन के पहले पढ रहा था।
बेटू को पता है?
हाँ, वह इण्डोनेसियायी कवि का कविता-संग्रह था।
वह चली गयी। चश्मा और पुस्तक आने से शायद समय काटने में मदद होगी, मैं ऐसी उम्मीद लगाये था। पर ऐसा हुआ नहीं। दोपहर के कुछ आगे सरकने के बाद जब वार्ड में पिछली खिडकी से ढेर-सारी रोशनी आ रही थी, चश्मा और पुस्तक आ गयी। पुस्तक को देखते ही मुझे बरसों पुरानी बात याद आ गयी। जब मैंने अपने मित्र को इस कवि का संग्रह दिया, वह हठात् बोला था, इस कवि का नाम, नाम कम इण्डोनेसियायी गाली अधिक लगता हैः साले तेरा सपार्दी जोको दामोनो! मेरे दर्दीले शरीर में विद्युतल्लेखा की तरह हँसी उभरी और शरीर की सतह पर आते न आते फीकी पड गयी। मैं हल्का-सा मुस्कराकर रह गया। मैंने कविता-संग्रह पढने की कोशिश की पर पता नहीं क्यों, मैं पढ नहीं पाया। इस बीमारी के अनिश्चय ने मेरे साथ यह अवश्य किया हैः मेरी पढने की आदत कमजोर पड गयी है। मैं जैसे जैसे स्वस्थ होता जाऊँगा, मुझे पढने पर अधिक ध्यान देना होगा। मुझे उससे अधिक सुख बहुत कम चीजों में मिलता है। पढना मेरे लिए आनन्दलोक में प्रवेश करने जैसा रहा है। क्या मेरे लिए आनन्दलोक प्रवेश का कोई नया मार्ग उत्पन्न हो गया है? मुझे पता नहीं पर इतना पता है कि मुझे पढने को अपनी पहले जैसी सघनता के साथ वापस लाना है। मैंने कविता-संग्रह बन्द कर बिस्तर के ही एक ओर रख दिया। सिस्टर सिस्सी, यही उस नयी नर्स का नाम था, आयीं और उन्होंने तेजी से कविता-संग्रह को उठाकर सलीके से बिस्तर के पास ही मेज पर रख दिया। अभी भी छोटी-छोटी नलियों से कई तरह का द्रव्य मेरे शरीर में भेजा जा रहा था। पेशाब की नली से लगातार पेशाब पारदर्शी प्लास्टिक थैले में इकट्ठा हो रही थी। पेशाब को नाप कर एक चार्ट में लिखना होता है, सिस्टर सिस्सी को पेशाब नापने का काम पसन्द नहीं है, वे यह काम गोलू से कराती हैं और खुद दूर खडी होकर नोट करती हैं। आज मैंने नारियल पानी, सन्तरे का रस आदि पिया है और मेरी आँतें उस गति से चल नहीं रहीं जिनसे चलने की उनकी आदत है, इसलिए पेट कुछ भारी-भारी-सा जान पड रहा है। दोपहर को करीब चार बजे चाय आ गयी। मैंने अपने बिस्तर पर थोडा-सा उठकर वह पी ली। अब पेट और अधिक भरा-भरा जान पडने लगा। यही नहीं, मुझे लेटने में भी परेशानी होने लगी। मैंने सिस्टर सिस्सी को आवाज दी। वे आयीं। मैंने उनसे कहा कि मुझे नीचे सोफे पर बैठा दें। वे मेरे पास अवश्य खडी थी पर वे कुछ इस तरह व्यवहार कर रही थीं मानो उन्हें कहीं और कहीं अधिक आवश्यक काम से जाना है और मैं उनके काम में बाधा उत्पन्न कर रहा हूँ। मैंने उनके इस व्यवहार पर बहुत ध्यान नहीं दिया। मैं वैसे भी तब तक कुछ अधिक ही बेचैनी महसूस करने लगा था। अस्पताल में ऐसा होता है। आपको अचानक लगता है कि आप चारों ओर से बँध गये हैं, तब आप छूटने के लिए छटपटाते हैं। यह उद्विग्नता जितनी देर चलती है, बहुत कष्ट देती है। यह ऐसा कष्ट है, जो मन में उत्पन्न होकर शरीर के पोर-पोर में फैल जाता है। पर जितनी देर यह रहता है आपको निरन्तर अपनी स्थिति में परिवर्तन करते रहना पडता है ताकि कहीं भीतर आपको यह लगने लगे कि आप अपने बन्धनों को काटने का कोई गम्भीर उद्यम कर रहे हैं। यह शायद बीमारी का सबसे कष्टप्रद भाग होता है। डॉक्टर भी इसमें कुछ नहीं कर सकता। सिर्फ इन्तजार करना और धीरज रखना ही इसका उपाय है।
पर सिस्टर सिस्सी को इस सबसे कोई सहानुभूति नहीं थी। मैं उन्हें अपनी स्थिति बदलने जितनी बार बुलाता, वे आतीं अवश्य पर इस तरह आकर खडी हो जातीं मानो मैं उनके किसी बेहद जरूरी काम में जाने-अनजाने बाधा डाल रहा हूँ। इससे मेरी बढी हुई उद्विग्नता और बढ जाती। गोलू भी भागा चला आता। हालाँकि मुझे उठाने आदि का काम उसका नहीं था।
अगर मुझे आपका काम करते किसी ने देख लिया, मेरी नौकरी चली जाएगी, साहब!
वह बोला था।
पर तब भी उसने पूरी सफाई से मुझे कम-से-कम तीन बार बिस्तर पर और उतनी ही बार सोफे पर बिठाया पर वह यह सब पूरे धीरज और तन्मयता से करता रहा। उसे मरीज की तकलीफ को, फिर वह भले ही अटपटी ही क्यों हो, न समझने का अभ्यास नहीं है। वह अभी तक पर्याप्त विज्ञान-सम्पन्न नहीं हो पाया होगा।
मैं कई बार सिस्टर को बुलाता, वे जवाब तक देना आवश्यक नहीं समझतीं, वे ऐसे व्यवहार करतीं मानो उन्होंने मेरी आवाज सुनी ही न हो। ऐसे समय में मेरे पास के कमरे से अल्पना भी मेरे लिए उन्हें आवाज लगाती,
वे बुला रहे हैं।
पर इससे भी उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। सिस्टर सिस्सी के व्यवहार को समझना कठिन नहीं था। वे स्वभाव से नर्स हैं ही नहीं। यानी उनमें सहज सेवा भाव नहीं है। वे सिर्फ नौकरी कर रही हैं, सेवा नहीं और वे अस्पताल मरीजों के लिए नहीं, पिकनिक के लिए आती हैं। यह शायद इन दिनों जीने का लोकप्रिय ढंग हैः हमेशा पिकनिक मनाने की मनःस्थिति में रहो। इसके कारण आप जीवन के जटिल प्रश्नों का सामना करने से साफ बच निकलते हो। यह अलग बात है कि वे कहीं आगे खडे आफ आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं और तब आपको उनका सामना करना ही पडता है। मरीजों के कष्टों के बीच उनका समय राजी-खुशी बीत जाए, यही सिस्टर सिस्सी की कोशिश रहती है। यह बिल्कुल मुमकिन है कि उनके भावलोक में मरीजों का अस्तित्व हो ही नहीं। मैंने सोचा, हमारे सुखवादी समय में ऐसे कितने लोग होते जा रहे हैं जिन्हें अपने कर्त्तव्य का न बोध होता है न समझ। ये लोग दूसरी जगहों पर जैसे-तैसे खप जाते हैं, पर अस्पतालों में इनका होना खतरनाक है। ये ऊपर-ऊपर से अपना काम इस चतुराई से करते हैं कि कोई अँगुली न उठा पाये। पर दरअसल ये काम में जरा भी डूबते नहीं, इन्हें कुछ और करने की चाहना लगातार सताती रहती है। इन्हें नर्स का दायित्व देना न सिर्फ गलत है बल्कि शायद मरीज की जान से खेलने जैसा है। मैं बार-बार सिस्टर सिस्सी को बुलाता रहा, वे बार-बार उसी तरह आती रहीं मानो मैं उनके आवश्यक कार्य में बाधा डाल रहा हूँ। गोलू जितना कर सकता था, करता रहा। यह जानकर करता रहा कि उसे मुझे सीधे-सीधे छूने की इजाजत नहीं है।
जैसे कोई और समय, उद्विग्नता के वे दो-तीन घण्टे बिस्तर से सोफा और सोफे से बिस्तर पर आते-जाते कट गये। रात होने को आयी। मैं थक भी गया था। सिस्टर सिस्सी मरीज की अवहेलना कर चार्टों में कुछ भरती रहीं। मेरे भाग्य से जल्द ही उनके जाने का समय हो गया। उनके जाने की सम्भावना से मेरे मन में खुशी फैल गयी। मैंने सोचा, अब सिस्टर अंशु आएँगी, वे भले ही मेरे तकलीफ को कम न कर सकें, उसे समझने का प्रयास जरूर करेंगी। मनुष्य होने की यह भी एक विचित्रता है कि वह औरों को भले ही समझने का प्रयास न करे पर यह हमेशा, हर क्षण चाहता रहता है कि दूसरे उसे जरूर समझें। यही उसकी सबसे बडी सान्त्वना है। शायद इसीलिए सुनना, बोलने से कहीं अधिक प्रभावी होता है। समझना, समझाने से।
मैं बिस्तर पर कुछ देर लेटा रहा। मन शान्त होना शुरू हो गया था। मन की शान्ति शरीर के कोने-कोने में बूँद-बूँद टपकना शुरू हो गयी। हल्की-सी नींद आ रही थी। आज मैंने बिना काम किये भी कितना काम किया था। सिस्टर अंशु ने मुझे जगाकर कोई गोली मेरे मुँह में रखी और पानी का गिलास हाथ में थमा दिया। मैंने देखा पास ही मेरा राहुल खडा था। इतने में भोपाल से मेरी देखभाल करने आया मेरा शागिर्द दिनेश भी मुखौटा लगाकर आ गया।
सर, अब कैसा लग रहा है?
आज थोडी बेचैनी थी, पर अब ठीक है।
मैंने कहा। दिनेश आज रात ही भोपाल लौट रहा था। कुछ दिन बाद फिर आएगा। राहुल ने हमारी बातें सुन लीं हैं। वह सिस्टर अंशु के पास जाकर कुछ बोला और अंशु ने मेरे शरीर में पानी ले जाती नली में एक इन्जेक्शन लगा दिया।
मेरी पलकें भारी होने लगीं। मैं नलियों के बीच फँसा-सा कुछ देर के लिए सो गया।
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