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मेरे सर्वेश्वर

भानु भारती
मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि मुझे अपने से पहले वाली पीढी के प्रतिष्ठित कला व्यक्तित्वों से बहुत प्यार और आत्मीयता मिली, विशेष कर हिंदी के मूर्धन्य कवियों लेखकों से। लेकिन सर्वेश्वरजी से मेरा रिश्ता कुछ अलग ही था। क्या था, क्यों था, यह मैं स्वयं भी नहीं जानता। मैं उन्हें भाई साहब कहकर पुकारता था और उनसे एक बडे भाई जैसा प्यार और घनिष्ठ आत्मीयता मैंने पाई जो अपने आप में विरल थी।
सर्वेश्वरजी की कविताओं से मेरा परिचय जयपुर में अपने कॉलेज के दिनों से ही हो गया था। उन्हें प्रत्यक्ष देखने-सुनने का अवसर हुआ, जयपुर के रेडियो स्टेशन ने एक कवि सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें सर्वेश्वरजी भी आमंत्रित थे। यह शायद 1967 या 68 की बात है। उन्होंने अपनी ताजा कविता अब मैं यह खिडकी नहीं खोलूँगा सुनाई थी। कविता पाठ करते हुए उनकी वह छवि आज भी मेरी स्मृति में एकदम ताजा है। यह वह दौर था जब एक कवि के रूप में उनकी ख्याति अपने चरम पर थी। अपने समकालीनों में सर्वेश्वरजी की कविता का तेवर और मिजाज एकदम भिन्न था और हम जैसे युवा उनकी कविता के मुरीद थे। संश्लिष्ट आधुनिक कथ्य के बावजूद उनकी कविता में एक सरलता थी, जो आकर्षित करती थी। बाद में जब मैंने उन्हें जाना, तो वही सरलता उनके व्यक्तित्व में भी पाई। दिल्ली जैसी महानगरी में अपने गँवाईपन को जिंदा रख पाना और राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कवि एवं पत्रकार होने का जरा गुमान न होना, यह आज मैं समझ सकता हूँ कि कितनी बडी बात थी। लेकिन इस सरलता के साथ ही गाँव के व्यक्ति का अक्खडपन भी उनमें भरपूर था, यहाँ तक कि वह हाथापाई या गालीगलौज भी कर सकते थे। ऐसे भी किस्से उनके हैं।
1970 में जब मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अध्ययन के लिए गया, तभी प्रत्यक्ष भेंट उनसे हुई, जो कैसे इतना शीघ्र घनिष्ठ आत्मीयता में बदल गई पता ही नहीं चला । जल्द ही मैं उस परिवार का अभिन्न अंग बन गया था। बुआजी, विभा, शुभा सबसे आत्मीय रिश्ता अपने आप जैसे बनता चला गया । कोई विरला ही दिन होता होगा, जब मैं दिल्ली में रहूँ और उस परिवार से भेंट न हो। अक्सर शाम का खाना उसी परिवार के साथ होता। सर्वेश्वरजी से मेरे इस रिश्ते को शायद यह किस्सा अच्छे से बयान करे -
तब मैं दिल्ली में अकेला रह रहा था और पत्नी उदयपुर में एमएससी कर रही थी और हमारा चार साल का बेटा कनु जयपुर में अपने बडे पापा यानी कि दादा के साथ रह रहा था। कुछ ऐसा अवसर हुआ कि वह कुछ दिनों के लिए दिल्ली मेरे पास आ गया । पहली ही सुबह उसे जो दूध मैंने पीने के लिए दिया उसने एक घूँट भर कर छोड दिया और बुरा मुँह बनाकर कहा यह कैसा दूध है, मैं ऐसा दूध नहीं पीता। मैंने उसे बताया दिल्ली में डेयरी का दूध ही मिलता है और उसे यही दूध पीना पडेगा। जब मैंने थोडी सख्ती की, तो उसने मुझे धमकाया मैं आपकी शिकायत बडे पापा से कर दूँगा। मैंने हँस कर कहा कि ठीक है बडे पापा तो जयपुर में है जब जयपुर जाओगे, तभी तो करोगे तब तक दूध तो तुम्हें पीना पडेगा। उसी शाम वह मेरे साथ सर्वेश्वरजी के यहाँ गया जिनसे वह पहली बार मिल रहा था । थोडी देर वह चुपचाप बैठा उन्हें देखता रहा, हम लोग बातों में लगे थे कि अचानक कनु जोर से बोला अंकल पापा मुझे डेयरी का दूध पिलाते हैं। मुझे जोर की हँसी आ गई, लेकिन सर्वेश्वरजी कुछ समझ नहीं पाए। पूछा यह क्या कह रहा है? मैंने उन्हें बताया आप से मेरी शिकायत कर रहा है। वे चिंतित हो उठे और कनु से पूछा क्या बेटा क्या कह रहे हो, उसने फिर अपनी बात दोहरा दी। पापा मुझे डेयरी का दूध पिलाते हैं । मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि उस चार साल के बच्चे ने कुछ ही देर में यह जान लिया था कि उसके बडे पापा की अनुपस्थिति में मेरी शिकायत सर्वेश्वरजी से की जा सकती है।
उसके बाद तो रोज सर्वेश्वर अंकल के यहाँ उनके लिए चॉकलेट जमने लगी। कनु उन्हें डांस दिखाते और सर्वेश्वर अंकल तकिये के नीचे चॉकलेट जमाते । कनु की फरमाइश पर कविताएँ भी बनती। जो सामने हो उसी पर दो लाइने जड दी जाती, जैसे कि - भानु भारती मेरा नाम नाटक करना मेरा काम, या कि नंदकिशोर आचार्य अंकल पर - एक छींक नंदू को आई, इतना छींका, इतना छींका, गिरे पेड के सारे पत्ते धोखा हुआ हमें आँधी का । मैंने कहा अंकल अपने पर भी तो कुछ बनाएँ, तो जवाब था- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कभी किसी को बख्शे ना ।
सर्वेश्वरजी और उनके प्रिय मित्र विजयदेव नारायण साही के इलाहाबाद में सडक साहित्य के किस्से मशहूर रहे हैं। दिल्ली में सडक चलते यह सडक - साहित्य मुझे भी कई दफा सुनने देखने को मिला । सिकंदरा रोड से मंडी हाउस आते हुए लडकियों के कॉलेज की छुट्टी हुई, तो अचानक लडकियों के झुंड फाटक से बाहर निकले और तुरंत सर्वेश्वरजी का सडक साहित्य जागा- किड किड किड किया किया दडवे से, निकली पढी लिखी मुर्गियाँ ।
सर्वेश्वरजी दिनमान में नाटकों की समीक्षा करते थे। उन दिनों न तो कभी मुझे ही एहसास हुआ और न कभी उन्होंने ऐसा एहसास कराया, लेकिन अब मुझे समझ आता है कि रंगमंच में जो आज मेरी जगह है उसमें सर्वेश्वरजी की समीक्षाओं और दिनमान का कितना बडा हाथ रहा है। मैंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए एक जापानी नाटक द एलीफेंट खेला। नाटक लीक से बहुत अलग हटकर था और सर्वेश्वरजी को प्रस्तुति बहुत ही पसंद आई। उन्होंने मुझसे कहा मैं इस प्रस्तुति पर दिनमान में तीन पेज लिखूँगा, मैंने कहा आप ऐसा मत कीजिएगा लोगों को लगेगा कि आप से संबंध होने के कारण आपने मेरी प्रस्तुति की इतनी बडी समीक्षा की है। क्यों? मैं इसलिए नहीं लिखूँ कि मैं तुम्हारा दोस्त हूँ और दूसरे इसलिए नहीं लिखेंगे कि वह तुम्हारे दोस्त नहीं है या दुश्मन है, तो फिर कौन लिखेगा? और उन्होंने नाटक की बडी समीक्षा दिनमान में की।
लेकिन सर्वेश्वरजी से एक शिकायत मुझे हमेशा रही । उन्होंने केवल अपने आलस्य और आलस्य के चलते कोई बडा नाटक नहीं लिखा । नाटकों की उन्हें गहरी समझ थी जो विरले ही लेखकों कवियों में मैंने पाई, और मैं चाहता था कि वे कोई बडा काव्य नाटक हिंदी को दें जो मैं अब भी समझता हूँ उनके लिए संभव था । उन्होंने केवल दो नाटक लिखे- बकरी और गरीबी हटाओ । दोनों ही नाटक लघु प्रहसन हैं। बकरी का पहला प्रदर्शन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में मेरी क्लासमेट ज्योति देशपांडे के निर्देशन में खेला गया जिसमें मनोहर सिंह के साथ दूसरी मुख्य भूमिका मैंने ने निभाई । ज्योति को इस नाटक के निर्देशन के लिए प्रेरित करने वाला मैं ही था, क्योंकि मुझे को नाटक थोडा सपाट और सीधा यानी कि डायरेक्ट लगा और मैं खुद उसे नहीं खेलना चाहता था। उनके दूसरे नाटक गरीबी हटाओ से भी मैं बहुत संतुष्ट नहीं था लेकिन वह नाटक मैंने खेला और उसका सीधा सपाटपन कम करने के लिए मैंने अधिकार प्राप्त चरित्र जैसे कि नेता पुलिस वाले अफसर आदि तीन फुट के पुतलों से मंचित करवाएँ, जिन्हें काले आवरण में ढकी आकृति संचालित करती थी और साधारण लोग जैसे कि गाँव वाले मजदूर इत्यादि का मंचन वास्तविक चरित्र करते थे। धागों से संचालित पुतले सीधा तन कर चलते थे, जबकि उनसे कद में दुगने वास्तविक चरित्र जमीन पर रेंगते हुए चलते थे। सर्वेश्वरजी फाइनल ड्रेस रिहर्सल देखने आए। रिहर्सल के बाद हम दोनों पैदल बंगाली मार्केट की ओर आ रहे थे, तो वे जोर से हँसे और बोले मैंने रजाई से हाथ निकाल कर एक नाटक लिख दिया और भानु भारती महीना भर से माथा खपाए हैं। मैंने कहा हाँ, लेकिन अब मैं आप का नाटक तभी करूँगा, जब आप बडा काव्य नाटक लिखेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं वह नाटक जिसका मुझे इंतजार था कभी नहीं लिखा गया और एक दिन अचानक वह चले गए।
मैं उदयपुर में था और कनु को अपने स्कूल के ब्लैकबोर्ड पर उस दिन की ताजा खबर लिखनी थी। मैंने रेडियो ऑन किया, खबर आ रही थी हिंदी के प्रतिष्ठित कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,.. मुझे लगा भाई साहब को कोई बडा पुरस्कार मिला है, लेकिन आगे की पंक्तियाँ दिल दहला देने वाली थीं, उनका दिल्ली में निधन हो गया था। मैं जब तक पहुँचा, उनका पार्थिव शरीर भी बाकी नहीं बचा था, केवल राख लेकर बाणगंगा में तर्पण भर कर पाया । पर उनकी उपस्थिति अभी भी महसूस करता हूँ और कहीं से भी उनकी कविताओं की पंक्तियाँ फूट पडती हैं, जो मुश्किल और कठिन समय में बहुत बडा संबल तब भी थीं, आज भी हैं।
राह में बाँस के पुल की आश्वस्ति के साथ निडर आगे बढने की जो सीख वह हमें दे गए हैं, वह सच में हौसला देती है। यह महज इत्तफाक नहीं है कि आज भी हर जन आंदोलन में लोगों को सर्वेश्वरजी की कविता याद आती है। एक कवि की सामर्थ्य का इससे बडा प्रमाण भला और क्या हो सकता है?
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